ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
भगभक्तस्य ते वयमुदशेम तवावसा. मूर्धानं राय आरभे.. (५) हे सूर्य देव! तुम धन के स्वामी हो. यदि तुम रक्षा करो तो हम धन की उन्नति करने में लग जावें. (५) नहि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः. नेमा आपो अनिमिषं चरन्तीर्न ये वातस्य प्रमिनन्त्यभ्वम्.. (६) हे वरुण देव! आकाश में उड़ने वाले पक्षियों में भी तुम्हारे समान शक्ति और पराक्रम नहीं है. इन्हें तुम्हारे बराबर क्रोध भी नहीं मिला है. सर्वदा चलने वाली वायु और बहने वाला जल तुम्हारी गति से आगे नहीं बढ़ सकता. (६) अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः. नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः.. (७) शुद्ध बल के स्वामी वरुण मूलरहित आकाश में ठहर कर उत्तम तेज के समूह को ऊपर ही ऊपर धारण करते हैं. उस तेजसमूह की किरणों का मुख नीचे और जड़ें ऊपर हैं. उन्हीं के कारण हममें प्राण स्थित रहते हैं. (७) उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ. अपदे पादा प्रतिधातवे ऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्.. (८) राजा वरुण ने सूर्य के उदय से अस्त तक चलने के लिए मार्ग का विस्तार किया है. उसने आकाश में बिना पैरों वाले सूर्य के चलने के लिए मार्ग बनाया है. वे मेरे हृदय का भेदन करने वाले शत्रु का नाश करें. (८) शतं ते राजन्भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिष्टे अस्तु. बाधस्व दूरे निर्ऋतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुग्ध्यस्मत्.. (९) हे राजा वरुण! आपकी ओषधियां सैकड़ों-हजारों हैं. आपकी उत्तम बुद्धि विस्तृत और गंभीर हो. तुम हमारा अनिष्ट करने वाले पापों को हमसे दूर रखो. हमने जो पाप किए हैं, उन्हें नष्ट कर दो. (९) अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृश्रे कुह चिद्दि्वेयुः. अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशच्चन्द्रमा नक्तमेति.. (१०) ऊंचे आकाश में जो सप्तर्षि नामक तारे स्थित हैं, वे रात में दिखाई देते हैं, पर दिन में कहां चले जाते हैं? वरुण देव के कार्यों में कोई बाधा नहीं डाल सकता. वरुण की आज्ञा से ही रात में चंद्रमा प्रकाशित होता है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः. अहेळमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः.. (११) हे वरुण! यजमान हव्य के द्वारा तुमसे जिस आयु की याचना करते हैं, मैं शक्तिशाली स्तोत्र के द्वारा तुम्हारी स्तुति करके उसी परम आयु की याचना करता हूं. तुम इस विषय में लापरवाही न करके ठीक से ध्यान दो. अगणित लोग तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. तुम मुझसे मेरी आयु मत छीनो. (११) तदिन्नक्तं तद्दिवा मह्यमाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे. शुनःशेपो यमह्वद्गृभीतः सो अस्मान् राजा वरुणो मुमोक्तु.. (१२) कर्त्तव्य को जानने वाले लोगों ने रात में और दिन में मुझसे यही कहा है. मेरे हृदय से उत्पन्न ज्ञान भी यही सलाह देता है. शुनःशेप ने सूर्य से बंधकर जिनको पुकारा था, वे ही राजा वरुण हमें बंधन से मुक्त करें. (१२) शुनःशेपो ह्यह्वद्गृभीतस्त्रिष्वादित्यं द्रुपदेषु बद्धः. अवैनं राजा वरुणः ससृज्याद्विदाँ अदब्धो वि मुमोक्तु पाशान्.. (१३) लकड़ी के तीन यूपों से बंधे हुए शुनःशेप ने अदिति के पुत्र वरुण का आह्वान किया था, इसलिए विद्वान् एवं दयालु राजा वरुण ने शुनःशेप को बंधन से छुड़ा दिया था. (१३) अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः. क्षयन्नस्मभ्यमसुर प्रचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कृतानि.. (१४) हे वरुण! हम नमस्कार करके एवं यज्ञों में हवि प्रदान करके तुम्हारे क्रोध को समाप्त करते हैं. हे अनिष्ट का नाश करने वाले बुद्धिमान् वरुण! हमारे कल्याण के लिए इस यज्ञ में निवास करो और हमारे पापों को कम करो. (१४) उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय. अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (१५) हे वरुण! मेरे सिर में बंधे हुए फंदे को ऊपर से और पैरों में बंधे हुए फंदे को नीचे से खोल दो तथा कमर में बंधे हुए फंदे को बीच में ढीला कर दो. हे अदितिपुत्र वरुण! हम तुम्हारे यज्ञ में सतत संलग्न रहकर पापमुक्त हो जाएंगे. (१५) सूक्त—२५ देवता—वरुण यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम्. मिनीमसि द्यविद्यवि.. (१) हे वरुण देव! संसार के विद्वान् तुम्हारे व्रत का अनुष्ठान करने में जिस प्रकार भूलें करते ebook converter DEMO Watermarks*
हैं, उसी प्रकार हमसे भी प्रतिदिन प्रमाद होता रहता है. (१) मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः. मा हृणानस्य मन्यवे.. (२) हे वरुण! जो तुम्हारा अनादर करता है, तुम उसके लिए घातक बन जाते हो. तुम हमारा वध मत करना. तुम हमारे ऊपर क्रोध मत करना. (२) वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न सन्दितम्. गीर्भिर्वरुण सीमहि.. (३) हे वरुण देव! जिस प्रकार रथ का मालिक थके हुए घोड़े को स्वस्थ करता है, उसी प्रकार हम भी स्तुतियों द्वारा तुम्हारा मन प्रसन्न करते हैं. (३) परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये. वयो न वसतीरुप.. (४) जिस प्रकार चिड़ियां अपने घोंसलों की ओर तेजी से उड़ती हैं, उसी प्रकार हमारी क्रोधरहित विचारधाराएं जीवन प्राप्त करने के लिए दौड़ रही हैं. (४) कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे. मृळीकायोरुचक्षसम्.. (५) हम शक्तिशाली नेताओं तथा अगणित लोगों पर