सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०५

व्यक्तियोंमें है, सम्पूर्ण वस्तुओंमें है, सम्पूर्ण घटनाओंमें है, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें है, सम्पूर्ण क्रियाओंमें है। वह सबमें एक रूपसे, समान रीतिसे ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। अब उसको प्राप्त करना कठिन है तो सुगम क्या होगा? जहाँ चाहो, वहीं प्राप्त कर लो। वास्तवमें इस संसारका जो 'है'-पना दीखता है, वह संसारका नहीं है। संसार तो एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता। इसमें केवल परिवर्तन-ही-परिवर्तन है। यह केवल परिवर्तनका ही पुंज है। जैसे पंखा तेजीसे घूमता है तो एक चक्र दीखता है, पर वास्तवमें वहाँ चक्र नहीं है, प्रत्युत पंखेकी ताड़ी ही चक्ररूपसे दीखती है। ऐसे ही यह संसार 'नहीं' होते हुए भी 'है'-रूपसे दीखता है। वास्तवमें एक परमात्मतत्त्व ही 'है'-रूपसे विद्यमान है।

विचार करें, अभी जितने शरीर आदि दीखते हैं, ये सौ वर्ष पहले थे क्या? और सौ वर्ष बाद रहेंगे क्या? ये पहले भी नहीं थे और अन्तमें भी नहीं रहेंगे; अतः ये बीचमें भी नहीं हैं। परन्तु परमात्मा सृष्टिके पैदा होनेसे पहले भी था, सृष्टिके लीन होनेके बाद भी रहेगा, अतः परमात्मा सृष्टिके समय भी ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। जो पहले भी नहीं था, बादमें भी नहीं रहेगा, वह अभी भी नहीं है; और जो पहले भी था, बादमें भी रहेगा, वह अभी भी है। अतः संसारका जो 'है'-पना दीखता है, यह गलती है। परमात्मतत्त्व ही 'है'-रूपसे दीखता है। उस परमात्मतत्त्वकी सत्यतासे ही यह असत्य संसार मोह-(मूर्खा-ता)- के कारण सत्यकी तरह दीखता है—

जाम्बु सत्यता तँ जड् माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥

(मानस १।११७।४)

यदि मोह नहीं होगा, तो यह संसार नहीं दीखेगा, प्रत्युत एक परमात्मतत्त्व ही दीखेगा—'वासुदेवः सर्वम्' (गीता ७।१९)। कारण कि परमात्मा ही था, परमात्मा ही रहेगा, बीचमें दूसरा कहाँसे आयेगा? सोनेके जितने गहने हैं, उनमें पहले सोना ही था फिर सोना ही रहेगा; अतः बीचमें सोनेके सिवाय दूसरा कहाँसे आयेगा? गहना तो केवल (रूप, आकृति, उपयोग आदिको लेकर) कहनेके लिये है, तत्त्वतः तो सोना ही है। ऐसे ही संसार केवल कहनेके लिये है, तत्त्वतः तो परमात्मा ही है। उस परमात्माका अनुभव करनेमें ही मनुष्य-जन्मकी सफलता है।

'है'-(परमात्मा-) का अनुभव न करके 'नहीं'-

(संसार-) में उलझ जाना मनुष्यता नहीं है, प्रत्युत पशुता है। इस पशुताका त्याग करना है—'पशुबुद्धिमिमां जहि' (श्रीमद्भागवत १२।५।२)। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो नष्ट होनेवाले प्राणियोंमें नष्ट न होनेवाले परमात्माको देखता है, उसका देखना सही है। परन्तु जो नष्ट होनेवालेको देखता है और नष्ट न होनेवालेको नहीं देखता, वह आत्मघाती है—

योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते।

किं तेन न कृतं पापं चौरिणात्मापहारिणा॥

(महाभारत, उद्योग ४२।३७)

'जो अन्य प्रकारका (अविनाशी) होते हुए भी आत्माको अन्य प्रकारका (विनाशी) मानता है, उस आत्मघाती चोरने कौन-सा पाप नहीं किया?'

जो नाशवान् संसारको न देखकर सब जगह समानरूपसे परिपूर्ण परमात्मतत्त्वको देखता है, वह आत्मघाती नहीं होता अर्थात् वह अपने द्वारा अपनी हत्या नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। परन्तु जो सब जगह परिपूर्ण परमात्मतत्त्वको न देखकर संसार-शरीरको देखता है, वह आत्मघाती परमगतिको न प्राप्त होकर बार-बार जन्मता-मरता रहता है, दुःख पाता रहता है। इसलिये मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे (गीता—छठे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।

जैसे दर्पणमें मुख नहीं होनेपर भी मुख दीखता है और स्वप्नमें हाथी नहीं होनेपर भी हाथी दीखता है, ऐसे ही संसार नहीं होनेपर भी संसार दीखता है। अगर संसारकी तरफ दृष्टि न रहे तो संसार 'है'-रूपसे नहीं दीखेगा। परमात्मा ही 'है'-रूपसे दीख रहा है—इस बातको साधक दृढ़तासे मान ले, फिर चाहे वह अभी न दीखे, पर बादमें दीखने लग जायगा। जैसे अभी साधक वृन्दावनमें बैठा है, तो उसे वृन्दावनको याद नहीं करना पड़ता। सोते समय, भोजन करते समय, हरेक कार्य करते समय वह वृन्दावनको याद नहीं करता; परन्तु 'मैं वृन्दावनमें हूँ'—इस बातमें उसको सन्देह नहीं होता। वह बिना याद किये याद रहता है। ऐसे ही अभी भले ही परमात्मा न दीखे, पर साधक ऐसा दृढ़तासे मान ले कि 'है'-रूपसे तो केवल परमात्मा ही है, संसार नहीं है, तो बादमें उसको ऐसा अनुभव होने लग जायगा। कारण कि मिथ्या वस्तु कबतक टिकी रहेगी और सत्य वस्तु कबतक छिपी रहेगी?

