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रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

रोगों की पहचान

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पानी में मिलाकर रोगी को पिलाएँ।

स्तन पीड़ा होने पर

  • ▣ नीम की पत्तियाँ, साँठी के चावल, सफेद जीरा सबको दूध में पकाकर कुछ दिन पिएँ।

साँप के काटने पर

  • ▣ नीम के पत्ते खिलाएँ। जब पत्ते कड़वे लगना शुरू हो जाएँ तो समझ लेना चाहिए कि विष उतर गया है।

कील मुँहासे होने पर

  • ▣ नीम के बीजों को सिरके में पीसकर लेप करें।

मोतियाबिंद होने पर

  • ▣ ताजी निबौली लेकर पत्थर पर घिस लें। रोज़ रात को सुरमँ की तरह आँखों में दो-2 सलाई लगाएँ।

घाव होने पर

  • ▣ नीम के हरे पत्तों को पीसकर उनका रस निकाल लें। अब रूई को इस रस में डालकर अच्छी तरह से तर कर लें। फिर एक प्याली में थोड़ा देसी घी डालकर उसमें रूई को डालकर गर्म करने के लिए रखें। अब उतारकर सहने योग्य गर्म रहने पर उस रूई को घाव वाली जगह रखें और पट्टी बाँध दें। नित्य यह पट्टी बदलें।

मूत्राशय या गुर्दे में पथरी होने पर

  • ▣ नीम की पत्तियों की राख को फॉक कर डेढ़ चम्मच शीतल जल पी लें। यह काम दिन में 4 बार करें।

सफेद कोढ़ होने पर

  • ▣ नीम की पत्तियाँ, फूल, निबौली-सबको पीसकर शरबत के रूप में सेवन करें। लगातार दो महीने यह दवा लें।

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साहिब बन्दगी

गठिया होने पर

▣ नीम के तेल की मालिश करें।

मासिक धर्म में रुकावट होने पर

▣ 20 ग्राम नीम की छाल, 5-5 ग्राम सोंठ और गुड़ लेकर काढ़ा बनाकर पिएँ। यह लाभकारी है।

उल्टियाँ होने पर

▣ 20 ग्राम नीम के पत्ते पीसकर 100 ग्राम पानी में मिलाकर अच्छी तरह से छान लें। यह पानी रोगी को दें।

लौंग से रोगों का निदान

एसीडिटी होने पर

▣ चार लौंग, 10 ग्राम आँवला रस और एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर दिन में दो बार पिएँ।

गैस होने पर

▣ एक कप पानी में तीन लौंग डालकर उबालें और ठण्डा करके पी लें। यह प्रयोग दिन में दो बार करें।

ज्वर होने पर

▣ लौंग को पीसकर फाँक लें और गुनगुना पानी पी लें। दिन में 3-4 बार कर लें।

सिर दर्द होने पर

▣ लौंग को अच्छी तरह पीसकर लेप बना लें। यह लेप सिर दर्द में बड़ा ही लाभकारी है।

अमरूद से रोगों का निदान

पुराना जुकाम होने पर

▣ 2-3 दिन केवल अमरूद का सेवन करें।

रोगों की पहचान

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पुराने दस्त होने पर

  • ▣ अमरूद की नयी पत्तियों को उबालकर उनका पानी पिएँ।

कब्ज होने पर

  • ▣ अमरूद खाकर ऊपर से गर्म दूध पी लें।

पेट दर्द होने पर

  • ▣ अमरूद की नयी पत्तियों को पीसकर पानी में मिलाकर पिएँ।

मुनक्के से रोगों का निदान

टी. बी. होने पर

  • ▣ मुनक्के के साथ पीपल और शक्कर पीसकर रोज खाएँ।

चक्कर आने पर

  • ▣ 22 ग्राम मुनक्के को घी में सेंक लें। फिर उसपर सेंधा नमक डालकर खाएँ।

भूख न लगने पर

  • ▣ मुनक्के में मिर्च-नमक डालकर गर्म करके खाने से लाभ मिलता है।

हल्दी से रोगों का निदान

चेचक होने पर

  • ▣ इमली के बीजों का चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का हल्दी के साथ सेवन करें।