दृष्टि रखने वाले वरुण को इस यज्ञ में ले आवेंगे. (५) तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः. धृतव्रताय दाशुषे.. (६) मित्र और वरुण हव्य देने वाले यजमान पर प्रसन्न होकर हमारे द्वारा दिया हुआ साधारण हवि स्वीकार कर लेते हैं. वे कभी भी उसका त्याग नहीं करते. (६) वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्. वेद नावः समुद्रियः.. (७) वरुण आकाश में उड़ने वाले पक्षियों और सागर में चलने वाली नौकाओं का मार्ग जानते हैं. (७) वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः. वेदा य उपजायते.. (८) वरुण उक्त महिमा को धारण करके समय-समय पर उत्पन्न होने वाले बारह महीनों को जानते हैं और तेरहवें मास को भी जानते हैं. (८) वेद वातस्य वर्तनिमुरोर्ऋष्वस्य बृहतः. वेदा ये अध्यासते.. (९) वरुण विस्तार से संपन्न, दर्शनीय और अधिक गुण वाली वायु का मार्ग जानते हैं. वे आकाश में निवास करने वाले देवों से भी परिचित हैं. (९) नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्या३स्वा. साम्राज्याय सुक्रतुः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
व्रत धारण करने वाले एवं उत्तम कर्म करने वाले वरुण दैवी प्रजाओं पर साम्राज्य करने के लिए आकर बैठे थे. (१०) अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति. कृतानि या च कत्वा.. (११) बुद्धिमान् मनुष्य वरुण की अनुकंपा से वर्तमान काल और भविष्यत् काल की सारी आश्चर्यजनक घटनाओं को देख लेते हैं. (११) स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत्. प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (१२) शोभन बुद्धि वाले वे ही अदितिपुत्र वरुण हमें सदा उत्तम मार्ग पर चलने वाला बनावें एवं हमारी आयु को बढ़ावें. (१२) बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम्. परि स्पशो नि षेदिरे.. (१३) वरुण सोने का कवच धारण करके अपने बलिष्ठ शरीर को ढकते हैं. उसके चारों ओर सुनहरी किरणें फैलती हैं. (१३) न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम्. न देवमभिमातयः.. (१४) हिंसा करने वाले लोग भयभीत होकर वरुण की शत्रुता छोड़ देते हैं. मनुष्यों को पीड़ा पहुंचाने वाले लोग उन्हें पीड़ा नहीं पहुंचाते. पाप करने वाले लोग उनके प्रति पाप का आचरण त्याग देते हैं. (१४) उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या. अस्माकमुदरेष्वा.. (१५) वरुण ने मनुष्यों की उदरपूर्ति के लिए पर्याप्त अन्न पैदा किया है. वे विशेष रूप से हमारी उदरपूर्ति करते हैं. (१५) परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु. इच्छन्तीरुरुचक्षसम्.. (१६) बहुत से लोगों ने वरुण के दर्शन किए हैं. जिस प्रकार गाएं गोशाला की ओर जाती हैं, उसी प्रकार कभी पीछे न लौटने वाली मेरी विचारधारा वरुण की ओर अग्रसर होती है. (१६) सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम्. होतेव क्षदसे प्रियम्.. (१७) हे वरुण! मधुर रस वाला मेरा हव्य तैयार है. तुम होता के समान उस हव्य का भक्षण करो. इसके पश्चात् हम लोग आपस में बातें करेंगे. (१७) दर्शं नु विश्वदर्शिनं दर्शं रथमधि क्षमि. एता जुषत मे गिरः.. (१८) सब लोग जिन वरुण के दर्शन करते हैं, उन्हें मैंने देखा है. मैंने कई बार धरती पर चलता ebook converter DEMO Watermarks*
हुआ उनका रथ देखा है. वरुण ने मेरी प्रार्थना स्वीकार की है. (१८) इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय. त्वामवस्युरा चके.. (१९) हे वरुण देव! आज मेरी पुकार सुनो. आज मुझे सुख प्रदान करो. मैं अपनी रक्षा की इच्छा से तुम्हें बुला रहा हूं. (१९) त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि. स यामनि प्रति श्रुधि.. (२०) हे बुद्धिमान् वरुण! आकाश, धरती एवं समस्त संसार में तुम्हारा प्रकाश फैला हुआ है. तुम हमारी प्रार्थना सुनकर हमारी रक्षा करने का वचन दो. (२०) उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत. अवाधमानि जीवसे.. (२१) हमारे सिर वाले फंदे को ऊपर से और कमर के फंदों को बीच से खोल दो, जिससे हम जीवन धारण कर सकें. (२१) सूक्त—२६ देवता—अग्नि वसिष्वा हि मियेध्य वस्त्राण्यूर्जां पते. सेमं नो अध्वरं यज.. (१) हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के योग्य एवं अन्नों के पालक हो. तुम अपना तेज धारण करो और हमारे इस यज्ञ को पूरा करो. (१) नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः. अग्ने दिवित्मता वचः.. (२) हे अग्नि! तुम सदा युवा, कमनीय एवं तेजस्वी हो. हम यज्ञ संपन्न करने वाले एवं ज्ञानपूर्ण वाक्यों से तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. तुम यहां बैठो. (२) आ हि ष्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये. सखा सख्ये वरेण्यः.. (३) हे श्रेष्ठ अग्नि! जिस प्रकार पिता पुत्र को, भाई भाई को और मित्र मित्र को अभीष्ट वस्तुएं देता है, उसी प्रकार तुम भी मुझे इच्छित वस्तुएं दो. (३) आ नो बर्ही रिशादसो वरुणो मित्रो अर्यमा. सीदन्तु मनुषो यथा.. (४) हे अग्नि देव! शत्रुओं का नाश करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमा जिस प्रकार मनु के यज्ञ में आए थे, उसी प्रकार तुम भी हमारे यज्ञ में बिछे हुए कुशों पर बैठो. (४) पूर्व्य होतरस्य नो मन्दस्व सख्यस्य च. इमा उ षु श्रुधी गिरः.. (५) हे पूर्वज एवं यज्ञ संपन्नकर्त्ता अग्नि! हमारे इस यज्ञ और हमारी मित्रता से तुम प्रसन्न हो ebook converter DEMO Watermarks*
