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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

ता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (३) हे बहुतों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो! मेरे पुत्र विष्णापु को धन देने की इच्छा से तुमने धन दिया था. मैं अश्वक ऋषि संतान पाने के उद्देश्य से तुम्हें बुलाता हूं. हमारी मित्रता नष्ट मत करना. तुम यहां आकर अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (३) उत त्यं वीरं धनसामृजीषिणं दूरे चित्सन्तमवसे हवामहे. यस्य स्वादिष्ठा सुमतिः पितुर्यथा मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! हम वीर, धन का उपभोग करने वाले, ऋजीश युक्त एवं दूरस्थित विष्णापु को बुलाते हैं. उसकी स्तुति भी मुझ पिता के समान ही सरस है. हमारी मित्रता को अलग मत करो. तुम यहां आकर अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (४) ऋतेन देवः सविता शमायत ऋतस्य शृङ्गमूर्विया वि पप्रथे. ऋतं सासाह महि चित्पृतन्यतो मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! सत्य के द्वारा सूर्य अपनी किरणें शांत करते हैं. उसके बाद वे सत्य के सींग के समान अपनी किरणों का विस्तार करते हैं. सूर्य युद्ध करने वाले शत्रुओं को वास्तव में पराजित करते हैं. हमारी मित्रता अलग न हो. तुम यहां आकर अपने घोड़ो की लगाम अलग करो. (५) सूक्त—७६ देवता—अश्विनीकुमार द्युम्नी वां स्तोमो अश्विना क्रिविर्न सेक आ गतम्. मध्वः सुतस्य स दिवि प्रियो नरा पातं गौराविवेरिणे.. (१) हे अश्विनीकुमारो! द्युम्नीक तुम्हारा स्तोता है. वर्षा ऋतु में जिस प्रकार कुएं का पानी पास आ जाता है, उसी प्रकार तुम आओ. हे नेताओ! यह स्तोता दीप्तिशाली यज्ञ में नशीले सोमरस को प्रिय समझता है. गौर मृग जिस प्रकार तालाब में पानी पीता है, उसी प्रकार तुम सोमरस पिओ. (१) पिबतं घर्मं मधुमन्तमश्विना बर्हिः सीदतं नरा. ता मन्दसाना मनुषो दुरोण आ नि पातं वेदसा वयः.. (२) हे अश्विनीकुमारो! मधुर एवं पात्रों में टपकने वाले सोमरस को पिओ. हे नेताओ! यज्ञ के कुशों पर बैठो. तुम यजमान की यज्ञशाला में प्रसन्न होकर पुरोडाश आदि के साथ सोमरस पिओ. (२) आ वां विश्वाभिरूतिभिः प्रियमैधा अहूषत. ebook converter DEMO Watermarks*

ता वर्तयातमुप वृक्तबर्हिषो जुष्टं यज्ञं दिविष्टुषु.. (३) हे अश्विनीकुमारो! यज्ञ को प्रेम करने वाला यजमान तुम्हें समस्त रक्षासाधनों के साथ बुलाता है. कुश बिछाने वाले यजमान का जो हव्य सब देव स्वीकार करते हैं, उसे स्वीकार करने के लिए तुम प्रातःकाल आओ. (३) पिबतं सोमं मधुमन्तमश्विना बर्हिः सीदतं सुमत्. ता वावृधाना उप सुष्टुतिं दिवो गन्तं गौराविवेरिणम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! मधुर सोमरस पिओ एवं शोभन कुशों पर बैठो. गौर मृग जिस प्रकार पानी पीने के लिए तालाब पर आते हैं, उसी प्रकार तुम बढ़कर हमारी स्तुति की ओर आओ. (४) आ नूनं यातमश्विनाश्वेभिः प्रुषितप्सुभिः. दस्रा हिरण्यवर्तनी शुभस्पती पातं सोममृतावृधा.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम दीप्तिशाली रूपवाले घोड़ों के साथ यहां आओ. हे दर्शनीय सोने के रथ वाले, जल के स्वामी एवं यज्ञ की वृद्धि करने वाले अश्विनीकुमारो! सोमरस पिओ. (५) वयं हि वां हवामहे विपन्यवा विप्रासो वाजसातये. ता वल्गू दस्रा पुरुदंससा धियाश्विना श्नुष्ट्या गतं.. (६) हम स्तोता एवं ब्राह्मण लोग अन्न पाने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. हे दर्शनीय एवं विविध कर्मों वाले अश्विनीकुमारो! तुम हमारी स्तुति सुनकर शीघ्र आओ. (६) सूक्त—७७ देवता—इंद्र तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः. अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (१) हम दर्शनीय, शत्रुओं को पराजित करने वाले, निवासस्थान देने वाले एवं सोमरस पीकर प्रसन्न बने हुए इंद्र को स्तुतियों द्वारा इस प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार गाएं गोशाला में इंद्र को बुलाती हैं. (१) द्युक्षं सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम्. क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तममीमहे.. (२) हम दीप्तिशाली, शोभन-दान वाले, बलों से युक्त तथा पर्वत के समान अनेक लोगों का पालन करने वाले, इंद्र से बोलने वाले पुत्र-पौत्र, हजारों एवं सैकड़ों धनों से युक्त गाएं एवं अन्न शीघ्र मांगते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

न त्वा बृहन्तो अद्रयो वरन्त इन्द्र वीळवः. यदित्ससि स्तुवते मावते वसु नकिष्टदा मिनाति ते.. (३) हे इंद्र! विशाल एवं दृढ़ पर्वत भी तुम्हें नहीं रोक पाते. मुझ जैसे स्तोता को तुम जो धन देना चाहते हो, तुम्हें उससे कोई नहीं रोक सकता. (३) योद्धासि क्रत्वा शवसोत दंसना विश्वा जाताभि मज्मना. आ त्वायमर्क ऊतये ववर्त्तति यं गोतमा अजीजनन्.. (४) हे इंद्र! ज्ञान एवं बल के द्वारा तुम शत्रु का संहार करते हो. तुम अपने कर्म एवं बल से सभी प्राणियों को हराते हो. तुम्हारी पूजा करने वाला यह स्तोता अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हारी सेवा में लगता है. गौतम वंश के ऋषियों ने तुम्हें अपने यज्ञ में प्रकट किया है. (४) प्र हि रिरिक्ष ओजसा दिवो अन्तेभ्यस्परि. न त्वा विव्याच रज इन्द्र पार्थिवमनु स्वधां ववक्षिथ.. (५) हे इंद्र! तुम अपने बल द्वारा द्युलोक से भी महान् बनते हो. मृत्युलोक तुम्हें व्याप्त नहीं कर पाता. तुम हमारा हव्य-अन्न वहन करने की इच्छा करो. (५) नकिः परिष्टिर्मघवन्मघस्य ते यद्दाशुषे दशस्यसि. अस्माकं बोध्युचथस्य चोदिता मंहिष्ठो वाजसातये.. (६) हे धनस्वामी इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान को जो धन देते हो, उससे तुम्हें कोई नहीं रोक पाता. तुम अतिशय दानशील एवं धन के प्रेरक बनकर मुझ उचथ्य ऋषि का स्तोत्र सुनो. (६) सूक्त—७८ देवता—इंद्र बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम्. येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि.. (१) हे मरुतो! इंद्र के लिए पाप नष्ट करने वाले एवं विशाल साममंत्रों का गायन करो. यज्ञवर्धक देवों ने सामगान के द्वारा इंद्र के लिए दीप्तियुक्त एवं जागरणशील ज्योति के रूप में सूर्य को बनाया. (१) अपाधमदभिशस्तीरशस्तिहाथेन्द्रो द्युम्न्याभवत्. देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे बृहद्दानो मरुद्गण.. (२) स्तोत्र न करने वाले लोगों को मारने वाले इंद्र ने शत्रुओं द्वारा होने वाली हिंसा दूर की. इसके पश्चात् इंद्र यशस्वी बने. हे विशाल दीप्तियुक्त एवं मरुतों सहित इंद्र! सभी देवों ने तुम्हें अपनी मित्रता के लिए पाया. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा.. (३)

