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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

( १६ ) विषय पृष्ठङ्क अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी की ख़िलअत प्राप्त होना ३५० मंत्री-पद पर एफ़्० सी० केवेन्टरी की नियुक्ति ... ३५१ राजकुमारी मोहनकुंवरी का विवाह ... ३५१ लोक-हितकारी कार्य ... ... ३५२ खिराज में कमी होना ... ... ३५३ दिगंबर जैन सम्मेलन की ओर से महारावत को अभिनंदनपत्र मिलना ... ... ३५४ सम्राट् जॉर्ज की ओर से महारावत को खिताब मिलना ३५४ मंत्री पद पर महारावत का राजा त्रिभुवनदास को नियत करना ३५४ विवाह और सन्तति ... ... ... ३५५ महारावत की जीवन सम्बन्धी मुख्य-मुख्य बातें ... ३५६ सातवां अध्याय प्रतापगढ़ राज्य के सरदार और प्रतिष्ठित कर्मचारी सरदार ... ... ... ३५८ महारावत के निकट सम्बन्धी ... ... ३५६ अरगोद ... ... ... ३५६ प्रथम वर्ग के सरदार ... ... ... ३६१ धमोतर ... ... ... ३६१ कल्याणपुरा ... ... ... ३६५ आंबीरामा ... ... ... ३६६ रायपुर ... ... ... ३६७ भांतला ... ... ... ३६८ सालिमगढ़ ... ... ... ३६६ अचलावदा ... ... ... ३७०

( १७ ) विषय पृष्ठांक यरडिया ... ... ... ३७० बोड़ी साखथली ... ... ... ३७२ जाजली ... ... ... ३७२ द्वितीय वर्ग के सरदार ... ... ... ३७३ अनघोरा ... ... ... ३७३ घरखेड़ी ... ... ... ३७४ नागदी ... ... ... ३७६ देवद ... ... ... ३७७ बड़ा सेलारपुरा ... ... ... ३७८ छायण (लीधेरथा) ... ... ... ३७८ पणणावा ... ... ... ३७६ धनेसरी ... ... ... ३८० डोराणा ... ... ... ३८० प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ... ... ... ३८१ घषांवत ... ... ... ३८३ शाह वर्षा और उसके वंशज ... ... ... ३८३ पाडलियों का घराना ... ... ... ३८३ पाडलिया चंद्रभाण और सुन्दर ... ... ... ३८३ लसण के पुत्र कपूर के वंशज ... ... ... ३८४ लसण के दूसरे पुत्र हरचंद के वंशधर ... ... ... ३६० खासगीवालों का घराना ... ... ... ३६१ भांचावत ... ... ... ३६३ आपा सखाराम का वंश ... ... ... ३६४

( १८ ) परिशिष्ट विषय पृष्ठाङ्क १—गुहिल से लगाकर प्रतापगढ़ के पूर्व पुरुष रावत क्षेमकर्ण तक मेवाड़ के गुहिलवंशी राजाओं की वंशावली ... ३६५ २—महारावत क्षेमकर्ण से वर्तमान समय तक प्रतापगढ़ के राजाओं की वंशावली ... ... ३६७ ३—प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास का कालक्रम ... ३६८ ४—प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रणयन में जिन-जिन पुस्तकों से सहायता ली गई उनकी सूची ... ... ४१३ अनुक्रमणिका (क) वैयक्तिक ... ... ... ४१६ (ख) भौगोलिक ... ... ... ४४८

( १६ ) चित्र-सूची चित्र पृष्ठाङ्क ( १ ) स्वर्गवासी महाराजकुमार मानसिंह समर्पण पत्र के सामने ( २ ) देवलिया के राजमहल ... ... १७ ( ३ ) उदयनिवास महल, प्रतापगढ़ ... ... १६ ( ४ ) प्रतापगढ़ के प्राचीन महल ... ... २० ( ५ ) शेवना के प्राचीन शिवमन्दिर का भीतरी भाग ... २७ ( ६ ) शेवना के प्राचीन देवी-मन्दिर का भीतरी भाग ... २८ ( ७ ) महारावत जसवन्तसिंह ... ... १२६ ( ८ ) महारावत हरिसिंह ... ... १४१ ( ९ ) महारावत प्रतापसिंह ... ... १७७ ( १० ) महारावत पृथ्वीसिंह ... ... १९७ ( ११ ) महारावत उम्मेदसिंह ... ... २१५ ( १२ ) महारावत सालिमसिंह ... ... २४५ ( १३ ) महारावत सामन्तसिंह ... ... २५६ ( १४ ) रघुनाथद्वारा, देवलिया ... ... २७६ ( १५ ) महारावत दलपतसिंह ... ... २८१ ( १६ ) महारावत उदयसिंह ... ... २९७ ( १७ ) प्रतापगढ़ का नवीन राजभवन ... ... २९९ ( १८ ) महारावत सर रघुनाथसिंह, के० सी० आई० ई० ... ३१५ ( १९ ) महारावत सर रामसिंहजी बहादुर, के० सी० एस० आई० ३५० ( २० ) श्रीभुवनेश्वरीदेवी ज़नाना हॉस्पिटल, प्रतापगढ़ ... ३५२