जाओ. हमारे इन स्तुति-वचनों को सुनो. (५) यच्चिद्धि शश्वता तना देवन्देवं यजामहे. त्वे इद्धूयते हवि:.. (६) यद्यपि नित्य एवं विस्तृत हव्य द्वारा हम भिन्न-भिन्न देवताओं का पूजन करते हैं, पर हे वरुण! वह भी तुम्हें ही प्राप्त होता है. (६) प्रियो नो अस्तु विशपतिर्होता मन्द्रो वरेण्य:. प्रिया: स्वग्नयो वयम्.. (७) प्रजापालक, यज्ञसंपादक, प्रसन्न और श्रेष्ठ अग्नि हमारे लिए प्रिय हों. हम भी शोभन अग्नि के सहयोग से उनके प्रिय बनें. (७) स्वग्नयो हि वार्यं देवासो दधिरे च न:. स्वग्नयो मनामहे.. (८) शोभन अग्नि से युक्त एवं तेजस्वी ऋत्विजों ने हमारे उत्तम द्रव्य को धारण किया है, इसलिए हम शोभन अग्नि के समीप पहुंचकर याचना करते हैं. (८) अथा न उभयेषाममृत मर्त्यानाम्. मिथ: सन्तु प्रशस्तय:.. (९) हे अग्नि! तुम अमर हो और हम मनुष्य मरणधर्मा हैं. हम लोग एक-दूसरे की प्रशंसा करें. (९) विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वच:. चनो धा: सहसो यहो.. (१०) हे बल के पुत्र अग्नि! तुम सब अग्नियों के साथ आकर हमारा यह यज्ञ और हमारी स्तुतियां स्वीकार करके हमें अन्न दो. (१०) सूक्त—२७ देवता—अग्नि अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभि:. सम्राजन्तमध्वराणाम्.. (१) हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के सम्राट् एवं पूंछ वाले घोड़े के समान हो. हम स्तुतियों के द्वारा तुम्हारी वंदना करते हैं. (१) स घा न: सूनु: शवसा पृथुप्रगामा सुशेव:. मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात्.. (२) अग्नि शक्ति के पुत्र और शीघ्र गमन करने वाले हैं, वे हमारे ऊपर प्रसन्न होकर हमें सुख दें और हमारी अभिलाषाओं की वर्षा करें. (२) स नो दूराच्चासाच्च नि मर्त्यादघायो:. पाहि सदमिद्विश्वायु:.. (३) हे अग्नि! तुम सर्वत्र गमन करने में समर्थ हो. तुम हमारा अनिष्ट करने वाले पापाचारी ebook converter DEMO Watermarks*
मनुष्यों से दूर एवं समीप देश में हमारी रक्षा करो. (३) इममू षु त्वमस्माकं सनिं गायत्रं नव्यांसम्. अग्ने देवेषु प्र वोचः.. (४) हे अग्नि! इस यज्ञ में उपस्थित हवि और नवीनतम गायत्री छंद में रचित स्तोत्र के विषय में देवों को बताना. (४) आ नो भज परमेष्वा वाजेषु मध्यमेषु. शिक्षा वस्वो अन्तमस्य.. (५) हे अग्नि! हमें दिव्यलोक तथा अंतरिक्षलोक का अन्न सब ओर से प्राप्त कराओ. तुम हमें भूलोक संबंधी धन भी प्रदान करो. (५) विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ. सद्यो दाशुषे क्षरसि.. (६) हे विलक्षण प्रकाश वाले अग्नि देव! जिस प्रकार सिंधु की लहरें जल को सभी पर्वतों, नालियों आदि में भर देती हैं, उसी प्रकार तुम भी लोगों में धन का विभाग करने वाले हो. द्रव्य देने वाले यजमान को तुम कर्म का फल शीघ्र दो. (६) यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः. स यन्ता शश्वतीरिषः.. (७) हे अग्नि देव! युद्धक्षेत्र में तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो और तुम्हारी प्रेरणा से जो युद्धक्षेत्र में जाता है, वह नित्य ही अन्न प्राप्त करता रहेगा. (७) नकिरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित्. वाजो अस्ति श्रवाय्यः.. (८) हे अग्नि देव! तुम शत्रुओं का दमन करने वाले हो. तुम्हारे भक्त यजमान पर कोई आक्रमण नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास विशेष प्रकार की शक्ति है. (८) स वाजं विश्वचर्षणिर्वाद्भिरस्तु. तरुता विप्रेभिरस्तु सनिता.. (९) सारे मनुष्य अग्नि की पूजा करते हैं. उसने घोड़ों की सहायता से हमें युद्ध में सफलता दिलाई है. वह बुद्धिमान् ऋत्विजों को यज्ञकर्म का फल देने वाला हो. (९) जराबोध तद्विविद्धि विशेविशे यज्ञियाय. स्तोमं रुद्राय दृशीकम्.. (१०) हे अग्नि देव! हम प्रार्थना के द्वारा तुम्हें जगाते हैं. तुम भिन्नभिन्न यजमानों पर कृपा करके यज्ञ का अनुष्ठान पूर्ण करने के लिए यज्ञ में आओ. तुम क्रूर हो. यजमान सुंदर स्तोत्रों से तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१०) स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः. धिये वाजाय हिन्वतु.. (११) अग्नि देव सीमारहित धूमकेतु वाले तथा महान् हैं. उनकी ज्योति विशाल है. वह हमारे ebook converter DEMO Watermarks*
यज्ञ और अन्न के लिए प्रसन्न हों. (११) स रेवाँ इव विशपतिर्देव्यः केतुः शृणोतु नः. उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः.. (१२) अग्नि प्रजापालक, देवताओं के होता, दूत के समान देवताओं का ज्ञापन करने वाले एवं स्तुति सुनने वाले हैं. उसी प्रकार अग्नि हमारी स्तुति सुनें. (१२) नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः. यजाम देवान्यदि शन्कवाम मा ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः.. (१३) बड़े, बालक, युवा एवं वृद्ध सभी देवताओं को हम नमस्कार करते हैं. यदि संभव होगा तो हम देवताओं की पूजा करेंगे. हम कहीं विशिष्ट गुणसंपन्न देवों की स्तुति करना न छोड़ दें. (१३) सूक्त—२८ देवता—इंद्र आदि यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे. उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (१) हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमरस निचोड़ने के लिए भारी जड़ वाला पत्थर उठाया जाता है और ओखली की सहायता से सोमरस तैयार किया जाता है, वहां सोमरस अपना जानकर पिओ. (१) यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता. उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (२) हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमलता को निचोड़ने के लिए दोनों फलक जांघों के समान फैल गए हैं, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (२) यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते. उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (३) हे इंद्र! जिस यज्ञ में यजमान की पत्नियां भीतर घुसती और बाहर निकलती रहती हैं, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (३) यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव. उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः.. (४) हे इंद्र! जिस यज्ञ में सोमलता मंथन करने का दंड घोड़े की लगाम के समान बांधा जाता है, उसी यज्ञ में ओखली द्वारा तैयार किया हुआ सोमरस अपना जानकर पिओ. (४)
यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे. इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः.. (५) हे ऊखल! यद्यपि घर-घर में तुम्हारा प्रयोग किया जाता है, पर इस यज्ञ में तुम उसी प्रकार ध्वनि करते हो, जिस प्रकार विजयी लोग दुंदुभी बजाते हैं. (५) उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित्. अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखल.. (६) हे ऊखल रूप काष्ठ! तुम्हारे ही सामने होकर हवा चलती है, इसलिए हे ऊखल! इंद्र देवता के पान के लिए सोमरस तैयार करो. (६) आयजी वाजसातमा ता ह्यु१च्चा विजर्भृतः. हरी इवान्धांसि बप्सता.. (७) हे ऊखल और मूसल! तुम दोनों सभी प्रकार यज्ञ के साधन एवं प्रभूत अन्न देने वाले हो. जिस प्रकार इंद्र के दोनों घोड़े अपना खाद्य चना आदि चबाते समय ध्वनि करते हैं, उसी प्रकार तुम भी तुमुल ध्वनि के साथ परस्पर प्रहार करते हो. (७) ता नो अद्य वनस्पती ऋष्वावृष्वेभिः सोतृभिः. इन्द्राय मधुमत्सुतम्.. (८) हे ऊखल और मूसल रूप दोनों काष्ठो! तुम दोनों देखने में परम सुंदर हो. शोभन अभिनव मंत्रों के सहयोग से तुम दोनों इंद्र के लिए मधुर सोमरस तैयार करो. (८) उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज. नि धेहि गोरधि त्वचि.. (९) सोमरस निचोड़ने वाले फलकों से बचे हुए सोम को उठाकर पवित्र कुशों के ऊपर रखो. इसके बाद उसे गोचर्म से बनाए हुए पात्र में रखो. (९) सूक्त—२९ देवता—इंद्र यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (१) हे इंद्र! तुम सोमपानकर्त्ता एवं सत्यवादी हो. हम कोई प्रसिद्ध व्यक्ति नहीं हैं. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों और अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ. (१) शिप्रिन्वाजानां पते शचीवस्तव दंसना. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे शक्तिशाली, सुंदर ठोड़ी वाले एवं अन्नों के पालक इंद्र! हम पर सदा तुम्हारा अनुग्रह रहे. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ. (२) नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (३) तुम परस्पर मिलकर देखने वाली यमदूतियों को भली-भांति सुला दो. वे सदा बेहोश रहें, कभी न जागें. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ. (३) ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (४) हे शूर! हमारे शत्रु असावधान रहें और हमारे मित्र सावधान रहें. अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ. (४) समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापयामुया. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (५) हे इंद्र! यह गधे के रूप वाला हमारा बैरी निंदा रूपी वचनों से आपकी बदनामी कर रहा है. इसे मार डालो. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ. (५) पताति कुण्डृणाच्या दूरं वातो वनादधि. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (६) हमारे प्रतिकूल वायु कुटिल गति से चलती हुई वन से दूर चली जाए. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा धनवान् बनाओ. (६) सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्. आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (७) तुम हमारे प्रति क्रोध करने वालों का नाश करो, हमारी हिंसा करने वालों को मार डालो. हे अनंत धनशाली इंद्र! हमें सुंदर और अगणित गायों तथा अश्वों द्वारा उत्तम धनवान् बनाओ. (७) सूक्त—३० देवता—इंद्र आ व इन्द्रं क्रिविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम्. मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे यजमानो एवं ऋत्विजो! जिस प्रकार कुएं को जल से भर देते हैं, उसी प्रकार हम अन्न की इच्छा से हजार यज्ञ करने वाले एवं महान् इंद्र को सोमरस से सींच देते हैं. (१) शतं वा यः शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्. एदु निम्नं न रीयते.. (२) जिस प्रकार पानी अपने आप नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार इंद्र सैकड़ों संख्या वाले विशुद्ध सोमरस एवं हजारों संख्या वाले आशीर मिश्रित सोमरस के समीप आते हैं. (२) सं यन्मदाय शुष्मिण एना ह्यस्योदरे. समुद्रो न व्यचो दधे.. (३) पहले बताया हुआ सोमरस बलशाली इंद्र को प्रसन्न करने के लिए एकत्रित हुआ है. इसके द्वारा इंद्र का सागर के समान विस्तृत उदर भर जाता है. (३) अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्. वचस्तच्चिन्न ओहसे.. (४) हे इंद्र! जिस प्रकार कबूतर गर्भ धारण करने की इच्छुक कबूतरी को प्राप्त करता है, उसी प्रकार तुम अपने इस सोमरस को ग्रहण करो. इसी सोमरस के कारण हमारी प्रार्थनाएं भी स्वीकार करो. (४) स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते. विभूतिरस्तु सूनृता.. (५) हे धन के रक्षक एवं उत्तम वचनों द्वारा स्तुति किए गए वीर इंद्र! