प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
( 84 ) राजा—(आचमन करके देखकर) ये देवराज इन्द्र के मित्र दिलीप हैं, ये रघु हैं, ये मेरे पूज्य पिता अ है । आप लोगों के यहाँ आने का क्या कारण है ? अब तो मेरे लि भी आपके साथ रहने का समय आ पहुँचा है । र म, सीता, लक्ष्मण, मैं अब यहाँ से पितरो के पास जा रहा हूं । पितरों, यह मैं आया । (संज्ञा हीन हो जाते हैं ।) (काञ्चुकीय पर्दा गिराता है) सब—हाय, हाय, महाराज । हाय, हाय, महाराज । (सब निकलते हैं) दूसरा अंक समाप्त ।
तृतीय अङ्क ) मूल (ततः प्रविशति सुधाकारः) सुधाकारः—(सम्मार्जनादीनि कृत्वा) भवतु इदानीं कृतमत्र कार्य- मार्यसम्भकस्याज्ञप्तम् । यावन् मुहूर्तम् स्वप्स्यामि । (स्वपिति) (प्रविश्य) भटः—(चेटमुपगम्य ताडयित्वा) अंश्चो दास्याः पुत्र ! किमिदानीं कर्म न करोषि ? (ताडयति) सुधाकारः—(बुद्ध्वा) ताडय मां ताडय माम् । भटः—ताडिते त्वं कि करिष्यसि । सुधाकारः—अधन्यस्य मम कार्तवीर्यस्येव बाहुसहस्रं नास्ति । भटः—बाहुसहस्रेण किं कार्यम् । सुधाकारः—त्वां हनिष्यामि । भटः—एहि दास्याः पुत्र ! मृते मोक्ष्यामि । (पुनरपि ताडयति) सुधाकारः—(रुदित्वा) शक्यमिदानी भर्तः ! मेऽपराधं ज्ञातुम् । भटः—नास्ति किलापराधो नास्ति । ननु मया सन्दिष्टो भर्तृदारकस्य रामस्य राज्यविभ्रष्टकृतसन्तापेन स्वर्गं गतस्य भर्तुर्दशरथस्य प्रतिमागेहं द्रष्टुमद्य कोसल्यापुरोगैः सर्वैरन्तःपुरैरिहागन्तव्य- मिति । अत्रेदानीं त्वया किं कृतम् ? सुधाकारः—पश्यतु भर्ता अपनीतकपोतसन्दानकं तावद् गर्भगृहम् । सौधवर्णकदत्तचन्दनपञ्चाङ्गुला भित्तयः । अवसक्तमाल्य- दामशोभीनि द्वाराणि । प्रकीर्णा वालुकाः । अत्रेदानीं मया किं न कृतम् ? भटः—यद्येवं विश्वस्तो गच्छ । यावदहमपि सर्वम् कृतमित्यमात्याय निवेदयामि ।
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( 84 ) राजा—(श्राचमन करके देखकर) ये देवराज इन्द्र के मित्र दिलीप हैं, ये रघु हैं, ये मेरे पूज्य पिता अज हैं । श्राप लोगो के यहाँ श्राने का क्या कारण है ? अब तो मेरे लिए भी श्रापके साथ रहने का समय श्रा पहुँचा है । र म, सीता, लक्ष्मण, मैं अब यहाँ से पितरों के पास जा रहा हूं । हे पितरों, यह मैं श्राया । (संज्ञा हीन हो जाते हैं ।) (काञ्चुकीय पर्दा गिराता है) सब—हाय, हाय, महाराज । हाय, हाय, महाराज । (सब निकलते हैं) दूसरा श्रंक समाप्त ।
पुरोगैः - कौसल्या जिनके आगे चल रही है, ऐसी । अन्तःपुरैः = रानियों के द्वारा । आगन्तव्यम् = आना चाहिये । अपनीत = हटाना । कपोतसन्द्वानकं = कबूतरो के घोसलो को । गर्भगृह = मध्यगृह अर्थात् बीच का भवन । सौध- [पार्श्व टिप्पणी: पदविज्ञात-] वर्णकदत्त = सुधामय (सफेद) रग से पोतना । चन्दनापञ्चाङ्गुला = चन्दन से [पार्श्व टिप्पणी: ज इति।] पाँचो अंगुलियो के निशान बनाना । भित्तयः = दीवारे । अवसक्त = संयोजित करना या लगाना । माल्यदामशोभीनि = फूलों की मालाओ से सुशोभित । प्रकीर्णाः = बिखेरी गई । बालुकाः = रेत । विश्वस्तः = पीटने के भय से रहित । प्रवेशकः = यह भी विष्कम्भक के समान ही आगे आने वाली घटनाओ के सक्षिप्त अर्थ का सूचक है । सावेगम् = पीड़ा के साथ । मातुलपरिचयात् = मामा युधाजित के पास रहने के कारण । अविज्ञातवृत्तान्तः = समाचारो को न जानने वाला । अस्मि = हूं । दृढम् = नितान्त । अकल्यशरीरः = रोगग्रस्त शरीर वाले । व्याधिः = रोग । हृदयपरितापः = आधि या मानसिक पीडा । आहुः = कहा है । भिषजः = वैद्य । भुङ्क्ते = खाते है । निरशनः = निराहार रहने वाले । दैवम् = कुछ भी नही कहा जा सकता है । स्फुरति = फड़क रहा है । वाहय = चलाओ । अन्वय—मे पितुः कः व्याधिः, खलु महान् हृदयपरितापः । वैद्याः तम् किम् आहुः, खलु तत्र निपुणाः भिषज. न । किम् आहारम् भुङ्क्ते शयनम् अपि (अनुभवति) । भूमौ निरशनः । किम् आशा स्यात् । दैवम् । हृदयम् स्फुरति, रथम् वाहय । (१) हिन्दी अर्थ (इसके बाद सुधाकार का प्रवेश) सुधाकार—(झाडू लगा कर) अच्छा, इस समय आर्य संभावक द्वारा बताए गए सभी कार्य तो कर लिए । अब थोड़ी देर तक सो लूँ । (सोता है) (प्रवेश करके) भट—(चेट के पास जाकर और पीट कर) अरे दासी-पुत्र, अब काम क्यों नहीं करता ? (पीटता है) सुधाकार—(जाग कर) मार लो, मुझे मार लो । भट—मारने पर तुम क्या करोगे ?