स्तन पीड़ा होने पर

  • ▣ हल्दी की गाँठ को साफ पत्थर पर पानी के साथ घिसकर स्तनों पर लेप करें।

जुकाम होने पर

  • ▣ गर्म दूध में हल्दी डालकर सेवन करें।

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साहिब बन्दगी

अन्दरूनी चोट लगने पर

❑ ढाई ग्राम हल्दी को पाव-भर दूध में अच्छी तरह से उबालें और उतारकर गुनगुना होने पर पी लें।

दांतों में दर्द होने पर

❑ हल्दी के साथ हींग को थोड़े-से पानी के साथ पीस लें। अब इसकी छोटी-सी गोली बनाकर दुखते हुए दाँत के नीचे रख दें।

घाव या घाव में कीड़े हो जाने पर

❑ हल्दी में थोड़ा-सा तेल डालकर घाव वाली जगह डालें।

जुकाम होने पर

❑ आधा गिलास गर्म दूध में डेढ़ चम्मच (छोटा) हल्दी घोल कर पी लें।

पोदीने से रोगों का निदान

गैस होने पर

❑ 50 ग्राम पोदीना, 7 ग्राम अजवायन, 8 ग्राम अदरक-सबको पौन गिलास (बड़े) पानी में उबालें। फिर इसमें पौन कप दूध और थोड़ी मिश्री या गुड़ मिला लें। यह दवा बहुत लाभकारी है।

रक्त जम जाने पर

❑ पोदीने का रस निकालकर पिएँ। लाभदायक है।

पेट दर्द होने पर

❑ ढाई चम्मच सूखे पोदीने में मिश्री मिलाकर लें। बच्चा है तो डेढ़ चम्मच ही दें।

गाजर से रोगों का निदान

नोट : बुखार होने पर गाजर का रस मत पिएँ।

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पित्ताशय में पथरी होने पर

  • ▣ गाजर के 225 ग्राम रस में इतना ही सलाद के पत्तों का रस मिलाकर पिएँ। बहुत लाभदायक है।

घाव हो जाने पर

  • ▣ गाजर को उबालकर अच्छी तरह से पीस लें। अब उसका लेप घाव वाली जगह करके पट्टी बाँध दें।

पीलिया होने पर

  • ▣ गाजर का रस पिलाएँ और गाजर का ही सूप भी रोगी को दें।

मूत्र संबंधी रोग होने पर

  • ▣ गाजर के रस में आधी मात्रा में पालक का रस मिलाकर पिएँ।

गुर्दे या मूत्राशय की पथरी होने पर

  • ▣ गाजर का रस पीना बहुत लाभदायक है।

दमा होने पर

  • ▣ दिन में दो बार एक बड़ा गिलास गाजर का रस पिएँ। रात को गाजर का रस मत पिएँ।

गुर्दे के रोग होने पर

  • ▣ पौन गिलास पानी में डेढ़ चम्मच गाजर के बीज उबालकर पिएँ और साथ ही गाजर के रस में उससे आधी से भी कम मात्रा में पालक का रस मिलाकर भी पिएँ।

सीने में दर्द होने पर

  • ▣ गाजरों को उबालकर उनका रस निकाल लें। फिर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर रोगी को पिलाएँ।

खून के लाल कणों की कमी होने पर

  • ▣ 225 ग्राम गाजर के रस में इतना ही पालक का रस मिलाकर सेवन करें।

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साहिब बन्दगी

माताओं-बहनों के दूध में कमी होने पर

☐ गाजर का रस पिएँ।

आँखें कमजोर होने पर

☐ गाजर का रस लाभदायक है।

कैंसर होने पर

☐ गाजर का रस जरूर पिएँ, लाभकारी है।

जीरे से रोगों का निदान

पुराना बुखार होने पर

☐ डेढ़ ग्राम पिप्सा हुआ जीरा और गुड़-दोनों को अच्छी तरह से मिला लें। सुबह-शाम यह दवा लें।