१०६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

परिशिष्ट भाव— वास्तवमें सताईसवें-अट्टाईसवें श्लोकोंमें आत्माका ही वर्णन है; परन्तु 'परमेश्वर' और 'ईश्वर' नाम आनेसे इन श्लोकोंकी व्याख्यामें परमात्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि आत्माका परमात्मासे साधर्म्य है (इसी अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध— इसी अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगकी बात बतायी। इस संयोगसे छूटनेके दो उपाय हैं—परमात्माके साथ अपने स्वतःसिद्ध सम्बन्धको पहचानना और प्रकृति-(शरीर-) से अपने माने हुए सम्बन्धको तोड़ना। सताईसवें-अट्टाईसवें श्लोकोंमें परमात्माके साथ सम्बन्धको पहचाननेकी बात बता दी। अब आगेके दो श्लोकोंमें प्रकृतिसे सम्बन्ध तोड़नेकी बात बताते हैं।

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।

यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २१ ॥

यः= जोक्रियमाणानि= की जाती हुईपश्यति= देखता (अनुभव
कर्माणि= सम्पूर्ण क्रियाओंकोपश्यति= देखता हैकरता) है,
सर्वशः= सब प्रकारसेतथा= और
प्रकृत्या= प्रकृतिके द्वाराआत्मानम्= अपने-आपकोसः, च= वही (यथार्थ
एव= हीअकर्तारम्= अकर्तादेखता है)।

व्याख्या— 'प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः'—वास्तवमें चेतन तत्त्व स्वतः-स्वाभाविक निर्वाकार, सम और शान्तरूपसे स्थित है। उस चेतन तत्त्व-(परमात्मा-) की शक्ति प्रकृति स्वतः-स्वाभाविक क्रियाशील है। उसमें नित्य-निरन्तर क्रिया होती रहती है—'प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः '। यद्यपि प्रकृतिको सक्रिय और अक्रिय—दो अवस्थाओंवाली (सर्ग-अवस्थामें सक्रिय और प्रलय-अवस्थामें अक्रिय) कहते हैं, तथापि सूक्ष्म विचार करें तो प्रलय-अवस्थामें भी उसकी क्रियाशीलता मिटती नहीं है। कारण कि जब प्रलयका आरम्भ होता है, तब प्रकृति सर्ग-अवस्थाकी तरफ चलती है। इस प्रकार प्रकृतिमें सूक्ष्म क्रिया चलती ही रहती है। प्रकृतिकी सूक्ष्म क्रियाको ही अक्रिय-अवस्था कहते हैं; क्योंकि इस अवस्थामें सृष्टिकी रचना नहीं होती। परन्तु महासर्गमें जब सृष्टिकी रचना होती है, तब सर्गके आरम्भसे सर्गके मध्यतक प्रकृति सर्गकी तरफ चलती है और सर्गका मध्य भाग आनेपर प्रकृति प्रलयकी तरफ चलती है। इस प्रकार प्रकृतिकी स्थूल क्रियाको सक्रिय-अवस्था कहते हैं। अगर प्रलय और महाप्रलयमें प्रकृतिको अक्रिय माना जाय, तो प्रलय-महाप्रलयका आदि, मध्य और अन्त कैसे होगा?

ये तीनों तो प्रकृतिमें सूक्ष्म क्रिया होनेसे ही होते हैं। अतः सर्ग-अवस्थाकी अपेक्षा प्रलय-अवस्थामें अपेक्षाकृत अक्रियता है, सर्वथा अक्रियता नहीं है।

सूर्यका उदय होता है, फिर वह मध्यमें आ जाता है और फिर वह अस्त हो जाता है, तो इससे मालूम होता है कि प्रातः सूर्योदय होनेपर प्रकाश मध्याह्नतक बढ़ता जाता है और मध्याह्नसे सूर्यास्ततक प्रकाश घटता जाता है। सूर्यास्त होनेके बाद आधी राततक अन्धकार बढ़ता जाता है और आधी रातसे सूर्योदयतक अन्धकार घटता जाता है। वास्तवमें प्रकाश और अन्धकारकी सूक्ष्म सन्धि मध्याह्न और मध्य-रात ही है, पर वह दीखती है सूर्योदय और सूर्यास्तके समय। इस दृष्टिसे प्रकाश और अन्धकारकी क्रिया मिटती नहीं, प्रत्युत निरन्तर होती ही रहती है। ऐसे ही सर्ग और प्रलय, महासर्ग और महाप्रलयमें भी प्रकृतिमें क्रिया निरन्तर होती ही रहती है*।

इस क्रियाशील प्रकृतिके साथ जब यह पुरुष सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब शरीरद्वारा होनेवाली स्वाभाविक क्रियाएँ (तादात्म्यके कारण) अपनेमें प्रतीत होने लगती हैं।

'यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति' —प्रकृति और उसके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरमें

  • महासर्गमें समयकी गणनाका साधन सूर्य होता है; किन्तु महाप्रलयमें सूर्य भी लीन हो जाता है। अतः महासर्गके कालसे ही महाप्रलयके कालकी गणना आरम्भ हो जाती है। महाप्रलयके कालकी गणनाका एकमात्र साधन नित्य, चेतन, अविनाशी परमात्मतत्त्व ही होता है।

श्लोक ३० ]

  • साधक-संजीवनी *

१०७

खाना-पीना, चलना-फिरना, उठना-बैठना, घटना-बढ़ना, हिलना-डुलना, सोना-जागना, चिन्तन करना, समाधिस्थ होना आदि जो कुछ भी क्रियाएँ होती हैं, वे सभी प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं, स्वयंके द्वारा नहीं; क्योंकि स्वयंमें कोई क्रिया होती ही नहीं—ऐसा जो देखता है अर्थात् अनुभव करता है, वही वास्तवमें ठीक देखता है। कारण कि ऐसा देखनेसे अपनेमें अकर्तृत्व-(अकर्तापन-) का अनुभव हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, वे सब-की-सब प्रकृति-विभागमें ही होती हैं। इसमें जीवका हाथ नहीं है। प्रकृतिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको ही गीतामें कहीं 'गुणोंसे होनेवाली क्रियाएँ' और कहीं 'इन्द्रियोंसे होनेवाली क्रियाएँ' कहा गया है; जैसे—सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं—'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणेः कर्माणि सर्वशः ' (३।२७); गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—'गुणा गुणेषु वर्तन्ते ' (३।२८); गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं—'नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ' (१४।१९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं—'इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते ' (५।९) आदि। तात्पर्य है कि क्रियामात्र प्रकृतिजन्य ही है। अतः प्रकृति कभी किंचिन्मात्र भी अक्रिय नहीं होती और पुरुषमें कभी किंचिन्मात्र भी क्रिया नहीं होती। इसलिये गीतामें आया है कि तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी 'मैं (स्वयं) लेशमात्र भी कुछ नहीं करता हूँ'—ऐसा अनुभव करता है—'नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित् ' (५।८); स्वयं न करता है, न करवाता है—'नैव कुर्वन् कारयन् ' (५।१३); यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न करता है, न लिप्त होता है—'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ' (१३।३१); जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—'तत्रैव सति कर्तारमात्मानं..... ' (१८।१६) आदि।

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥

यदा= जिस कालमेंस्थितविस्तारम्= विस्तार (देखता है),
(साधक)अनुपश्यति= देखता हैतदा= उस कालमें
भूतपृथग्भावम्= प्राणियोंके= और
अलग-अलगततः= उस प्रकृतिसेब्रह्म= ब्रह्मको
भावोंकोएव= ही (उनसम्पद्यते= प्राप्त हो
एकस्थम्= एक प्रकृतिमें हीसबका)

