रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
नहीं होगा। फिर इसकी शुद्धता का क्या कहना! एक और बड़ी बात यह कि इसमें हम कोई केमिकलस भी नहीं डाल रहे हैं और न ही कोई मिलावट कर रहे हैं। आप हमारे बच्चे ही तो हैं। जैसे माता-पिता को बच्चों की फिकर होती है, ऐसे ही हमें भी आपकी फिकर है। इसलिए आपके लिए यह परम औषधी बनायी है। इसके सेवन में तीन बातें ध्यान में रखना—
- 1. भोजन के बाद एक चम्मच दिन में दो बार ले सकते हैं।
- 2. बच्चों और बूढ़ों को आधा चम्मच ही खिलाएँ।
- 3. च्यवनप्राश खाने के आधे घण्टे बाद तक पानी मत पिएँ।
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर। न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर ॥
आयुर्वेद का महत्व
आयुर्वेद का महत्व
हमारे देश में पहले आयुर्वेद का बड़ा महत्व था। टीके नहीं थे। चेचक बगैरह से बचाने के लिए माताएँ बच्चों को घुट्टी पिलाती थीं। आज हम अंग्रेजी दवाओं पर निर्भर हो गये हैं, इसलिए उम्र कम होती जा रही है, बीमारियाँ भी बढ़ती जा रही हैं।
मेडिकल साईंस ने बड़ी तरक्की की, वैज्ञानिक उन्नति पर हैं, पर वे कुछ बीमारियों की दवा नहीं ढूँढ़ पा रहे हैं। उदाहरण के लिए एड्स। यह जानलेवा है। रोगी मरेगा-ही-मरेगा। आखिर क्या चीज़ है एड्स। शरीर के अंदर रोग-निरोधक शक्ति का ह्रास ही एड्स है। वो कीटाणु इतने ठीठ हैं कि आसानी से मरते भी नहीं हैं। यदि तेज दवा दी जाएगी तो पहले इंसान ही मर जायेगा। इसी तरह जितनी भी दवाएँ डॉ० देता है, वो रोग के कीटाणुओं की तो खबर लेती ही है, साथ में आपकी भी खबर लेती है। जैसे मच्छरों को भगाने के लिए जो आप गुड नाइट बगैरह का इस्तेमाल करते हैं, वो मच्छरों की खबर तो लेगा ही, साथ ही आपकी भी खबर ले लेगा। मैंने एक बार अखबार में पढ़ा कि यदि छोटे बच्चे को किसी बंद कमरे में सुलाकर गुड नाइट लगा दी जाए तो वो सुबह तक मर भी सकता है। इस तरह दवा भी आपको कुछ-न-कुछ नुकसान पहुँचाकर ही जाती है।
तो एड्स के कीटाणु जल्दी पनपते हैं। उनका हमला रक्त पर है। भाई, रक्त के ग्राहकी बहुत हैं। हम जो भी खा रहे हैं, उसी से तो रक्त बन रहा है। आदमी उत्तम खाता है। जो शेर एक बार नरभक्षी हो जाए, वो फिर किसी दूसरे जानवर का माँस खाना ही नहीं चाहता है। मनुष्य उत्तम पदार्थ खाता है। काजू, बादाम आदि कोई जानवर तो खाता नहीं है। इसलिए जो शेर आदमी का माँस खा लिया, वो बाकी जानवर की तरफ जाता ही नहीं है।
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हरेक कीटाणु को हमला ही रक्त पर है। वो कीटाणु तो दवा से भी नहीं मरते हैं और बहुत तेज दवा इंसान को दी नहीं जा सकती, क्योंकि पहले इंसान ही मर जायेगा। हर दवा का तो साइड इफेक्ट है। ऐलोपैथी यहाँ फेल है। डॉ० लोगों के पास तो तीन चीजें रह गयी हैं— 1. एन्टिसेप्टिक 2. पेनिकिलर 3. कुत्रिम विटामिन
इनके बाद शल्य चिकित्सा है। पर ये तीनों चीजें हमारे शरीर का नाश ही करती हैं। कुत्रिम विटामिन लेते हैं तो जो हमारे शरीर में विटामिन बनाने वाली नाडियाँ हैं, वो काम करना बंद कर देती हैं, कमजोर हो जाती हैं। क्योंकि जैसे बना-बनाया मिल गया तो बनाने का आलस नहीं आ जाता है! दूसरा जो भी एन्टिसेप्टिक ले रहे हैं, वो कीटाणुओं के साथ-2 आपकी भी खबर ले रही है। आयुर्वेद साइड इफेक्ट से हटकर है।
