ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—७ देवता—अग्नि
सूक्त—७ देवता—अग्नि
स्वस्ति नो दिवो अग्ने पृथिव्या विश्वायुर्धेहि यजथाय देव.
सचेमहि तव दस्म प्रकेतैरुरुष्या ण उरुभिर्देव शंसैः.. (१)
हे दिव्यगुण युक्त अग्नि! हम यज्ञकर्त्ताओं के लिए द्यावा-पृथिवी से लाकर कल्याण
प्रदान करो. हे दर्शनीय अग्नि! हम तुम्हें प्राप्त करें. तुम अनेक प्रशंसनीय रक्षासाधनों से
हमारी रक्षा करो. (१)
इमा अग्ने मतयस्तुभ्यं जाता गोभिरश्वैरभि गृणन्ति राधः.
यदा ते मर्तो अनु भोगमानड्वसो दधानो मतिभिः सुजात.. (२)
हे अग्नि! ये स्तुतियां तुम्हारे लिए बोली गई हैं. तुम अश्वों और गायों के साथ हमारे लिए
धन देते हो, इसलिए हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे तेज से सबको ढकने वाले, शोभनकर्मों से
उत्पन्न एवं हमें धन देने वाले अग्नि! जब लोग तुम्हारा दिया हुआ धन प्राप्त करते हैं, तब
तुम्हारी स्तुति की जाती है. (२)
अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित्सखायम्.
अग्नेरनीकं बृहतः सपर्यं दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य.. (३)
मैं अग्नि को ही पिता, बंधु, भ्राता तथा नित्य मित्र मानता हूं. मैं अग्नि के मुख की उसी
प्रकार सेवा करता हूं, जिस प्रकार द्युलोक में स्थित, पूजायोग्य एवं दीप्तिशाली सूर्यमंडल की
आराधना की जाती है. (३)
सिध्रा अग्ने धियो अस्मे सनुत्रीर्यं त्रायसे दम आ नित्यहोता.
ऋतावा स रोहिदश्वः पुरुक्षुर्द्युभिरस्मा अहभिर्वाममस्तु.. (४)
हे अग्नि! तुम्हारे विषय में हमारे द्वारा की गई स्तुतियां पूर्ण हुई हैं. हे नित्य होता व
यज्ञयुक्त अग्नि! तुम हमारी यज्ञशाला में उपस्थित रहकर हमारी रक्षा करते हो. मैं तुम्हारे
सहयोग से यज्ञकर्त्ता बनूं तथा लाल रंग के घोड़े एवं बहुत सा धन प्राप्त करूं, जिससे उत्तम
दिवसों में तुम्हें हव्य मिल सके. (४)
द्युभिर्हितं मित्रमिव प्रयोगं प्रत्नमृत्विजमध्वरस्य जारम्.
बाहुभ्यामग्निमायवोऽजनन्त विक्षु होतारं न्यसादयन्त.. (५)
दीप्तियों से युक्त, मित्र के समान युक्त करने योग्य, पुराने ऋत्विज् एवं यज्ञ को समाप्त
करने वाले अग्नि को यजमानों ने भुजाओं द्वारा उत्पन्न किया तथा देवों को बुलाने का काम
सौंपा. (५)
स्वयं यजस्व दिवि देव देवान्किं ते पाकः कृणवदप्रचेताः.
यथायज ऋतुभिर्देव देवानेवा यजस्व तन्वं सुजात.. (६)
हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम द्युलोक में रहने वाले देवों का यज्ञ करो. कच्ची बुद्धि वाले
और ज्ञानरहित लोग तुम्हारे बिना क्या कर सकेंगे? हे शोभन जन्म वाले अग्नि! तुमने जिस
प्रकार समयसमय पर देवों के यज्ञ किए हैं, उसी प्रकार अपना भी यज्ञ करो. (६)
भवा नो अग्नेऽवितोत गोपा भवा वयस्कृदुत नो वयोधाः.
रास्वा च नः सुमहो हव्यदातिं त्रास्वोत नस्तन्वो३ अप्रयुच्छन्.. (७)
हे अग्नि! तुम दृष्ट और अदृष्ट दोनों प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करो. तुम हमारे लिए
अन्न उत्पन्न करो एवं अन्न दो. हे शोभन पूजा योग्य अग्नि! तुम हमें हव्य सामग्री का दान करो
एवं हमारे शरीरों का पालन करो. (७)
सूक्त—८ देवता—अग्नि व इंद्र
प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति.
दिवश्चिदन्ताँ उपमाँ उदानळपामुपस्थे महिषो ववर्ध.. (१)
अग्नि बड़ा झंडा लेकर द्यावा-पृथिवी के बीच में जाते हैं एवं देवों को बुलाने के लिए
बैल के समान शब्द करते हैं. अग्नि द्युलोक से दूर या समीप रहकर उसे व्याप्त करते हैं एवं
जल के भंडार अंतरिक्ष में बिजली के रूप में बढ़ते हैं. (१)
मुमोद गर्भो वृषभः ककुद्मान्सेमा वत्सः शिमीवाँ अरावीत्.
स देवतात्युद्यतानि कृण्वन्त्स्वेषु क्षयेषु प्रथमो जिगाति.. (२)
अभिलाषापूरक एवं उन्नत तेज वाले अग्नि द्यावा-पृथिवी के मध्य में प्रसन्न होते हैं.
प्रातःकाल एवं निशा के प्रसिद्ध पुत्र एवं यज्ञकर्म करने वाले अग्नि शब्द करते हैं. वे यज्ञ में
उत्साहपूर्ण कर्म करते हैं, अपने स्थानों में रहते हैं एवं देवों के प्रमुख बनकर जाते हैं. (२)
आ यो मूर्धानं पित्रोररब्ध न्यध्वरे दधिरे सूरो अर्णः.
अस्य पत्मन्नरुषीरश्वबुध्ना ऋतस्य योनौ तन्वो जुषन्त.. (३)
अग्नि अपने माता-पिता द्यावा-पृथिवी के सिर पर अपने तेज से रमण करते हैं.
यज्ञकर्त्ता शोभनशक्ति वाले अग्नि के तेज को यज्ञ में धारण करते हैं. अग्नि के पतन के समय
सुशोभित स्तोता यज्ञ के स्थान में व्याप्त अग्नि के शरीर की सेवा करते हैं. (३)
उषउषो हि वसो अग्रमेषि त्वं यमयोरभवो विभावा.
ऋताय सप्त दधिषे पदानि जनयन्मित्रं तन्वे३ स्वायै.. (४)
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हे प्रशंसनीय अग्नि! तुम प्रतिदिन उषाकाल से पहले ही आ जाते हो तथा आपस में
मिले हुए रात-दिन को प्रकाशित करते हो. तुम अपने शरीर से सूर्य को उत्पन्न करते हुए यज्ञ
के निमित्त सात स्थानों में बैठो. (४)
भुवश्चक्षुर्मह ऋतस्य गोपा भुवो वरुणो यदृताय वेषि.
