भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

अभाव में शीत से व्याकुल होकर आग के पास सोता है. (११) यो वः सेनानीर्महतो गणस्य राजा व्रातस्य प्रथमो बभूव. तस्मै कृणोमि न धना रुणध्मि दशां प्राचीस्तदृतं वदामि.. (१२) हे पासो! तुम्हारे समूह का जो सेनापति राजा एवं प्रमुख है, मैं उसके लिए नमस्कार करता हूं. मैं दसों उंगलियों से हाथ जोड़कर सत्य कहता हूं कि भविष्य में मैं जुए से धन नहीं कमाऊंगा. (१२) अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः. तत्र गावः कितव तत्र जाया तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः.. (१३) हे जुआरी! मेरी बात को महत्त्वपूर्ण समझकर तुम पासों से मत खेलो. खेती से जो धन मिले, उसीको बहुत मानकर प्रसन्न रहो. खेती से बहुत सी गाएं एवं पत्नी प्राप्त होगी, सविता स्वामी ने मुझसे ऐसा कहा है. (१३) मित्रं कृणुध्वं खलु मृळता नो मा नो घोरेण चरताभि धृष्णु. नि वो नु मन्युर्विशतामरातिर्न्यो बभ्रूणां प्रसितौ न्वस्तु.. (१४) हे पासो! हमें अपना मित्र बना लो एवं हमें सुखी करो. तुम हमारे ऊपर अपने भयंकर तथा असह्य प्रभाव का प्रयोग मत करो. तुम्हारा क्रोध हमारे शत्रुओं में प्रवेश करे. शत्रु तुम पीले रंग वाले पासों के बंधन में शीघ्र आ जावें. (१४) सूक्त—३५ देवता—विश्वेदेव अबुध्रमु त्य इन्द्रवन्तो अग्नयो ज्योतिर्भरन्त उषसो व्युष्टिषु. मही द्यावापृथिवी चेततामपोऽद्या देवानाभव आ वृणीमहे.. (१) इंद्र से संबंधित अग्नियां उषाओं द्वारा अंधकारनाश के समय तेज धारण करते हुए जाग गई हैं. विस्तृत द्यावा एवं पृथिवी भी चेतनायुक्त हों. आज मैं देवों की रक्षा का वरण करता हूं. (१) दिवस्पृथिव्योरव आ वृणीमहे मातृन्सिन्धून्पर्वताञ्छर्यणावतः. अनागास्त्वं सूर्यमुषासमीमहे भद्रं सोमः सुवानो अद्या कृणोतु नः.. (२) हम द्यावा-पृथिवी से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं. मैं माता तुल्य नदियों एवं कुरुक्षेत्र में स्थित पर्वतों से भी रक्षा की याचना करता हूं. हे सूर्य एवं उषा! मैं तुम दोनों से प्रार्थना करता हूं कि मुझे पापरहित रखो. जाने जाते हुए सोम आज हमारा मंगल करें. (२) द्यावा नो अद्य पृथिवी अनागसो मही त्रायेतां सुविताय मातरा. ebook converter DEMO Watermarks*

उषा उच्छन्त्यप बाधतामघं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (३) विस्तृत एवं माता-पिता के समान द्यावा-पृथिवी से हम प्रार्थना करते हैं कि वे सुख पाने के लिए हम निष्पाप लोगों की रक्षा करें. अंधकार का विनाश करती हुई उषा हमारे पापों को समाप्त करे. हम प्रज्वलित अग्नि से सुख की याचना करते हैं. (३) इयं न उसा प्रथमा सुदेव्यं रेवत्सनिभ्यो रेवती व्युच्छतु. आरे मन्युं दुर्विदत्रस्य धीमहि स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (४) धन की स्वामिनी, मुख्या एवं पापों का नाश करने वाली उषा हमें दान योग्य धन दे. हम बुरे धन वाले व्यक्ति के क्रोध से दूर रहना चाहते हैं. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (४) प्र या: सिस्रते सूर्यस्य रश्मिभिर्ज्योतिर्भरन्तीरुषसो व्युष्टिषु. भद्रा नो अद्य श्रवसे व्युच्छत स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (५) जो उषाएं सूर्यकिरणों के साथ मिलती हैं एवं प्रकाश को धारण करके अंधकार का नाश करती हैं, वे आज हमें अन्न देने के लिए अनुकूल हों एवं अंधकार का नाश करें. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (५) अनमीवा उषस आ चरन्तु न उदग्नयो जिहतां ज्योतिषा बृहत्. आयुक्षातामश्विना तूतुजिं रथं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (६) रोगरहित उषाएं हमारे पास आवें एवं विस्तृत अग्नि तेज से मिलकर ऊपर उठें. अश्विनीकुमार हमारे पास आने के लिए अपने तेज चलने वाले रथ में घोड़े जोतें. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (६) श्रेष्ठं नो अद्य सवितर्वरेण्यं भागमा सुव स हि रत्नधा असि. रायो जनित्रीं धिषणामुप ब्रुवे स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (७) हे सविता देव! आज हमें श्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य धन दो. तुम उत्तम रत्न देने वाले हो. हम धन उत्पन्न करने वाली स्तुतियां बोलते हैं. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (७) पिपर्तु मा तद्ॠतस्य प्रवाचनं देवानां यन्मनुष्या३ अमन्महि. विश्वा इदुस्राः स्पळुदेति सूर्यः स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (८) यज्ञों का देवस्तुतिरूपी भाग हमारी रक्षा करे. हम उसे जानते हैं. सूर्य प्रत्येक प्रभात में सभी वस्तुओं को स्पष्ट करते हुए आते हैं. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

अद्वेषो अद्य बर्हिषः स्तरीमणि ग्राव्णां योगे मन्मनः साध ईमहे. आदित्यानां शर्मणि स्था भुरण्यसि स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (९) आज यज्ञ में कुश बिछाए जा चुके हैं एवं सोमरस निचोड़ने का एक पत्थर दूसरे पर रख दिया गया है. इस समय मेरा मन अभिलषित वस्तु पाने के लिए द्वेषरहित देवों की शरण जाता है. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (९) आ नो बर्हिः सधमादे बृहद्दिवि देवाँ ईळे सादया सप्त होतॄन्. इन्द्रं मित्रं वरुणं सातये भगं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (१०) हे अग्नि! हमारे विस्तृत एवं दीप्त यश में तुम सात होताओं व इंद्र, मित्र, वरुण, भग आदि देवों को भली प्रकार बुलाओ. हम धनप्राप्ति के लिए देवों की स्तुति करेंगे. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (१०) त आदित्या आ गता सर्वतातये वृधे नो यज्ञमवता सजोषसः. बृहस्पतिं पूषणमश्विना भगं स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (११) हे प्रसिद्ध आदित्यो! तुम हमारे यज्ञ के लिए आओ एवं हमारे कल्याण के लिए संयत होकर यज्ञ में बैठो. हम बृहस्पति, पूषा, अश्विनीकुमारों, भग एवं प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (११) तन्नो देवा यच्छत सुप्रवाचनं छर्दिरदित्याः सुभरं नृपाय्यम्. पश्वे तोकाय तनयाय जीवसे स्वस्त्य१ग्निं समिधानमीमहे.. (१२) हे आदित्य देवो! तुम अपना यज्ञ पूर्ण करो एवं हमें मानवों की रक्षा करने वाला मनपसंद घर दो. हम प्रज्वलित अग्नि से अपने पशुओं, संतान एवं जीवन के विषय में कल्याण की याचना करते हैं. (१२) विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऊती विश्वे भवन्त्वग्नयः समिद्धाः. विश्वे नो देवा अवसा गमन्तु विश्वमस्तु द्रविणं वाजो अस्मे.. (१३) आज सभी मरुत् सब प्रकार से हमारी रक्षा करें एवं सभी अग्नियां प्रज्वलित हों. सभी देव हमारी रक्षा के लिए आवें तथा सब प्रकार के अन्न व संपत्ति हमें प्राप्त हों. (१३) यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं त्रायध्वे यं पिपृथात्यंहः. यो वो गोपीथे न भयस्य वेद ते स्याम देववीतये तुरासः.. (१४) हे देवो! हम यज्ञ के ऐसे आतुर व्यक्ति बनें, जिसकी तुम युद्ध में रक्षा करते हो, जिनका त्राण करते हो एवं जिन्हें पापरहित करके उनकी अभिलाषा पूर्ण करते हो एवं जो तुम्हारा सहारा पाकर भय को जानते भी नहीं. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—३६ देवता—विश्वेदेव