एक तो हमारे चार मूल वेद हैं, फिर चार उपवेद भी हैं। एक है- आयुर्वेद, जिनके रचयिता प्रजापति ब्रह्मा हैं वैसे, लेकिन अश्विनी कुमार और धनवंत्री कहा जाता है। देवताओं का डॉ० अश्विनी कुमार तो मेडिकल से बच्चों को पढ़ाया भी जाता है। नाक पर अश्विनी कुमार का वास है। कोई भी चीज खाने लगे तो यह बताता है कि खानी चाहिए कि नहीं। यह सृष्ठकर बताता है। इस शरीर में बड़ा जोरदार सिस्टम है। तो 14 देवताओं में अश्विनी कुमार का वास नाक पर है। यह अपनी ड्यूटी कर रहा है। आयुर्वेद पर 42 कामसूत्र के शास्त्र भी लिखे गये हैं। गुरुकुलों में ऋषि-मुनि इन चीजों की भी शिक्षा देते थे।
तो दूसरा है- धनुर्वेद। इसके रचयिता हैं- विश्वामित्र। सभी शस्त्रों का प्रयोग, शस्त्र चलाने की कला, राजनीति, प्रजा के साथ व्यवहार आदि का इसमें उल्लेख है। तलवार कैसे चलानी है, भाला कैसे चलाना है आदि इसमें बताया गया है।
तीसरा है-गन्धर्ववेद। इसमें गायन, शृंगार आदि का वर्णन है। गले का कैसे सजाना है, जूड़ा कैसे बाँधना है आदि। लोग कहते हैं कि
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ब्यूटी-पार्लर का कोर्स करके आई है। यह सब तो हमारे धर्म-शास्त्रों से चुराकर वो ले गये हैं। यहाँ तो पहले ही था।
तो चौथा उपवेद है—अर्थवेद। वो मूल वेद तो अथर्ववेद है, पर यह अर्थवेद है। इसमें धन-उपार्जन के फार्मूले बताए गये हैं। किस मौसम में क्या खरीद करनी चाहिए, यह भी बताया गया है। लोग कहते हैं बिजनेस एण्ड मैनेजमेंट। भाइयों, यह सब तो यहाँ से लिया गया है। यह सब यहाँ का मूल है। हमारा देश आगे था, आगे है। तो उसमें यह भी लिखा है कि आपका आवास कैसा हो। आज जो इंजीनियर बता रहे हैं, वो सब उसमें है। जैसे उत्तर दिशा में शोचाल्य नहीं रखना चाहिए, क्योंकि वायुकोण की तरफ रखा तो दिन-भर हवा द्वारा वही गंद बदबू आती रहेगी।
...तो एड्स पर चिकित्सा विज्ञान फेल हो गया। वनस्पति जगत की पूरी-पूरी खबर उसे नहीं हुई। वनस्पति जगत में कई लाख किस्म के पौधे हैं। हरेक का बड़ा महत्व है। लोग नहीं जानते हैं, इसलिए आश्चर्यचकित हैं एड्स के मरीजों को पीड़ित देखकर।
मैंने एड्स पर शोध किया। मैंने उन जड़ी-बूटियों को देखा, जिन्हें कीड़ा नहीं लगता है। 27 लाख कीटों में से कोई भी कीड़ा उन पौधों में नहीं लग रहा था। उन बूटियों पर शोध किया। जैसे नीम, कनियारी आदि बूटियों पर कीड़ा नहीं लग रहा है। पपीते पर भी कीड़ा नहीं लग रहा है। ऐसे अन्य बूटियाँ भी हैं। मैंने प्रयोग किया। एक फौज के सूबेदार को मेरा शिष्य अरुणाचल प्रदेश से लाया। वो अंतिम स्टेज पर था। डॉ० तो ऐसा कर देगा, ऐसी दवा दे देगा कि यदि 3 साल में मरना होगा तो 5 पाँच साल में मरेगा। पर मरेगा। क्योंकि कीटाणु बढ़ते ही जायेंगे। उनका विकास रुकेगा नहीं।
एड्स के मरीज को यदि बुखार हुआ तो उतरेगा नहीं, यदि जुकाम हुआ तो चलता ही रहेगा, क्योंकि रोग-प्रतिरोधक शक्ति ही नहीं रहती है। फिर सभी कीटाणु हमला बोल देते हैं। कीटाणु बढ़ते जाते हैं, उसने तो मरना ही है।
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तो जिन दवाओं को कीड़ा नहीं लगता, जब वो खून में पहुँचेंगी, उसी से तो माँस भी बनेगा। फिर उस माँस के पास कीड़ा आयेगा ही नहीं। इस तरह नयी पीढ़ी पनपेगी ही नहीं, विकास भी रुक जायेगा। मैंने पहले अपने पर शोध किया, सोचा कि यदि शरीर पर कुछ असर हुआ तो निपट लूँगा।
तो बड़ी औषधियाँ हैं, जिन्हें कोई भी कीड़ा नहीं लगता है। जोजड़े देखे, उनके चारों तरफ काँटे हैं। कनियारी में भी काँटे हैं। कीड़ा पहुँचता नहीं है। ये बड़ी संजीवनी-सी बूटियाँ हैं।
...तो मैंने तीन दिन उसे आश्रम में रखा, वो चीज़ दी। वो कहने लगा कि मुझे अब रोग नहीं है। ऐसे ही कुछ और लोगों को भी वो दवा दी। पाँच साल से भी ज्यादा हो गये, वे स्वस्थ हैं।