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. यह स्तुति तुम्हारी विभूति से संपन्न एवं सत्य हो. (५) ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतये स्मिन्वाजे शतक्रतो. समन्येषु ब्रवावहै.. (६) हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! इस संग्राम में हमारी रक्षा करने के लिए तत्पर रहो. दूसरे कार्यों के विषय में हम और तुम मिलकर बातचीत करेंगे. (६) योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे. सखाय इन्द्रमूतये.. (७) हम प्रत्येक यज्ञ के आरंभ में एवं अपने यज्ञों में विघ्न डालने वाले विभिन्न संग्रामों में परम शक्तिशाली इंद्र को अपनी रक्षा के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार कोई अपने मित्र को बुलाता है. (७) आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः. वाजेभिरुप नो हवम्.. (८) इंद्र यदि हमारी पुकार सुनेंगे तो यह निश्चय है कि वे हजारों पालनशक्तियों एवं अन्नों के साथ हमारे निकट आवेंगे. (८) अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्. यं ते पूर्वं पिता हुवे.. (९)
इंद्र बहुत से यजमानों के पास जाते हैं. मैं उनके प्राचीन निवासस्थान स्वर्ग से उन्हें बुलाता हूं. इससे पूर्व मेरे पिता भी उन्हें बुला चुके हैं. (९) तं त्वा वयं विश्ववारा शास्महे पुरुहूत. सखे वसो जरितृभ्यः.. (१०) हे सबके प्रिय इंद्र! अगणित लोग तुम्हें अपने यज्ञों में बुलाते हैं. तुम्हें सब मित्र के समान प्रेम करते हैं. तुम सबको स्वर्ग में स्थान देते हो. मैं प्रार्थना करता हूं कि तुम स्तुति करने वालों पर कृपा करो. (१०) अस्माकं शिपिरिणीनां सोमपाः सोमपान्वाम्. सखे वज्रिन्तसखीनाम्.. (११) हे सोमरस पीने वाले इंद्र! तुम सबके मित्र और वज्रधारी हो. हम तुम्हारे मित्र और सोमपान करने वाले हैं. तुम हमारी लंबी नाक वाली गायों की वृद्धि करो. (११) तथा तदस्तु सोमपाः सखे वज्रिन्तथा कृणु. यथा त उश्मसीष्टये.. (१२) हे इंद्र! तुम सोमरस पीने वाले, सबके मित्र और वज्रधारी हो. तुम इस प्रकार के कार्य करो कि हम अपनी अभिलषित वस्तुएं पाने के लिए तुम्हें प्रेम करें. (१२) रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः. क्षुमन्तो याभिर्मदेम.. (१३) जब इंद्र हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाएंगे तो हमारी गाएं अधिक दूध देने वाली एवं शक्तिसंपन्न बनेंगी. उन गायों से भोजन प्राप्त करके हम प्रसन्न होंगे. (१३) आ घ त्वावान्त्मनाप्तः स्तोतृभ्यो धृष्णवियानः. ऋणोरक्षं न चक्रयोः.. (१४) हे साहसी इंद्र! तुम्हारी कृपा से हमें तुम्हारे ही समान कोई देवता अनायास मिल जाएगा. हम उसकी स्तुति करेंगे, उससे मांगेंगे, तो वह अवश्य ही हमें मनचाही संपत्ति देगा. जिस प्रकार घोड़े रथ के दोनों पहियों के अरों को घुमाते हैं, उसी प्रकार वे धन को हमारी ओर प्रेरित करेंगे. (१४) आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम्. ऋणोरक्षं न शचीभिः.. (१५) हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! जिस प्रकार गाड़ी के आगे बढ़ने से पहियों के अरे अपने आप घूमते हैं, उसी प्रकार हम स्तुति करने वालों को इच्छानुसार धन दो. (१५) शश्वदिन्द्रः पोप्रुथद्भिर्जिगाय नानदद्भिः शाश्वसद्भिर्धनानि. स नो हिरण्यरथं दंसनावान्त्स नः सनिता सनये स नोऽदात्.. (१६) घास खा लेने के पश्चात् इंद्र के घोड़े शब्द करते हुए हिनहिनाते हैं और जोरजोर से सांस लेते हैं. इंद्र ने उन्हीं की सहायता से सदा शत्रुओं की संपत्ति को जीता है. इंद्र कर्मपरायण एवं ebook converter DEMO Watermarks*
दाता हैं. उन्हीं ने हमें सोने का रथ दिया है. (१६) आश्विनावश्वावत्येषा यातं शवीरया. गोमद्दस्रा हिरण्यवत्.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! तुम बहुत से घोड़ों द्वारा ढोया हुआ अन्न लेकर आओ. हे शत्रुनाशक! हमारा घर बहुत सी गायों और सोने से भरा हो. (१७) समानयोजनो हि वां रथो दस्रावमर्त्यः. समुद्रे अश्विनयेते.. (१८) हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुम दोनों के लिए एक ही अविनाशी रथ तैयार किया गया है. वह रथ समुद्र और आकाश में भी चल सकता है. (१८) न्य१घ्न्यस्य मूर्धनि चक्रं रथस्य येमथुः. परि द्यामन्यदीयते.. (१९) हे अश्विनीकुमारो! तुमने शत्रुओं का विनाश करने के लिए अपने रथ का एक पहिया स्थिर पर्वत के ऊपर जमाया है और दूसरा आकाश में चारों ओर घूम रहा है. (१९) कस्त उषः कधप्रिये भुजे मर्तो अमर्त्ये. कं नक्षसे विभावरि.. (२०) हे अमर उषा! तुम्हें स्तुति बहुत प्यारी लगती है. कोई भी मनुष्य तुम्हारा उपभोग करने में समर्थ नहीं है. हे विशेष प्रभावशालिनी! तुम किस पुरुष को प्राप्त होगी? (२०) वयं हि ते अमन्मह्याऽन्तादा पराकात्. अश्वे न चित्रे अरुषि.. (२१) हे विस्तृत एवं रंगबिरंगे प्रकाश वाली उषा! हम तुम्हें न दूर से समझ सकते हैं और न पास से. (२१) त्वं त्योभिरा गहि वाजेभिर्दुहितर्दिवः. अस्मे रयिं नि धारय.. (२२) हे आकाश की पुत्री उषा! तुम प्रसिद्ध अन्नों के साथ आओ और हमें धन दो. (२२) सूक्त—३१ देवता—अग्नि त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरा ऋषिर्देवो देवानामभवः शिवः सखा. तव व्रते कवयो विद्मनापसोऽजायन्त मरुतो भ्राजदृष्टयः.. (१) हे अग्नि! तुम अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के आदि ऋषि थे. तुम स्वयं देव थे एवं अन्य देवों के कल्याणकारक मित्र थे. तुम्हारे कर्म के कारण ही मरुद्गणों ने जन्म लिया जो अपना कर्म जानते हैं और जिनके शस्त्र चमकीले हैं. (१) त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरस्तमः कविर्देवानां परि भूषसि व्रतम्. ebook converter DEMO Watermarks*
