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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्यज्यते. एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते.. (२८) पाप की देवी कृत्या क्रोध से लालपीले रंग की हो रही है. कृत्या को इस स्त्री पर संबद्ध करके छोड़ा जाता है. इसकी जाति के लोग बढ़ रहे हैं एवं इसका पति बंधन में है. (२८) परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु. कृत्यैषा पद्द्वती भूत्व्या जाया विशते पतिम्.. (२९) मैला कपड़ा उतार दो. ब्राह्मणों को धन दान करो इस प्रकार कृत्या चली जाती है और पत्नी पति में प्रवेश करती है. (२९) अश्रीरा तनूर्भवति रुशती पापयामुया. पतिर्यद्वध्वो३ वाससा स्वमङ्गमभिधित्सते.. (३०) पति यदि वधू के वस्त्र से अपना शरीर ढकना चाहता है तो पति का तेजस्वी शरीर पापधारिणी कृत्या के कारण श्रीहीन हो जाता है. (३०) ये वध्वश्चन्द्रं वहतुं यक्ष्मा यन्ति जनादनु. पुनस्तान्यज्ञिया देवा नयन्तु यत आगताः.. (३१) वधू को प्राप्त स्वर्णरूप दहेज को वहन करने के लिए जो व्याधियां हमारे विरोधियों के पास से आती हैं. यज्ञभाग को ग्रहण करने वाले देव उन्हें वहीं लौटा दें, जहां से वे आई हैं. (३१) मा विदन्परिपन्थिनो य आसीदन्ति दम्पती. सुगेभिर्दुर्गमतीतामप द्रान्तवरातयः.. (३२) इन पतिपत्नी के समीप जो विघ्नकारी आते हैं, वे समाप्त हो जावें. ये दोनों सुविधाओं के द्वारा असुविधाओं को नष्ट कर दें एवं इनके शत्रु इनसे दूर रहें. (३२) सुमङ्गलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत. सौभाग्यमस्यै दत्त्वायाथास्तं वि परेतन.. (३३) यह वधू सौभाग्यशालिनी हो. सब लोग एकत्र होकर इसे देखें. सब लोग इसे सौभाग्य का आशीर्वाद देकर अपने-अपने घर जावें. (३३) तृष्टमेतत्कटुकमेतदपाष्ठवद्विषवन्नैतदत्तवे. सूर्या यो ब्रह्मा विद्यात्स इद्वाधूयमर्हति.. (३४) यह कपड़ा दाहजनक, कठोर, ग्रहण न करने योग्य, मैला और विषयुक्त है. सूर्या को जानने वाला ब्राह्मण ही इस वधूवस्त्र को पाने का अधिकारी है. (३४) ebook converter DEMO Watermarks*

आशसनं विशसनमथो अधिविकर्तनम्. सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मा तु शुन्धति.. (३५) सूर्या का रूप देखो. इसके वस्त्र के लपेटने वाले भाग का रंग अलग है और सिर पर ओढ़ने वाला भाग अलग रंग का है. यह तीन जगह से फटा हुआ है. ब्रह्मा ही इस वस्त्र को शुद्ध कर सकते हैं. (३५) गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः. भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्महां त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः.. (३६) मैं तुम्हारा हाथ सौभाग्य के लिए पकड़ रहा हूं. मुझ पति के साथ तुम वृद्ध शरीर वाली बनो. भग, अर्यमा, सविता एवं पूषा आदि देवों ने तुम्हें इसलिए दिया है कि मैं तुम्हारे साथ गृहस्थ धर्म का पालन कर सकूं. (३६) तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या३ वपन्ति. या न ऊरू उशती विश्रयाते यस्यामुशन्तः प्रहराम शेपम्.. (३७) हे पूषा! मनुष्य जिस नारी के गर्भ में बीज बोते हैं, उसे तुम अतिशय कल्याणी बनाकर भेजो. यह हमारी जंघाओं की कामना करती हुई अपनी जंघाओं को फैलावे एवं हम कामना करते हुए इसकी विस्तृत जंघाओं में अपनी पुरुषेंद्रिय का प्रवेश करावें. (३७) तुभ्यमग्रे पर्यवहन्सूर्यां वहतुना सह. पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह.. (३८) हे अग्नि! सूर्या को चादर ओढ़ाकर सबसे पहले तुम्हारे ही समीप लाया जाता है. तुम पत्नी को संतानसहित पति के लिए देते हो. (३८) पुनः पत्नीमग्निरदादायुषा सह वर्चसा. दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम्.. (३९) अग्नि ने आयु और तेज के साथ पत्नी पुनः पति को प्रदान की. इसका पति दीर्घ अवस्था वाला बनकर सौ बरस जिए. (३९) सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः. तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः.. (४०) हे कन्या! सबसे पहले सोम ने तुम्हें पत्नीरूप में प्राप्त किया. इसके बाद तुम्हें गंधर्व ने प्राप्त किया. तेरा तीसरा पति अग्नि और चौथा मानव है. (४०) सोमो ददद् गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये. रयिं च पुत्राँश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम्.. (४१) ebook converter DEMO Watermarks*

सोम ने उस बालिका को गंधर्व को दिया. गंधर्व ने अग्नि को दिया. अग्नि ने यह मुझे पत्नी रूप में धन एवं पुत्रों सहित प्रदान की. (४१) इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम्. क्रीळन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वे गृहे.. (४२) हे वर और वधू! तुम दोनों यहीं रहो, एक-दूसरे से अलग मत होओ एवं पूरी अवस्था प्राप्त करो. तुम पुत्रों और नातियों के साथ खेलते हुए अपने घर में प्रसन्न रहो. (४२) आ नः प्रजां जनयतु प्रजापतिराजरसाय समनक्त्वर्यमा. अदुर्मङ्गलीः पतिलोकमा विश शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे.. (४३) प्रजापति हमें संतान दें एवं हमें बुढ़ापे तक साथ-साथ रखें. हे वधू! तुम अमंगलरहित होकर पति के घर में प्रवेश करो. तुम हमारे मानवों एवं पशुओं के लिए कल्याण कारक बनो. (४३) अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः. वीरसूर्देवकामा स्योना शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे.. (४४) तुम क्रोधरहित आंखों वाली होकर बढ़ो तथा पति का घात न करने वाली बनो. तुम पशुओं के लिए कल्याणकारिणी, शोभन मन युक्त एवं तेजपूर्ण बनो. तुम वीरजननी, देवों की भक्त एवं सुखकारिणी बनो तथा हमारे मानवों और पशुओं का कल्याण करो. (४४) इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु. दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि.. (४५) हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम इस वधू को शोभन पुत्रों-वाली एवं सौभाग्यशालिनी बनाओ. तुम इसमें मुझे दस पुत्रों को दो एवं मेरे पति को ग्यारहवां करो. (४५) सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव. ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु.. (४६) हे वधू! तुम ससुर, सास, ननद और देवर के प्रति महारानी बनो. (४६) समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ. सं मातरिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ.. (४७) हे विश्वदेव! तुम हमारे हृदयों को आपस में मिलाओ. वायु, धाता और सरस्वती हमें मिलावें. (४७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—८६ देवता—इंद्र आदि