भुवो अपां नपाज्जातवेदो भुवो दूतो यस्य हव्यं जुजोषः.. (५)
हे अग्नि! तुम चक्षु के समान यज्ञ को प्रकाशित करने वाले तथा रक्षक हो. जब तुम
वरुण के रूप में जाते हो तब तुम रक्षक बनते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम्हीं जल के नाती एवं
उस यजमान के दूत बनते हो, जिसका हवि तुम स्वीकार कर लेते हो. (५)
भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः.
दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकृषे हव्यवाहम्.. (६)
हे अग्नि! तुम अंतरिक्ष में कल्याणकारी अश्वों वाले देवों से मिलकर यज्ञ और जल के
नेता बनते हो. तुम प्रधान एवं सबका उपभोग करने वाले सूर्य को स्वर्ग में धारण करते हो एवं
अपनी जीभ को हव्यवहन करने वाली बनाते हो. (६)
अस्य त्रितः क्रतुना वव्रे अन्तरिच्छन्धीतिं पितुरेवैः परस्य.
सचस्यमानः पित्रोरुपस्थे जामि ब्रुवाण आयुधानि वेति.. (७)
यज्ञ के भाग से बढ़ी हुई शक्ति वाले त्रित ऋषि ने अपने रक्षासाधनों से युक्त होकर, यज्ञ
के मध्य में अपना भाग चाहते हुए उत्तम एवं जगत्पालक इंद्र को यज्ञ के द्वारा मित्र बनाया.
माता-पितारूप द्यावा-पृथिवी के मध्य में वर्तमान यज्ञ में ऋत्विजों सहित त्रित ने इंद्र के
अनुकूल स्तोत्र बोलते हुए आयुध प्राप्त किए. (७)
स पित्र्याण्यायुधानि विद्वानिन्द्रेषित आप्त्यो अभ्ययुध्यत्.
त्रिशीर्षाणं सप्तरश्मिं जघन्वान्त्वाष्ट्रस्य चिन्निः ससृजे त्रितो गाः.. (८)
अपने पिता के आयुधों को जानने वाले एवं इंद्र के द्वारा प्रेरित आप्त्यपुत्र त्रित ने युद्ध
किया. उसने सात रश्मियों वाले त्रिशिरा का वध किया और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की गाएं
छीन लीं. (८)
भूरीदिन्द्र उदिनक्षन्तमोजोऽवाभिनत् सत्पतिर्मन्यमानम्.
त्वाष्ट्रस्य चिद्विश्वरूपस्य गोनामाचक्राणस्त्रीणि शीर्षा परा वर्कू.. (९)
सज्जनों के पालक इंद्र ने स्वयं को शूर मानने वाले एवं अतिरिक्त तेज धारण करने वाले
त्वष्टापुत्र को मार डाला. इंद्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की गायों को बुलाते हुए उसके तीन
सिरों को काट दिया. (९)
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सूक्त—९ देवता—जल
सूक्त—९ देवता—जल
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१)
हे सुख के आधार जल! तुम हमें अन्न पाने के योग्य बनाओ तथा हमें महान् व रमणीय
ज्ञान दो. (१)
यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (२)
हे जल! पुत्र की उन्नति चाहने वाली माताएं जिस प्रकार उसे दूध देती हैं, उसी प्रकार
तुम अपना सुखकर रस हमें दो. (२)
तस्मा अरङ्गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (३)
हे जल! तुम जिस पाप को नष्ट करने के लिए हमसे प्रसन्न हुए हो, हम उसी पाप के
नाश के लिए तुम्हारे पास शीघ्र जाते हैं. तुम हमें प्रजनन के योग्य बनाओ. (३)
शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु नः.. (४)
दिव्य जल हमारे यज्ञ के लिए सुखदाता हों एवं पीने योग्य बनें. जल हमारे ऊपर शुद्धि
हेतु बरसें, हमारे उत्पन्न रोगों को मिटावें तथा अनुत्पन्न रोगों को हमसे अलग रखें. (४)
ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्. अपो याचामि भेषजम्.. (५)
जल अभिलाषायोग्य वस्तुओं के स्वामी एवं मानवों को निवासस्थान देने वाले हैं. हम
जलों से दवाओं की प्रार्थना करें. (५)
अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा. अग्निं च विश्वशम्भुवम्.. (६)
सोम ने मुझसे कहा कि जल के भीतर सभी दवाएं एवं संसार को सुखी करने वाले
अग्नि रहते हैं. (६)
आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे३ मम. ज्योक्च सूर्यं दृशे.. (७)
हे जल! तुम मेरे शरीर की रक्षा करने वाली दवाओं को पुष्ट करो, जिससे हम बहुत दिन
तक सूर्य को देख सकें. (७)
इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि. यद्वाह्मभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्.. (८)
हे जल! मुझ में जो कुछ पाप है, मैंने जो द्रोह किया है, मेरा जो पतन हुआ है अथवा
मैंने जो झूठ बोला है, उसे मुझसे दूर करो. (८)
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सूक्त—१० देवता—यमयमी
आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि.
पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा.. (९)
आज मैं जल में घुसा हूं. मैंने जल का रस पिया है. हे अग्नि! तुम जलयुक्त बनकर
जाओ एवं मुझे तेजस्वी बनाओ. (९)
सूक्त—१० देवता—यमयमी
ओ चित्सखायं सख्या ववृत्यां तिरः पुरू चिदर्णवं जगन्वान्.
पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः.. (१)
यमी बोली- इस निर्जन एवं विस्तृत द्वीप में आकर मैं तुझ सखा से संभोग सुख पाने के
लिए सन्मुख हुई हूं. तुम माता के उदर से ही मेरे साथ हो. विधाता यह चाहते हैं कि तुम्हारे
संसर्ग से मेरे उदर से जो पुत्र पैदा हो, वह हमारे पिता का योग्य नाती हो. (१)
न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति.
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्त्तार उर्विया परि ख्यन्.. (२)
यम ने उत्तर दिया- तुम्हारा साथी यम तुम्हारे साथ ऐसी मित्रता नहीं चाहता. तुम बहिन
होने के कारण इस संबंध के योग्य नहीं हो. महान् एवं शक्तिशाली प्रजापति के
स्वर्गधारणकर्त्ता पुत्र अर्थात् देव देख रहे हैं. (२)
उशन्ति घा ते अमृतास एतदेकस्य चित्त्यजसं मर्त्यस्य.
नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्व१मा विविश्याः.. (३)
यमी ने कहा- प्रजापति आदि देव त्याज्य नारियों के साथ इस प्रकार का संबंध रखना
चाहते हैं. मानवों के लिए यह संबंध त्याज्य है. तुम अपने मन को मेरे अनुकूल बनाओ एवं
प्रजापति के समान तुम भी पुत्र के जन्मदाता के रूप में मेरे शरीर में प्रवेश करो. (३)
न यत्पुरा चकृमा कद्ध नूनमृता वदन्तो अनृतं रपेम.
गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नो नाभिः परमं जामि तन्नौ.. (४)
यम बोला- हमने पहले ऐसा कभी नहीं किया. हम सत्य बोलते हुए असत्य से दूर रहते
हैं. अंतरिक्ष में जल धारण करने वाले सूर्य एवं अंतरिक्ष में रहने वाली उनकी पत्नी सरण्यू
हमारे पिता-माता हैं. इस प्रकार हम सगे भाईबहिन हैं. (४)
गर्भे नु नौ जनिता दम्पती कर्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः.
नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथिवी उत द्यौः.. (५)
यमी कहने लगी- रूपकर्त्ता, शुभाशुभ प्रेरक एवं सर्वात्मक प्रजापति ने गर्भ में ही हमें
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पति-पत्नी बना दिया था. प्रजापति के काम का कोई भी विरोध नहीं करता है. हमारे दंपती
होने की बात द्यावा-पृथिवी जानते हैं. (५)
को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत्.
बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन्.. (६)
यमी बोली- पहले दिन के संभोग को कौन जानता है! उसे किसने देखा है? उसे कौन
बताएगा? हे मोक्ष और बंधन का निर्णय करने वाले यम! तुम मित्र और वरुण के स्थान
अर्थात् दिन-रात के विषय में क्या कहते हो. (६)
यमस्य मा यम्यं१ काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय.
जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद्वृहेव रथ्येव चक्रा.. (७)
तुझ यम की अभिलाषा मुझ यमी के प्रति जागृत हो. एक ही शय्या पर साथ-साथ सोने
के लिए पत्नी जिस प्रकार पति के सामने अपना शरीर प्रदर्शित करती है, उसी प्रकार मैं
अपना शरीर प्रकाशित करूंगी. आओ, हम दोनों रथ के दो पहियों के समान एक ही कार्य में
लगें. (७)
न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति.
अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा.. (८)
यम ने कहा- यहां जो देवों के गुप्तचर घूमते हैं, वे न कभी रुकते हैं और न आंखें बंद
करते हैं. हे दुःख देने वाली यमी! तुम मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के पास शीघ्र जाओ एवं रथ
के पहियों के समान एक रुचिवाला कार्य करो. (८)
रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत्सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्.
दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य बिभृयादजामि.. (९)
सभी यजमान रात और दिन का कल्पित भाग यम को दें. सूर्य का तेज यम के लिए
बार-बार उदित हो. आपस में संबंध रखने वाले रात-दिन द्यावा और पृथिवी के साथ यम के
बंधु हैं. यमी अपने भाई यम के अतिरिक्त किसी अन्य को अपना बनावें. (९)
आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि.
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्.. (१०)
आगे चलकर ऐसा समय आएगा, जब बहिनें अपने भाई के अतिरिक्त किसी अन्य
व्यक्ति को पति बनावेंगी. हे सुंदरी! मेरे अतिरिक्त किसी अन्य को पति बनाने की कल्पना
करो और अपनी भुजा को वीर्याधान करने वाले उस पुरुष का उपधान बनाओ. (१०)
किं भ्रातासद्यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निर्ऋतिर्निगच्छात्.
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काममूता बह्वे३ तद्रपामि तन्वा मे तन्वं१ सं पिपृग्धि.. (११)
यमी कहने लगी- उस भाई के होने से क्या लाभ है, जिसके रहते हुए भी बहिन
पतिविहीन रहे. उस बहिन के होने से क्या लाभ है, जिसके होते हुए भाई दुःख उठाए. मैं
काममूर्च्छित होकर ये वचन बोल रही हूं. तुम मेरे शरीर से अपना शरीर भली-भांति मिलाओ.
(११)
न वा उ ते तन्वा तन्वं१ सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्.
अन्येन मत्प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत्.. (१२)
यम कहने लगा- हे यमी! मैं तुम्हारे शरीर से अपना शरीर नहीं मिलाना चाहता. जो
अपनी बहिन के साथ संभोग करता है, उसे लोग पापी कहते हैं. हे सुंदरी! मेरे अतिरिक्त
किसी अन्य पुरुष के साथ आमोदप्रमोद करो. तुम्हारा भाई यह काम करना नहीं चाहता.
(१२)
बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम.
अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्.. (१३)
यमी बोली- मुझे खेद है कि तुम बहुत कमजोर हो. मैं तुम्हारे मन को नहीं समझ पा रही
हूं. रस्सी जिस प्रकार घोड़े को बांधती है और लता जिस प्रकार वृक्ष से लिपट जाती है, उसी
प्रकार अन्य स्त्री तुम्हारा आलिंगन करती है. (१३)
अन्यम् षु त्वं यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्.
तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम्.. (१४)
यम ने कहा- हे यमी! लता जिस प्रकार वृक्ष को लपेटती है, उसी प्रकार तुम मेरे
अतिरिक्त अन्य पुरुष का आलिंगन करो. वह पुरुष भी तुम्हारा आलिंगन करे. तुम उस पुरुष
का मन जीतने की कामना करो और वह पुरुष तुम्हारा मन जीतने की इच्छा करे. तुम उसी के
साथ कल्याणकारी सहवास करो. (१४)
सूक्त—११ देवता—अग्नि
वृषा वृष्णे दुदुहे दोहसा दिवः पयांसि यह्वो अदितेरदाभ्यः.
विश्वं स वेद वरुणो यथा धिया स यज्ञियो यजतु यज्ञियाँ ऋतून्.. (१)
वर्षा करने वाले, महान् और अपराजेय अग्नि ने हवि बरसाने वाले यजमान के लिए
दोहन क्रिया द्वारा आकाश से जल गिराया. वरुण अपनी बुद्धि से सारे संसार को जानते हैं.
यज्ञयोग्य अग्नि अनुकूल ऋतुओं में यज्ञ करें. (१)
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रपदगन्धर्वीरप्या च योषणा नदस्य नादे परि पातु मे मनः.
इष्टस्य मध्ये अदितिर्नि धातु नो भ्राता नो ज्येष्ठः प्रथमो वि वोचति.. (२)
अग्नि के गुणों का वर्णन करने वाली गंधर्वपत्नी एवं जलों से संस्कृत आहुति ने अग्नि
को विशेष तृप्त किया है. मेरा मन स्तुतियों के उच्चारण में भली-भांति लगा रहे. खंडनरहित
अग्नि हमें यज्ञ के बीच में स्थित करें. यजमानों में मुख्य अर्थात् मेरे बड़े भाई अग्नि की
विशेषरूप से स्तुति करें. (२)
सो चिन्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती.
यदीमुशन्तमुशतामनु क्रतुमग्निं होतारं विदथाय जीजनन्.. (३)
भद्रा, शब्दयुक्त एवं अन्न वाली उषा यजमान के लिए आदित्य के साथ शीघ्र उदित हुई.
उस समय यज्ञाभिलाषियों के ऊपर प्रसन्न होने वाले एवं देवों को बुलाने वाले अग्नि को उत्पन्न
किया गया. (३)
अध त्यं द्रप्सं विभ्वं विचक्षणं विराभरदिषितः श्येनो अध्वरे.
यदी विशो वृणते दस्ममार्या अग्निं होतारमध धीरजायत.. (४)
बाज पक्षी अग्नि द्वारा प्रेरित होकर यज्ञ में महान्, सूक्ष्मदर्शी तथा न कम न अधिक सोम
को ले आया. जब आर्य यजमान उस दर्शनीय व देवों के आह्वान करने योग्य अग्नि की
प्रार्थना करते हैं, तब होता यज्ञक्रिया आरंभ करते हैं. (४)
सदासि रण्वो यवसेव पुष्यते होत्राभिरग्ने मनुषः स्वध्वरः.
विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यं१ वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः.. (५)
हे अग्नि! तुम पशुओं को पुष्ट करने वाली घास के समान सदा रमणीय हो. तुम मनुष्यों
के हव्य से शोभन यज्ञ वाले बनो. तुम स्तोता की स्तुतियों की प्रशंसा करते हुए एवं हव्य का
उपभोग करते हुए बहुत से देवों के साथ जाते हो. (५)
उदीरय पितरा जार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति.
विवक्ति वह्निः स्वपस्यते मखस्तविष्यते असुरो वेपते मती.. (६)
हे अग्नि! तुम अपना प्रकाश अपने माता-पिता द्यावा-पृथिवी की ओर इस प्रकार भेजो,
जिस प्रकार सूर्य अपनी ज्योति इनकी ओर भेजते हैं. यज्ञ की कामना करने वाला यजमान
सच्चे मन से यज्ञ करना चाहता है एवं स्तुति वचन बोलने का इच्छुक है. अध्वर्यु यज्ञकर्म को
पूरा करने को उत्सुक है. ब्रह्मा स्तोत्र को बढ़ाते हैं एवं उनकी बुद्धि यज्ञ के विषय में कभी-
कभी शंका करने लगती है. (६)
यस्ते अग्ने सुमतिं मर्तो अक्षत्सहसः सूनो अति स प्र शृण्वे.
इषं दधानो वहमानो अश्वैरा स द्युमाँ अमवान्भूषति द्यून्.. (७)
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हे बलपुत्र अग्नि! जो मनुष्य तुम्हारी दयादृष्टि चाहता है, वह प्रसिद्ध, अन्नदाता, घोड़ों
पर बैठकर चलने वाला, दीप्तिशाली, बली एवं प्रतिदिन सुशोभित होता हुआ तुम्हारी सेवा
करता है. (७)
यदग्न एषा समितिर्भवाति देवी देवेषु यजता यजत्र.
रत्ना च यद्विभजासि स्वधावो भागं नो अत्र वसुमन्तं वीतात्.. (८)
हे यज्ञ-योग्य अग्नि! जब हमारी स्तुतियां देवों के बीच में प्रकाशित होती हैं, उस समय
तुम हमें रत्न देते हो. हे स्वधायुक्त अग्नि! उस समय हम धन का भाग प्राप्त करें. (८)
श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्.
आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्या.. (९)
हे अग्नि! तुम देवों के साथ यज्ञशाला में रहकर हमारे स्तुतिवचनों को सुनो, अमृत
बरसाने वाले रथ को जोड़ो व देवों के माता-पिता द्यावा-पृथिवी को हमारे पास लाओ. तुम
देवों को छोड़कर मत जाओ. तुम यहीं रहो. (९)
सूक्त—१२ देवता—अग्नि
द्यावा हक्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा.
देवो यन्मर्तान्यजथाय कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन्.. (१)
सत्य बोलने वाले एवं प्रमुख द्यावा-पृथिवी सबसे पहले यज्ञ में अग्नि का आह्वान करें.
अग्नि देव मानवों को यज्ञ के लिए प्रेरित करते हुए एवं देवों को बुलाने के लिए ज्वलारूपी
प्राणों को धारण करके वेदी पर बैठें. (१)
देवो देवान्परिभूरृतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्.
धूमकेतुः समिधा भ्राभ्रॅजीको मन्द्रो होता नित्यो वाचा यजीयान्.. (२)
दीप्तिशाली, सभी देवों में प्रमुख, सब कुछ जानने वाले, धुएं रूपी ध्वजा से युक्त,
समिधा के कारण ऊंची ज्वालाओं वाले, स्तुतियोग्य, नित्य एवं वाणी द्वारा यजमानों का यज्ञ
करने वाले अग्नि देवों के समीप जाते हुए यज्ञ के साथ-साथ हमारा हव्य ले जावें. (२)
स्वावृग्देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी.
विश्वे देवा अनु तत्ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः.. (३)
अग्नि देव के अपने तेज से जो जल उत्पन्न होता है, उस जल से उत्पन्न होने वाले वृक्ष
द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं तथा सभी देव तुम्हारे दिए हुए जल की प्रशंसा करते हैं.
तुम्हारी उज्ज्वल दीप्ति दिव्य एवं बरसने वाले जल को दुहती है. (३)
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अर्चामि वां वर्धायापो घृतस्नू द्यावाभूमी शृणुतं रोदसी मे.
अहा यद् द्यावोऽसुनीतिमयन्मध्वा नो अत्र पितरा शिशीताम्.. (४)
हे अग्नि! तुम मेरे यज्ञकर्म को बढ़ाओ. हे वर्षा का जल उत्पन्न करने वाले द्यावा-पृथिवी!
तुम मेरी स्तुति सुनो. स्तोता जिस समय यज्ञस्तुति करते हैं, उस समय तुम वर्षा करके सबको
शुद्ध करो. (४)
किं स्विन्नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चक्रमा को वि वेद.
मित्रश्चिद्धि ष्मा जुहुराणो देवाञ्छ्लोको न यातामपि वाजो अस्ति.. (५)
क्या दीप्तिशाली अग्नि ने हमारी स्तुतियां और हवि स्वीकार कर लिया है? क्या हमने
अग्नि के परिचरण का कर्म किया है? इन बातों को कौन जानता है? मित्र के समान
स्नेहपूर्वक बुलाने से अग्नि आ जाते हैं. हमारी यह स्तुति एवं हव्य अन्न देवों के पास जावे.
(५)
दुर्मन्त्वत्रामृतस्य नाम सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति.
यमस्य यो मनवते सुमन्त्वग्ने तमृष्व पाह्यप्रयुच्छन्.. (६)
मरणरहित सूर्य का अपराधरहित एवं मधुरतायुक्त जल धरती पर नानारूप धारण करता
है. यम के अपराध को सूर्य जानते हैं. हे महान् अग्नि! प्रमाद न करते हुए सूर्य की रक्षा करो.
(६)
यस्मिन्देवा विदथे मादयन्ते विवस्वतः सदने धारयन्ते.
सूर्ये ज्योतिरदधुर्मास्य१क्तून्परि द्योतनिं चरतो अजस्रा.. (७)
अग्नि के यज्ञ में उपस्थित रहने पर देव प्रसन्न होते हैं एवं सूर्य के यज्ञवेदीरूप स्थान में
अपने आपको स्थापित करते हैं. देवों ने सूर्य में तेज तथा चंद्रमा में रातों को स्थापित किया.
नष्ट न होने वाले सूर्य और चंद्र प्रकाश पाते हैं. (७)
यस्मिन्देवा मन्मनि सञ्चरन्त्यपीच्ये३ न वयमस्य विद्म.