सूक्त—३६ देवता—विश्वेदेव उषासानक्ता बृहती सुपेशसा द्यावाक्षामा वरुणो मित्रो अर्यमा. इन्द्रं हुवे मरुतः पर्वताँ अप आदित्यान्द्यावापृथिवी अपः स्वः.. (१) मैं महान् एवं शोभनरूप वाली उषा व रात्रि और द्यावा-पृथिवी, वरुण, मित्र, अर्यमा, इंद्र, मरुद्गण, पर्वतसमूह, जलों, आदित्यों, अंतरिक्ष एवं अन्य देवों को यज्ञ में बुलाता हूं. (१) द्यौश्च नः पृथिवी च प्रचेतस ऋतावरी रक्षतामंहसे रिषः. मा दुर्विदत्रा निर्ऋतिर्न ईशत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (२) शोभन बुद्धि वाली एवं यज्ञ के योग्य द्यावा-पृथिवी हमें हिंसकों एवं पाप से बचावें. बुरी बुद्धि वाली मृत्यु हम पर अधिकार न कर सके. हम आज देवों की उसी रक्षा की याचना करते हैं. (२) विश्वस्मान्नो अदितिः पात्वंहसो माता मित्रस्य वरुणस्य रेवतः. स्वर्वज्ज्योतिरवृकं नशीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (३) धन के स्वामी मित्र और वरुण की माता अदिति पाप से हमारी रक्षा करें. हम विनाशरहित ज्योति को पूर्णरूप से शीघ्र प्राप्त करें. देवों से आज हम उसी रक्षा की याचना करते हैं. (३) ग्रावा वदन्नप रक्षांसि सेधतु दुष्ष्वप्न्यं निर्ऋतिं विश्वमत्रिणम्. आदित्यं शर्म मरुतामशीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (४) सोमरस निचोड़ने के काम आने वाले दोनों पत्थर शब्द करते हुए राक्षसों को दूर भगावें एवं बुरे सपनों, मृत्यु और सबको खाने वाले राक्षसों को हमसे हटावें. हम आदित्यों एवं मरुतों से संबंधित सुख प्राप्त करें. हम आज देवों की उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (४) इन्द्रो बर्हिः सीदतु पिन्वतामिळा बृहस्पतिः सामभिर्ऋक्क्वौ अर्चतु. सुप्रकेतं जीवसे मन्म धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (५) इंद्र भली प्रकार कुश पर बैठें. स्तुतिवचन विशेषरूप से बोले जावें. साममंत्रों द्वारा प्रशंसित बृहस्पति हमारी अभिलाषा पूरी करें. हम जीवन के लिए शोभन ज्ञान एवं धन प्राप्त करें. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (५) दिविस्पृशं यज्ञमस्माकमश्विना जीराध्वरं कृणुतं सुम्नमिष्टये. प्राचीनरश्मिमाहुतं घृतेन तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे यज्ञ को स्वर्ग छूने वाला, शीघ्र गतियुक्त व हिंसारहित ebook converter DEMO Watermarks*

बनाओ. तुम हमारी अभिलाषापूर्ति के लिए हमें सुख दो तथा घृत द्वारा आहुति दी गई अग्नि को देवों के प्रति अभिमुख बनाओ. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (६) उप ह्वये सुहवं मारुतं गणं पावकम्ऋष्वं सख्याय शंभुवम्. रायस्पोषं सौश्रवसाय धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (७) मैं शोभन आह्वान वाले, शुद्धिकर्त्ता, दर्शनीय, सुखदाता व धन के पोषक मरुद्गण को मित्रता पाने के लिए बुलाता हूं तथा विशेषरूप से अन्न पाने के लिए मैं उनका ध्यान करता हूं. हम आज देवों से विशेष रक्षा की याचना करते हैं. (७) अपां पेरुं जीवधन्यं भरामहे देवाव्यं सुहवमध्वरश्रियम्. सुरश्मिं सोममिन्द्रियं यमीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (८) हम जल का पालन करने वाले, जीवों को धन्य करने वाले, देवों को तृप्ति देने वाले, शोभन स्तुति वाले, यज्ञ की शोभा व शोभन दीप्तियुक्त सोम को धारण करते हैं एवं उनसे शक्ति की याचना करते हैं. आज हम देवों से वही प्रसिद्ध रक्षा मांगते हैं. (८) सनेम तत्सुसनिता सनित्वभिर्वयं जीवा जीवपुत्रा अनागसः. ब्रह्मद्विषो विष्वगेनो भरेरत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (९) हम और हमारे पुत्र दीर्घजीवी तथा अपराधरहित बनकर एवं अपनी संतान के साथ बांटकर सोमरस का पान करें. हम ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले लोग सब प्रकार के पापों से पूर्ण हों. आज हम देवों से उसी रक्षा की याचना करते हैं. (९) ये स्था मनोर्यज्ञियास्ते शृणोतन यद्वो देवा ईमहे तद्ददातन. जैत्रं क्रतुं रयिमद्वीरवद्यशस्तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (१०) हे मनुष्यों का यज्ञ पाने के योग्य देवो! तुम हमारी स्तुति सुनो. हम तुमसे जो कुछ मांगते हैं, वह हमें दो. हमें जय प्रदान करने वाला ज्ञान व धन एवं संतान से युक्त यश दो. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (१०) महदद्य महतामा वृणीमहेऽवो देवानां बृहतामनर्वणाम्. यथा वसु वीरजातं नशामहै तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (११) हम आज श्रेष्ठ, महान् और अद्वितीय देवों से अधिक रक्षा की प्रार्थना करते हैं. आज हम देवों से उसी विशेष रक्षा की प्रार्थना करते हैं, जिससे हमें धन एवं संतान प्राप्त हो सके. (११) महो अग्नेः समिधानस्य शर्मण्यनागा मित्रे वरुणे स्वस्तये. ebook converter DEMO Watermarks*

