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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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३४८ राजतरङ्गिणी अन्यांश्चानीय देशेभ्यः पुण्येभ्यो वश्चिकादिषु । पावनानग्रहारेषु ब्राह्मणान्स न्यरोपयत् ॥ ३४३ ॥ ३४३. उसने पुण्यदेशों¹ से अन्य पवित्र ब्राह्मणों² को लाकर वश्चिक³ आदि अग्रहारों में बसाया। उत्तमो लोकपालोऽयमिति लक्ष्म प्रशस्तिषु । यः प्राप्तवान्विना यज्ञं चक्षमे न पशुक्षयम् ॥३४४॥ ३४४. जिसने प्रशस्तियों¹ में यह 'उत्तम लोकपाल है', उपाधि प्राप्त की थी। यज्ञ के अतिरिक्त पशु क्षय² वह सहन नहीं कर सकता था। है। मैं स्वयं नहीं खाता। सनातनी ब्राह्मण गण आज भी लहसुन प्याज का भक्षण नहीं करते। उन्हें अभक्ष्य माना गया है। वैष्णव तथा वैश्य वर्ग में एक बहुत बड़ा समाज लहसुन तथा प्याज से परहेज करता है। मारवाड़ी बासा में अबतक प्याज एवं लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। (२) भूक्षीर वाटिका: वर्तमान बुछो और प्राचीन भूक्षीर वाटिका स्थान है। यह पतला भूखण्ड है। शंकराचार्य पर्वत के मूल में उत्तर- पश्चिम स्थान से डल के एक भाग गगरी बल तक फैला है। 'वोर' शब्द संस्कृत वाटिका का अपभ्रंश है। भूका अर्थ भूमि, क्षीर का अर्थ दूध, तथा वाटिका का अर्थ छोटा उद्यान होता है। शुद्ध संस्कृत नाम। सम्भव है वहाँ पर ऐसे वृक्ष हैं जिनके पत्ते या डंठल तोड़ने पर गूलर, वटादि की तरह दूध निकलता रहा हो। (३) खासटा : इस स्थान को सुदर बल के समीप होना चाहिए। निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता कि वास्तव में यह स्थान कहाँ पर था। पृष्ठ १९० सुदर बल टिप्पणी द्रष्टव्य है। ३४३ (१) पुण्यदेश : यहाँ पर पुण्यदेश का प्रयोग महत्वपूर्ण है। राजा सम्भवतः कश्मीर को पुण्यदेश इसलिये नहीं समझता था कि वहाँ के ब्राह्मणादि आचारभ्रष्ट हो गये थे। कई बार वहाके ब्राह्मणो के सुधार की चेष्ट की गयी। कितनी ही बार ब्राह्मण बाहर से लाकर कश्मीर में बसाये गये परन्तु प्रतीत होता है कालान्तर मे आने वाले ब्राह्मण भी स्थानीय ब्राह्मणों से मिलकर आचार का त्याग कर देते थे। अतएव राजा कश्मीर के बाहर 'पुण्यदेश' उत्तरी भारत के तीर्थस्थानों आदि से लाकर ब्राह्मण कश्मीर में बसाये। (२) पवित्र ब्राह्मण : कश्मीर की तुलना में पुण्यदेश के ब्राह्मणों को पवित्र कहा गया है। पवित्र ब्राह्मण का यहाँ अर्थ—विद्वान्, आचार- नियम स्वाध्यायप्रिय, पठन-पाठन-यज्ञादि कर्मकाण्ड में पारंगत ब्राह्मणों से है। (३) वश्चिक : यह वर्तमान गांव उची है। रामख्यार नदी की पूर्व दिशा मे अधोभाग मे है। सन् १८९१ में पं० काशीराम को यहाँ कुछ खण्डित मूर्तियां मिली थीं। उनके अनुसार स्थान विशेष प्राचीन महत्व नहीं रखता था। मात्र एक देवस्थान रूप में स्थित था। इसके पूर्व में नदी कुछ दूर पर पड़ेगी। उत्तर मे रामख्यार नदी है। पश्चिम मे दुरवाग तथा सपनगर हैं। दक्षिण मे अवन्ती है। यह विजयेश्वर के पश्चिम पड़ता है। ३४४. (१) प्रशस्ति : निसन्देह गोपादित्य ऐतिहासिक व्यक्ति था। उसके नाम से सम्बन्धित गोपाद्रि पर्वत, गोपपुर (गोपा अग्रहार) तथा अनेक स्थान हैं। शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर इस राजा का निर्माण था। यहाँ पर,

प्रथम तरंग ३४९ षड्दिनां वर्षषष्टिं पालयित्वा स मेदिनीम् । भोक्तुं पुण्यपरीपाकं लोकान्सुकृतिनामगात् ॥ ३४५ ॥ ३४५. उसने साठ वर्ष छह दिन¹ मेदिनी का पालन करके, पुण्य परिपाक भोग हेतु, सुकृ- तियों के लोक में प्रस्थान किया । गोकर्णस्तत्सुतः क्षोणीं गोकर्णेश्वरकृद्बधे । अष्टपञ्चाशतं वर्षांस्त्रिंशत्याऽह्नां विवर्जितान् ॥ ३४६ ॥ गोकर्ण:¹ ३४६. गोकर्णेश्वर² का निर्माता उसके पुत्र गोकर्ण ने तीस दिन कम अट्ठावन वर्ष³ पृथ्वी पर शासन किया । प्रतीत होता है, कल्हण ने गोपादित्य सम्बन्धी प्रशस्तियों से अपनी लेखन सामग्री ली थी । प्रशस्ति के लिये टिप्पणी पृ० १३ 'प्रशस्ति पट्ट' द्रष्टव्य हैं। (२) पशुह्वय-- यज्ञ में पशुहत्या विहित थी । अतएव राजा ने पशुहत्या यज्ञ के अतिरिक्त सब स्थानों पर बन्द करवा दी । कश्मीर शीत प्रधान देश है। तथापि उसने धर्म भावना से प्रेरित होकर पशुहत्या वर्जित कर दी । प्रतीत होता है । राजा धर्मभीरु था । सुधारक था । पाठभेद : श्लोक संख्या ३४५ में 'सपद्दिनां' का 'सपण्मासा' तथा 'परीपाकं' का पाठभेद 'परिपाकं' तथा 'परो पार्क' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४५. (१) छह दिन : कुछ विद्वानो का मत है कि 'छह दिन' के स्थान पर 'छह मास' होना चाहिए। श्री स्टीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित दोनों ने ही ६ दिन हो पाठ ठीक माना है। पाठ दोनों ही मिलते है । अतएव मैने प्रचलित पाठ के अनुसार '६ दिन' ही दिया है। किसी गणना पर इसका निश्चय करना कठिन है। श्री स्टीन ने ठीक लिखा है कि राजा युधिष्ठिर का राज्य काल नहीं दिया गया है। अतएव गणना करना कठिन है। श्री एस पी. पण्डित ने भी ६० वर्ष ६ दिन राज्य- काल माना है पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'क्षोणी' का 'क्षौणी', दृधे' का 'दधे'; 'त्याऽह्नां' का 'त्यह्ना' तथा 'विवर्जि- तान्' का 'विवर्जनात्' पाठभेद मिलता हैं। पादटिप्पणियाँ : ३४६ (१) गोकर्ण : आइने अकबरी में राजा गोकर्ण को 'कुरेन' तथा उसका राज्यकाल ५७ वर्ष ११ दिन दिया गया है। हसन लिखता है-क. २०३४ में उसके (गोपादित्यके) बेटे राजा गोकर्ण ने इकबाल- मन्दी का ताज सर पर रखकर अठावन वरस सल्तनत किया। श्री स्टीन राज्याभिषेक का समय कल्हण की गणनानुसार लौकिक संवत् २७६७ वर्ष छठवीं मास तथा उन्नीसवीं दिन देते है। श्री एस० पी० पण्डित ने यह काल ईसा पूर्व ३११ वर्ष माना है। श्री जनरल कनिंघम के अनुसार राजा गोकर्ण का नाम किदार शैलो की मुद्रा पर टंकित मिला है। परन्तु बादमें उस मुद्रा के प्रति सन्देह प्रकट दिया गया है कि वास्तव में वह गोकर्ण की थी । श्री देवसेन श्री कनिंघम के मत का खण्डन करते हैं । (२) गोकर्णेश्वर : गोकर्णेश्वर महादेव का कहाँ स्थान था अभी तक पता नहीं चला है । गोकर्ण क्षेत्र

