ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—७१ देवता—ब्रह्मज्ञान
सूक्त—७१ देवता—ब्रह्मज्ञान बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः. यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः.. (१) हे बृहस्पति! बच्चे सबसे पहले पदार्थों का नाम मात्र जानते हैं. यह उनकी भाषा की पहली सीढ़ी है. बालकों का जो पापरहित वेदार्थ ज्ञान है, वह गुहा में छिपा हुआ रहता है. वह ज्ञान सरस्वती की कृपा से प्रकट होता है. (१) सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत. अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि.. (२) जिस प्रकार सत्तू वाले भुने हुए जौ सूप से शुद्ध किए जाते हैं, उसी प्रकार विद्वान् लोग मन में विचार करके शुद्ध भाषा बोलते हैं. उस समय विद्वान् लोग मित्रताओं को जानते हैं. इनके वचनों में मंगलकारिणी लक्ष्मी छिपी रहती हैं. (२) यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्. तामाभृत्या व्यदधुः पुरुत्रा तां सप्त रेभा अभि सं नवन्ते.. (३) बुद्धिमान् मनुष्य यज्ञ के द्वारा भाषा का मार्ग जानते हैं. उन्होंने ऋषियों के मन में प्रविष्ट वाणी को जान लिया है. उस भाषा को प्राप्त करके उन्होंने अनेक देशों में फैलाया. सातों छंद इसी भाषा में एकत्र होते हैं. (३) उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम्. उतो त्वस्मै तन्वं१ वि सस्रे जायेव पत्य उशती सुवासाः.. (४) कुछ लोग मन से विचार करके भी भाषा को नहीं समझ पाते. कुछ लोग भाषा को सुनकर भी नहीं सुनते. किसी किसी के सामने भाषा अपने शरीर को इस प्रकार विसर्जित कर देती है, जिस प्रकार शोभन वस्त्रों वाली एवं पति की कामना करने वाली नारी पति के सामने अपने शरीर को प्रदर्शित करती है. (४) उत त्वं सख्ते स्थिरपीतमाहुर्नैनं हिन्वन्त्यपि वाजिनेषु. अधेन्वा चरति माययैष वाचं शुश्रुवाँ अफलामपुष्पाम्.. (५) किसी-किसी को विद्वानों की मंडली में उत्तम भावग्रहण करने वाले के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. इनकी किसी भी कार्य में उपेक्षा नहीं की जाती. कुछ लोग फल और पुष्परहित वाणी की सेवा करते हैं. इनकी वाणी वास्तविक धेनु नहीं, अपितु मायारूपिणी धेनु है. (५) यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति. ebook converter DEMO Watermarks*
यदीं शृणोत्यलकं शृणोति नहि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम्.. (६) जो वेद पढ़ने वाला, मित्र को जानने वाले मित्र को त्याग देता है, उसकी वाणी में कोई सार नहीं होता. वह पुरुष जो भी सुनता है, व्यर्थ सुनता है. वह सत्कर्म का मार्ग नहीं जानता. (६) अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः. आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे.. (७) आंखों और कानों वाले मित्र मन का भाव प्रकाशित करने में अद्वितीय होते हैं. कुछ लोग कमर तक गहरे तालाब के समान, कुछ मुख तक गहरे तालाब के समान एवं कुछ स्नान करने योग्य तालाबों के समान दिखाई देते हैं. (७) हृदा तष्टेषु मनसो जवेषु यद् ब्राह्मणाः संयजन्ते सखायः. अत्राह त्वं वि जहुर्वेद्याभिरोहब्रह्माणो वि चरन्त्यु त्वे.. (८) जिस समय समान ज्ञान वाले अनेक ब्राह्मण हृदय द्वारा समझे जाने वाले वेदार्थ के गुणदोष पर विचार करने पर एकत्र होते हैं, उस समय किसी-किसी को विशेष ज्ञान होता है एवं कोई कोई स्तोत्र का अर्थ जानकर घूमते हैं. (८) इमे ये नार्वाङ्न परश्चरन्ति न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः. त एते वाचमभिपद्य पापया सिरीस्तन्त्रं तन्वते अप्रजज्ञयः.. (९) ये अविद्वान् लोग इस लोक में वेद को जानने वाले ब्राह्मणों द्वारा एवं परलोकवासी देवों के साथ यज्ञकर्म का आचरण नहीं करते. वे न तो स्तोता हैं और न सोमयज्ञ करने वाले हैं. ये पाप का आश्रय लेने वाली लौकिक वाणी से युक्त होकर मूर्ख के समान हल चलाते हुए कृषिकर्म करते हैं. (९) सर्वे नन्दन्ति यशसागतेन सभासाहेन सख्या सखायः. किल्विषस्पृत्पितुषणिर्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय.. (१०) मित्र के समान आचरण करने वाले एवं सभा में यश प्रदान करने वाले यश को पाकर प्रसन्न होते हैं. यश के कारण पाप दूर होता है. अन्न मिलता है एवं शक्ति प्राप्त होती है. इस प्रकार यश से अनेक प्रकार का हित होता है. (१०) ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान्गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु. ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां वि मिमीति उ त्वः.. (११) कुछ होता अनेक ऋचाओं का उच्चारण करते हुए यज्ञ में सहायक होते हैं एवं कुछ लोग गायत्री छंद में साममंत्रों को गाते हैं. ब्रह्मा नामक पुरोहित प्रायश्चित्त की व्याख्या करता है एवं ebook converter DEMO Watermarks*