जब भी वो दवा रक्त में पहुँचेंगी तो उन कीटाणुओं का विकास रुक जायेगा, आगे भी नहीं होगी। तो कहने का भाव है कि बनस्पति जगत में बहुत कुछ है।
मेरे पास वैद्य भी आते हैं। पर मेरा लक्ष्य इससे हटकर है। यह इसलिए कि लोगों को शरीर का भी लाभ मिले। शरीर स्वस्थ होगा तो भक्ति-ध्यान भी ठीक हो पायेगा।
पहला स्वर्ग नीरोगी काया।
इसलिए सोचा कि यदि लोगों को लाभ मिल जाए तो अच्छा ही तो है। आप सोचें कि पहले ऋषि-मुनियों की आयु भी लंबी थी, उन्हें इन चीजों का ज्ञान था।
रोगों के उपचार में आयुर्वेद के फार्मूले
रोगों के उपचार में आयुर्वेद के फार्मूले
कुछ रोग होने पर
- ▣ 22 ग्राम बाबची, 22 ग्राम हल्दी (दोनों), 12 ग्राम धमासा, 12 ग्राम शिंगरफ, 12 ग्राम हीरा कसीस, 12 ग्राम हरताल, 12 ग्राम मैनसिल, 12 ग्राम पारा-गंधक-सबको गाय के घी के साथ घोटे। जब लेप तैयार हो जाए तो इसे शरीर पर लगाकर 5 घण्टे धूप में बैठें। उसके बाद पानी में नीम का रस डालकर स्नान करें।
- ▣ आक का दूध दें।
- ▣ काले दाने (बेल) को अकरकरा के साथ पीसकर कोढ़ वाले स्थान पर लेप करें।
- ▣ कनेर के फूल को तोड़कर ले आएँ और मीठे तेल में डाल दें। ऐसे 41 दिन तक पड़ा रहने देंगे तो वो गल जायेगा। अब जैतून का तेल भी मीठे तेल जितना ही उसमें डाल कर अच्छी तरह मिला लें। इस तेल की मालिश से सफेद दाग खत्म होते हैं।
- ▣ त्रिफला, पीपल, अतीस, इलायची, बायबिडंग, चित्रक, जीरा, अजमोद, देवदारू, सोठ, नागरमोथा, कूट चव्च, बच, खुरासानी, संधा नमक, कलौंजी, मिर्च-सबको समान मात्रा में अच्छी तरह से कूट-पीस लें। अब इसे गाय के घी में मिलाकर 4-4 ग्राम की छोटी-2 गोलियाँ बना लें। यह गोली रोगी को हररोज खिलानी चाहिए।
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सावधानी बरतें
- ❑ खट्टी चीजें मत खाएँ।
- ❑ दूध, दही मत खाएँ।
क्षय रोग
- ❑ पीपल, भटकटैया का फल, नागरमोथा और दाख-सबको पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को घी और घी से डबल की मात्रा में शहद के साथ चाटें।
- ❑ शुद्ध भिलातक, काली मिर्च, सत गिलोय, छोटी इलायची-सब बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। अब 1 रत्ती यह दवा आधा पाव बकरी के दूध के साथ दें और प्रतिदिन दूध की मात्रा 20 ग्राम बढ़ाते जाएँ। बहुत लाभकारी है।
- ❑ लहसुन की ढाई कलियों को छील-पीसकर पौन गिलास दूध में डालकर उबालें। जब अच्छी तरह से गाढ़ा हो जाए तो उतारकर गुनगुना हो जाने पर पी लें।
- ❑ नहाने के बाद कुछ देर धूप का सेवन करें।
हैजा होने पर
इसमें बार-बार उलटी और दस्त का आना, प्यास का सताना आदि लक्षण सामने आते हैं।
- ❑ पुदीने का रस रोगी को पिलाएँ।
- ❑ 15 से 20 ग्राम छोटी इलायची का छिलका लेकर उसे गुलाबजल में अच्छी तरह से उबाल लें। यह जल रोगी को दें।
- ❑ नींबू की शिकंजी बनाकर रोगी को पिलाएँ।
जुकाम होने पर
जुकाम मुख्य रूप से कफ, पित्त और वायु के कारण होता है।
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यदि कफ के कारण जुकाम होगा तो सिर तो भारी होगा ही, साथ ही नाक से सफेद कफ भी निकलेगा। यदि पित्त के कारण जुकाम होगा तो प्यास तो अधिक लगेगी ही, साथ में नाक से पीला पदार्थ भी निकलेगा और यदि वायु के कारण जुकाम हुआ तो गला तो बँठेगा ही, साथ ही नाक से पतला-पतला मवाद भी निकलेगा।
साधारणतया नाक का बहना, उसका एक या दोनों तरफ से बंद हो जाना, सिर में भारीपन महसूस होना और अधिक छँके आना आदि बताते हैं कि रोगी को जुकाम हो गया है।
- ❑ अदरक का रस निकालकर गर्म कर लें। अब उसे शहद में मिलाकर रोगी को चाटने को दें।