बवासीर होने पर

☐ एक चम्मच जीरे में काली मिर्च पीसकर शहद में मिलाकर दिन में दो-तीन बार सेवन करें।

खुजली होने पर

☐ जीरे को गर्म पानी में पीस, लेप करें।

मुँह में दुर्गंध होने पर

☐ जीरे को भूनकर खाएँ।

अंगूर से रोगों को निदान

दमा होने पर

☐ अंगूर का सेवन करें।

गुर्दे की पीड़ा होने पर

☐ 25 ग्राम अंगूर के पत्तों को पीस लें। फिर उसमें पानी मिलाकर अच्छी तरह से छान लें। अब उसमें नमक मिलाकर रोगी को

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पिलाएँ। यह बहुत लाभकारी है।

फेफड़ों के रोग होने पर

▣ अंगूर खाएँ। यह बहुत लाभकारी है।

चने से रोगों का निदान

श्वेत प्रदर होने पर

▣ भुने हुए चने पीसकर उसमें मिश्री मिलाकर खाएँ और ऊपर से घी युक्त गुनगुना दूध पी लें।

बार-बार पेशाब आने पर

▣ भुने हुए चने गुड़ सहित खाएँ।

हृदय रोग होने पर

▣ हृदय रोगियों को काला चना खाना चाहिए, लाभदायक है।

वीर्य पतला होने पर

▣ शाम को चने पानी में भिगो दें। सुबह उन्हें खाकर ऊपर से दूध पी लें।

मधुमेह होने पर

▣ चने की रोटी दो हफ्ते तक खाएँ। लाभकारी है।

अनार से रोगों का निदान

दस्त होने पर

▣ अनार को भूनकर फिर उसका रस निकाल लें। उस रस में एक चम्मच शहद मिलाकर पी लें।

मुँह में दुर्गंध होने पर

▣ अनार के छिलकों का चूर्ण पानी के साथ लें।

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साहिब बन्दगी

गंजापन होने पर

❑ अनार के पत्तों को पीसकर गंज वाली जगह लेप कर दें।

नकसीर आने पर

❑ अनार का रस नथुनों में डालें।

पेट दर्द होने पर

❑ अनार के दाने निकालकर उसमें सेंधा नमक और जरा-सी काली मिर्च डालकर खाएँ। यह बहुत लाभकारी है।

मासिक स्त्राव अधिक होने पर

❑ अनार के सूखे हुए छिलकों को पीसकर चूर्ण बना लें। फिर किसी साफ़ बारीक कपड़े से छान कर डेढ़ चम्मच (छोटा) चूर्ण खिलाकर थोड़ा-सा शीतल जल पिला दें। यह प्रयोग सुबह-शाम करें।

नारंगी से रोगों का निदान

गुर्दे का रोग होने पर

❑ सुबह खाली पेट नारंगी का रस पिएँ।

मुँहासे होने पर

❑ नारंगी के छिलके पीसकर लगाएँ।

गैस होने पर

❑ सुबह खाली पेट नारंगी का रस पिएँ।

देसी घी से रोगों का निदान

सिर दर्द होने पर

❑ सोते समय पैर की तलियों में देसी घी की मालिश करें।

रोगों की पहचान

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चेहरे पर दाग होने पर

  • ▣ सोते समय देसी घी चेहरे पर अच्छी तरह मलकर लगा लें। सुबह ठंडे पानी से चेहरा धो लें।

पुरानी खाँसी होने पर

  • ▣ देसी घी में गुड़ डालकर आग पर रखें और फिर इसका सेवन करें।

होंठ फटने पर

  • ▣ घी में नमक डालकर होंठों पर लगाएँ।

हिचकी आने पर

  • ▣ दो चम्मच देसी घी को गर्म करके पी लें।

पित्ती होने पर

  • ▣ देसी घी में जरा-सा सेंधा नमक मिलाकर मालिश करें।

अखरोट से रोगों का निदान

बच्चों के बिस्तर पर पेशाब करने पर

  • ▣ बिस्तर पर पेशाब करने वाले बच्चों को तीन अखरोट और 21-22 किशमिश के दाने रोज खिला दें।