श्रेष्ठे स्याम सवितुः सवीमनि तद्देवानांमवो अद्या वृणीमहे.. (१२) हम महान् एवं प्रज्वलित अग्नि से सुख व मित्रवरुण से पापहीनता तथा कल्याण प्राप्त करें. हम सूर्य से सर्वोत्तम सुख प्राप्त करें. आज हमें देवों से उसी विशेष रक्षा की याचना करते हैं. (१२) ये सवितुः सत्यसवस्य विश्वे मित्रस्य व्रते वरुणस्य देवाः. ते सौभगं वीरवद्गोमदप्नो दधातन द्रविणं चित्रमस्मे.. (१३) जो देव सत्य स्वभाव वाले सविता, मित्र और वरुण के यज्ञ में उपस्थित रहते हैं, वे हमें सौभाग्य, संतान एवं गायों से युक्त अन्न, पूजनीय धन एवं पुण्यकर्म दें. (१३) सविता पश्चात्तात्सविता पुरस्तात्सवितोत्तरात्तात्सविताधरात्तात्. सविता नः सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायुः.. (१४) सूर्य देव हमें पश्चिम, पूर्व, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं में सभी अभिलषित धन प्रदान करें एवं दीर्घ आयु दें. (१४) सूक्त—३७ देवता—सूर्य नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृतं सपर्यत. दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शंसत.. (१) हे ऋत्विजो! तुम मित्र और वरुण को देखने वाले महान्, दीप्तिशाली, दूर रहते हुए भी सबको देखने वाले, देवों के वंश में उत्पन्न, संसार का ज्ञान कराने वाले एवं स्वर्ग के पुत्रतुल्य सूर्य को नमस्कार करके यज्ञ आदि से उनकी पूजा तथा प्रशंसा करो. (१) सा मा सत्योक्तिः परि पातु विश्वतो द्यावा च यत्र ततनन्नहानि च. विश्वमन्यन्नि विशते यदेजति विश्वाहापो विश्वाहोदेति सूर्यः.. (२) ये सत्यवचन मेरी सभी प्रकार से रक्षा करें, जिनके सहारे आकाश एवं दिन स्थित हैं, सभी प्राणी जिनके आश्रित हैं, जिनके प्रभाव से प्राणिसमूह गति करता है, जल बहता है एवं सदा सूर्य उगता है. (२) न ते अदेवः प्रदिवो नि वासते यदेतशेभिः पतरै रथर्यसि. प्राचीनमन्यदनु वर्तते रज उदन्येन ज्योतिषा यासि सूर्य.. (३) हे सूर्य देव! जब तुम अपने गतिशील घोड़ों को रथ में जोड़ने की इच्छा करते हो, तब कोई भी प्राचीन राक्षस तुम्हारे समीप नहीं रहता. तुम्हारी वह प्रसिद्ध ज्योति जल के पीछे चलती है, जिसके साथ तुम उदित होते हो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विश्वमुदियर्षि भानुना. तेनास्मद्विश्वामनिरामनाहुतिमपामीवामप दुष्ष्वप्न्यं सुव.. (४) हे सूर्य देव! तुम जिस ज्योति से अंधकार का नाश करते हो एवं जिस किरण से सारे संसार को चमकाते हो, उसी के द्वारा हमारा अन्नाभाव, यज्ञहीनता, रोगसमूह एवं बुरे स्वप्न नष्ट करो. (४) विश्वस्य हि प्रेषितो रक्षसि व्रतमहेळयन्नुच्चरसि स्वधा अनु. यदद्य त्वा सूर्योपब्रवामहै तं नो देवा अनु मसीरत क्रतुम्.. (५) हे प्रेरित सूर्य देव! तुम क्रोध न करते हुए सभी यजमानों के यज्ञों की रक्षा करते हो एवं प्रातःकाल के यज्ञ के बाद उदित होते हो. आज जब हम तुम्हारा नाम लें, तभी देव हमारे यज्ञ को स्वीकार करें. (५) तं नो द्यावापृथिवी तन्न आप इन्द्रः शृण्वन्तु मरुतो हवं वचः. मा शूने भूम सूर्यस्य सन्दृशि भद्रं जीवन्तो जरणामशीमहि.. (६) द्यावा-पृथिवी, इंद्र, जल एवं मरुत् हमारा आह्वान एवं स्तुतिवचन सुनें. हम सूर्य की कृपादृष्टि पाकर दुःख प्राप्त न करें, अपितु चिरकाल तक प्राण धारण करते हुए कल्याण एवं यौवन का भोग करें. (६) विश्वाहा त्वा सुमनसः सुचक्षसः प्रजावन्तो अनमीवा अनागसः. उद्यन्तं त्वा मित्रमहो दिवेदिवे ज्योग्जीवाः प्रति पश्येम सूर्य.. (७) हे सूर्य देव! हम प्रसन्नमन, सुदर्शन, संतानयुक्त, रोगरहित एवं निष्पाप होकर सदा तुम्हारा यज्ञ करें. हे मित्रों का आदर करने वाले सूर्य! हम चिरंजीवी बनकर तुम्हें प्रतिदिन उदित होता हुआ देखें. (७) महि ज्योतिर्बिभ्रतं त्वा विचक्षण भास्वन्तं चक्षुषेचक्षुषे मयः. आरोहन्तं बृहतः पाजसस्परि वयं जीवाः प्रति पश्येम सूर्य.. (८) हे विशेष दृष्टि वाले सूर्य! हम चिरंजीवी बनकर प्रतिदिन तुम्हारा दर्शन करें. तुम महान् ज्योति धारण करने वाले, दीप्तिशाली, सब देखने वालों की आंखों के लिए सुखकर एवं महान् सागर के ऊपर आरोहण करते हो. (८) यस्य ते विश्वा भुवनानि केतुना प्र चेरते नि च विशन्ते अक्तुभिः. अनागास्त्वेन हरिकेश सूर्याह्नाह्ना नो वस्यसावस्यसोदिहि.. (९) हे हरे बालों वाले सूर्य! तुम्हारी जिस पहचान के कारण सभी प्राणी विशेष रूप से गति करते हैं और रात के समय विश्राम करते हैं, तुम अपनी पहचान को लेकर प्रतिदिन उगो एवं ebook converter DEMO Watermarks*

हम तुम्हें देखें. (९) शं नो भव चक्षसा शं नो अह्ना शं भानुना शं हिमा शं घृणेन. यथा शमध्वञ्छमसद् दुरोणे तत्सूर्य द्रविणं धेहि चित्रम्.. (१०) हे सूर्य! तुम अपने तेज, दिवस, किरण, शीतलता एवं उष्णता के द्वारा हमारे लिए कल्याणकारी बनो. हम चाहे मार्ग में हों या अपने घर में, तुम हमें यह विचित्र संपत्ति दो. (१०) अस्माकं देवा उभयाय जन्मने शर्म यच्छत द्विपदे चतुष्पदे. अदत्पिबदूर्जयमानमाशितं तदस्मे शं योररपो दधातन.. (११) हे देवो! तुम हमारे द्विपद और चतुष्पद दोनों प्रकार के प्राणियों को सुख दो. सब प्राणी खाते-पीते एवं शक्तिशाली बनें. तुम प्राणियों को सुख एवं पापहीनता प्रदान करो. (११) यद्वो देवाश्चकृम जिह्वया गुरु मनसो वा प्रयुती देवहेळनम्. अरावा यो नो अभि दुच्छुनायते तस्मिन्तदेनो वसवो नि धेतन.. (१२) हे निवासस्थान देने वाले देवो! हमने वचन अथवा मन के प्रयोग से तुम्हारा जो अपमान किया है, उस पाप को तुम उस पर डालो जो हम पर आक्रमण करके हमारे प्रति पाप का आचरण करता है. (१२) सूक्त—३८ देवता—इंद्र अस्मिन्न इन्द्र पृत्सुतौ यशस्वति शिमीवति क्रन्दसि प्राव सातये. यत्र गोषाता धृषितेषु खादिषु विष्वक्पतन्ति दिद्यवो नृषाह्ये.. (१) हे इंद्र! तुम यश देने वाले व परस्पर प्रहारों से युक्त युद्ध में सिंहनाद करते हो एवं धन पाने के लिए हमारी रक्षा करते हो. गायों का लाभ कराने वाले एवं मानवों को पराजित करने वाले युद्ध में योद्धा एक-दूसरे को नष्ट करते हैं एवं दीप्त आयुध चारों ओर गिरते हैं. (१) स नः क्षुमन्तं सदने व्यूर्णुहि गोअर्णसं रयिमिन्द्र श्रवाय्यम्. स्याम ते जयतः शक्र मेदिनो यथा वयमुशमसि तद्वसो कृधि.. (२) हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम हमारे घर में इतनी प्रशंसनीय संपत्ति भर दो कि गाएं सागर के जल के समान पर्याप्त मात्रा में हों. हे शक्र! हम तुम्हारी विजय पर शक्तिशाली बनें. हे वासदाता इंद्र! हम जो कामना करें, उसे पूरा करो. (२) यो नो दास आर्यो वा पुरुष्टुतादेव इन्द्र युधये चिकेतति. अस्माभिषे सुसहाः सन्तु शत्रवस्त्वया वयं तान्वनुयाम सङ्गमे.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