प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत. वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा.. (३) हे मरुतो! महान् इंद्र के लिए स्तोत्र बोलो. शतक्रतु एवं वृत्रहंता इंद्र ने सौ धारों वाले वज्र से वृत्र असुर का नाश किया. (३) अभि प्र भर धृषता धृषन्मनः श्रवश्चित्ते असद् बृहत्. अर्शन्त्वापो जवसा वि मातरो हनो वृत्रं जया स्वः.. (४) हे शत्रुओं को हराने के लिए दृढ़ निश्चय इंद्र! तुम्हारा अन्न महान् है. दृढ़ हृदय द्वारा वह धन तुम हमें दो. हमारी माता के समान जल तेजी के साथ भूमियों पर जावे. तुम जल रोकने वाले वृत्र असुर का नाश करो तथा अपने आपको जीतो. (४) यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय. तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तब्ना उत द्याम्.. (५) हे अभूतपूर्व एवं धनस्वामी इंद्र! जब वृत्र की हत्या करने के लिए तुमने धरती को दृढ़ एवं द्युलोक को विरुद्ध किया. (५) तत्ते यज्ञो अजायत तदर्क उत हस्कृतिः. तद्विश्वमभिभूरसि यज्जातं यच्च जन्त्वम्.. (६) हे इंद्र! उस समय तुम्हारे लिए यश एवं प्रसन्नतादायक मंत्र उत्पन्न हुए. उस समय तुमने उत्पन्न एवं भविष्य में जन्म लेने वाले संसार को पराजित किया. (६) आमासु पक्वमैरय आ सूर्यं रोहयो दिवि. घर्मं न सामन्तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वाणसे बृहत्.. (७) हे इंद्र! उस समय तुमने कच्ची उम्र वाली गायों को दुधारू बनाया एवं सूर्य को द्युलोक में चढ़ाया. हे स्तोताओ! साममंत्रों द्वारा जिस प्रकार सोमरस को बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार स्तुतियों द्वारा इंद्र को बढ़ाओ. स्तुति के योग्य इंद्र के लिए विस्तृत एवं प्रीतिकर साममंत्र गाओ. (७) सूक्त—७९ देवता—इंद्र आ नो विश्वासु हव्य इन्द्रः समत्सु भूषतु. उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहा परमज्या ऋचीषमः.. (१) सभी युद्धों में बुलाने योग्य इंद्र हमारी स्तुतियों का अनुभव करें. इंद्र वृत्रनाशक, विशाल ज्या वाले एवं स्तुतियों द्वारा अभिमुख करने योग्य हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

त्वं दाता प्रथमो राधसामस्यसि सत्य ईशानकृत्. तुविद्युम्नस्य युज्या वृणीमहे पुत्रस्य शवसो महः.. (२) हे इंद्र! तुम सबसे मुख्य, धनदाता एवं सत्य हो. तुम स्तोताओं को ऐश्वर्य वाला बनाओ. हे बहुत धन वाले, बल के पुत्र एवं महान् इंद्र! हम तुम्हारे योग्य धन को वरण करते हैं. (२) ब्रह्मा त इन्द्र गिर्वणः क्रियन्ते अनतिद्भूता. इमा जुषस्व हर्यश्व योजनेन्द्र या ते अमन्महि.. (३) हे स्तुति योग्य एवं हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! हम तुम्हारे गुणों से पूर्ण स्तुतियां करते हैं. वे तुमसे मिलने योग्य हैं. उन्हें तुम स्वीकार करो. हम तुम्हारे लिए जितनी स्तुतियां कर रहे हैं, उन्हें स्वीकार करो. (३) त्वं हि सत्यो मघवन्नानतो वृत्रा भूरि न्युब्जसे. स त्वं शविष्ठ वज्रहस्त दाशुषेऽर्वाञ्चं रयिमा कृधि.. (४) हे सत्यशील, धनस्वामी एवं किसी से न दबने वाले इंद्र! तुम अनेक राक्षसों का नाश करते हो. हे हाथ में वज्र धारण करने वाले एवं अतिशय शक्तिशाली इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान को सामने जाने वाला धन दो. (४) त्वमिन्द्र यशा अस्यूजीषी शवसस्पते. त्वं वृत्राणि हंस्यप्रतीन्येक इदनुत्ता चर्षणीधृता.. (५) हे शक्ति के स्वामी एवं ऋषीज के अधिकारी इंद्र! तुम यशस्वी बनो. तुमने अकेले ही शत्रुओं की हिंसा करने वाले वज्र द्वारा ऐसे राक्षसों को मारा जिन पर न कोई आक्रमण कर सकता था और न जिन्हें कोई जीत सकता था. (५) तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे. महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन्.. (६) हे शक्तिशाली एवं उत्तमज्ञान वाले इंद्र! हम तुमसे पैतृक संपत्ति के समान धन मांगते हैं. तुम्हारा घर तुम्हारे यश के समान विशालरूप से अंतरिक्ष में स्थित है. तुम्हारे सुख हमें प्राप्त करें. (६) सूक्त—८० देवता—इंद्र कन्या३ वारवायती सोममपि सुताविदत्. अस्तं भरन्त्यब्रवीदिन्द्राय सुनवै त्वा शक्राय सुनवै त्वा.. (१) जल की ओर स्नान हेतु जाती हुई कन्या अपाला ने मार्ग में सोमलता प्राप्त की. उसने ebook converter DEMO Watermarks*