मित्रो नो अत्रादितिरनागान् त्सविता देवो वरुणाय वोचत्.. (८)
ज्ञानरूपी अग्नि के यज्ञ में उपस्थित रहने पर देवगण अपने-अपने अधिकार में लग
जाते हैं. हम अग्नि के छिपे हुए रूप को नहीं जानते. इस यज्ञ में मित्र, अदिति एवं सूर्य
पापनाशक अग्नि के सामने हमको पापरहित बतावें. (८)
श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्.
आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्याः.. (९)
हे अग्नि! तुम यज्ञशाला में सब देवों के साथ रहकर हमारी स्तुतियां सुनो, अमृत बरसाने
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वाले अपने रथ में घोड़े जोड़ो व देवों के माता-पिता द्यावा-पृथिवी को हमारे पास लाओ. तुम
देवों को छोड़कर मत जाओ और यहीं रहो. (९)
सूक्त—१३ देवता—हविर्धान शकट
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरे:.
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु:.. (१)
हे हवि धारण करने वाली गाड़ियों! मैं प्राचीन मंत्रों का उच्चारण करके एवं तुम्हारे ऊपर
सोम आदि लादकर पत्नीशाला से ले जाता हूं. स्तोता की आहुति के समान मेरी स्तुतियां देवों
के समीप जावें. दिव्यधाम में रहने वाले देव एवं अमरपुत्र इस बात को सुनें. (१)
यमे इव यतमाने यदैतं प्र वां भरन्मानुषा देवयन्तः.
आ सीदतं स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवतमिन्दवे न:.. (२)
हे गाड़ियों! जब तुम जुड़वां संतान के समान एक साथ जाती हो, तब देवपूजक लोग
तुम्हारे ऊपर बहुत सी हवन की सामग्री लादते हैं. तुम अपने स्थान को जानती हुई वहां रहो
एवं हमारे सोम के लिए शोभन स्थान वाली बनो. (२)
पञ्च पदानि रुपो अन्वरोहं चतुष्पदीमन्वेमि व्रतेन.
अक्षरेण प्रति मिम एतामृतस्य नाभावधि सं पुनामि... (३)
हे गाड़ियों! मैं तुम्हारे ऊपर यज्ञ के पांच उपकरणों को रखता हूं, नियमपूर्वक चार छंदों
का प्रयोग करता हूं, ओम् का उच्चारण करके यज्ञकार्य पूरा करता हूं एवं यज्ञ की नाभि पर
सोमरस को शुद्ध करता हूं. (३)
देवेभ्य: कमवृणीत मृत्युं प्रजायै कममृतं नावॄणीत.
बृहस्पतिं यज्ञमकृण्वत ऋषिं प्रियां यमस्तन्वं१ प्ररिरेचीत्.. (४)
देवों में किसे मृत्यु के पास भेजा जाए एवं प्रजा में से किसे अमर न बनाया जाए?
यजमान देवों के पालक एवं फलदाता विशाल यज्ञ को करते हैं. इस कारण यम हमारे शरीर
को मौत के पास नहीं भेजते. (४)
सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवतन्नृतम्.
उभे इदस्योभयस्य राजत उभे यतेते उभयस्य पुष्यतः.. (५)
स्तोतागण पिता के समान एवं प्रशंसायोग्य सोम के लिए सातों छंदों वाली स्तुतियां
बोलते हैं. सोम के पुत्र तुल्य ऋत्विज् भी सच्ची स्तुतियां बोलते हैं. हवि ढोने वाली दोनों
गाड़ियां देव और मानव दोनों की ईश हैं, यज्ञकर्म पूरा करने का प्रयत्न करती हैं तथा दोनों
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सूक्त—१४ देवता—पितृलोक आदि
का पोषण करती हैं. (५)
सूक्त—१४ देवता—पितृलोक आदि
परेयिवांसं प्रवतो महीरनु बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम्.
वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं राजानं हविषा दुवस्य.. (१)
हे यजमान! तुम पितरों के स्वामी यम की पुरोडाश आदि के द्वारा सेवा करो. यम बहुत
से पुण्यकर्म करने वालों को सुख देने वाले स्थानों में ले जाते हैं, बहुतों का मार्ग सरल बनाते
हैं एवं सभी मनुष्यों की मंजिल एक है. (१)
यमो नो गातुं प्रथमो विवेद नैषा गव्यूतिरपभर्तवा उ.
यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुरेना जज्ञानाः पथ्या३ अनु स्वाः.. (२)
सबके प्रमुख यम हमारे मार्गों को जानते हैं. यम के मार्ग का नाश कोई नहीं कर सकता.
जिस मार्ग से पूर्ववर्ती पितर गए हैं, उसीसे हम सब लोग जावें. (२)
मातली कव्यैर्यमो अङ्गिरोभिर्बृहस्पतिर्ऋक्वभिर्वावृधानः.
याँश्च देवा वावृधुर्यै च देवान्त्स्वाहान्ये स्वधयान्ये मदन्ति.. (३)
इंद्र कव्य नामक पितरों की सहायता से, यम अंगिरा नामक पितरों की सहायता से और
बृहस्पति ऋक्व नामक पितरों की सहायता से बढ़ते हैं. देवों की संवर्धना करने वाले एवं देवों
द्वारा संबंधित लोग भी बढ़ते हैं. देवों में कोई स्वाहा और कोई स्वधा के द्वारा प्रसन्न होता है.
(३)
इमं यम प्रस्तरमा हि सीदाङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः.
आ त्वा मन्त्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन्हविषा मादयस्व.. (४)
हे यम! अंगिरा नामक पितरों के साथ एकता रखते हुए तुम इस विस्तृत यज्ञ में आकर
बैठो. विद्वान् ऋत्विजों द्वारा बोले हुए मंत्र तुम्हें बुलावें. हे स्वामी यम! तुम इस हवि से प्रसन्न
बनो. (४)
अङ्गिरोभिरा गहि यज्ञियेभिर्यम वैरूपैरिह मादयस्व.
विवस्वन्तं हुवे यः पिता तेऽस्मिन्यज्ञे बर्हिष्या निषद्य.. (५)
हे यम! नानारूप धारी एवं यज्ञकर्त्ता अंगिराओं के साथ इस यज्ञ में पधारो एवं यजमान
को प्रसन्न करो. मैं तुम्हारे पिता विवस्वान् को बुलाता हूं. वे इस यज्ञ में बैठकर यजमान को
प्रसन्न करें. (५)
अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः.
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तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (६)
नवीन आगमन वाले अंगिरा, अथर्वा और भृगु नामक पितर सोमरस के अधिकारी हैं.
हम उन यज्ञपात्र पितरों की कृपादृष्टि पावें एवं उनकी कृपादृष्टि के कारण कल्याण प्राप्त करें.
(६)
प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः.
उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम्.. (७)
हे मेरे पिता! जिन प्राचीन मार्गों से हमारे पूर्ववर्ती पितर गए हैं, उन्हीं से तुम भी पधारो.
तुम वहां स्वधा से प्रसन्न होते हुए यम एवं वरुणदेव—दोनों स्वामियों को देखो. (७)
सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेनेष्टापूर्तेन परमे व्योमन्.