सूक्त—८६ देवता—इंद्र आदि वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत. यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१) इंद्र का स्वागतकथन— मैंने स्तोताओं से सोमरस निचोड़ने को कहा, पर उन्होंने मेरी बात नहीं मानी. उन्होंने मेरे स्थान पर मेरे पुत्र वृषाकपि की स्तुति की, सोमरस वाले यज्ञ में स्वामी वृषाकपि मेरे मित्र बनकर प्रसन्न हुए. मैं सबसे श्रेष्ठ हूं. (१) परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः. नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२) हे इंद्र! तुम स्वयं चलकर वृषाकपि के समीप जाते हो. तुम सोमरस के लिए दूसरी जगह नहीं जाते हो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२) किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः. यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (३) हरे रंग के हिरण के तुल्य वृषाकपि ने तुम्हारा क्या प्रिय किया है कि तुम उदार बनकर उसके लिए पुष्टिकारक अन्न देते हो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (३) यमिमं त्वां वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि. श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (४) हे इंद्र! जिस प्रिय वृषाकपि की तुम रक्षा करते हो उसके कान को कुत्ते की अभिलाषा करने वाला कुत्ता काटे. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (४) प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत्. शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (५) इंद्राणी ने कहा—“यजमानों द्वारा मेरे लिए निर्मित प्रिय हवि वृषाकपि ने दूषित कर दिए. मैं शीघ्र ही इसका सिर काट डालूंगी. मैं इस दुष्कर्म करने वाले का सुख नहीं चाहती. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (५) न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशूतरा भुवत्. न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (६) कोई भी स्त्री मेरे समान सौभाग्यशालिनी एवं उत्तम पुत्र वाली नहीं है मेरे समान कोई भी स्त्री न तो पुरुष को अपना शरीर अर्पित करने वाली है और न संभोग के समय जांघों को

फैलाने वाली है. इंद्र सबसे उत्तम हैं.” (६) उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्ग भविष्यति. भसन्मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (७) वृषाकपि ने कहा— “हे सुंदर लाभ प्रदान करने वाली माता! जैसे तुमने कहा है कि तुम्हारी जंघाएं शिर आदि अंग उसी प्रकार के हो जाएंगे. तुम कोयल के समान प्रिय वचन बोलकर पिता को प्रसन्न करो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (७) किं सुबाहो स्वङ्गुरॆ पृथुष्टो पृथुजाघने. किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (८) इंद्र ने कहा— “हे सुंदर भुजाओं, शोभन उंगलियों, लंबे बालों व विस्तृत जंघाओं वाली एवं वीरपत्नी इंद्राणी! तुम वृषाकपि के प्रति व्यर्थ क्यों क्रोध कर रही हो? इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (८) अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते. उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (९) इंद्राणी ने कहा— “यह घातक वृषाकपि मुझे पतिहीना के समान समझता है. मैं इंद्रपत्नी वीर पुत्रों वाली एवं मरुतों की सखा हूं. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (९) संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति. वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१०) “नारी सत्य की विधात्री व वीरमाता इंद्रपत्नी यज्ञ या युद्ध के समय वहां जाती है एवं सबका आदर पाती है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१०) इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम्. नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (११) इंद्र ने कहा— “मैंने इन सब स्त्रियों में इंद्राणी को सौभाग्य वाली सुना है. इसका पति अन्य नारियों के समान बुढ़ापे से नहीं मरता. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (११) नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते. यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१२) “हे इंद्राणी! मैं अपने मित्र वृषाकपि के बिना प्रसन्न नहीं रह सकता. उसीको प्रसन्न करने वाला हवि देवों के समीप जाता है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१२) वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आद् सुस्नुषे. ebook converter DEMO Watermarks*

घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१३) “हे वृषाकपि की पत्नी! तुम धनवाली, शोभनपुत्रयुक्त एवं शोभन पुत्रवधू हो. तुम्हारे बैल को इंद्र खा जावें एवं तुम्हारे सुखकर प्रिय हवि का भक्षण करें. इंद्र सबसे उत्तम हैं.” (१३) उक्षणो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम्. उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१४) इंद्राणी द्वारा प्रेरित याज्ञिक मेरे लिए पंद्रह या बीस बैल पकाते हैं. उन्हें खाकर मैं मोटा बनता हूं. याज्ञिक लोग मेरी दोनों कोखें सोमरस से भर देते हैं. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (१४) वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत्. मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१५) इंद्राणी ने कहा—“हे इंद्र! तीखे सीगों वाला बैल जिस प्रकार गर्जन करता हुआ गायों में रमण करता है, उसी प्रकार तुम मेरे साथ रमण करो. दधिमंथन का शब्द तुम्हारे लिए कल्याणकारी हो. प्रेम की अभिलाषिणी इंद्राणी का सोमरस निचोड़ना तुम्हारा कल्याण करे. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (१५) न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या३ कपृत्. सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१६) “वह व्यक्ति मैथुन करने में समर्थ नहीं हो सकता जिसकी पुरुषेंद्रिय जांघों के बीच लटकती है. वह व्यक्ति मैथुन करने में समर्थ हो सकता है, जिसकी बालों से युक्त पुरुषेंद्रिय सोते समय विस्तृत होती है. इंद्र सबसे उत्तम हैं.” (१६) न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते. सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या३ कपृद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१७) इंद्र ने कहा—“वह पुरुष मैथुन करने में समर्थ नहीं हो सकता जिसकी बालों वाली पुरुषेंद्रिय उसके सोते समय विस्तृत होती है, वही व्यक्ति मैथुन करने में समर्थ हो सकता है जिसकी पुरुषेंद्रिय जांघों के बीच में लटकती है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१७) अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत्. असिं सूनां नवं चरुमाधेश्स्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१८) हे इंद्र! यह वृषाकपि पराए नष्ट धन को प्राप्त करे. वह तलवार वध का स्थल नया चरु एवं काठ की गाड़ी प्राप्त करे. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*