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महामहोपाध्याय रायबहादुर साहित्यवाचस्पति डॉ० गौरीशंकर हीराचंद ओझा, डी० लिट्०, अजमेर रचित तथा संपादित ग्रन्थ स्वतन्त्र रचनाएं- मूल्य (१) प्राचीन लिपिमाला ( प्रथम संस्करण ) ... अप्राप्य (२) भारतीय प्राचीन लिपिमाला ( द्वितीय परिवर्द्धित संस्करण ) ... अप्राप्य (३) सोलंकियों का प्राचीन इतिहास-प्रथम भाग ... अप्राप्य (४) सिरोही राज्य का इतिहास ... अप्राप्य (५) बापा रावल का सोने का सिक्का ... ॥) (६) वीरशिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह ... ॥=) (७) * मध्यकालीन भारतीय संस्कृति ... रु० ३) (८) राजपूताने का इतिहास-पहली जिल्द ( द्वितीय संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण ) ... रु० ७) (६) राजपूताने का इतिहास-दूसरी जिल्द, उदयपुर राज्य का इतिहास-पहला खंड ... अप्राप्य उदयपुर राज्य का इतिहास-दूसरा खंड ... रु० ११) (१०) राजपूताने का इतिहास-तीसरी जिल्द, पहला भाग-डूंगरपुर राज्य का इतिहास ... रु० ४) दूसरा भाग-बांसवाड़ा राज्य का इतिहास ... रु० ४॥) तीसरा भाग-प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ... रु० ७) (११) राजपूताने का इतिहास-चौथी जिल्द, जोधपुर राज्य का इतिहास-प्रथम खंड ... रु० ८) जोधपुर राज्य का इतिहास-द्वितीय खंड ... यंत्रस्थ (१२) राजपूताने का इतिहास-पांचवीं जिल्द, बीकानेर राज्य का इतिहास-प्रथम खंड ... रु० ६) बीकानेर राज्य का इतिहास-द्वितीय खंड ... रु० ६)

  • प्रयाग की "हिन्दुस्तानी एकेडमी"-द्वारा प्रकाशित । इसका उर्दू अनुवाद भी उक्त संस्था ने प्रकाशित किया है। "गुजरात वर्नाक्युलर सोसाइटी" (अहमदाबाद) ने भी इस पुस्तक का गुजराती अनुवाद प्रकाशित किया है, जो वहां से १) रु० में मिलता है ।

२ मूल्य (१३) राजपूताने का इतिहास—दूसरा खंड ... अप्राप्य (१४) राजपूताने का इतिहास—तीसरा खंड ... रु० ६) (१५) राजपूताने का इतिहास—चौथा खंड ... रु० ६) (१६) भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की सामग्री ... ॥) (१७) ‡ कर्नल जेम्स टॉड का जीवनचरित्र ... ।) (१८) ‡ राजस्थान-ऐतिहासिक-दन्तकथा—प्रथम भाग ('एक राजस्थान निवासी' नाम से प्रकाशित) ... अप्राप्य (१९) × नागरी अंक और अक्षर ... अप्राप्य सम्पादित (२०) ✼ अशोक की धर्मलिपियां—पहला खंड ( प्रधान शिलाभिलेश्व ) ... रु० ३) (२१) ✼ सुलेमान सौदागर ... रु० १॥) (२२) ✼ प्राचीन मुद्रा ... रु० ३) (२३) ✼ नागरीप्रचारिणी पत्रिका ( त्रैमासिक ), नवीन संस्करण, भाग १ से १२ तक—प्रत्येक भाग ... रु० १०) (२४) ✼ कोशोत्सव स्मारक संग्रह ... रु० ३) (२५-२६) ‡ हिन्दी टॉड राजस्थान—पहला और दूसरा खंड ( इनमें विस्तृत सम्पादकीय टिप्पणियों-द्वारा टॉड-कृत 'राजस्थान' की अनेक ऐतिहासिक त्रुटियां शुद्ध की गई हैं ) ... रु० ४) (२७) जयानक-प्रणीत 'पृथ्वीराज-विजय-महाकाव्य' सटीक ... रु० ५) (२८) जयसोम-रचित 'कर्मचंद्रवंशोत्कीर्तनकं काव्यम्' ... यंत्रस्थ (२९) मुंहणोत नैणसी की ख्यात—दूसरा भाग ... रु० ४) (३०) गद्य-रत्न-माला—संकलन ... रु० १॥) (३१) पद्य-रत्न-माला—संकलन ... रु० ।।।) ‡ खङ्गविलास प्रेस, बांकीपुर-द्वारा प्रकाशित । × हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग-द्वारा प्रकाशित । ✼ काशी नागरीप्रचारिणी सभा-द्वारा प्रकाशित । ❖❖ ग्रन्थकर्त्ता-द्वारा रचित पुस्तकें 'व्यास एण्ड सन्स', बुकसेलर्स, अजमेर के यहां भी मिलती हैं ।

राजपूताने का इतिहास-तीसरी जिल्द, तीसरा भाग प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पहला अध्याय भूगोल सम्बन्धी वर्णन प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी राजधानी देवलिया होने से पहले यह राज्य देवलिया (देवगढ़) राज्य कहलाता था। उक्त राज्य के अधीन का प्रदेश कांठल नाम से प्रसिद्ध है। देवलिया का नाम क़सबा पहाड़ी प्रदेश में होने तथा वहां का जलवायु आरोग्यप्रद न होने के कारण महारावत प्रतापसिंह ने समान भूमि में घोघे- रिया खेड़ा (डोडेरिया का खेड़ा) के स्थान पर प्रतापगढ़ नगर बसाया, जहां राजधानी स्थिर होने से इसका नाम प्रतापगढ़ राज्य हुआ। प्रतापगढ़ राज्य राजपूताने के दक्षिणी भाग में २३°२२' और २४°१८' उत्तर अक्षांश तथा ७४°२६' और ७५° पूर्व देशान्तर के बीच स्थित है। स्थान और क्षेत्रफल इस राज्य का क्षेत्रफल अनुमान ८८६ वर्ग मील है। (१) संस्कृत के 'कंठ' या 'कंठिका' शब्द से कांठा शब्द की उत्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ समुद्र, नदी अथवा किसी निश्चित सीमा के किनारे का प्रदेश होता है। यथा 'मही कांठा' = 'मही के तट का प्रदेश'; 'रेवा कांठा' = 'रेवा(नर्मदा)के तट का प्रदेश' आदि। प्रतापगढ़ राज्य से मालवा राज्य की सीमा मिलती है। इस कारण से उक्त राज्य 'कांठा' अर्थात् सीमा के तट का प्रदेश कहलाने लगा, जिसका परिवर्तित रूप 'कांठल' है।