सोमलता को घर लाते समय कहा—"मैं शक्तिशाली इंद्र के लिए तुम्हारा रस निचोड़ती हूं." (१) असौ य एषि वीरको गृहंगृहं विचाकशत्. इमं जम्भसुतं पिब धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम्.. (२) हे वीर एवं दीप्तिशाली इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए सभी घरों में जाते हो. भुने हुए जौ (सत्तू), पुरोडाश एवं उक्थ मंत्रों से युक्त सोमरस को पिओ जो मैंने अपने दांतों से निचोड़ा है. (२) आ चन त्वा चिकित्सामोऽधि चन त्वा नेमसि. शनैरिव शनकैरिवेन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (३) हे इंद्र! मैं तुम्हें जानना चाहती हूं. इस समय मैं तुम्हें प्राप्त नहीं करती हूं. हे सोम! मेरे दांतों से दबकर तुम पहले धीरे-धीरे एवं बाद में जोर से बहो. (३) कुविच्छकत्कुवित्करत्कुविन्नो वस्यसस्करत्. कुवित्पतिद्विषो यतीरिन्द्रेण सङ्गमामहै.. (४) वे इंद्र मुझ अपाला को अनेक बार समर्थ करें एवं बहुत बार धनसंपन्न बनावें. त्वचारोग के कारण पति द्वारा छोड़ी हुई मैं इंद्र से मिलती हूं. (४) इमानि त्रीणि विष्टपा तानीन्द्र वि रोहय. शिरस्ततस्योर्वरामादिदं म उपोदरे.. (५) हे इंद्र! मेरे पिता के केशरहित शीश, खेत और मेरे उदर के नीचे वाले स्थान इन तीनों को उपजाऊ बनाओ. (५) असौ च या न उर्वरादिमां तन्वं१ मम. अथो ततस्य यच्छिरः सर्वा ता रोमशा कृधि.. (६) हे इंद्र! मेरे पिता का जो ऊसर खेत है, मेरे शरीर का जो त्वचादोष के कारण लोमरहित गोपनीय स्थान है एवं मेरे पिता का जो सिर है, इन में खेत को उपजाऊ एवं शेष दो को बालों से युक्त बनाओ. (६) खे रथस्य खेऽनसः खे युगस्य शतक्रतो. अपालामिन्द्र त्रिष्पूत्वकृणोः सूर्यत्वचम्.. (७) हे सौ यज्ञों वाले इंद्र! तुमने रथ के बड़े छेद, गाड़ी के मंझोले छेद एवं जुए के छेद से निकाल कर अपाला की त्वचा को सूर्य के समान प्रभावयुक्त किया. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—८१ देवता—इन्द्र

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

सूक्त—८१ देवता—इन्द्र पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत. विश्वासाहं शतक्रतुं मंहिष्ठं चर्षणीनाम्.. (१) हे ऋत्विजो! सोमरस पीने वाले अपने इंद्र की विशेष रूप से स्तुति करो. इंद्र सभी शत्रुओं को हराने वाले, सौ यज्ञ करने वाले एवं प्रजाओं को सर्वाधिक धन देने वाले हैं. (१) पुरुहूतं पुरुष्टुतं गाथान्यं१ सनश्रुतम्. इन्द्र इति ब्रवीतन.. (२) हे ऋत्विजो! तुम अनेक लोगों द्वारा बुलाए हुए, बहुत से लोगों द्वारा स्तुति, यज्ञगान के योग्य एवं सनातनरूप से प्रसिद्ध देव विशेष को इंद्र कहना. (२) इन्द्र इन्नो महानां दाता वाजानां नृतुः. महाँ अभिज्ञ्वा यमत्.. (३) हमें महान् अन्न देने वाले, बहुसंख्यक धन देने वाले और सबको बचाने वाले इंद्र हमारे सामने आकर धन प्रदान करें. (३) अपादु शिप्रयन्धसः सुदक्षस्य प्रहोषिणः. इन्दोरिन्द्रो यवाशिरः.. (४) शोभन नासिका वाले इंद्र ने भली प्रकार होम करने वाले सुदक्ष नामक ऋषि के दिए हुए सोमरस को पिया था, जो भुने हुए जौ से मिला तथा पात्रों में निचुड़ रहा था. (४) तम्वभि प्रार्चतेन्द्रं सोमस्य पीतये. तदिद्ध्रयस्य वर्धनम्.. (५) हे ऋत्विजो! सोमरस पीने के लिए इंद्र के सामने जाकर उनकी स्तुति करो. वह सोमपान ही इंद्र को बढ़ाता है. (५) अस्य पीत्वा मदानां देवो देवस्यौजसा. विश्वाभि भुवना भुवत्.. (६) दीप्तिशाली इंद्र सोम के नशीले रस को पीकर अपनी शक्ति द्वारा सारे संसार को पराजित करते हैं. (६) त्यमु वः सत्रासाहं विश्वांसु गीर्ष्वायतम्. आ च्यावयस्यूतये.. (७) हे स्तोता! बहुतों को पराजित करने वाले एवं सभी स्तुतिवचनों में व्याप्त इंद्र को रक्षा के लिए भली प्रकार बुलाओ. (७) युध्मं सन्तमनर्वाणं सोमपामनपच्युतम्. नरमवार्यक्रतुम्.. (८) शत्रुसंहारक, सत्ता वाले, अन्यों द्वारा अनाक्रांत, सोमरस पीने वाले, युद्धों में शत्रुओं द्वारा अपराजित एवं नेता इंद्र को कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