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३५० राजतरंगिणी सूनुर्नरेन्द्रादित्योऽस्य खिखिलान्याभिधोऽभवत् । भूतेश्वरप्रतिष्ठानामक्षयिण्याश्च कारकः ॥ ३४७ ॥ नरेन्द्रादित्य (खिखिल)¹: ३४७. उसका पुत्र नरेन्द्रादित्य उपनाम खिखिल² हुआ । वह भूतेश्वर³ प्रतिष्ठानों और अक्षयिणी⁴ का संस्थापक था । दक्षिण भारत में पश्चिमी समुद्रतट पर है । गोकर्ण उमामहेश्वर, श्री ब्रह्मोश्वर, शंकेतको, श्नोभैरव, को 'दक्षिण काशी' भी कहते है । श्रीक्षेत्र-गोकर्ण थी क्षेत्रपाल, श्रीनरसिंह, श्रीकृष्ण, श्रीकेतको त्रिस्थलो में से एक क्षेत्र है। भास्कर क्षेत्रो में विनायक, श्री सिद्धेश्वर, श्रीमल्लिकर्जुन, श्री चक्रतीर्थ, इसकी गणना की जाती है । श्रो नागेश्वर, श्री मणिनाग, श्रोरामतीर्थ, श्रीकपिल- पौराणिक गाथा है कि महादेव गाय के कर्ण तीर्थ, श्री वैतरणी, श्री सरखती, श्रो सोमतीर्थ, से उत्पन्न हुए थे । जिस स्थान पर गाय के कान से आदि अनेक स्थान कश्मीर के देवस्थानों के समान रूद्र प्रकट हुए थे उस स्थान का नाम 'गोकर्ण' यहाँ बने मिलेंगे । किंवा 'रुद्रयोनि' पड़ गया था। महाप्रलय काल मे स्थान गन्दा है। बहुत गरीबी है। गोकर्ण पृथ्वी जलमग्न हो जायगी तो 'गोकर्णक्षेत्र' का स्थान का लिंग ऊपर निकला नही है। एक छोटा कुण्ड आदर्श सदृश दिखाई पडता रहेगा । अतएव उसको है । जलसे भरा रहता है। उसमे हाथ डालने पर संज्ञा 'वर्णावर्त' उस समय दी जायगी । गोकर्क के एक छोटे लिंग का स्पर्श होता है। कथा है कि दूसरे चारो ओर योजन पर्यन्त भूमि को 'गोकर्णमण्डल' लिंग के नीचे अन्य लिंग है। पार्श्वमे महाबलेश्वर कहा जाता है। की मूर्ति एक उठे स्तम्भ पर है । 'रुद्रभूमि' गोकर्ण को कहते है। यहाँ मरने पर गोकर्ण के मुख्य मन्दिर की परिक्रमा मे आदि- मुक्ति होती है। दिवंगत को शिव का सानिध्य गोकर्ण की मूर्ति भूमिस्तर से नीचे जल में मुझे प्राप्त होता है। मैने गोकर्ण क्षेत्र की यात्रा १२ दिखाई दी । मन्दिर के पृष्ठ भाग में ताम्र गंगा है । अगस्त सन् १९६५ को की थी । स्थान समुद्र यह एक पक्का छोटा कुण्ड है। इसमें अस्थि प्रवाह तटपर है। मन्दिर प्राचीन नही मालूम होता । किया जाता है। जल गंधा है । कुण्ड गन्दा लगा । समुद्र की लहरो के कारण तट कट गया है। पेड की पत्तियां गिर कर पड़ती रहती है । श्मशान से गोकर्ण में जगत्-पूजित आत्मलिंग वैवस्वत मन्व- अस्थिचयन कर यहाँ पर अस्थियां डाल दी जाती है। न्तर के २३वें, त्रेतायुग में शरत् काल कार्तिक बाहर से भी लोग अस्थि लाकर इसमे डालते हैं। शुक्ल प्रतिपद व्यतिपात योग, तुला मास, विशाखा आश्चर्य की बात यह है अस्थियो कुछ ही दिनो नक्षत्र, दिन रविवार, लग्न मीन, के मंगल मुहूर्त में में गलकर जल मे घुल जाती है। यहाँ के जल में स्थापित हुआ था। रावण आत्मलिंग को उखाड़ना रासायनिक पदार्थ कुछ है। जिनके कारण अस्थियाँ चाहता था। किन्तु असफल रहा। यहा महा- गल जाती है। अन्यथा अस्थियाँ जलमे या भूमि में बलेश्वर, महागणपति श्रीबलंकुलेश्वर, श्री ताम्र- सैकड़ों वर्ष पड़ी रहती है । गौरी, श्री वेंकटरमण, श्री भद्रकाली, कालीह्रद, पाठभेद : श्री गङ्गातीर्थ, श्री दुर्गाकुण्ड, श्री शन्नशृंग, श्री कोटि- श्लोकसंख्या ३४७ मे 'कारकः' का 'कारसः' तीर्थ, श्री विष्णुयती, श्री विष्णुपदाभ्यली, श्री रुद्र- पाठभेद मिलता है । पाद, श्री शंकर नारायण, श्री पट्टविनायक, श्री

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प्रथम तरंग ३५१ दिव्यानुग्रहभागुग्राभिधौ यस्य गुरुर्व्यधात् । उग्रेशं मातृचक्रं च प्रभावोद्ग्राविग्रहः ॥ ३४८ ॥ ३४८. दैवी शक्ति प्राप्त, प्रभावोत्कृष्ट एवं विग्रह युक्त, उग्र १ नामक उसके गुरु ने उग्रेश २ एवं मातृ ३ चक्र स्थापित किया।


[पादटिप्पणियाँ - बायाँ स्तम्भ]

पादटिप्पणियाँ : ३४७. (१) नरेन्द्रदित्य : आइने अकबरी ने 'नुकुन्द्र' नाम दिया है। उसका राज्यकाल ३६ वर्ष ३ मास १० दिन माना है । कल्हण की गणना के अनुसार स्कीन राज्या- भिषेक का समय लौकिक संवत् २८२५ वर्ष पाँचवाँ मास उन्नीसवें दिन देते हैं। श्री एस. पी. पण्डित समय ईसा पूर्व २५३ वर्ष रखते हैं । हसनके अनुसार अपने बापके मरने के बाद राजा नरेन्द्रदित्य रौनके बख्श सल्तनत हुआ। राजा ३६ वरस हकूमत करके गुजर गया । (२) खिखिल : एक मुद्रा 'देव शाहो 'खिगिल'—अंकित प्राप्त हुई है। इसे नरेन्द्रदित्य प्रथम की मुद्रा कहा जाता है। इस मुद्रा की शैलो इफ्येलाइट शासको अर्थात् हूणों की शैलो की है। वह मुद्रा राजा लपन ( लक्ष्मण ) ( रा० त० ३ : २८३ ) के ढंग की है। एक दूसरी मुद्रा मिलती है उस पर—'श्रीनरेन्द्र'—अंकित है। यह मुद्रा 'किदार' शैली की है। सम्भव है कि यह मुद्रा इसी नाम के बाद में हुए किसी राजा की मुद्रा रही हो । यह मुद्रा सम्भवतः ५वीं ६ठवी शताब्दी की प्रतीत होती है। किन्तु कल्हण के अनुसार ईसा पूर्व २५०-२१४ वर्ष की है। कल्हण के अनुसार खिखिल श्रीनन्द तृतीय के पश्चात् उन्नीसवाँ राजा हुआ था। खिखिल नाम भारतीय नहीं प्रतीत होता अतएव इसे हूण वंशीय मानने की ओर विद्वानों का झुकाव है। किन्तु कल्हण के काल तथा मुद्रा काल में ६ शताब्दियों का अन्तर समस्या उत्पन्न कर देता है । (३) भूतेश्वर : हरमुकुट पर्वत के समीप यह स्थान


[पादटिप्पणियाँ - दायाँ स्तम्भ]