२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस राज्य के उत्तर में उदयपुर और ग्वालियर राज्य; पश्चिम में उदयपुर और बांसवाड़ा राज्य; दक्षिण में रतलाम और जावरा राज्य एवं पूर्व में ग्वालियर, जावरा तथा इंदौर राज्य के कुछ- सीमा कुछ अंश हैं। उत्तर से दक्षिण तक इस राज्य की अधिक से अधिक लंबाई ५० मील है। पूर्व से पश्चिम तक का उत्तर का आधा भाग चौड़ा है, जिसकी चौड़ाई ३० मील है, परंतु दक्षिणी आधे विभाग की चौड़ाई कम है और कहीं-कहीं तो केवल ८ मील ही है। प्रतापगढ़ राज्य का उत्तरी तथा उत्तर-पश्चिम का अनुमान एक तिहाई हिस्सा, जो 'मगरे' के नाम से प्रसिद्ध है, पर्वत श्रेणियों से भरा पर्वत श्रेणियां हुआ है। उत्तरी विभाग में सबसे ऊंची पहाड़ी समुद्र की सतह से १८४२ फुट ऊंची है। दक्षिणी विभाग में सबसे ऊंची पहाड़ी समुद्र की सतह से १६१० फुट है, जो कानगढ़ के समीप है। शेष भूमि अर्थात् राज्य का पश्चिमी विभाग मालवा के पठार के समान है, जो समुद्र की सतह से १६५० से १७०० फुट तक ऊंचा है और माल की ज़मीन होने से बड़ा उपजाऊ है। इस राज्य में जाकम (जाखम), शिव, ऐरा, रेतम और करमोई नदियां नामक नदियां हैं। उनमें जाकम (जाखम) और शिव साल भर बहती हैं, बाक़ी कुछ मास तक ही। (१) जाकम (जाखम)—यह नदी इंदौर राज्य के जाखमियां गांव से निकलकर कुछ दूर मेवाड़ में बहती हुई मेवाड़ से दक्षिण-पश्चिम में इस राज्य में प्रवेशकर मगरा ज़िले के उत्तरी भाग में बहती हुई पुनः मेवाड़ में प्रवेश करती है। तत्पश्चात् धरियावद के पास होती हुई यह मही की सहायक नदी सोम में जा मिलती है। (२) शिव—इस नदी का उद्गम इसी राज्य के दक्षिणी भाग में शिवना गांव से हुआ है। कुछ मील प्रतापगढ़ राज्य में बहकर पूर्व में २३ मील तक इस राज्य की सीमा बनाती हुई यह उत्तर-पूर्व में मंदसोर के पास बहकर चंबल में जा गिरती है।

भूगोल सम्बन्धी वर्णन ३ (३) ऐरा—राजधानी प्रतापगढ़ के पास से निकलकर १५ मील दक्षिण-पश्चिम में बहती हुई यह बांसवाड़ा राज्य में प्रवेश करती है और वहां से तीस मील बहकर मही में मिल जाती है। (४) रेतम—क़सबा प्रतापगढ़ से निकलकर राज्य के उत्तर-पूर्व में बहती हुई ग्वालियर राज्य में जाकर यह चंबल में मिल जाती है। (५) करमोई—इस नदी का निकास सीतामाता की पहाड़ियों से हुआ है। मेवाड़ में धरियावद के पास बहती हुई यह मही में जा मिलती है। इस राज्य में कोई बड़ी उल्लेखनीय झील नहीं है। राज्य में छोटे-बड़े सब मिलाकर ३१ तालाब हैं, जिनमें रायपुर, गंधेर, खेरोट, घोटार्सो, अचल्ल- झीलें पुर, जाजली, अचलावदा, साखथली और देवलिया का 'तेजसागर' तालाब मुख्य हैं। तेजसागर तालाब महारावत तेजसिंह का बनवाया हुआ है। इस राज्य का जल-वायु मालवा के समान है और सामान्यतः आरोग्यप्रद है। मई-जून और अक्टूबर मास में सर्वत्र विशेष गर्मी पड़ती जल-वायु और वर्षा है, किंतु मगरा ज़िले में पहाड़ियां होने से अन्य स्थानों की अपेक्षा गर्मी कम रहती है। शीतकाल में सर्दी अधिक पड़ती है। यहां वर्षा का औसत २५ इंच के क़रीब है। ई० स० १८६३ (वि० सं० १६५०) में यहां ६४ इंच वर्षा हुई थी और ई० स० १८६६ (वि० सं० १६५६) में ११ इंच से भी कम। पहाड़ी प्रदेश को छोड़कर यहां की अधिकांश भूमि उपजाऊ है। मिट्टी काली, भूरी और धामनी है। मगरा ज़िले की भूमि कंकरीली है। ज़मीन और पैदावार काली मिट्टीवाली अर्थात् 'माळ' की भूमि अधिक उपजाऊ है। यहां खरीफ़ (सियालू) और रबी (उन्हालू) दोनों फ़सलें होती हैं, परंतु रबी की फ़सल की अपेक्षा खरीफ़ की फ़सल अधिक होती है। जहां कुओं आदि से सिंचाई की सुविधा है, वहां तथा 'माळ' में रबी की फ़सल पैदा की जाती है।