- ❑ चाय में तुलसी के पत्ते डालकर रोगी को पिलाएँ।
- ❑ तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाएँ। मिठास के लिए थोड़ी मिश्री डाल सकते हैं।
- ❑ अजवायन का काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर रोगी को दें।
- ❑ कफ के जुकाम में भुने हुए चने खाना भी लाभदायक होता है।
सावधानी बरतें
- ❑ यदि कब्ज है तो पेट की सफाई के लिए व्रत रखें।
- ❑ ठंडे जल से मत नहाएँ।
- ❑ सोते समय सिर के नीचे तकिया मत रखें। यदि रखना ही है तो पतला-सा रखें, जिससे सिर ज्यादा ऊँचा न होने पाए।
- ❑ दही और घी मत खाएँ।
- ❑ भोजन हल्का करें, जो जल्दी पच सके।
आँखों से दिखना कम हो जाने पर
- ❑ 5 ग्राम भीमसेनी कपूर लें, 5 ग्राम केसर और 260 ग्राम गुलाब जल को लेकर अच्छी तरह घोंट ले। अब अच्छी तरह छानकर
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किसी बोटल में भर लें। इसका सेवन आँखों के लिए बहुत लाभकारी है।
पीपल, बहेड़े की गुठली का गूदा, बच, मिर्च, हर्र, शंखनाभि, कूठ, मनःशिला-सबको बकरी के दूध के साथ अच्छी तरह पीस लें। अब छोटी-2 बत्तियाँ बना लें। इन बत्तियों को शहद के साथ घिसकर आँख में लगाने से दृष्टि बढ़ती है।
बड़ा सौँफ, बादाम की गिरी, कूजे वाली मिश्री-सबको समान मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें और किसी शीशी में रख लें। 12 ग्राम यह चूर्ण रात को सोने के ठीक पहले पौन गिलास दूध के साथ प्रतिदिन डेढ़ महीने तक लें।
नीम कमल, मुलहटी, तमाल पत्र, कपूर, गेरू और नागकेशर-सबको पीसकर आँखों में अंजन की तरह लगाएँ।
ज्योतिष्मती के तेल की 3-4 बूँदों को मक्खन के साथ मिलाकर चाटना बड़ा ही हितकर होता है।
60 ग्राम कलमी शोरे को प्याज के रस में डालकर आग पर रखें। जब प्याज का रस जल जाए तो उसे उतार शीशी में बंद करके रख दें। यह नेत्रों का बेहतरीन सुरमा तैयार हो गया। इसे सुरमे की तरह ही लगाएँ।
आँख दुखने पर
सबसे पहले मँहदी की थैली बना लें। अब उस थैली में सुपारी, कपूर, फिटकरी, काठा और लोध डालकर थोड़ा पानी भी डाल दें, जिससे सब अच्छी तरह से तर हो जाएँ। अब उस थैली को आँखों में लगाएँ।
ग्वारपाटे का रस आँखों में लगाएँ।
बहेड़े को शहद में घिसकर लेप करें।
आमिया हल्दी और ग्वारपाटे का गूदा मिलाकर लेप बना लें।
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यह लेप आँखों के ऊपर लगाएँ।
आँख आने पर
आँख आने पर आँखों में से बराबर कीच तो निकलती ही है, साथ ही आँखें लाल भी हो जाती हैं और दर्द भी होता है।
- ❑ दारू हल्दी, रसौत, सेंधा नमक और हर्-सबको एक साथ जल के सहयोग से पीस लें। लेप तैयार हो जाने पर इसे आँखों के चारों तरफ लगाएँ।
- ❑ सर्वप्रथम पेट की सफाई करें और फिर 10 ग्राम हालम में चीनी मिलाकर खाएँ।
- ❑ दारू हल्दी को पानी में औटाएँ। फिर छानकर रोगी की आँखों में डालें।
- ❑ 50 ग्राम गुलाब जल में 2-3 ग्राम फिटकरी मिला लें। अब किसी कपड़े से इसे छान लें। यह जल रोगी की आँखों में 2-2 बूँदें सुबह-शाम डालें।
पोथकी ( रोहें ) रोग होने पर
इसमें आँखों की पलकों के भीतर दाने तो निकलते ही हैं, साथ ही आँखों से पीब भी निकलती है।
- ❑ फिटकरी को तवे पर भूनकर अच्छी तरह से पीस लें। अब इसे गुलाबजल में घोलें। इसकी दो-दो बूँदें आँखों में दिन में तीन बार डालें। पर डालने से पहले आँखों को साफ पानी से छींटे मारकर अच्छी तरह से धो लें।
- ❑ त्रिफले को रात के समय पानी में डाल दें। सुबह किसी कपड़े से छानकर उसी पानी से आँखों पर छींटे मारकर धो लें।
अण्डकोषों में दर्द होने पर
- ❑ 120 ग्राम कड़वी तूंबी की गिरी, 25 ग्राम साबुन-दोनों को