शिक्षा ण इन्द्र राय आ पुरु विद्वाँ ऋचीषम. अवा नः पार्ये धने.. (९) हे स्तुति द्वारा संबोधन करने योग्य एवं विद्वान् इंद्र! शत्रुओं का धन लेकर हमें अनेक बार दो. (९) अतश्चिदिन्द्र ण उपा याहि शतवाजया. इषा सहस्रवाजया.. (१०) हे इंद्र! द्युलोक से ही सैकड़ों अन्नों एवं हजारों शक्तियों से युक्त होकर हमारे पास आओ. (१०) अयाम धीवतो धीयोऽर्वद्भिः शक्र गोदरे. जयेम पृत्सु वज्रिवः.. (११) हे समर्थ इंद्र! यज्ञकर्मयुक्त हम युद्ध में शत्रुओं को जीतने के लिए यज्ञ करेंगे. हे पर्वतों को विदीर्ण करने वाले एवं वज्रधारी इंद्र! हम युद्धों में घोड़ों के द्वारा विजयी बनेंगे. (११) वयमु त्वा शतक्रतो गावो न यवसेष्वा. उक्थेषु रणयामसि.. (१२) हे अनेक कर्मों वाले इंद्र! गोपाल गायों को जिस प्रकार जौ के खेत में विशेष रूप से प्रसन्न करता है, उसी प्रकार हम तुम्हें उक्थों द्वारा प्रसन्न करेंगे. (१२) विश्वा हि मर्त्यत्वनानुकामा शतक्रतो. अगन्म वज्रिन्नाशसः.. (१३) हे सौ यज्ञों वाले इंद्र! संसार के सभी लोग इच्छाएं रखते हैं. हे वज्रधारी इंद्र! हम भी मनचाही वस्तुएं प्राप्त करें. (१३) त्वे सु पुत्र शवसोऽवृत्रन् कामकातयः. न त्वामिन्द्राति रिच्यते.. (१४) हे बलपुत्र इंद्र! अभिलाषापूर्ण शब्द बोलने वाले लोग तुम्हारा सहारा लेते हैं. कोई भी देव तुमसे बढ़कर नहीं हो सकता. (१४) स नो वृषन्त्सनिष्या सं घोरया द्रवित्न्वा. धियाविद्धि पुरन्ध्या.. (१५) हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम सर्वाधिक धन देने वाली, शत्रुओं को भयभीत करने वाली, शत्रुओं को भगाने वाली एवं अनेक को धारण करने वाली यज्ञक्रिया के द्वारा हमारा पालन करो. (१५) यस्ते नूनं शतक्रतविन्द्र द्युम्नितमो मदः. तेन नूनं मदे मदेः.. (१६) हे सौ यज्ञों वाले इंद्र! प्राचीनकाल में हमने तुम्हारे लिए जो सर्वाधिक यज्ञ वाला सोमरस निचोड़ा था, उसके द्वारा प्रमुदित होकर एवं धन देकर हमें प्रसन्न बनाओ. (१६) यस्ते चित्रश्रवस्तमो य इन्द्र वृत्रहन्तम. य ओजोदातमो मदः.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! हमने तुम्हारे निमित्त अतिशय कीर्ति वाला, पापों का सर्वाधिक नाशक एवं अतिशय बलदाता सोमरस निचोड़ा है. (१७) विद्मा हि यस्ते अद्रिवस्त्वादत्तः सत्य सोमपाः. विश्वासु दस्म कृष्टिषु.. (१८) हे वज्रधारी, यथार्थ कर्म वाले, सोमरस पीने वाले एवं दर्शनीय इंद्र! सभी यजमानों के पास तुम्हारा दिया हुआ जो धन है, हम उसीको जानते हैं. (१८) इन्द्राय मद्ने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः. अर्कमर्चन्तु कारवः.. (१९) जो सोमरस नशा करने वाले इंद्र के लिए निचोड़ा गया है, उसकी स्तुति हमारे वचन करें. हम स्तुति करने वाले सोमरस की पूजा करें. (१९) यस्मिन् विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त संसदः. इन्द्रं सुते हवामहे.. (२०) जिन इंद्र में सभी कांतियां आश्रित हैं एवं सात होताओं का समूह जिन्हें सोमरस देकर प्रसन्न होता है, उन इंद्र को मैं सोमरस निचूड़ जाने पर बुलाता हूं. (२०) त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमतनत. तमिद्वर्धन्तु नो गिरः.. (२१) हे देवो! तुमने त्रिकद्रुक अर्थात् ज्योति, गौ और वायु पाने के लिए ज्ञानसाधन यज्ञ का विस्तार किया था. हमारी स्तुतियां उस यज्ञ को बढ़ावें. (२१) आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः. न त्वामिन्द्राति रिच्यते.. (२२) हे इंद्र! सरिताएं जिस प्रकार सागर में गिरती हैं, उसी प्रकार सोमरस तुम में प्रवेश करे. कोई भी देव तुमसे बढ़कर नहीं है. (२२) विव्यक्थ महिना वृषन्भक्षं सोमस्य जागृवे. य इन्द्र जठरेषु ते.. (२३) हे अभिलाषापूरक एवं जागरणशील इंद्र! तुम अपनी महिमा के द्वारा सोमरस पीने में सबसे अधिक हुए हो. हे इंद्र! सोमरस तुम्हारे उदर में प्रवेश करता है. (२३) अरं त इन्द्र कुक्षये सोमो भवतु वृत्रहन्. अरं धामभ्य इन्दवः.. (२४) हे वृत्रहंता इंद्र! सोमरस तुम्हारे उदर के लिए पर्याप्त हो. निचोड़ा गया सोमरस तुम्हारे शरीरों के लिए पर्याप्त हो. (२४) अरमश्वाय गायति श्रुतकक्षो अरं गवे. अरमिन्द्रस्य धाम्ने.. (२५) मैं श्रुतकक्ष ऋषि इंद्र से अश्व, गाएं एवं निवासस्थान पाने के लिए पर्याप्त स्तुति करता हूं. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

अरं हि ष्मा सुतेषु णः सोमेष्विन्द्र भूषसि. अरं ते शक्र दावने.. (२६) हे इंद्र! हमारे सोमरस निचुड़ जाने पर तुम उन्हें पीने के लिए पर्याप्त हो. हे दानशील एवं शक्तिशाली इंद्र! सोमरस तुम्हारे लिए पर्याप्त हो. (२६) पराकात्ताच्चिदद्रिवस्त्वां नक्षन्त नो गिरः. अरं गमाम ते वयम्.. (२७) हे वज्रधारी इंद्र! हमारे स्तुतिवचन दूर रहकर भी तुम्हें प्राप्त हों. तुमसे हम पर्याप्त धन प्राप्त करें. (२७) एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः. एवा ते राध्यं मनः... (२८) हे इंद्र! तुम वीरों की इच्छा करने वाले, शूर एवं स्थिर हो. तुम्हारा मन आराधना करने योग्य है. (२८) एवा रातिस्तुवीमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः. अधा चिदिन्द्र मे सचा.. (२९) हे अधिक धन वाले इंद्र! सभी यजमान तुम्हारा दिया हुआ धन धारण करते हैं. तुम मेरे साथी बनो. (२९) मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते. मत्स्वा सुतस्य गोमतः.. (३०) हे अन्नों के स्वामी इंद्र! तुम स्तोता के समान आलसी मत बनना. तुम गोदुग्ध मिला हुआ सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (३०) मा न इन्द्राभ्याऽदिशः सूरो अक्तुष्व्वा यमन्. त्वा युजा वनेम तत्.. (३१) हे इंद्र! रात के समय फैलने वाले राक्षस हमारे अधिकारी न बनें. तुम्हारी सहायता से हम उनका विनाश करेंगे. (३१) त्वयेदिन्द्र युजा वयं प्रति ब्रुवीमहि स्पृधः. त्वमस्माकं तव स्मसि.. (३२) हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम शत्रुओं को भगा देंगे. तुम हमारे हो और हम तुम्हारे हैं. (३२) त्वामिद्धि त्वायवोऽनुनोनुवतश्चरन्. सखाय इन्द्र कारवः.. (३३) हे इंद्र! तुम्हारी अभिलाषा एवं बार-बार स्तुति करने वाले तुम्हारे मित्र स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (३३) सूक्त—८२ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