हैं। अशोक के वर्णन में इसका उल्लेख किया जा चुका है। पृष्ठ १४९ तथा टिप्पणी 'भूतेश' पृष्ठ २०१ द्रष्टव्य है । (४) अक्षयिणी : ब्राह्मणो के भोजन निमित्त अक्षयिणी क्षेत्र किंवा सदावर्त है। कश्मीर के पर्वतीय भागो मे इस प्रकार के दानो को 'मच्छिन्या' कहते हैं। श्रीवर ने ( ६:४०८ ) जैनुल आंवदीन बादशाह द्वारा दिये गये एक दान का वर्णन शूरपुर अर्थात् हूरपुर के पास पीर पंतशाल मार्ग पर किया है । यहाँ यात्री बिना किसी भेदभाव के भोजन प्राप्त करते थे। उसने यहाँ 'अन्नसत्र अविच्छिन्ना' शब्द का प्रयोग किया है। अक्षयिणी का अर्थ होता है कि जहाँ सदावर्त अथवा दान निरन्तर किया जाता है। वह इतना होता है कि कभी कमी नहीं पड़ती । कोई हताश होकर लौटता नहीं। अक्षय भाण्डार तुल्य आवश्यकता पूर्ति करता है। अच्छिन्नेनान्नसत्रेण द्विजवेश्वरवासिनाम् । उदरे मेदुरे सिद्धः प्रणामो यत्नतो विभोः ॥ १:५:२१ नासिक की गुफा में तथा अन्य स्थानों पर इस प्रकार के दान के लिए 'अक्षयनिधि' शब्द का प्रयोग किया गया है। जम्मू के रघुनाथ मन्दिर मे यह 'सदावर्त' नाम से प्रसिद्ध है । डोगरा राजाओ के काल में बनिहाल पास तथा झेलम की सड़क वुनयार पर साधु तथा तीर्थ यात्रियों को इस प्रकार का दान दिया जाता था । श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अक्षयिणी को देवी माना है। उन्होंने 'अक्षायिणी देवी के मन्दिर की स्थापना की' इस प्रकार अनुवाद किया है। मैं इसे ठीक मानने में असमर्थ हूँ। (पृष्ठ : ५८३) ३४८ (१) उग्र : इनका उल्लेख वहीं और अभी

३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीर्घैरनघांल्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सो दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया । युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्धयुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे¹। तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है। (ऋ० १:३६ : १८; पं०ब्रा. १४: ३ : १७; २३:१६ ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५ ४-१२) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिप्रेत है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की। (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृष्ठ १८१ (१२२) द्रष्टव्य है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शति' पाठभेद मिलता है। श्लोक संख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है। राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी मे युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है— राजा युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया। किन्तु कालान्तर में यह कामी हो गया, वह इतना क्रूर हो गया था कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओ ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी। इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया। श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष भाठवा मास उनतीसवाँ दिन मानते है । धो एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं। हसन के अनुसार 'क. २८२८ मे उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ। उसकी आँखें बड़ी छोटी थी। यही वजह था कि यह बीनाई पूरी नही रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रैयत परवरी में मसरूफ रहा। लेकिन बिल आखिर कमीनों घोर बदकारों की सुहबत में पड़कर जुल्म और सखती का पेशा अख्तियार कर लिया। हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी और बदकारी अपना शआर बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा। अकलमन्दो और सन रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनो और आ- वारो को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूँनरेजी में कोई कसर बाकी न रखी। यह देखकर

प्रथम तरंग ३५३ तेन क्रमागतं राज्यं सावधानेन शासता । अनुजग्मे मितं कालं पूर्वभूपालपद्धतिः ॥३५१॥ ३५१. उसने क्रमागत राज्य का सावधानी पूर्वक शासन करता हुआ कुछ दिन तक पूर्ववर्ती राजाओं की पद्धति १ का अनुकरण किया । काले कियत्यपि ततो यात्यभाग्यवशादसौ । सिषेवे श्रीमदन्नीतो यत्किञ्चनविधायिताम् ॥३५२॥ ३५२. कुछ समय पश्चात् अभाग्य वश श्रीमद से उन्मत्त वह यत्किंचनविधायी १ हो गया । नान्त्वग्रहीदनुग्राह्यान्न संजग्राह धीमतः । न प्रवृत्तोपचाराणां प्रागिवासीत्प्रियंकरः ॥३५३॥ ३५३. वह अनुग्रह पात्रों पर अनुग्रह, धीमानों का संग्रह, तथा सेवारत सेवकों का पूर्ववत् प्रियकर्त्ता नहीं रह गया था । दुर्विद्यपर्षदा सार्कं निर्विशेषं सभाजितैः । परिजहे स दुर्जान्तो जाततेजोवधैर्बुधैः ॥३५४॥ ३५४. दुर्विद्य गण के साथ, निर्विशेष रूप से सम्मानित तथा अपमानित विद्वानों ने उस दुर्जान्त राजा का त्याग कर दिया । सर्वत्र समदृष्टित्वं गुणोऽयं खलु योगिनः । अकीर्त्तिहेतुः स महान्दोषस्तु पृथिवीपतेः ॥३५५॥ ३५५. सर्वत्र समदर्शिता योगियों के लिये गुण है किन्तु वह पृथिवीपति की अकीर्ति का हेतु तथा महान् दोष है । उसकी फ़ौज और रैयत उससे मुतनफ़र हो गयी । पादटिप्पणियाँ : आसपास के हुक्काम जो दिल और जान से राजा के ३५१ (१) पद्धति : यहाँ शासन पद्धति मतोअ और फ़रमांबरदार थे, एक एक करके इसके अर्थ लगाना चाहिए । पूर्ववर्ती राजाओं की शासन बागी होने लगे । हकूमत के अहले हल व अकदौद पद्धति का अनुकरण कुछ दिन तक राजा करता रहा । ज़वान इसकी मजवली पर मुत्तफ़िक हो गये । अहले ३५२ (१) यत्किंचनविधायी : राजा ज़माना की यह बेमुरव्वती देखकर युधिष्ठिर दो-तीन स्वेच्छाचारी, उद्दण्ड, अकर्मण्य, उच्छृंखल, निरंकुश रकीबों के हमराह हिन्दुस्तान की तरफ भाग गया । तथा अविहित, अकरणीय कर्म करने वाला हो गया यहाँ एक राजा ने उसे पकड़कर जान से मार डाला । था । कल्हण का यही तात्पर्य यहाँ प्रकट होता है । इसकी मुद्दत हकूमत बावन बरस और आठ माह पाठभेद : थी ।' पृष्ठ ५० श्लोक संख्या ३५४ में 'परिजहे' का पाठभेद पाठभेद : 'परिजिहे' मिलता है । श्लोक संख्या ३५१ में 'अनुजग्मे' का 'मनुजग्मे' पादटिप्पणियाँ : तथा 'मितं' का पाठभेद 'सितं' मिलता है । ३५५. (१)समदर्शी : योगियों तथा सज्जनों के ४५

३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीर्घैरनघैर्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सौ दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया । युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्धयुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे१ ।

तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है। (ऋ० १.३६ : १८; पं० ब्रा. १४. ३ : १७; २३:१६ · ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५.४-१२) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिप्रेत है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की। (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृष्ठ १८१ (१ २२) द्रष्टव्य है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शति' पाठभेद मिलता है। श्लोक संख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है । राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी में युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है-राजा युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया । किन्तु कालान्तर में वह कामी हो गया, वह इतना क्रूर हो गया कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओं ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी । इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया । श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष आठवां मास उनतीसवां दिन मानते हैं। श्री एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं । हसन के अनुसार 'क. २८२८ में उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ । उसकी आँखें बड़ी छोटी थीं। यही वजह था कि वह बोलाई पूरी नही रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रँयत परवरी में मसरूफ रहा । लेकिन बिल आखिर कमीनों और बदकारो की सुहबत में पड़कर जुल्म और सख्ती का पेशा अख्तियार कर लिया । हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी और बदकारी अपना शआर बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा । अकलमन्दों और सन रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनों और आ- वारों को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूंरेजी में कोई कसर बाकी न रखी । यह देख कर

प्रथम तरंग ३५३ तेन क्रमागतं राज्यं सावधानेन शासता । अनुजग्मे मितं कालं पूर्वभूपालपद्धतिः ॥३५१॥ ३५१. उसने क्रमागत राज्य का सावधानी पूर्वक शासन करता हुआ कुछ दिन तक पूर्ववर्ती राजाओं की पद्धति¹ का अनुकरण किया । काले कियत्यपि ततो यात्यभाग्यवशादसौ । सिषेवे श्रीमदक्षीबो यत्किञ्चनविधायिताम् ॥३५२॥ ३५२. कुछ समय पश्चात् अभाग्य वश श्रीमद से उन्मत्त वह यत्किंचनविधायी¹ हो गया । नान्वग्रहीदनुग्राह्यान्न संजग्राह धीमतः । न प्रवृत्तोपचाराणां प्रागिवासीत्प्रियकरः ॥३५३॥ ३५३. वह अनुग्रह पात्रों पर अनुग्रह, धीमानों का संग्रह, तथा सेवारत सेवकों का पूर्ववत् प्रियकर्त्ता नहीं रह गया था । दुर्विद्यपर्षदा सार्कं निर्विशेषं सभाजितैः । परिजह्रे स दुर्जातो जाततेजोवधैर्बुधैः ॥३५४॥ ३५४. दुर्विद्य गण के साथ, निर्विशेष रूप से सम्मानित तथा अपमानित विद्वानों ने उस दुर्जात राजा का त्याग कर दिया । सर्वत्र समदृष्टित्वं गुणोऽयं खलु योगिनः । अकीर्तिहेतुः स महान्दोषस्तु पृथिवीपतेः ॥३५५॥ ३५५. सर्वत्र समदर्शिता योगियों के लिये गुण है किन्तु वह पृथिवीपति की अकीर्ति का हेतु तथा महान् दोष है ।