४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास खरीफ़ की फ़सल की मुख्य पैदावार ज्वार, मक्का, तिल, कोदरा, कुरी, सामली, माल, चांवल, मूंग, उड़द, चौंला, तूअर, सन, कपास आदि हैं। रबी की पैदावार में गेहूं, जौ, चना, अफ़ीम, सरसों, अलसी, अजवाइन, राई, बटला ( मटर ), मसूर और सुवा हैं। जहां जल की सुविधा है, वहां गन्ने की खेती भी होती है। पहिले अफ़ीम की खेती बहुतायत से होती थी, परंतु कितने एक वर्षों से अंग्रेज़-सरकार की ओर से उसका बोना कम करा दिया गया है। शाकों में गोभी, आलू, कद्दू (कुम्हड़ा, कोला), प्याज़, लहसुन, मूली, रतालू, अरबी, अदरक, बैंगन, भिंडी, तुरई, आल (लौकी), गवार, मेथी आदि और फलों में आम, सीताफल (शरीफ़ा), केला, अनार, अमरूद, शहतूत, अंजीर, पपीता और नींवू मुख्य हैं। जंगल की पैदावार में सफ़ेद मूसली, गोंद, शहद, चिरौंजी तथा कत्था आदि हैं। इस राज्य के उत्तरी तथा पश्चिमी पहाड़ी प्रदेशों में जंगल बहुत हैं। पहले इन जंगलों की तरफ़ राज्य की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जाता जंगल था, किंतु अब वे राज्य के प्रबंध में हैं। जंगल में सागवान, शीशम, आबनूस, हल्दू, सालर, ढाक, धौ, कदंब, महुआ, पीपल, बबूल, नीम, इमली, बांस आदि के वृक्ष हैं। सीता- माता के पास केवड़ा अधिकता से होता है, जो सुगंधि के लिए प्रसिद्ध है। सरीपीपली, दोनों सालिमगढ़, बजरंगगढ़, कनोरा और अरणोद में भरनेवाले साप्ताहिक हटवाड़ों में भील लोग लकड़ियां, बांस आदि बेचने के लिए ले जाते हैं, जिससे राज्य को लगभग सात हज़ार रुपये वार्षिक महसूल की आय होती है। इन हटवाड़ों में सरीपीपली और सालिमगढ़ के हाट प्रसिद्ध हैं, जिनमें नीमच, मंदसोर और कभी-कभी नसीराबाद के व्यापारी भी लकड़ी खरीदने के लिए जाते हैं। चंदन के वृक्ष इस राज्य में सर्वत्र पाये जाते हैं, परंतु दक्षिणी भाग के बड़वास कलां और हतुण्या में अधिकता से होते हैं, जो राज्य की ही संपत्ति समझे जाते हैं। घास सर्वत्र होती है, पर मगरा ज़िले में अधिक। घास के कुछ स्थल राज्य के लिए सुरक्षित हैं।

भूगोल सम्बन्धी वर्णन ५ पालतू-पशुओं में गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़ा और ऊंट मुख्य हैं। जंगली जानवरों में बाघ, चीता, रीछ, जरख (लकड़बग्घा), हिरन, पशु-पक्षी नीलगाय, सांभर, चीतल, सूअर, भेड़िया, शियागोस आदि पाये जाते हैं । पक्षियों में गिद्ध, चील, तोता, कबूतर, फ़ाख़्ता, तीतर, बटेर, लवा आदि कई प्रकार के पक्षी हैं । जल के निकट रहनेवाले पक्षियों में सारस, बतख़, बगुले, टिटहरी आदि हैं । जल-जंतुओं में मगर, मछलियां, मेंढक, केकड़े, कछुए, जलमानुस आदि हैं खनिज पदार्थों की इस राज्य में खोज नहीं हुई है। प्रसिद्ध है कि राजधानी प्रतापगढ़ के समीप की पहाड़ियों में लोहा है । धमोतर के खानें पश्चिम में नकोर के पास इमारती पत्थर की खान है। देवलिया के महलों का निर्माण उसी पत्थर से हुआ है, परंतु कई वर्षों से यह खान बंद है । चूने का पत्थर राजधानी प्रतापगढ़ से पांच मील दूर रजोरा और तेरह मील दूर कामलियाखाल में मिलता है। प्रतापगढ़ राज्य में अब तक कोई रेल्वे लाइन नहीं खुली है । राज्य का निकटवर्ती रेल्वे स्टेशन पूर्व में बी० बी० एंड सी० आई० रेल्वे का रेल्वे मंदसोर है, जो वर्तमान राजधानी प्रतापगढ़ से २० मील दूर है । प्रतापगढ़ से मंदसोर स्टेशन तक पक्की सड़क है, जिसपर बैल- गाड़ियां, तांगे और मोटरें चलती हैं। इस राज्य में इस सड़क की लंबाई सड़कें १३ मील है और शेष ग्वालियर राज्य में है। आज- कल प्रतापगढ़ से मंदसोर तक मोटर सर्विस जारी हो जाने से लोगों को बड़ा सुभीता हो गया है। देवलिया, नीमच, धरियावद, बांसवाड़ा, पीपलोदा और जावरा की तरफ़ गमनागमन के लिए कच्ची सड़कें बनी हुई हैं और उधर मोटरें, तांगे आदि भी चलते हैं। राज्य के अन्य भागों में गाड़ियों तथा ऊंट, घोड़ा आदि भार-वाहक पशुओं के जाने लायक़ मार्ग हैं। बरसात में कच्ची सड़कें तथा पहाड़ी मार्ग खराब हो जाते