अयमेमि विचायकशद्विचिन्वन्दासमार्यम्. पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१९) मैं यजमानों को देखता हुआ एवं दासों तथा आर्यों को अलग-अलग करता हुआ यज्ञ की ओर जाता हूं. मैं हवि पकाने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले का सोमरस पीता हूं तथा बुद्धिशाली यजमान को देखता हूं. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (१९) धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना. नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहाँ उप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२०) मरुभूमि और वन में कितने योजन की दूरी है? हे वृषाकपि! तुम समीप के घर में ही आओ और यज्ञशाला में पहुंचो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२०) पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै. य एष स्वप्नंनशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२१) हे वृषाकपि! तुम पुनः हमारे पास आओ. मैं और इंद्राणी तुम्हारे लिए प्रीति कर कार्य करते हैं. यह सूर्य जिस मार्ग से आते हैं, उसीसे तुम घर में आओ. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२१) यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन. क्व१ स्य पुल्वघो मृगः कमगञ्जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२२) हे इंद्र एवं वृषाकपि! तुम ऊपर को मुंह करके मेरे घर आओ. अनेक रसमय पदार्थों को खाने वाला तथा मनुष्यों को प्रसन्न करने वाला मृग कहां है? इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२२) पर्शुहं नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम्. भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२३) हे इंद्र द्वारा छोड़े गए बाण! मनु की पुत्री पर्शु ने एक साथ बीस पुत्रों को जन्म दिया. जिसका पेट मोटा था, उसका कल्याण हुआ. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२३) सूक्त—८७ देवता—राक्षसहंता अग्नि रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुप यामि शर्म. शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्.. (१) मैं राक्षसों के हंता शक्तिशाली यजमानों के मित्र और अधिक स्थूल अग्नि का घृत से हवन करता हूं एवं अग्नि के घर के पास जाता हूं. ज्वालाओं को तेज करने वाले अग्नि यजमानों द्वारा प्रज्वलित होते हैं. वे हमें हिंसक राक्षसों से रात-दिन बचावें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानानुप स्पृश जातवेदः समिद्धः. आ जिह्वया मूरदेवान्रभस्व क्रव्यादो वृक्त्व्यपि धत्स्वास्न्.. (२) हे जातवेद! तुम प्रज्वलित होकर एवं लोहे के समान तेज दांतों वाले बनकर अपनी ज्वालाओं से राक्षसों को जलाओ. तुम अपनी जीभ के समान ज्वालाओं से हिंसक राक्षसों को मारो एवं मांसभक्षी राक्षसों को काटकर अपने मुंह में रख लो (२) उभोभयाविन्नुप धेहि दंष्ट्रा हिंस्रः शिशानोऽवरं परं च. उतान्तरिक्षे परि याहि राजञ्जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्.. (३) हे दोनों जबड़ों में दांतों वाले एवं राक्षसहिंसक अग्नि! तुम अपनी दोनों ओर की दाढ़ें तेज करते हुए वधयोग्य राक्षसों पर जमा दो. हे दीप्त अग्नि! तुम आकाश में स्थित राक्षसों के समीप जाओ एवं अपने दांतों से भक्षण करो. (३) यज्ञैरिषूः संनममानो अग्ने वाचा शल्यां अशनिभिर्दिहानः. ताभिर्विध्य हृदये यातुधानान् प्रतीचो बाहूनप्रति भङ्ग्ध्येषाम्.. (४) हे अग्नि! तुम हमारे यज्ञों और स्तुतियों के द्वारा बाणों को झुकाते हुए एवं उनके फलों को वज्रों के द्वारा तेज करते हुए उन बाणों से राक्षसों के हृदयों को बेधो तथा उनकी भुजाओं को तोड़ दो. (४) अग्ने त्वचं यातुधानस्य भिन्धि हिंस्राशनिर्हरसा हन्त्वेनम्. प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात्क्रविष्णुर्वि चिनोतु वृक्णम्.. (५) हे जातवेद अग्नि! राक्षसों की खाल को काट डालो. हिंसक वज्र उन्हें ताप से मारे. तुम राक्षसों के शरीर के भाग अलग-अलग कर दो. मांस की इच्छा करने वाले मांसाहारी जंतु इनके छिन्न-भिन्न शरीरों को खावें. (५) यत्रेदानिं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्. यद्वान्तरिक्षे पथिभिः पतन्तं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः.. (६) हे जातवेद अग्नि! तुम राक्षस को खड़ा हुआ, घूमता हुआ, आकाश में स्थित, मार्ग में चलता हुआ—किसी भी अवस्था में देखो तो बाण फेंककर उसे बेध दो. (६) उतालब्धं स्पृणुहि जातवेद आलेभानादृष्टिभिर्यातुधानात्. अग्ने पूर्वो नि जहि शोशुचान आमादः क्ष्वेङ्कास्तमदन्त्वेनीः.. (७) हे जातवेद अग्नि! तुम मुझ स्तोता को आक्रमणकारी राक्षस के हाथ से अपनी ऋष्टियों द्वारा बचाओ. तुम प्रमुख एवं प्रज्वलित होकर राक्षस को मारो. ये पक्षी उस राक्षस को खावें. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