हे बहुतों द्वारा प्रशंसित इंद्र! जो दास, आर्य अथवा राक्षस हमारे साथ युद्ध करना चाहते हैं. वे सब शत्रु तुम्हारी कृपा से हमारे द्वारा सरलता से हार जावें. हम तुम्हारी कृपा से उन्हें युद्ध में मार डालें. (३) यो दभ्रेभिर्हव्यो यश्च भूरिभिर्यो अभीके वरिवोविन्नृषाह्ये. तं विखादे सस्निमद्य श्रुतं नरमर्वाञ्चमिन्द्रमवसे करामहे.. (४) जो इंद्र मानव संहारक युद्ध में धन प्राप्त करते हैं, वे चाहे थोड़े मनुष्यों द्वारा पुकारे जावें अथवा बहुतों द्वारा उन पर शुद्ध, सर्वत्र प्रसिद्ध एवं यज्ञ के नेता इंद्र को आज हम अपने अनुकूल बनाते हैं. (४) स्ववृजं हि त्वामहमिन्द्र शुश्रवानानुदं वृषभ रध्रचोदनम्. प्र मुञ्चस्व परि कुत्सादिहा गहि किमु त्वावान्मुष्कयोर्बद्ध आसते.. (५) हे अभिलाषापूरक इंद्र! हमने सुना है कि तुम स्वयं अपने बंधन काटने वाले, आशातीत बल देने वाले एवं अपने भक्त के प्रेरक हो. तुम यहां आओ और कुत्स के बंधन से स्वयं को

बनते हो. लोग तुम्हें अंधे और दुर्बलों का ही नहीं, यज्ञ का वैद्य भी कहते हैं. (३) युवं च्यवानं सनयं यथा रथं पुनर्युवानं चरथाय तक्षथुः. निष्टौग्र्यमूहथुरद्भ्यस्परि विश्वेत्ता वां सवनेषु प्रवाच्या.. (४) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार बढ़ई पुराने रथ को नया बनाकर चलने योग्य कर देता है, उसी प्रकार तुमने वृद्ध च्यवन ऋषि को जवान बनाकर चलने-फिरने लायक कर दिया था. तुमने तुग्र के पुत्र भुज्यु को जल के ऊपर तैराकर किनारे पर लगा दिया था. तुम्हारे वे कार्य यज्ञ के समय विशेषरूप से वर्णन करने योग्य हैं. (४) पुराणा वां वीर्या३ प्र ब्रवा जनेऽथो हासथुर्भिषजा मयोभुवा. ता वां नु नव्याववसे करामहेऽयं नासत्या श्रदरिर्यथा दधत्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! मैं लोगों के सामने तुम्हारे सभी पुराने वीर कर्मों का वर्णन करती हूं. तुम दोनों सुख देने वाले वैद्य हो. मैं तुमसे रक्षा पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करती हूं. मेरी स्तुति पर यजमान श्रद्धा करते हैं. (५) इयं वामह्वे शृणुतं मे अश्विना पुत्रायेव पितरा मह्यं शिक्षतम्. अनापिरज्ञा असजात्यामतिः पुरा तस्या अभिशस्तेरव स्पृतम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हें बुलाता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. जिस प्रकार पिता पुत्र को सीख देता है, उसी प्रकार तुम मुझे सिखाओ. मैं बंधुरहित, ज्ञानशून्य जातिरहित एवं बुद्धिहीन हूं. तुम दुर्गति से पहले ही मेरी रक्षा करो. (६) युवं रथेन विमदाय शुन्ध्युवं न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषणाम्. युवं हवं वध्रिमत्या अगच्छतं युवं सुषुतिं चक्रथुः पुरन्धये.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तुम पुरुमित्र की कन्या शुंध्युव को विमद के साथ विवाह करने के लिए रथ द्वारा ले गए थे. तुम वध्रिमती द्वारा बुलाए जाने पर आए थे एवं तुमने उस बुद्धिमती के लिए शोभन ऐश्वर्य दिया था. (७) युवं विप्रस्य जरणामुपेयुषः पुनः कलेरकृणुतं युवद्वयः. युवं वन्दनमृश्यदादुदूपथुर्युवं सद्यो विश्पलामेतवे कृथः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने बुढ़ापे को प्राप्त एवं मेधावी कलि ऋषि को दुबारा जवान बना दिया था. तुमने वंदन नामक ऋषि को कुएं से निकाला था एवं लंगड़ी विश्पला को लोहे का पैर लगाकर चलने योग्य बना दिया था. (८) युवं ह रेभं वृषणा गुहा हितमुदैरयतं ममृवांसमश्विना. युवमृबीसमुत तप्तमत्रय ओमन्वन्तं चक्रथुः सप्तवध्रये.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अभिलाषापूरक अश्विनीकुमारो! तुमने गुफा में पड़े हुए एवं मरणासन्न रेभ ऋषि को बाहर निकाला था. तुमने सात बंधनों से बंधे एवं जलते हुए अग्निकुंड में फेंके गए अत्रि ऋषि के लिए वर्षा करके अग्नि शांत कर दी थी. (९) युवं श्वेतं पेदवेऽश्विनाश्वं नवभिर्वाजैर्नवती च वाजिनम्. चर्कृत्यं ददथुर्द्र्रावयत्सखं भगं न नृभ्यो हव्यं मयोभुवम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! तुमने राजा पेदु के लिए निन्यानवे घोड़ों के साथ एक शक्तिशाली घोड़ा दिया था. वह घोड़ा शत्रुओं पर विजय पाने वाला व शत्रुओं के मित्रों को भगाने वाला था. वह मनुष्यों के लिए आह्वान करने योग्य, सुखदाता एवं धन के समान सेवनीय था. (१०) न तं राजानावदिते कुतश्चन नांहो अश्नोति दुरितं नकिर्भयम्. यमश्विना सुहवा रुद्रवर्तनी पुरोरथं कृणुथः पत्न्या सह.. (११) हे स्वामी! दीनतारहित, शोभन आह्वान वाले एवं प्रशंसनीय मार्ग वाले अश्विनीकुमारो! तुम जिस पतिपत्नी को अपने रथ के अगले भाग में बैठा लेते हो, उसे न पाप लगता है, न दुर्दशा उसके पास आती है और न उसे किसी से भय रहता है. (११) आ तेन यातं मनसो जवीयसा रथं यं वामृभवश्चक्रुरश्विना. यस्य योगे दुहिता जायते दिव उभे अहनी सुदिने विवस्वतः.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! मन के समान वेगशाली उसी रथ पर बैठकर आओ, जिसे तुम्हारे लिए ऋभु नामक देवों ने बनाया था एवं जिस रथ के संयोग से सूर्यपुत्री उषा जन्म लेती है व सूर्य से शोभन दिन-रात उत्पन्न होते हैं. (१२) ता वर्तिर्यातं जयुषा वि पर्वतमपिन्वतं शयवे धेनुमश्विना. वृकस्य चिद्वर्तिकामन्तरास्याद्युवं शचीभिर्ग्रसिताममुञ्चतम्.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुम उसी जयशील रथ के द्वारा पर्वत की ओर जाने वाले मार्ग पर जाओ एवं शंयु के लिए बूढ़ी गाय को पुनः दुधारू बना दो. तुमने भेड़िए के मुंह में फंसी हुई वर्तिका नामक चिड़िया को अपने कर्मों के प्रभाव से छुड़ाया था. (१३) एतं वां स्तोममश्विनावकर्मातक्षाम भृगवो न रथम्. न्यमृक्षाम योषणां न मर्ये नित्यं न सूनुं तनयं दधानाः.. (१४) हे अश्विनीकुमारो! भृगुवंशियों ने जिस प्रकार रथ बनाया, उसी प्रकार हमने तुम्हारे लिए यह स्तोत्र बनाया है. जिस प्रकार दामाद को देने के लिए कन्या का शृंगार किया जाता है, उसी प्रकार हमने यह रथ सजाया है. हम इस स्तोत्र को यज्ञकर्त्ता पुत्र के समान सदा धारण करते हैं. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—४० देवता—अश्विनीकुमार

