ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
अधिकार, राष्ट्र, आशीर्वाद, अविचल, ध्रुव रूप, भक्त १-६ १७४. राजा की स्तुति १-५ राज्यप्राप्ति, द्वेषी व दानरहित, आश्रय, यज्ञ, स्वामी १-५ १७५. सोमरस निचोड़ने में सहायक पत्थर की स्तुति १-४ कर्म, ओषधितुल्य, प्रयोग, यजमान १-४ १७६. ऋभुगण एवं अग्नि का वर्णन १-४ दुग्धपान, दिव्य स्तोत्र, हव्यवाहक, आयुवृद्धि १-४ १७७. माया का वर्णन १-३ जीवात्मारूपी पक्षी, रक्षक वाणी, सूर्य १-३ १७८. गरुड़ का वर्णन १-३ बुलाना, द्यावा-पृथिवी, विस्तार १-३ १७९. इंद्र की स्तुति व वर्णन १-३ भाग, उपासना, दानी १-३ १८०. इंद्र की स्तुति १-३ धन मांगना, आना, तेजसहित जन्म १-३ १८१. विभिन्न विषयों का वर्णन १-३ पृथु, सुप्रथ, सुरक्षित, साममंत्र लाना, प्राप्ति १-३ १८२. बृहस्पति एवं अग्नि से रक्षा हेतु प्रार्थना १-३ शत्रुनाशार्थ प्रार्थना, दुर्बुद्धि, अमंगल नाश हेतु प्रार्थना १-३ १८३. यजमान, यजमानपत्नी व उसके गर्भ की रक्षा हेतु प्रार्थना १-३ पुत्र व गर्भाधान की कामना, जन्म देना १-३ १८४. गर्भ की सुरक्षा हेतु प्रार्थना १-३ भाग, गर्भधारण हेतु प्रार्थना, आह्वान १-३ ebook converter DEMO Watermarks*
१८५. आदित्य व वरुण से जीवन रक्षा हेतु प्रार्थना १-३ रक्षार्थ प्रार्थना, दबाना असंभव, ज्योति देना १-३ १८६. जीवन को अमृतमय बनाने की वरुण से प्रार्थना १-३ दीर्घायु हेतु प्रार्थना, यज्ञ का आग्रह, अमृत याचना १-३ १८७. अग्नि से शत्रुओं से बचाने की प्रार्थना १-५ स्तुति, आना, रक्षा याचना, एक-एक कर देखना, रक्षार्थ प्रार्थना १-५ १८८. अग्नि से प्रार्थना १-३ ज्ञानी, स्तुति, रक्षा की प्रार्थना १-३ १८९. सूर्य की महिमा का वर्णन १-३ जाना, व्याप्त करना, शोभा पाना १-३ १९०. सृष्टिक्रम की उत्पत्ति का वर्णन १-३ तप से यज्ञ, सत्य, रात-दिन की उत्पत्ति, सागर, सवंत्सर, सूर्य, चंद्रमा, द्युलोक, पृथिवी व अंतरिक्ष की सृष्टि १-३ १९१. अग्नि से कल्याण एवं धन की प्रार्थना १-४ धन याचना, मिलकर भोगने का आग्रह, अभिमंत्रित करना, संगठित रहने का आग्रह १-४ ebook converter DEMO Watermarks*
प्रथम मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्. होतारं रत्नधातमम्.. (१) मैं अग्नि की स्तुति करता हूं. वे यज्ञ के पुरोहित, दानादि गुणों से युक्त, यज्ञ में देवों को बुलाने वाले एवं यज्ञ के फल रूपी रत्नों को धारण करने वाले हैं. (१) अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत. स देवाँ एह वक्षति.. (२) प्राचीन ऋषियों ने अग्नि की स्तुति की थी. वर्तमान ऋषि भी उनकी स्तुति करते हैं. वे अग्नि इस यज्ञ में देवों को बुलावें. (२) अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे. यशसं वीरवत्तमम्.. (३) अग्नि की कृपा से यजमान को धन मिलता है. उन्हीं की कृपा से वह धन दिनदिन बढ़ता है. उस धन से यजमान यश प्राप्त करता है एवं अनेक वीर पुरुषों को अपने यहां रखता है. (३) अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि. स इद्देवेषु गच्छति.. (४) हे अग्नि! जिस यज्ञ की तुम चारों ओर से रक्षा करते हो, उस में राक्षस आदि हिंसा नहीं कर सकते. वही यज्ञ देवताओं को तृप्ति देने स्वर्ग जाता है. (४) अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः. देवो देवेभिरा गमत्.. (५) हे अग्नि देव! तुम दूसरे देवों के साथ इस यज्ञ में आओ. तुम यज्ञ के होता, बुद्धिसंपन्न, सत्यशील एवं परमकीर्ति वाले हो. (५) यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि. तवेत्तत् सत्यमङ्गिरः.. (६) हे अग्नि! तुम यज्ञ में हवि देने वाले यजमान का जो कल्याण करते हो, वह वास्तव में तुम्हारी ही प्रसन्नता का साधन बनता है. (६) उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धिया वयम्. नमो भरन्त एमसि.. (७)
हे अग्नि! हम सच्चे हृदय से तुम्हें रात-दिन नमस्कार करते हैं और प्रतिदिन तुम्हारे समीप आते हैं. (७) राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम्. वर्धमानं स्वे दमे.. (८) हे अग्नि! तुम प्रकाशवान्, यज्ञ की रचना करने वाले और कर्मफल के द्योतक हो. तुम यज्ञशाला में बढ़ने वाले हो. (८) स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव. सचस्वा नः स्वस्तये.. (९) हे अग्नि! जिस प्रकार पुत्र पिता को सरलता से पा लेता है, उसी प्रकार हम भी तुम्हें सहज ही प्राप्त कर सकें. तुम हमारा कल्याण करने के लिए हमारे समीप निवास करो. (९) सूक्त—२ देवता—वायु आदि वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः. तेषां पाहि श्रुधी हवम्.. (१) हे दर्शनीय वायु! आओ, यह सोमरस तैयार है, इसे पिओ. हम सोमपान के लिए तुम्हें बुला रहे हैं. तुम हमारी यह पुकार सुनो. (१) वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः. सुतसोमा अहर्विदः.. (२) हे वायु! अग्निष्टोम आदि यज्ञों के ज्ञाता ऋत्विज् तथा यजमान आदि हम संस्कार द्वारा शुद्ध सोमरस के साथ तुम्हारी स्तुति करते हैं. (२) वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे. उरूची