सफेद दाग होने पर

  • ▣ अखरोट खाएँ। यह लाभकारी है।

टी. बी. होने पर

  • ▣ नित्य 2 अखरोट, 4 लहसुन की कली को पौन चम्मच (बड़ा) गाय के घी में भूनकर रोगी को खिलाएँ।

मरोड़ होने पर

  • ▣ अखरोट को पीसकर (पानी के साथ) नाभि स्थाप पर लेप करना चाहिए।

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साहिब बन्दगी

बच्चों के पेट में कीड़े होने पर

  • ❑ रोज बच्चों को दूध देते समय पहले तीन अखरोट भी दे दें।

आलू से रोगों का निदानु

उच्च रक्तचाप होने पर

  • ❑ पानी में थोड़ा-सा नमक डालकर आलू उबालें। उबल जाने के बाद उनका छिलका उतारकर खाएँ।

गुर्दे की खराबी होने पर

  • ❑ आलू खाना लाभकारी रहता है।

गठिया होने पर

  • ❑ आलू को कोयलों पर भून लें। फिर उनका छिलका उतारकर स्वादानुसार नमक-मिर्च लगाकर खाएँ।

गुर्दे की पथरी होने पर

  • ❑ आलू के साथ-साथ पानी पर ज़ोर रखें।

खड़ी डकारें आने पर

  • ❑ आलू को राख या कोयलों पर भून कर खाएँ।

आँखों में जाला होने पर

  • ❑ कच्चे आलू को किसी पत्थर पर घिसें और फिर आँखों में जैसे काजल लगाते हैं, ऐसे लगाएँ। यह काम दिन में 2-3 बार 100 दिन करें।

मूली से रोगों का निदान

पीलिया होने पर

  • ❑ 120 ग्राम मूली के पत्तों का रस, 40 ग्राम मिश्री-दोनों को मिलाकर रोगी को पिलाएँ। यह दवा सुबह ही दें। मूली, पपीता बगैरह सुबह-2 ही अपना सही असर दिखाते हैं।

रोगों की पहचान

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आवाज़ बैठ जाने पर

  • ▣ पौन चम्मच मूली के बीजों को पीसकर गर्म पानी के साथ सेवन करें और एक कप पानी में इतना ही मूली का रस डालकर गराये करें।

खूनी बवासीर होने पर

  • ▣ सुबह-सुबह कच्ची मूली खाएँ। लाभ मिलेगा।

मूत्राशय की पथरी होने पर

  • ▣ 40 ग्राम मूली के बीजों को एक बड़े गिलास पानी में अच्छी तरह उबालें। फिर छानकर पी लें। इसके अतिरिक्त मूली के पत्ते भी चबाएँ।

हिचकी आने पर

  • ▣ मूली के पाँच पत्ते लेकर अच्छी तरह से धोकर चबाएँ।

मेथी से रोगों का निदान

पेट दर्द होने पर

  • ▣ दानेदार मेथी की फँकी लेकर ऊपर से गर्म पानी पी लें।

मधुमेह होने पर

  • ▣ दानेदार मेथी को अच्छी तरह पीसकर आटे में मिला लें। उस आटे की रोटी खाएँ।

आग से जल जाने पर

  • ▣ दानेदार मेथी को पीसकर (पानी के साथ) जले हुए स्थान पर लेप कर दें। यह लाभकारी प्रयोग है।

खूनी बवासीर होने पर

  • ▣ 5 चम्मच दानेदार मेथी को एक गिलास दूध में डाल उबालकर सेवन करें।

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साहिब बन्दगी

गेहूँ से रोगों का निदान

नोट : गेहूँ के बड़े गुण हैं। इसका रस पीने और सलाद खाने से कई बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है। हृदय रोग, पोलियो और पथरी और आँखों की कमजोरी में तो यह विशेष लाभकारी है।

आठ इंच गेहूँ के पौधे के ठण्डल और पत्ती लेकर सलाद की तरह खिलाएँ या उनका ताजा रस निकालकर रोगी को दें।