इह प्र ब्रूहि यतमः सो अग्ने यो यातुधानो य इदं कृणोति. तमा रभस्व समिधा यविष्ठ नृचक्षसंश्कक्षुषे रन्धयैनम्.. (८) हे अग्नि! उस राक्षस को भगाओ जो यज्ञ में विघ्न डालता है. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम समिधाओं द्वारा प्रज्वलित होकर राक्षस को मारो. हे मानवों को देखने वाले अग्नि! तुम राक्षस को अपने तेज के वश में करो. (८) तीक्ष्णेनाग्ने चक्षुषा रक्ष यज्ञं प्राञ्चं वसुभ्यः प्र णय प्रचेतः. हिंस्रं रक्षांस्यभि शोशुचानं मा त्वा दभन्यातुधाना नृचक्षः.. (९) हे अग्नि! तुम अपने तीखे तेज से हमारे यज्ञ की रक्षा करो. हे उत्तम ज्ञान वाले अग्नि! इस यज्ञ को धन के अनुकूल बनाओ. हे प्रदीप्त एवं मानवदर्शक अग्नि! तुम राक्षसों को मारो. वे तुम्हें न मार सकें. (९) नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि प्रति शृणीह्यग्रा. तस्याग्ने पृष्टीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च.. (१०) हे मानवदर्शक अग्नि! तुम मानवहिंसक राक्षस को देखो तथा उसके तीन मस्तकों को काट डालो. (१०) त्रियातुधानः प्रसितिं त एत्वृतं यो अग्ने अनृतेन हन्ति. तमर्चिषा स्फूर्जयञ्जातवेदः समक्षमेनं गृणते नि वृङ्धि.. (११) हे अग्नि! राक्षस तीन बार तुम्हारी लपटों में जावे. जो राक्षस असत्य से सत्य को मारता है, उसे तुम अपने तेज से भस्म कर दो. हे जातवेद अग्नि! इस राक्षस को मेरे सामने ही टुकड़े-टुकड़े कर दो. (११) तदग्ने चक्षुः प्रति धेहि रेभे शफारुजं येन पश्यसि यातुधानम्. अथर्ववज्ज्योतिषा दैव्येन सत्यं धूर्वन्तमचितं न्योष.. (१२) हे अग्नि! गर्जन करते हुए इस राक्षस पर वह दृष्टि डालो जो तुम खुरों के समान नाखूनों द्वारा सज्जनों को भग्न करने वाले राक्षस पर डालते हो. दध्यङ् अथर्वा ऋषि जिस प्रकार अपने तेज से राक्षसों को मारते हैं, उसी प्रकार तुम अपने तेज से असत्य द्वारा सत्य का हनन करने वाले राक्षस को मारो. (१२) यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद्वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः. मन्योर्मनसः शरव्या३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (१३) हे अग्नि! आज स्त्रीपुरुष आपस में लड़ रहे हैं और स्तोता कड़वी बातें कह रहे हैं. इस कारण मन में क्रोध होने पर जो बाण फेंका जाता है, उसी बाण से तुम राक्षसों का हृदय बेध ebook converter DEMO Watermarks*

दो. (१३) परा शृणीहि तपसा यातुधानान्पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि. पराचिंषा मूरदेवाञ्छृणीहि परासुतृपो अभि शोशुचानः.. (१४) हे अग्नि! तुम अपनी गरमी से राक्षसों को जलाओ तथा अपने तेज से राक्षसों को समाप्त करो. मूढ़ राक्षसों को तुम अपने परम तेज से नष्ट करो. जो राक्षस दूसरों के प्राण हरण करके तृप्त होते हैं, उन्हें तुम शोकमग्न करो. (१४) पराद्य देवा वृजिनं शृणन्तु प्रत्यगेनं शपथा यान्तु तृष्टाः. वाचास्तेनं शरव ऋच्छन्तु मर्मन्विश्वस्यैतु प्रसितिं यातुधानः.. (१५) आज महान् देव पापी राक्षस को समाप्त करें. हमारी बुरी उक्तियां इस राक्षस को लगें. हमारे बाण इस असत्यवादी राक्षस को लगें. राक्षस व्याप्त अग्नि के जाल में फंसे. (१५) यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः. यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च.. (१६) हे अग्नि! जो राक्षस पुरुष का मांस अपने पास लाता है. जो अश्व आदि उपयोगी पशुओं का मांस एकत्र करता है अथवा जो गाय का दूध चुराता है, उसके सिर को काट दो. (१६) संवत्सरीणं पय उस्रियायास्तस्य माशीद्यातुधानो नृचक्षः. पीयूषमग्ने यतमस्तितृप्सात्तं प्रत्यञ्चमर्चिषा विध्य मर्मन्.. (१७) हे मानवदर्शक अग्नि! गाय के एक वर्ष तक के दूध को राक्षस न पी सकें. जो राक्षस इस अमृततुल्य गोदुग्ध को पीने के लिए आगे आवे, उसके मर्म को तुम अपनी ज्वालाओं द्वार छिन्न-भिन्न कर डालो. (१७) विषं गवां यातुधानाः पिबन्त्वा वृश्च्यन्तामदितये दुरेवाः. परैनान्देवः सविता ददातु परा भागमोषधीनां जयन्ताम्.. (१८) हे अग्नि! राक्षसों द्वारा दिया हुआ गोदुग्ध विष हो जाए एवं राक्षस काटकर अग्नि को भेंट किए जावें. सूर्य इन राक्षसों को हिंसकों को सौंप दें. राक्षस ओषधियों का असार अंश प्राप्त करें. (१८) सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः. अनु दह सहमूरान्क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः.. (१९) हे अग्नि! तुम बहुत समय से राक्षसों को बाधा पहुंचा रहे हो. राक्षस तुम्हें युद्ध में नहीं जीत पाए. तुम मांसभक्षक राक्षसों को समूल नष्ट करो. वे तुम्हारे दिव्य आयुधों से बच न ebook converter DEMO Watermarks*