सोमपीतये.. (३) हे वायु! तुम सोमरस की प्रशंसा करते हुए उसे पीने की जो बात कहते हो, वह बहुत से यजमानों के पास तक जाती है. (३) इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतं. इन्दवो वामुशन्ति हि.. (४) हे इंद्र और वायु! तुम दोनों हमें देने के लिए अन्न लेकर आओ. सोमरस तैयार है और तुम दोनों की अभिलाषा कर रहा है. (४) वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू. तावा यातमुप द्रवत.. (५) हे वायु और इंद्र! तुम दोनों यह जान लो कि सोमरस तैयार है. तुम दोनों अन्नयुक्त द्रव्य में रहने वाले हो. तुम दोनों शीघ्र ही यज्ञ के समीप आओ. (५) वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्. मक्ष्वित्था धिया नरा.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे वायु और इंद्र! सोमरस देने वाले यजमान ने जो सोमरस तैयार किया है, तुम दोनों उसके समीप आओ. हे दोनों देवो! तुम्हारे आने से यह यज्ञकर्म शीघ्र पूरा हो जाएगा. (६) मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्. धियं घृताचीं साधन्ता.. (७) मैं पवित्र बल वाले मित्र तथा हिंसकों का नाश करने वाले वरुण का यज्ञ में आह्वान करता हूं. ये दोनों धरती पर जल लाने का काम करते हैं. (७) ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा. क्रतुं बृहन्तमाशाथे.. (८) हे मित्र और वरुण! तुम दोनों यज्ञ के वर्धक और यज्ञ का स्पर्श करने वाले हो. तुम लोग हमें यज्ञ का फल देने के लिए इस विशाल यज्ञ को व्याप्त किए हुए हो. (८) कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया. दक्षं दधाते अपसम्.. (९) मित्र और वरुण बुद्धिमान् लोगों का कल्याण करने वाले और अनेक लोगों के आश्रय हैं. ये हमारे बल और कर्म की रक्षा करें. (९) सूक्त—३ देवता—अश्विनीकुमार अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत्पाणी शुभस्पती. पुरुभुजा चनस्यतम्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी भुजाएं विस्तीर्ण एवं हवि ग्रहण करने के लिए चंचल हैं. तुम शुभ कर्म के पालक हो. तुम दोनों यज्ञ का अन्न ग्रहण करो. (१) अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया. धिष्ण्या वनतं गिर:.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम अनेक कर्म वाले, नेता और बुद्धिमान् हो. तुम दोनों आदरपूर्ण बुद्धि से हमारी स्तुति सुनो. (२) दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः. आ यातं रुद्रवर्तनी.. (३) हे शत्रु विनाशक, सत्यभाषी और शत्रुओं को रुलाने वाले अश्विनीकुमारो! सोमरस तैयार करके बिछे हुए कुशों पर रख दिया गया है. तुम इस यज्ञ में आओ. (३) इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः. अण्वीभिस्तना पूतासः.. (४) हे विचित्र प्रकाश वाले इंद्र! ऋषियों की उंगलियों द्वारा निचोड़ा गया, नित्य शुद्ध यह सोमरस तुम्हारी इच्छा कर रहा है. तुम इस यज्ञ में आओ. (४) इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः. उप ब्रह्माणि वाघतः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम हमारी भक्ति से आकर्षित होकर इस यज्ञ में आओ. ब्राह्मण तुम्हारा आह्वान कर रहे हैं. तुम सोमरस लिए हुए वाघत नामक पुरोहित की प्रार्थना सुनने के लिए आओ. (५) इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः. सुते दधिष्व नश्चनः.. (६) हे अश्व के स्वामी इंद्र! तुम हमारी प्रार्थना सुनने के लिए शीघ्र आओ और सोमरस से युक्त इस यज्ञ में हमारा अन्न स्वीकार करो. (६) ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आ गत. दाश्वांसो दाशुषः सुतम्.. (७) हे विश्वेदेवगण! तुम मनुष्यों के रक्षक एवं पालन करने वाले हो. हव्यदाता यजमान ने सोमरस तैयार कर लिया है, तुम इसे ग्रहण करने के लिए आओ. तुम लोगों को यज्ञ का फल देने वाले हो. (७) विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः. उस्रा इव स्वसराणि.. (८) हे वृष्टि करने वाले विश्वेदेवगण! जिस प्रकार सूर्य की किरणें बिना आलस्य के दिन में आती हैं, उसी प्रकार तुम तैयार सोमरस को पीने के लिए जल्दी आओ. (८) विश्वे देवासो अस्रिध एहिमायासो अद्रुहः. मेधं जुषन्त वह्नयः.. (९) विश्वेदेवगण नाशरहित, विस्तृत बुद्धि वाले तथा वैर से हीन हैं. वे इस यज्ञ में पधारें. (९) पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती. यज्ञं वष्टु धियावसुः.. (१०) देवी सरस्वती पवित्र करने वाली तथा अन्न एवं धन देने वाली हैं. वे धन साथ लेकर हमारे इस यज्ञ में आएं. (१०) चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्. यज्ञं दधे सरस्वती.. (११) सरस्वती सत्य बोलने की प्रेरणा देने वाली हैं तथा उत्तम बुद्धि वाले लोगों को शिक्षा देती हैं. वे हमारा यह यज्ञ स्वीकार कर चुकी हैं. (११) महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना. धियो विश्वा वि राजति.. (१२) सरस्वती नदी ने प्रवाहित होकर विशाल जलराशि उत्पन्न की है. साथ ही यज्ञ करने वाले लोगों में उन्होंने ज्ञान भी जगाया है. (१२) सूक्त—४ देवता—इंद्र सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे. जुहूमसि द्यविद्यवि.