सूक्त—४० देवता—अश्विनीकुमार रथं यान्तं कुह को ह वां नरा प्रति द्युमन्तं सुविताय भूषति. प्रातर्यावाणं विभ्वं विशेविशे वस्तोर्वस्तोर्वहमानं धिया शमि.. (१) हे यज्ञों के नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारे दीप्तिशाली यज्ञ की ओर प्रातःकाल चलने वाले, व्याप्त, सब मनुष्यों के पास प्रतिदिन धन पहुंचाने वाले एवं गतिशील रथ की पूजा मेरे समान किस यजमान ने कहां की है? (१) कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषितः. को वां शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ आ.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम रात और दिन में कहां रहते हो? तुम्हारा समय कहां बीतता है? तुम कहां निवास करते हो? जिस प्रकार विधवा अपने देवर को और सधवा अपने पति को चारपाई पर बुलाती है, उसी प्रकार मेरे अतिरिक्त कौन यजमान तुम्हें यज्ञवेदी पर अपने अनुकूल बनाता है? (२) प्रातर्जरिथे जरणेव कापथा वस्तीर्वस्तोर्यजता गच्छथो गृहम्. कस्य ध्वस्रा भवतः कस्य वा नरा राजपुत्रेव सवनाव गच्छथः.. (३) हे यज्ञों के नेता अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार प्रातःकाल परम ऐश्वर्य वाले राजाओं को जगाया जाता है, उसी प्रकार तुम्हें प्रातःकाल जगाने के लिए स्तुतियां पढ़ी जाती हैं. हे यज्ञ के योग्य अश्विनीकुमारो! तुम प्रतिदिन यजमान के घर जाते हो. तुम किस यजमान के दोष समाप्त करते हो एवं राजकुमारों के साथ किसके यज्ञ में जाते हो? (३) युवां मृगेव वारणा मृगण्यवो दोषा वस्तोर्हविषा नि ह्वयामहे. युवं होत्रामृतुथा जुह्वते नरेषं जनाय वहथः शुभस्पती.. (४) हे वरण करने वाले अश्विनीकुमारो! बहेलिए जिस प्रकार शार्दूल की इच्छा करते हैं, उसी प्रकार हव्य लेकर मैं तुम्हें रात-दिन बुलाता हूं. हे यज्ञ के नेता अश्विनीकुमारो! यजमान समय- समय पर तुम्हारे लिए आहुति देते हैं. तुम वर्षा के जल के स्वामी होने के कारण यजमानों के लिए अन्न देते हो. (४) युवां ह घोषा पर्यश्विना यती राज्ञ ऊचे दुहिता पृच्छे वां नरा. भूतं मे अह्न उत भूतमक्तवेऽश्वावते रथिने शक्तमर्वते.. (५) हे यज्ञ के नेता अश्विनीकुमारो! राजा कक्षीवान् की पुत्री मैं घोषा इधर-उधर दौड़कर तुम्हारी बात करती हूं एवं तुम्हारे ही विषय में पूछती हूं. तुम रात-दिन मेरे यहां रहो एवं अश्व व रथ से युक्त मेरे भतीजे को यहां से निकाल दो. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

युवां कवी षः पर्यश्विना रथं विशो न कुत्सो जरितुर्नशायथः. युवोर्ह मक्षा पर्यश्विना मध्वासा भरत निष्कृतं न योषणा.. (६) हे मेधावी अश्विनीकुमारो! तुम लोग रथ पर बैठकर कुत्स के समान स्तोता के घर जाते हो. तुम्हारे मधु को मधुमक्खियां इस प्रकार अपने मुंह में भर लेती हैं, जिस प्रकार युवती संभोग में रत रहती है. (६) युवं ह भुज्युं युवमश्विना वशं युवं शिज्जारमुशनामुपारथुः. युवो ररावा परि सख्यमासते युवोरहमवसा सुन्मना चके.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तुमने भुज्यु, वश, अत्रि और उशना का उद्धार किया. हव्य देने वाला यजमान तुम्हारी मित्रता प्राप्त करता है. मैं तुम्हारी रक्षा के द्वारा मिलने वाले सुख की कामना करता हूं. (७) युवं ह कृशं युवमश्विना शयुं युवं विधन्तं विधवामुरुष्यथः. युवं सनिभ्यः स्तनयन्तमश्विनाप व्रजमूर्णूथः सप्तास्यम्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने कृश, शंयु, अपने सेवकों ओर विधवा वध्रिमती का उद्धार किया था. तुम ही अपने यजमानों के लिए गरजते हुए तथा गतिशील द्वार वाले मेघ को भेदकर जल बरसाते हो. (८) जनिष्ट योषा पतयत्कनीनको वि चारुहन्वीरुधो दंसना अनु. आस्मै रीयन्ते निवनेव सिन्धवोऽस्मा अह्ने भवति तत्पतित्वनम्.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से मैं युवती बन गई हूं और मेरी कामना करने वाला पति आ गया है. तुम्हारे द्वारा की गई वर्षा के बाद पेड़पौधे उग आए हैं. जिस प्रकार नीचे बहने वाली नदियां सागर की ओर जाती हैं, उसी प्रकार पौधे इन की ओर बढ़ रहे हैं. इस पति को ऐसा यौवन प्राप्त हो, जिसे कोई नष्ट न कर सके. (९) जीवं रुदन्ति वि मयन्ते अध्वरे दीर्घामनु प्रसितिं दीधियुर्नरः. वामं पितृभ्यो य इदं समेरिरे मयः पतिभ्यो जनयः परिष्वजे.. (१०) जो लोग अपनी पत्नियों के वियोग में रोते हैं, पत्नियों को यज्ञ में अपने समीप बैठाते हैं, उन्हें अपनी विस्तृत बांहों में समेटते हैं और उनसे संतान उत्पन्न करके उन्हें पितृयज्ञ में प्रेरित करते हैं, उनकी स्त्रियां सुख के साथ उनका आलिंगन करती हैं. (१०) न तस्य विद्म तदु षु प्र वोचत युवा ह यद्युवत्याः क्षेति योनिषु. प्रियोस्रियस्य वृषभस्य रेतिनो गृहं गमेमाश्विना तदुश्मसि.. (११) हे अश्विनीकुमारो! मैं पतिपत्नी के संसर्ग वाले सुख को नहीं जानती. मुझे उस विषय में ebook converter DEMO Watermarks*