सकें. (१९) त्वं नो अग्ने अधरादुदक्तात्त्वं पश्चादुत रक्षा पुरस्तात्. प्रति ते ते अजरासस्तपिष्ठा अघशंसं शोशुचतो दहन्तु.. (२०) हे अग्नि! तुम हमें दक्षिण, उत्तर, पश्चिम एवं पूर्व दिशाओं से बचाओ. तुम्हारी अतिशय तप्त, जरारहित एवं ज्वलित किरणें पापी राक्षसों को भस्म कर दें. (२०) पश्चात्पुरस्तादधरादुदक्तात्कविः काव्येन परि पाहि राजन्. सखे सखायमजरो जरिम्णेऽग्ने मर्ताँ अमर्त्यस्त्वं नः.. (२१) हे दीप्त एवं कार्यकुशल अग्नि! तुम अपने कौशल द्वारा हमें पश्चिम, पूर्व, दक्षिण एवं उत्तर दिशाओं से बचाओ. हे जरामरणरहित एवं सखा अग्नि! मैं तुम्हारा मित्र हूं. तुम मुझे जरा एवं मृत्यु को प्रदान न करो. (२१) परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि. धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भङ्गुरावताम्.. (२२) हे बल के पुत्र अग्नि! तुम पूरक मेधावी धर्षक एवं कुटिल राक्षसों का प्रतिदिन नाश करने वाले हो. हम तुम्हारा ध्यान करते हैं. (२२) विषेण भङ्गुरावतः प्रति ष्म रक्षसो दह. अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिर्ऋष्टिभिः (२३) हे अग्नि! तुम तोड़फोड़ करने वाले राक्षसों को अपने व्याप्त एवं तीखे तेज से जलाओ. उन्हें ऐसे खड्गों से मारो, जिनका अगला भाग गरम है. (२३) प्रत्यग्ने मिथुना दह यातुधाना किमीदिना. सं त्वा शिशाभि जागृह्यदब्धं विप्र मन्मभिः.. (२४) हे अग्नि! जो राक्षस पतिपत्नी के रूप में यह देखते हुए घूमते हैं कि कहां क्या हो रहा है. उन्हें तुम जलाओ. हे अपराजेय एवं ज्ञानी अग्नि! मैं सुंदर स्तुतियों से तुम्हारी प्रशंसा करता हूं. तुम जागो. (२४) प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणीहि विश्वतः प्रति. यातुधानस्य रक्षसो बलं वि रुज वीर्यम्.. (२५) हे अग्नि! तुम अपने तेज से राक्षसों का तेज चारों ओर नष्ट कर दो. तुम राक्षसों के बल और तेज को नष्ट करो. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—८८ देवता—अग्नि व सूर्य हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृश्याहुतं जुष्टमग्नौ. तस्य भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कं स्वधया पप्रथन्त.. (१) पीने योग्य, जरारहित एवं देवों का प्रिय सोमरसरूपी हव्य सूर्य को जानने वाले एवं स्वर्गस्थ अग्नि को होम किया जाता है. देवगण सोम उत्पादन पूर्ति और धारण के लिए सुखकर अग्नि को अन्न से बढ़ाते हैं. (१) गीर्णं भुवनं तमसापगूळ्हमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ. तस्य देवाः पृथिवी द्यौरुतापोऽरणयन्नोषधीः सख्ये अस्य.. (२) अंधकार द्वारा निगला हुआ एवं अंधकार में छिपा हुआ संसार अग्नि के उत्पन्न होने पर प्रकट होता है. उस अग्नि के मैत्रीपूर्ण कार्य से देवगण पृथ्वी स्वर्ग, जल एवं ओषधियां—सब प्रसन्न होते हैं. (२) देवेभिर्न्विषतो यज्ञियेभिरग्निं स्तोषायजरं बृहन्तम्. यो भानुना पृथिवीं द्यामुतेमामाततान रोदसी अन्तरिक्षम्.. (३) यज्ञ के योग्य देवों द्वारा शीघ्र प्रेरित मैं जरारहित एवं विशाल अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि ने अपने तेज से धरती, द्यौ, इनके मध्यभाग एवं आकाश को विस्तृत किया है. (३) यो होतासीत्प्रथमो देवजुष्टो यं समाञ्जन्त्राज्येना वृणानाः. स पतत्रीत्वरं स्था जगद्यच्छ्वात्रमग्निरकृणोज्जातवेदाः.. (४) जो अग्नि देवों द्वारा सेवित होकर पहले होता बने थे एवं वर के अभिलाषी यजमान जिन्हें घी से सींचते हैं, उन अग्नि ने अपने तेज से पक्षियों गतिशील सांप आदि तथा स्थावरजंगम रूप संसार को शीघ्र ही उत्पन्न किया. (४) यज्जातवेदो भुवनस्य मूर्धन्नतिष्ठो अग्ने सह रोचनेन. तं त्वाहेम मतिभिर्गीर्भिरुक्थैः स यज्ञियो अभवो रोदसिप्राः.. (५) हे जातवेद अग्नि! तुम आदित्य के साथ तीनों लोकों के सिर पर स्थित होते हो. हम तुम्हें अर्चनीय स्तुतियों एवं मंत्रों द्वारा प्राप्त करते हैं. तुम यज्ञ के पात्र एवं द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करने वाले हो. (५) मूर्धा भुवो भवति नक्तमग्निस्ततः सूर्यो जायते प्रातरुद्यन्. मायामू तु यज्ञियानामेतामपो यत्तूर्णिश्चरति प्रजानन्.. (६) अग्नि रात के समय सभी प्राणियों के मूर्धारूप बन जाते हैं एवं प्रातः उदय होते हुए सूर्य ebook converter DEMO Watermarks*

बन जाते हैं. अग्नि को यज्ञ-संपादक देवों की बुद्धि कहा जाता है एवं वे सबको जानते हुए सब स्थानों में जल्दी-जल्दी चलते हैं. (६) दृशेन्थो यो महिना समिद्धोऽरोचत दिवियोनिर्विभावा. तस्मिन्नग्नौ सूक्तवाकेन देवा हविर्विश्व आजुहुवुस्तनूपाः.. (७) जो अग्नि अपने महत्त्व के कारण दर्शनीय, प्रज्वलित स्वर्ग में स्थित एवं तेजस्वी बनकर दीप्त होते हैं, उन्हीं अग्नि के अंगरक्षक देवों ने स्तुतियां पढ़ते हुए हव्य डाला. (७) सूक्तवाकं प्रथममादिदग्निमादिद्धविर्जनयन्त देवाः. स एषां यज्ञो अभवत्तनूपास्तं द्यौर्वेद तं पृथिवी तमापः.. (८) देवों ने सबसे पहले मन से सूक्त वचन का चिंतन किया. इसके पश्चात् हव्य को उत्पन्न किया. वे अग्नि देवों के यज्ञपात्र एवं शरीररक्षक बने. उन अग्नि को द्युलोक, पृथ्वी और अंतरिक्ष जानते हैं. (८) यं देवासोऽजनयन्ताग्निं यस्मिन्नाजुहुवुर्भुवनानि विश्वा. सो अर्चिषा पृथिवीं द्यामृतेमामृजूयमानो अतपन्महित्वा.. (९) जिस अग्नि को देवों ने उत्पन्न किया, जिस अग्नि में विश्व की सब वस्तुओं का हवन किया जाता है. वह ही सरल गति वाले अग्नि अपनी विशाल ज्वाला से इस धरती और स्वर्ग को तृप्त करते हैं. (९) स्तोमेन हि दिवि देवासो अग्निमजीजनञ्छक्तिभी रोदसिप्राम्. तमू अकृण्वन् त्रेधा भुवे कं स ओषधीः पचति विश्वरूपाः.. (१०) देवों ने स्वर्ग में केवल स्तुतियों द्वारा द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करने वाले अग्नि को अपनी शक्ति से उत्पन्न किया. उस सुखकारक अग्नि को देवों ने तीन भागों में विभक्त किया. वही अग्नि समस्त ओषधियों को पकाती है. (१०) यदेदेनमधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम्. यदा चरिष्णू मिथुनावभूतामादित्प्रापश्यन्भुवनानि विश्वा.. (११) जिस समय यज्ञ के पात्र देवों ने इस अग्नि और अदितिपुत्र देवों को स्वर्ग में स्थापित किया, वे उस समय जोड़े से विचरण करने वाले बन गए तभी सब प्राणियों ने उन्हें देखा. (११) विश्वस्मा अग्निं भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमह्नामकृण्वन्. आ यस्ततानोषसो विभातीरपो ऊर्णोति तमो अर्चिषा यन्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