अध्वर्यु यज्ञ में विविध कार्य करता है. (११) सूक्त—७२ देवता—देव देवानां नु वयं जाना प्र वोचाम विपन्यया. उक्थेषु शस्यमानेषु यः पश्यादुत्तरे युगे.. (१) हम स्पष्ट शब्दों में देवों की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं. ये देव भविष्य में स्तोत्रों के उच्चारण के समय स्तोता को देखेंगे. (१) ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मार इवाधमत्. देवानां पूर्व्ये युगेऽसतः सदजायत.. (२) लोहार जिस प्रकार धौंकनी चलाता है, उसी प्रकार ब्रह्मणस्पति ने देवों को उत्पन्न किया. देवों से पूर्व के समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. (२) देवानां युगे प्रथमेऽसतः सदजायत. तदाशा अन्वजायन्त तदुत्तानपदस्परि.. (३) देवों की उत्पत्ति से पहले के समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. इसके बाद दिशाएं उत्पन्न हुईं. दिशाओं से वृक्ष उत्पन्न हुए. (३) भूर्जज्ञ उत्तानपदो भुव आशा अजायन्त. अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि.. (४) वृक्षों से भूमि उत्पन्न हुई एवं भूमि से दिशाएं उत्पन्न हुईं. अदिति से दक्ष उत्पन्न हुए और बाद में दक्ष से अदिति उत्पन्न हुई. (४) अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव. तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः.. (५) हे दक्ष! तुम्हारी पुत्री अदिति ने देवों को उत्पन्न किया. अदिति के पश्चात् प्रशंसनीय एवं अमृत के बंधु देवों ने जन्म लिया. (५) यद्देवा अदः सलिले सुसंरब्धा अतिष्ठत. अत्रा वो नृत्यतामिव तीव्रो रेणुरपायत.. (६) हे देवो! जब तुम इस जल में रहकर अपने को जानते हुए स्थित थे, तब तुम नृत्य सा करने लगे. इससे बहुत धूल उड़ी. (६) यद्देवा यतयो यथा भुवनान्यपिन्वत. अत्रा समुद्र आ गूळ्हमा सूर्यमजभर्तन.. (७) बादल जिस प्रकार वर्षा द्वारा संसार को भरते हैं, उसी प्रकार देवों ने संसार को ढक लिया. उन्होंने सागर में ढके हुए सूर्य को चमकने के लिए बाहर निकाला. (७) अष्टौ पुत्रासो अदितेर्ये जातास्तन्व१ स्परि. ebook converter DEMO Watermarks*
देवाँ उप प्रैत्सप्तभिः परा मार्ताण्डमास्यत्.. (८) अदिति के शरीर से आठ पुत्र उत्पन्न हुए. उन में से सात के साथ वह देवलोक में चली गई. आठवां सूर्य आकाश में स्थित हुआ. (८) सप्तभिः पुत्रैरदितिरुप प्रैत्पूर्व्यं युगम्. प्रजायै मृत्यवे त्वत्पुनर्मार्ताण्डमाभरत्.. (९) प्राचीनकाल में अदिति सात पुत्रों के साथ देवलोक में चली गई. केवल सूर्य को प्रजाओं के जन्म-मरण के लिए आकाश में स्थिर किया. (९) सूक्त—७३ देवता—इंद्र व मरुत् जनिष्ठा उग्रः सहसे तुराय मन्द्र ओजिष्ठो बहुलाभिमानः. अवर्धन्निन्द्रं मरुतश्चिदत्र माता यद्वीरं दधनद्धनिष्ठा.. (१) गर्भ धारण करने वाली इंद्र की माता ने जिस इंद्र को जन्म दिया, उस समय मरुतों ने वीर इंद्र की प्रशंसा इस प्रकार की—“तुम शक्तिप्रदर्शन और शत्रुनाश के लिए उत्पन्न हुए हो. तुम प्रशंसनीय, ओजस्वी एवं अधिक अभिमानी हो.” (१) द्रुहो निष्पत्ता पृशनी चिदेवैः पुरू शंसेन वावृधुष्ट इन्द्रम्. अभीवृतेव ता महापदेन ध्वान्तातप्रपित्वादुदरन्त गर्भाः.. (२) मरुतों के साथ-साथ इंद्र की सेना भी इंद्र के समीप बैठी है. मरुतों ने विशाल स्तोत्रों द्वारा इंद्र को बढ़ाया. जिस प्रकार बंद गोष्ठ के खुलने पर गाएं बाहर निकलती हैं, उसी प्रकार अंधकाररूप मेघ के भीतर से वर्षा का जल बाहर निकला. (२) ऋष्वा ते पादा प्र यज्जिगास्यवर्धन्वाजा उत ये चिदत्र. त्वमिन्द्र सालावृकान्त्सहस्रमासन् दधिषे अश्विना ववृत्याः.. (३) हे इंद्र! तुम्हारे चरण महान् हैं. तुम जिस समय चलते हो, उस समय ऋभुगण एवं वहां उपस्थित देव बढ़ते हैं. तुम हजार भेड़ियों को मुख में धारण करते हो तथा अश्विनीकुमारों को घुमा सकते हो. (३) समना तूर्णिरुप यासि यज्ञमा नासत्या सख्याय वक्षि. वसाव्यामिन्द्र धारयः सहस्राश्विना शूर ददतुर्मघानि.. (४) हे इंद्र! संग्राम की जल्दी होने पर भी तुम यज्ञ में जाते हो. उस समय तुम अश्विनीकुमारों की मित्रता धारण करते हो. हे शूर इंद्र! उस समय तुम हमारे लिए हजार धन धारण करते हो. अश्विनीकुमार हमारे लिए धन दें. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
मन्दमान ऋतादधि प्रजायै सखिभिरिन्द्र इषिरेभिरर्थम्. आभिर्हि माया उप दस्युमागान्मिल्हः प्र तम्रा अवपत्तमांसि.. (५) इंद्र यज्ञ में अपने मित्र मरुतों के साथ प्रसन्न होते हुए यजमान के लिए धन देते हैं. इंद्र ने यजमानों के निमित्त असुरों की माया को समाप्त किया, वर्षा की तथा अंधकार को नष्ट किया. (५) सनामाना चिद् ध्वसयो न्यस्मा अवाहन्निन्द्र उषसो यथानः. ऋष्वैरगच्छः सखिभिर्निकामैः साकं प्रतिष्ठा हृद्या जघन्थ.. (६) इंद्र ने वृत्र को मारने के लिए समान नाम वाले शत्रुओं को नष्ट किया. इंद्र ने उषा की गाड़ी के समान ही वृत्र को नष्ट किया. इंद्र दीप्त व वृत्रवध के इच्छुक अपने मित्र मरुतों के साथ वृत्र को मारने गए. हे इंद्र! तुमने शत्रुओं के सुंदर शरीर को नष्ट किया. (६) त्वं जघन्थ नमुचिं मखस्युं दासं कृण्वान ऋषये विमायम्. त्वं चकर्थ मनवे स्योनान्पथो देवत्राञ्जसेव यानान्.. (७) हे इंद्र! नमुचि राक्षस तुम्हारे धन की अभिलाषा करता था, इसलिए तुमने उसे मार डाला. तुमने मनु के सामने घातक असुर नमुचि को मायाविहीन किया. तुमने मनु के चलने के लिए मार्ग सुरक्षित कर दिया. वे मार्ग सरलता से देवलोक में जाते हैं. (७) त्वमेतानि पप्रिषे वि नामेशान इन्द्र दधिषे गभस्तौ. अनु त्वा देवाः शवसा मदन्त्युपरिबुध्नान्वनिनश्चकर्थ.. (८) हे इंद्र! तुम इस संसार को जल से पूर्ण करते हो तथा सबके स्वामी बनकर हाथ में वज्र धारण करते हो. तुम शक्तिसंपन्न हो. सभी देव तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम बादलों का मुख नीचे की ओर करते हो. (८) चक्रं यदस्याप्स्वा निषत्तमुतो तदस्मै मध्विच्चच्छद्यात्. पृथिव्यामतिषितं यदूधः पयो गोष्वदधा ओषधीषु.. (९) इंद्र का जो चक्र आकाश में स्थित है, वह इंद्र के लिए मधु देता है. हे इंद्र! तुमने धरती पर लता, घास आदि में जो दूध स्थापित किया है, वह गायों के थनों से दूध के रूप में निकलता है. (९) अश्वादियायेति यद्वदन्त्योजसो जातमुत मन्य एनम्. मन्योरियाय हर्म्येषु तस्थौ यतः प्रजज्ञ इन्द्रो अस्य वेद.. (१०) कुछ लोग कहते हैं कि इंद्र की उत्पत्ति आदित्य से हुई है. मैं इंद्र को बल से उत्पन्न मानता हूं. इंद्र क्रोध से उत्पन्न होकर अटारियों पर स्थित हुए. इंद्र कहां से उत्पन्न हुए हैं, यह ebook converter DEMO Watermarks*