बताओ. मुझ युवती के घर में मेरा युवा पति निवास करता है. मैं केवल यही कामना करती हूं कि मैं प्रिय, युवतियों को चाहने वाले एवं शक्तिशाली पति को प्राप्त करूं. (११) आ वामगन्त्सुमतिर्वाजिनीवसू न्यश्विना हृत्सु कामा अयंसत. अभूतं गोपा मिथुना शुभस्पती प्रिया अर्यम्णो दुर्याँ अशीमहि.. (१२) हे अन्न एवं धन वाले तथा उदक के स्वामी अश्विनीकुमारो तुम्हारी कृपादृष्टि परस्पर मिलकर मेरे समीप आवे. मेरे मन की अभिलाषाएं पूरी हों. तुम मेरे रक्षक बनो. मैं पति के घर जाकर उसकी प्यारी बनूं. (१२) ता मन्दसाना मनुषो दुरोण आ धत्तं रयिं सहवीरं वचस्यवे. कृतं तीर्थं सुप्रपाणं शुभस्पती स्थाणुं पथेष्ठामप दुर्मतिं हतम्.. (१३) हे प्रसन्न होते हुए अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी स्तुति की अभिलाषा करती हूं. तुम मेरे पति के घर में पुत्रादियुक्त धन स्थापित करो. हे जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! जब मैं पति के घर जाऊं तब तुम पानी के घाटों का जल पीने योग्य बनाओ. मेरे मार्ग में यदि कोई सूखा हुआ वृक्ष या दुष्ट बुद्धि वाला व्यक्ति हो, तुम उसे भी हटाओ. (१३) क्व स्विद्य कतमास्वश्विना विक्षु दस्रा मादयेते शुभस्पती. क ईं नि येमे कतमस्य जग्मतुर्विप्रस्य वा यजमानस्य वा गृहम्.. (१४) हे दर्शनीय एवं जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम आज किस जनपद और किन प्रजाओं में आनंद पाते हो? किसने तुम्हें बांधकर रखा है एवं तुम किस बुद्धिमान् यजमान के घर जाते हो? (१४) सूक्त—४१ देवता—अश्विनीकुमार समानमु त्यं पुरुहूतमुकथ्यं१ रथं त्रिचक्रं सवना गनिग्मतम्. परिज्मानं विदथ्यं सुवृत्तिभिर्वयं व्युष्टा उषसो हवामहे.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे पास एक ही प्रशंसित एवं बहुतों द्वारा आहूत रथ है. तीन पहियों वाला वह रथ यज्ञों में जाता है. हम उस चारों ओर घूमने वाले एवं यज्ञ के लिए हितकारी रथ को प्रतिदिन प्रातःकाल सुंदर स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं. (१) प्रातर्युजं नासत्याधि तिष्ठथः प्रातर्यावाणं मधुवाहनं रथम्. विशो येन गच्छथो यज्वरीर्नरा कीरेश्चिद्यज्ञं होतृमन्तमश्विना.. (२) हे सत्य का पालन करने वाले एवं नेता अश्विनीकुमारो! तुम प्रातःकाल घोड़ों से युक्त होने वाले, प्रातःकाल चलने वाले एवं मधुकारक रथ पर बैठो. उसी रथ पर बैठकर तुम ebook converter DEMO Watermarks*

यज्ञशील प्रजाओं के समीप एवं स्तुतिकर्त्ता के ऋषियुक्त घर को जाते हो. (२) अध्वर्युं वा मधुपाणिं सुहस्त्यमग्निधं वा धृतदक्षं दमूनसम्. विप्रस्य वा यत्सवनानि गच्छथोऽत आ यातं मधुपयेमश्विना.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम मुझ हाथ में सोम धारण करने वाले, शोभनहस्त, शक्तिशाली, दानेच्छुक एवं अग्नि का आधान करने वाले अध्वर्यु के पास आओ. यदि तुम किसी बुद्धिमान् यजमान के यज्ञों में जा रहे हो, तब भी उन यज्ञों को छोड़ कर हमारा सोमरस पीने के लिए आओ. (३) सूक्त—४२ देवता—इंद्र अस्तेव सु प्रतरं लायमस्यन्भूषन्निव प्र भरा स्तोममस्मै. वाचा विप्रास्तरंत वाचमर्यो नि रामय जरितः सोम इन्द्रम्.. (१) हे अंतरात्मा! धनुर्धारी जिस प्रकार सीने में घुसने वाला बाण छोड़ता है, उसी प्रकार तुम इंद्र को सुशोभित करते हुए उसकी स्तुति करो. हे मेधावी स्तोताओ! तुम अपने स्तुतिवचन से शत्रु की स्तुतियों को पराजित करो एवं सोमयज्ञ में इंद्र को आकर्षित करो. (१) दोहेन गामुप शिक्षा सखायं प्र बोधय जरितर्जारमिन्द्रम्. कोशं न पूर्णं वसुना न्युष्टमा च्यावय मघदेयाय शूरम्.. (२) हे स्तोता! गाय जिस प्रकार दूध देती है, उसी प्रकार इंद्र अभिलाषा पूर्ण करते हैं. तुम मित्र इंद्र को वश में करो एवं जारतुल्य इंद्र को जगाओ. लोग जिस प्रकार धन से भरे हुए पात्र को उलटा करके उस में से भरा धन निकालते हैं, उसी प्रकार तुम धन देने के लिए शूर इंद्र को अभिमुख करो. (२) किमङ्ग त्वा मघवन्भोजमाहुः शिशीहि मा शिशयं त्वा शृणोमि. अप्रस्वती मम धीरस्तु शक्र वसुविदं भगमिन्द्रा भरा नः.. (३) हे धनस्वामी इंद्र! लोग तुम्हें स्तोताओं का इष्ट क्यों कहते हैं? मैंने तुम्हें दाता सुना है, इसलिए तुम धन देकर स्तोता को संपन्न करो. हे शक्र! मेरी बुद्धि यज्ञकर्म में निपुण हो एवं मेरा भाग्य धन प्राप्त कराने वाला बनाओ. (३) त्वां जना ममसत्येष्विन्द्र सन्तस्थाना वि ह्वयन्ते समीके. अत्रा युजं कृणुते यो हविष्मान्नास्रुन्वता सख्यं वष्टि शूरः.. (४) हे इंद्र! लोग युद्धों में तुम्हें सहायता के लिए पुकारते हैं. युद्ध में शत्रुओं के साथ स्थित लोग तुम्हें बुलाते हैं. इंद्र हव्य वाले आह्वदाता को अपना मित्र बनाते हैं एवं सोमरस न निचोड़ने