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस प्रकार ग्वाला दूध दुहने के लिए गाय को बुलाता है, उसी प्रकार हम भी अपनी रक्षा के लिए सुंदर कर्म करने वाले इंद्र को प्रतिदिन बुलाते हैं. (१) उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब. गोदा इद्वेवतो मदः.. (२) हे सोमरस पीने वाले इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए हमारे त्रिषवण यज्ञ के पास आओ. तुम धन के स्वामी हो. तुम्हारी प्रसन्नता गाय देने का कारण बनती है. (२) अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्. मा नो अति ख्य आ गहि.. (३) हे इंद्र! हम सोमपान करने के पश्चात् तुम्हारे अत्यंत समीपवर्ती एवं शोभन-बुद्धि वाले लोगों के बीच रहकर तुम्हें जानें. तुम भी हमें छोड़कर दूसरों को दर्शन मत देना. तुम हमारे समीप आओ. (३) परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्. यस्ते सखिभ्य आ वरम्.. (४) हे यजमान! बुद्धिमान् एवं हिंसारहित इंद्र के पास जाकर मुझ बुद्धिमान् होता के विषय में पूछो. वे तुम्हारे मित्रों को उत्तम धन देते हैं. (४) उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत. दधाना इन्द्र इद्दुवः.. (५) सदा इंद्र की सेवा करने वाले हमारे पुरोहित इंद्र की स्तुति करें. इंद्र की निंदा करने वाले लोग इस देश के अतिरिक्त अन्य देशों से भी निकल जावें. (५) उत नः सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः. स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि.. (६) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम्हारी कृपा से शत्रु और मित्र दोनों हमें सुंदर धन वाला कहते हैं. हम इंद्र की कृपा से प्राप्त सुख से जीवन बितावें. (६) एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम्. पतयन्मन्दयत् सखम्.. (७) यह सोमरस तुरंत नशा करने वाला एवं यज्ञ की शोभा है. यह मनुष्यों को मस्त करने वाला, कार्यसाधक और आनंददाता इंद्र का मित्र है. यज्ञ में व्याप्त इंद्र को यह सोमरस दो. (७) अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः. प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (८) हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! इसी सोमरस को पीकर तुमने वृत्र आदि शत्रुओं का नाश किया था और युद्धक्षेत्र में अपने योद्धाओं की रक्षा की थी. (८) तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो. धनानामिन्द्र सातये.. (९) eBook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—५ देवता—इंद्र
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! तुम युद्ध में बलप्रदर्शन करने वाले हो. हम धन पाने के लिए तुम्हें यज्ञ में हवि देते हैं. (९) यो रायोऽवनिर्महान्त्सुपारः सुन्वतः सखा. तस्मा इन्द्राय गायत.. (१०) हे ऋत्विज्! जो इंद्र धन का रक्षक, गुणसंपन्न, सुंदर कार्यों को पूर्ण करने वाला तथा यजमान का मित्र है, उसी को प्रसन्न करने के लिए स्तुति करो. (१०) सूक्त—५ देवता—इंद्र आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत. सखायः स्तोमवाहसः.. (१) हे स्तुति करने वाले मित्रो! शीघ्र आओ और यहां बैठो. तुम लोग इंद्र की स्तुति करो. (१) पुरुतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्. इन्द्रं सोमे सचा सुते.. (२) सोमरस तैयार हो जाने पर सब लोग एकत्र हो जाओ और शत्रुओं का नाश करने वाले एवं श्रेष्ठ धनों के स्वामी इंद्र की स्तुति करो. (२) स घा नो योग आ भुवत् स राये स पुरन्ध्याम्. गमद् वाजेभिरा स नः.. (३) वह ही इंद्र हमारे अभावों को पूरा करें, हमें धन दें, अनेक प्रकार की बुद्धि प्रदान करें और भांति-भांति के अन्न लेकर हमारे पास आवें. (३) यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रवः. तस्मा इन्द्राय गायत.. (४) युद्ध में जिस इंद्र के घोड़ों सहित रथ को देखकर शत्रु भाग जाते हैं, उन्हीं इंद्र की स्तुति करो. (४) सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये. सोमासो दध्याशिरः.. (५) यह पवित्र और विशुद्ध सोमरस यज्ञ में सोमपान करने वाले के समीप पीने हेतु अपने आप पहुंच जाता है. (५) त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः. इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो.. (६) हे सुंदर कर्म करने वाले इंद्र! तुम सभी देवों में बड़े होने के कारण सोमपान करने के लिए सबसे अधिक उत्साहित रहते हो. (६) आ त्वा विशन्त्वाशवः सोमास इन्द्र गिर्वणः. शं ते सन्तु प्रचेतसे.. (७) हे स्तुतियों के लक्ष्य इंद्र! तीनों सवन नामक यज्ञों में व्याप्त सोमरस तुम्हें मिले. यह सोम ebook converter DEMO Watermarks*