उद्घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम्. अस्तारमेषि सूर्य.. (१) हे शोभन वीर्य वाले इंद्र! तुम प्रसिद्ध धन वाले, अभिलाषापूरक, मानवहितैषी एवं दाता यजमान के चारों ओर जाते हो. (१) नव यो नवतिं पुरो बिभेद बाह्वोजसा. अहिं च वृत्रहावधीत्.. (२) वृत्रहंता इंद्र ने भुजाओं की शक्ति से निन्यानवे शत्रुपुरियों को तोड़ा एवं मेघ का हनन किया. (२) स न इन्द्रः शिवः सखाश्वावद् गोमद्यवमत्. उरुधारेव दोहते.. (३) वे कल्याणकारी एवं सखा इंद्र बड़ी धाराओं से दूध देने वाली गायों के समान हमारे लिए घोड़ों, गायों एवं जौ से युक्त धन दें. (३) यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा अभि सूर्य. सर्वं तदिन्द्र ते वशे.. (४) हे वृत्रहंता एवं सूर्यरूपी इंद्र! इस समय विश्व में जो भी पदार्थ हैं, तुम उनके सामने उदित हुए हो एवं सारा विश्व तुम्हारे वश में है. (४) यद्वा प्रवृद्ध सत्पते न मरा इति मन्यसे. उतो तत्सत्यमित्तव.. (५) हे वृद्धिप्राप्त एवं सज्जनपालक इंद्र! तुम अपने को जो मरणरहित मानते हो, वह सत्य है. (५) ये सोमासः परावति ये अर्वावति सुन्विरे. सर्वास्ताँ इन्द्र गच्छसि.. (६) हे इंद्र! समीपवर्ती अथवा दूरवर्ती स्थानों में जो सोमरस निचोड़ा जाता है, तुम उस सबके सामने जाते हो. (६) तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे. स वृषा वृषभो भुवत्.. (७) हम महान् वृत्र राक्षस को मारने के लिए उस इंद्र को बुलाते हैं. अभिलाषापूरक इंद्र हमारे लिए धन बरसावें. (७) इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः. द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः.. (८) अतिशय तेजस्वी, सोमरस पीने के लिए निश्चित, यशस्वी, स्तुति योग्य एवं सोम के अधिकारी इंद्र को प्रजापति ने दान करने के लिए बनाया था. (८) गिरा वज्रो न सम्भृतः सबलो अनपच्युतः. ववक्ष ऋष्वो अस्तुतः.. (९) स्तोताओं द्वारा स्तुतियां सुनकर वज्र के समान तीक्ष्ण बनाए गए, बलवान् अपराजित ebook converter DEMO Watermarks*

दीप्तिशाली एवं युद्ध में शत्रुओं से न दबने वाले इंद्र स्तोताओं के लिए धन आदि वहन करने की इच्छा करते हैं. (९) दुर्गे चिन्नः सुगं कृधि गृणान इन्द्र गिर्वणः. त्वं च मघवन् वशः.. (१०) हे स्तुति करने योग्य एवं स्तोताओं द्वारा स्तुत इंद्र! तुम दुर्गम मार्गों को भी हमारे लिए सुगम बनाओ. हे धनस्वामी इंद्र! तुम हमारी कामना करो. (१०) यस्य ते नू चिदादिशं न मिनन्ति स्वराज्याम्. न देवो नाध्रिगुर्जनः.. (११) हे इंद्र! लोग तुम्हारे आदेश और शासन का विरोध न पहले करते थे और न अब करते हैं. देव और युद्ध में शीघ्रतापूर्वक जाने वाले वीर—दोनों ही तुम्हारा विरोध नहीं करते. (११) अधा ते अप्रतिष्कुतं देवी शुष्मं सपर्यतः. उभे सुशिप्र रोदसी.. (१२) हे शोभन-टोप वाले इंद्र! दीप्तियुक्त द्यावा-पृथिवी तुम्हारे अबाध बल की पूजा करती हैं. (१२) त्वमेतदधारयः कृष्णासु रोहिणीषु च. परुष्णीषु रुशत् पयः.. (१३) हे इंद्र! तुम काले और लाल रंग वाली गायों में उज्ज्वल दूध धारण करते हो. (१३) वि यदहेर्ध त्विषो विश्वे देवासो अक्रमुः. विदन्मृगस्य ताँ अमः.. (१४) वृत्र असुर के तेज से डरकर सब देव भाग गए थे. वे वृत्ररूपी पशु से डर गए थे. (१४) आदु मे निवरो भुवद्वृत्रहादिष्ट पौंस्यम्. अजातशत्रुरस्तृतः.. (१५) वृत्रहंता इंद्र ने वृत्र का निवारण किया, अपने बल का प्रयोग किया एवं वे अजातशत्रु बने. (१५) श्रुतं वो वृत्रहन्तमं प्र शर्धं चर्षणीनाम्. आ शुषे राधसे महे.. (१६) हे ऋत्विजो! मैं प्रसिद्ध, सर्वाधिक शत्रुहंता एवं बली इंद्र की स्तुति तुम प्रजाओं को महान् धन दिलाने के लिए करता हूं. (१६) अया धिया च गव्यया पुरुणामन्युरुष्टुत. यत्सोमेसोम आभवः.. (१७) हे अनेक गायों वाले एवं बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम हमारे प्रत्येक सोमरस को पीने के लिए उपस्थित हुए हो. हम गो-अभिलाषिणी बुद्धि वाले होंगे. (१७) बोधिन्मना इदस्तु नो वृत्रहा भूर्यासुतिः. शृणोतु शक्र आशिषम्.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*

वृत्रहंता एवं अनेक सोमाभिषवों के लक्ष्य इंद्र हमारी अभिलाषा जानें. शक्तिशाली इंद्र हमारी स्तुति सुनें. (१८) कया त्वन्न ऊत्याभि प्र मन्दसे वृषन्. कया स्तोतृभ्य आ भर.. (१९) हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम किन रक्षासाधनों द्वारा हमें प्रमुदित करोगे एवं किस प्रकार स्तोताओं को धन दोगे? (१९) कस्य वृषा सुते सचा नियुत्वान्वृषभो रणत्. वृत्रहा सोमपीतये.. (२०) अभिलाषापूरक मरुतों के स्वामी, वर्षाकारक एवं वृत्रहंता इंद्र किस यजमान द्वारा स्तुतियों के साथ निचोड़े गए सोम को पीने के लिए रमण करते हैं. (२०) अभी षु णस्त्वं रयिं मन्दानः सहस्रिणम्. प्रयन्ता बोधि दाशुषे.. (२१) हे इंद्र! तुम हमारे दिए हुए सोम से प्रसन्न होकर हमारे लिए हजारों धन दो एवं हव्यदाता यजमान को धन देने का विचार करो. (२१) पत्नीवन्तः सुता इम उशन्तो यन्ति वीतये. अपां जग्मिर्निचुम्पुणः.. (२२) ये जलयुक्त सोम निचोड़े गए हैं. इंद्र हमें पी लें, ऐसी अभिलाषा करते हुए सोम इंद्र के पास जाते हैं. पीने पर प्रसन्नता देने वाला सोम जल में जाता है. (२२) इष्टा होत्रा असृक्षतेन्द्रं वृधासो अध्वरे. अच्छावभृथमोजसा.. (२३) हमारे यज्ञ में इंद्र को बढ़ाते हुए एवं यज्ञ करने वाले सात होता यज्ञ की समाप्ति पर तेजयुक्त होकर इंद्र का विसर्जन करते हैं. (२३) इह त्या सधमाद्या हरी हिरण्यकेश्या. वोळहामाभि प्रयो हितम्.. (२४) इंद्र के साथ ही तर्पण करने योग्य एवं सुनहरे बालों वाले हरि नामक घोड़े इस यज्ञ में रखे हुए अन्न की ओर इंद्र को ले जावें. (२४) तुभ्यं सोमाः सुता इमे स्तीर्णं बर्हिर्विभावसो. स्तोतृभ्य इन्द्रमा वह.. (२५) हे दीप्तिशाली धन वाले अग्नि! तुम्हारे लिए ही ये सोम निचोड़े गए हैं एवं कुश बिछाए गए हैं. हम पर कृपा के निमित्त इंद्र को सोमरस पीने के लिए बुलाओ. (२५) आ ते दक्षं वि रोचना दधद्रत्ना वि दाशुषे. स्तोतृभ्य इन्द्रमर्चत.. (२६) हे इंद्र को हवि देने वाले ऋत्विजो एवं यजमानो! इंद्र तुम्हारे लिए एवं स्तोताओं के लिए दीप्तिशाली बल और रत्न दें. तुम इंद्र की पूजा करो. (२६) ebook converter DEMO Watermarks*