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पानी में डाल अच्छी तरह से मसल लें। अब इसे कड़बी तूँबी के ही पत्ते पर डालकर अण्डकोषों पर बाँध दें। विकल्प के तौर पर किसी बारीक पकड़े का सहारा भी ले सकते हैं। 4-5 दिन यह प्रयोग करें।
पीलिया होने पर
जब मुँह कड़वा रहने लगे, सिर में चक्कर आने लगे, मल काला आने लगे, कब्ज की शिकायत रहने लगे, उल्टियाँ होने लगे तो समझ लेना चाहिए कि शीघ्र ही पीलिया का रोग होने वाला है।
इसमें शरीर पीला तो होता ही है, शोच भी काली आती है। अनार के पत्तों को पीसकर चूर्ण बना लें। 5 ग्राम इस चूर्ण को छाछ (गाय के दूध की) के साथ रोगी को दें।
चिरायता और कुटकी दोनों समान मात्रा में लेकर अच्छी तरह घोंट लें। अब रात के समय उसे पानी में डाल दें। सुबह उठकर साफ कपड़े से छान लें। इस पानी में मिठास के लिए थोड़ी-सी मिश्री डालकर रोगी को पिलाएँ। यह दवा हररोज रोगी को पिलाएँ।
पीपल के 5 कोमल थोड़े छोटे साइज के पत्ते लेकर अच्छी तरह से साफ कर लें। फिर मिश्री के साथ कूट-पीस लें। अब पौन गिलास पानी में मिला लें। फिर छानकर वो पानी रोगी को पिला दें। यह प्रयोग सुबह-शाम तब तक करें, जब तक रोगी ठीक न हो जाए।
भोजन के बाद 25 मिली ग्राम रोहितकारिष्ठ चम्मच-भर पानी में मिलाकर रोगी को दें।
शंख भस्म, पुर्नवा, नवायस लौह और मण्डूर-सब 250-250 मि. ग्रा. और गिलोय सत्व 4 ग्राम लेकर अच्छी तरह पीस लें। फिर इसकी 8 पुड़ियाँ बना लें। 5 घण्टे के अन्तराल से जल
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के साथ एक पूड़ी मिलाकर रोगी को पिलाते जाएँ।
सावधानी बरतें
- ❑ तेलयुक्त पदार्थ, गर्म मसाले, खट्टी चीजें मत खाएँ।
लू लगने पर
इसमें सिर में दर्द तो होता ही है, साथ ही आँखों के सामने अँधेरा भी छा जाता है, घबराहट और उल्टियाँ भी होती हैं।
- ❑ नींबू और प्याज के रस में काला नमक मिलाकर रोगी को चटाएँ।
- ❑ प्यास लगने पर नींबू पानी दें।
- ❑ आमरस में थोड़ा नमक मिलाकर रोगी को दें।
निमोनिया होने पर
इसमें रोगी की स्वाँस क्रिया तो तेज होती ही है, साथ ही पसलियों में दर्द और खाँसी भी होती है।
- ❑ फिटकरी को आग पर रखकर लावा बनाने के बाद अच्छी तरह पीसकर उसका चूर्ण बना लें। 350 ग्राम इस चूर्ण को 120 मि. ग्रा. अन्नम भस्म और एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर रोगी को पिलाएँ। यह दवा रोगी को दिन में 3 बार अवश्य दें।
सावधानी बरतें
रोगी को स्वच्छ और हवादार कमरे में रखें, पर ठंड से बचाने के लिए गर्म कपड़े भी पहनाए रखें।
आँव आने पर
इसमें बार-बार मल त्याग की इच्छा होती है, पर मल में सफेद आँव आती है। कभी रक्त भी आता है और बाद में पेट में मरोड़ लगते हैं, जो कि दुखदायी होते हैं।
- ❑ बेल-फल के अंदर के गूदे को पानी में अच्छी तरह मिला लें।
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अब उसे छानकर उसमें सौँफ व शक्कर मिलाकर रोगी को दें। बायविडिंग को नींबू के रस में मिलाकर दें। काली गिलोय के फल, फूल या पत्तों में से जो भी मिल जाए, उसे पानी में मिलाकर रस तैयार करें। यह रस पौन चम्मच (छोटा) सुबह, दुपहर और शाम के समय रोगी को दें।
बवासीर होने पर
यह दो तरह की होती है—खूनी और वादी। खूनी बवासीर में मल-द्वार के मस्से बाहर निकल आते हैं, उनमें सूजन होती है और मल-त्याग के समय इनमें से खून निकलता है। दूसरी ओर वादी बवासीर में मस्से भीतर की ओर होते हैं।