उच्चज्ञान की प्राप्ति में तुम्हारा सहायक एवं कल्याणकारी प्राप्त हो. (७) त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो. त्वां वर्धन्तु नो गिर:... (८) हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! ऋग्वेद के मंत्रों एवं सोम-संबंधी मंत्रों ने तुम्हारी प्रशंसा की है. हमारी स्तुतियां भी तुम्हारी प्रतिष्ठा बढ़ावें. (८) अक्षितोति: सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्रिणम्. यस्मिन् विश्वानि पौंस्या.. (९) रक्षा में सदा तत्पर रहने वाले इंद्र इस हजार संख्या वाले सोम रूपी अन्न को ग्रहण करें. इसी में समस्त शक्तियां रहती हैं. (९) मा नो मर्ता अभि द्रुहन् तनूनामिन्द्र गिर्वणः. ईशानो यवया वधम्.. (१०) हे स्तुति करने के योग्य इंद्र! तुम शक्तिशाली हो. तुम ऐसी कृपा करना कि हमारे शत्रु हमारे शरीर पर चोट न कर सकें. तुम उन्हें हमारा वध करने से रोकना. (१०) सूक्त—६ देवता—इंद्र एवं मरुद्गण युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः. रोचन्ते रोचना दिवि.. (१) जो इंद्र तेजस्वी सूर्य के रूप में, अहिंसक अग्नि के रूप में तथा सर्वत्र गतिशील वायु के रूप में स्थित हैं, सब लोकों में निवास करने वाले प्राणी उन्हीं इंद्र से संबंध रखते हैं. उन्हीं इंद्र की मूर्ति आकाश में नक्षत्रों के रूप में चमकती है. (१) युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे. शोणा धृष्णू नृवाहसा.. (२) सारथि उन इंद्र के रथ में हरि नाम के सुंदर, रथ के दोनों ओर जोड़ने योग्य, लाल रंग के और शक्तिशाली दो घोड़ों को जोड़ते हैं. वे घोड़े इंद्र एवं उनके सारथि को ढोने में समर्थ हैं. (२) केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे. समुषद्भिरजायथा:... (३) हे मनुष्यो! यह आश्चर्य देखो कि यह इंद्र रात को बेहोश प्राणियों को प्रातः होश में लाते हुए और रात में अंधकार के कारण रूपहीन पदार्थों को प्रातः रूप प्रदान करते हुए सूर्य रूप में किरणें बिखेरते हैं. (३) आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे. दधाना नाम यज्ञियम्.. (४) इसके पश्चात् मरुद्गण ने यज्ञ के योग्य नाम धारण करके अपने प्रतिवर्ष के नियम के अनुसार बादलों में जलरूपी गर्भ को प्रेरित किया है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
वीळु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः. अविन्द उस्रिया अनु.. (५) हे इंद्र! तुमने मरुद्गण के साथ मिलकर गुफा में छिपाई हुई गायों को खोजकर वहां से निकाला. वे मरुद्गण दृढ़ स्थान को भी भेदन करने एवं एक स्थान की वस्तु को दूसरी जगह में ले जाने में समर्थ हैं. (५) देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद्वसुं गिरः. महामनूषत श्रुतम्.. (६) स्तुति करने वाले लोग स्वयं देवभाव प्राप्त करने की इच्छा से धन के स्वामी, शक्तिशाली एवं विख्यात मरुद्गण को लक्ष्य करके उसी प्रकार स्तुति कर रहे हैं, जिस प्रकार वे इंद्र की स्तुति करते हैं. (६) इन्द्रेण सं हि दृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा. मन्दू समानवर्चसा.. (७) हे मरुद्गण! भयरहित इंद्र के साथ तुम्हारी बहुत घनिष्ठता देखी जाती है. तुम दोनों नित्य प्रसन्न और समान तेज वाले हो. (७) अनवद्यैरभिद्युभिर्मखः सहस्वदर्चति. गणैरिन्द्रस्य काम्यैः.. (८) यह यज्ञ दोषरहित, देवलोक में निवास करने वाले तथा फल देने के कारण कामना करने योग्य मरुद्गण के साथ होने के कारण इंद्र को बलवान् समझकर पूजा-अर्चना करता है. (८) अतः परिज्मन्ना गहि दिवो वा रोचनादधि. समस्मिन्नृञ्जते गिरः.. (९) हे चारों ओर व्यापक मरुद्गण! तुम द्युलोक, आकाश या दीप्त सूर्य मंडल से इस यज्ञ में आओ. पुरोहित-समूह इस यज्ञ में तुम्हारी भली प्रकार स्तुति कर रहा है. (९) इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि. इन्द्रं महो वा रजसः.. (१०) हम इंद्र देव की प्रार्थना इसीलिए करते हैं कि वे पृथ्वीलोक, आकाश या वायुलोक से हमें धन प्रदान करते हैं. (१०) सूक्त—७ देवता—इंद्र इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (१) सामवेद का गान करने वालों ने सामगान के द्वारा, ऋग्वेद का पाठ करने वालों ने ऋचाओं द्वारा और यजुर्वेद का पाठ करने वालों ने मंत्रों द्वारा इंद्र की स्तुति की है. (१) इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
वज्र धारण करने वाले एवं सर्वाभरणभूषित इंद्र अपने आज्ञाकारी दोनों घोड़ों को अत्यंत शीघ्र रथ में जोतकर सबके साथ मिल जाते हैं. (२) इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (३) इंद्र ने मनुष्यों को निरंतर देखने के लिए सूर्य को आकाश में स्थापित किया है. सूर्य अपनी किरणों द्वारा पर्वत आदि समस्त संसार को प्रकाशित कर रहे हैं. (३) इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (४) हे शत्रुओं द्वारा न हारने वाले इंद्र! अपनी अमोघ रक्षण शक्ति के द्वारा ऐसे महायुद्धों में हमारी रक्षा करो जो हजारों गजों, अश्वों आदि का लाभ देने वाले हों. (४) इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे. युजं वृत्रेषु वज्रिणम्.. (५) इंद्र हमारी सहायता करने वाले तथा धन-लाभ का विरोध करने वाले हमारे