देवों ने सारे संसार के कल्याण के लिए वैश्वानर अग्नि को दिनों का ज्ञान कराने वाला बनाया है. अग्नि विशेष-प्रकाश वाली उषाओं को विस्तृत करते हैं एवं जाते समय सारे संसार को अंधकार के समूह में डुबा देते हैं. (१२) वैश्वानरं कवयो यज्ञियासोऽग्निं देवा अजनयन्नजुर्गम्. नक्षत्रं प्रत्नममिनच्चरिष्णु यक्षस्याध्यक्षं तविषं बृहन्तम्.. (१३) विद्वान् एवं यज्ञपात्र देवों ने जरारहित सूर्यरूपी वैश्वानर अग्नि को उत्पन्न किया. अग्नि ने प्राचीन, घूमने वाले, विस्तृत एवं महान् नक्षत्रों को देवों के सामने ही तेजहीन कर दिया. (१३) वैश्वानरं विश्वहा दीदिवांसं मन्त्रैरग्निं कविमच्छा वदाम:. यो महिम्ना परिबभूवोर्वी उतावस्तादुत देवः परस्तात्.. (१४) सर्वदा प्रकाशमय, पैनी मेधा वाले और संसार का उपकार करने वाले अग्नि की हम स्तुति करते हैं. वे वैश्वानर अग्नि अपनी महिमा से द्यावा-पृथिवी को भी तिरस्कृत कर ऊपरनीचे तपते हैं. (१४) द्वे स्रुती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम्. ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च.. (१५) मैंने पितरों, देवों एवं मानवों के दो मार्ग सुने हैं. आगे बढ़ता हुआ यह संसार उन्हीं पर जाता है. माता और पिता से जन्मा हुआ इन्हीं से जाता है. (१५) द्वे समीची बिभृतश्चरन्तं शीर्षतो जातं मनसा विमृष्टम्. स प्रत्यङ्ङ्विश्वा भुवनानि तस्थावप्रयुच्छन्तरणिर्भ्राजमानः.. (१६) परस्पर संगत द्यावा-पृथिवी में विचरण करते हुए सबसे शीर्षरूप आदित्य से उत्पन्न व स्तुतियों से संस्कृत अग्नि को धारण करने वाले, प्रभावहीन, शीघ्रता करने वाले एवं तेजस्वी वैश्वानर सभी लोकों के सम्मुख ठहरते हैं. (१६) यत्रा वदेते अवरः परश्च यज्ञन्योः कतरो नौ वि वेद. आ शेकुरित्सधमादं सखायो नक्षन्त यज्ञं क इदं वि वोचत्.. (१७) जिस समय पार्थिव अग्नि और वायु परस्पर विवाद करते हैं कि हम यज्ञकर्म के नेताओं में यज्ञ को कौन अधिक जानता है, उस समय मित्र ऋत्विज् यज्ञ करते हैं. वे यह निर्णय नहीं कर पाते कि कौन ठीक है? (१७) कत्यग्नयः कति सूर्यासः कत्युषासः कत्यु स्विदापः. नोपस्पिजं वः पितरो वदामि पृच्छामि वः कवयो विद्मने कम्.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे विद्वान् पितरो! मैं तुमसे स्पर्धा वाली बात नहीं कर रहा हूं. मैं केवल जानने के लिए पूछ रहा हूं कि अग्नियां, सूर्य उषाएं एवं जल कितने हैं. (१८) यावन्मात्रमुषसो न प्रतीकं सुपर्ण्यो३वसते मातरिश्वः. तावद्दधात्युप यज्ञमायन्ब्राह्मणो होतुरवरो निषीदन्.. (१९) हे वायु! जब तक रात्रियां उषा के मुख से परदा नहीं हटा देतीं, तब तक नीचे स्थित होता और स्तोता पार्थिव अग्नि यज्ञ के समीप आकर बैठ जाते हैं. (१९) सूक्त—८९ देवता—इंद्र इन्द्रं स्तवा नृतमं यस्य मह्ना विबबाधे रोचना वि ज्मो अन्तान्. आ यः पप्रौ चर्षणीधृद्वरोभिः प्र सिन्धुभ्यो रिरिचानो महित्वा.. (१) हे स्तोता! नेताओं में श्रेष्ठ इंद्र की स्तुति करो. उनके महत्त्व से दूसरों के तेज हार जाते हैं. उनकी महिमा सारी धरती को पराभूत करती है. वे मानव प्रजा को धारण करते हैं. उनका महत्त्व सागर से भी बड़ा है तथा वे अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करते हैं. (१) स सूर्यः पर्युरू वरांस्येन्द्रो ववृत्याद्रथ्येव चक्रा. अतिष्ठन्तमपस्यं१न सर्गं कृष्णा तमांसि त्विष्या जघान.. (२) सारथि जिस प्रकार रथ का पहिया घुमाता है, उसी प्रकार शोभन वीर्य वाले इंद्र अपने अधिक तेज को चारों ओर घुमाते हैं. इंद्र अपने तेज से शीघ्र गति वाले एवं कार्यकुशल विश्व के समान अंधकार को नष्ट करते हैं. (२) समानमस्मा अनपावृहर्चं क्ष्मया दिवो असमं ब्रह्म नव्यम्. वि यः पृष्ठेव जनिमान्यर्य इन्द्रश्चिकाय न सखायमीषे.. (३) हे स्तोता! तुम मेरे साथ उन इंद्र के लिए निकृष्टता रहित द्यावा-पृथिवी में अद्वितीय एवं नए स्तोत्र को बोलो जो यज्ञों में उत्पन्न स्तोत्रों को सुनने के लिए उतने ही इच्छुक हैं, जितने कि शत्रुओं को देखने के लिए हैं. वे अपने मित्रों का बुरा नहीं चाहते. (३) इन्द्राय गिरो अनिशितसर्गा अपः प्रेरयं सगरस्य बुध्नात्. यो अक्षेणेव चक्रिया शचीभिर्विष्वक्तस्तम्भ पृथिवीमृत द्याम्.. (४) मैंने इंद्र के लिए सर्वोच्च स्तुतियां की हैं. इन स्तुतियों द्वारा मैंने अंतरिक्ष के जल को बरसने के लिए प्रेरित किया है. वे इंद्र अपने कर्मों द्वारा द्यावा और पृथ्वी को इस प्रकार धारण करते हैं, जिस प्रकार धुरा पहियों को धारण करता है. (४) आपान्तमन्युस्तृपलप्रभर्मा धुनिः शिमीवाञ्छुरुमाँ ऋजीषी.