18 मि. ग्रा. कुटजारिष्ठ चम्मच-भर पानी के साथ रोगी को दें। हारसिंगार के 20 ग्राम बीजों की मिंगी और 5 ग्राम काली मिर्च-दोनों को पानी के साथ पीसकर छोटी-छोटी गोलियाँ बना लें। यह गोली खाना बहुत ही लाभकारी है।
बेल के फल की 35 ग्राम गिरी, 6 काली मिर्च, 500 मि. ग्रा. इलायची, 12 ग्राम मिश्री-सबको कूट-पीसकर रोगी को दें। यह खूनी बवासीर में लाभदायक है।
10 ग्राम सफेद कथा, 10 ग्राम रीठे का जलाया गया छिलका-दोनों को अच्छी तरह से कूट-पीस लें। ढाई ग्राम यह दवा दिन में दो बार लें। बहुत लाभकारी है।
नीम के पत्ते, सोनापाठा, चित्रक की जड़ की छाल, कटकंज के बीजों की गिरी, सेंधा नमक, छोटी हरड, इंद्रयव, सोंठ, बेल के पत्ते-सब 110-110 ग्राम लेकर अच्छी तरह कूट-पीसकर छान लें और काँच की बोटल में रख दें। 3 ग्राम यह चूर्ण छाछ के साथ प्रातः लें।
2 ग्राम अजवायन को पीसकर छाछ में डालें। साथ में थोड़ा-सा
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सेंधा नमक भी डाल लें। यह दवा दुपहर को भोजन के बाद लें।
❑ आम की गुठली को पीस लें। अब 2 ग्राम की मात्रा रोगी को दें।
❑ प्राणदा वटी की गोली दिन में तीन बार जल के साथ रोगी को दें।
नोट : शहद का सेवन नित्य करें।
अजीर्ण ( बदहज्मी ) होने पर
इसमें खट्टी डकारें आना और भूख का नहीं लगना, घबराहट का होना, पेट में दर्द का होना, उल्टी जैसा मन होना आदि स्थितियाँ बनी रहती हैं।
❑ पेट की सफाई करना इस रोग की पहली दवा है।
❑ 4 ग्राम नींबू के रस में इतना ही अदरक का रस मिलाकर उसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर सेवन करें।
❑ 12 ग्राम तेजाब गंधक, 600 ग्राम सिरका, 60 ग्राम जीरा, 60 ग्राम काला नमक-सबको किसी ढक्कन वाले बर्तन में डालकर ढाई दिन तक रहने दें। बाद में छाया में उस दवा को सुखा लें। अब 5 रती यह दवा रोज खाएँ।
❑ 12 ग्राम तुलसी के पत्तों का रस और पिप्पल चूर्ण-दोनों को शहद में मिलाकर रोगी को चटाएँ।
❑ ढाई ग्राम धनिए के चूर्ण और ढाई ग्राम ही सोंठ को गुनगुने पानी में मिलाकर रोगी को दें।
❑ मामूली-सी हींग को भून लें। अब उसमें सेंधा नमक मिलाकर जल के साथ रोगी को दें।
मूत्र न आने पर
❑ 35 ग्राम एरण्ड के तेल को गर्म पानी में डालकर सेवन करें।
❑ मूली के पत्तों का रस पिएँ। 50 ग्राम के लगभग लें।
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साहिब बन्दगी
रुक रुक कर पेशाब आने पर
कटियाली के रस में शहद मिलाकर पिएँ।
ढाई ग्राम जीरे को इतनी ही मिश्री के साथ पीसकर शीतल जल से सेवन करें।
बार बार पेशाब आने पर
यदि रात को बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता हो तो शाम के भोजन के बाद 40 ग्राम धुने हुए चने बिना छिलका उतारे ही खाएँ। फिर गुड़ खाकर पानी पीना चाहिए।
मेथी का साग खाएँ।
पेट में दर्द होने पर
नौशादर, गेरु मिट्टी और काली मिर्च-सबको बराबर मात्रा में लेकर बहुत ही बारीक पीस लें। 260 मि. ग्रा. इस चूर्ण का गर्म की हुई सौफ के साथ सेवन करें।
काली मिर्ची, सोंठ और काल नमक को पीसकर चूर्ण बना लें। अब ढाई ग्राम यह चूर्ण फॉककर गुनगुना पानी पी लें।
आक का दूध दें। यह अत्यंत लाभकारी औषधी है।
हींग, अजवायन, सेंधा नमक और हरड मिलाकर सेवन करें।
पेट में सूजन होने पर
मकोय के रस में थोड़ी सोंठ डालकर उसका लेप करें।
नाभि स्थान में दर्द होने पर
22 ग्राम सौफ, 22 ग्राम गुड़ दोनों को मिलाकर सुबह खाली पेट खाना लाभकारी है।
पेट में कीड़े होने पर
200 मि. ग्रा. बच दूध में मिलाकर रोगी को पिलाएँ।
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- ❑ अंकोल की जड़ का रस काढ़ा करके पिएँ।
- ❑ बेल के पत्तों का रस पिएँ।