( 86 ) (निष्क्रान्तौ) (प्रवेशकः) (ततः प्रविशति भरतो रथेन सूतश्च) भरतः- (सावेगम्) सूत ! चिरं मातुलपरिचयादविज्ञातवृत्तान्तो ऽस्मि । श्रुतं मया दृढमकल्यशरीरो महाराज इति । तदुच्यताम्— पितुर्मे को व्याधिः सूतः--हृदयपरितापः खलु महान् भरतः--किमाहुस्त वैद्या' सूतः--न खलु भिषजस्तत्र निपुणाः । भरतः--किमाहारं भुङ्क्ते शयनमपि सूतः--भूमौ निरशनः भरतः-किमाशा स्याद सूतः--दैव भरत.---स्फुरति हृदयं वाहय रथम् ॥ (१) सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (रथं वाहयति) शब्दार्थ—सुधाकार˙ = चूने की कलई आदि से सफेदी करने वाला सम्मार्जनादीनि = स्वच्छता आदि । कृत्वा = करके अर्थात् झाडू लगाकर भवतु = ठीक है । कृतम् = कर लिया है । आर्यसम्भपकस्य = पूज्य सम्भप- का (यह काञ्चुकीय का नाम है) । आज्ञप्तम् = आदेश दिया गया । मुहूर्तम् = थोडे समय के लिए । स्वप्स्यामि = सोऊँगा । भट˙ = सिपाही । चेटम् उपगम्य = सेवक के पास जाकर । ताडयित्वा = पीट कर । अंघो = अरे । दास्या पुत्र = दासी के लड़के (यह सभ्य समाज की गाली है, किसी को "दासी का पुत्र' कहना उसे गाली देना है, क्योकि इससे उसकी माँ का अपमान झलकता है) मृते = मरने पर । मोक्ष्यामि - छोड़ू गा । शक्यम् - समर्थ हूँ । भर्त˙ - स्वामि । अपराधे - दोष । सन्दिष्ट. - आज्ञा दिए गए हो । भर्तृदारकस्य = राजकुमार । विभ्रष्ट = हटना । कृत ~ होने वाले । प्रतिमागेह = मृत राजाओं की स्मृति मे जहाँ उनकी प्रतिमाएँ लगाई जाती हैं, उस स्थान को । कौसल्य.
पुरोगैः = कौसल्या जिनके आगे चल रही है, ऐसी । अन्तःपुरैः = रानियों के द्वारा। आगन्तव्यम् = आना चाहिये । अपनीत = हटाना । कपोतसन्दानकं = कबूतरों के घोंसलो को । गर्भगृह = मध्यगृह अर्थात् बीच का भवन । सोध- वर्णकदत्त = सुधामय (सफेद) रग से पोतना । चन्दनापञ्चाऽगुला = चन्दन से पांचों अंगुलियो के निशान बनाना । भित्तयः = दीवारे । अवसक्त = संयोजित करना या लगाना । माल्यदामशोभीनि = फूलों की मालाओ से सुशोभित । प्रकीर्णाः = बिखेरी गई । बालुकाः = रेत । विश्वस्तः = पीटने के भय से रहित । प्रवेशकः = यह भी विष्कम्भक के समान ही आगे आने वाली घटनाओं के संक्षिप्त अर्थ का सूचक है। सावेगम् = पीडा के साथ । मातुलपरिचयात् = मामा युधाजित के पास रहने के कारण । अविज्ञातवृत्तान्तः = समाचारो को न जानने वाला । अस्मि = हूं । बाढम् = नितान्त । अकल्यशरीरः = रोगग्रस्त शरीर वाले । व्याधिः = रोग । हृदयपरितापः = आधि या मानसिक पीडा । आहुः = कहा है। भिषजः = वैद्य । भुङ्क्ते = खाते हैं । निरशनः = निराहार रहने वाले। दैवम् = कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। स्फुरति = फडक रहा है। वाहय = चलाओ । अन्वय—मे पितुः कः व्याधिः, खलु महान् हृदयपरितापः । वैद्याः तम् किम् आहुः, खलु तत्र निपुणाः भिषजः न । किम् आहारम् भुङ्क्ते शयनम् अपि (अनुभवति) । भूमौ निरशनः । किम् आशा स्यात् । दैवम् । हृदयम् स्फुरति, रथम् वाहय । (१) हिन्दी अर्थ (इसके बाद सुधाकार का प्रवेश) सुधाकार--(झाडू लगा कर) अच्छा, इस समय आर्य संभावक द्वारा बताए गए सभी कार्य तो कर लिए । अब थोड़ी देर तक सो लूँ । (सोता है) (प्रवेश करके) भट--(चेट के पास जाकर और पीट कर) अरे दासी-पुत्र, अब काम क्यों नहीं करता ? (पीटता है) सुधाकार - (जाग कर) मार लो, मुझे मार लो । भट—मारने पर तुम क्या करोगे ?