६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हैं, जिससे गाड़ियों आदि का चलना वन्द रहता है । इस राज्य में अब तक छः बार मनुष्य गणना हुई है । यहां की जन- संख्या ई० स० १८८१ ( वि० सं० १६३७ ) में ७६५६८; ई० स० १८६१ जन-संख्या ( वि० सं० १६४७ ) में ८७६७५; ई० स० १६०१ ( वि० सं० १६५७ ) में ५२०२५; ई० स० १६११ ( वि० सं० १६६७) में ६२७०४; ई० स० १६२१ (वि० सं० १६७७) में ६७११० और ई० स० १६३१ (वि० सं० १६८७) में ७६५३६ थी। ई० स० १६०१ (वि० सं० १६५७) में मनुष्य-संख्या में अधिक कमी होने का कारण वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६०० ) का भीषण अकाल और उसके बाद दूसरे वर्ष फैलनेवाली हैज़ा आदि बिमारियां थीं । इस राज्य के निवासियों के मुख्य-धर्म वैदिक, जैन और इसलाम हैं । हिंदू (वैदिक) धर्म के माननेवालों में वैष्णव, शैव, शाक्त आदि कई भेद हैं, धर्म जिनमें वैष्णव मतावलंबियों की संख्या अधिक है । जैन धर्म में दिगंबर तथा श्वेतांबर, नामक दो फ़िर्के हैं। श्वेतांबरों में एक फ़िर्का ढूंढ़ियों का है, जो स्थानकवासी कहलाते हैं । प्रतापगढ़ राज्य में दिगंबरों की संख्या अधिक है । भील और मीणे हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं तथा देवी, महादेव, भैरव आदि देवताओं को पूजते हैं। उनका विवाह-संस्कार हिंदू-धर्म की प्रणाली के अनुसार होता है । मुसल- मानों में सुन्नी और शिया नामक दो भेद हैं, जिनमें सुन्नियों की संख्या विशेष है । शिया मत के माननेवाले दाऊदी बोहरे हैं । ईसाइयों की संख्या नाम मात्र की है। हिंदुओं में ब्राह्मण, राजपूत, महाजन, चारण, सुनार, दर्ज़ी, लुहार, सुथार, कुम्हार, माली, गूजर, कुनवी, गाडरी, धाकड़, दरोगा, नाई, धोबी, कोली, मीणे, जातियां भील, बलाई, भांची, ढोली, मेहतर आदि अनेक जातियां हैं । ब्राह्मणों और महाजनों आदि में कई उपजातियां हो गई हैं, जिनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता । ब्राह्मणों की उपजातियों में तो परस्पर खान-पान का संबंध भी नहीं है । मुसलमानों

भूगोल सम्बन्धी वर्णन ७ में शेख़, सैयद, मुग़ल, पठान, रंगरेज़, भिश्ती आदि कई भेद हैं। इस राज्य के निवासियों में लगभग आधे से अधिक लोग खेती का पेशा करते हैं। ब्राह्मण पूजा-पाठ और पुरोहिताई करते हैं, किन्तु कोई- कोई खेती, व्यापार तथा नौकरी भी करते हैं। पेशा राजपूत प्रायः सैनिक-वृत्ति अथवा खेती करते हैं। महाजन तथा बोहरे विशेषतः व्यापार करते हैं। शेष लोग खेती, नौकरी, मज़दूरी, पशुपालन आदि से अपनी जीविका उपार्जन करते हैं। प्रतापगढ़ राज्य के निवासियों में पुरुषों की साधारण पोशाक पगड़ी, कुरता, लंबा अंगरखा और धोती है। नागरिकों में कोट और पायजामा पहनने की चाल बढ़ रही है। ग्रामीण पोशाक तथा मीणे, भील आदि पगड़ी के स्थान पर मोटा वस्त्र, जिसे फेंटा कहते हैं, सिर पर लपेट लेते हैं। शहरों में राजकीय पुरुष पगड़ी, अंगरखा या अचकन तथा पायजामा पहनकर अंगरखे पर कमरबंदा बांधते हैं, परंतु आजकल पगड़ी के स्थान पर साफ़ा या टोपी और अंगरखे के स्थान में कोट का प्रचार बढ़ता जा रहा है। कोई-कोई अंग्रेज़ी टोप का भी व्यवहार करने लगे हैं। बोहरे तथा मुसलमान प्रायः पायजामा पहनते हैं। स्त्रियों की पोशाक में लहंगा, साड़ी और कंचुकी (कांचली) मुख्य हैं। कोई-कोई स्त्रियां कुरती, अंगिया या वास्कट भी पहनती हैं। मीणे, भील, किसान तथा अन्य ग्रामीण लोगों की स्त्रियों के लहंगे कुछ ऊंचे होते हैं। मुसलमानों की स्त्रियां बहुधा पायजामे व तिलक पहनती हैं। बोहरों की स्त्रियां बाहर जाते समय प्रायः लहंगा और दुपट्टा काम में लाती हैं। इस राज्य में बोली जानेवाली मुख्य भाषा मालवी है, जिसे रांगड़ी भी कहते हैं। कुछ लोग वागड़ी तथा भीली भाषा बोलते हैं, जिनका गुजराती से बहुत कुछ संबंध है। कोई-कोई शुद्ध गुजराती भाषा भी बोलते हैं। यहां की प्रचलित लिपि नागरी है। राजकीय अदालतों, महाजनों की बहियों, चिट्ठी-पत्री आदि में इसी लिपि का व्यवहार होता है, किंतु यह