- ❑ 600 मि. ग्रा. अजवायन के चूर्ण में इतना ही गुड़ मिलाकर गोली बनाकर सुबह-शाम खिलाएँ।
- ❑ दो किलो पानी में 60 ग्राम अनार के जड़ की छाल को डालकर उबालें। जब पानी आधे से थोड़ा कम रह जाए तो उतार लें। ठंडा होने पर रोगी को 15-15 मिनट बाद एक कप पानी पिलाते जाएँ।
मंदाग्नि होने पर
इसमें खायो हुआ पदार्थ बिना पचे ही बाहर आ जाता है। फिर जी मचलना, भूख कम लगना, खट्टी डकारें आना आदि भी होता ही है।
- ❑ दिन के भोजन के बाद 5 ग्राम लवणभास्कर चूर्ण पानी के साथ लें।
- ❑ 300 मि. ग्रा. अग्निरस को शहद में मिलाकर रोगी को चटाएँ।
पेट में गैस होने पर
- ❑ दूध में छोटी पीपल डालकर उबालें और फिर यह दूध पिएँ।
- ❑ बैंगन की सब्जी खाएँ।
- ❑ सुबह-2 रोजाना आधे नींबू को एक गिलास पानी में निचोड़कर पिएँ।
- ❑ दिन में दो बार भोजन के बाद एक काली हरड चूसने से बहुत लाभ मिलता है।
- ❑ पाँच लींग पीस लें। अब पौन कप पानी में डालकर उन्हें उबालें। जब ठंडा हो जाए तो पी लें। सुबह-शाम यह दवा लें।
गुर्दे की पथरी होने पर
- ❑ 45 ग्राम कलमी शोरे को किसी बर्तन में बिछाकर आग पर रखें।
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साहिब बन्दगी
ऊपर से 34 ग्राम काली मिर्च डालें। जब काली मिर्च अच्छी तरह उसमें मिल जाएँ तो उतारकर ठंडा कर लें। अब उसे पीसकर किसी बर्तन में रख लें। यह दवा आधा ग्राम की मात्रा में पानी के साथ रोगी को देनी चाहिए। बहुत लाभकारी है।
100 ग्राम कलमी शोरा, 50 ग्राम बेर पत्थर और ढाई सेर मूली रस लेकर रख लें। सबसे पहले एक बर्तन में 100 ग्राम कलमी शोरा डालें। तब उस पर 50 ग्राम बेर पत्थर डालें। फिर आधा सेर मूली रस डालकर आग पर रखें। भली-भाँति गर्म करके ठंडा होने के लिए रखें। जब ठंडा हो जाए तो पुनः आधा सेर मूली रस डालकर आग पर रखें। फिर अच्छी तरह गर्म करके ठंडा होने के लिए रखें। ऐसे ही आधा-आधा सेर मूली रस डालकर बार-बार गर्म करते जाएँ। यानी पाँच बार आपको गर्म करके ठंडा करना पड़ेगा। तो अंतिम बार ठंडा करने के बाद दवा तैयार हो जायेगी। अब 1 रत्ती जवाखार, 1 रत्ती मूली क्षार और एक रत्ती बनायी हुई दवा पानी में डालकर दिन में दो बार रोगी को दें। यह बहुत ही लाजवाब दवा है। पथरी रेत बनकर मूत्र-मार्ग से बाहर आ जाती है।
नोट : गुर्दे की पथरी में यदि औषधियों से लाभ न मिले तो जर्मनी में ऐसी मशीन का अविष्कार हुआ है, जिससे आप्रेशन की जरूरत नहीं पड़ती और वो मशीन बाहर से ही ऐसी तरंगे छोड़ती है कि गुर्दे की पथरी टूटकर मूत्र-मार्ग से बाहर आ जाती है। अभी यह भारत में भी आ गयी है। इसलिए आप्रेशन से बचें। इसमें रोगी को बेहोश करने की भी जरूरत नहीं होती और न ही शरीर के किसी अन्य अंग को हानि पहुँचती है। अस्पताल में रुकने की भी रोगी को जरूरत नहीं रहती है।
अन्य उपचार
☐ छाछ का सेवन करते रहें।
☐ मूली का सेवन करें।
रोगों की पहचान
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❑ मूली के बीजों का काढ़ा पिएँ। बहुत ही लाभकारी है।
❑ शहद का सेवन करें।
❑ 22 ग्राम मूली के रस में 1 ग्राम यवक्षार मिलाकर दिन में दो बार सेवन करें।
❑ चुकंदर को उबालकर उसका 35 ग्राम पानी पिएँ। यह दवा दिन में तीन बार लें। बहुत ही लाभकारी दवा है।
❑ 10 मि. ग्रा. यवक्षार तथा 60 ग्राम टिंडे का रस सुबह-शाम लें।
माथे में दर्द होने पर
❑ चंदन के तेल में थोड़ा कपूर मिलाकर माथे पर लगाएँ।
अम्ल पित्त होने पर
इसमें छाती और गले में जलन होना, खट्टी डकारें आना, जी मचलना, पेट में भारीपन, प्यास का अधिक सताना आदि स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