( ८८ ) सुधाकार—मुझ अभागे के कार्तवीर्य के समान हजार भुजाएँ नहीं हैं । भट हजार भुजाओ के होने पर क्या करते ? सुधाकार—तुमको समाप्त कर देता । भट—अरे, दासीपुत्र, अब तो दम निकाल कर ही छोडूंगा । (फिर पीटता है) सुधाकार—(रोकर) हे स्वामी, क्या मैं इस समय मेरा दोष जान सकता हूँ भट—कुछ दोष नही, सचमुच तेरा कुछ दोष नही है । मैंने जो कहा था कि राजकुमार राम को राज्य न मिलने से उत्पन्न होने वाले दुःख से मृत्यु को प्राप्त होने वाले राजा दशरथ के प्रतिमा-गृह को देखने आज कौसल्या आदि के साथ समूचा रनिवास यहाँ आ रहा है । तो फिर तूने यहाँ क्या किया है ? सुधाकार—स्वामी देखिए । गर्भगृह मे बनाए गए कबूतरो के घोसलों को हटा दिया है । दीवारें सफेदी से पोत दी हैं और उन पर चन्दन से पचांगुलिका के आकार बना दिए गए हैं । दरवाजों को पुष्प- मालाओं से सजा दिया है । चारो ओर रेत बिछा दी गई हे । यहाँ अब मैंने क्या नहीं किया ? भट—यदि ऐसा है तो निश्चिन्त होकर जाओ । मै भी मन्त्री जी को-पूरी तैयारी की सूचना दे देता हूँ । (दोनों निकल जाते है) (प्रवेशक) (इसके बाद रथ में बैठे भरत और सारथि का प्रवेश) भरत—(चिन्तापूर्वक) सारथि, बहुत समय तक मामाजी के यहाँ रहने के कारण मुझे घर के कोई समाचार नहीं मिले । मैंने सुना था कि महाराज अधिक रुग्ण है । अतः कहो—मेरे पिताजी को कौन सा रोग है ? सूत—दारुण मानसिक सन्ताप । भरत—उनको वैद्यो ने क्या कहा ? सूत—वहाँ कोई चतुर वैद्य नही, जो बता सके । भरत—उनके खाने और सोने की क्या व्यवस्था है ? सूत—पृथ्वी पर बिना भोजन किए रहते हैं ।
भरत—क्या उनके जीने की आशा है ? सूत—भगवान् ही जाने । भरत—मेरा हृदय धड़क रहा है, रथ चलाओ । (१) सूत—जैसी महाराज की आज्ञा । (रथ चलाता है) (२) मूल भरतः— (रथवेगं निरूप्य) अहो नु खलु रथवेगः । एते ते, द्रुमा धावन्तीव द्रुतरथगतिक्षीणविषया नदीवोद्वृत्ताम्बुर्निपतति मही नेमिविवरे । अरव्यक्तिर्नष्टा स्थितमिव जवाच्चक्रवलय रजश्चाश्वोद्धूतं पतति पुरतो नानुपतति ॥ (२) सूतः—आयुष्मन्, सोपस्नेहतया वृक्षाणामभितः खल्वयोध्या भवितव्यम् । भरतः—अहो नु खलु स्वजनदर्शनोत्सुकस्य त्वरता मे मनसः । सम्प्रति हि, पतितमिव शिरः पितुः पादयो. स्निह्यतेवास्मि राज्ञा समुत्थापित त्वरितमुपगता इव भ्रातर. क्लेदयन्तीव मामश्रुभिर्मातरः । सदृश इति महानिति व्यायतश्चेति भृत्यैरिवाह स्तुतः सेवया परिहसितमिवात्मनस्तत्र पश्यामि वेष भाषां च सौमित्रिणा ॥ (३) सूतः— (आत्मगतम्) भो ! कष्टम् यदयमविज्ञाय महाराजविनाश- मुदर्के निष्फलामाशां परिवहन्नयोध्यां प्रवेक्ष्यति कुमारः । जानद्भिरप्यस्माभिर्न निवेद्यते । कुतः, पितुः प्राणपरित्यागं मातुरैश्वर्यलुब्धताम् । ज्येष्ठभ्रातुः प्रवासं च त्रीन् दोषान् कोऽभिधास्यति ॥ (४) (प्रविश्य) भटः — जयतु कुमारः । भरतः—भद्र ! कि शत्रुघ्नो मामभिगत । भटः—अभिगतः ख वर्तते कुमारः । उपाध्यायास्तु भवन्तपाहुः ।
(90)
भरतः—किमिति किमिति । भटः—एकनाडिकावशेषः कृत्तिकाविषयः । तस्मात् प्रतिपन्नायामेव रोहिण्यामयोध्यां प्रवेक्ष्यति कुमारः । भरतः—वाढमेवनम् । न मया गुरुवचनमतिक्रान्तपूर्वम् । गच्छ त्वम् । भटः—यदाज्ञापयति कुमारः । (निष्क्रान्तः) शब्दार्थ—रथवेगं = रथ की गति को । निरूप्य = देख कर । क्षीण- विषयाः = अल्पीभूत पदार्थ वाले । उद्वृत्ताम्बुः = उछलते हुए जल वाली । नेमिविवरे = पहिए के घेरे के रन्ध्र में । अरव्यक्तिः = पहिए के नाभि मध्य के अवयव अरों की स्फुट प्रतीति । स्थितम् = गति रहित । जवात् = वेग के कारण । चक्रवलयम् = पहिए का मण्डल । रजः = धूलि । अश्वोद्धूतं = घोड़ों के खुरों से उडी हुई । पुरतः = आगे । नानुTurnपतति = पीछे नही गिरती है । घोपस्नेहतया = घने और शीतल होने के कारण । अभितः = आगे । त्वरता = शीघ्रता । स्निह्यता = प्रेम प्रदर्शित करते हुए । समुत्थापितः = उठाते हुए । उपगता = पहुँचा हुआ । क्लेदयन्ति = सींच रही हैं । सदृशः = पहले के समान ही । व्यायतः = नियन्त्रित या बलवान् । आत्मनः = स्वयं के । सौमित्रिणा = लक्ष्मण के द्वारा । अविज्ञाय = नहीं जान कर । उदर्के = उत्तर काल में । निष्फलाम् = फलरहित । आशानाम् = मनोरथ को । परिवहन् = धारण करते हुए । प्रवेक्ष्यति = प्रवेश करेगा । जानद्भिः = जानते हुए भी । निवेद्यते = कहा जा रहा है । प्राणपरित्यागं = मृत्यु को । ऐश्वर्यलुब्धताम् = धन लोलुपता को । प्रवास = देशान्तरगमन को । दोषान् = दुःखपूर्ण समाचारों को । अभिधास्यति = कहेगा । अभिगतः = आया है । उपाध्यायाः = वसिष्ठ, वामदेव आदि ने । भवन्तम् = आपको । आहुः = कहा है । नाडिका = २४ मिनट का काल या आधे मुहूर्त का समय । कृत्तिकाविषय = कृत्तिका नक्षत्र का समय । प्रतिपन्ना- याम् = बीत जाने पर । गेहिण्याम् = रोहिणी नक्षत्र में । वाढम् = हाँ, ठीक है । अतिक्रान्तपूर्वम् = पहले उल्लंघन करना । अन्वय—द्रुतरयगतिक्षीणविषयाः द्रुमाः धावन्ति इव । मही उद्- वृत्ताम्बुः नदी इव नेमिविवरे निपतति । अरव्यक्तिः नष्टा । चक्रवलयम् जवात् स्थितम् इव । अश्वोद्धूतं रजः च पुरतः पतति न अनुपतति । (२)
( ९१ ) अन्वय— पितुः पादयोः शिरः पतितम् इव। स्निह्यता राज्ञा समुत्था- पितः इव अस्मि। भ्रातरः त्वरितम् उपगता इव। मातरः अश्रुभिः माम् क्लेदयन्ति इव। सदृशः इति, महान् इति, व्यायतः च इति भृत्यैः सेवया अहम् स्तुतः इव। तत्र आत्मनः वेषं च भाषां च सौमित्रिणा परिहसितम् इव पश्यामि। (३) अन्वय—पितुः प्राणपरित्यागम्, मातुः ऐश्वर्यलुब्धताम्, ज्येष्ठभ्रातुः प्रवासम्, त्रीन् दोषान् कः अभिधास्यति। (४) हिन्दी अर्थ भरत—(रथ की गति को देख कर) अहा। रथ किस तीव्रता से भागा जा रहा है। ये वृक्ष रथ की तेज गति के कारण आँखों से ओझल होते हुए मानो दौड़ रहे हैं। भँवर से युक्त जल वाली नदी की भाँति पृथ्वी धुरी के छिद्र में मानो गिर रही है। बड़ी तेजी से घूमने के कारण चक्र के आरे दीख नहीं रहे हैं। रथ का पहिया वेग से मानो गति हीन हो रहा है और धूलि घोड़ों के खुरों से उड़ कर सामने ही गिरती है पीछे नहीं। (२) सूत—हे दीर्घायु, वृक्षों की सघनता तथा शीतलता से जान पड़ता है कि अयोध्या पास में ही है। भरत—अहा, आत्मीय जनों को देखने के लिए मेरा मन कितना उतावला हो रहा है। क्योंकि, इस समय—ऐसा लग रहा है कि पिताजी के चरणों में मेरा सिर झुका हुआ है और उन्होंने मुझे प्रेम से उठा सा लिया है। भाई शीघ्रता से आकर मुझे घेर से रहे हैं। जननियां आँसुओं से मुझे भिगो सी रही हैं। भरत पहले के समान ही है, पहले से बड़े हो गए हैं, इस प्रकार कहते हुए सेवक लोग मेरी सेवा करते हुए प्रशंसा कर रहे हैं और लक्ष्मण मेरी निम्न प्रकार की वेशभूषा तथा बोली पर परिहास कर रहा है। (३) सूत—(मन में) अरे, दुःख की बात है कि यह राजकुमार महाराज की मृत्यु को नहीं जान कर भावी मिथ्या आशा को लिए हुए अयोध्या में प्रवेश
( ९२ ) करेगा और मैं जानते हुए भी इसे नही बता पा रहा हूं । क्योकि, पिता दशरथ की मृत्यु, माता कैकेयी का राज्यलोभ और वडे भाई राम का वनवास इन तीनो दोषों को कौन कहेगा । (४) (प्रवेश करके) भट - राजकुमार की जय हो । भरत-भद्र, क्या शत्रुघ्न मेरे पास श्रा रहे हैं । भट- हां, राजकुमार तो श्रापके पास श्रा ही रहे हैं । किन्तु उपाध्यायों ने श्रापसे कहा है । भरत - क्या कहा है, क्या कहा है ? भट- कृत्तिका का एक दण्ड (६० पल या २४ मिनट का काल=नाडी या नाडिका) रह गया है । उसके बीत जाने पर रोहिणी मे कुमार श्रोयोध्या मे प्रवेश करे । भरत-बहुत अच्छा । मैंने गुरुजनो के वचन पहले कभी नही टाले । तुम चलो । भट - जैसा राजकुमार श्रादेश देते हैं। (निकल जाता है) (३) मूल भरतः- अथ कस्मिन् प्रदेशे विश्रमिष्ये । भवतु दृष्टम् । एतस्मिन् वृक्षान्तराविष्कृते देवकुले मुहूर्तम् विश्रमयिष्ये । तदुभयं भविष्यति-दैवतपूजा विश्रमश्च । अथ च उपोपविश्य प्रवेष्ट- व्यानि नगराणीति