८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास लिपि घसीट रूप में लिखी जाती है, जिसमें शुद्धता का बहुत कम ध्यान रखा जाता है। कुछ राजकीय दफ़्तरों में अंग्रेज़ी का व्यवहार भी होने लगा है। गांवों में काले और सफ़ेद कंबल तथा मोटी खादी बनाई जाती है। तांबे और पीतल के बर्तन तथा भीलनियों के पहिनने की पीतल की पींजनियां दस्तकारी आदि ज़ेवर भी यहां बहुतायत से बनते हैं। सोने-चांदी के ज़ेवर, लाख, हाथीदांत और नारियल की चूड़ियां, लकड़ी के रंगीन खिलौने, पलंग के शीशम आदि के पाये तथा खिलौने और अन्य सामान यहां अधिकता से बनता है। हरे, लाल और आसमानी रंग के कांच के ऊपर एक प्रकार का सुनहरी काम यहां बहुत ही सुन्दर बनता है, जो भारतवर्ष में अन्यत्र कहीं नहीं बनता। ऐसे काम के बटन, सिगरेट-केस आदि वस्तुएं बनती हैं, जिनपर पौराणिक या शिकार आदि के चित्र अंकित किये जाते हैं और वे सोने में मढ़े जाते हैं। इस काम को करनेवाले यहां चार-पांच परिवार ही हैं, जो दूसरों को यह काम नहीं बतलाते। व्यापार के मुख्य केन्द्र राजधानी के अतिरिक्त अरनोद, कनोरा, कोटड़ी, रायपुर और सालिमगढ़ हैं। राज्य में बाहर से आनेवाली वस्तुएं व्यापार नमक, कपड़ा, शकर, मिट्टी का तेल, पेट्रोल, तंबाकू, नारियल, मसाला, चावल, गुड़, सूखा मेवा, सोना, चांदी, तांबा, पीतल, लोहा आदि धातुएं, कांच तथा चीनी का सामान, हाथीदांत, मोटर, साइकिलें आदि हैं। राज्य से बाहर जानेवाली वस्तुओं में रूई, अफ़ीम, अन्न, तिल, अलसी, सुवा, सरसों, गुड़, घी, इमारती लकड़ी, लकड़ी के खिलौने, चमड़ा आदि मुख्य हैं। पहले यहां अफ़ीम का व्यापार बहुत था, परंतु अब अफ़ीम का सारा व्यापार अंग्रेज़-सरकार के नियन्त्रण में होने से उठ गया है। बंबई, इंदौर, रतलाम, मंदसोर, नीमच, वागड़ (डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा राज्य) और मेवाड़ आदि से यहां का व्यापारिक संबंध है।

भूगोल सम्बन्धी वर्णन ६ हिंदुओं के त्योहारों में होली, गनगौर, रक्षाबंधन, तीज, दशहरा और दीवाली मुख्य हैं। रक्षाबन्धन विशेषतः ब्राह्मणों और दशहरा राजपूतों का त्योहार है। दशहरे के अवसर पर महारावतजी की त्योहार सवारी धूमधाम से निकलती है। दीवाली व्यवसायी- वर्ग का त्योहार है, परंतु उसे सब हिंदू समानता से मनाते हैं। होली भी सब वर्गों का त्योहार है और सब जातियों के लोग फाग खेलते हैं। भीलों के त्योहारों में होली, दशहरा और दीवाली मुख्य हैं। गनगौर और तीज स्त्रियों के त्योहार हैं। मुसलमानों के त्योहार दोनों ईदें—‘इदउलफ़ितुर’ और ‘इदुलजुहा’—तथा मोहर्रम (ताज़िये) हैं। अरणोद के पास गौतमनाथ महादेव का मेला वैशाख सुदि १५ से दो दिन तक प्रति वर्ष होता है। अंबा माता (प्रतापगढ़ से ४ मील उत्तर) का मेला प्रति वर्ष कार्तिक सुदि २ को होता है, जहां मेले बहुत से यात्री जाते हैं। सीतामाता का मेला प्रत्येक तीसरे वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में होता है। इस राज्य में अंग्रेज़ी डाकखाने प्रतापगढ़, देवलिया, अरणोद, नीनोर और जाजली में हैं। तारघर केवल प्रताप- डाकखाने और तारघर गढ़ में ही है। पहले राज्य की ओर से शिक्षा का कोई प्रबंध न था, जिससे लोग पंडितों, जैन यतियों तथा अन्य घरू पाठशालाओं में अपने बालकों को शिक्षा दिलाते थे। अब राज्य की तरफ़ से प्रतापगढ़ शिक्षा और देवलिया के अतिरिक्त वसाड़, केरोट (खेरोट), धामल्या, गंधेर, पानमोड़ी, दलोठ, कोटड़ी, नीनोर, वरमंडल, पीलू, कुणी, अवलेसर, नौगामा, कुलथाना, चूंLoopना, अमलावद, सरीपीपली तथा पारल्या में राज्य की तरफ़ से प्रारम्भिक पाठशालाएं खोल दी गई हैं। धमोतर, बारेवरदा, अरणोद, सालिमगढ़ और डोराना में सरदारों की तरफ़ से पाठशालाएं हैं, जहां प्रारंभिक शिक्षा दी जाती है। राजधानी प्रतापगढ़ में एक हाईस्कूल है और संस्कृत की ज्ञानवृद्धि के लिए पृथक् पाठशाला २

१० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास भी है, जहां 'आचार्य' कक्षा तक की पढ़ाई होती है। उसका संबंध बनारस के गवर्नमेंट संस्कृत कालेज से है। कन्याओं की शिक्षा के लिए राजधानी में कन्या पाठशाला है। सार्वजनिक हित की दृष्टि से एक पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना भी हो गई है। इस राज्य में पहले रोगियों का इलाज वैद्य, हकीम, जर्राह तथा अन्य अनुभवी लोगों-द्वारा होता था। ग्रामीण जनता अपनी चिकित्सा अपने- अस्पताल अपने अनुभव की औषधियों-द्वारा करती थी। कई वर्षों से राज्य ने जनता के हितार्थ राजधानी प्रतापगढ़ और देवलिया में अस्पताल खोल दिये हैं, जहां चीर-फाड़ एवं बड़े-बड़े रोगों का इलाज होता है। राजधानी प्रतापगढ़ में स्त्रियों की चिकित्सा के लिए पृथक् अस्पताल भी बन गया है एवं देशी दवाखाना भी खोल दिया गया है। इनके अतिरिक्त वहां सेठ घासीलाल पूनमचंद की तरफ़ से भी एक अंग्रेज़ी दवाखाना चल रहा है। प्रतापगढ़ राज्य में शीतला से बालकों आदि को बचाने के लिए सर्वत्र टीका लगाने की व्यवस्था की गई है। गांवों में घूम-घूमकर रोगियों की चिकित्सा करने के लिए राज्य ने एक डाक्टर और वैद्य भी नियत कर दिया है। रायपुर के ठिकाने में एक छोटा अस्पताल है, जो वहां के ठाकुर-द्वारा चलाया जाता है। वर्तमान महा- रावतजी का इस ओर पूरा ध्यान होने से धमोतर और अरनोद में भी दवाखाने खोलने की व्यवस्था की जा रही है। पाठशालाओं के अध्यापकों- द्वारा भी गांवों में बुखार, खांसी आदि की औषधियां राज्य वितीर्ण कराता रहता है, जिससे ग्रामीण जनता का कष्ट बहुत कुछ कम हो गया है। राज्य-प्रबंध की सुविधा के लिए पहले इस राज्य के पांच विभाग किये गये थे, जो प्रतापगढ़, कन्तोरा, बजरंगगढ़, साखथली और मगरा ज़िले कहलाते थे; किन्तु बाद में उनकी संख्या ज़िले घटाकर हथूनिया, साखथली और मगरा नामक तीन ज़िले ही रखे गये। ई० स० १९०५ (वि० सं० १९६२) में मगरा और प्रतापगढ़ दो ही ज़िले रह गये। तत्पश्चात् ई० स० १९०६ (वि० सं० १९६३)

भूगोल सम्बन्धी वर्णन ११ में मगरा ज़िले के लिए एक नायब नियत कर देवलिया में रखा गया और वह ज़िला प्रतापगढ़ के अन्तर्गत कर दिया गया। फिर ख़ालसे की समस्त भूमि का माली प्रबंध एक पृथक् अफ़सर बनाकर उसके अधीन कर दिया गया, जो 'रेवेन्यु अफ़सर' कहलाता है। रेवेन्यु अफ़सर को जुडिशियल मामलों में द्वितीय श्रेणी के मैजिस्ट्रेट के अधिकार प्राप्त हैं। कार्य की सुविधा के लिए गांवों में पटवारो तथा क़ानूनगो मुक़र्रर कर दिये गये हैं। इस राज्य में पहले न्याय प्राचीन प्रणाली से होता था। फिर क्रमशः उसमें वर्तमान शैली के अनुसार परिवर्त्तन किये गये । छोटे-छोटे दीवानी न्याय मामलों के दो सौ रुपये तक के दावे सुनने का अधिकार स्मॉल काज़ कोर्ट बनाकर उसे दे दिया गया है, जिनकी अपील नहीं होती; परन्तु निगरानी हाई कोर्ट में होती है। दो सौ रुपये से ऊपर दस हज़ार अथवा उससे अधिक के दावे अदालत दीवानी में सुने जाते हैं और उनकी अपील सेशन जज के पास होती है। सेशन जज के किये हुए फ़ैसलों की अपील हाई कोर्ट में होती है। फ़ौजदारी मामले में एक हज़ार रुपया जुरमाना और दो वर्ष तक क़ैद की सज़ा देने का अधिकार प्रथम श्रेणी के मैजिस्ट्रेट को है। उसकी अपील सेशन कोर्ट में होती है। प्राण-दंड और देश-निर्वासन तक की सज़ा देने का अधिकार सेशन जज को है। उसकी अपील हाई कोर्ट में होती है और महारावतजी साहब की आज्ञा होने पर ही प्राण दंड और निर्वासन की सज़ा दी जाती है। ई० स० १८४४ (वि० सं० १९५१) के इक़रारनामे के अनुसार धमोतर, राय- पुर, कल्याणपुरा, भांतला, घरडिया, आंबीरामा, अचलावदा, अरनोद और सालिमगढ़ के ठिकानों को दीवानी तथा फ़ौजदारी के नियत अधिकार प्राप्त हैं। वि० सं० १६७७ ( ई० स० १६२० ) में महारावत रघुनाथसिंह ने बोड़ी साखथली के ठाकुर को और वि० सं० १६८६ (ई० स० १६२६) में वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने जाजली के ठाकुर को भी नियत अधिकार दे दिये हैं, जिससे इस समय न्याय सम्बन्धी अधिकारवाले वहां ११