आ ते दधामीन्द्रियमुक्था विश्वा शतक्रतो. स्तोतृभ्य इन्द्र मृळय.. (२७) हे शतक्रतु इंद्र! मैं तुम्हारे लिए शक्तिशाली सोम एवं सभी स्तुतियों का संपादन करता हूं. हे इंद्र! तुम हमें सुख दो. (२७) भद्रम्भद्रं न आ भरेषमूर्जं शतक्रतो. यदिन्द्र मृळयासि नः.. (२८) हे शतक्रतु इंद्र! यदि तुम हमें सुखी करना चाहते हो तो हमें कल्याणकारी एवं सुखकारक धन दो, अन्न दो तथा बल दो. (२८) स नो विश्वान्या भर सुवितानि शतक्रतो. यदिन्द्र मृळयासि नः.. (२९) हे शतक्रतु इंद्र! यदि तुम हमें सुखी करना चाहते हो तो हमारे लिए सभी मंगल दो. (२९) त्वामिद्वृत्रहन्तम सुतावन्तो हवामहे. यदिन्द्र मृळयासि नः.. (३०) हे असुरहंताओं में श्रेष्ठ इंद्र! तुम हमें सुखी करना चाहते हो तो सोमरस निचोड़ने वाले हम तुम्हें बुलाते हैं. (३०) उप नो हरिभिः सुतं याहि मदानां पते. उप नो हरिभिः सुतम्.. (३१) हे सोमों के स्वामी इंद्र! तुम हर नामक घोड़ों की सहायता से हमारे द्वारा निचोड़े गए सोम के समीप आओ. (३१) द्विता यो वृत्रहन्तमो विद इन्द्रः शतक्रतुः. उप नो हरिभिः सुतम्.. (३२) शतक्रतु एवं शत्रुहंताओं में श्रेष्ठ इंद्र दो प्रकार से जाने जाते हैं. हे इंद्र! हरि नामक घोड़ों की सहायता से हमारे द्वारा निचोड़े हुए सोम के समीप आओ. (३२) त्वं हि वृत्रहन्नेषां पाता सोमानामसि. उप नो हरिभिः सुतम्.. (३३) हे वृत्रहंता इंद्र! तुम सोमरस पीने वाले हो, इसलिए हमारे द्वारा निचोड़े हुए सोमरस के पास हरि नामक घोड़ों की सहायता से आओ. (३३) इन्द्र इषे ददातु न ऋभुक्षणमृभुं रयिम्. वाजी ददातु वाजिनम्.. (३४) इंद्र अन्न देने के लिए हमें धनदाता ऋभुक्षा एवं ऋभु नामक देवों को दें. शक्तिशाली इंद्र हमें अपने भाई वाज को दें. (३४) सूक्त—८३ देवता—मरुद्गण गौर्धयति मरुतां श्रवस्युर्माता मघोनाम्. युक्ता वह्नी रथानाम्.. (१)

धनवान् मरुतों की माता, अन्न की अभिलाषा करने वाली, मरुतों को संयुक्त करने वाली एवं सर्वत्र पूजनीय पृश्नि मरुतों को सोमरस पिलाती हैं. (१) यस्या देवा उपस्थते व्रता विश्वे धारयन्ते. सूर्यामासा दृशे कम्.. (२) सभी देव पृश्नि की गोद में रहकर व्रत धारण करते हैं. सूर्य एवं चंद्रमा उसके समीप सुख से रहते हैं. (२) तत्सु नो विश्वे अर्य आ सदा गृणन्ति कारव:. मरुतः सोमपीतये.. (३) इधर-उधर जाने वाले हमारे सब स्तोता सोमरस पीने के लिए सदा मरुतों की स्तुति करते हैं. (३) अस्ति सोमो अयं सुतः पिबन्त्यस्य मरुतः. उप स्वराजो अश्विना.. (४) यह सोम निचोड़ा गया है. स्वयं तेजस्वी मरुद्गण एवं अश्विनीकुमार उसका अंश पीते हैं. (४) पिबन्ति मित्रो अर्यमा तना पूतस्य वरुणः. त्रिषधस्थस्य जावतः.. (५) मित्र, अर्यमा और वरुण दशापवित्र द्वारा छने हुए, तीन पात्रों में स्थित एवं प्रशंसनीय जन्म पाने वाले सोम को पीते हैं. (५) उतो न्वस्य जोषमाँ इन्द्रः सुतस्य गोमतः. प्रातर्होतेव मत्सति.. (६) होता जिस प्रकार प्रातःकाल देवों की स्तुति करता है, उसी प्रकार इंद्र हमारे द्वारा निचोड़े गए व गाय के दूध-दही से मिले हुए सोम की स्तुति द्वारा प्रशंसा करते हैं. (६) कदुत्विषन्त सूर्य्यस्तिर आप इव सिधः. अर्षन्ति पूतदक्षसः.. (७) बुद्धिमान् एवं जलों के समान तिरछे चलने वाले मरुद्गण कब दीप्त होते हैं. शत्रुहननकर्त्ता एवं पवित्र शक्ति वाले मरुद्गण हमारे यज्ञ की ओर आते हैं. (७) कद्वो अद्य महां देवानामवो वृणे. तमना च दस्मवर्चसाम्.. (८) हे महान्, दर्शनीय तेज वाले एवं स्वयं दीप्तिशाली मरुतो! मैं तुम्हारा पालन कब वरण करूंगा? (८) आ ये विश्वा पार्थिवानि पप्रथन्नोचना दिवः. मरुतः सोमपीतये.. (९) मैं उन्हीं मरुतों को सोमरस पीने के लिए बुलाता हूं. जिन्होंने सभी पार्थिव वस्तुओं एवं तेजस्वी स्वर्गिक वस्तुओं को विस्तृत किया है. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