बात वही जानते हैं। (१०) वयः सुपर्णा उप सेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयो नाधमानाः. अप ध्वान्तमूर्णुहि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्य१स्मान्निधयेव बद्धान्.. (११) गति करने वाली सूर्यकिरणें इंद्र के समीप पहुंचीं. यज्ञ को प्रेम करने वाले ऋषि बुद्धि की याचना करते हुए इंद्र के पास गए. हे इंद्र! अंधकार को नष्ट करो. हमारी आंखों को प्रकाश से भर दो तथा पाप से बंधे हुए हम लोगों को छुड़ाओ. (११) सूक्त—७४ देवता—मरुत् वसूनां वा चकृष इयक्षन्धिया वा यज्ञैर्वा रोदस्योः. अर्वन्तो वा ये रयिमन्तः सातौ वनुं वा ये सुश्रुणं सुश्रुतो धुः.. (१) देवों व मानवों द्वारा धनदान के इच्छुक इंद्र को धनदान के लिए स्तुतियों या यज्ञ द्वारा आकर्षित किया जाता है. संग्राम में धन कमाने के साधन घोड़े इंद्र को आकर्षित करते हैं. यज्ञ का आश्रय लेने वाले अथवा शत्रु का संहार करने वाले लोग इंद्र को आकर्षित करते हैं. (१) हव एषामसुरो नक्षत द्यां श्रवस्यता मनसा निंसत क्षाम्. चक्षाणा यत्र सुविताय देवा द्यौर्न वारेभिः कृणवन्त स्वैः.. (२) इंद्र को प्रेरणा देने वाला अंगिरागोत्रीय ऋषियों का आह्वान शब्द आकाश को पूर्ण करता है. अन्न की इच्छा करने वाले देवों ने मन से धरती को प्राप्त किया. धरती पर पणियों द्वारा चुराई गई गायों को देखते हुए देवों ने अपने कल्याण के लिए अपने तेज से इस प्रकार प्रकाश किया, जिस प्रकार सूर्य चमकता है. (२) इयमेषाममृतानां गीः सर्वताता ये कृपणन्त रत्नम्. धियं च यज्ञं च साधन्तस्ते नो धान्तु वसव्य१मसामि.. (३) यह इन मरणरहित देवों की स्तुति है. वे यज्ञ में सभी प्रकार के रत्न देते हैं. देवगण स्तुति और यज्ञ को सिद्ध करते हुए हमें अधिक धन प्रदान करें. (३) आ तत्त इन्द्रायवः पनन्ताभि य ऊर्वं गोमन्तं तितृत्सान्. सकृत्स्वं१ ये पुरुपुत्रां महीं सहस्रधारां बृहतीं दुदुक्षन्.. (४) हे इंद्र! जो अंगिरावंशी ऋषि पणियों द्वारा चुराई गई गायों का समूह उनसे छीनना चाहते हैं, वे तुम्हारी ही स्तुति करते हैं. एक बार उत्पन्न, अनेक संतान उत्पन्न करने वाली तथा हजारों धाराओं में संपत्तीरूपी दूध दुहाने वाली धरतीरूपी गाय को दुहने के इच्छुक लोग भी इंद्र की स्तुति करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
शचीव इन्द्रमवसे कृणुध्वमनानतं दमयन्तं पृतन्यून्. ऋभुक्षणं मघवानं सुवृक्तिं भर्ता यो वज्रं नर्यं पुरुक्षुः.. (५) हे यज्ञकर्म करने वाले यजमानो! कभी न झुकने वाले, शत्रुओं को वश में करने वाले, महान्, धनसंपन्न, शोभन स्तुतियुक्त, प्रसिद्ध एवं मानवहितकारी वज्र धारण करने वाले इंद्र की शरण में रक्षा पाने के लिए जाओ. (५) यद्वावान पुरूतमं पुराषाळ्वा वृत्रहेन्द्रो नामान्यप्राः. अचेति प्रासहस्पतिस्तुविष्मान्यदीमुशमसि कर्तवे करतत्.. (६) शत्रुनगरों को पराजित करने वाले इंद्र जिस समय अत्यंत शक्तिशाली शत्रु का नाश करके वृत्रनाशक बनते हैं, उस समय धरती को जल से पूर्ण करते हैं. उस समय सबके द्वारा शत्रुपराभवकारी, सबके स्वामी व धनी जाने जाकर हम सबकी अभिलाषा पूरी करते हैं. (६) सूक्त—७५ देवता—नदी प्र सु व आपो महिमानमुत्तमं कारुर्वोचाति सदने विवस्वतः. प्र सप्तसप्त त्रेधा हि चक्रमुः प्र सृत्वरीणामति सिन्धुरोजसा.. (१) हे जल! सेवा करने वाले यजमान के घर में स्तोता तुम्हारी विस्तृत महिमा कथन करता है. नदियां सात-सात के रूप में पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक में तीन प्रकार से बहती हैं. नदियों में सबसे तेज बहने वाली सिंधु है. (१) प्र तेऽरदद्वरुणो यातवे पथः सिन्धो यद्वाजाँ अभ्यद्रवस्त्वम्. भूम्या अधि प्रवता यासि सानुना यदेषामग्रं जगतामिरज्यसि.. (२) हे सिंधु! तुम जिस समय उपजाऊ स्थानों की ओर बही, उस समय वरुण ने तुम्हारे गमन के लिए विस्तृत मार्ग बनाया. तुम धरती के ऊपर उच्चमार्ग से जाती हो. तुम सभी नदियों के अग्र भाग में विराजमान हो. (२) दिवि स्वनो यतते भूम्योपर्यन्तं शुष्ममुदियर्ति भानुना. अभ्रादिव प्र स्तनयन्ति वृष्टयः सिन्धुर्यदेति वृषभो न रोरुवत्.. (३) सिंधु नदी के बहने का शब्द धरती से उठकर आकाश को व्याप्त कर लेता है. सिंधु महान् वेग और ज्योतिपूर्ण लहरों के साथ बहती है. सिंधु नदी जिस समय बैल के समान गरजती हुई बहती है, उस समय ऐसा जान पड़ता है, जैसे आकाश से वर्षा हो रही हो. (३) अभि त्वा सिन्धो शिशुमिन्न मातरो वाश्रा अर्षन्ति पयसेव धेनवः. राजेव युध्वा नयसि त्वमित्सिचौ यदासामग्रं प्रवतामिनक्षसि.