सत्समुदाचारः । तस्मात् स्थाप्यताम् रथः । सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (रथं स्थापयति) भरतः- (रथादवतीर्य) सूत ! एकान्ते विश्रामयाश्वान् । सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (निष्क्रान्तः) भरतः- (किञ्चिद गत्वावलोक्य) साधुमुक्तपुष्पलाजाविष्कृता वलयः, दत्तचन्दनपञ्चाङ्गला भित्तयः, अवसक्तमाल्यदामशोभीनि द्वाराणि, प्रकीर्णा वालुकाः । किं नु खलु पार्वणोऽयं विशेषः श्रथवा आह्निक मास्तित्वयम् ? कस्य नु खलु दैवतस्य स्थानं भविष्यति । नेह किञ्चित् प्रहरणं ध्वजो वा बहिश्चिह्नं दृश्यते । भवतु प्रविश्य ज्ञास्ये । (प्रविश्यावलोक्य) अहो
( 93 )
धुर्यम् पाषाणानाम् । अहो भावगतिराकृतीनाम् । दैवतोद्- दिष्टानापि मानुषविश्वासतासां प्रतिमानाम् । किन्नु खलु चतुर्देवतोऽय स्तोमः । अथवा यानि तानि भवन्तु । अस्ति तावन्मे मनसि प्रहर्षः । काम दैवतमित्येव युक्त नमयितुं शिरः । विफलस्तु प्रणाम. स्याद मन्त्रार्चितदैवतः ॥ (५) (प्रविश्य) देवकुलिकः—भोः ! नैत्यकावसाने प्राणिधर्ममनुतिष्ठति मयि को नु खल्वयमासा प्रतिमानामल्पान्तराकृतिरिव प्रतिमागृहं प्रविष्टः ? भवतु, प्रविश्य ज्ञास्ये । (प्रविशति) भरतः—नमोऽस्तु । देवकुलिकः- न खलु न खलु प्रणामः कार्यः । भरतः—मा तावद् भो ! वक्तव्य किञ्चिदमासु विशिष्ट प्रतिपाल्यते । किं कृतः प्रतिषेधोऽय नियमप्रभविष्णुता ॥ (६) देवकुलिकः— य खल्वेतैः कारणैः प्रतिषेधयामि भवन्तम् । किन्तु दैवतशकया ब्राह्मणजनस्य प्रणामं परिहरामि । क्षत्रिया ह्यत्र- भवन्तः । भरतः—एवम् । क्षत्रिया ह्यत्रभवन्तः । अथ के नामात्रभवन्तः । देवकुलिकः- इक्ष्वाकवः । भरतः— (सहर्षम्) इक्ष्वाकव इति । एते ते ऽयोध्याभर्तारः । एते ते देवतानामसुरपुरवधे गच्छन्त्योऽभिसरीः— मेते ते शत्रुलोके सपुरजनपदा यान्ति स्वसुकृतैः । एते ते प्राप्नुवन्तः स्वभुजबुलजितां कृत्स्नां वसुमती मेने ते मृत्युना ये चिरमिवसिताश्छन्दं मृगयता ॥ (७) भोः ! यदृच्छया खलु मया महत् फलमासादितम् । अभिधीयता कस्तावदत्रभवान् ?
( ९४ ) शब्दार्थ—प्रदेशे=स्थान पर । विश्रमिष्ये=आराम करूंगा । वृक्षान्त राविष्कृते=पेडो के मध्य दीखने वाले । देवकुले=मन्दिर मे । मुहूर्तम्=थोडी देर तक । उभय=दोनो । उपोपविश्य = थोडी देर बैठकर । सत्समुदाचारः = शिष्टाचार । स्थाप्यताम् = रोको । विश्रामय=आराम कराओ । साधु- मुक्त पुष्पलाजाविष्कृताः=सज्जन व्यक्ति से विकीर्ण किए गए फूल व खीलों से प्रकट होने वाले । बलय. =प्रसाद या नैवेद्य । अवसक्त=लटकने वाली । पार्वणः =पूर्णिमा आदि विशेष तिथि पर होने वाला । आह्निकम्=प्रतिदिन किया जाने वाला । आस्तिक्यम् = ईश्वर भक्त का । दैवतस्य=देवता का । इह-यहाँ पर । प्रहरणम्=शक्ति आदि आयुध । बहिश्चिह्नं=बाहरी लक्षण । ज्ञास्ये= मालूम करूंगा । क्रियामाधुर्यम्= शिल्प चातुरी । भावगति = भावों की अभि- व्यक्ति । दैवतोद्दिष्टानां=देवताओ को प्रतिमा स सकल्पित । मानुषविश्वासातः =मनुष्यो की प्रतिमा की विश्वास योग्यता । चतुर्देवता=चार देवताओ का । स्तोम.=समूह । वार्षल = शूद्र सम्बन्धी । अमन्त्रार्चितदैवतः-देवता के मन्त्र और पूजा के बिना । देवकुलिक =पुजारी । नैत्यकावसाने=पूजा आदि नित्य कर्म की समाप्ति पर । प्राशणधमंम्=भोजन को । अनुतिष्ठति=कर लेने पर । अल्पान्तराकृति = बहुत कम भेद वाले आकार का । ज्ञास्ये=ज्ञात करूगा । नमोऽश्वरतु = नमस्कार होवे । मा तावद् भोः = ऐसा मत कहो । वक्तव्यम् = दूषण । विशिष्ट.= मुझ से अच्छे व्यक्ति की । प्रतिपाल्यते= प्रतीक्षा की जा रही है । नियमप्रभविष्णुता = स्वय के तपोनुष्ठान की प्रौढ़ता । दैवतशकया प्रतिमाओ के भ्रम मे । परिहरामि= मना कर रहा हूँ । असुरपरवधे - राक्षसों के नगर मे रहने वालो को समाप्त करने मे । अभिसरी=सहायता के लिए । शक्रलोके = इन्द्रलोक स्वर्ग मे । सुपरजनपदाः = नगर की प्रजाओं के साथ । यान्ति = जाते है । स्वसुकृतैः = अपने पुण्यो के द्वारा । स्वभुजवलजिता = अपने बाहुबल से जीती गई । कृत्स्नाम् सम्पूर्ण । वसुमतीम् = पृथ्वी को । अनवसिताः = नही समाप्त किये जाने वाले । छन्द = अभिप्राय को । मृगयता= ढूँढते हुए । यदृच्छया = अनायास ही । आसादितं = प्राप्त कर लिया है । अभिधीयताम् = कहो । अत्रभवान् = ये । अन्वय--दैवतम् इति इव शिरः नमयितुम् कामम् युक्तम् । प्रणामा तु अमन्त्रार्चितदैवत. वार्षलः स्यात् । (१५)