वाले पुरुष के साथ मित्रता नहीं चाहते हैं. (४) धनं न स्पन्द्रं बहुलं यो अस्मै तीव्रांन्त्सोमाँ आसुनोति प्रयस्वान्. तस्मै शत्रून्त्सुतुकाम्प्रातरह्वो नि स्वश्त्रान्युवति हन्ति वृत्रम्.. (५) जो हव्य वाला यजमान इंद्र के लिए इस प्रकार नशीला सोमरस निचोड़ता है, जिस प्रकार कोई व्यक्ति दरिद्र को देने के लिए गाय या अश्व आदि धन का संस्कार करता है, इंद्र उसके शक्तिशाली, संतानसहित एवं शोभन आयुधों वाले शत्रुओं को उससे अलग हटाते हैं एवं उसका उपद्रव शांत करते हैं. (५) यस्मिन्वयं दधिमा शंसमिन्द्रे यः शिश्राय मघवा काममस्मे. आराच्चित्सन्भयतामस्य शत्रुर्न्‍यस्मै द्युम्ना जन्या नमन्ताम्.. (६) हमने जिन इंद्र की स्तुति की है, वे धनवान् इंद्र हमारी इच्छा पूरी करते हैं. इंद्र के शत्रु दूर होते हुए भी डरते हैं एवं शत्रुओं के जनपद की संपत्ति इंद्र के अधिकार में आ जाती है. (६) आराच्छत्रुमप बाधस्व दूरमुग्रो यः शम्बः पुरुहूत तेन. अस्मे धेहि यवमद्गोमदिन्द्र कृधी धियं जरित्रे वाजरत्नाम्.. (७) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम्हारा जो उग्र वज्र है, उससे शत्रु को हमारे पास से भगाओ. हे इंद्र! हमें जौ और गायों वाला धन दो. तुम अपने स्तोता की स्तुति अन्न एवं रत्न उत्पन्न करने वाली बनाओ. (७) प्र यमन्तर्वृषसवासो अग्मन्तीव्राः सोमा बहुलान्तास इन्द्रम्. नाह दामानं मघवा नि यंसन्नि सुन्वते वहति भूरि वामम्.. (८) अनेक धाराओं में माधुर्य बरसाता हुआ एवं तेज नशे वाला सोमरस विविध अन्नों से मिलकर जिस समय इंद्र के शरीर में प्रवेश करता है, उस समय इंद्र सोमरसदाता यजमान को कभी नहीं रोकते. इसके अतिरिक्त वे सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को अधिक मात्रा में शोभन धन देते हैं. (८) उत प्रहामतिदीव्या जयति कृतं यच्छ्वघ्नी विचिनोति काले. यो देवकामो न धना रुणद्धि समितं राया सृजति स्वधावान्.. (९) जुआरी जिस प्रकार अपने को चुनौती देने वाले विरोधी जुआरी को देखकर पकड़ लेता है, उसी प्रकार इंद्र अपने विरोधी योद्धा के साथ भांति-भांति का युद्ध करके उसे हराते हैं. जो व्यक्ति देवों की पूजा की अभिलाषा से धन की कंजूसी नहीं करता, शक्तिशाली इंद्र उसीको धनसंपन्न बनाते हैं. (९) गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्. ebook converter DEMO Watermarks*

वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम.. (१०) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम दरिद्रता से आई बुद्धि को तुम्हारी कृपा से पशुओं की सहायता से पार करें एवं यवों द्वारा विस्तृत भूख शांत करें. हम राजाओं के साथ रहकर अपनी शक्ति द्वारा मुख्य धनों को प्राप्त करें. (१०) बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः. इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु.. (११) बृहस्पति हमें पापी शत्रु से पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं में बचावें. इंद्र पूर्व एवं मध्य भाग में हमारी रक्षा करें. मित्रों के मित्र इंद्र हमें धन दें. (११) सूक्त—४३ देवता—इंद्र अच्छा म इन्द्रं मतयः स्वर्विदः सध्रीचीर्विश्वा उशतीरनूषत. परि ष्वजन्ते जनयो यथा पतिं मर्यं न शुन्ध्युं मघवानमूतये.. (१) मुझ अंगिरागोत्रीय कृष्ण ऋषि की सब कुछ प्राप्त कराने वाली, विस्तृत एवं अभिलाषापूर्ण स्तुतियां इंद्र की भली प्रकार स्तुति करती हैं. पत्नियां जिस प्रकार पति का स्पर्श करती हैं, उसी प्रकार मेरी स्तुतियां रक्षा पाने के हेतु धनस्वामी इंद्र के समीप जाती हैं. (१) न घा त्वद्रिगप वेति मे मनस्त्वे इत्कामं पुरुहूत शिश्रय. राजेव दस्म नि षदोऽधि बर्हिष्यस्मिन्त्सु सोमेऽवपानमस्तु ते.. (२) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं दर्शनीय इंद्र! तुम्हारी ओर अभिमुख मेरा मन अन्य किसी की ओर नहीं जाता है. मैं अपनी अभिलाषा तुम्हीं पर स्थापित करता हूं. राजा जिस प्रकार अपने महल में बैठता है, उसी प्रकार तुम यज्ञ के कुशों पर बैठो. इस शोभन सोम के प्रति तुम्हारी पीने की अभिलाषा हो. (२) विषूवृदिन्द्रो अमतेरुत क्षुधः स इद्रायो मघवा वस्व ईशते. तस्येदिमे प्रवणे सप्त सिन्धवो वयो वर्धन्ति वृषभस्य शुष्मिणः.. (३) इंद्र दुर्बुद्धि और भूख से बचाने के लिए हमारे चारों ओर रहें. वे ही धनस्वामी इंद्र समस्त संपत्तियों के स्वामी हैं. अभिलाषापूरक एवं तेजस्वी की आज्ञा से ये सात नदियां देश में अन्न बढ़ाती हैं. (३) वयो न वृक्षं सुपलाशमासदन्त्सोमास इन्द्रं मन्दिनश्चमूसदः. प्रैषामनीकं शवसा दविद्युतद्विदत्स्व१र्मनवे ज्योतिरार्यम्.. (४)