आप अपने घरों में भी गमलों में गेहूँ के पौधे उगा सकते हैं। कुछ ही दिनों में गेहूँ के पौधे उग जाते हैं।

हड़डी टूटने पर

0 10 ग्राम शहद में इतनी ही गेहूँ की राख मिलाकर चाटें।

मूत्राशय में पथरी होने पर

0 गेहूँ के साथ चने उबालकर छान लें और वो पानी पिएँ।

पेशाब के साथ वीर्य जाने पर

0 110 ग्राम गेहूँ को शाम के 7 बजे पानी में भिगो दें और सुबह उसी पानी के सहयोग से किसी पत्थर पर पीस लें। फिर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर पी लें। हफ्ता-डेढ़ हफ्ता जरूर करें।

छाछ से रोगों का निदान

नोट : दही के मुकाबले छाछ का बड़ा महत्व है। यह बड़ी गुणकारी है। इसका सेवन रोगों को जड़ से मिटाता है। पेट के रोगों में इसका विशेष महत्व है।

अपच होने पर

0 जीरे को भूनकर उसमें काली मिर्च मिलाकर पीस लें। अब इस चूर्ण को छाछ में डालकर थोड़ा-सा सेंधा नमक मिला लें। यह बड़ी लाभकारी दवा है।

रोगों की पहचान

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बच्चों के दाँत निकलने पर

  • ▣ छाछ पिलाने से बच्चों के दाँत बिना कष्ट के निकलते हैं।

बवासीर होने पर

  • ▣ पौन गिलास (बड़ा) छाछ में पौन चम्मच अजवायन पीसकर डालें और थोड़ा-सा सेंधा नमक भी डाल लें। यह बवासीर को जड़ से मिटाने के लिए बहुत ही फायदेमंद है।

मोटापा होने पर

  • ▣ छाछ मोटापा कम करने के साथ-साथ बल का संचार भी करती है।

तिल से रोगों का निदान

बार बार पेशाब होने पर

  • ▣ 55 ग्राम काले तिल, 110 ग्राम गुड़ और 30 ग्राम अजवायन-सबको अच्छी तरह से मिलाकर रख लें। दिन में दो बार 7-7 ग्राम यह दवा खाएँ।

सिर में रूसी होने पर

  • ▣ तिल के तेल की मालिश करें। अब किसी कपड़े को गर्म पानी में भिगोकर सिर पर लपेट दें। 4 मिनट लपेटे रखने के बाद खोलकर ठंडे पानी से सिर धो लें।

बाल झड़ने पर

  • ▣ रोज़ तिल खाएँ।

काली मिर्च से रोगों का निदान

गैस होने पर

  • ▣ पौन गिलास पानी में 8 काली मिर्च डालकर उबालें और पी लें।

कील मुँहासे होने पर

  • ▣ रात के समय 18 काली मिर्च गुलाबजल में पीसकर चेहरे पर लगाएँ और सुबह गर्म पानी से चेहरा धो लें।

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साहिब बन्दगी

राई से रोगों का निदान

उल्टियाँ होने पर

▣ राई को पीसकर पेट पर लेप करें।

जुकाम होने पर

▣ राई में शहद मिलाकर खाएँ।

हिचकी आने पर

▣ आधा गिलास (बड़ा) पानी में 12 ग्राम राई को उबालें। फिर छान लें और जब पानी पीने योग्य हो जाए तो पी लें।

फिटकरी से रोगों का निदान

दाँत दर्द होने पर

▣ सूई में फिटकरी डालकर दाँत के नीचे दबाएँ।

गले में खराश होने पर

▣ गर्म पानी में फिटकरी और नमक डालकर गरारे करें।

मलेरिया होने पर

▣ ढाई ग्राम फूलों हुई फिटकरी के चूर्ण में 9 ग्राम मिश्री पीसकर मिला लें। ढाई ग्राम ही यह दवा थोड़े-से गर्म पानी के साथ ढाई घण्टे के ही अन्तराल में 4 बार लें। बहुत फायदेमंद है, पर गर्भवती को नहीं देनी है।