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस प्रकार माता बालक के पास जाती है अथवा दुधारू गाएं रंभाती हुई बछड़ों के पास जाती हैं, उसी प्रकार अन्य नदियां सिंधु से मिलती हैं. जैसे युद्ध करने वाला राजा सेना लेकर आगे बढ़ता है, उसी प्रकार हे सिंधु! तुम अपनी सहायक नदियों के साथ आगे जाती हो. (४) इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्णया. असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयार्जीकीये शृणुह्या सुषोमया.. (५) हे गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री, परुष्णी, असिक्नी के साथ रहने वाली मरुद्वृधा, वितस्ता, सुषोमा और आर्जिकीया नदियों! तुम मेरी स्तुति को सुनो और स्वीकार करो. (५) तृष्टामया प्रथमं यातवे सजूः सुसर्त्वा रसया श्वेत्या त्या. त्वं सिन्धो कुभया गोमतीं क्रुमुं मेहत्न्वा सरथं याभिरीयसे.. (६) हे सिंधु! तुम तेज बहने वाली गोमती नदी के समीप जाने के लिए पहले तृष्टामा नद से मिली. बाद में तुम सुसर्तु, रसा, श्वेती, क्रमु, कुभा और मेहत्नु से मिलकर आगे बढ़ी. तुम इन नदियों के साथ बहती हो. (६) ऋजीत्येनी रुशती महित्वा परि ज्रयांसि भरते रजांसि. अदब्धा सिन्धुरपसामपस्तमाश्वा न चित्रा वपुषीव दर्शता.. (७) सीधी बहने वाली, श्वेत-वर्णा और दीप्त सिंधु नदी का वेगशाली जल चारों ओर बहता है. बहने वाली नदियों में सिंधु सबसे तेज है. यह घोड़ी के समान विचित्र और मोटे शरीर वाली नारी के समान दर्शनीय है. (७) स्वश्वा सिन्धुः सुरथा सुवासा हिरण्ययी सुकृता वाजिनीवती. ऊर्णावती युवतिः सीलमावत्युताधि वस्ते सुभगा मधुवृधम्.. (८) शोभन अश्वों, शोभन रथों एवं शोभन वस्त्रों से युक्त, सुनहरे रंग वाली, भली प्रकार सजी हुई, अन्न एवं ऊन से युक्त, सरकंडों वाली तथा सौभाग्ययुक्त सिंधु मधु बढ़ाने वाले फूलों से ढकी रहती है. (८) सुखं रथं युयुजे सिन्धुरश्विनं तेन वाजं सनिषदस्मिन्नाजौ. महान्ह्यस्य महिमा पनस्यतेऽदब्धस्य स्वयशसो विरप्शिनः.. (९) सिंधु सुख देने वाले एवं अश्वों से युक्त रथ को जोतती है. वह उस रथ के द्वारा अन्न प्रदान करे. यज्ञ में इस रथ की महिमा गाई जाती है. यह रथ अपराजित, स्वाधीन यश वाला तथा महान् है. (९) सूक्त—७६ देवता—सोमरस निचोड़ने का ebook converter DEMO Watermarks*
पत्थर आ व ऋञ्जस ऊर्जा व्युष्टिष्विन्द्रं मरुतो रोदसी अनक्तन. उभे यथा नो अहनी सचाभुवा सदःसदो वरिवस्यात उद्भिदा.. (१) हे पत्थरो! अन्न वाली उषा के आते ही मैं तुम्हें भली प्रकार तैयार करता हूं. तुम सोमरस द्वारा इंद्र, मरुत् और द्यावा-पृथिवी को प्रसन्न करो. ये देव हम में से प्रत्येक के घर जाकर सेवा ग्रहण करें एवं घर को धन से पूर्ण कर दें. (१) तदु श्रेष्ठं सवनं सुनोतनात्यो न हस्तयतो अद्रिः सोतरि. विदद्ध्य१र्यो अभिभूति पौंस्यं महो राये चित्तरुते यदर्वतः.. (२) हे पत्थरो! तुम उत्तम सोमरस प्रस्तुत करो. तुम हाथ से पकड़े जाने पर रोके हुए घोड़े के समान हो जाते हो. सोम निचोड़ने वाला यजमान शत्रु को हटाने वाला बल प्राप्त करता है. यह पत्थर महान् धन पाने के लिए घोड़े भी देता है. (२) तदिद्ध्यस्य सवनं विवेरपो यथा पुरा मनवे गातुमश्रेत्. गोअर्णसि त्वाष्ट्रे अश्वनिर्णिजि प्रेमध्वरेष्वध्वराँ अशिश्रयुः.. (३) सोमरस जिस प्रकार प्राचीन काल में मनु के यज्ञ में आया था, उसी प्रकार वह इस पत्थर द्वारा कुचला जाकर जल में प्रवेश करे. यजमानों ने यज्ञकाल में गायों एवं अश्वों से घिरे हुए त्वष्टापुत्र के हनन के समय इन पत्थरों का सहारा लिया था. (३) अप हत रक्षसो भङ्गुरावतः स्कभायत निर्ऋतिं सेधतामतिम्. आ नो रयिं सर्ववीरं सुनोतन देवाय्यं भरत श्लोकमद्रयः.. (४) हे पत्थरो! तोड़फोड़ करने वाले राक्षसों का नाश करो. पाप को दूर करो और दुष्टबुद्धि को हटाओ. हमें समस्त संतान से युक्त धन दो एवं देवों को प्रसन्न करने वाली स्तुतियों का निर्माण करो. (४) दिवश्चिदा वोऽमवत्तरेभ्यो विभवना चिदाश्वपस्तरेभ्यः. वायोश्चिदा सोमरभस्तरेभ्योऽग्नेश्चिदर्च पितुकृत्तरेभ्यः.. (५) आदित्य से भी शक्तिशाली, सुधन्वा से शीघ्र कार्य करने वाले, सोमाभिषव हेतु वायु से भी अधिक वेगयुक्त एवं अग्नि से भी अधिक अन्नसाधक पत्थरों की तुम पूजा करो. (५) भुरन्तु नो यशसः सोत्वन्धसो ग्रावाणो वाचा दिविता दिवित्मता. नरो यत्र दुहते काम्यं मध्वाघोषयन्तो अभितो मिथस्तुरः.. (६) यशस्वी पाषाण हमारे लिए निचुड़ा हुआ सोमरस तैयार करें. वे स्तुति के तेजस्वी वचनों ebook converter DEMO Watermarks*
के द्वारा हमें उज्ज्वल सोमयाग में स्थापित करें. यज्ञकर्म के नेता ऋत्विज् सोमयज्ञ में चारों ओर परस्पर शीघ्रता करते हुए एवं स्तोत्र बोलते हुए सोमरस निचोड़ते हैं. (६) सुन्वन्ति सोमं रथिरासो अद्रयो निरस्य रसं गविषो दुहन्ति ते. दुहन्त्यूधरुपसेचनाय कं नरो हव्या न मर्जयन्त आसभिः.. (७) पाषाण गतिशील बनकर सोमरस निचोड़ते हैं. वे स्तुति की इच्छा करते हुए अग्नि को सींचने के लिए सोमरस निचोड़ते हैं. सोमरस निचोड़ने वाले लोग शेष सोमरस को पीकर अपने मुख शुद्ध करते हैं. (७) एते नरः स्वपसो अभूतन य इन्द्राय सुनुथ सोममद्रयः. वामंवामं वो दिव्याय धाम्ने वसुवसु वः पार्थिवाय सुन्वते.. (८) हे यज्ञकर्म के नेताओं और पत्थरो! तुम शोभन सोमरस निचोड़ने वाले बनो एवं इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ो. तुम दिव्य धाम के लिए सुंदर धन उपार्जित करो एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के लिए निवासयोग्य धन दो. (८) सूक्त—७७ देवता—मरुत् अभ्रप्रुषो न वाचा पृषा वसु हविष्मन्तो न यज्ञा विजानुषः. सुमारुतं न ब्रह्माणमर्हसे गणमस्तोष्वेषां न शोभसे.. (१) हव्ययुक्त यज्ञ के समान संसार को जन्म देने वाले मरुत् स्तुति से प्रसन्न होकर इस प्रकार धन देते हैं, जिस प्रकार बादल पानी की बूंदें बरसाते हैं. मैं मरुतों के महान् गुण की वास्तविक पूजा नहीं कर पाया हूं. मैंने मरुतों की शोभा के लिए भी स्तुति नहीं की है. (१) श्रिये मर्यासो अञ्जीँरकृण्वत सुमारुतं न पूर्व्वीरति क्षपः. दिवस्पुत्रास एता न येतिर आदित्यासस्ते अक्रा न वावृधुः.. (२) मरुद्गण पहले मनुष्य थे और बाद में पुण्य से देव बने. वे अपनी शोभा के लिए आभूषण धारण करते हैं. उन्हें अनेक सेनाएं भी नहीं हरा सकतीं. स्वर्ग के पुत्र ये मरुत् अब दिखाई नहीं देते एवं अदिति के पुत्र ये आक्रमणशील मरुत् नहीं बढ़ते. (२) प्र ये दिवः पृथिव्या न बर्हणा त्मना रिरिच्रे अभ्रान्न सूर्यः. पाजस्वन्तो न वीराः पनस्यवो रिशादसो न मर्या अभिद्यवः.. (३) मरुत् अपने शरीर से ही स्वर्ग और धरती की अपेक्षा इस प्रकार अतिरिक्त हो गए हैं, जिस प्रकार बादलों से सूर्य बड़ा है. मरुत् वीर पुरुषों के समान स्तुति चाहने वाले एवं शत्रुघातक मानवों के समान दीप्तियुक्त होते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