व्याख्या —[प्रकृतिके दो रूप हैं—क्रिया और पदार्थ। क्रियासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये उन्तीसवों श्लोक कहा, अब पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये यह तीसवों श्लोक कहते हैं।]

'यदा भूतपृथग्भावं ..... ब्रह्म सम्पद्यते तदा '—जिस कालमें साधक सम्पूर्ण प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको अर्थात् त्रिलोकीमें जितने जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज प्राणी पैदा होते हैं, उन प्राणियोंके स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित

यहाँ क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा होनेवाली बताया है, कहीं गुणोंके द्वारा होनेवाली बताया है और कहीं इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली बताया है—ये तीनों बातें एक ही हैं। प्रकृति सबका कारण है, गुण प्रकृतिके कार्य हैं और गुणोंका कार्य इन्द्रियाँ हैं। अतः प्रकृति, गुण और इन्द्रियाँ—इनके द्वारा होनेवाली सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा होनेवाली ही कही जाती हैं।

देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। त्रिलोकीके स्थावर-जंगम प्राणियोंके शरीर, नाम, रूप, आकृति, मनोवृत्ति, गुण, विकार, उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि सब एक प्रकृतिसे ही उत्पन्न हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृतिमें ही स्थित रहते हैं और प्रकृतिमें ही लीन होते हैं। इस प्रकार देखनेवाला ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है अर्थात् प्रकृतिसे अतीत स्वतःसिद्ध अपने स्वरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। वास्तवमें वह पहलेसे ही प्राप्त था, केवल प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ

१०८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

अपना सम्बन्ध माननेसे ही उसको अपने स्वरूपका अनुभव नहीं होता था। परन्तु जब वह सबको प्रकृतिमें ही स्थित और प्रकृतिसे ही उत्पन्न देखता है, तब उसको अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है।

जैसे पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले स्थावर-जंगम जितने भी शरीर हैं तथा उन शरीरोंमें जो कुछ भी परिवर्तन होता है, रूपान्तर होता है१ क्रियाएँ होती हैं२ वे सब पृथ्वीपर ही होती हैं। ऐसे ही प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले जितने गुण, विकार हैं तथा उनमें जो कुछ परिवर्तन होता है, घट-बद्ध होती है, वह सब-की-सब प्रकृतिमें ही होती है। तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीसे पैदा होनेवाले पदार्थ पृथ्वीमें ही स्थित रहनेसे और पृथ्वीमें लीन होनेसे पृथ्वीरूप ही हैं, ऐसे ही प्रकृतिसे पैदा होनेवाला सब संसार प्रकृतिमें ही स्थित रहनेसे और प्रकृतिमें ही लीन होनेसे प्रकृतिरूप ही है। इसी प्रकार स्थावर-जंगम प्राणियोंके रूपमें जो चेतन-तत्त्व है, वह निरन्तर परमात्मामें

परिशिष्ट भाव— पूर्वश्लोकमें व्यक्ति की बात और प्रस्तुत श्लोकमें कालकी बात आयी है।

भक्तिके प्रकरणमें भगवान्ने सम्पूर्ण भावोंको अपनेमें बताया है—‘भवन्ति भावा भूतानां मत् एव पृथग्विधाः’ (१०।५), पर यहाँ ज्ञानके प्रकरणमें सम्पूर्ण भावोंको प्रकृतिमें बताया है। तात्पर्य है कि जहाँ सत्-असत्का विभाग किया है, वहाँ सब भाव असत्में कहे हैं और जहाँ समग्रकी बात कही है, वहाँ सब भाव अपनेमें कहे हैं। समग्रमें सत्-असत् सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘सदसच्चाहम्’ (१।१९)

सम्बन्ध—बाईसवें श्लोकमें जिसको देहसे पर बताया है और पीछेके (तीसवें) श्लोकमें जिसका ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है, उस पुरुष-(चेतन-) के वास्तविक स्वरूपका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!अव्ययः= अविनाशी= न
अयम्= यह (पुरुष स्वयं)परमात्मा= परमात्मस्वरूपकरोति= करता है
अनादित्वात्= अनादि होनेसेही है।(और)
(और)शरीरस्थः= यह शरीरमें= न
निर्गुणत्वात्= गुणोंसे रहितरहता हुआलिप्यते= लिप्त
होनेसेअपि= भीहोता है।

१-पहले मिट्टी और बीजको तौल ले और एक पात्रमें वह तुली हुई मिट्टी बिछाकर बीज बो दे और पानी सींच दे। फसल होनेपर उसको काटकर अनाज तैयार कर ले और मिट्टीको सूखने दे। सूखनेके बाद मिट्टी और अनाजको तौलकर देखे तो मिट्टीका वजन कम तथा अनाजका वजन ज्यादा होगा। यह मिट्टी-(पृथ्वी-) का अनाजमें रूपान्तर होना है

२-क्रियाएँ दो तरह की होती हैं—होना और करना। बालकका जवान और बूढ़ा होना आदि क्रियाएँ ‘होती’ हैं और खाना-पीना आदि क्रियाएँ ‘करते’ हैं। ये सब क्रियाएँ शरीरमें ही होती हैं।

श्लोक ३१ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०९

व्याख्या—‘अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः’— इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिसको अनादि कहा है, उसीको यहाँ भी ‘अनादित्वात्’ पदसे अनादि कहा है अर्थात् यह पुरुष आदि-(आरम्भ-) से रहित है। अब प्रश्न होता है कि वहाँ तो प्रकृतिको भी अनादि कहा है, इसलिये प्रकृति और पुरुष—दोनोंमें क्या फरक रहा ? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘निर्गुणत्वात् ’ अर्थात् यह पुरुष गुणोंसे रहित है। प्रकृति अनादि तो है, पर वह गुणोंसे रहित नहीं है, प्रत्युत गुणों और विकारोंवाली है। उससे सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण तथा विकार पैदा होते हैं। परन्तु पुरुष इन तीनों गुणों और विकारोंसे सर्वथा रहित (निर्गुण और निर्विकार) है। ऐसा यह पुरुष साक्षात् अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है अर्थात् यह पुरुष विनाशरहित परम शुद्ध आत्मा है।

‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’— यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न कुछ करता है और न किसी कर्मसे लिप्त ही होता है। तात्पर्य है कि इस पुरुष-(स्वयं-) ने न तो पहले किसी भी अवस्थामें कुछ किया है, न वर्तमानमें कुछ करता है और न आगे ही कुछ कर सकता है अर्थात् यह पुरुष सदासे ही प्रकृतिसे निलिप्त, असंग है तथा गुणोंसे रहित और अविनाशी है। इसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व है ही नहीं।