सोमो विश्वान्यतसा वनानि नार्वागिन्द्रं प्रतिमानानि देभुः.. (५) पीने के पश्चात् ओज उत्पन्न करने वाले पत्थरों द्वारा शीघ्रता से कूटे गए शत्रुओं को कंपाने वाले कर्मठ आयुधधारी एवं गतिशील सोम सभी वनों को बढ़ाते हैं. ये वन न तो इंद्र की समानता कर सकते हैं, न उन्हें लघु बना सकते हैं. (५) न यस्य द्यावापृथिवी न धन्व नान्तरिक्षं नाद्रयः सोमो अक्षाः. यदस्य मन्युरधिनीयमानः शृणाति वीळु रुजति स्थिराणि.. (६) द्यावा-पृथिवी, उदक, अंतरिक्ष एवं पर्वत जिन इंद्र की समानता नहीं कर सकते, उन्हीं के लिए सोमरस निचोड़ा जाता है. इंद्र का क्रोध जब शत्रुओं पर होता है, उस समय ये दृढ़तापूर्वक शत्रुओं को मारते हैं एवं उनके स्थिर पदार्थों को भी तोड़ डालते हैं. (६) जघान वृत्रं स्वधितिर्वनेव रुरोज पुरो अरदन्न सिन्धून्. बिभेद गिरिं नवमिन्न कुम्भमा गा इन्द्रो अकृणुत स्वयुग्भिः.. (७) फरसा जिस प्रकार वृक्षों को काटता है, उसी प्रकार इंद्र शत्रुओं को मारते हैं. इंद्र ने शत्रुनगरियों को तोड़ा, वर्षा के जल से नदियों को आकार दिया व पहाड़ों को कच्चे घड़े के समान फोड़ा. इंद्र ने अपने साथी मरुतों के साथ जल को हमारे सामने प्रस्तुत किया. (७) त्वं ह त्यदृणया इन्द्र धीरोऽसिर्न पर्व वृजिना शृणासि. प्र ये मित्रस्य वरुणस्य धाम युजं न चना मिनन्ति मित्रम्.. (८) हे धीर इंद्र! तुम स्तोताओं को ऋण से छुड़ाते हो. जिस प्रकार तलवार पशुओं की बोटियां काटती है, उसी प्रकार तुम स्तोताओं के पापों को नष्ट करते हो. जो मूर्ख लोग वरुण और मित्र को धारण करने वाले एवं मित्रतुल्य यज्ञकर्म का लोप करते हैं, उन्हें भी इंद्र नष्ट करते हैं. (८) प्र ये मित्रं प्रार्यमणं दुरेवाः प्र सङ्गिरः प्र वरुणं मिनन्ति. न्य१मित्रेषु वधमिन्द्र तुम्रं वृषन्व्ऋषणमरुषं शिशीहि.. (९) हे अभिलाषापूरक इंद्र! जो बुरे लोग मित्र, अर्यमा, मरुद्गण एवं वरुण से द्वेष करते हैं, उन शत्रुओं के लिए तुम अपना गतिशील, कामवर्षक एवं दीप्तिशाली वज्र तेज करो. (९) इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत्पर्वतानाम्. इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमे योगे हव्य इन्द्रः.. (१०) इंद्र स्वर्ग, धरती, जल, पर्वतों, वृद्धों एवं ज्ञानियों के स्वामी हैं. योग और क्षेम के लिए इंद्र को ही बुलाया जाता है. (१०)