त्यान्नु पूतदक्षसो दिवो वो मरुतो हुवे. अस्य सोमस्य पीतये.. (१०) हे पवित्र बल वाले एवं अपने तेज से ही दीप्त मरुतो! मैं इस सोमरस को पीने के लिए तुम्हें बुलाता हूं. (१०) त्यान्नु ये वि रोदसी तस्तभुर्मरुतो हुवे. अस्य सोमस्य पीतये.. (११) जिन मरुतों ने द्यावा-पृथिवी को स्तब्ध किया है, मैं उन्हीं को सोमरस पीने के लिए बुलाता हूं. (११) त्यं नु मारुतं गणं गिरिक्षां वृषणं हुवे. अस्य सोमस्य पीतये.. (१२) मैं सर्वत्र प्रसिद्ध, पर्वत पर स्थित एवं जलों को बरसाने वाले मरुतों को सोमरस पीने के लिए बुलाता हूं. (१२) सूक्त—८४ देवता—इंद्र आ त्वा गिरो रथीरिवाऽस्थुः सुतेषु गिर्वणः. अभि त्वा समनूषतेन्द्र वत्सं न मातरः.. (१) हे स्तुतिपात्र इंद्र! सोमरस निचूड़ जाने पर हमारी स्तुतियां रथ पर बैठे वीरों के समान तुम्हारे पास स्थित होती हैं. हे इंद्र! गाएं जिस प्रकार बछड़ों को देखकर रंभाती है, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां तुमसे संबंधित हैं. (१) आ त्वा शुक्रा अचुच्यवुः सुतास इन्द्र गिर्वणः. पिबा त्व१ स्यान्धस इन्द्र विश्वासु ते हितम्.. (२) हे स्तुति योग्य इंद्र! पात्रों को चमकाते हुए एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए सोम तुम्हारे पास आवें. तुम इस सोम को पिओ. चारों ओर से चरु-पुरोडाश आदि तुम्हारे समीप आवें. (२) पिबा सोमं मदाय कमिन्द्र श्येनाभृतं सुतम्. त्वं हि शश्वतीनां पती राजा विशामसि.. (३) हे इंद्र! वाजरूप-धारिणी गायत्री द्वारा लाए गए एवं हम लोगों द्वारा निचोड़े गए सोमरस को नशे के लिए सुखपूर्वक पिओ. तुम सभी मरुद्गणों के पालनकर्त्ता और अपने तेज से दीप्तिशाली हो. (३) श्रुधी हवं तिरश्च्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति. सुवीर्यस्य गोमतो रायस्पूर्धि महाँ असि.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

मैं तिरश्ची नामक ऋषि तुम्हारी सेवा करता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. तुम महान् हो. तुम शोभन संतान वाला एवं गौयुक्त धन हमें दो. (४) इन्द्र यस्ते नवीयसीं गिरं मन्द्रामजीजनत्. चिकित्विन्मनसं धियं प्रत्नामृतस्य पिप्युषीम्.. (५) हे इंद्र! जिस यजमान ने तुम्हारे लिए नवीन एवं प्रसन्न करने वाला स्तुतिवचन बनाया है, उस यजमान के लिए तुम प्राचीन, सच्चा, बड़ा एवं सबके मन को पसंद आने वाला रक्षाकार्य करो. (५) तमु ष्टवाम यं गिर इन्द्रमुक्थानि वावृधुः. पुरूण्यस्य पौंस्या सिषासन्तो वनामहे.. (६) हमारी स्तुतियां एवं उक्थमंत्रों ने जिस इंद्र को बढ़ाया है हम उसीकी स्तुति करते हैं. हम इंद्र के अनेक पुरुषार्थों को भोगने की इच्छा से उनकी सेवा करते हैं. (६) एतो न्विन्द्रं स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्ना. शुद्धैरुक्थैर्वावृध्वांसं शुद्ध आशीर्वान्ममत्तु.. (७) हे ऋषियो! जल्दी आओ. हम शुद्ध सामगीतों एवं शुद्ध उक्थमंत्रों द्वारा इंद्र को पापरहित करके उनकी स्तुति करेंगे. दशापवित्र से शुद्ध किए गए एवं गोदुग्ध आदि से मिश्रित सोम उन्नतिशील इंद्र को प्रमुदित करें. (७) इन्द्र शुद्धो न आ गहि शुद्धः शुद्धाभिरूतिभिः. शुद्धो रयिं नि धारय शुद्धो ममद्धि सोम्यः.. (८) हे इंद्र! तुम शुद्ध हो. तुम हमारे यज्ञ में आओ. तुम शुद्ध रक्षण वाले मरुतों के साथ आओ और पापरहित बनकर हमें शुद्ध धन दो. हे सोमयोग्य एवं शुद्ध इंद्र तुम हर्षित बनो. (८) इन्द्र शुद्धो हि नो रयिं शुद्धो रत्नानि दाशुषे. शुद्धो वृत्राणि जिघ्नसे शुद्धो वाजं सिषाससि.. (९) हे शुद्ध इंद्र! तुम हमें धन दो. हे शुद्ध इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान के लिए रत्न दो. तुम शुद्ध होकर शत्रुओं को मारते हो एवं अन्न देने की अभिलाषा करते हो. (९) सूक्त—८५ देवता—इंद्र अस्मा उषास अतिरन्त याममिन्द्राय नक्तमूर्य्याः सुवाचः. अस्मा आपो मातरः सप्त तस्थुर्नृभ्यस्तराय सिन्धवः सुपाराः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