शत्रुओं के लिए वज्रधारी हैं. हम स्वल्प अथवा विपुल धन पाने के लिए हम इंद्र का आह्वान करते हैं. (५) स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृधि. अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः.. (६) हे इंद्र! तुम हमारे लिए इच्छित फल देने वाले तथा वृष्टि प्रदान करने वाले हो. तुम हमारे लाभ के लिए उस मेघ का मर्दन करो. तुमने कभी भी हमारी प्रार्थना अस्वीकार नहीं की है. (६) तुञ्जेतुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः. न विन्धे अस्य सुष्टुतिम्.. (७) भिन्न-भिन्न फल देने वाले देवताओं के लिए जिन उत्तम स्तुतियों का प्रयोग किया जाता है, वे सब वज्र धारण करने वाले इंद्र के लिए हैं. इंद्र के अनुरूप स्तुति को मैं नहीं जानता. (७) वृषा यूथेव वंशगः कृष्टीरियर्त्योजसा. ईशानो अप्रतिष्कुतः.. (८) जिस प्रकार तेज चाल वाला बैल धेनु समूह को अपने बल से अनुगृहीत करता है, उसी प्रकार इच्छाओं को पूरा करने वाले इंद्र मनुष्यों को शक्तिशाली बनाते हैं. इंद्र समर्थ हैं एवं किसी की प्रार्थना को ठुकराते नहीं हैं. (८) य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति. इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम्.. (९) इंद्र समस्त मानवों, संपत्तियों और पंच-क्षितियों पर निवास करने वाले वर्णों पर शासन करने वाले हैं. (९) इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः. अस्माकमस्तु केवलः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—८ देवता—इंद्र
हे ऋत्विजो! और यजमानो! हम सर्वश्रेष्ठ इंद्र का आह्वान तुम्हारे कल्याण के निमित्त करते हैं. इंद्र केवल हमारे हैं. (१०) सूक्त—८ देवता—इंद्र एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम्. वर्षिष्ठमूतये भर.. (१) हे इंद्र! हमारी रक्षा के लिए ऐसा धन दो जो हमारे भोग के योग्य, शत्रुओं को विजय करने में सहायक तथा शत्रुओं की हार का कारण बने. (१) नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै. त्वोतासो न्यर्वता.. (२) उस धन से एकत्र किए गए योद्धाओं के मुक्के की चोट से हम शत्रु को रोक देंगे. तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर हम घोड़ों की सहायता से शत्रुओं को दूर भगाएंगे. (२) इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रं घना ददीमहि. जयेम सं युधि स्पृधः.. (३) हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर हम अत्यंत दृढ़ वज्र को धारण करके अपने से द्वेष करने वाले शत्रुओं को पराजित करेंगे. (३) वयं शूरैर्भिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम्. सासह्वाम पृतन्यतः.. (४) हे इंद्र! हम तुम्हारी सहायता पाकर अपने शस्त्रधारी सैनिकों को लेकर शत्रु सेना को जीत सकेंगे. (४) महाँ इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे. द्यौर्न प्रथिना शवः.. (५) इंद्र देव शरीर से बलिष्ठ एवं गुणों से युक्त होने के कारण महान् हैं. वज्रधारी इंद्र को पूर्वोक्त महत्त्व प्राप्त हो. इंद्र की सेना आकाश के समान विस्तृत हो. (५) समोहे वा य आशत नरस्तोकस्य सनितौ. विप्रासो वा धियायवः.. (६) जो वीर पुरुष युद्धक्षेत्र में जाने वाले हैं, पुत्र पाने की इच्छा रखते हैं अथवा जो बुद्धिमान् ज्ञान की अभिलाषा रखते हैं, वे सब इंद्र की कृपा से सिद्धि प्राप्त करें. (६) यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्र इव पिन्वते. उर्वीरापो न काकुदः.. (७) इंद्र का जो उदर सोमरस पीने के लिए सदा तत्पर रहता है, वह समुद्र के समान विस्तृत है. जिस प्रकार जीभ का पानी कभी नहीं सूखता, उसी प्रकार इंद्र के उदर में स्थित सोमरस भी कभी नहीं सूखता. (७) eBook converter DEMO Watermarks*
एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (८) इंद्र के मुख से निकली हुई वाणी सत्य, विविध विशेषताओं से युक्त, महती एवं गौएं देने वाली है. यज्ञ में हव्य देने वाले यजमान के लिए तो इंद्र की वाणी पके हुए फलों से लदी डाली के समान है. (८) एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (९) हे इंद्र! तुम्हारी विभूतियां हव्य प्रदान करने वाले हमारे समान यजमान की रक्षा करने वाली एवं शीघ्र फल देने वाली हैं. (९) एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (१०) सोमपान करने वाले इंद्र के लिए सामवेद एवं ऋग्वेद के मंत्र अभिलषित हैं. इंद्र सोमपान संबंधी मंत्रों की इच्छा करते हैं. (१०) सूक्त—९ देवता—इंद्र इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः. महाँ अभिष्टिरोजसा.. (१) हे इंद्र! इस यज्ञ में आकर सोमरस रूपी समस्त भोज्य पदार्थों से प्रसन्न बनो. इसके पश्चात् तुम परम शक्तिशाली बनकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो. (१) एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने. चक्रिं विश्वानि चक्रये.. (२) यदि आनंद देने वाला एवं कार्य संपादन की प्रेरणा करने वाला सोमरस तैयार हो तो उसे प्रसन्न एवं संपूर्ण कार्य