हित्वायावद्यं पुनरस्तमेहि सं गच्छस्व तन्वा सुवर्चाः.. (८)
हे मेरे पिता! तुम उत्तम स्वर्ग में जाकर अपने पितरों से, यम से और अपने श्रौत, स्मार्त
कर्मों के फलों से मिलो. तुम अपना पाप छोड़कर म्रियमान नामक घर में आओ एवं शोभन
दीप्ति वाले शरीर से मिलो. (८)
अपेत वीत वि च सर्पतातोऽस्मा एतं पितरो लोकमक्रन्.
अहोभिरद्भिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्यवसानमस्मै.. (९)
हे श्मशान पर रहने वाले पिशाचो! यहां से चले जाओ, हट जाओ. पितरों ने इस स्थान
को हमारे इस मरे हुए यजमान के लिए बनाया है. यम ने दिवसों, जलों और रात्रियों से युक्त
यह स्थान इस मरने वाले को दिया है. (९)
अति द्रव सारमेयौ श्वानौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा.
अथा पितृन्त्सुविदत्राँ उपेहि यमेन ये सधमादं मदन्ति.. (१०)
हे अग्नि! तुम सरमा के पुत्र, चार आंखों वाले एवं चितकबरे दो कुत्तों को पार करके
उत्तम मार्ग के द्वारा जाते हुए यम के साथ प्रसन्न रहने वालों एवं शोभनज्ञानसंपन्न पितरों के
समीप जाओ. (१०)
यौ ते श्वानो यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी नृचक्षसौ.
ताभ्यामेनं परि देहि राजन्त्स्वस्ति चास्मा अनमीवं च धेहि.. (११)
हे स्वामी यम! जो तुम्हारे घर के रक्षक, चार आंखों वाले, मार्ग की रक्षा करने वाले एवं
मनुष्यों द्वारा प्रशंसित दो कुत्ते हैं, उनसे इस मृत व्यक्ति की रक्षा करो एवं इसे कल्याण एवं
रोगहीनता दो. (११)
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उरूणसावसुतृपा उदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु.
तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्.. (१२)
लंबी नाक वाले, दूसरों के प्राणों से तृप्त होने वाले, अत्यंत बली एवं यम के दूत जो दो
कुत्ते हैं, वे आज हमें सूर्य का दर्शन करने के लिए यहां कल्याणकारी प्राण दें. (१२)
यमाय सोमं सुनुत यमाय जुहुता हवि:. यमं ह यज्ञो गच्छत्यग्निदूतो अरङकृत:.. (१३)
हे ऋत्विजो! यम के लिए सोमरस निचोड़ो तथा हवि का होम करो. अग्नि को दूत बनाने
वाला एवं अलंकृत यज्ञ यम के पास जाता है. (१३)
यमाय घृतवद्धविर्जुहोत प्र च तिष्ठत. स नो देवेष्वा यमद्दीर्घमायु: प्र जीवसे.. (१४)
हे ऋत्विजो! यम के लिए घी वाला हवि होम करो एवं उनकी सेवा करो. यम देव हमें
लंबा जीवन बिताने के लिए अधिक आयु दें. (१४)
यमाय मधुमत्तमं राज्ञे हव्यं जुहोतन.
इदं नम ऋषिभ्य: पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकृद्भ्य:.. (१५)
हे ऋत्विजो! स्वामी यम के लिए अत्यंत मधुर हवि का होम करो. हमारे जिन पूर्वज
ऋषियों ने पहले यह मार्ग बनाया है, उनके लिए नमस्कार है. (१५)
त्रिकद्रुकेभि: पतति षळुर्वीरिकमिद्बृहत्.
त्रिष्टुब्गायत्री छन्दांसि सर्वा ता यम आहिता.. (१६)
यम त्रिकद्रुक नामक यज्ञ को प्राप्त करते हैं, छ: स्थानों में रहते हैं एवं एक विस्तृत
संसार में घूमते हैं. त्रिष्टुप्, गायत्री आदि सब छंद यम की स्तुति में प्रयुक्त हैं. (१६)
सूक्त—१५ देवता—पितृलोक
उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:.
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु.. (१)
उत्तम, मध्यम और अधम—तीनों श्रेणियों के पितर कृपा करते हुए हमारा हवि ग्रहण
करें. हमारी हिंसा न करने वाले और हमारे यज्ञों को जानने वाले जो पितर हमारी प्राणरक्षा
करने आए हैं, वे यज्ञों में हमारी रक्षा करें. (१)
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वांसो य उपरास ईयु:.
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु.. (२)
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जो बाबा आदि पितर पहले मरे हैं, जो बड़े भाई आदि पितर बाद में मरे हैं, जो पृथिवी
पर जन्म लेकर आ गए हैं अथवा जो शोभन धन वाली प्रजाओं के बीच हैं, उनके लिए यह
नमस्कार है. (२)
आहं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः.
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः.. (३)
मैंने ऐसे पितरों को पाया है जो मेरी भक्ति को भली-भांति जानते हैं. मैंने व्यापक यज्ञ
की नित्यता एवं पूरा करने का उपाय भी पाया है. जो पितर कुशों पर बैठकर सोमरस पीते
हुए प्रसन्न होते हैं, वे इस कर्म में आवें. (३)
बर्हिषदः पितर ऊत्य१र्वागिमा वो हव्या चक्रमा जुषध्वम्.
त आ गतावसा शन्तमेनाथा नः शं योररपो दधात.. (४)
हे कुशों पर बैठने वाले पितरो! इस समय तुम हमारी रक्षा करो. हमने तुम्हारे लिए ये
हव्य तैयार किए हैं, तुम इनका उपभोग करो. तुम आओ और रक्षा करते हुए हमारा कल्याण
करो. तुम हमें सुखी करो, हमारा दुःख मिटाओ और हमें पापरहित बनाओ. (४)
उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु.
त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्.. (५)
कुशों के ऊपर प्रिय द्रव्य रखे जाने के बाद सोमरस के प्रेमी पितर बुलाए गए हैं. वे वहां
आवें, हमारी स्तुतियां सुनें, स्तुतियां सुनकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करें एवं हमारी रक्षा करें.
(५)
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्योमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे.
मा हिंसिष्ट पितरः केनचिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम.. (६)
हे पितरो! तुम सब मेरी दाहिनी ओर धरती पर घुटने टेककर बैठो और तुम सब इस यज्ञ
की प्रशंसा करो. हम पुरुष होने के कारण भूल से पाप कर बैठते हैं. तुम किसी पाप के
कारण हमारी हिंसा मत करो. (६)
आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय.
पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात.. (७)
हे लाल ज्वालाओं के समीप बैठने वाले पितरो! हव्य देने वाले मनुष्य को धन दो, तुम
यजमान के पुत्रों को धन दो तथा हमारे इस यज्ञ में धन धारण करो. (७)
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः.
तेभिर्यमः संरणानो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु.. (८)
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हमारे सोमरस तैयार करने वाले, उत्तम वस्त्रधारक एवं नियमपूर्वक देवादि को सोमपान
कराने वाले प्राचीन पितर यम के साथ एवं यम उनके साथ हवि आदि का उपभोग करना
चाहते हैं. यम उन पितरों के साथ अपनी इच्छाओं के अनुसार हव्य भक्षण करें. (८)
ये तातृषुर्देवत्रा चेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः.