यहाँ ‘शरीरस्थोऽपि’ कहनेका तात्पर्य है कि यह पुरुष जिस समय अपनेको शरीरमें स्थित मानकर अपनेको कार्यका कर्ता और सुख-दुःखका भोक्ता मानता है, उस समय भी वास्तवमें यह तटस्थ, प्रकाशमात्र ही रहता है। सुख-दुःखका भान इसीसे होता है; अतः इसको प्रकाशक कह सकते हैं, पर इसमें प्रकाशक-धर्म नहीं है।

परिशिष्ट भाव— पुरुष अनादि है, पर शरीर आदिवाला है। पुरुष निर्गुण है, पर शरीर गुणमय है। पुरुष परमात्मा है, पर शरीर अनात्मा है। पुरुष अव्यय है, पर शरीर नाशवान् है। इसलिये अज्ञानी मनुष्यके द्वारा पुरुष (आत्मा)-को शरीरमें स्थित माननेपर भी वास्तवमें वह शरीरमें स्थित नहीं है अर्थात् शरीरसे सर्वथा असम्बद्ध है—‘न करोति न लिप्यते ’। कारण कि शरीरका सम्बन्ध तो संसारके साथ है, पर पुरुषका सम्बन्ध परमात्मके साथ है। अतः वास्तवमें पुरुष कभी शरीरस्थ हो सकता ही नहीं। परन्तु इस वास्तविकताकी तरफ ध्यान न देनेके कारण मनुष्य उसको शरीरस्थ मान लेता है।

‘निर्गुणत्वात्’— पुरुष स्वयं निर्गुण होते हुए भी गुणोंका संग करके बँध जाता है (गीता—इसी अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। दीखता तो ऐसा ही है कि बन्धन स्वतः-स्वाभाविक है और मुक्ति कृतिसाध्य है, पर वास्तवमें मुक्ति स्वतः-स्वाभाविक है और बन्धन कृतिसाध्य है। गुणोंका सम्बन्ध पुरुषके साथ नहीं है, प्रत्युत प्रकृतिके साथ है (गीता १३।२३) इसलिये ‘अनादि, निर्गुण, परमात्मा, अव्यय’ और ‘न करोति न लिप्यते ’— ये स्वतः-स्वाभाविक हैं। साधकको इस स्वाभाविकताका अनुभव करना है।

जैसे मकानमें रहते हुए भी हम मकानसे अलग हैं, ऐसे ही शरीरमें रहते हुए माननेपर भी हम शरीरसे अलग हैं।

यहाँ ‘अपि’ पदसे ऐसा मालूम होता है कि अनादिकालसे अपनेको शरीरमें स्थित माननेवाला हेक (चौंटीसे ब्रह्मार्पयन्त) प्राणी स्वरूपसे सदा ही निलिप्त, असंग है। उसकी शरीरके साथ एकता कभी हुई ही नहीं; क्योंकि शरीर तो प्रकृतिका कार्य होनेसे सदा प्रकृतिमें ही स्थित रहता है और स्वयं परमात्माका अंश होनेसे सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है। स्वयं परमात्मासे कभी अलग हो सकता ही नहीं। शरीरके साथ एकात्मता माननेपर भी, शरीरके साथ कितना ही घुल-मिल जानेपर भी, शरीरको ही अपना स्वरूप माननेपर भी उसकी निलिप्तता कभी नष्ट नहीं होती, वह स्वरूपसे सदा ही निलिप्त रहता है। अपनी निलिप्तताका अनुभव न होनेपर भी उसके स्वरूपमें कुछ भी विकृति नहीं होती। अतः उसने अपने स्वरूपसे न कभी कुछ किया है और न करता ही है तथा वह स्वयं न कभी लिप्त हुआ है और न लिप्त होता ही है।

यद्यपि पुरुष अपनेको शरीरमें स्थित माननेसे ही कर्ता और भोक्ता बनता है, तथापि इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि ‘प्रकृति’में स्थित पुरुष ही भोक्ता बनता है और यहाँ कहते हैं कि ‘शरीर’ में स्थित होनेपर भी पुरुष कर्ता-भोक्ता नहीं है। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रकृति और उसका कार्य शरीर—दोनों एक ही हैं। अतः पुरुषको चाहे प्रकृतिमें स्थित कहो, चाहे शरीरमें स्थित कहो, एक ही बात है। एक शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे मात्र प्रकृतिके साथ, मात्र शरीरोंके साथ सम्बन्ध हो जाता है। वास्तवमें पुरुषका सम्बन्ध न तो व्यक्ति शरीरके साथ है और न समष्टि प्रकृतिके साथ ही है। अपना सम्बन्ध शरीरके साथ माननेसे ही वह अपनेको कर्ता-भोक्ता मान लेता है। वास्तवमें वह न कर्ता है और न भोक्ता है।

११०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

‘न करोति न लिप्यते’—यह साधनजन्य नहीं है, प्रत्युत स्वतः-स्वाभाविक है। तात्पर्य है कि स्वरूपमें लेशमात्र भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है—यह स्वतःसिद्ध बात है। इसमें कोई पुरुषार्थ नहीं है अर्थात् इसके लिये कुछ करना नहीं है। तात्पर्य है कि कर्तृत्व-भोक्तृत्वको मिटाना नहीं है, प्रत्युत इनको अपनेमें स्वीकार नहीं करना है, इनके अभावका अनुभव करना है; क्योंकि वास्तवमें ये अपनेमें हैं ही नहीं! इसलिये साधकको अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्वका अनुभव करना चाहिये। अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व (निष्कामता-निर्ममता)-का अनुभव होना ही जीवन्मुक्त है। इसीको गीताने स्मृति प्राप्त होना कहा है—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा ’ (१८।७३)

अगर स्वरूप कर्ता और भोक्ता नहीं है तो फिर कर्ता और भोक्ता कौन है? यह विचार किया जाता है। पहले यह विचार करें कि कर्ता कौन है? शरीर कर्ता नहीं है; क्योंकि यह प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार—ये चार करण हैं, जिनको ‘अन्तःकरण’ कहते हैं। यह अन्तःकरण भी कर्ता नहीं है; क्योंकि करण कर्ताके अधीन होता है। परन्तु कर्ता स्वतन्त्र होता है—‘स्वतन्त्रः कर्ता ’ (पाणि० अ० १।४।५४)। करण तो क्रियाकी सिद्धिमें अत्यन्त सहायक होता है—‘साधकतमं करणम् ’ (पाणि० अ० १।४।४२), इसलिये करणके बिना किसी क्रियाकी सिद्धि होती ही नहीं। जैसे, कलम स्वतन्त्रतासे नहीं लिखती, प्रत्युत वह तो लिखनेका एक साधन (करण) है, जो लेखक (कर्ता)-के अधीन होता है। अतः करण कर्ता नहीं होता और कर्ता करण नहीं होता। दूसरी बात, यदि करणमें कर्तापन है तो फिर सुखी-दुःखी स्वयं क्यों होता है? यदि करण सुखी-दुःखी होता है तो हमें क्या नुकसान है? सत्-स्वरूप भी कर्ता नहीं है; क्योंकि मैंपन तो प्रकृतिका कार्य है, वह प्रकृतिसे अतीतमें कैसे सम्भव है? यदि स्वरूपमें कर्तापन होता तो वह कभी मिटता नहीं; क्योंकि स्वरूप अविनाशी है। इसलिये भगवान्ने यहाँ स्वरूपमें कर्तापनका निषेध किया है—‘न करोति ’। आगे अठारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने कहा है कि जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है (गीता—अठारहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। वास्तवमें जो भोक्ता (सुखी-दुःखी) होता है, वही कर्ता होता है।