सिद्ध करने वाले को भेंट करो. (२) मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे. सचैषु सवनेष्वा.. (३) हे सुंदर नासिका एवं ठोड़ी वाले तथा समस्त यजमानों द्वारा पूज्य इंद्र! तुम आनंद बढ़ाने वाली स्तुतियों से प्रसन्न होकर इस सवन नामक यज्ञ में पधारो. (३) असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत. अजोषा वृषभं पतिम्.. (४) हे इंद्र! मैंने तुम्हारी स्तुतियां की हैं. वे तुम्हारे समीप स्वर्ग में पहुंच गई हैं. तुमने उन स्तुतियों को स्वीकार कर लिया है. तुम मनचाही वर्षा करने वाले एवं यजमान के रक्षक हो. (४) सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम्. असदित्ते विभु प्रभु.. (५) eBook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! श्रेष्ठ एवं विविध प्रकार का धन हमारे पास भेजो. हमारे भोग के लिए पर्याप्त एवं अधिक धन तुम्हारे ही पास है. (५) अस्मान्त्सु तत्र चोदयेंद्र राये रभस्वतः. तुविद्युम्न यशस्वतः.. (६) हे अधिक संपत्ति वाले इंद्र! धन की सिद्धि के लिए हमें यज्ञ रूपी कर्म की प्रेरणा दो. हम उद्योगशील एवं कीर्ति वाले हों. (६) सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत्. विश्वायुर्धेह्यक्षितम्.. (७) हे इंद्र! हमें गायों एवं अन्न के साथ-साथ अधिक मात्रा में धन दो. यह धन इतना विस्तृत हो कि समस्त आयु भर खर्च होने पर भी समाप्त न हो. (७) अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युम्नं सहस्रसातमम्. इन्द्र ता रथिनीरिषः.. (८) हे इंद्र! हमें विशाल यश, अनेक रथों में भरा हुआ अन्न एवं ऐसा धन दो, जिससे हम हजारों की संख्या में दान कर सकें. (८) वसोरिन्द्रं वसुपतिं गीर्भिर्गृणन्त ऋग्मियम्. होम गन्तारमूतये.. (९) अपने धन की रक्षा करने के लिए हम स्तुतियों द्वारा इंद्र को बुलाते हैं. इंद्र धन के रक्षक, ऋचाओं से प्रेम करने वाले एवं यज्ञस्थान में गमन करने वाले हैं. (९) सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरिः. इन्द्राय शूषमर्चति.. (१०) सब यजमान प्रत्येक यज्ञ में इंद्र के महान् पराक्रम की प्रशंसा करते हैं. इंद्र यज्ञ में सदा निवास करने वाले एवं शक्तिसंपन्न हैं. (१०) सूक्त—१० देवता—इंद्र गायन्ति त्वा गायत्रिणो ऽर्चन्त्यर्कमर्किणः. ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे.. (१) हे शतक्रतु इंद्र! उद्गाता तुम्हारी स्तुति करते हैं. पूजार्थक मंत्र बोलने वाले होता पूजा के योग्य इंद्र की अर्चना करते हैं. जिस प्रकार बांस के ऊपर नाचने वाले कलाकार बांस को ऊपर उठाते हैं, उसी प्रकार स्तुति करने वाले ब्राह्मण तुम्हारी उन्नति करते हैं. (१) यत्सानोः सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कृत्वम्. तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति.. (२) जब यजमान सोमलता खोजने के लिए एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर जाता है और ebook converter DEMO Watermarks*
सोमयाग रूप अनेक कर्म आरंभ करता है, तब इंद्र उसका प्रयोजन जानते हैं तथा यजमान की इच्छानुसार वर्षा करने के लिए मरुद्गण के साथ यज्ञस्थान में आने की तैयारी करते हैं. (२) युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा. अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर.. (३) हे सोमपानकर्त्ता इंद्र! अपने केशर वाले, युवा एवं पुष्ट शरीर वाले घोड़ों को रथ में जोड़ो. इसके पश्चात् हमारी स्तुतियां सुनने के लिए समीप आओ. (३) एहि स्तोमाँ अभि स्वराभि गृणीह्या रुव. ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञं च वर्धय.. (४) हे सर्वव्यापक इंद्र! इस यज्ञ में आओ. उद्गाता द्वारा की हुई स्तुति की प्रशंसा करो, अध्वर्यु की स्तुतियों का समर्थन करो और अपने शब्दों से सबको आनंद दो. इसके पश्चात् हमारे अन्न के साथ-साथ इस यज्ञ को भी बढ़ाओ. (४) उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे. शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत् सख्येषु च.. (५) अगणित शत्रुओं को रोकने वाले इंद्र के लिए गाए गए गीत वृद्धि पाते रहें. इन गीतों के कारण शक्तिशाली इंद्र हमारे पुत्रों एवं मित्रों के मध्य महान् शब्द करें. (५) तमित् सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये. स शक्र उत नः शकदिन्द्रो वसु दयमानः.. (६) हम लोग मैत्री, धन और शक्ति पाने के लिए इंद्र के समीप जाते हैं. बलशाली इंद्र हमें धन प्रदान करके हमारी रक्षा करते हैं. (६) सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः. गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः.. (७) हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ अन्न सर्वत्र फैला हुआ और सुविधापूर्वक मिलने वाला है. हे वज्र धारण करने वाले इंद्र! दूध, घी आदि रस के लाभ के लिए गोशाला का द्वार खोलो और हमें धन प्रदान करो. (७) नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः. जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि.. (८) हे इंद्र! जिस समय तुम शत्रु का वध करते हो, उस समय धरती और आकाश दोनों में ebook converter DEMO Watermarks*