[बायाँ स्तम्भ] उसकी फ़ौज और रैयत उससे मुतनफर हो गयी । आसपास के हुक्काम जो दिल और जान से राजा के मतोअ और फरमांबरदार थे, एक एक करके इसके बागी होने लगे । हकूमत के महल हल व अकदीद जवान इसकी मजवली पर मुताफिक हो गये । अह्ल जमाना की यह बेमुरव्वती देखकर युधिष्ठिर दो-तीन रफ़ीकों के हमराह हिन्दुस्तान की तरफ भाग गया । यहाँ एक राजा ने उसे पकड़कर जान से मार डाला । इसकी मुद्दत हकूमत बावन बरस और आठ माह थी ।' पृष्ठ ५० पाठभेद : श्लोक संख्या ३५१ में 'अनुजग्मे' का 'मनुजने' तथा 'मितं' का पाठभेद 'सितं' मिलता है । ४५

[दायाँ स्तम्भ] पादटिप्पणियाँ : ३५१ (१) पद्धति : यहाँ शासन पद्धति अर्थ लगाना चाहिए । पूर्ववर्ती राजाओं की शासन पद्धति का अनुकरण कुछ दिन तक राजा करता रहा । ३५२ (१) यत्किंचनविधायी : राजा स्वेच्छाचारी, उद्दण्ड, अकर्मण्य, उच्छृंखल, निरंकुश तथा अविहित, अकरणीय कर्म करने वाला हो गया था । कल्हण का यही तात्पर्य यहाँ प्रकट होता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३५४ में 'परिजह्रे' का पाठभेद 'परिजह्वे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५५. (१) समदर्शी : योगियों तथा सज्जनों के

३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीघैरनघाँल्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सो दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया। युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्धयुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे१।


[बायाँ स्तम्भ / Left Column] तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है । (ऋ० १:३६ : १८; पं०ब्रा. १४. ३ : १७; २३.१६ - ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५.४-१२ ) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिहित है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की । (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृ० १८१ ( १.२२ ) द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शंति' पाठभेद मिलता है। श्लोक सख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है। राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी में युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है- राजा

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया। किन्तु कालान्तर में वह कामी हो गया। वह इतना क्रूर हो गया था कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओं ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी। इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया। श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष आठवा मास उनतीसवाँ दिन मानते हैं। प्रो एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं। हसन के अनुसार 'फ. २८२८ में उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ। उसकी आँखें बड़ी छोटी थी। यही वजह था कि यह बीनाई पूरी नहीं रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रैयत परवरी में मसरूफ रहा। लेकिन बिल आखिर कमीनों और बदकारों की सुहबत में पडकर जुल्म और सख्ती का पेशा अख्तियार कर लिया। हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी ओर बदकारी अपना शआर बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा। अकलमन्दो और सल रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनों और आ- वारों को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूंरेजी में कोई कसर बाकी न रखो। यह देखकर

प्रथम तरंग ३५३ तेन क्रमागतं राज्यं सावधानेन शासता । अनुजग्मे मितं कालं पूर्वभूपालपद्धतिः ॥३५१॥ ३५१. उसने क्रमागण राज्य का सावधानी पूर्वक शासन करता हुआ कुछ दिन तक पूर्ववर्ती राजाओं की पद्धति का अनुकरण किया । काले कियत्यपि ततो यात्यभाग्यवशादसौ । सिषेवे श्रीमदद्वीवो यत्किञ्चनविधायिताम् ॥३५२॥ ३५२. कुछ समय पश्चात् अभाग्य वश श्रीमद से उन्मत्त वह यत्किंचनविधायी' हो गया । नान्वग्रहीदनुग्राह्यान संजग्राह धीमतः । न प्रवृत्तोपचाराणां प्रागिवासीत्प्रियंकरः ॥३५३॥ ३५३. वह अनुग्रह पात्रों पर अनुग्रह, धीमानों का संग्रह, तथा सेवारत सेवकों का पूर्ववत् प्रियकर्त्ता नहीं रह गया था । दुर्विद्यपर्षदा सार्कं निर्विशेषं सभाजितैः । परिजह्ने स दुर्जातो जाततेजोवधैर्बुधैः ॥३५४॥ ३५४. दुविद्य गण के साथ, निर्विशेष रूप से सम्मानित तथा अपमानित विद्वानों ने उस दुर्जात राजा का त्याग कर दिया । सर्वत्र समदृष्टित्वं गुणोऽयं खलु योगिनः । अकीर्त्तिहेतुः स महान्दोषस्तु पृथिवीपतेः ॥३५५॥ ३५५. सर्वत्र समदर्शिता योगियों के लिये गुण है किन्तु वह पृथ्वीपति की अकीर्ति का हेतु तथा महान् दोष है ।

उसकी फौज और रैयत उससे मुतनफर हो गयी । आसपास के हुक्काम जो दिल और जान से राजा के मतीअ और फरमांबरदार थे, एक एक करके इसके बागी होने लगे । हकूमत के महल हल व अकदीद जवान इसकी मजवलो पर मुताबिक हो गये । अहले जमाना की यह बेमुरव्वती देखकर युधिष्ठिर दो-तीन रकीबो के हमराह हिंदुस्तान की तरफ भाग गया । यहाँ एक राजा ने उसे पकड़कर जान से मार डाला । इसकी मुद्दत हकूमत बावन बरस और आठ माह थी ।' पृ० ५० पाठभेद : श्लोक संख्या ३५१ में 'अनुजग्मे' का 'मनुजग्मे' तथा 'मितं' का पाठभेद 'सितं' मिलता है । ४५

पादटिप्पणियाँ : ३५१ (१) पद्धति : यहाँ शासन पद्धति अर्थ लगाना चाहिए । पूर्ववर्ती राजाओं की शासन पद्धति का अनुकरण कुछ दिन तक राजा करता रहा । ३५२ (१) यत्किंचनविधायी : राजा स्वेच्छाचारी, उद्दण्ड, अकर्मण्य, उच्छृंखल, निरंकुश तथा प्रविहित, अकरणीय कर्म करने वाला हो गया था । कल्हण का यही तात्पर्य यहाँ प्रकट होता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३५४ में 'परिजह्ने' का पाठभेद 'परिजिल्हे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५५. (१) समदर्शी : योगियों तथा सज्जनों के

३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीर्घैरनघैर्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सौ दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया। युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्ध्ययुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे १ । तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है। (ऋ० १:३६ : १८; पं०ब्रा. १४: ३ : १७; २३:१६ · ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५.४-१२) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिप्रेत है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की। (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृष्ठ १८१ ( १ २२ ) द्रष्टव्य है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शति' पाठभेद मिलता है। श्लोक संख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है। राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी में युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है-राजा युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया। किन्तु कालान्तर में वह कामी हो गया, वह इतना क्रूर हो गया था कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओ ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी। इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया। श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष आठवा मास उनतीसवाँ दिन मानते हैं। प्रो एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं। हसन के अनुसार 'क. २८२८ में उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ। उसकी आँखें बड़ी छोटी थी। यही वजह था कि यह बीनाई पूरी नहीं रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रैयत परवरी में मसरूफ रहा। लेकिन बिल आखिर कमीनों और बदकारों की सुहबत में पड़कर जुल्म और सख्ती का पेशा अख्तियार कर लिया। हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी और बदकारी अपना शभार बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा। अकलमन्दों और सन रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनों और भा- वारों को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूँरेजी में कोई कसर बाकी न रखी। यह देखकर