बिच्छू के काट लेने पर

▣ फिटकरी को किसी साफ पत्थर पर थोड़े-से पानी के साथ घिसकर काटे हुए स्थान पर लगाएँ और फिर थोड़ा-सा आग पर सेंक दें। इससे बिच्छू का जहर समाप्त हो जाता है।

आँखों में दर्द होने पर

▣ 50 ग्राम गुलाबजल में डेढ़ ग्राम फिटकरी घोलकर रख दें। दिन में 3-4 बार इस दवा की 2-2 बूँद आँखों में डालें।

सूज़ाक होने पर

▣ पौन गिलास पानी में 5 ग्राम फिटकरी घोल कर पिएँ।

जन्म-मरण का महारोग

जन्म-मरण का महारोग

हम सब छोटे-से-छोटे रोग से भी छुटकारा पाने के लिए बहुत सावधानी से प्रयत्न करते हैं। यदि हमें लगता है कि जिस डॉ० से हम अपना इलाज करवा रहे हैं, जिसकी दवा खा रहे हैं, उससे हमें तनिक भी आराम नहीं आ रहा है, कहीं भी ऐसा नहीं लग रहा कि हमारा रोग दूर हो पायेगा तो हम फौन दूसरे डॉ० की सलाह लेते हैं, उसकी दवा शुरू करते हैं।

रोगों को मिटाकर प्राण दान देने वाले डॉ० को भगवान भी कहा जाता है। ऐसे ही जन्म-मरण के महारोग को मिटाकर अमर-धाम में आत्मा को पहुँचाने वाले सदगुरु को भगवान से भी अधिक दर्जा संतों ने दिया है। पर अफ़सोस है कि इस महारोग से छुटकारा पाने के लिए हम बड़ी ही लापरवाही बरतते हैं। बार-बार जन्म-मरण का महारोग संसार के सब जीवों को लगा हुआ है। सब इस महारोग से ग्रसित हैं, कोई भी इसकी ठीक-ठीक दवा नहीं जान पा रहा है।

कोई इस रोग से बचने के लिए यज्ञ बता रहा है, कोई तप। कोई तीर्थ बता रहा है तो कोई मंत्र जाप। पर कोई भी इससे छूट नहीं पा रहा है। यह सब चीजें ऐसी ही हैं, जैसे अंग्रेजी दवा खाकर रोग से कुछ देर के लिए छूट गये, पर जड़ से रोग खत्म न हुआ। कुछ देर के लिए स्वर्ग में चले गये, कुछ देर के लिए ब्रह्म लोक में चले गये और कर्मों के छीन होने पर पुनः भवसागर में गिर पड़े। जैसे अंग्रेजी दवा ने रोग को दबा दिया तो बाद में वो किसी अन्य रूप में उभर आई, क्योंकि जड़ से समाप्त नहीं हुई। ऐसे ही कालांतर में संतों से पहले सदा के लिए इस भवसागर से छुटकारा कोई नहीं पाया। साहिब कह रहे हैं—

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साहिब बन्दगी

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

वापिस आना ही पड़ा। सदा के लिए, जड़ से यह महारोग समाप्त न हुआ। बड़े-2 योगियों का भी यह रोग सदा के लिए समाप्त नहीं हुआ। तभी तो बड़े-बड़े योगी भी माया और निरंजन के वश में हो गये। बड़ी-बड़ी तपस्या करने के बाद भी माया ने सबको छल लिया। जहाँ देवराज इंद्र को छल लिया गया, जो गौतम की स्त्री के पास पहुँच गया, वहाँ अन्य की बात करना ठीक नहीं है। देवराज बड़ी तपस्या से बनता है। कहने का भाव है कितनी भी तपस्या कर लो, माया नहीं छोड़ेगी।