१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ठिकाने हैं। राज्य की भूमि खालसा, शासन और जागीर नामक तीन भागों में बंटी हुई है। खालसा की भूमि की सारी आय राज्य लेता है। देव मंदिरों, [शासन, जागीर और भोम आदि] ब्राह्मणों आदि को पुण्य में दी हुई भूमि और गांव एवं चारणों और भाटों को दिये हुए गांव आदि शासन के अन्तर्गत है। इनका हासिल आदि राज्य वसूल नहीं करता और वे ही लोग लेते हैं, जिनके पूर्वजों आदि को वह भूमि और गांव मिले हुए हों। जागीरदारों को जागीर की भूमि और गांव पूर्वकाल में की हुई उनकी सेवाओं के उपलक्ष्य में अथवा महारावत के निकट के सम्बन्धी होने से दिये गये हैं। जागीरदारों में राजपूत जागीरदार मुख्य हैं। उनके अतिरिक्त राज्य के कुछ कर्मचारी भी हैं, जिनको उनकी अच्छी सेवाओं के पुरस्कार में जागीरें दी गई हैं। उनमें ब्राह्मण, महाजन, धायभाई आदि हैं। जागीरदारों से जागीर के एवज़ में नियत खिराज और सेवा ली जाती है। कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं, जिनसे खिराज अथवा नौकरी नहीं ली जाती। राजपूत जागीरदारों की वहां तीन श्रेणियां हैं। प्रथम श्रेणी के जागीरदार, 'उमराव-नगारवन्द' कहलाते हैं, जिनकी संख्या वर्तमान समय में ११ है—धमोतर, कल्याणपुरा, रायपुर, अरगोद, झांतला, वरडिया, सालिमगढ़, अचलावदा, आंधीरामा, बोड़ी साखथली और जाजली। दूसरी श्रेणी के सरदार ताज़ीमी कहलाते हैं, जिनका वर्णन सरदारों के प्रसङ्ग में किया जायगा। तीसरी श्रेणीवाले ग़ैर-ताज़ीमी कहलाते हैं। राजपूत जागीरदारों को प्रतिवर्ष नियमित रूप से खिराज देने के अतिरिक्त नियत अवधि तक स्वयं नौकरी में जमीयत के साथ दशहरे पर उपस्थित होना पड़ता है। इनके अतिरिक्त विशेष अवसरों पर जब राज्य चाहे, उनको जाना पड़ता है। किसी सरदार की मृत्यु पर जब नया सरदार होता है, तो राज्य में उसको तलवारबंदी का नज़राना दाख़िल करना

१. बाप्पा रावल व गुहिल वंश की स्थापना

पड़ता है। ठिकानों का प्रबंध ठीक न हो अथवा महारावत तथा राज्य के विरुद्ध उनका आचरण हो तो उनकी जागीरें ज़ब्त भी हो जाती हैं। जागीरदार बिना महारावत की आज्ञा के दत्तक नहीं ले सकते। जागीरदारों तथा माफ़ीदारों को अपनी भूमि राज्य की आज्ञा के बिना रेहन रखने और बेचने का अधिकार नहीं है। इस राज्य में २४ सवार, १४८ पैदल और १३ गोलंदाज़ सैनिक हैं। इनके अतिरिक्त १७८ पुलिस के सिपाही आदि हैं, जो राजधानी के प्रबंध सेना और पुलिस आदि : के अतिरिक्त थानों आदि पर नौकरी देते हैं। आवश्यकता होने पर जागीरदारों की जमीयतें भी सैनिक-सेवा का कार्य करती हैं। प्रतापगढ़ राज्य की वार्षिक आय लगभग छः लाख रुपये है और उतना ही व्यय है। आय के मुख्य सीगे ज़मीन का हासिल, चुंगी (दाण), आय-व्यय : जागीरदारों का ख़िराज, मादक द्रव्यों की बिक्री (आवकारी), अफ़ीम का मुनाफ़ा, स्टाम्पं, कोर्ट- फ़ीस, जंगल आदि हैं। व्यय के मुख्य सीगे हाथ-खर्च, महलों के ख़र्च, सरकारी कर, राज्य-प्रबन्ध, सेना, पुलिस, पब्लिक वर्क्स, शिक्षा, अस्प- ताल आदि हैं। आधुनिक परिपाटी पर राज्य-प्रबन्ध हो जाने के कारण आय के साधन अधिक विस्तृत होते जाते हैं। आय-व्यय का बजट प्रति- वर्ष बनता है। राज्य का पहले कोई स्वतन्त्र सिक्का नहीं था। वहां मांडू और गुजरात के सुलतानों के सिक्के चलते थे। बादशाह अकबर ने मालवा और सिक्का : गुजरात के राज्य दिल्ली के साम्राज्य में मिला लिये, तब से वहां मुग़लकालीन सिक्कों का प्रचलन हुआ। मुग़ल-साम्राज्य की अवनति के दिनों में राजपूताने के अन्य राज्यों की भांति प्रतापगढ़ के स्वामी महारावत सालिमसिंह ने भी बादशाह शाह आलम (दूसरा, ई० स० १७५६-८८ = वि० सं० १८१६-४२) के समय उक्त बादशाह के नाम के चांदी के सिक्के बनाने के लिए प्रतापगढ़ में टकसाल