( 95 ) अन्वय—अस्मासु किञ्चित् वक्तवयम् ; विशिष्टः प्रतिपाल्यते । अयं प्रतिषेधः किं कृतः, नियमप्रभविष्णुता । (६) अन्वय—एते ते असुरपुरवधे दैवतानाम् अभिसरीम् गच्छन्ति । एते ते सपुरजनपदाः स्वसुकृतैः शक्रलोके गच्छन्ति । एते ते कृत्स्नाम् वसुमतीम् स्वभु- जबलजिताम् प्राप्नुवन्तः (सन्ति) । एते ते छन्द मृगयता मृत्युना चिरम् अनव- सिताः । (६) हिन्दी अर्थ भरत—तब तक किस जगह विश्राम करूँ । ठीक' है, देख लिया । वृक्षों के मध्य दिखने वाले इस मन्दिर में थोड़ी देर तक आराम करूँगा । इस प्रकार देवदर्शन और विश्राम दोनो काम हो जायेगे । और नगर के समीप थोडी देर बैठ कर फिर उसमे प्रवेश करना चाहिए, इस प्रकार शिष्टाचार का भी पालन हो जाएगा । अतः रथ को रोको । सूत—जैसी दीर्घायु की आज्ञा । (रथ ठहराता है) भरत—(रथ से उतरकर) सूत, घोडो को एक ओर ले जाकर आराम कराओ । सूत—जो आज्ञा । (निकल जाता है) भरत—(कुछ चलकर और देखकर) यहाँ तो विधिवत् खील और फूल के नैवेद्य दिए गए है । दीवारो की पुताई के ऊपर चन्दन से पाँचो अंगु- लियों की छापें लगाई गई है । दरवाजो पर फूलो की मालाएँ लटक रहीं है । बाहर रेत बिछी है । क्या कोई त्यौहार है, जिसकी यह विशेषता है अथवा प्रतिदिन का नियम पालन है । यह कौन से देवता का स्थान हो सकता है । यहाँ शस्त्र, ध्वजा आदि बाहरी चिह्न भी तो नही दीख पड़ते । ठीक है, अन्दर जाकर ज्ञात करूँगा । (प्रवेश करके और देखकर) अहा, पत्थर की कारीगरी कितनी अच्छी है । मूर्तियो मे भावव्यंजना सजीव प्रतीत होती है । ये प्रतिमाएँ देवताओ की होकर भी मनुष्यो के समान जान पडती है । क्या यह चार देवताओ की मूर्तियो का समूह है ? अथवा जो कुछ भी होवे । मुझे तो इन्हे देखकर अपार आनन्द हो रहा है ।
( 96 ) ये देवमूर्तियां हैं, ऐसा समझकर तो इन्हें प्रणाम करना उचित है। किन्तु विशेष परिचय न होने से बिना मन्त्र पढ़े ही प्रणाम करना होगा और यह परिपाटी शूद्रो की सी होगी । (५) (प्रवेश करके) देवकुलिक—अरे, नित्य नियत पूजा पाठ कर लेने के बाद मेरे भोजन आदि के अवसर पर इन मूर्तियो से मिलती जुलती आकृति वाला यह कौन व्यक्ति इस प्रतिमा गृह मे आया है । अच्छा, भीतर जाकर पता लगाता हूँ । (प्रवेश करता है) भरत—नमस्कार है । देवकुलिक—नही, नही, प्रणाम मत करो । भरत — क्यों ? ऐसा मत कहो । क्या हममे कोई दोष है, या हमसे किसी अच्छे आदमी की प्रतीक्षा कर रहे हो । यह प्रणाम करने के लिएमना क्यो रहे हो । क्या यह तुम्हारा अधिकार मद तो नही है ? (६) देवकुलिक—मैं आपको इन कारणो से नही रोक रहा हूँ । किन्तु कही तुम ब्राह्मण होकर देवताओ के भ्रम से इन मूर्तियो को प्रणाम न कर लो इसलिए मना कर रहा हूँ । ये मूर्तियाँ क्षत्रियो की हैं ? भरत—ऐमा । क्या ये क्षत्रिय महानुभाव है । अच्छा, तो फिर इन श्रीमानो के क्या नाम हैं। देवकुलिक—ये इक्ष्वाकु वंशीय है । भरत—(प्रसन्नतापूर्वक) क्या इक्ष्वाकुवंशी । क्या ये अयोध्या के राजा है ? ये वे ही लोग है, जो राक्षसों का विनाश करने में देवताओ की सहायता के लिए जाते रहे है । ये वे लोग है, जो अपने पुण्यों के प्रताप से अपने नगर व प्रजा जनों के साथ स्वर्ग जाते रहे हैं । ये वे है, जो अपने बाहुबल से सम्पूर्ण भूमण्डल को जीतकर अपने अधिकार में करते रहे हैं । और ये वे है, जो इच्छानुसार ढूंढने वाली मृत्यु के द्वारा भी बहुत समय तक समाप्त नही किए जाते हैं, अर्थात् जिनकी मृत्यु अपनी इच्छा पर निर्भर करती है । (७)