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।

गूह छोड़ भये संयासी, तऊ न पावत पारा ॥

इसलिए यह सही उपाय नहीं है। सही उपाय बता रहे हैं-

सत्य नाम निज औषधी, सतगुरु दीन बताय।

औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय ॥

सच्चा नाम ही इस महारोग की औषधी है। पर इस औषधी की भी नक़ल हो गयी है। सब संत बनकर यह औषधी दे रहे हैं। तभी तो साहिब को कहना पड़ा-

कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्ति न होय।

मूल नाम जो गुप्त है, जाने बिरला कोय ॥

कहने में सब संत बने हैं, पर भक्ति इस संसार में बार-बार आने की दे रहे हैं, नाम काल पुरुष का दे रहे हैं। खैर, जनता जनादन को भी सलाम है कि लगी है फिर भी।

...तो सदगुरु के सत्यनाम के बिना इस महारोग से कोई छूट नहीं सकता है। कुछ नाम की बात कर रहे हैं, अमर लोक की भी बात कर रहे हैं, पर वो वहाँ पहुँचे नहीं है, केवल पढ़ी-लिखी बातें कह रहे हैं, उन्हें उस अमर-लोक का सही-सही ज्ञान नहीं है। ऐसे लोगों के लिए साहिब कह रहे हैं-

रोगों की पहचान

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बिन देखे उस देश की, बात करे सो क्रूर। आप तो खारही खात है, बेचत फिरे कपूर ॥

इसलिए ऐसे लोगों से तो बहुत सावधान रहने की जरूरत है। कुछ कह रहे हैं कि सत्लोक में धुनें हो रही हैं। वो शब्द को ही परमात्मा कह रहे हैं। नहीं, साहिब ने तथा संतों ने कभी शब्द को परमात्मा नहीं कहा। वो तो कह रहे हैं-

जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, वाको काल न खाय ॥

कह रहे हैं कि जाप भी मर जाता है। जाप यानी मुँह से जो उच्चारण हुआ, वो जाप है। फिर अजपा भी मर जाता है। जो मन से जाप हुआ, वो अजपा है, वो तुरिया की स्थिति में होता है। वो भी मर जाता है। फिर अनहद भी महाशून्य तक जाता है, आगे नहीं जा पाता, इसलिए वो भी मर जाता है।

आवाज दो के बिना नहीं हो सकती है। इसलिए जहाँ आवाज है, वहाँ द्वैत है और जहाँ द्वैत है, वहाँ माया है। तो वो कह रहे हैं कि सत्लोक में धुनें हो रही हैं। यानी उन्होंने कहीं निचले देशों को ही अमर-लोक मान लिया है, वो वहाँ पहुँचे नहीं हैं। इसलिए उनके पास सच्चा नाम भी नहीं हैं। इसलिए यह भी सावधानी बरतनी है। जन्म-मरण के महारोग से छूटना है तो सच्चे सद्गुरु की खोज करनी होगी, क्योंकि उन्हीं से तो सच्चा नाम मिलेगा। इसलिए-

सतगुरु खोजो संत, जीव काज को चाहहु। मेटो भव को अंक, आवागमन निवारहु ॥

सत्यपुरुष का पाँचवा पुत्र निरंजन है

जो तीन लोक का राजा और चौरासी लाख योनियों व अनहद का रचयिता भी है

  1. 1. मैं सिरजों में मारऊँ, मैं जारी में खाऊँ। जल थल नभ मैं रहूँ, मोर निरंजन नाऊँ॥
  2. 2. सात शून्य सातहि कमल, सात सुरति स्थान। इक्षीस ब्रह्माण्ड लग, काल निरंजन ज्ञान॥
  3. 3. एक पाट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लगे, सवा लाख की धानी॥
  4. 4. गुप्त भयो हैं संग सबके, मन ही निरंजन जानिये॥
  5. 5. अनहद की धुन भँवरगुफा में, अति घनघोर मचाया है। बाजे बजे अनेक भाँति के, सुनि के मन ललचाया है॥ ..... यह सब काल जाल को फँदा, मन कल्पित ठहराया है॥
  6. 6. तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार हैं। लग रहे सिद्ध साधु न पावत पार हैं॥
  7. 7. मन ही निराकार निरंजन जानिए॥
  8. 8. ज्योति निरंजन लग काल पसारा। मन माया भई किया सृष्टि विस्तारा॥
  9. 9. बिना जाने जो नर भक्ति करई। सो नहीं भवसागर से तरई॥
  10. 10. मन ही सरूपी देव निरंजन तोहि रहा भरमाई। हे हँसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई॥
  11. 11. निराकार जो वेद वखाने, वोही काल कोई भेद न जाने॥