प्रथम तरंग ३५५ वाक् मर्म्मच्छेदिनी दीर्घं नर्म शश्वत्कथा विटैः । अनीश्वरोचिता तस्य क्रीडाऽपि भयदाऽभवत् ॥३५७॥ ३५७. राजा के लिये अनुचित उसकी मर्मभेदी वाणी, विटों के साथ लम्बी मनोरञ्जन वार्ता तथा क्रीड़ा भी भयदायक हो गयी थी । पुरो मिथ्यागुणग्राही परोक्षं दोषदर्शकः । असुस्थिरादरो भूसूत्सोऽभूद् द्वेष्योऽनुजीविनाम् ॥३५८॥ ३५८. प्रत्यक्ष मिथ्या गुणग्राही, परोक्ष में दोष दर्शक, और असुस्थिर आदर प्रदर्शक, वह राजा अनुजीवियों के द्वेष का पात्र बन गया था। मनागनवधानेन स्खलतस्तस्य भूपतेः । इत्थं राज्यस्थितिरगादचिरेण विसूत्रताम् ॥३५६॥ ३५६. नितान्त असावधानी के कारण स्खलित, उस राजा की राज्यस्थिति शीघ्र ही इस प्रकार विशृंखलित हो गयी । गीत प्रिय और दक्ष होता है। समयानूसार पदों का उल्लेख करता है। कामुक रसमय गीतो से उत्तेजित करता है। वाक् प्रलोभन से चित्त को हरने की कोशिश करता है। उसका तीसरा गुण ऊहा-पोह में दक्ष होना है। चौथा गुण उसका वाग्मी होना है। वह शब्दजाल में फँसा कर अपनी रुचि के अनुसार काम करवा लेता है। पवित्र-से-पवित्र व्यक्ति को वह अपवित्र करने में सफल होता है। किसी को पतित करने में उत्साहित होता है। विट कामतन्त्र कला कोविद नायक एवं नायिका का सन्देश वाहक होता है। विट का लक्षण साहित्य दर्पण में दिया गया है। वेश्योपचारकुशलो मधुरो दक्षिणः कविः । ऊहापोहक्षमो वाग्मी चतुरश्च विटो भवेत् ॥ ॥ २४ : १०४ ॥ (२) स्त्रैण : स्त्रियों की मन्त्रणा पर चलनेवाले व्यक्तियों के अर्थ में यहाँ इस शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्द राजा का विशेषण है। लौकिक भाषा मे इस शब्द का अर्थ मेहुरा होता है। इसका अर्थ नारीसुलभ, स्त्री द्वारा शासित, स्त्रीत्व, नारीत्व स्त्रीस्वभाव तथा दौर्बल्य भी होता है। कल्हण का यहाँ तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि राजा रमणियो में इतना रम गया था कि उसका पुरुषोचित व्यवहार एवं आचरण जैसे लुप्त हो गया था। स्त्रैण शब्द का शुक्र ने राजा के सन्दर्भ में कल्हण के समान ही प्रयोग किया है। जायते राष्ट्रदासश्च शत्रुवृद्धिर्धनक्षयः । सुराप्यपि वरो राजा न स्त्रैणो नातिकोपवान् ॥ ४ : ५९ ॥ लोकांश्चण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान्विलुम्पति । मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्ध्या च व्यवहारतः ॥ ॥ ४ : ६० ॥ पाठभेद : श्लोकसंख्या ३५७ में 'दीर्घं नर्म शश्वत्कथा' का पाठभेद 'दीर्घनर्म चासत् तदा' मिलता है। श्लोकसंख्या ३५८ में 'असुस्थिरादरो' का पाठभेद 'अस्वस्थिरादरो' मिलता है। श्लोकसंख्या ३६० में 'उपेक्षितस्य' का 'उपेक्षितास्य' तथा 'द्रोहि' का 'निज', और 'द्रोणि' पाठभेद मिलता है

३५४ राजतरंगिणी नयद्भिर्गुणतां दोषान्दोषतां च गुणान्विटैः । स लुप्तप्रतिभश्चक्रे शनकैः स्त्रीजितोपमः ॥३५६॥ ३५६. दोषों को गुण एवं गुणों को दोष बताने वाले विटों¹ द्वारा प्रतिभाहीन, वह राजा शनैः शनैः स्त्रैण² तुल्य हो गया । लिये समदर्शी होना गुण कहा गया है। योगी तथा ॥ १:६०॥ राजा में अन्तर है। राजा के लिए समदर्शी होना दमो दण्ड इति ख्यातस्तस्माद्दण्डो महीपतिः । उसी प्रकार गुण है, जिस प्रकार उपदण्ड दायक । तस्य नीतिर्दण्डनीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥१:१८६॥ राजा सभी गुणों का समन्वय है। दुष्टों को दण्ड, राज्ञां स दण्डनीत्या हि सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः । कण्टकशोधन, आततायियों का नाश, शत्रुओं का दण्ड एव हि धर्माण रक्षां परमं स्मृतम् ॥४:४७॥ संहार, युद्ध में विजय, समय पर तेजस्वी, समय पर अहिसंकौ साधुहिंसा पशुवच्चे तिचोदनात् । सरल, समय पर दानी, जनता के उपकार के लिये दण्ड्यस्यादण्डनान्नित्यमदण्डस्य च दण्डनात् ॥ जब जिस समय जिन गुणों की अपेक्षा हो ग्रहणकारी । ॥४:४९॥ होना चाहिए । युद्ध में शत्रु पर दया राजा के नाश भगवान् श्री रामचन्द्र ने भी राजा के लिये एवं पराजय का कारण होती है। आततायियों पर सामनीति को अनुचित कहा है। करुणा समाज में अशान्ति उत्पन्न करती है। अवां- न साम्ना शक्यते कीर्तिर्न साम्ना शक्यते यशः । छनीय तत्त्वों के प्रति उपेक्षा देश को अराजकता की प्राप्तुं लक्ष्मण लोकेऽस्मिञ्जयो वा रणमूर्धनि ओर ले जाती है । योगी एवं पण्डित जो अपने ही —वा० रा० २:१:१६ में लीन रहते हैं, उनके लिये समदर्शिता गुण है। पाठभेद : ये पशु पक्षी में भी मैत्री भावना रख सकते श्लोक संख्या ३५६ में 'जितोपमः' का पाठभेद हैं। किन्तु सर्वसाधारण में यह मैत्री भावना तथा 'जितोपमाम्' मिलता है । समदर्शिता प्रचुरता से प्राप्त नहीं होती । योगी के पादटिप्पणियाँ : साथ सर्प बैठता है। सिंह देखकर चला जाता है। ३५६. (१) विट : इस शब्द का अर्थ कामुक, परन्तु एक साधारण मनुष्य को विषधर क्रूद्ध सर्प लंपट, वेश्यागामी होता है। विषय भोग में विट काट सकता है, मनुष्यभक्षी सिंह उसकी हत्या कर अपनी समस्त सम्पत्ति का नाश कर देता है। और सकता है। ऐसी स्थिति में सर्प पर तथा सिंह पर अन्त में धूर्त बन जाता है। दया करना मानवहत्या में सहायक होना होगा । 'कुट्टनीमतम्' में विट का विशद वर्णन किया उस समय सर्प तथा सिंह को मार देना हिंसा नहीं गया है। वह तत्कालीन कश्मीर के सामाजिक अहिंसा होगी । एक के मरने से अनेकों की रक्षा जीवन पर प्रकाश डालता है। उसमे विट को सन्देश- होगी । इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन शुक्रनीति वाहक चित्रित किया गया है। वह वेश्या तथा सुन्दरी में किया गया है। राजा को बात का वारग, दण्ड- स्त्रियों से उनके प्रेमियों के मध्य सन्देश वाहक का स्वरूप एवं क्रूर आदि सद्गुणों से युक्त होना कहा कार्य करता है। प्रेमी तथा प्रेमिका को एक दूसरे के गया है। दुर्बलों की हिंसा का समर्थन किया गया है। साथ पहुँचाने की व्यवस्था करता है। अभिगमन के राजा सम्पूर्ण धमों का रक्षण है । लिये प्रेरित करता है । दण्डस्य कारणं राजा सदसद्वर्त्मदर्शकः । विट के चार मुख्य लक्षण कहे गये हैं। वह स्वधर्मेणानुरञ्जयो स्वधर्मे स्थापयेत् प्रजाः ॥ वेश्योपचार में कुशल होता है । मधुरभाषी कविना-