विभुर्विश्वस्मै भुवनाय मेधिरो द्विमाता शयुः कतिधा चिदायवे.. (२) हे अग्नि! तुम अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों में प्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ हो. तुम बुद्धिमान् हो और देवों के यज्ञों को सुशोभित करते हो. तुम सारे संसार पर अनुग्रह के लिए अनेक रूप से व्याप्त हो. तुम मेधावी एवं दो लकड़ियों से उत्पन्न हो. मनुष्यों का कल्याण करने के लिए तुम भिन्नभिन्न रूपों में सब जगह रहते हो. (२) त्वमग्ने प्रथमो मातरिश्वन आविर्भव सुक्रतूया विवस्वते. अरेजेतां रोदसी होतूर्वूर्येऽसघ्नोर्भारमयजो महो वसो.. (३) हे अग्नि! तुम वायु की अपेक्षा प्रमुख हो और यजमान के निकट सुंदर यज्ञ को पूर्ण करने की इच्छा से प्रकट हो जाओ. तुम्हारी सामर्थ्य देखकर धरती और आकाश कांप उठते हैं. तुमने श्रेष्ठ होता के रूप में यज्ञ का कार्य स्वीकार किया है. तुम्हारे यज्ञ में निवास के कारण पूज्य देवताओं के यज्ञ पूर्ण हुए हैं. (३) त्वमग्ने मनवे द्यामवाशयः पुरूरवसे सुकृते सुकृत्तरः. श्वात्रेण यत्पित्रोर्मुच्यसे पर्या त्वा पूर्वमनयन्नापरं पुनः.. (४) हे अग्नि! तुमने मनु पर अनुग्रह करके यह बताया था कि किन कर्मों से स्वर्ग मिलता है. तुमने अपने सेवक पुरूरवा को शोभन फल दिया. दोनों काष्ठ तुम्हारे माता-पिता हैं. उनके घर्षण से तुम उत्पन्न होते हो. ऋत्विज् तुम्हें पहले वेदी के पूर्व भाग में ले जाते हैं, बाद में पश्चिम भाग में. (४) त्वमग्ने वृषभः पुष्टिवर्धन उद्यतस्रुचे भवसि श्रवाय्यः. य आहुतिं परि वेदा वषट्कृतिमेकायुरग्रे विश आविवाससि.. (५) हे अग्नि! तुम अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले हो एवं यजमान को धन आदि से पुष्ट करते हो. हे एकमात्र अन्नदाता! जो यजमान यज्ञपात्र उठाते हुए तुम्हारा यश गाता है एवं वषट्कार शब्द के साथ तुम्हें आहुति देता है, तुम उसे पहले प्रकाश देते हो, उसके बाद सारे संसार को. (५) त्वमग्ने वृजिनवर्तनिं नरं सकमन्विपर्षि विदथे विचर्षणे. यः शूरसाता परितक्म्ये धने दभ्रेभिश्चित्समृता हंसि भूयसः.. (६) हे विशिष्ट ज्ञानसंपन्न अग्नि! तुम सदाचारहीन मनुष्य को ऐसे काम में लगाते हो, जिससे उसका उद्धार हो सके. जब विस्तृत युद्ध चारों ओर भली-भांति आरंभ हो जाता है तो तुम्हारी कृपा से थोड़ी संख्या वाले एवं वीरताशून्य लोग बड़े-बड़े वीरों का वध कर डालते हैं. (६) त्वं तमग्ने अमृतत्व उत्तमे मर्तं दधासि श्रवसे दिवेदिवे. यस्तातृषाण उभयाय जन्मने मयः कृणोषि प्रय आ च सूरये.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अग्नि! जो मनुष्य तुम्हारी सेवा करता है, उसके लिए तुम अन्न प्रदान करने हेतु उत्तम और स्थायी पद पर प्रतिष्ठित कर देते हो. जो यजमान मनुष्यों एवं पशुओं को प्राप्त करने के लिए अत्यंत उत्सुक है, उस बुद्धिमान् यजमान को तुम सुख और अन्न दो. (७) त्वं नो अग्ने सनये धनानां यशसं कारुं कृणुहि स्तवानः. ऋध्याम कर्मापसा नवेन देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः.. (८) हे अग्नि! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें धन एवं यश देने वाला तथा यज्ञकर्म करने वाला पुत्र प्रदान करो. तुम्हारे द्वारा दिए गए नवीन पुत्र से हम पराक्रम में उन्नति करेंगे. हे धरती और आकाश! तुम अन्य देवों के साथ मिलकर हमारी ठीक से रक्षा करो. (८) त्वं नो अग्ने पित्रोरुपस्थ आ देवो देवेष्वनवद्य जागृवि. तनूकृद्बोधि प्रमतिश्च कारवे त्वं कल्याण वसु विश्वमोपिषे.. (९) हे दोषरहित अग्नि! तुम सब देवों की अपेक्षा जागरूक हो. तुम अपने माता-पिता धरती-आकाश के पास रहकर अनुग्रह के रूप में हमें पुत्र दो एवं यज्ञकर्त्ता यजमान के प्रति प्रसन्नचित्त रहो. हे कल्याणकारक! तुम यजमान के लिए सभी प्रकार की संपत्ति प्रदान करो. (९) त्वमग्ने प्रमतिस्त्वं पितासि नस्त्वं वयस्कृत्तव जामयो वयम्. सं त्वा रायः शतिनः सं सहस्रिणः सुवीरं यन्ति व्रतपामदाभ्य.. (१०) हे अग्नि! तुम हम पर अनुग्रह बुद्धि रखते हो. तुम हमारे पालक हो. तुम हमें दीर्घ जीवन देते हो. हम तुम्हारे बंधु हैं. कोई तुम्हारी हिंसा नहीं कर सकता, क्योंकि तुम शोभन पुरुषों से युक्त एवं यज्ञ के पालन करनेवाले हो. तुम्हें सैकड़ों एवं हजारों प्रकार की संपत्तियां भली प्रकार प्राप्त हैं. (१०) त्वामग्ने प्रथममायुमायवे देवा अकृण्वन्नहुषस्य विशपतिम्. इळामकृण्वन्मनुषस्य शासनीं पितुर्यत्पुत्रो ममकस्य जायते.. (११) हे अग्नि! तुम्हें देवों ने प्राचीन काल में मनुष्य रूपधारी नहुष व मानव शरीर वाला सेनापति बनाया था. जिस समय तुमने मेरे पिता अंगिरा ऋषि के पुत्र के रूप में जन्म लिया था, उसी समय देवों ने इला को मनु की धर्मोपदेशकत्रीं बनाया. (११) त्वं नो अग्ने तव देव पायुभिर्मघोनो रक्ष तन्वश्च वन्द्य. त्राता तोकस्य तनये गवामस्यनिमेषं रक्षमाणस्तव व्रते.. (१२) हे वंदनीय अग्नि! तुम अपनी रक्षणशक्ति द्वारा हम धनवानों एवं हमारे पुत्रों के शरीर की रक्षा करो. हमारे पौत्र तुम्हारे यज्ञ में सदा लगे रहते हैं. तुम उनकी गायों की रक्षा करो. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