अब यह विचार करें कि भोक्ता कौन है? भोक्ता न सत् है, न असत् है। सत् भोक्ता नहीं हो सकता; क्योंकि सत्में कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’, जबकि भोक्तापनका अभाव होता है—‘न लिप्यते ’। असत् भी भोक्ता नहीं हो सकता; क्योंकि असत्की सत्ता ही नहीं है—‘नासतो विद्यते भावः ’। असत्में चेतनता भी नहीं है। अतः उसमें भोक्तापनकी कल्पना ही नहीं हो सकती। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तापन और भोक्तापन न तो सत्में हैं और न असत्में ही हैं। सत्-असत्के संयोगमें भी कर्तापन और भोक्तापन नहीं हैं; क्योंकि जैसे दिन और रातका संयोग असम्भव है, ऐसे ही सत् और असत्का संयोग भी असम्भव है। अतः कर्तापन-भोक्तापन केवल माने हुए हैं—‘कर्ताहमिति मन्यते ’ (३।२७)। जब साधक विवेकपूर्वक शरीरसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है अर्थात् मैं-मेरापनको मिटा देता है (जो कि वास्तवमें मैं नहीं), तब न कर्ता रहता है, न भोक्ता रहता है, प्रत्युत एक चिन्मय सत्ता रहती है। इस प्रकार अपनेमें कर्तापन और भोक्तापनके अभावका अनुभव होनेपर साधक मुक्त हो जाता है अर्थात् कर्ता-भोक्ता नहीं रहता, प्रत्युत शुद्ध स्वरूप (चिन्मय सत्ता) रह जाता है।

न करोति न लिप्यते ’ पदोंका विवेचन भगवान्ने आगे बत्तीसवें-तैंतीसवें श्लोकोंमें किया है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि वह पुरुष न करता है और न लिप्त होता है, तो अब प्रश्न होता है कि वह कैसे लिप्त नहीं होता और कैसे नहीं करता? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥

यथा= जैसेन, उपलिप्यते = (कहीं भी) लिप्तअवस्थितः= परिपूर्ण
सर्वगतम्= सब जगह व्याप्तनहीं होता,आत्मा= आत्मा
आकाशम्= आकाशतथा= ऐसे हीदेहे
सौक्ष्म्यात्= अत्यन्त सूक्ष्म होनेसेसर्वत्र= सब जगहन, उपलिप्यते = लिप्त नहीं होता।

श्लोक ३३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१११

व्याख्या —[पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ‘न करोति’ पदोंसे पहले कर्तृत्वका और फिर ‘न लिप्यते’ पदोंसे भोक्तृत्वका अभाव बताया है। परन्तु उन दोनोंका विवेचन करते हुए इस श्लोकमें पहले भोक्तृत्वके अभावकी बात बतायी है और आगेके श्लोकमें कर्तृत्वके अभावकी बात बतायेंगे। अतः यहाँ ऐसा व्यतिक्रम रखनेमें भगवान्का क्या भाव है? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि कर्तृत्वके बाद ही भोक्तृत्व होता है अर्थात् कर्म करनेके बाद ही उस कर्मके फलका भोग होता है, तथापि मनुष्य जो कुछ भी करता है, पहले किसी फल-(सिद्धि-) का उद्देश्य मनमें रखकर ही करता है। अतः मनमें पहले भोक्तृत्व आता है, फिर उसके अनुसार काम करता है अर्थात् फिर कर्तृत्व आता है। इस दृष्टिसे भगवान् यहाँ सबसे पहले भोक्तृत्वका निषेध करते हैं। भोक्तृत्व-(लिप्ता- ) का त्याग होनेपर कर्तृत्वका त्याग स्वतः हो जाता है अर्थात् फलेच्छाका त्याग होनेपर क्रिया करनेपर भी कर्तृत्व नहीं होता।]

‘यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते’— आकाशका कार्य वायु, तेज, जल और पृथ्वी है। अतः

परिशिष्ट भाव— चिन्मय सत्ता एक ही है, पर अहंताके कारण वह अलग-अलग दीखती है। अपरा प्रकृतिके अंश ‘अहम्’ को पकड़नेके कारण ही यह जीव ‘अंश’ कहलाता है—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ’ (गीता १५।७)। अगर यह अहम्को न पकड़े तो एक सत्ता-ही-सत्ता है। सत्ता (होनेपन)-के सिवाय सब कल्पना है। वह चिन्मय सत्ता सब कल्पनाओंका आधार, अधिष्ठान, प्रकाशक और आश्रय है। उस सत्तामें एकदेशीयपना नहीं है। वह चिन्मय सत्ता सर्वव्यापक है। सम्पूर्ण सृष्टि (क्रियाएँ और पदार्थ) उस सत्ताके अन्तर्गत हैं। सृष्टि तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती है, पर सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है। तात्पर्य है कि चिन्मय सत्ता न शरीरस्थ है और न प्रकृतिस्थ है, प्रत्युत आकाशकी तरह सर्वत्र स्थित है अर्थात् वह सम्पूर्ण शरीरोंके, सृष्टिमात्रके बाहर-भीतर सर्वत्र परिपूर्ण है। वह सर्वव्यापी सत्ता ही हमारा स्वरूप है और वही परमात्मतत्त्व है। तात्पर्य है कि सर्वदेशीय सत्ता एक ही है। वही योगियोंका योग है, वही ज्ञानियोंका ज्ञान है और वही भक्तोंका भगवान् है। साधकका लक्ष्य निरन्तर उस सत्ताकी तरफ ही रहना चाहिये।

सत्तामें एकदेशीयता अहम्के कारण दीखती है। वह अहम् सुखलोलुपतापर टिका हुआ है। साधन करते हुए भी साधक जहाँ है, वहीं सुख भोगने लग जाता है—‘सुखसंगेन बध्नाति ’ (गीता १४।६)। यह सुखलोलुपता गुणातीत होनेतक रहती है। अतः इसमें साधकको बहुत विशेष सावधान रहना चाहिये और सावधानीपूर्वक सुखलोलुपतासे बचना चाहिये।

सम्बन्ध— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने आत्मामें भोक्तृत्वका अभाव बताया, अब आगेके श्लोकमें आत्मामें कर्तृत्वका अभाव बताते हैं।