पक्षी जिस प्रकार शोभन पत्तों वाले वृक्षों का सहारा लेते हैं, उसी प्रकार नशा करने वाले एवं पात्रों में भरे हुए सोम इंद्र के पास जाते हैं. सोम के नशे से इंद्र का मुख चमकने लगता है. इंद्र मनुष्यों के लिए सूर्य नामक उत्तम ज्योति दें. (४) कृतं न श्वघ्नी वि चिनोति देवने संवर्गं यन्मघवा सूर्यं जयत्. न तत्ते अन्यो अनु वीर्यं शकन्न पुराणो मघवन्नोत नूतनः.. (५) जुआरी जिस प्रकार जुआघर में अपने को जीतने वाले दूसरे जुआरी को खोजता है, उसी प्रकार धनस्वामी इंद्र वर्षा का विरोध करने वाले सूर्य को हराने के लिए ढूंढ़ता है. हे धनस्वामी इंद्र! कोई भी नया-पुराना व्यक्ति तुम्हारी शक्ति के अनुसार काम नहीं कर सकता. (५) विशंविशं मघवा पर्यशायत जनानां धेना अवचाकशद्वृषा. यस्याह शक्रः सवनेषु रण्यति स तीव्रैः सौमैः सहते पृतन्यतः.. (६) धनस्वामी इंद्र प्रत्येक मनुष्य में सोते हैं. अभिलाषापूरक इंद्र मनुष्यों की स्तुतियों पर ध्यान देते हैं. शक्र जिसके यज्ञों में रमण करते हैं, वह नशीला सोमरस पीकर शत्रुओं को पराजित करता है. (६) आपो न सिन्धुमभि यत्समक्षरन्त्सोमास इन्द्रं कुल्याइव ह्रदम्. वर्धन्ति विप्रा महो अस्य सादने यवं न वृष्टिर्दिव्येन दानुना.. (७) जब सोमरस सागर की ओर जाने वाली नदियों के समान अथवा तालाब की ओर जाने वाली नालियों के समान इंद्र के पास जाते हैं, तब मेधावी ब्राह्मण यज्ञ में इंद्र का तेज वर्षा के दिव्य जल से बढ़े हुए जौ के समान बढ़ा देते हैं. (७) वृषा न क्रुद्धः पतयद्रजःस्वा यो अर्यपत्नीरकृणोदिमा अपः. स सुन्वते मघवा जीरदानवेऽविन्दज्ज्योतिर्मनवे हविष्मते.. (८) लोकों में जिस प्रकार एक बैल क्रोध में भरकर दूसरे बैल की ओर झपटता है, उसी प्रकार इंद्र मेघ को मारकर अपने द्वारा पालने योग्य जलों को हमारी ओर प्रेरित करते हैं. धनस्वामी इंद्र सोमरस निचोड़ने वाले, शीघ्र दानकर्त्ता एवं हव्य धारक यजमान के लिए तेज प्रदान करते हैं. (८) उज्जायतां परशुर्ज्योतिषा सह भूया ऋतस्य सुदुघा पुराणवत्. वि रोचतामरुषो भानुना शुचिः स्वर्णि शुक्लं शुशुचीत सत्पतिः.. (९) इंद्र का वज्र तेजी के साथ हमारे शत्रुओं के वध में लग जावे. यज्ञ को दोहन करने वाली बातें प्राचीन काल के समान हों. इंद्र प्रकाशित होते हुए अपनी दीप्ति से शुद्धतापूर्वक तेज धारण करें. सज्जनों के पालक इंद्र सूर्य के समान प्रज्वलित होते हुए दीप्त हों. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्. वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम.. (१०) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम दरिद्रता से आई हुई दुर्बुद्धि को तुम्हारी कृपा से पशुओं की सहायता से पार करें एवं यज्ञों द्वारा अपनी विस्तृत भूख शांत करें. हम राजाओं के साथ रहकर अपनी शक्ति द्वारा मुख्य धनों को प्राप्त करें. (१०) बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः. इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु.. (११) बृहस्पति हमें पापी शत्रु से पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं में बचावें. इंद्र पूर्व और मध्य भाग में हमारी रक्षा करें. हम मित्रों के मित्र इंद्र हमें धन दें. (११) सूक्त—४४ देवता—इंद्र आ यात्विन्द्रः स्वपतिर्मदाय यो धर्मणा तूतूजानस्तुविष्मान्. प्रत्वक्षाणो अति विश्वा सहांस्यपारेण महता वृष्ण्येन.. (१) वे धनस्वामी इंद्र प्रसन्नता पाने के लिए अपने रथ में बैठकर हमारे यज्ञ में आवें, जो शीघ्रता से बढ़कर शत्रु के बलों को अपनी असीमित शक्तियों से क्षीण करते हैं. (१) सुष्ठामा रथः सुयमा हरी ते मिम्यक्ष वज्रो नृपते गभस्तौ. शीभं राजन्त्सुपथा याह्यर्वाङ् वर्धाम ते पपुषो वृष्ण्यानि.. (२) हे मनुष्यों के पालक इंद्र! तुम्हारा रथ शोभन स्थिति वाला, तुम्हारे घोड़े वश में रहने वाले एवं वज्र तुम्हारी बांहों में रहने वाला है. हे स्वामी इंद्र! शोभन मार्ग द्वारा शीघ्र हमारे सामने आओ. हम सोमरस पिलाकर तुम्हारी शक्ति बढ़ाते हैं. (२) एन्द्रवाहो नृपतिं वज्रबाहुमुग्रमुग्रासस्तविषास एनम्. प्रत्वक्षसं वृषभं सत्यशुष्ममेमस्मत्रा सधमादो वहन्तु.. (३) शक्तिशाली, विशाल शरीर वाले एवं परस्पर प्रसन्न रहने वाले इंद्र के घोड़े मनुष्यों के पालक, हाथ में वज्र धारण करने वाले, शक्तिशाली, शत्रु सेनाओं को निर्बल बनाने वाले, अभिलाषापूरक व विवाडरहित शक्ति वाले इंद्र को हमारे समीप लावें. (३) एवा पतिं द्रोणसाचं सचेतसमूर्जः स्कम्भं धरुण आ वृषायसे. ओजः कृष्व सं गृभाय त्वे अप्यसो यथा केनिपानामिनो वृधे.. (४) हे इंद्र तुम्हीं सबके पालक, द्रोणकलश में रहने वाले, प्रजा वाले एवं बलधारणकर्त्ता सोमरस से अपने पेट को भरते हो. तुम मुझे शक्ति दो एवं अपना बनाओ. हम बुद्धिमानों को ebook converter DEMO Watermarks*

बढ़ाने में तुम्हीं समर्थ हो. (४) गमन्नस्मे वसून्या हि शंसिषं स्वाशिषं भरमा याहि सोमिनः. त्वमीशिषे सास्मिन्ना सत्सि बर्हिष्यनाधृष्या तव पात्राणि धर्मणा.. (५) हे इंद्र! मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं, इसलिए सारी संपत्ति मेरे पास आवे. तुम मुझ सोमरस वाले के शोभन यज्ञ में आओ. तुम धन के स्वामी हो. तुम इन बिछे हुए कुशों पर बैठो. तुम्हारे सोमरस के पात्रों को राक्षस छू भी नहीं सकते. (५) पृथक् प्रायन्प्रथमा देवहूतयोऽकृण्वत श्रवस्यानि दुष्टरा. न ये शेकुर्यज्ञियां नावमारुहमीरमैव ते न्यविशन्त केपयः.. (६) हे इंद्र! जो प्रमुख एवं देवों को बुलाने वाले लोग तुम्हारी कृपा से अलग-अलग स्वर्ग में गए, उन्होंने अन्यों द्वारा यश के कार्य किए थे. जो यज्ञरूप नाव पर नहीं चढ़ सके, वे पापकर्मा, ऋणयुक्त एवं नीच बने रहते हैं. (६) एवैवापागपरे सन्तु दूढ्योऽश्वा येषां दुर्युज आयुयुज्रे. इत्था ये प्रागुपरे सन्ति दावने पुरूणि यत्र वयुनानि भोजना.. (७) जो लोग इसी प्रकार दुर्बुद्धि एवं यज्ञरहित हैं, वे अधोगामी रहें. जिन यज्ञ न करने वालों के शक्तिशाली घोड़े रथ में जुड़ते हैं, वे नरक में जाते हैं. जो मरने से पहले ही देवों को हव्य देते हैं, वे स्वर्ग में जाते हैं. स्वर्ग में शोभन वस्तुएं अधिक मात्रा में रहती हैं. (७) गिरीँरञ्जान्रेजमानाँ अधारयद् द्यौः क्रन्ददन्तरिक्षाणि कोपयत्. समीचीने धिषणे वि ष्कभायति वृष्णः पीत्वा मद उक्थानि शंसति.. (८) इंद्र ने पेट भरने वाले सोम को पीकर गमनशील एवं कांपने वाले मेघों को स्थिर किया. उस समय स्वर्ग क्रंदन करने लगा और अंतरिक्ष कुपित हो उठे. इंद्र परस्पर मिली हुई द्यावा- पृथिवी को उसी दशा में रखते हैं. (८) इमं बिभर्मि सुकृतं ते अङ्कुशं येनारुजासि मघवञ्छफारुजः. अस्मिन्त्सु ते सवने अस्तवोक्यं सुत इष्टौ मघवन्बोध्याभगः.. (९) हे धनस्वामी इंद्र! मैं तुम्हारे लिए स्तुतिरूपी शोभन अंकुश धारण करता हूं. इससे प्रेरित होकर तुम शत्रुसेना को नष्ट करने वाले अपने हाथियों को कोंचते हो. इस सोमयाग में तुम्हारा निवास हो. तुम सेवनीय बनकर यज्ञ में हमारी स्तुतियां सुनो. (९) गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्. वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम.. (१०)