( 97 ) अहा, अकस्मात् स्वेच्छा से ही मुझे महान् फल मिल गया । आप कहिए, ये कौन महानुभाव है ? (४) मूल देवकुलिकः—अयं खलु तावत्त सन्निहितसर्वरत्नस्य विश्वजितो यज्ञस्य प्रवर्तयिता प्रज्वलितधर्मप्रदीपो दिलीपः । भरतः—नमोऽस्तु धर्मपरायणाय । अभिधीयतां कस्तावदत्रभवान् ? देवकुलिकः—अयं खलु तावत् संवेशनोत्थापनयोरनेकब्राह्मणजन- सहस्रप्रयुक्तपुण्याहशब्दरवो रघुः । भरतः—अहो बलवान् मृत्युरेतामपि रक्षामतिक्रान्तः । नमोऽस्तु ब्राह्मणजनावेदितराज्यफलाय । अभिधीयतां कस्ताव- दत्रभवान् ? देवकुलिकः—अथ खलु तावत् प्रियावियोगनिर्वेदपरित्यक्तराज्यभारो नित्यावभृथस्नानप्रशान्तरजा अजः । भरतः—नमोऽस्तु श्लाघनीयपश्चात्तापाय । (दशरथस्य प्रतिमामव- लोकयन् पर्याकुलो भूत्वा) भोः ? बहुमानव्याक्षिप्तेन मनसा सुव्यक्तं नावधारितम् । अभिधीयतां कस्तावदत्रभवान् ? देवकुलिकः—अयं दिलीपः । भरतः—पितृपितामहो महाराजस्य । ततस्ततः । देवकुलिक.—अत्रभवान् रघुः । भरतः—पितामहो महाराजस्य । ततस्ततः । देवकुलिकः—अत्रभवानजः । भरतः—पिता तातस्य । किमिति किमिति । देवकुलिक —अयं दिलीपः, अयं रघुः, अयमजः । भरतः—भवन्तं किञ्चित् पृच्छामि । धरमाणानामपि प्रतिमाः स्थाप्यन्ते ? देवकुलिकः—न खलु, अतिक्रान्तानामेव । भरतः—तेन ह्यापृच्छे भवन्तम् । देवकुलिकः—तिष्ठ ।
( 98 ) येन प्राणाश्च राज्य च स्त्रीशुल्कार्थे विसर्जिताः । इमा दशरथस्य त्व प्रतिमा कि न पृच्छसे ॥ ( ८ ) भरतः—हा तात ! (मूर्च्छितः पतति । पुनः प्रत्यागत्य) हृदय भव सकामं यत्कृते शकसे त्वं शृणु पितृनिधनं तद् गच्छ धैर्यम् च तावत् । स्पृशति तु यदि नीचो मामयं शुल्कशब्द स्त्र्यर्थं च भवति सत्यं तत्र देहो विशोध्यः ॥ ( ६ ) आर्य ! देवकुलिकः—आर्येति-इक्ष्वाकुकुलालापः खल्वियम् । कच्चित् कैकेयी- पुत्रो भरतो भवान् ननु ? भरतः—अथकिम् अथकिम् । दशरथपुत्रो भरतोऽस्मि, न कैकेय्याः । देवकुलिकः—तेन ह्यापृच्छे भवन्तम् । भरतः—तिष्ठ । शेषमभिधीयताम् । देवकुलिक.—का गतिः । श्रूयताम् । उपरतस्तत्रभवान् दशरथः । सीता- लक्ष्मणसहायस्य रामस्य वनगमन प्रयोजनं न जाने । भरतः—कथं कथमार्योऽपि वनं गतः । (द्विगुण मोहमुपगतः) शब्दार्थ--देवकुलिकः = पुजारी । सन्निहितसर्वरत्नस्य = सभी प्रकार की बहुमूल्य वस्तुओं को अपने पास रखने वाले । विश्वजितो यज्ञस्य=विश्वजित् नामक यज्ञ के । प्रवर्त्तयिता=करने वाले । प्रज्वलितधर्मप्रदीप-=धर्म रूपी दीपक को सतत जलाने वाले । धर्मपरायणाय=धर्मनिष्ठ को । अभिधीयता= कहो । सवेशनोत्थापनयोः=सोने के और उठने के समय में । सहस्र=हजार । पुण्याहशब्दरवो=पवित्र मन्त्र पाठो की वाचन ध्वनि वाला । एताम्=इस (रक्षा) को । अतिक्रान्त =पार गई । आवेदित=देना । प्रियावियोग = प्रिय रानी इन्दुमति का विरह । निर्वेद=विषयो से विमुखता । नित्य=सदा । अवभृतस्नान= यज्ञ की दीक्षा का अभिषेक । प्रशान्तरजा =रजोगुण को धोने वाले । अजः= राजा का नाम । श्लाघनीय=प्रशंसनीय । पश्चात्तापाय=प्रिया की अत्यधिक आसक्ति रूपि अनुताप वाले । पर्याकुलः=व्याकुल । बहुमानव्याक्षिप्तेन=अत्यन्त सम्मान या गौरव के कारण अन्यत्र लगे हुए । सुव्यक्तं=भली प्रकार से । नावधारितं=नही निश्चय कर सका । पितृपितामहः=परदादा । महाराजस्य
( 99 ) :। रथ के । पितामहः=दादा । तातस्य=पिता दशरथ के । धरमाणानाम् = ८) र्म धारण करने वालो के । अतिक्रान्तानाम् मृत्यु को प्राप्त करने वालों के । पृच्छे=जाने की अनुमति लेता हूँ । स्त्रीशुल्कार्थे=विवाह के समय स्त्री को र जाने वाले द्रव्य के लिए । विसर्जिताः=छोड दिए । पृच्छसे=पूछ रहे हो । भागत्य=होश में आकर । सकामं=पूर्ण मनोरथ वाले । यत्कृते=जिस विषय । शकसे=आशका कर रहे थे । स्पृशति=सम्बन्ध युक्त होता है । नीचः= न्दनीय । विशोध्य=(अग्नि द्वारा) शुद्ध करना चाहिए । आलाप. = बोला िने का शब्द । शेषम्=अवशिष्ट या बचा हुआ । गति. = उपाय । उपरत= र गए । अन्वय- येन स्त्रीशुल्कार्थे प्राणाः राज्यं च विसर्जिताः, दशरथस्य इमां प्रतिमा त्वं किम् न पृच्छसे । (८) अन्वय-हृदय, सकामं भव, त्वं यत्कृते शंकसे, तत् पितृनिधन शृणु, तावत् धैर्यम् च गच्छ । तु नीचः अयम् शुल्कशब्दः मां स्पृशति, अथ च सत्यम् भवति, तत्र देहः विशोध्य । (६) हिन्दी अर्थ देवकुलिक-ये महाराज दिलीप हैं, जिन्होने सभी रत्नो को इकट्ठा कर, विश्वजित् नामक यज्ञ को सम्पन्न किया था और धर्म के दीपक को प्रकाशित किया था । भरत - इन धर्म प्राण को नमस्कार । आगे बताइए, ये कौन है ? देवकुलिक-ये महाराज रघु हैं, जिनके कान सोते-जागते समय पुण्याह वाचन की मन्त्र ध्वनि से पूर्ण रहा करते थे । भरत - ओह, प्रबल मृत्यु ने इस घेरे को भी पार कर लिया । ब्राह्मणो की सेवा में अपनी पूरी सम्पत्ति समर्पित करने वाले महाराज रघु को प्रणाम हो । अब कहो, ये श्रीमान् कौन है ? देवकुलिक-ये महाराज अज हैं, जिन्होंने अपनी प्रिय रानी के विरह में विरक्त होकर राजपाट को छोड़ दिया था और जो नित्य प्रति किए जाने वाले यज्ञों के अवसान में अभिषेकों से सम्पूर्ण कल्मषभार को धो देने वाले थे ।
( 100 ) भरत—प्रशंसनीय पश्चात्ताप करने वाले को नमस्कार है । (दशरथ की प्र को देखते हुए श्रौर घबरा कर) श्ररे, मेरा हृदय इन महापुरु गौरवचिन्ता मे लग गया था, इसलिए ठीक से नही समझ सका । श्राप फिर से बताइये कि ये कौन हैं ? देवकुलिक—ये दिलीप हैं । भरत—महाराज के प्रपितामह । इसके वाद । देवकुलिक—ये हैं रघु । भरत—महाराज के पितामह । इसके आगे । देवकुलिक—ये श्रीमान् अज हैं । भरत—महाराज के पिता । क्या कहा, क्या कहा ? देवकुलिक—यह दिलीप, यह रघु, यह अज हैं । भरत—मैं श्रापसे कुछ पूछना चाहता हूँ । क्या जीवितों की भी प्रति स्थापित की जाती हैं ? देवकुलिक—नही, केवल मृतको की । भरत—अच्छा, श्रव श्राप मुझे जाने की श्राज्ञा दें । देवकुलिक—ठहरो, जिन्होने स्त्री शुल्क के लिए अपने राज्य श्रौर प्राण सव कुछ दिए, उन महाराज दशरथ की प्रतिमा के विषय मे श्राप क्यों नही जानना चाहते । (८) भरत—हा पिताजी । (वेहोश होकर गिरता है । फिर होश मे श्राकर) हे हृदय, श्रव तुम्हारी इच्छा पूरी हुई, जिसकी तुम्हे श्राशंका थी, पिता की मृत्यु के समाचार को सुनो श्रौर धीरज बाँधो । किन्तु हा यदि स्त्री शुल्क मे याचित राज्य का उद्देश्य मैं बनाया गया होऊँ तब तो देह की शुद्धि करनी पडेगी श्रर्थात् कड़ी परीक्षा देकर श्रप निर्दोष होना सिद्ध करना पडेगा । (६) श्रार्य ! देवकुलिक—'श्रार्य, कह कर वात करना तो इक्ष्वाकु वंशी लोगों का क्रम है क्या श्राप कैकयी के पुत्र भरत तो नही है ?
( 101 ) [भरत]—और क्या, और क्या । मै दशरथ का पुत्र भरत हूँ, कैकेयी का नही । [देव]कुलिक—तो अब आप जा सकते है । [भरत]—ठहरो, बची हुई बात भी कह दो । [देव]कुलिके—क्या किया जाए । सुनिए । महाराज दशरथ की मृत्यु हो गई । सीता और लक्ष्मण के साथ राम वन को क्यो चले गए, इसका मुझे कारण ज्ञात नही है । [भर]त—क्या कहा, क्या पूज्य राम भी वन को गए ? (फिर मूच्छित हो जाता है) (१) मूल देवकुलिकः—कुमार ! समाश्वसिहि समाश्वसिहि । [भ]रतः—(समाश्वस्य) अयोध्यामटवीभूतां पित्रा भ्रात्रा च वर्जिताम् । पिपासार्तोऽनुधावामि क्षीणतोयां नदीमिव ॥ (१०) आर्य ! विस्तरश्रवणं मे मनसः स्थैर्यमुत्पादयति । तत् सर्वमन- वशेषमभिधीयताम् । देवकुलिकः—श्रूयताम्, तत्रभवता राज्ञाभिषिच्यमाने तत्रभवति रामे भवतो जनन्याऽभिहितं किल । भरतः—तिष्ठ, तं स्मृत्वा शुल्कदोषं भवतु मम सुतो राजेत्यभिहितं तद्धैर्येणाश्वसत्या व्रज सुत वनमित्यार्याऽप्यभिहितः । तं दृष्ट्वा बद्धचीरं निधनमसहत राजा ननु गतः पात्यन्ते धिक्प्रलापा ननु मयि सदृशाः शेषाः प्रकृतिभिः ॥ (११) (मोहमुपगतः) (नेपथ्ये) उत्सरतार्याः ! उत्सरत । देवकुलिकः—(विलोक्य) अये ! काले खल्वागता देव्यः पुत्रे मोहमुपागते । हस्तस्पर्शो हि मातृणामजलस्य जलाञ्जलिः ॥ (१२)