त्वमग्ने यज्यवे पायुरन्तरोऽनिषङ्गाय चतुरक्ष इध्यसे. यो रातहव्योऽवृकाय धायसे कीरेश्चिन्मन्त्रं मनसा वनोषि तम्.. (१३) हे अग्नि! तुम यजमान की रक्षा करते हो. तुम राक्षसों की बाधा से यज्ञ को मुक्त करने के लिए यज्ञ के समीप रहकर चारों ओर प्रकाशित होते हो. तुम हिंसा नहीं करते, अपितु पोषण करते हो. जो स्तुतिगानकर्त्ता तुम्हें द्रव्य देता है, तुम उसकी स्तुति को मन से चाहते हो. (१३) त्वमग्न उरुशंसाय वाघते स्पार्हं यद्रेक्णः परमं वनोषि तत्. आध्रस्य चित्रप्रमतिरुच्यसे पिता प्र पाकं शास्सि प्रदिशो विदुष्टरः.. (१४) हे अग्नि देव! तुम ऐसी कामना करो कि तुम्हारी स्तुति करने वाला ऋत्विज् मनचाहा, अनंत धन प्राप्त करे. विद्वान् लोग कहते हैं कि तुम दुर्बल यजमान का पालन करने के लिए प्रसन्नचित्त पिता के समान हो. तुम अत्यंत ज्ञानवान् हो. तुम अबोध बालक के समान यजमान को ज्ञान दो और दिशाओं का बोध कराओ. (१४) त्वमग्ने प्रयतदक्षिणं नरं वर्मेव स्यूतं परि पासि विश्वतः. स्वादुक्षद्मा यो वसतौ स्योनकृज्जीवयाजं यजते सोपमा दिवः.. (१५) हे अग्नि! जिस यजमान ने ऋत्विजों को दक्षिणा दी है, उसकी तुम चारों ओर से उसी प्रकार रक्षा करो, जिस प्रकार सिला हुआ कवच शरीर की रक्षा करता है. जो यजमान अतिथियों को स्वादिष्ट अन्न खिलाकर सुखी करता है एवं अपने घर में प्राणियों से यज्ञ करवाता है, वह स्वर्ग के समान सुखकारी होता है. (१५) इमामग्ने शरणिं मीमृषो न इममध्वानं यमगाम दूरात्. आपिः पिता प्रमतिः सोम्यानां भूरिरस्युषिक्कन्मर्त्यानाम्.. (१६) हे अग्नि! हमने जो तुम्हारे यज्ञ का लोप किया, उस भूल को क्षमा करो. हम तुम्हारी अग्निहोत्र रूपी सेवा को छोड़कर जो दूरवर्ती मार्ग में चले आए हैं, इस भूल को भी क्षमा करो. तुम सोमयाग करने वाले मनुष्यों को सरलता से प्राप्त हो जाते हो. तुम उनके पिता के समान, परम मननशील एवं यज्ञ पूरा करने वाले हो. तुम उन्हें प्रत्यक्ष रूप से दर्शन दो. (१६) मनुष्वदग्ने अङ्गिरस्वदङ्गिरो ययातिवत्सदने पूर्ववच्छुचे. अच्छ याह्या वहा दैव्यं जनमा सादय बर्हिषि यक्षि च प्रियम्.. (१७) हे पवित्र अग्नि! तुम हवि ग्रहण करने के लिए भिन्न-भिन्न स्थानों पर जाते हो. तुम जिस प्रकार मनु, अंगिरा, ययाति आदि पूर्व पुरुषों के यज्ञ में जाते थे, उसी प्रकार हमारे यज्ञ में भी सामने की ओर से आओ, देवों को अपने साथ लाकर कुशों पर बैठाओ और उन्हें प्रिय द्रव्य दो. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—३२ देवता—इंद्र
एतेनाग्ने ब्रह्मणा वावृधस्व शक्ती वा यत्ते चकृमा विदा वा. उत प्र णेष्यभि वस्यो अस्मान्त्सं नः सृज सुमत्या वाजवत्या.. (१८) हे अग्नि! तुम हमारी इस स्तुति से वृद्धि प्राप्त करो. हमने अपनी शक्ति और बुद्धि के अनुसार तुम्हारी स्तुति की है. इस स्तुति के कारण तुम हमें प्रभूत संपत्ति दो तथा अन्न के साथ-साथ शोभन बुद्धि भी प्रदान करो. (१८) सूक्त—३२ देवता—इंद्र इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री. अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्.. (१) मैं वज्रधारी इंद्र के पूर्वकृत पराक्रमों का वर्णन करता हूं. उसने मेघ का वध किया. इसके पश्चात् जलों को धरती पर गिराया. इसके बाद बहती हुई पहाड़ी नदियों का मार्ग बदल दिया. (१) अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वयं ततक्ष. वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः.. (२) इंद्र ने पर्वत पर आश्रय लेने वाले मेघ का वध किया. त्वष्टा ने इंद्र के लिए भली प्रकार फेंका जाने वाला वज्र बनाया. इसके बाद जल की वेगवती धाराएं उसी प्रकार समुद्र की ओर गई थीं, जिस प्रकार रंभाती हुई गाएं बछड़ों वाले घर की ओर जाती हैं. (२) वृषायमाणोऽवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत्सुतस्य. आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजामहीनाम्.. (३) इंद्र ने बैल के समान तेजी से सोम ग्रहण किया. ज्योतिष्टोम, गोमेध और आयु इन विविध यज्ञों में चुआया हुआ सोमरस इंद्र ने पिया. धन के स्वामी इंद्र ने वज्ररूपी बाण ग्रहण करके सर्वप्रथम उत्पन्न मेघ का वध किया था. (३) यदिन्द्राहन्प्रथमजामहीनामान्मायिनाममिनाः प्रोत मायाः. आत्सूर्यं जनयन्द्यामुषासं तादीत्ना शत्रुं न किला विवित्से.. (४) हे इंद्र! जब तुमने प्रथम उत्पन्न मेघ का वध किया था, तभी मायाधारियों की माया भी समाप्त कर दी थी. इसके पश्चात् तुमने सूर्य, आकाश एवं उषा को प्रकाशित किया था. इसके बाद तुम्हारा कोई शत्रु दिखाई नहीं दिया. (४) अहन्वृत्रं वृत्रतरं व्यंसमिन्द्रो वज्रेण महता वधेन. स्कन्धांसीव कुलिशेना विवृक्णाऽहिः शयत उपपृक्पृथिव्याः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र ने संसार में अंधकार फैलाने वाले शत्रु को महाविनाशकारी वज्र द्वारा हाथ काटकर मारा था. जिस प्रकार कुल्हाड़ी से काटी हुई शाखा गिर पड़ती है, उसी प्रकार वृत्र धरती पर सोया हुआ था. (५) अयोध्देव दुर्मद आ हि जुह्वे महावीरं तुविबाधमृजीषम्. नातारीदस्य संमृतिं वधानां सं रुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः.. (६) अहंकारी वृत्र ने यह समझकर इंद्र को ललकारा कि मेरे समान कोई योद्धा है ही नहीं. इंद्र महान् पराक्रमी, बहुतों का ध्वंस करने वाले एवं शत्रुविजयी हैं. वृत्र इंद्र के विनाश से बच नहीं सका. इंद्र के शत्रु वृत्र ने गिरते समय नदियों के किनारे भी नष्ट कर दिए. (६) अपादहस्तो अपृतन्यदिन्द्रमास्य वज्रमधि सानौ जघान. वृष्णो वधिः प्रतिमानं बुभूषन्पुरुत्रा वृत्रो अशयद्व्यस्तः.. (७) बिना हाथपैर वाले वृत्र ने इंद्र को युद्ध में ललकारा. इंद्र ने पहाड़ की चोटी के समान वृत्र के पुष्ट कंधे में वज्र मारा. जिस प्रकार शक्तिशाली पुरुष की समानता करने वाले बलहीन व्यक्ति का प्रयत्न व्यर्थ जाता है, वही दशा वृत्र की हुई. वह कई जगह घायल होकर धरती पर गिर पड़ा. (७) नदं न भिन्नममुया शयानं मनो रुहाणा अति यन्त्यापः. याश्चिद् वृत्रो महिना पर्यतिष्ठत्तासामहिः पत्सुतः शीर्बभूव.. (८) सुंदर जल धरती पर पड़े हुए वृत्र को लांघकर उसी प्रकार आगे जा रहा है, जिस प्रकार सरिता टूटे हुए किनारों को पार करके बहती है. वह