तुम्हारी महिमा नहीं समाती. तुम आकाश से जल की वर्षा करो और हमारे लिए गाएं दो. (८) आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवं नू चिद्दधिष्व मे गिरः. इन्द्र स्तोममिमं मम कृष्वा युजश्चिदन्तरम्.. (९) हे इंद्र! तुम्हारे दोनों कान चारों ओर की बात सुनने वाले हैं, इसलिए हमारी पुकार जल्दी सुनो. हमारी स्तुतियों को अपने मन में स्थान दो. जिस प्रकार मित्र की बातें स्मरण रहती हैं, उसी प्रकार हमारी ये स्तुतियां भी अपने पास रखो. (९) विद्या हि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवनश्रुतम्. वृषन्तमस्य हूमह ऊतिं सहस्रसातमाम्.. (१०) हे इंद्र! हम तुम्हें जानते हैं कि तुम मनचाही वर्षा करते हो तथा युद्धस्थल में हमारी प्रार्थना सुनते हो. तुम समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हो. हम हजारों प्रकार के धन देने वाली तुम्हारी रक्षा का आह्वान करते हैं. (१०) आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब. नव्यमायुः प्र सू तिर कृधी सहस्रसामृषिम्.. (११) हे इंद्र! तुम हमारे पास शीघ्र आओ. हे कुशिक ऋषि के पुत्र! प्रसन्न होकर सोमपान करो, देवताओं द्वारा प्रशंसनीय यज्ञकर्म करने के लिए हमारा जीवन बढ़ाओ एवं मुझ ऋषि को हजारों धन वाला बनाओ. (११) परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः. वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः.. (१२) हे हमारी स्तुतियों के विषय इंद्र! हमारी ये स्तुतियां सब ओर से तुम्हारे पास पहुंचें. चिर आयु वाले तुम्हारा अनुगमन करके ये स्तुतियां वृद्धि प्राप्त करें. ये स्तुतियां तुम्हें संतुष्ट करके हमारे लिए प्रसन्नता प्रदान करें. (१२) सूक्त—११ देवता—इंद्र इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः. रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिं पतिम्.. (१) सागर के समान विस्तृत रथ के स्वामियों में श्रेष्ठ, अन्यों के स्वामी एवं सबके पालक इंद्र को हमारी स्तुतियों ने बढ़ाया था. (१) सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते. त्वामभि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे बल के स्वामी इंद्र! तुम्हारी मित्रता पाकर हम शक्तिशाली एवं निर्भय बनें. तुम अपराजित विजेता हो. हम तुम्हें नमस्कार करते हैं. (२) पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः. यदी वाजस्य गोमतः स्तोतृभ्यो मंहते मघम्.. (३) इंद्र द्वारा किए गए पुराकालीन दान प्रसिद्ध हैं. यदि वे स्तुतिकर्त्ताओं को गाययुक्त एवं शक्तिपूर्ण अन्न दान करें तो सब प्राणियों की रक्षा हो सकती है. (३) पुरां भिन्दुर्मुवा कविरमितौजा अजायत. इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्त्ता वज्री पुरुष्टुतः.. (४) इंद्र ने पुरभेदनकारी, युवा, अमित तेजस्वी, समस्त यज्ञों के धारणकर्त्ता, वज्रधारक एवं अनेक व्यक्तियों द्वारा स्तुत रूप में जन्म लिया. (४) त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम्. त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः.. (५) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने गायों का अपहरण करने वाले बल असुर की गुफा का द्वार खोल दिया था. बलासुर द्वारा सताए हुए देवों ने उस समय निडर होकर तुम्हें घेर लिया था. (५) तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन्. उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः.. (६) हे शूर इंद्र! निचोड़े हुए सोमरस के गुणों का वर्णन करता हुआ मैं तुम्हारे धनदानों से प्रभावित होकर वापस आया हूं. हे स्तुतिपात्र इंद्र! यज्ञकर्त्ता तुम्हारे समीप उपस्थित होने एवं तुम्हारी कार्यकुशलता को जानते थे. (६) मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः. विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर.. (७) हे इंद्र! तुमने छल द्वारा मायावी शुष्ण का नाश किया. इस बात को जो मेधावी लोग जानते हैं, तुम उनकी रक्षा करो. (७) इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत. सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः.. (८) शक्ति द्वारा विश्व के स्वामी बनने वाले की स्तुति प्रार्थियों ने की है. इंद्र के धन देने के ढंग हजारों अथवा हजारों से भी अधिक हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१२ देवता—अग्नि