युष्माकं बुध्ने अपां न यामनि विथुर्यति न मही श्रथर्यति. विश्वप्सुर्यज्ञो अर्वागयं सु वः प्रयस्वन्तो न सत्राच आ गत.. (४) हे मरुतो! विस्तृत जलों के गमन के समान जिस समय तुम परस्पर टकराते हो, उस समय धरती न भयभीत होती है और न बिखरती है. यह अनेक रूपों वाला व यज्ञसाधन हवि तुम्हारे समीप जाता है. तुम अन्नदाताओं के समान एकत्रित होकर आओ. (४) यूयं धूर्षु प्रयुजो न रश्मिभिर्ज्योतिष्मन्तो न भासा व्युष्टिषु. श्येनासो न स्वयशसो रिशादसः प्रवासो न प्रसितसः परिप्रुषः.. (५) हे मरुतो! तुम रथ की रस्सी से बंधे हुए घोड़ों के समान गतिशील एवं प्रातःकालीन प्रकाश के समान तेजस्वी हो. तुम श्येन पक्षी के समान शत्रुओं का नाश करके यश प्राप्त करते हो तथा पथिकों के समान चारों ओर घूम-घूमकर जल बरसाते हो. (५) प्र यद्वहध्वे मरुतः पराकाद्यूं महः संवरणस्य वस्वः. विदानासो वसवो राध्यस्याराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोत.. (६) हे मरुतो! तुम बहुत दूर से संग्रह करने योग्य धन वहन करके लाते हो. तुम उपभोग- योग्य धन को प्राप्त करके शत्रुओं को दूर से ही अलग कर देते हो. (६) य उद्गचि यज्ञे अध्वरेशा मरुद्भ्यो न मानुषो ददाशत्. रेवत्स वयो दधते सुवीरं स देवानामपि गोपीथे अस्तु.. (७) यज्ञ में बैठने वाला जो यजमान यज्ञ की समाप्ति पर मरुतों को दान करता है, वह अन्न, धन और सेवकों का स्वामी बनकर देवों के साथ सोमरस पीता है. (७) ते हि यज्ञेषु यज्ञियास ऊमा आदित्येन नाम्ना शम्भाविष्ठाः. ते नोऽवन्तु रथतूर्मनीषां महश्च यामन्नध्वरे चकानाः.. (८) यज्ञ के अधिकारी एवं रक्षक मरुत्, आकाश के जल द्वारा सुख देते हैं, तेज चलने वाले रथ से आकर हमारी बुद्धि की रक्षा करते हैं एवं महान् हवि की अभिलाषा करते हुए यज्ञ में आते हैं. (८) सूक्त—७८ देवता—मरुत् विप्रासो न मन्मभिः स्वाध्यो देवाव्यो३ न यज्ञैः स्वप्रसः. राजानो न चित्राः सुसन्दृशः क्षितीनां न मर्या अरेपसः.. (१) मरुद्गण यज्ञ में स्तोत्र बोलने वाले मेधावी स्तोताओं के समान शोभन ध्यान वाले, यज्ञों द्वारा देवों को तृप्त करने वाले, यजमानों के समान शोभन कर्म वाले, राजाओं के समान ebook converter DEMO Watermarks*
पूजनीय व दर्शनीय तथा गृहस्वामी मानवों के समान पापरहित होते हैं. (१) अग्निर्ने ये भ्राजसा रुक्मवक्षसो वातासो न स्वयुजः सद्यऊतयः. प्रज्ञातारो न ज्येष्ठाः सुनीतयः सुशर्माणो न सोमा ऋतं यते.. (२) मरुद्गण अग्नि के समान तेज से सुशोभित, स्वर्णांलकारों से युक्त वक्षःस्थल वाले, वायु के समान स्वयं मिलने वाले व शीघ्र गतिशील, उत्तम ज्ञानियों के समान पूज्य तथा शोभन नयन एवं मुख वाले सोम के समान यज्ञ में जाते हैं. (२) वातासो न ये धुनयो जिगत्नवोऽग्नीनां न जिह्वा विरोकिणः. वर्मण्वन्तो न योधाः शिमीवन्तः पितॄणां न शंसाः सुरातयः.. (३) मरुद्गण वायु के समान शत्रुओं को कंपित करने वाले व गतिशील, अग्नि की ज्वालाओं के समान सुंदर मुख वाले, कवचधारी योद्धाओं के समान शौर्य कर्म करने वाले एवं पितरों के वचनों के समान शोभन दानी हैं. (३) रथानां न येश्राः सनाभयो जिगीवांसो न शूरा अभिद्यवः. वरेयवो न मर्या घृतपृष्ठोऽभिस्वतर्ारो अर्कं न सुष्टुभः.. (४) मरुद्गण रथ के पहियों के अरों के समान एक आश्रय से संबंधित, जयशील शूरों के समान दीप्ति वाले, दान करने वाले मानवों के समान जल गिराने वाले एवं शोभन स्तोत्र करने वालों के समान उत्तम शब्द वाले हैं. (४) अश्वासो न ये ज्येष्ठास आशवो दिधिषवो न रथ्यः सुदानवः. आपो न निम्नैरुदभिर्जिगत्नवो विश्वरूपा अङ्गिरसो न सामभिः.. (५) मरुद्गण घोड़ों के समान प्रशंसनीय एवं शीघ्रगति वाले, धन धारण करने वाले रथस्वामियों के समान शोभन दानयुक्त, सरिताओं के समान जल लेकर जाने वाले तथा अनेक रूपधारी अंगिरागोत्रीय ऋषियों के समान सामगान करने वाले हैं. (५) ग्रावाणो न सूरयः सिन्धुमातर आदर्दिरासो अद्रयो न विश्वहा. शिशूला न क्रीळयः सुमातरो महाग्रामो न यामन्नुत त्विषा.. (६) मरुद्गण जल बरसाने वाले, मेघों के समान नदियों के निर्माता, ध्वंसक वज्र के समान सदा शत्रुनाशकर्त्ता, शोभन माताओं वाले, बच्चों के समान क्रीड़ाशील एवं विशाल जलसमूह के समान चलते समय दीप्ति से युक्त हैं. (६) उषासां न केतवोऽध्वरश्रियः शुभंयवो नाञ्जिभिर्व्याश्वितन्. सिन्धवो न ययियो भ्राजदृष्टयः परावतो न योजनानि ममिरे.. (७) eBook converter DEMO Watermarks*