—कबीर साहिब

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रोगों की पहचान

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योगमत और संतमत में अंतर

योगमतसंतमत
1. योगमत में काया का नाम है।1. संतमत में विदेह नाम है।
2. योग मत चाचरी, भूचरी, अगोचरी मुद्राओं के ईर्द-गिर्द घूमता है, जो शरीर में हैं।2. संतमत में पाँच मुद्राओं से आगे शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान रखने को कहा है।
3. यह नाम लिखने-पढ़ने में आता है। इनसे काल-पुरुष ने पाँच तत्व पैदा किये और शरीरों की रचना की।3. यह अकह नाम है जो लिखने-पढ़ने में नहीं आता है और पाँच तत्वों से बाहर है।
4. योगमत में अनहद धुनों को ही परमात्मा माना जाता है।4. संतमत में आत्मा किसी शब्द की मोहताज नहीं, क्योंकि आत्मा अपने आप में परिपूर्ण है।
5. योगमत करनी अथवा कर्माई का मार्ग है।5. यह सहज मार्ग है, गुरु कृपा का मार्ग है और भुंग-मता है।
6. योगमत में सुरति शब्द का अभ्यास किया जाता है।6. संतमत सुरति को चेतन करने का मार्ग है।
7. योगमत में काल का नाम लिया जाता है। यह नाम शरीर को दिया जाता है।7. संतमत जिंदा नाम प्रदान करता है जो कि शरीर को छोड़ आत्मा को दिया जाता है।
8. योगमत में गुरु की भूमिका न के बराबर होती है।8. संतमत में भक्ति का सार ही संत सदगुरु है।
9. योगमत सीमाबद्ध है, जिसमें साधक दसवें द्वार तक ही जाता है।9. संतमत असीम है जो कि ग्यारहवें द्वार की बात करता है, जो सुरति में है।

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साहिब बन्दगी

योगमतसंतमत
10. योगमत निराकार निरंजन की ही सत्ता को सर्वश्रेष्ठ मानता है। 11. योगमत में कमाई का फल खत्म होने पर वापिस माता के पेट में आना पड़ता है। 12. योगमत वैशाखियों के सहारे चलता है जो कि शास्त्रों की साक्षी देकर अपने आप को स्थापित करता है। 13. इसमें रिद्धि-सिद्धि और दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, मगर आत्मा का ज्ञान नहीं होता है। 14. योगमत मीन और पपील मार्ग हैं।10. संतमत में निराकार सत्ता से आगे चौथे लोक अर्थात अमर लोक की बात की जाती है। 11. संतमत में जीव सदा के लिए आवागमन से मुक्त हो जाता है और अपने निजधाम सत्य लोक को चला जाता है। 12. संतमत में संत सद्गुरु अपने अनुभव से बोलता है जो किसी का मोहताज नहीं होता है। 13. संतमत में जीव को आत्मज्ञान होने से आध्यात्मिकशक्तियाँ मिलती हैं। 14. जबकि संतमत विहंगम मार्ग है।
  • □ पाँच शब्द औ पाँचों मुद्रा, सोई निश्चय माना। आगे पूर्ण पुरुष पुरातन, उसकी खबर न जाना ॥
  • □ नौ नाथ चौरासी सिद्ध लों, पाँच शब्द में अटके। मुद्रा साथ रहे घट भीतर, फिर औंधे मुँह लटके ॥
  • □ काया नाम सबहिं गुण गावैं, विदेह नाम कोई बिरला पावै। विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सद्गुरु साँचा होई ॥
  • □ जब तक गुरु मिले नहीं साँचा, तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