इंद्र से डरी हुई उषाएं अपनी गति बढ़ाती रहती हैं. इंद्र के कारण ही सब रात्रियां निशांत में शोभनवाक्यों वाली बनती हैं. इंद्र के कारण ही सात नदियां मानव हितकारिणी एवं सरलता से पार होने योग्य रहती हैं. (१) अतिविद्धा विथुरेणा चिदस्त्रा त्रिः सप्त सानु संहिता गिरीणाम्. न तद्देवो न मर्त्यस्तुतुर्याद्यानि प्रवृद्धो वृषभश्चकार.. (२) इंद्र ने बिना किसी की सहायता से अपने वज्र द्वारा इक्कीस पर्वतशृंगों को तोड़ा था. अभिलाषापूरक इंद्र ने जो काम किए हैं, उन्हें न देव कर सकते हैं और न मानव. (२) इन्द्रस्य वज्र आयसो निमिश्ल इन्द्रस्य बाह्वोर्भूयिष्ठमोजः. शीर्षन्निन्द्रस्य क्रतवो निरेक आसन्नेषन्त श्रुत्या उपाके.. (३) इंद्र का वज्र उनके हाथ में दृढ़तापूर्वक पकड़ा गया है और उनकी भुजाओं में अधिक शक्ति है. युद्ध के लिए चलते समय इंद्र के सिर पर टोप आदि होते हैं एवं उनका आदेश सुनने के लिए लोग समीप पहुंचते हैं. (३) मन्ये त्वा यज्ञियं यज्ञियानां मन्ये त्वा च्यवनमच्युतानाम्. मन्ये त्वा सत्वनामिन्द्र केतुं मन्ये त्वा वृषभं चर्षणीनाम्.. (४) हे इंद्र! मैं तुम्हें यज्ञ योग्य व्यक्तियों में सबसे श्रेष्ठ समझता हूं. मैं तुम्हें दृढ़ पर्वतों को तोड़ने वाला मानता हूं. मैं तुम्हें सेनाओं का झंडा मानता हूं. मैं तुम्हें प्रजाओं की अभिलाषाएं पूरी करने वाला मानता हूं. (४) आ यद्वज्रं बाह्वोरिन्द्र धत्से मदच्युतमहये हन्तवा उ. प्र पर्वता अनवन्त प्र गावः प्र ब्रह्माणो अभिनक्षन्त इन्द्रम्.. (५) हे इंद्र! जिस समय तुम अपनी भुजाओं में शत्रु का गर्व नष्ट करने वाला तथा मेघ को मारने वाला वज्र धारण करते हो एवं जिस समय मेघ एवं उन में भरा हुआ जल गर्जन करता है, उस समय स्तोता इंद्र के समीप जाते हुए उनकी स्तुति करते हैं. (५) तमु ष्टवाम य इमा जजान विश्वा जातान्यवराण्येस्मात्. इन्द्रेण मित्रं दिधिषेम गीर्भिरुपो नमोभिर्वृषभं विशेम.. (६) हम उस इंद्र की स्तुति करते हैं, जिसने इन सब जीवों को उत्पन्न किया है एवं सभी वस्तुएं जिनके बाद पैदा हुई हैं. हम उन्हीं इंद्र के साथ मित्रता करेंगे एवं स्तुतियों तथा नमस्कारों द्वारा अभिलाषापूरक इंद्र के सामने आएंगे. (६) वृत्रस्य त्वा श्वसथादीषमाणा विश्वे देवा अजहुर्ये सखायः. मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! जो विश्वेदेव तुम्हारे मित्र थे, उन्होंने वृत्र असुर की सांस से भयभीत होकर तुम्हें छोड़ दिया था. उस समय मरुतों के साथ तुम्हारी मित्रता स्थापित हुई उसके बाद तुमने सभी शत्रुसेनाओं को जीत लिया. (७) त्रिः षष्टिस्त्वा मरुतो वावृधाना उस्रा इव राशयो यज्ञियासः. उप त्वेमः कृधि नो भागधेयं शुष्मं त एना हविषा विधेम.. (८) हे इंद्र! तिरसठ यज्ञयोग्य मरुतों ने गायों के समान झुंड बनाकर तुम्हें बढ़ाया था. हम तुम्हारे समीप आते हैं. तुम हमें उपभोग के योग्य अन्न दो. हम अपने हव्य द्वारा तुम्हारा बल बढ़ावेंगे. (८) तिग्ममायुधं मरुतामनीकं कस्त इन्द्र प्रति वज्रं दधर्ष. अनायुधासो असुरा अदेवाश्चक्रेण ताँ अप वप ऋजीषिन्.. (९) हे इंद्र! तुम्हारा आयुध तेज है और मरुतों की सेना तुम्हारे साथ है. कौन तुम्हारे वज्र के प्रतिकूल आचरण कर सकता है? हे सोम पीने वाले इंद्र! तुम अपने चक्र द्वारा आयुधहीन एवं देवद्वेषी असुरों को दूर भगाओ. (९) मह उग्राय तवसे सुवृक्तिं प्रेरय शिवतमाय पश्वः. गिर्वाहसे गिर इन्द्राय पूर्वीर्धेहि तन्वे कुविदङ्ग वेदत् .. (१०) हे स्तोता! मुझे पशु प्रदान करने के लिए महान्, शक्तिशाली, उन्नत एवं परम कल्याणकारी इंद्र की शोभन स्तुति करो. स्तुति के योग्य इंद्र के लिए तुम बहुत सी स्तुतियां करो. इंद्र हमारे पुत्रों के लिए बहुत धन दें. (१०) उक्थवाहसे विभ्वे मनीषा दृणा न पारमीरया नदीनाम्. नि स्पृश धिया तन्वि श्रुतस्य जुष्टतरस्य कुविदङ्ग वेदत्.. (११) हे स्तोता! जिस प्रकार नाविक नाव द्वारा यात्रियों को पार पहुंचाता है, उसी प्रकार तुम मंत्रों द्वारा प्राप्त होने योग्य एवं महान् इंद्र के पास स्तुतियां भेजो. अपनी स्तुति द्वारा प्रसिद्ध एवं अतिशय प्रसन्नतादायक इंद्र को हमारे पास पहुंचाओ. इंद्र हमारी संतान के लिए बहुत धन दें. (११) तद्विविद्धि यत्त इन्द्रो जुजोषत्स्तुहि सुष्टुतिं नमसा विवास. उप भूष जरितर्मा रुवण्यः रावया वाचं कुविदङ्ग वेदत्.. (१२) हे ऋत्विज्! इंद्र जो चाहते हैं, तुम वही करो. हे स्तोता! शोभन स्तुति करने वाले इंद्र की स्तुति करो एवं नमस्कार द्वारा उनकी सेवा करो. तुम अपने को अलंकृत करो. रोओ मत. इंद्र को अपना स्तुतिवचन सुनाओ. इंद्र तुम्हें बहुत धन दें. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः. आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त .. (१३) शीघ्रगति वाला एवं दस हजार सेनाओं को साथ लेकर चलने वाला कृष्ण नामक असुर अंशुमती नदी के किनारे रहता था. इंद्र ने उस चिल्लाने वाले असुर को अपनी बुद्धि से खोजा एवं मानव-हित के लिए उसकी वधकारिणी सेनाओं का नाश किया. (१३) द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः. नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृष्णो युध्यताजौ.. (१४) इंद्र ने कहा— “मैंने अंशुमती नदी के किनारे गुफा में घूमने वाले कृष्ण असुर को देखा है. वह दीप्तिशाली सूर्य के समान जल में स्थित है. हे अभिलाषापूरक मरुतो! मैं युद्ध के लिए तुम्हें चाहता हूं. तुम युद्ध में उसे मारो.” (१४) अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः. विशो अदेवीर्अभ्या३ चरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे.. (१५) तेज चलने वाला कृष्ण असुर अंशुमती नदी के किनारे दीप्तिशाली बनकर रहता था। इंद्र ने बृहस्पति की सहायता से काली एवं आक्रमण हेतु आती हुई सेनाओं का वध किया. (१५) त्वं ह त्यत्सप्तभ्यो जायमानोऽशत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र. गूह्ळे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्भ्यो भुवनेभ्यो रणं धाः.. (१६) हे इंद्र! वह कार्य तुम्हीं ने किया था. तुम्हीं जन्म लेकर सात शत्रुओं को नष्ट करने वाले बने थे. तुमने अंधकारपूर्ण द्यावा-पृथिवी को प्राप्त किया था. तुमने महान् भवनों के लिए आनंद दिया था. (१६) त्वं ह त्यदप्रतिमानमोजो वज्रेण वज्रिन्धृषितो जघन्थ. त्वं शुष्णस्यावातिरो वधत्रैस्त्वं गा इन्द्र शच्येदाविन्दः.. (१७) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने वह कार्य किया है. तुमने अद्वितीय योद्धा बनकर अपने वज्र से शुष्ण का बल नष्ट किया था. तुमने अपने आयुधों से राजर्षि कुत्स के कल्याण के लिए कृष्ण असुर को नीचे की ओर मुंह करके मारा था तथा अपनी शक्ति से शत्रुओं की गाएं प्राप्त की थीं. (१७) त्वं ह त्यद्वृषभ चर्षणीनां घनो वृत्राणां तविषो बभूथ. त्वं सिन्धूँरसृजस्तस्तभानान् त्वमपो अजयो दासपत्नीः.. (१८) हे इंद्र! तुमने वह कार्य किया है. हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम मनुष्यों के भावी उपद्रवों ebook converter DEMO Watermarks*