जीवित अवस्था में अपनी शक्ति से जिस जल को रोके हुए था, इस समय वह उसी जल के नीचे सो गया है. (८) नीचावया अभवद् वृत्रपुत्रेन्द्रो अस्या अव वधर्जभार. उत्तरा सूरधरः पुत्र आसीद्दानुः शये सहवत्सा न धेनुः.. (९) वृत्र की माता वृत्र को इंद्र के प्रहार से बचाने के लिए तिरछी होकर उसके शरीर पर गिर पड़ी. इंद्र ने वृत्र की माता के नीचे के भाग पर वज्र मारा. उस समय माता ऊपर और पुत्र नीचे था. जिस प्रकार गाय अपने बछड़े के साथ सो जाती है, उसी प्रकार वृत्र की माता दनु सदा के लिए सो गई. (९) अतिष्ठन्तीनामनिवेशनानां काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम्. वृत्रस्य निण्यं वि चरन्त्यापो दीर्घं तम आशयदिन्द्रशत्रुः.. (१०) एक स्थान पर न रुकने वाले जल में डूबकर वृत्र का शरीर नाममात्र को भी दिखाई नहीं दे रहा है. इंद्र से बैर करने वाला वृत्र चिरनिद्रा में लीन है और जल उसके ऊपर होकर बह रहा है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
दासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठन्निरुद्धा आपः पणिनेव गावः. अपां बिलमपिहितं यदासीद् वृत्रं जघन्वाँ अप तद्ववार.. (११) जिस प्रकार पणि नामक असुर ने गायों को गुफा में बंद कर दिया था, उसी प्रकार वृत्र द्वारा रक्षित उसकी जल रूपी पत्नियां भी निरुद्ध थीं. जल बहने का मार्ग भी रुका हुआ था. इंद्र ने वृत्र को मारकर वह द्वार खोला. (११) अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन्देव एकः. अजयो गा अजयः शूर सोममवासृजः सर्तवे सप्त सिन्धून्.. (१२) हे इंद्र! सभी आयुधों के प्रहार में अद्वितीय वृत्र ने जब तुम्हारे वज्र के ऊपर प्रहार किया था, उस समय तुम घोड़े की पूंछ के समान घूम कर उसे बचा गए थे. हे शूर! तुमने पणि द्वारा पर्वत गुफा में छिपाई हुई गायों को जीता तथा सोम को भी जीत लिया. तुमने सात नदियों का प्रवाह बाधाहीन कर दिया. (१२) नास्मै विद्युन्न तन्यतुः सिषेध न यां मिहमकिरद्धादुनिं च. इन्द्रश्च यद्युयुधाते अहिश्चोतापरीभ्यो मघवा वि जिग्ये.. (१३) जिस समय इंद्र और वृत्र परस्पर युद्ध कर रहे थे, उस समय वृत्र ने माया से जिस बिजली, मेघगर्जन, जलवर्षा और अशनि का प्रयोग किया था, वे इंद्र को नहीं रोक सके. इसके साथ ही इंद्र ने वृत्र की अन्य मायाओं को भी जीत लिया. (१३) अहेर्यातारं कमपश्य इन्द्र हृदि यत्ते जघ्नुषो भीरगच्छत्. नव च यन्नवतिं च स्रवन्तीः श्येनो न भीतो अतरो रजांसि.. (१४) हे इंद्र! वृत्र को मारते समय तुम्हारे मन में कोई भी भय नहीं हुआ. उस समय तुमने सहायक रूप में किसी भी वृत्रहंता को नहीं देखा था. तुम निडर बाज पक्षी के समान शीघ्रता से निन्यानवे नदियों को पार कर गए थे. (१४) इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा शमस्य च शृङ्गिणो वज्रबाहुः. सेदु राजा क्षयति चर्षणीनामरान्न नेमिः परि ता बभूव.. (१५) वृत्र को मारकर वज्रधारी इंद्र स्थावर, जंगम, सींग रहित और सींग वाले पशुओं के स्वामी बने. इंद्र मनुष्यों के भी राजा बने. जिस प्रकार पहिए के अरे नेमि में स्थित रहते हैं, उसी प्रकार इंद्र ने सबको धारण किया. (१५) सूक्त—३३ देवता—इंद्र एतायामोप गव्यन्त इन्द्रमस्माकं सु प्रमतिं वावृधाति. ebook converter DEMO Watermarks*
अनामृणः कुविदादस्य रायो गवां केतं परमावर्जते नः.. (१) हम पणि असुर द्वारा रोकी हुई गायों को पाने की इच्छा से इंद्र के पास चलें. इंद्र हिंसारहित हैं एवं हमारी उत्तम बुद्धि को बढ़ाते हैं. इसके बाद वे इस गोरूप धन के विषय में हमें उत्तम ज्ञान देते हैं. (१) उपदेहं धनदामप्रतीतं जुष्टां न श्येनो वसतिं पतामि. इन्द्रं नमस्यन्नुपमेभिरर्कैर्यैः स्तोतृभ्यो हव्यो अस्ति यामन्.. (२) जिस प्रकार बाज अपने घोंसले की ओर तेजी से जाता है, उसी प्रकार मैं उत्तम स्तुतियों द्वारा पूजन करके धनदाता एवं अपराजेय इंद्र की ओर दौड़ता हूं. शत्रुओं के साथ युद्ध छिड़ने पर स्तोतागण इंद्र का आह्वान करते हैं. (२) नि सर्वसेन इषुधीँ रसक्त समर्यो गा अजति यस्य वष्टि. चोष्कूयमाण इन्द्र भूरि वामं मा पणिर्भूरस्मदधि प्रवृद्ध.. (३) समस्त सेना से युक्त इंद्र पीठ पर तरकस लगाए हुए हैं. सबके स्वामी इंद्र जिसे चाहते हैं, उसी की गाय पणि से छुड़ाकर उसके पास भेज देते हैं. हे उत्तम बुद्धिसंपन्न इंद्र! हमें पर्याप्त मात्रा में गोरूप धन देकर व्यापारी के समान हमसे उसका मूल्य मत मांगना. (३) वधीर्हि दस्युं धनिनं घनेनँ एकश्चरन्नुपशाकेभिरिन्द्र. धनोरधि विषुणक्ते व्यायन्नयज्वानः सनका प्रेतिमीयुः.. (४) हे इंद्र! शक्तिशाली मरुद्गण तुम्हारे साथ थे, फिर भी तुमने अकेले ही चोर एवं धनवान् वृत्र को कठोर वज्र द्वारा मारा. यज्ञविरोधी उसके अनुचर तुम्हें मारने के विचार से गए, पर उन्हें तुम्हारें धनुष से मृत्यु मिली. (४) परा चिच्छीर्षा ववृजुस्त इन्द्रायज्वानो यज्वभिः स्पर्धमानाः. प्र यद्दिवो हरिवः स्थातरुग्र निरव्रताँ अधमो रोदस्योः.. (५) हे इंद्र! जो लोग स्वयं यज्ञ नहीं करते हैं अथवा यज्ञ करने वालों का विरोध करते हैं, वे पीछे की ओर मुंह करके भाग गए हैं. हे इंद्र! तुम हरि नामक घोड़ों के स्वामी, युद्ध में पीठ न दिखाने वाले तथा उग्र हो. यज्ञ न करने वालों को तुमने स्वर्ग, आकाश और धरती से भगा दिया है. (५) अयुयुत्सन्रनवद्यस्य सेनामयातयन्त क्षितयो नवग्वाः. वृषायुधो न वध्रयो निरष्टाः प्रवद्भिरिन्द्राच्चितयन्त आयन्.. (६) वृत्र के अनुचरों ने दोषरहित इंद्र की सेना के साथ युद्ध करना चाहा था. उत्तम चरित्र वाले मनुष्यों ने इंद्र को युद्ध के लिए प्रेरित किया. जिस प्रकार शूर के साथ युद्ध छेड़ने वाले ebook converter DEMO Watermarks*