आग्ने याहि सुविद्वेत्रेभिर्वाङ् सत्यैः काव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः.. (९)
हे अग्नि! यज्ञ करने के ज्ञाता, स्तोत्रों और मंत्रों के बनाने वाले एवं क्रम से देवत्व पाने
वाले जो पितर प्यासे हैं, उन्हें हमारे सामने लेकर आओ. वे पितर विशेष परिचित,
विवादरहित, यज्ञ में बैठने वाले एवं हव्य ग्रहण करने वाले हैं. (९)
ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः.
आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः.. (१०)
हे अग्नि! जो पितर सच्चे, हव्य भक्षण करने वाले, सोम पीने वाले, इंद्रादि देवों के साथ
एक रथ पर बैठने वाले, देवाराधन कर्त्ता, पहले वाले, उनके बाद वाले एवं यज्ञ में बैठने वाले
हैं. उन पितरों के साथ आओ. (१०)
अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः.
अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन.. (११)
हे अग्निष्वात्त नामक पितरो! यहां आओ और स्वागत स्वीकार करके अपने-अपने
आसनों पर बैठो एवं कुशों पर फैले हुए हव्यों को खाओ. इसके बाद हमें पुत्र-पौत्रों से युक्त
धन दो. (११)
त्वमग्न ईळितो जातवेदोऽवाढ्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी.
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि.. (१२)
हे सबको जानने वाले अग्नि! हमने तुम्हारी स्तुति की है. तुमने हमारा हव्य सुगंधित
बनाकर पितरों को दिया है. पितर ‘स्वधा’ शब्द के साथ दिया हुआ हवि भक्षण करें. हे अग्नि
देव! तुम हमारे प्रयत्न द्वारा संपादित हव्यों का भक्षण करो. (१२)
ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म.
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व.. (१३)
हे जातवेद अग्नि! तुम उन सब पितरों को जानते हो, जो यहां आए हैं, जो यहां नहीं
आए हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं जानते हैं. तुम स्वधा शब्द के साथ किए गए
हमारे यज्ञ को स्वीकार करो. (१३)
ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते.
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सूक्त—१६ देवता—अग्नि
तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व.. (१४)
हे स्वयं प्रकाश अग्नि! जो पितर अग्नि द्वारा जलाए गए हैं एवं जो नहीं जलाए गए हैं, वे
सब स्वर्ग के बीच में स्वधा शब्द के साथ दिए गए हव्यों से प्रसन्न होते हैं. तुम उन पितरों के
साथ मिलकर उनके देव शरीर को उनकी इच्छा के अनुसार बनाओ. (१४)
सूक्त—१६ देवता—अग्नि
मैनमग्ने वि दहो माभि शोचो मास्य त्वचं चिक्षिपो मा शरीरम्.
यदा शृतं कृणवो जातवेदोऽथेमेनं प्र हिणुतात्पितृभ्यः.. (१)
हे अग्नि! इस मरे हुए व्यक्ति को पूरी तरह मत जलाओ. इसे कष्ट मत पहुंचाओ. इसके
चमड़े और शरीर को इधर-उधर मत बिखेरो. हे जातवेद अग्नि! जब तुम इसे पका चुको, तभी
इसे पितरों के पास भेज देना. (१)
शृतं यदा करसि जातवेदोऽथेमेनं परि दत्तात्पितृभ्यः.
यदा गच्छात्यसुनीतिमेतामथा देवानां वशनीर्भवति.. (२)
हे अग्नि! तुम इस मरे हुए शरीर को जब पका लो, तभी इसे पितरों के पास पहुंचा देना.
जब यह दोबारा प्राण प्राप्त करेगा, तब देवों के वश में रहेगा. (२)
सूर्यं चक्षुर्गच्छतु वातमात्मा द्यां च गच्छ पृथिवीं च धर्मणा.
अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः.. (३)
हे मरे हुए व्यक्ति! तुम्हारी आंखें सूर्य को और तुम्हारा प्राण वायु को प्राप्त हो. तुम अपने
धार्मिक कार्यों के कारण स्वर्ग या धरती पर जाओ. यदि जल में तुम्हारा सुख है तो वहां
जाओ. तुम अपने शरीर के द्वारा ओषधियों में स्थित रहो. (३)
अजो भागस्तपसा तं तपस्व तं ते शोचिस्तपतु तं ते अर्चिः.
यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्.. (४)
हे अग्नि! इस मरे हुए व्यक्ति का जो भाग जन्मरहित है, उसीको तुम अपने ताप से
तपाओ. तुम्हारी ज्वाला एवं प्रकाश उसे तपावे. हे जातवेद अग्नि! तुम अपने कल्याणकारी
रूपों के द्वारा इसे उत्तम कर्म करने वालों के लोकों में ले जाओ. (४)
अव सृज पुनरग्ने पितृभ्यो यस्त आहुतश्चरति स्वधाभिः.
आयुर्वसान उप वेतु शेषः सं गच्छतां तन्वा जातवेदः.. (५)
हे अग्नि! जो मरा हुआ व्यक्ति तुम्हारी आहुति बनकर स्वधा शब्द के साथ ऊपर जाता
है, उसे पितरों के समीप जाने की प्रेरणा दो. इसके शरीर का शेष भाग जीवन प्राप्त करे. हे
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जातवेद अग्नि! यह व्यक्ति शरीर से पुनः मिले. (५)
यत्ते कृष्णः शकुन आतुतोद पिपीलः सर्प उत वा श्वापदः.
अग्निष्टद्विश्वादगदं कृणोतु सोमश्च यो ब्राह्मणाँ आविवेश.. (६)
हे मृत व्यक्ति! तुम्हारे जिस अंग को कौवे ने नोचा है अथवा चींटी, सांप या अन्य किसी
पशु ने काटा है, अग्नि उस सबको रोगरहित करें. ब्राह्मणों के शरीर में प्रवेश करने वाले सोम
भी तुम्हें निरोग बनावें. (६)
अग्नेर्वर्म परि गोभिर्व्ययस्व सं प्रोर्णुष्व पीवसा मेदसा च.
नेत्त्वा धृष्णुर्हरसा जर्हृषाणो दधृग्विधक्ष्यन्पर्यङ्खयाते.. (७)
हे प्रेत! तुम गाय के चमड़े के साथ-साथ आग की लपटरूपी कवच को पहनो. तुम चर्बी
और मांस से ढक जाओ. ऐसा होने पर अपने तेज से तुम्हें पराभूत करने वाले एवं अत्यंत
प्रसन्न अग्नि तुम्हें नहीं जलावेंगे. वे तुम्हें विशेष रूप से जलाने को तैयार हैं. (७)
इममग्ने चमसं मा वि जिह्वरः प्रियो देवानामुत सोम्यानाम्.
एष यश्चमसो देवपानस्तस्मिन्देवा अमृता मादयन्ते.. (८)
हे अग्नि! इस चमस को इधर-उधर मत करना. यह सोमरस पीने वाले देवों का प्रिय है.
यह चमस देवों के सोमपान के लिए है. इसे पाकर मरणरहित देव प्रसन्न होते हैं. (८)
क्रव्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः.
इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्.. (९)
मैं मांस जलाने वाली तेज आग को दूर करता हूं. पाप को ढोने वाली वह आग यम के
देश में जावे. यहां ही ये दूसरे अग्नि हैं, ऐसा जानते हुए हम देवों के लिए हव्य ले जाते हैं. (९)
यो अग्निः क्रव्यात्प्रविवेश वो गृहमिमं पश्यन्नितरं जातवेदसम्.
तं हरामि पितृयज्ञाय देवं स घर्ममिन्वात्परमे सधस्थे.. (१०)
मांस जलाने वाली चिता की अग्नि तुम्हारे इस घर में प्रवेश कर गई है. मैं उन्हें घर से
निकालता हूं. मैं दूसरे जातवेद अग्नि को देखता हुआ उत्तम स्थान में यज्ञ के लिए प्राप्त करता
हूं. यह अग्नि मेरे यज्ञ को लेकर स्वर्ग में जावें. (१०)
यो अग्निः कव्यवाहनः पितॄन्यक्षदृतावृधः.
प्रेदु हव्यानि वोचति देवेभ्यश्च पितृभ्य आ.. (११)
जो अग्नि श्राद्ध की सामग्री को पितरों तक ढोने वाले, यज्ञ को बढ़ाने वाले एवं
देवपितरों का यज्ञ करने वाले हैं, मैं उन्हीं के पास होम की सामग्री ले जाता हूं. (११)
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उशन्तस्त्वा नि धीमहुशन्तः समिधीमहि. उशन्नुशत आ वह पितॄन्हविषे अत्तवे.. (१२)
हे अग्नि! मैं तुम्हारी कामना करता हुआ तुम्हें स्थापित करता हूं एवं प्रज्वलित करता हूं.
तुम भी कामना करते हुए हव्य की अभिलाषा करने वाले देवों के पास होम की सामग्री
इसलिए ले जाओ कि वे उसे खा सकें. (१२)
यं त्वमग्ने समदहस्तमु निर्वापया पुनः.
कियाम्बवत्र रोहतु पाकदुर्वा व्यल्कशा.. (१३)
हे अग्नि! तुमने जिसे जलाया है, उसे पुनः बुझाओ. जिस जगह पर कुछ जल भरा हो
और अनेक शाखाओं वाली पकी दूब खड़ी हो. (१३)
शीतिके शीतिकावति ह्लादिके ह्लादिकावति.
मण्डूक्या३ सु सं गम इमं स्व१ग्निं हर्षय.. (१४)
हे शीतल एवं वनस्पतियों से युक्त पृथिवी! तुम लोगों को प्रसन्न करती हो. तुम्हारे ऊपर
बहुत आह्लादक वनस्पतियां हैं. तुम ऐसी वर्षा लाओ, जिससे मेंढक संतुष्ट हों. तुम अग्नि को
प्रसन्न करो. (१४)
सूक्त—१७ देवता—सरण्यू आदि
त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोतीतीदं विश्वं भुवनं समेति.
यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश... (१)
त्वष्टा अपनी कन्या सरण्यू का विवाह करने वाले हैं. विवाह की तैयारी में सारा संसार
सम्मिलित है. यम और यमी की माता का जब सूर्य से विवाह हुआ, तब सूर्य की पत्नी उत्तर
कुरु देश से चली गई. (१)
अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वी सवर्णामददुर्विवस्वते.
उताश्विनावभरद्यत्तदासीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः.. (२)
मरणरहित सरण्यू को मनुष्यों के बीच छिपाया गया और सरण्यू के समान दूसरी स्त्री
बनाकर सूर्य को दी गई. सरण्यू उस समय घोड़ी के रूप में छिपाई गई थी. उसने
अश्विनीकुमारों को गर्भ के रूप में धारण किया और दो बालकों को जुड़वां रूप में जन्म
दिया. (२)
पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वाननष्टपशुर्भुवनस्य गोपाः.
स त्वैतेभ्यः परि ददत्पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः... (३)
हमारी भक्ति को जानने वाले, अमर पशुओं से युक्त एवं सारे संसार के रक्षक पूषा तुम्हें
इस लोक में छुड़ावें. अग्नि तुम्हें धन देने वाले देवों को दें. (३)
आयुर्विश्वायुः परि पासति त्वा पूषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्.
यत्रासते सुकृतो यत्र ते ययुस्तत्र त्वा देवः सविता दधातु.. (४)
सारे संसार के जीवन पूषा तुम्हारी आयु की रक्षा करें. वे तुम्हारे गंतव्य स्वर्ग में पहले से
वर्तमान हैं. पुण्य वाले लोग जहां रहते हैं, वहां वे गए हैं, पूषा तुम्हें वहीं ले जावें. (४)
पूषेमा आशा अनु वेद सर्वाः सो अस्माँ अभयतमेन नेषत्.
स्वस्तिदा आघृणिः सर्ववीरोऽप्रयुच्छन्पुर एतु प्रजानन्.. (५)
पूषा इन सारी दिशाओं को जानते हैं. वे हमें भयरहित दिशाओं से ले चलें. कल्याण
करने वाले, दीप्तियुक्त, सब वीरों से युक्त एवं हमें जानने वाले पूषा प्रमादरहित होकर हमारे
सामने आवें. (५)
प्रपथे पथामजनिष्ट पूषा प्रपथे दिवः प्रपथे पृथिव्याः.
उभे अभि प्रियतमे सधस्थे आ च परा च चरति प्रजानन्.. (६)
सबसे उत्तम मार्ग में पूषा ने जन्म लिया है. वे धरती और स्वर्ग के उत्तम मार्ग में उत्पन्न
हुए हैं. पूषा की दोनों प्रियतमाएं अर्थात् द्यावा-पृथिवी साथ-साथ रहती हैं. पूषा उन्हें विशेष
रूप से जानते हुए घूमते हैं. (६)
सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वटीमध्वरे तायमाने.
सरस्वतीं सुकृतो अह्वयन्त सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्.. (७)
देवों की इच्छा से यज्ञ करने वाले सरस्वती को बुलाते हैं. यज्ञ के विस्तार के समय
पुण्यकर्म करने वालों ने सरस्वती को बुलाया. सरस्वती यजमान को धन दें. (७)
सरस्वति या सरथं ययाथ स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती.
आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयस्वानमीवा इष आ धेह्यस्मे.. (८)
हे सरस्वती! तुम पितरों के साथ स्वधा के उच्चारणपूर्वक दिए गए हव्य से प्रसन्न होती
हुई उसके साथ एक रथ पर बैठकर आओ. इस यज्ञ के फैले हुए कुशों पर बैठकर आनंद करो
एवं हमें निरोग बनाओ तथा अन्न दो. (८)
सरस्वतीं यां पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः.
सहस्रार्घमिळो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानेषु धेहि.. (९)
हे सरस्वती! पितर लोग दक्षिण की ओर आकर एवं यज्ञ में इधर-उधर चलते हुए तुम्हें
बुलाते हैं. तुम इस यज्ञ में यजमान के लिए अनेक जनों द्वारा पूजनीय अन्न एवं धन का भाग