❑ जीरे को तवे पर भूनकर उसमें जरा-सा सेंधा नमक डाल दें। अब इसे संतरे के रस में मिलाकर रोगी को पिलाएँ।
❑ बेलगिरी के ताजा पत्ते तोड़ लाएँ। अब इन्हें जल की सहायता से पीस लें। मिठास के लिए मिश्री भी डाल दें। यह दवा रोगी को दें।
❑ अडूसे के पत्ते और नीम के पत्ते लेकर उनका रस निकाल लें। इस रस में शहद मिलाकर रोगी को पिलाएँ।
पायरिया होने पर
इसमें मसूड़ों में सूजन तो होती ही है, साथ ही उनमें से पीब भी निकलती है।
❑ नीम की पत्तियों को पानी में उबाल कर कुछे करें। यह दवा दिन
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साहिब बन्दगी
में 4-5 बार जरूर करें।
खाँसी होने पर
खाँसी को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है—सूखी खाँसी और बलगमी खाँसी।
- ❑ कफयुक्त खाँसी हो तो कपूर, कर्कट शृंगी और हरीतकी—सबको पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को गर्म पानी के साथ रोगी को दें।
- ❑ त्रिफला, बायबिडंग, गिलोय, पीपल, सोंठ, चित्रक, राक्षा, मिर्चस मिश्री—सबको समान मात्रा में लेकर अच्छी तरह से पीस लें। यह दवा 3 ग्राम रोज सेवन करें।
- ❑ अडुसे के पत्तों का रस निकालकर उसमें थोड़ा नमक मिलाकर रोगी को दें।
- ❑ बेहेड़े की छाल का छोटा-सा टुकड़ा रोगी को चूसने के लिए दें।
दमा होने पर
इसमें श्वास क्रिया में तकलीफ होती है। आयुर्वेद वायु और कफ की गड़बड़ी को इसका मुख्य कारण मानता है। जब कफ और वायु दोनों की मात्रा बहुत बड़ा जाए तो बड़ी हुई वायु कफ को सुखाने लगती है, जिससे कफ सूखकर श्वास नली में जमकर श्वास क्रिया में कष्टकारक सिद्ध होता है।
- ❑ सनाय के 100 ग्राम पत्ते, 15 ग्राम आँवला—दोनों को पीनी के साथ अच्छी तरह से पीसकर छोटी-2 गोलियाँ बना लें। एक गोली रोज खाएँ।
- ❑ आँवला, सुहागा, भारंगी, बंसलोचन, मुलहठी, पीपल—सबको 25 ग्राम मात्रा में लेकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें।
अब अडुसे की छाल का रस, मुनके का काढ़ा, चिचिड़ी का रस, कटेली का रस, मिश्री-सब 450 ग्राम लेकर गर्म कर
रोगों की पहचान
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लें। गाढ़ा हो जाने पर उतार लें।
अब ऊपर का चूर्ण इस काढ़े में डाल दें। जब ठंडा हो जाए तो उसमें 450 ग्राम शहद की मात्रा डालें। आपकी दमे की दवा तैयार है। सुबह-शाम 10 ग्राम यह दवा रोगी को चटाकर बकरी का दूध पिला दें।
❑ 120 ग्राम संखिया में ढाई ग्राम मीठा सोडा मिलाकर अच्छी तरह पीस लें। अब इसकी 15 पुड़ियाँ बना लें। अब सुबह-शाम पानी के साथ रोगी को एक पुड़िया की दवा लें। 6-7 हफ्ते रोगी को यह दवा दें।
❑ सतगिलोय, सोंठ, विधारा, बहेड़ा की छाल, बड़ी हरड की छाल, आँवले की छाल, अश्वगन्ध नागौरी, बायविडंग, सौंठ, छोटी पीपर, सफेद पुनर्नवा, काली मिर्च, चित्रक जड़ की छाल-सब 210-210 ग्राम की मात्रा में लेकर अच्छी तरह अलग-2 से खरल में पीस लें। फिर छानकर सबको मिला लें। फिर गुड़ की चासनी बनाकर सब दवाई उसमें मिला लें। अब 5-5 ग्राम की छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लें। मरीज को ऐसी एक गोली रोज सुबह-सबेर कूटकर गाय के दूध के साथ दें।
सावधानी बरतें
❑ नमक बिलकुल न खाएँ।
ग्रहणी रोग होने पर
उदर और पक्काशय के बीज की आँत को ग्रहणी कहते हैं। जब उसमें खराबी हो जाती है, तो दस्त की बीमारी हो जाती है। सार रूप में ग्रहणी अंग जब सुचारू रूप से काम नहीं कर पाता तो ग्रहणी रोग होता है। इसकी गड़बड़ी में भी वात, पित्त और कफ को मुख्य कारण माना गया है।
जब भोजन के बाद कफ सहित मल आए और मीठी-2 डकारें