मरुद्गण उषाओं की किरणों के समान यज्ञ का आश्रय लेने वाले, कल्याण की कामना करने वाले, वरों के समान आभूषणों से सुशोभित, नदियों के समान गतिशील एवं चमकीले आयुधों व दूर जाने वाले पथिकों के समान दूर देश तक जाने वाले हैं. (७) सुभागान्नो देवाः कृणुता सुरत्नानस्मान्त्स्तोतृन्मरुतो वावृधानाः. अधि स्तोत्रस्य सख्यस्य गात सनाद्धि वो रत्नधेयानि सन्ति.. (८) हे देव मरुतो! तुम स्तुतियों से बढ़कर हम स्तुति करने वालों को शोभन धन एवं रत्नों से युक्त करो तथा हमारे सखा रूप स्तोत्र को स्वीकार करो. तुम सदा से हमें रत्न दान करते आए हो. (८) सूक्त—७९ देवता—अग्नि अपश्यमस्य महतो महित्वममर्त्यस्य मर्त्यासु विक्षु. नाना हनू विभृते सं भरेते असिन्वती बप्सती भूर्यत्तः.. (१) मैं मरने वाली प्रजाओं में मरणरहित अग्नि का महान् महत्त्व देखता हूं. इनके दोनों जबड़े अलग-अलग एवं दांतों से भरे हुए हैं. ये जबड़े स्तोता को न चबाकर लकड़ियों का भक्षण करते हैं. (१) गुहा शिरो निहितमृधगक्षी असिन्वन्नत्ति जिह्वया वनानि. अत्राण्यस्मै पड्भिः सं भरन्त्युत्तानहस्ता नमसाधि विक्षु.. (२) अग्नि का मस्तक गुप्त स्थान में छिपा हुआ है एवं उनकी सूर्यचंद्ररूपी आंखें अलग- अलग स्थानों में स्थित हैं. अग्नि काष्ठों को दांतों से न चबाते हुए केवल जीभ से खाते हैं. प्रजाओं के मध्य अध्वर्यु आदि इस अग्नि के पास पैदल चलकर आते हैं और हाथ उठाकर नमस्कार करके हव्य देते हैं. (२) प्र मातुः प्रतरं गुह्यमिच्छन्कुमारो व वीरुधः सर्पदुर्वीः. ससं न पक्वमविद्वच्छुचन्तं रिरिह्वांसं रिप उपस्थे अन्तः.. (३) बालक के समान यह अग्नि धरतीरूपी माता के ऊपर बड़ी-बड़ी लताओं एवं उनकी जड़ों की कामना करते हुए आगे बढ़ते हैं. यह धरती की गोदी में सूखे वृक्षों को पके अन्न के समान प्राप्त करते हैं तथा अपनी ज्वाला से वृक्षों को जलाते हैं. (३) तद्धामृतं रोदसी प्र ब्रवीमि जायमानो मातरा गर्भो अत्ति. नाहं देवस्य मर्त्यश्चिकेताग्निरङ्ग विचेताः स प्रचेताः.. (४) हे द्यावा-पृथिवी! मैं तुमसे सच कह रहा हूं कि अरणियों से उत्पन्न यह अग्नि अपने ebook converter DEMO Watermarks*
माता-पिता अर्थात् दोनों अरणियों को खा लेते हैं, मैं मनुष्य होने के कारण अग्नि देव के विषय में नहीं जानता. हे अग्नि! तुम विविध एवं उत्तम ज्ञान वाले हो. (४) यो अस्मा अन्नं तृष्वा३ दधात्याज्यैर्घृतैर्जुहोति पुष्यति. तस्मै सहस्रमक्षभिर्वि चक्षेऽग्ने विश्वतः प्रत्यङ्ङसि त्वम्.. (५) जो यजमान इस अग्नि को शीघ्र अन्न देता है तथा हव्य एवं घी से हवन को पुष्ट करता है, उसे अग्नि अपनी हजारों ज्वालाओं से देखते हैं. हे अग्नि! तुम सभी प्रकार हमारे अनुकूल रहते हो. (५) किं देवेषु त्यज एनश्चकर्थाग्ने पृच्छामि नु त्वामविद्वान्. अक्रीळन् क्रीळन्हरिरत्तवेऽदन्वि पर्वशश्चकर्त गामिवासिः.. (६) हे अग्नि! क्या तुमने देवों के प्रति क्रोधरूपी पाप किया है? मैं इस बात को नहीं जानता, इसलिए तुमसे पूछ रहा हूं. हे हरितवर्ण अग्नि! तुम किसी स्थान में विहार करते हुए, न करते हुए एवं काष्ठ आदि का भक्षण करते हुए उसे प्रत्येक जोड़ से इस प्रकार अलग कर देते हो, जैसे तलवार से गाय के टुकड़े किए जाते हैं. (६) विषूचो अश्वान्युयुजे वनेजा ऋजीतिभी रशनाभिर्गृभीतान्. चक्षदे मित्रो वसुभिः सुजातः समान्धे पर्वभिर्ववृधानः.. (७) वन में उत्पन्न ये अग्नि इधर-उधर गति करने हेतु वृक्षरूपी अश्वों को सरल लता रूपी रस्सियों से बांधकर अपने रथ में जोड़ते हैं. हमारे मित्र अग्नि किरणों से सुशोभित होकर काष्ठ के टुकड़े से बढ़ते हैं एवं उन्हें खाते हैं. (७) सूक्त—८० देवता—अग्नि अग्निः सप्तिं वाजंभरं ददात्यग्निर्वीरं श्रुत्यं कर्मनिःष्ठाम्. अग्नी रोदसी वि चरत्समञ्जन्नग्निर्नारीं वीरकुक्षिं पुरन्धिम्.. (१) अग्नि स्तोताओं को गतिशील एवं युद्ध में शत्रुओं का अन्न जीतने वाला घोड़ा, वीर एवं यज्ञप्रेमी पुत्र देते हैं. वे द्यावा-पृथिवी को सुशोभित बनाते हुए चलते हैं एवं नारी को वीरप्रसविनी बनाते हैं. (१) अग्नेरप्रसः समिदस्तु भद्राग्निर्मही रोदसी आ विवेश. अग्निरेकं चोदयत्समत्स्वग्निर्वृत्राणि दयते पुरूणि.. (२) यज्ञकर्म वाले अग्नि की समिधाएं कल्याणकारी हों. अग्नि अपने तेज के द्वारा विशाल द्यावा-पृथिवी में प्रवेश करते हैं. वे युद्ध में अपने यजमान को विजय पाने के लिए प्रेरित करते ebook converter DEMO Watermarks*
हैं एवं समस्त शत्रुओं को मारते हैं. (२) अग्निह्र त्यं जरतः कर्णमावाग्निरद्भ्यो निरदहज्जरूथम्. अग्निरत्रिं घर्म उरुष्यदन्तरग्निर्नृमेधं प्रजयासृजत्सम्.. (३) अग्नि ने उस प्रसिद्ध ऋषि जरत्कर्ण की रक्षा की एवं जल से निकलकर जरुथ नामक शत्रु को जलाया. अग्नि ने अग्निकुंड में पड़े हुए अत्रि ऋषि की रक्षा की तथा नृमेध ऋषि को संतान वाला बनाया. (३) अग्निर्दद् द्रविणं वीरपेशा अग्निॠषिं यः सहस्रा सनोति. अग्निर्दिवि हव्यमा ततानाग्नेर्धामानि विभृता पुरत्रा.. (४) प्रेरक ज्वालाओं वाले अग्नि धन देते हैं. वे हजारों गायों वाले ऋषियों को पुत्र देते हैं, यजमानों का दिया हुआ हवि द्युलोक में पहुंचाते हैं एवं धरती पर अनेक रूप धारण करते हैं. (४) अग्निमुक्थैॠषयो वि ह्वयन्तेऽग्निं नरो यामनि बाधितासः. अग्निं वयो अन्तरिक्षे पतन्तोऽग्निः सहस्रा परि याति गोनाम्.. (५) ऋषि मंत्रों के द्वारा अग्नि को बुलाते हैं. युद्ध में शत्रुओं द्वारा बाधित मनुष्य विजय पाने के लिए अग्नि को बुलाते हैं. आकाश में उड़ते हुए पक्षी अग्नि की स्तुति करते हैं. वे हजारों गायों से घिरकर जाते हैं. (५) अग्निं विश ईळते मानुषीर्या अग्निं मनुषो नहुषो वि जाताः. अग्निर्गान्धर्वीं पथ्यामृतस्याग्नेर्गव्यूतिर्घृत आ निषत्ता.. (६) मानव प्रजाएं अग्नि की स्तुति करती हैं. राजा नहुष से उत्पन्न संतान अग्नि की स्तुति करती है. अग्नि यज्ञ के लिए हितकारक गंधर्ववचन सुनते हैं. अग्नि का मार्ग घी में डूबा हुआ है. (६) अग्नये ब्रह्म ऋभवस्ततक्षुरग्निं महामवोचामा सुवृक्तिम्. अग्ने प्राव जरितारं यविष्ठाग्ने महि द्रविणमा यजस्व.. (७) बुद्धिमान् ऋभुओं ने अग्नि के लिए स्तुतियां बनाई हैं. हमने भी महान् अग्नि की स्तुति की है. अतिशय युवा अग्नि! स्तोता की रक्षा करो एवं हमें विशाल धन दो. (७) सूक्त—८१ देवता—विश्वकर्मा य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिर्होता न्यसीदत् पिता नः. स आशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ आ विवेश.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