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।

क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥

११२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! | इमम् | = इस | क्षेत्री | = क्षेत्रज्ञ (आत्मा) ---|---|---|---|---|--- यथा | = जैसे | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण एकः | = एक ही | लोकम् | = संसारको | क्षेत्रम् | = क्षेत्रको रविः | = सूर्य | प्रकाशयति | = प्रकाशित करता है, | प्रकाशयति | = प्रकाशित करता है, | | तथा | = ऐसे ही | |

व्याख्या—‘यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिम् रविः’ —नेत्रोंसे दीखनेवाले इस सम्पूर्ण संसारको, संसारके मात्र पदार्थोंको एक सूर्य ही प्रकाशित करता है और संसारकी सब क्रियाएँ सूर्यके प्रकाशके अन्तर्गत होती हैं; परन्तु सूर्यमें ‘मैं सबको प्रकाशित करता हूँ’ ऐसा कर्तृत्व नहीं होता। जैसे—सूर्यके प्रकाशमें ही ब्राह्मण वेदपाठ करता है और शिकारी पशुओंको मारता है, पर सूर्यका प्रकाश वेदपाठ और शिकाररूपी क्रियाओंको करने-करवानेमें कारण नहीं बनता। यहाँ ‘लोक’ शब्द मात्र संसार-(चौदह भुवनों-) का वाचक है। कारण कि मात्र संसारमें जो कुछ भी (चन्द्रमा, तारे, अग्नि, मणि, जड़ी-बूटी आदिमें) प्रकाश है, वह सब सूर्यका ही है। ‘क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत’—सूर्यकी तरह एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ, आत्मा) सम्पूर्ण क्षेत्रोंको प्रकाशित करता है अर्थात् सब क्षेत्रोंमें करना-करवानारूप सम्पूर्ण क्रियाएँ क्षेत्रीके प्रकाशमें ही होती हैं; परन्तु क्षेत्री उन क्रियाओंको करने-करवानेमें कारण नहीं बनता। सूर्य तो केवल स्थूल संसारको ही प्रकाशित करता है

परिशिष्ट भाव —जैसे सूर्य सम्पूर्ण जगत् (दृश्यमात्र)-को प्रकाशित करता है और उसके प्रकाशमें सम्पूर्ण शुभ-अशुभ क्रियाएँ होती हैं, पर सूर्य उन क्रियाओंका न तो कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है। ऐसे ही स्वयं सम्पूर्ण लोकोंके सब शरीरोंको प्रकाशित करता है अर्थात् उनको सत्ता-स्फूर्ति देता है, पर वास्तवमें स्वयं न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है, अर्थात् उसमें न कर्तृत्व आता है, न भोक्तृत्व। तात्पर्य है कि स्वयंमें प्रकाशकत्वका अभिमान नहीं है।

करनेकी जिम्मेवारी उसीपर होती है, जो कुछ कर सकता है। जैसे, कितना ही चतुर चित्रकार हो, बिना सामग्री (रंग, ब्रश आदि)-के वह चित्र नहीं बना सकता, ऐसे ही पुरुष (चेतन) बिना प्रकृतिकी सहायताके कुछ नहीं कर सकता। अतः पुरुषपर कुछ करनेकी जिम्मेवारी हो ही नहीं सकती। यह सबका अनुभव है कि शरीरके बिना हम कुछ कर सकते ही नहीं। इसलिये कुछ-न-कुछ करनेमें ही शरीरका उपयोग है। अगर हम कुछ भी न करना चाहें तो शरीरका क्या उपयोग है? कुछ भी उपयोग नहीं है। अगर हम कुछ भी देखना न चाहें तो आँख हमारे क्या काम आयी? कुछ भी सुनना न चाहें तो कान हमारे क्या काम आया? स्थूल क्रिया करनेमें स्थूलशरीर काम आता है। चिन्तन, ध्यान करनेमें सूक्ष्मशरीर काम आता है। स्थिरता, समाधिमें कारणशरीर काम आता है।* अगर कुछ न करें तो तीनों शरीर हमारे क्या काम आये? शरीर और उसके द्वारा होनेवाली क्रियाएँ संसारके ही काम आती हैं। हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है; अतः उसके लिये शरीर और उसकी क्रियाएँ कुछ काम नहीं आतीं। चिन्मय सत्तामात्रमें कोई कमी नहीं आती, वह सर्वथा पूर्ण है; अतः हमारेको अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। चिन्मय सत्ताके सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं; क्योंकि सत्ता एक ही हो सकती है, दो हो सकती ही नहीं। अतः हमारेको किसी साथीकी जरूरत नहीं है। इस प्रकार न तो क्रियाके साथ सम्बन्ध (कर्तृत्व)

  • समाधि और व्युत्थान—दोनों कारणशरीरमें होते हैं। कारणशरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘सहज-समाधि’ अथवा ‘सहजावस्था’ होती है।

और उसके प्रकाशमें स्थूल संसारकी ही क्रियाएँ होती हैं, पर क्षेत्री केवल स्थूल क्षेत्र-(संसार-) को ही प्रकाशित नहीं करता, प्रत्युत वह स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों क्षेत्रोंको प्रकाशित करता है तथा उसके प्रकाशमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरोंकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं।

जैसे सम्पूर्ण संसारको प्रकाशित करनेपर भी सूर्यमें (सबको प्रकाशित करनेका) अभिमान नहीं आता और तरह-तरहकी क्रियाओंको प्रकाशित करनेपर भी सूर्यमें नानाभेद नहीं आता, ऐसे ही सम्पूर्ण क्षेत्रोंको प्रकाशित करने, उनको सत्ता-स्फूर्ति देनेपर भी क्षेत्रीमें अभिमान, कर्तृत्व नहीं आता और तरह-तरहकी क्रियाओंको प्रकाशित करनेपर भी क्षेत्रीमें नानाभेद नहीं आता। वह क्षेत्री सदा ही ज्यों-का-त्यों निर्लिप्त, असंग रहता है।

कोई भी क्रिया तथा वस्तु बिना आश्रयके नहीं होती और कोई भी प्रतीति बिना प्रकाश-(ज्ञान-) के नहीं होती। क्षेत्री सम्पूर्ण क्रियाओं, वस्तुओं और प्रतीतियोंका आश्रय और प्रकाशक है।

श्लोक ३४]

  • साधक-संजीवनी *

११३

हो, न अप्राप्त वस्तुके साथ सम्बन्ध (कामना) हो और न प्राप्त वस्तुके साथ सम्बन्ध (ममता) हो तो प्रकृतिके साथ तादात्म्य नहीं रहेगा। प्रकृतिसे तादात्म्य न रहनेपर प्रकृतिमें क्रिया तो रहेगी, पर कर्ता और भोक्ता कोई नहीं रहेगा। (इसी अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—अब भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको जाननेका फल बताते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरैवमन्तरं