प्रथम तरंग ३५५ वाक् मर्मच्छेदिनी दीर्घं नर्म शश्वत्कथा विटैः । अनीश्वरोचिता तस्य क्रीडाऽपि भयदाऽभवत् ॥३५७॥ ३५७. राजा के लिये अनुचित उसकी मर्मभेदी वाणी, विटों के साथ लम्बी मनोरंजन वार्ता तथा क्रीडा भी भयदायक हो गयी थी । पुरो मिथ्यागुणग्राही परोक्षं दोषदर्शकः । असुस्थिरादरो भूमृत्सोऽभूद् द्वेष्योऽनुजीविनाम् ॥३५८॥ ३५८. प्रत्यक्ष मिथ्या गुणग्राही, परोक्ष में दोष दर्शक, और असुस्थिर आदर प्रदर्शक, वह राजा अनुजीवियों के द्वेष का पात्र बन गया था । मनागनवधानेन स्खलतस्तस्य भूपतेः । इत्थं राज्यस्थितिर्गादचिरेण विसूत्रताम् ॥३५६॥ ३५६. नितान्त असावधानी के कारण स्खलित, उस राजा की राज्यस्थिति शीघ्र ही इस प्रकार विशृंखलित हो गयी । गीत प्रिय और दक्ष होता है। समयानुसार पदों का उल्लेख करता है। कामुक रसमय गीतों से उत्तेजित करता है। चाक् प्रलोभन से चित्त को हरने की कोशिश करता है। उसका तीसरा गुण ऊहा-पोह में दक्ष होना है। चौथा गुण उसका वाग्मी होना है। वह शब्दजाल में फँसा कर अपनी रुचि के अनुसार काम करवा लेता है। पवित्र-से-पवित्र व्यक्ति को वह अपवित्र करने में सफल होता है। किसी को पतित करने में उत्साहित होता है। विट कामतन्त्र कला कोविद नायक एवं नायिका का सन्देश वाहक होता है। विट का लक्षण साहित्य दर्पण में दिया गया है। वेश्योपचारकुशलो मधुरो दक्षिणः कविः । ऊहापोहक्षमो वाग्मी चतुरश्च विटो भवेत् ॥ ॥ २४ : १०४ ॥ (२) स्त्रैण : स्त्रियों की मन्त्रणा पर चलनेवाले व्यक्तियों के अर्थ में यहाँ इस शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्द राजा का विशेषण है। लौकिक भाषा में इस शब्द का अर्थ मेहरा होता है। इसका अर्थ नारीसुलभ, स्त्री द्वारा शासित, स्त्रैणत्व, नारीत्व स्त्रीस्वभाव तथा दौर्बल्य भी होता है। कल्हण का यहाँ तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि राजा रमणियों में इतना रम गया था कि उसका पुरुषोचित व्यवहार एवं आचरण जैसे लुप्त हो गया था। स्त्रैण शब्द का शुक्र ने राजा के सन्दर्भ में कल्हण के समान ही प्रयोग किया है। जायते राष्ट्रनाशश्च शत्रुवृद्धिर्धनक्षयः । सुराप्यपि वरो राजा न स्त्रैणो नातिकोपवान् ॥ ४ : ५९ ॥ लोकाँश्चण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान्विलुम्पति । मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्ध्या च व्यवहारतः ॥ ॥ ४ : ६० ॥ पाठभेद : श्लोकसंख्या ३५७ में 'दीर्घं नर्म शश्वत्कथा' का पाठभेद 'दीर्घनर्म जासत् तथा' मिलता है। श्लोकसंख्या ३५८ में 'असुस्थिरादरो' का पाठभेद 'अस्वस्थिरादरो' मिलता है। श्लोकसंख्या ३६० में 'उपेक्षितस्य' का 'उपेक्षितास्य' तथा 'द्रोहि' का 'निज', और 'द्रोणि' पाठभेद मिलता है

३५६ राजतरंगिणी उपेक्षितस्य निर्दोषैरयतन्ताऽजितात्मनः । अथ लब्धबलास्तस्य नाशाय द्रोहिन्मन्त्रिणः ॥३६०॥ ३६०. शुभचिन्तकों द्वारा उपेक्षित एवं स्वच्छन्द इस राजा के नाशहेतु शक्तिशाली द्रोही मन्त्रियों ने यत्न किया । पादटिप्पणियाँ : ३६० (१) राजतन्त्र : प्राचीन भारत में राज- तन्त्र, कहीं वंशपरम्परागत उत्तराधिकार द्वारा ज्येष्ठ पुत्र अथवा प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार नियमानुसार सगोत्र सपिण्डादि को राज्य मिलता था । उनके अभाव में बन्धुओं को जाता था ; अथवा उसका निर्वाचन जनता किंवा मन्त्री एवं परिषदादि करती थी । कल्हण ने निर्वाचित राजा का वर्णन राज- तरंगिणी (७:७०३ ) में किया है । किस प्रकार परिषद् ने मिलकर कश्मीर के राजा का निर्वाचन किया था । कश्मीर राजा को कल्हण ने महाशान्त की उपमा दी ( त० १:१४१ ) है । श्री रणजीत सीताराम पण्डित राजतरंगिणी के अनुवाद में इस पर टिप्पणी लिखते हुए कहते हैं- 'इससे प्रकट होता है कि कश्मीर में राजाओं का मूलस्वरूप निर्वाचनीय था । उत्तराधिकार निर्वाचन पर निर्भर था ।' सम्भवतः बौद्धों के संघ प्रथा का प्रभाव था । संघ में निर्वाचन द्वारा कार्य सम्पन्न होता था । संघ में पद निर्वाचन द्वारा प्राप्त होते थे । प्राचीन भारत में जनता दुर्बल राजाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली थी । अतएव प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में राजाओं के राज्यच्युत, निर्वासित करने की अनेक घटनाएं मिलती हैं । शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है । धिज्यराज को जनता ने राज्यच्युत कर दिया था । उसके वंश ने दस पीढ़ियों तक राज्य किया था । पंचविंश ब्राह्मण में राजाओं के हटाने के दो उदा- हरण मिलते हैं । ये दीर्घश्रव तथा सिन्धुक्षित थे । ( १२:१२, ६ तथा १५:३, २५ ) । विष्णुपु[राण में] राजा वेणु की कथा प्रसिद्ध है । वह राज्यच्यु[त कर] मार डाला गया [। विष्णु] पुराण अध्याय १३ ) । भारतीय राजनीति के सिद्धान्त का जहाँ तक मैं अध्ययन कर सका हूँ, वह जनता के विप्लव, एवं विद्रोह के अधिकार को, दुराचारी, आततायी, क्रूर, एवं प्रजाभक्षक, शोषक राजा के विरुद्ध स्वीकार करता है । यद्यपि यह सिद्धान्त भी स्वीकार करता है कि राजा देवता का अंश है। किन्तु यह भी साधिकार घोषणा करता है । देवता बुरे कर्मों से राक्षस हो जाता है । ऋषि पुलस्त्य का नाती रावण था । ऋषि कुल में जन्म लेने पर भी बुरे कार्यों द्वारा राक्षस हो गया था । देवता उसी समय तक देवता है, जब तक उसमें देवत्व गुण वर्तमान रहता है । सद्गुण के कारण देवता होता है । देवत्व प्राप्त करता है । सद्गुण के अभाव से, प्रजा रंजक के अभाव में, न्याय प्रिय शासन के अभाव में, राष्ट्रसुरक्षा के अभाव में, राजा का सद्गुण और दैवी गुण लुप्त हो जाता है । पर- पीडा, परशोषण, दुराचार, एवं दूषित विचारों का आश्रय ग्रहण करते ही, उसका देवस्वरूप तथा देवत्व तिरोहित हो जाता है । अतएव उसे राज्यच्युत करना, उसे हटा देना, उसका वध कर देना, देव विरोधी कार्य नहीं कहा जायेगा । उसे असुर विरोधी कार्य, धर्म एवं शास्त्र सम्मत, कहकर पापहीन कहा गया है । जनता के कल्याण निमित्त इस प्रकार के राजा से पिण्ड छुड़ाना देशभक्ति की गणना में गिना जायेगा । शुक्राचार्य ने शुक्रनीति में स्वच्छन्द देशभक्ति किंवा स्वतन्त्र राजा के विषय में जो कहा है वही घटना इस राजा के सम्बन्ध में घटी । स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते । न भवेत्स्ववशो भिन्नप्रकृ[तिः] [१] ॥ २:४ ॥