अग्नि का आह्वान करने वाले हमारे पिता विश्वकर्मा सारे संसार को अग्नि में हवन के लिए डालकर स्वयं भी उसीमें बैठ गए. वे स्तुतियों द्वारा धन की कामना करते हुए पहले अग्नि का आच्छादन बने और बाद में उसीमें प्रवेश कर गए. (१) किं स्विद्वासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथासीत्. यतो भूमिं जनयन्विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षा:.. (२) सृष्टि बनाते समय विश्वकर्मा का आधार क्या था? उन्होंने सृष्टि का आरंभ कहां और किस प्रकार किया? विश्व को देखने वाले विश्वकर्मा के किस स्थान पर स्थित होकर धरती के बाद आकाश को बनाया? (२) विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्. सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एक:.. (३) विश्वकर्मा की आंखें, मुख, बाहु एवं चरण सब ओर फैले हुए हैं. उस देव ने अकेले ही बाहुओं और चरणों से भली-भांति गति करके द्यावा और भूमि को बनाया. (३) किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षु:. मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्.. (४) वह कौन सा वन एवं वृक्ष है, जिसने द्यावा-पृथिवी को निष्पादित किया. हे विद्वानो! अपने से यह पूछो कि ईश्वर भुवनों को धारण करके किस पर स्थित होता है? (४) या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा. शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधाव: स्वयं यजस्व तन्वं वृधान:.. (५) हे हव्यरूप अन्न धारण करने वाले विश्वकर्मा! तुम्हारे जो परम धाम अथवा उत्तम, मध्यम एवं साधारण शरीर हैं, उन्हें हव्य प्राप्त करके हमें दो. तुम अपने शरीर को बढ़ाते हुए स्वयं यज्ञ करो. (५) विश्वकर्मन् हविषा वावृधान: स्वयं यजस्व पृथिवीमुत द्याम्. मुह्यन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु.. (६) हे विश्वकर्मा! तुम हव्य से बढ़कर स्वयं धरती एवं द्यौ को पूजित करो, इस यज्ञ में यज्ञ न करने वाले लोग मूर्च्छित हों एवं धनस्वामी विश्वकर्मा स्वर्गफल देने वाले हों. (६) वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम. स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा.. (७) हम मंत्रों की रक्षा करने वाले विश्वकर्मा को आज यज्ञ में अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. eBook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—८२ देवता—विश्वकर्मा
वे हमारे सभी हवनों को स्वीकार करें एवं हमारी रक्षा के लिए सबके सुखोत्पादक एवं भले काम करने वाले बनें. (७) सूक्त—८२ देवता—विश्वकर्मा चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेने अजनन्नम्नमाने. यदेदन्ता अददृहन्त पूर्व आदिद् द्यावापृथिवी अप्रथेताम्.. (१) शरीर को उत्पन्न करने वाले, स्वयं को अद्वितीय समझने वाले एवं धीर विश्वकर्मा ने सबसे पहले जल को उत्पन्न किया. इसके पश्चात् जल में इधर उधर चलने वाले द्यावा-पृथिवी का निर्माण किया. विश्वकर्मा ने द्यावा-पृथिवी के प्राचीन एवं अंतिम भागों को दृढ़ करके प्रसिद्ध किया. (१) विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक्. तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्यर एकमाहुः.. (२) विशाल मन वाले विश्वकर्मा स्वयं महान् हैं. वे सृष्टि का निर्माण करने वाले वृष्टिकर्त्ता, श्रेष्ठ एवं सब कुछ देखने वाले हैं. विद्वान् लोग कहते हैं कि सप्तर्षियों से भी ऊंचे स्थानों को वे अकेले ही देखते हैं. उन सप्तर्षियों की अभिलाषाएं हव्यान्न द्वारा पूर्ण होती हैं. (२) यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा. यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या.. (३) जो विश्वकर्मा हमारा पालन करने वाले, उत्पन्न करने वाले व विश्व के उत्पादक हैं तथा देवों के तेज एवं सभी भुवनों को जानते हैं. जो एकमात्र देवों का नाम रखने वाले हैं, सब प्राणी उन्हीं के विषय में जानना चाहते हैं. (३) त आयजन्त द्रविणं समस्मा ऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना. असूर्ते सूर्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि.. (४) जिन ऋषियों ने स्थावर और जंगमरूप विश्व का निर्माण हो जाने पर सभी प्राणियों को बनाया, उन्हीं ऋषियों ने प्राचीन स्तोताओं के समान धन व्यय करके यज्ञ किया. (४) परो दिवा पर एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति. कं स्विद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः समपश्यन्त विश्वे.. (५) वह ईश्वर द्युलोक, धरती, देवों व असुरों से महान् हैं. जलों ने वह कौन सा गर्भ धारण किया था, जहां सभी देवों ने स्वयं को परस्पर मिला हुआ देखा. (५) तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः समगच्छन्त विश्वे.
अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन्विश्वानि भुवनानि तस्थुः.. (६) जल ने उन्हीं विश्वकर्मा को गर्भ में धारण किया था. वहीं सब देव एक-दूसरे से मिले. उस जन्मरहित की नाभि में ब्रह्मांड स्थित है. उसीमें सारा संसार स्थित है. (६) न तं विदाथ य इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव. नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति.. (७) जिस विश्वकर्मा ने उन सब प्राणियों को उत्पन्न किया था, उसे तुम नहीं जानते. तुम्हारा हृदय उसे जानने की योग्यता नहीं रखता. लोग अज्ञान रूपी पाले से ढक कर तरह-तरह की बातें करते हैं. वे भोजन करते हुए भांति-भांति की स्तुतियां करते हैं और स्वर्ग में जाने का प्रयत्न करते हैं. (७) सूक्त—८३ देवता—मन्यु यस्ते मन्योऽविधद्वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक्. साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता.. (१) हे वज्र के समान सारपूर्ण एवं बाण के समान शत्रुनाशक मन्यु! जो यजमान तुम्हारी पूजा करता है, वह ओज एवं बल धारण करता है एवं संग्राम में सभी शत्रुओं को जीतता है. तुम्हारी सहायता से हम दास और आर्य दो प्रकार के शत्रुओं को हरावें, तुम शक्ति के उत्पादक एवं शक्तिशाली हो. (१) मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः. मन्युं विश ईळते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः.. (२) मन्यु इंद्र है. मन्यु ही देव है. मन्यु वरुण, होता और जातवेद अग्नि हैं. सभी मानव प्रजाएं मन्यु की स्तुति करती हैं. हे मन्यु! तुम हमारे पिता तप के साथ मिलकर हमारी रक्षा करो. (२) अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान्तपसा युजा वि जहि शत्रून्. अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः.. (३) हे अतिशय शक्तिशाली मन्यु! तुम हमारे यज्ञ में आओ. तुम मेरे पिता तप से मिलकर शत्रुओं को मारो. हे शत्रुनाशक वृत्रवधकर्त्ता एवं राक्षसों को मारने वाले मन्यु! तुम सब प्रकार का धन हमारे लिए लाओ. (३) त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः स्वयम्भूर्भामो अभिमातिषाहः. विश्वचर्षणिः सहुरिः सहावानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि.. (४) हे मन्यु! तुम शत्रुओं को हराने वाली शक्ति से संपन्न स्वयं ही उत्पन्न क्रुद्ध ebook converter DEMO Watermarks*
शत्रुपराभवकारी सबको देखने वाले, सहनशील एवं शक्तिशाली हो. तुम संग्राम में हमें ओज प्रदान करो. (४) अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्य प्रचेतः. तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीळाहं स्वा तनूर्बलदेयाय मेहि.. (५) हे उत्तम ज्ञान वाले मन्यु! तुम्हारे यज्ञकर्म में भाग न लेने के कारण मैं युद्ध में शत्रुओं से हारकर दूर आ गया हूं. मुझ यज्ञरहित ने तुमको क्रुद्ध कर दिया है. तुम शक्ति देने के निमित्त मेरे शरीर में आओ. (५) अयं ते अस्म्युप मेह्यर्वाङ् प्रतीचीनः सहुरे विश्वधायः. मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूँरुत बोध्यापेः.. (६) हे शत्रुओं को सहनशील एवं विश्व के धारक मन्यु! मैं तुम्हारा यज्ञ करने वाला सेवक हूं. तुम मेरे पास आओ. हे वज्रधारी मन्यु! तुम मेरे पास आकर बढ़ो. तुम मुझे अपना बंधु समझो. हम दोनों शत्रुओं को मारें. (६) अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा मेऽधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि. जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभा उपांशु प्रथमा पिबाव.. (७) हे मन्यु! मेरे पास आओ और मेरे दाहिनी ओर खड़े होओ. इस प्रकार हम दोनों बहुत से शत्रुओं को मार सकेंगे. मैं तुम्हारे निमित्त मधुर धारक और उत्तम सोमरस का होम करता हूं. हम दोनों एकांत स्थान में सबसे पहले सोमरस पिएं. (७) सूक्त—८४ देवता—मन्यु त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणासो धृषिता मरुत्वः. तिग्मेषव आयुधा संशिशाना अभि प्र यन्तु नरो अग्निरूपाः.. (१) हे मरुतों से युक्त मन्यु! तुम्हारे साथ एक रथ पर बैठकर जाते हुए प्रसन्न, धृष्ट, तीखे बाणों वाले, आयुधों को तेज करते हुए एवं अग्नि के समान शत्रुओं को जलाने वाले नेता देव हमारी सहायता के लिए युद्ध में आवें. (१) अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि. हत्वाय शत्रून्वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व.. (२) हे मन्यु! तुम अग्नि के समान प्रज्वलित होकर शत्रुओं को जलाओ. हे सहनशील एवं बुलाए गए मन्यु! संग्राम में हमारे सेनापति बनो. तुम युद्ध में शत्रुओं को मारकर उनका धन हमें दो तथा हमें शक्ति प्रदान करते हुए शत्रुओं को मारो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मे रुजन्पृणन्प्रमृणन् प्रेहि शत्रून्. उग्रं ते पाजो नन्वा रुरुध्वे वशी वशं नयस एकज त्वम्.. (३) हे मन्यु! हम पर आक्रमण करने वाले शत्रु को हराओ. तुम शत्रुओं को मारते हुए, विशेषरूप से उनकी हिंसा करते हुए एवं सदा के लिए समाप्त करते हुए उनके पास जाओ. तुम्हारा उग्र बल रोका नहीं जा सकता. तुम अकेले ही शत्रुओं को वश में कर लेते हो. (३) एको बहूनामसि मन्यवीळितो विशंविशं युधसे सं शिशाधि. अकृत्तरुक्त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्महे.. (४) हे प्रशंसित मन्यु! तुम अकेले ही बहुत से शत्रुओं को हरा सकते हो. तुम हमारे प्रत्येक व्यक्ति को युद्ध के लिए तीखा बनाओ. हे अच्छिन्न दीप्ति वाले मन्यु! तुमसे मिलकर हम विजय के लिए सिंह के समान शक्तिशाली गर्जन करते हैं. (४) विजेषकृदिन्द्रइवानवब्रवोऽस्माकं मन्यो अधिपा भवेह. प्रियं ते नाम सहुरे गृणीमसि विद्मा तमुत्सं यत आबभूथ.. (५) हे मन्यु! तुम इंद्र के समान विजय प्राप्त करने वाले एवं अनिंदित वचन हो. तुम इस यज्ञ में हमारे विशेष रक्षक बनो. हे शत्रुओं को सहन करने वाले मन्यु! हम तुम्हारी प्रिय स्तुति करते हैं. हम उस शक्ति के उद्गमरूप स्तोत्र को जानते हैं जिससे तुम बढ़ते हो. (५) आभूत्या सहजा वज्र सायक सहो बिभर्ष्यभिभूत उत्तरम्. क्रत्वा नो मन्या सह मेद्येधि महाधनस्य पुरुहूत संसृजि.. (६) हे वज्र के समान सारयुक्त एवं बाण के समान शत्रुनाशक एवं शत्रुपराभवकारी मन्यु! शत्रु को पराजित करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है तथा तुम उत्तम तेज धारण करते हो. तुम यज्ञकर्म के कारण युद्ध में हमारे प्रति स्नेहपूर्ण बनो. बहुत से लोग तुम्हें बुलाते हैं. (६) संसृष्टं धनमुभयं समाकृतमस्मभ्यं दत्तां वरुणश्च मन्युः. भियं दधाना हृदयेषु शत्रवः पराजितासो अप नि लयन्ताम्.. (७) वरुण और मन्यु दोनों ही हमें भली प्रकार लाया हुआ एवं विभक्त न होने वाला अन्न दें. हमारे शत्रु अपने मन में भयभीत एवं पराजित होकर भाग जावें. (७) सूक्त—८५ देवता—सोम सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः. ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः.. (१) देवों में सत्यरूप ब्रह्मा ने धरती को ऊपर रोक लिया है एवं सूर्य ने द्युलोक को धारण ebook converter DEMO Watermarks*