प्राक्तुभ्य इन्द्रः प्र वृधो अहभ्यः प्रान्तरिक्षात्प्र समुद्रस्य धासेः. प्र वातस्य प्रथसः प्र ज्मो अन्तात्प्र सिन्धुभ्यो रिरिचे प्र क्षितिभ्यः.. (११) इंद्र रात, दिन, अंतरिक्ष, जल धारण करने वाले समुद्र विस्तृत वायु, धरती की सीमांत नदियों एवं मानवों से बढ़कर हैं. (११) प्र शोशुचत्या उषसो न केतुरसिन्वा ते वर्ततामिन्द्र हेतिः. अश्मेव विध्य दिव आ सृजानस्तपिष्ठेन हेषसा द्रोघमित्रान्.. (१२) हे इंद्र! तुम्हारा न टूटने वाला आयुध वज्र ज्योति वाली उषा की किरणों के साथ शत्रुओं पर गिरे. जैसे आकाश से गिरने वाली बिजली वृक्षों को नष्ट करती है, उसी प्रकार तुम द्रोह करने वाले अमित्रों को अत्यंत तप्त और गर्जन करने वाले आयुधों से मारो. (१२) अन्वह मासा अन्विद्वनान्यन्वोषधीरनु पर्वतासः. अन्विन्द्रं रोदसी वावशाने अन्वापो अजिहत जायमानम्.. (१३) जैसे ही इंद्र का जन्म हुआ, वैसे ही मास, वन, ओषधियां, पर्वत, एक-दूसरे को चाहने वाले द्यावा-पृथिवी एवं जल उनके पीछे चलने लगे. (१३) कर्हि स्वित्सा त इन्द्र चेत्यासदघस्य यद्विनदो रक्ष एषत्. मित्रक्रुवो यच्छसने न गावः पृथिव्या आपृगमुया शयन्ते.. (१४) हे इंद्र! तुमने जिस तलवार को फेंककर पापी राक्षसों का छेदन किया था, वह कब फेंकी जाएगी? जिस प्रकार वधशाला में गाएं कटती हैं, उसी प्रकार तुम्हारे इस आयुध से चोट खाकर मित्रों से द्वेष करने वाले राक्षस धरती पर गिरते हैं और सो जाते हैं. (१४) शत्रूयन्तो अभि ये नस्ततस्रे महि व्राधन्त ओगणास इन्द्र. अन्धेनामित्रस्तमसा सचन्तां सुज्योतिषो अक्तवस्ताँ अभि ष्युः.. (१५) हे इंद्र! जिन राक्षसों ने हमारे प्रति शत्रुभाव रखकर हमें बाधा पहुंचाई है एवं एकत्र होकर जिन्होंने हमें घेर लिया है, वे गहरे अंधकार में डूब जावें. उनके लिए ज्योति वाली रात भी अंधेरी हो जाए. (१५) पुरूणि हि त्वा सवना जनानां ब्रह्माणि मन्दन्गृणतामृषीणाम्. इमामाघोषन्नवसा सहूतिं तिरो विश्वाँ अर्चतो याह्यर्वाङ्.. (१६) हे इंद्र! यजमानों के बहुत से यज्ञ एवं स्तुति करते हुए ऋषियों की स्तुतियां तुम्हें प्रसन्न करती हैं. तुम इस स्तुति को शोभायुक्त बताते हुए अन्य सब स्तुतिकर्त्ताओं का तिरस्कार करो एवं रक्षासाधनों के साथ मेरे सामने स्थित होओ. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

एवा ते वयमिन्द्र भुञ्जतीनां विद्याम सुमतीनां नवानाम्. विद्याम वस्तोरवसा गृणन्तो विश्वामित्रा उत त इन्द्र नूनम्.. (१७) हे इंद्र! हम रक्षा करने वाले एवं तुमसे संबंधित नए-नए स्तोत्र प्राप्त करें. हम विश्वामित्र की संतान अपनी रक्षा के लिए तुम्हारी स्तुति करते हुए नाना प्रकार की संपत्ति प्राप्त करें. (१७) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संज्जितं धनानाम्.. (१८) हम इस युद्ध में विशाल शरीर वाले, संपत्तिशाली, पुकार सुनने वाले, उग्र संग्रामों में शत्रुओं को मारने वाले एवं शत्रुजनों को भली प्रकार जीतने वाले इंद्र को अन्नप्राप्ति और रक्षा के लिए बुलाते हैं. (१८) सूक्त—९० देवता—पुरुष सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्. स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्.. (१) विराट् पुरुष के हजार शीर्ष, हजार आंखें और हजार चरण हैं. वह धरती को चारों ओर से घेरकर उससे दस अंगुल अधिक स्थित हैं. (१) पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्. उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति.. (२) जो कुछ हो चुका है अथवा होने वाला है, वह सब विराट् पुरुष ही है. वह अमृत का स्वामी है, क्योंकि वह कारण अवस्था छोड़कर जगत् अवस्था को धारण करता है. इस प्रकार प्राणी उसको भोगते हैं. (२) एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः. पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. (३) यह सारा ब्रह्मांड विराट् पुरुष की महिमा है. वे स्वयं इससे बड़े हैं. सभी प्राणी उनके चौथाई अंश हैं. इनके तीन मरणरहित अंश दिव्यलोक में रहते हैं. (३) त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः. ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि.. (४) तीन चरणों वाले विराट् पुरुष ऊपर उठे. उनका केवल एक चरण यहां स्थित रहा. इसके पश्चात् वे भोजन करने वाली एवं भोजन न करने वाली वस्तुओं के रूप में व्याप्त हुए. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

तस्माद्विराळजायत विराजो अधिपूरुषः. स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः.. (५) उस आदि पुरुष से ब्रह्मांडरूपी विराट् उत्पन्न हुआ. ब्रह्मांडरूपी विराट् से अनेक पुरुष उत्पन्न हुए. उत्पन्न होने के पश्चात् वह ब्रह्मांड से बड़ा हुआ. इसके बाद उसने भूमि बनाई और भूमि से जीवों का शरीर बनाया. (५) यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत. वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः.. (६) जब पुरुषरूप काल्पनिक हवि से देवों ने यज्ञ का विस्तार किया, उस समय वसंत ऋतु को घी, ग्रीष्म को काष्ठ तथा शरद ऋतु को हवि बनाया. (६) तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः. तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये.. (७) सारी सृष्टि से पहले उत्पन्न पुरुष को यज्ञसाधन के रूप में बलिपशु बनाकर देवों ने काल्पनिक यज्ञ किया. इस साधन में देवों, साध्यों और ऋषियों ने यज्ञ किया. (७) तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्. पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये.. (८) जिस काल्पनिक यज्ञ में उस सर्वात्मक पुरुष का हवन किया जाता है, उससे दही से मिला हुआ घी उत्पन्न हुआ. उसीसे वायु देव से संबंधित जंगली और ग्रामीण पशु भी उत्पन्न हुए. (८) तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे. छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत.. (९) उस सर्वात्मक पुरुष के काल्पनिक होम वाले यज्ञ से ऋक् और साम उत्पन्न हुए, उसीसे छंद उत्पन्न हुए और यजु की उत्पत्ति हुई. (९) तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः. गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तमस्माज्जाता अजावयः.. (१०) उसी यज्ञ से घोड़े उत्पन्न हुए, जिनके मुंह में ऊपर-नीचे दोनों ओर दांत थे. उसीसे गाएं, बकरियां और भेड़ें उत्पन्न हुईं. (१०) यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्. मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते.. (११) प्रजापति के प्राणरूप देवों ने जब विराट् पुरुष को संकल्प से उत्पन्न किया, तब उन्हें ebook converter DEMO Watermarks*

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