सूक्त—१२ देवता—अग्नि अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (१) देवों के दूत एवं आह्वान करने वाले, समस्त संपत्तियों के अधिकारी एवं इस यज्ञ को सुंदरतापूर्वक पूर्ण कराने वाले अग्नि का हम वरण करते हैं. (१) अग्निमग्निं हवीमभिः सदा हवन्त विशपतिम्. हव्यवाहं पुरुप्रियम्.. (२) हम प्रजापालकर्त्ता, सदा हव्यवहन करने वाले एवं विश्व के प्रिय अग्नि को आवाहक मंत्रों द्वारा सदा बुलाते हैं. (२) अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे. असि होता न ईड्यः.. (३) हे काष्ठ से उत्पन्न अग्नि! यज्ञ में कुश बिछाने वाले यजमान के निमित्त देवों को बुलाओ, क्योंकि तुम हमारे स्तुत्य एवं होता हो. (३) ताँ उशतो वि बोधय यदग्ने यासि दूत्यम्. देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (४) हे अग्नि! तुम देवों का दूतकर्म करते हो, इसलिए हव्य की अभिलाषा करने वाले देवों को बुलाओ एवं उनके साथ बिछे हुए कुशों पर बैठो. (४) घृताहवन दीदिवः प्रति ष्म रिषतो दह. अग्ने त्वं रक्षस्विनः.. (५) हे घी द्वारा बुलाए गए तेजस्वी अग्नि! राक्षसों के सहयोगी बने हुए हमारे शत्रुओं को जला दो. (५) अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा. हव्यवाड् जुह्वास्यः.. (६) क्रांतदर्शी, गृहरक्षक, युवा, हव्यवाहक एवं जुहूमुख देवता अग्नि अग्नि से ही प्रज्वलित होते हैं. (६) कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे. देवममीवचातनम्.. (७) हे स्तोताओ! क्रांतदर्शी, सत्यशील, शत्रुनाशक एवं दिव्यगुणसंपन्न अग्नि के सामने आकर यज्ञ में उसकी स्तुति करो. (७) यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति. तस्य स्म प्राविता भव.. (८) हे अग्नि! क्योंकि तुम हव्य के स्वामी एवं देवों के दूत हो, इसलिए अपने सेवक यजमान के रक्षक बनो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
यो अग्निं देववीतये हविष्माँ आविवासति. तस्मै पावक मृळय.. (९) हे पावक! जो हव्य देने वाले तुम्हारी शरण में आकर इस इच्छा से तुम्हारी सेवा करते हैं कि उनका हव्य देवों को मिल सके, तुम उनकी रक्षा करो. (९) स नः पावक दीदिवोऽग्ने देवाँ इहा वह. उप यज्ञं हविश्च नः.. (१०) हे प्रदीप्त अग्नि! देवों को यहां यज्ञस्थल में लाओ एवं हमारा यज्ञ और हवि देवों के समीप ले जाओ. (१०) स नः स्तवान आ भर गायत्रेण नवीयसा. रयिं वीरवतीमिषम्.. (११) हे अग्नि! नवनिर्मित गायत्री छंद की स्तुति द्वारा प्रसन्न होकर हमें धन एवं संतानयुक्त अन्न दो. (११) अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः. इमं स्तोमं जुषस्व नः.. (१२) हे अग्नि! तुम कांतियुक्त एवं देवदूत के रूप में प्रसिद्ध हो. तुम हमारे इस स्तोत्र को स्वीकार करो. (१२) सूक्त—१३ देवता—अग्नि आदि सुसमिद्धो न आ वह देवाँ अग्ने हविष्मते. होतः पावक यक्षि च.. (१) हे भली प्रकार प्रज्वलित अग्नि! हमारे यजमान के कल्याण के लिए देवों को लाओ. हे देवों को बुलाने वाले पावक! हमारा यज्ञ पूरा करो. (१) मधुमन्तं तनूनपाद् यज्ञं देवेषु नः कवे. अद्या कृणुहि वीतये.. (२) हे क्रांतदर्शी एवं शरीररक्षक अग्नि! हमारे मधुयुक्त यज्ञ को उपभोग के निमित्त देवों के समीप ले जाओ. (२) नराशंसमिह प्रियमस्मिन् यज्ञ उप ह्वये. मधुजिह्वं हविष्कृतम्.. (३) मैं इस यज्ञ में प्रिय, मधुजिह्व, हव्य-संपादक एवं मनुष्यों द्वारा प्रशंसित अग्नि को बुलाता हूं. (३) अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईळित आ वह. असि होता मनुर्हितः.. (४) हे मानवों द्वारा प्रशंसित अग्नि! अपने परम सुखद रथ पर देवों को यहां ले आओ. तुम मानव हितकारी एवं देवों को बुलाने वाले हो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
स्तृणीत बर्हिरानुषग् घृतपृष्ठं मनीषिणः. यत्रामृतस्य चक्षणम्.. (५) हे मनीषियो! घी से चिकने कुशों को एक-दूसरे से मिलाकर बिछाओ. उस पर अमृत रखा जाएगा. (५) वि श्रयन्तामृतावधो द्वारो देवीरसश्चतः. अद्या नूनं च यष्टवे.. (६) यज्ञ पूरा करने के लिए आज निश्चय ही तेजस्वी एवं जनरहित द्वार खोले जावें. वे बंद न रहें. (६) नक्तोषासा सुपेशसास्मिन् यज्ञ उप ह्वये. इदं नो बर्हिरासदे.. (७) मैं बिछे हुए कुशों पर बैठने के लिए सुंदर रात और उषा को इस यज्ञ में बुलाता हूं. (७) ता सुजिह्वा उप ह्वये होतारा दैव्या कवी. यज्ञं नो यक्षतामिमम्.. (८) मैं अग्नि और सूर्य को बुलाता हूं. वे सुंदर जिह्वा वाले, क्रांतदर्शी और देवों को बुलाने वाले हैं. वे हमारा यज्ञ पूरा करें. (८) इला सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः. बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः.. (९) सुख देने वाली एवं विनाशरहित इला, सरस्वती तथा मही नामक देवियां कुशों पर बैठें. (९) इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुप ह्वये. अस्माकमस्तु केवलः.. (१०) मैं सर्वाग्रणी तथा अनेक रूपधारी त्वष्टा को इस यज्ञ में बुलाता हूं. वे केवल हमारे ही हों. (१०) अव सृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः. प्र दातुरस्तु चेतनम्.. (११) हे वनस्पतिदेव! देवों के लिए हवि भेंट करो. इससे यजमान साम से संपन्न बनें. (११) स्वाहा यज्ञं कृणोतनेन्द्राय यज्वनो गृहे. तत्र देवाँ उप ह्वये.. (१२) हे ऋत्विजो! तुम यजमान के घर में स्वाहा शब्द बोलते हुए इंद्र के निमित्त हवन करो. उस में हम देवों को बुलाते हैं. (१२) सूक्त—१४ देवता—अग्नि ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिः सोमपीतये. देवेभिर्याहि यक्षि च.. (१)