प्रथम तरंग ३५७ प्रभोः संकोचिताज्ञैस्तैश्चरद्भिनिरवग्रहम् । राज्यं जिहीर्षवो भूपाश्चक्रिरे भूम्यनन्तराः ॥३६१॥ ३६१. प्रभु की आज्ञा संकुचित करने वाले तथा स्वच्छन्द, उन मन्त्रियों ने पार्श्ववर्ती भूपों को राज्य हरण हेतु उत्सुक कर दिया । तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते नानादिगाश्रयाः । आसन्नाम्यामिपं प्राप्तुं श्येना इव ससंभ्रमाः ॥३६२॥ ३६२. मन्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित, नाना दिशाओं के वे सब नृप, बाज की भांति राज्य रूप मांस की प्राप्ति हेतु समुद्यत हो गये थे । अथोत्पन्नभयो राजा न शशाक निजस्थितिम् । व्यवस्थापयितुं यन्त्रच्युतां कारुः शिलामिव ॥३६३॥ ३६३. भयभीत राजा अपनी स्थिति को यन्त्र¹ च्युत शिला को शिल्पी की तरह व्यवस्थित रखने में असमर्थ हो गया । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६१ में 'संकोचिता' का पाठभेद 'संकुचिता' मिलता है । श्लोकसंख्या ३६२ में 'तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते' का पाठभेद 'तदनुप्राणिता वैरि नृपा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३६३ (१) यन्त्र : कश्मीर के मन्दिरों में लगे विशाल शिलाखण्डों को उठाने के लिए किसी प्रकार के यन्त्र का प्रयोग होता था । अन्यथा बड़े-बड़े शिलाखण्डों को कैसे उठाकर एक दूसरे पर रखा गया होगा । यह बात मन्दिरों के ध्वंसावशेषों के देखने से मालूम होती है । कल्हण इसी शिला उठाने वाले यन्त्र की उपमा यहाँ पर देता है । घिरारी किंवा चर्खा बड़े शहतीर में लगाकर शिला उठाने की क्रिया मन्दिरों के निर्माण निमित्त कश्मीर में प्रचलित थी । यह यन्त्र, आधुनिक शब्दावली में क्रेन था । श्री आर. एस. पण्डित इस यन्त्र का यहाँ अर्थ पानी उठाने वाले यन्त्र, अर्थात् ढेकली जिसके बाँस के एक छोर में पत्थर दूसरे में बाल्टी की लम्बी रस्सी बंधी रहती है, और हाथ से पानी खींचते और सिंचाई करते हैं, लगाया है । यह ढेकली प्रथा बिहार, बंगाल, आसाम तथा कश्मीर में कुछ प्रचलित रही है । यहाँ पत्थर गिरने से सन्तुलन बिगड़ जायेगा इस ओर उक्त मत से संकेत किया गया है । कल्हण ने यहाँ - 'यन्त्रयुता कारुः शिलामिव' लिखा है । कारुः का अर्थ कारीगर होता है । 'कारुः' का अर्थ शिल्पी होता है । (अमर कोश २:१०:५ ) शिल्पी के साथ कारु का प्रयोग स्पष्ट प्रकट करता है कि कारु का अर्थ कारीगर से है । यह यन्त्र पत्थर उठाने वाला यन्त्र है। न कि रणजीत सीताराम पण्डित के शब्दों में ढेकली । ढेकली कृषक चलाता है । यदि यन्त्र का सम्बन्ध जल उठाने से होता है, तो कृषक अथवा कृषिसम्बन्धी शब्द का प्रयोग किया जाता । कारु शब्द के प्रयोग से मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। यह पत्थर उठाने का यन्त्र था । जिसके भार के सन्तुलन के लिए यन्त्र के चर्खी अथवा घिरारी के रस्सा या डोरी में एक तरफ पत्थर लगा रहता था । इस प्रकार का यन्त्र स्टेशनों पर कोयला ऊँचाई पर ले जाकर रखने और वहाँ से इंजन में डालने के लिए मैने पश्चिमी रेलवे में देखा है ।

३५६ राजतरंगिणी उपेक्षितस्य निर्द्रोहैर्यतन्ताऽजितात्मनः । अथ लब्धबलास्तस्य नाशाय द्रोहिमन्त्रिणः ॥३६०॥ ३६०. शुभचिन्तकों द्वारा उपेक्षित एवं स्वच्छन्द इस राजा के नाशहेतु शक्तिशाली द्रोही मन्त्रियों ने यत्न किया । पादटिप्पणियाँ : ३६० (१) राजतन्त्र : प्राचीन भारत में राज- तन्त्र, कहीं वंशपरम्परागत उत्तराधिकार द्वारा ज्येष्ठ पुत्र अथवा प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार नियमानुसार सगोत्र सपिण्डादि को राज्य मिलता था । उनके अभाव में बन्धुओं को जाता था ; अथवा उसका निर्वाचन जनता किंवा मन्त्री एवं परिषदादि करती थी । कल्हण ने निर्वाचित राजा का वर्णन राज- तरंगिणी (७:७०३) में किया है । किस प्रकार परिषद् ने मिलकर कश्मीर के राजा का निर्वाचन किया था । कश्मीर राजा को कल्हण ने महाशार्वय की उपमा दी (८० १:१४१) है । श्री रणजीत सीताराम पण्डित राजतरंगिणी के अनुवाद में इस पर टिप्पणी लिखते हुए कहते हैं- 'इससे प्रकट होता है कि कश्मीर में राजाओं का मूलस्वरूप निर्वाचनीय था । उत्तराधिकार निर्वाचन पर निर्भर था।' सम्भवतः बौद्धो के संघ प्रथा का प्रभाव था । संघ में निर्वाचन द्वारा कार्य सम्पन्न होता था । संघ में पद निर्वाचन द्वारा प्राप्त होते थे । प्राचीन भारत में जनता दुर्बल राजाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली थी । अतएव प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में राजाओं के राज्यच्युत, निर्वासित करने की अनेक घटनाएं मिलती हैं । शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है । धिज्यराज को जनता ने राज्यच्युत कर दिया था । उसके वंश ने दस पीढ़ियों तक राज्य किया था । पंचविंश ब्राह्मण में राजाओं के हटाने के दो उदा- हरण मिलते हैं । वे दीर्घश्रव तथा सिन्धुक्षित थे । (१२:१२, ६ तथा १५:३, २५) । विष्णुपुराण में राजा वेणु की कथा प्रसिद्ध है । वह राज्यच्युत कर मार डाला गया था । (विष्णु पुराण अंश १ अध्याय १३) । भारतीय राजनीति के सिद्धान्त का जहाँ तक मैं अध्ययन कर सका हूँ, वह जनता के विप्लव, एवं विद्रोह के अधिकार को, दुराचारी, आततायी, क्रूर, एवं प्रजाभक्षक, शोषक राजा के विरुद्ध स्वीकार करता है । यद्यपि यह सिद्धान्त भी स्वीकार करता है। राजा देवता का अंश है। किन्तु यह भी साधिकार घोषणा करता है। देवता बुरे कर्मों से राक्षस हो जाता है । ऋषि पुलस्त्य का नाती रावण था। ऋषि कुल में जन्म लेने पर भी बुरे कार्यों द्वारा राक्षस हो गया था । देवता उसी समय तक देवता है, जब तक उसमें देवत्व गुण वर्तमान रहता है । सद्गुण के कारण देवता होता है । देवत्व प्राप्त करता है । सद्गुण के अभाव में, प्रजा रंजन के अभाव में, न्याय प्रिय शासन के अभाव में, राष्ट्रसुरक्षा के अभाव में, राजा का सद्गुण और दैवी गुण लुप्त हो जाता है । पर- पीडा, परशोषण, दुराचार, एवं दूषित विचारों का आश्रय ग्रहण करते ही, उसका देवस्वरूप तथा देवत्व तिरोहित हो जाता है । अतएव उसे राज्यच्युत करना, उसे हटा देना, उसका वध कर देना, देव विरोधी कार्य नहीं कहा जायेगा । उसे असुर विरोधी कार्य, धर्म एवं शास्त्र सम्मत, कहकर पापहीन कहा गया है । जनता के कल्याण निमित्त इस प्रकार के राजा से पिण्ड छुड़ाना देशभक्ति की गणना में गिना जायेगा । शुक्राचार्य ने शुक्रनीति में स्वच्छन्द देशभक्ति किंवा स्वातन्त्र्य राजा के विषय में जो कहा है वही घटना इस राजा के सम्बन्ध में घटी । प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते । भिन्नराष्ट्रो भवेत्सद्यो भिन्नप्रकृतिरेव च ॥ २:४ ॥

प्रथम तरंग ३५७ प्रभोः संकोचिताज्ञैस्तैश्चरद्भिनिरवग्रहम् । राज्यं जिहीर्षवो भूपाश्चक्रिरे भूम्यनन्तराः ॥३६१॥ ३६१. प्रभु की आज्ञा संकुचित करने वाले तथा स्वच्छन्द, उन मन्त्रियों ने पार्श्ववर्ती भूपों को राज्य हरण हेतु उत्सुक कर दिया । तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते नानादिगाश्रयाः । आसन्नाज्यामिषं प्राप्तुं श्येना इव ससंभ्रमाः ॥३६२॥ ३६२ मन्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित, नाना दिशाओं के वे सब नृप, बाज की भांति राज्य रूप मांस की प्राप्ति हेतु समुद्यत हो गये थे । अथोत्पन्नभयो राजा न शशाक निजस्थितिम् । व्यवस्थापयितुं यन्त्रच्युतां कारुः शिलामिव ॥३६३॥ ३६३. भयभीत राजा अपनी स्थिति को यन्त्र च्युत शिला को शिल्पी की तरह व्यवस्थित रखने में असमर्थ हो गया ।

पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६१ में 'संकोचिता' का पाठभेद 'संकुचिता' मिलता है । श्लोकसंख्या ३६२ में 'तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते' का पाठभेद 'तदनुप्राणिता वैरि नृपा' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ : ३६३ (१) यन्त्रः कश्मीर के मन्दिरों में लगे विशाल शिलाखण्डों को उठाने के लिए किसी प्रकार के यन्त्र का प्रयोग होता था । अन्यथा बड़े-बड़े शिलाखण्डों को कैसे उठाकर एक दूसरे पर रखा गया होगा । यह बात मन्दिरों के ध्वंसावशेषों के देखने से मालूम होती है । कल्हण इसी शिला उठाने वाले यन्त्र की उपमा यहाँ पर देता है। घिरारी किंवा चर्खी बड़े शहतीर में लगाकर शिला उठाने की क्रिया मन्दिरों के निर्माण निमित्त कश्मीर में प्रचलित थी । यह यन्त्र, आधुनिक शब्दावली में क्रेन था । श्री आर. एस. पण्डित इस यन्त्र का यहाँ अर्थ पानी उठाने वाले यन्त्र, अर्थात् ढेकली जिसके बांस के एक छोर में पत्थर दूसरे में बालटी की लम्बी रस्सी बंधी रहती है, और हाथ से पानी खींचते और सिंचाई करते हैं, लगाया है। यह ढेकली प्रथा बिहार, बंगाल, आसाम तथा कश्मीर में कुछ प्रचलित रही है । यहाँ पत्थर गिरने से सन्तुलन बिगड़ जायेगा इस ओर उक्त मत से संकेत किया गया है । कल्हण ने यहाँ-'यन्त्रच्युता कारुः शिलामिव' लिखा है। कारुः का अर्थ कारीगर होता है। 'कारुः' का अर्थ शिल्पी होता है। (अमर कोश २:१०:५) शिल्पी के साथ कारु का प्रयोग स्पष्ट प्रकट करता है कि कारु का अर्थ कारीगर से है। यह यन्त्र पत्थर उठाने वाला यन्त्र है। न कि रणजीत सीताराम पण्डित के शब्दों में ढेकली। ढेकली कूपक चलाता है। यदि यन्त्र का सम्बन्ध जल उठाने से होता है, तो कूपक अथवा कूपिसम्बन्धी शब्द का प्रयोग किया जाता। कारु शब्द के प्रयोग से मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। यह पत्थर उठाने का यन्त्र था। जिसके भार के सन्तुलन के लिए यन्त्र के चर्खी अथवा घिरारी के रस्सा या डोरी में एक तरफ पत्थर लगा रहता था। इस प्रकार का यन्त्र स्टेशनों पर कोयला ऊँचाई पर से जाकर रखने और वहाँ से इंजन में डालने के लिए मैंने पश्चिमी रेलवे में देखा है ।

३५८ राजतरंगिणी चिरक्षुण्णे क्षमाभर्तुस्तस्मिन्राज्ये विसंस्थुले। उपायोऽस्य स्थितेर्हेतुर्नैकः कश्चन पप्रथे ॥३६४॥ ३६४. बहुत दिनों से उस राज्य के विश्रृंखालत होने पर, उसके स्थायित्व हेतु कोई उपाय उस राजा को नही सूझा । दृष्टदोषान्स्थितिं प्राप्तो हन्यादस्मानसंशयम्। विचिन्त्येति न सामास्य जगृहुर्निजमन्त्रिणः ॥३६५॥ ३६५. उसके अपने मन्त्रियों ने राजा की सन्धि को यह सोचकर स्वीकार नहीं किया कि; राजा ने उनके दोषों को देख लिया है, अतएव स्थिति सुदृढ़ होने पर, उन्हें निश्चय ही मरवा डालेगा । अथ निरुन्धुस्ते संनद्धा बलैर्नृपमन्दिरं व्यवहितजनाक्रन्दं भेरीरवैर्तिभैरवैः । मदकरिघटाकेतुच्छायानिरुद्धरविप्रभा भवनवलभीः संतन्वन्तो दिवाऽपि तमोवृताः ॥३६६॥ ३६६. उन सन्नद्ध मन्त्रियों ने सेनाओं से राजभवन घेर लिया। उस समय अति भयंकर भेरी ध्वनि से जन-क्रन्दन दब गया। मदमत्त गजसमूह की पताकाओं की छाया से सूर्य-प्रकाश अवरुद्ध हो गया और अट्टालिकायें दिन में भी तमोवृत हो गयीं ।


कल्हण ने यन्त्र शब्द का प्रयोग क्रेन जैसे यन्त्र बड़ी शिलाओ ओर पर्वतों को उखाड़कर यन्त्रों द्वारा के लिये यहाँ किया है। वह शिला उठाने के काम समुद्र तट पर लाते थे । ] में आता है। आज कल भी इमारत बनाने में ऊँचे क्रेन का प्रयोग शिला, ईंटा आदि उठाने के लिये श्लोक संख्या ३६४ में 'चिर' का 'चिरं' किया जाता है । 'कश्चन' का 'कस्य न' तथा 'पप्रथे' का पाठभेद 'प्रपथे' मिलता है । इस प्रकार के यन्त्र भारत मे कश्मीर से लेकर धुर दक्षिण रामेश्वरम् तक सुदूर प्राचीन काल से श्लोक संख्या ३६५ में 'प्राप्तो' का 'प्राप्तान्', प्रचलित थे । वाल्मीकीय रामायण में सेतु बाँधने के 'प्राप्ते' तथा 'प्राप्ता' और 'स्मान' का पाठभेद 'स्माद' समय इस प्रकार के यन्त्रों का प्रयोग किया गया था। तथा 'स्मान्न' मिलता है । हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । श्लोक संख्या ३६७ मे 'रजोद्धूराज' का 'रजोद्भू पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥२२:९०॥ राज', 'रजोद्धाराज'; 'नाधु' का 'नायु', 'नासु', [ महाकाय महाबली वानर हाथो के समान बड़ी और 'राजाध्यना' का पाठभेद 'राजाधुना' मिलता है ।

प्रथम तरंग ३५९ तैर्गन्तुं स्वभुवो निवारितरणैर्दत्तेऽवकाशे तत- स्त्यक्तश्रीनगरात्तरात्स नृपतिस्तात्पर्यतो निर्ययौ । आजानेयरजोऽङ्कुराजललनाप्रस्थानसंदर्शन- क्षुभ्यत्पौरजनाश्रुलाजकणिकाकीर्णेन राजाध्वना ॥३६७॥ ३६७. उन लोगों के, स्वभूमि से जाने हेतु युद्ध बन्द कर अवकाश प्रदान करने पर, वह राजा सम्पत्ति त्याग कर, राजमार्ग द्वारा नगर से निकल गया । उस समय उत्तम अश्व की धूल में राज ललनाओं का प्रस्थान देखकर, दुखित होते पुरजनों की अश्रु रूपी लाज¹ कणिका से वह राजमार्ग व्याप्त हो गया था । राज्याच्च्युतस्य बहुशः परिचाररामा- कोशादि तस्य रिपवो व्रजतोऽपजहुः । उर्वारुहो विगलितस्य नगेन्द्रशृङ्गा- द्वल्लीफलादि रभसादिव गण्डशैलाः ॥३६८॥ ३६८. राज्यच्युत एवं गमनशील उस राजा के बहुत से परिवार, कामिनियां और धनादि को शत्रुओं ने उसी प्रकार हरण कर लिया, जैसे गण्डशैल, पर्वत शिखर से पतित वृक्ष को उसके लताफलादि से वेगपूर्वक वंचित कर देता है । रम्यैः शैलपथैर्व्रजञ्छ्रमवशाच्छायां श्रितः शाखिना- मासीनप्रचलायितेन सुमहद् दुःखं विसस्मार सः । दूरात्पामरपूत्कृतैः श्रुतिपथप्राप्तैः प्रबुद्धस्त्वभूद् दृष्टो निर्झरवारिभिः सह मनाक् श्वभ्रे निमज्जन्निव॥३६६॥ ३६९. रम्य शैल पथ पर गमन करते हुए, क्लान्ति वश वृक्षों की छाया का आश्रय लेकर बैठने और पुनः चलने से, उसने महान् दुःख को विस्मृत कर दिया । दूर से सुने गये पामरों के कोलाहलो से, प्रबुद्ध राजा निर्झर वारि के साथ गर्त में डूबता हुआ सा देखा गया ।

पादटिप्पणियाँ : ३६७. (१) लाज : धान का भुना लावा तथा पुष्प का राजपथ तथा राजा की शोभा-यात्रा के समय अथवा शुभ अवसरों पर वर्षा किया जाना पुरानी परंपरा है। प्रायः समस्त भारतवर्ष में यह प्रचलित है। बंगाल में मृतकों की शव-यात्रा के समय लाज- वर्षा की जाती है। विवाह के समय भी लावा परछने की क्रिया हमारी तरफ प्रचलित है।

पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६८ में 'रामा' का रामाः', 'दजहुः' का 'विजहुः', 'विगलितस्य' का 'विच- लितस्य' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ३६९ में 'मासीनप्रचलायितेन' का 'मासीनः प्रचलायिलेन' 'मासिन प्रचलायितेन' 'मामीनः प्रलयायितेन' 'मासीनप्रल्यायितेन' 'मासीन