ज्ञानचक्षुषा ।

भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर््यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥

एवम्= इस प्रकार= तथाविदुः= जानते हैं,
ये= जोते= वे
ज्ञानचक्षुषा= ज्ञानरूपी नेत्रोंसेभूतप्रकृतिमोक्षम्= कार्य-कारण-सहित प्रकृतिसेपरम्= परमात्माको
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः= क्षेत्र और क्षेत्रज्ञकेस्वयंको अलगयान्ति= प्राप्त हो जाते हैं।
अन्तरम्= विभागको

व्याख्या—[ज्ञानमार्ग विवेकसे ही आरम्भ होता है और वास्तविक विवेक-(बोध-) में ही समाप्त होता है। वास्तविक विवेक होनेपर प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वतःसिद्ध परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है—इसी बातको यहाँ बताया गया है।]

‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरैवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा’—सत्-असत्, नित्य-अनित्य, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको अलग-अलग जाननेका नाम ‘ज्ञानचक्षु’ (विवेक) है। यह क्षेत्र विकारी है, कभी एकरूप नहीं रहता। यह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है। ऐसा कोई भी क्षण नहीं है, जिसमें यह स्थिर रहता हो। परन्तु इस क्षेत्रमें रहनेवाला, इसको जाननेवाला क्षेत्रज्ञ सदा एकरूप रहता है। क्षेत्रज्ञमें परिवर्तन न हुआ है, न होगा और न होना सम्भव ही है। इस तरह जानना, अनुभव करना ही ज्ञानचक्षुसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागको जानना है।

‘भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर््यान्ति ते परम्’—वास्तविक विवेक अर्थात् बोध होनेपर भूत और प्रकृतिसे अर्थात् प्रकृतिके कार्यमात्रसे तथा प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर अर्थात् प्रकृतिसे अपने अलगावका ठीक अनुभव होनेपर साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं।

भगवान्ने पहले अय्यत्तकी उपासना करनेवालोंको अपनी प्राप्ति बतायी थी—‘ते प्राणुवन्ति मामेव’ (११।४), उसी बातको इस अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘मद्वावायोपपद्यते’ पदसे, तेईसवें श्लोकमें ‘न स भूयोऽभिजायते’ पदोंसे और यहाँ ‘यान्ति ते परम्’ पदोंसे कहा है।

ज्ञानमार्गमें देहाभिमान ही प्रधान बाधा है। इस बाधाको दूर करनेके लिये भगवान्ने इसी अध्यायके आरम्भमें ‘इदं शरीरम्’ पदोंसे शरीर-(क्षेत्र-) से अपनी (क्षेत्रज्ञकी) पृथक्ताका अनुभव करनेके लिये कहा, और दूसरे श्लोकमें ‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानम्’ पदसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके ज्ञानको वास्तविक ज्ञान कहा, फिर क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकी पृथक्ताका कई तरहसे वर्णन किया। अब उसी विषयका उपसंहार करते हुए भगवान् अन्तमें कहते हैं कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकी पृथक्ताको ठीक-ठीक जान लेनेसे क्षेत्रके साथ सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।

क्षेत्रज्ञने ही परमात्मासे विमुख होकर परमात्मासे भिन्नता मानी है और क्षेत्रके सम्मुख होकर क्षेत्रसे एकता मानी है। इसलिये परमात्मासे एकता और क्षेत्रसे सर्वथा भिन्नता— दोनों बातोंको कहना आवश्यक हो गया। अतः भगवान्ने इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्भि’ पदोंसे क्षेत्रज्ञकी परमात्मासे एकता बतायी और यहाँ क्षेत्रकी समष्टि संसारसे एकता बता रहे हैं। दोनोंका तात्पर्य क्षेत्रज्ञ और परमात्माकी अभिन्नता बतानेमें ही है।

जैसे किसी मकानमें चारों ओर अँधेरा है। कोई कह देता है कि मकानमें प्रेत रहते हैं, तो उसमें प्रेत दीखने लग जाते हैं अर्थात् उसमें प्रेत होनेका वहम हो जाता है। परन्तु किसी साहसी पुरुषके द्वारा मकानके भीतर जाकर प्रकाश कर देनेसे अँधेरा और प्रेत—दोनों ही मिट जाते हैं। अँधेरेमें चलते समय मनुष्य धीरे-धीरे चलता है कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं गड़गड़ा न आ जाय। उसको गिरनेका और साथ ही बिच्छू, साँप, चोर आदिका भय भी लगा रहता है।

९१४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १३

परन्तु प्रकाश होते ही ये सब भय मिट जाते हैं। ऐसे ही

सर्वत्र परिपूर्ण प्रकाशस्वरूप परमात्मासे विमुख

होनेपर अन्धकारस्वरूप संसारकी स्वतन्त्र सत्ता सर्वत्र

दीखने लग जाती है और तरह-तरहके भय सताने लग

जाते हैं। परन्तु वास्तविक बोध होनेपर संसारकी स्वतन्त्र

सत्ता नहीं रहती और सब भय मिट जाते हैं। एक

प्रकाशस्वरूप परमात्मा ही शेष रह जाता है। अँधेरेको

मिटानेके लिये तो प्रकाशको लाना पड़ता है, परमात्माको

कहींसे लाना नहीं पड़ता। वह तो सब देश, काल, वस्तु,

व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है।

इसलिये संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर उसका

अनुभव अपने-आप हो जाता है।

परिशिष्ट भाव-क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान 'विवेक' कहलाता है। जो साधक इस विवेकको महत्त्व

देकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको ठीक-ठीक जान लेते हैं तथा प्रकृति और उसके कार्य (शरीर)-को स्वयंसे सर्वथा

अलग अनुभव कर लेते हैं, वे चिन्मय परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं। उनकी दृष्टिमें एक चिन्मय तत्त्वके सिवाय

कुछ नहीं रहता।

भगवान्ने 'मद्भावायोपपद्यते' (१३।१८) पदसे सगुणकी प्राप्ति बतायी है और यहाँ 'ये विदुर्यान्ति ते परम्'

पदोंने निर्गुणकी प्राप्ति बतायी है। वास्तवमें 'मद्भाव' और 'परम्' की प्राप्ति एक ही है (गीता-आठवें अध्यायका

इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका सत्ताइसवाँ श्लोक)।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्-इन भगवान्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय

श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

इस (तेरहवें) अध्यायमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका

वर्णन किया गया है। क्षेत्र अलग है और क्षेत्रज्ञ अलग है-

ऐसा अनुभव हो जानेसे क्षेत्रज्ञका परमात्माके साथ योग हो

जाता है, जो कि नित्य है। इसलिये इस अध्यायका नाम

'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' रखा गया है।

तेरहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथ त्रयोदशोऽध्यायः' के

तीन, 'श्रीभगवानुवाच' के दो, श्लोकोंके चार सौ आठ

और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका

योग चार सौ छब्बीस है।

(२) इस अध्यायमें 'अथ त्रयोदशोऽध्यायः' के

आठ, 'श्रीभगवानुवाच' के सात, श्लोकोंके एक हजार

अठ्ठासी और पुष्पिकाके बावन अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण

अक्षरोंका योग एक हजार एक सौ पचपन है। इस

अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें एक उवाच है-'श्रीभगवानुवाच'।

तेरहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके चौंतीस श्लोकोंमेंसे-पहले श्लोकके

प्रथम चरणमें तथा अठारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण'

प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; सत्रहवें श्लोकके तृतीय चरणमें

तथा इकतीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे

'र-विपुला'; और तेईसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण'

प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनतीस

श्लोक ठीक 'पथ्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अवतरणिका—

श्रीभगवान्ने तेरहवें अध्यायके अन्तमें कहा कि ज्ञानचक्षुसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको देखनेवाला परमात्माको प्राप्त हो जाता है। अब प्रश्न होता है कि वह ज्ञान क्या है और उसकी क्या महिमा है तथा उस ज्ञानकी प्राप्तिका सरल उपाय क्या है? इसका वर्णन करनेके लिये भगवान् चौदहवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं।

बन्धन दोसे होता है—प्रकृतिसे और प्रकृतिके कार्य गुणोंसे। प्रकृतिके बन्धनसे छूटनेके लिये भगवान्ने तेरहवें अध्यायका विषय बता दिया। अब प्रकृतिके कार्य गुणोंके बन्धनसे छूटनेके लिये भगवान् चौदहवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हुए पहले दो श्लोकोंमें ज्ञानकी महिमाका वर्णन करते हैं।

श्रीभगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। यज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले—

ज्ञानानाम्= सम्पूर्ण ज्ञानोंमेंप्रवक्ष्यामि= कहूँगा,इतः= इस संसारसे
उत्तमम्= उत्तम (और)यत्= जिसको(मुक्त होकर)
परम्= श्रेष्ठज्ञात्वा= जानकरपराम्= परम
ज्ञानम्= ज्ञानको (में)सर्वे= सब-के-सबसिद्धिम्= सिद्धिको
भूयः= फिरमुनयः= मुनिलोगगताः= प्राप्त हो गये हैं।

व्याख्या—‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्’ —तेरहवें अध्यायके अठारहवें, तेईसवें और चौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका, प्रकृति-पुरुषका जो ज्ञान (विवेक) बताया था, उसी ज्ञानको फिर बतानेके लिये भगवान् ‘भूयः प्रवक्ष्यामि’ पदोंसे प्रतिज्ञा करते हैं। लौकिक और पारलौकिक जितने भी ज्ञान हैं अर्थात् जितनी भी विद्याओं, कलाओं, भाषाओं, लिपियों आदिका ज्ञान है, उन सबसे प्रकृति-पुरुषका भेद बतानेवाला, प्रकृतिसे अतीत करनेवाला, परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला यह ज्ञान श्रेष्ठ है, सर्वोत्कृष्ट है। इसके समान दूसरा कोई ज्ञान है ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। कारण कि दूसरे सभी ज्ञान संसारमें फैसानेवाले हैं, बन्धनमें डालनेवाले हैं।

यद्यपि ‘उत्तम’ और ‘पर’—इन दोनों शब्दोंका एक ही अर्थ होता है, तथापि जहाँ एक अर्थके दो शब्द एक

साथ आ जाते हैं, वहाँ उनके दो अर्थ होते हैं। अतः यहाँ ‘उत्तम’ शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान प्रकृति और उसके कार्य संसार-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद करानेवाला होनेसे श्रेष्ठ है; और ‘पर’ शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला होनेसे सर्वोत्कृष्ट है।

‘यज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः’ —जिस ज्ञानको जानकर अर्थात् जिसका अनुभव करके बड़े-बड़े मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त हो गये हैं, उसको मैं कहूँगा। उस ज्ञानको प्राप्त करनेपर कोई मुक्त हो और कोई मुक्त न हो—ऐसा होता ही नहीं, प्रत्युत इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब मुनिलोग मुक्त हो जाते हैं, संसारके बन्धनसे, संसारकी परवशतासे छूट जाते हैं और परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।

तत्त्वका मनन करनेवाले जिस मनुष्यका शरीरके साथ अपनापन नहीं रहा, वह ‘मुनि’ कहलाता है।

११६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

‘परां सिद्धिम्’ कहनेका तात्पर्य है कि सांसारिक कार्योंकी जितनी सिद्धियाँ हैं अथवा योग-साधनसे होनेवाली अणिमा, महिमा, गरिमा आदि जितनी सिद्धियाँ हैं, वे सभी वास्तवमें असिद्धियाँ ही हैं। कारण कि वे सभी जन्म-

मरण देनेवाली, बन्धनमें डालनेवाली, परमात्मप्राप्तिमें बाधा डालनेवाली हैं। परन्तु परमात्मप्राप्तिरूप जो सिद्धि है, वह सर्वोत्कृष्ट है; क्योंकि उसको प्राप्त होनेपर मनुष्य जन्म-मरणसे छूट जाता है।

परिशिष्ट भाव —(यह चौदहवाँ अध्याय तेरहवें अध्यायका ही परिशिष्ट है।) श्रेष्ठ-क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान सम्पूर्ण लौकिक-पारलौकिक ज्ञानोंसे उत्तम तथा सर्वोत्कृष्ट है। यह ज्ञान परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका रामबाण उपाय है, इसलिये इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते अर्थात् मुक्त हो जाते हैं।

‘ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्’ पदोंका तात्पर्य है—सात्विक, राजस और तामस ज्ञानसे तथा लौकिक-पारलौकिक ज्ञानसे भी उत्तम, आखिरी ज्ञान। इस ज्ञानके सिवाय दूसरा कोई ज्ञान परमसिद्धि प्राप्त नहीं करा सकता। एक परमात्मतत्त्वके सिवाय कुछ भी नहीं है—ऐसा अनुभव हो जाना ही परमसिद्धिकी प्राप्ति है। तात्पर्य है कि परमसिद्धि प्राप्त होनेपर क्रिया तथा पदार्थका अत्यन्त अभाव हो जाता है और एक चिन्मय सत्ताके सिवाय कोई जड़ वस्तु रहती ही नहीं, जो कि वास्तवमें है।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।

सर्गैऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥

इदम् = इस ज्ञानम् = ज्ञानका उपाश्रित्य = आश्रय लेकर मम = (जो मनुष्य) मेरी

साधर्म्यम् = सधर्माका आगताः = प्राप्त हो गये हैं, सर्गैः = (वे) महासर्गमें अपि = भी

न, उपजायन्ते = पैदा नहीं होते = और प्रलये = महाप्रलयमें भी न, व्यथन्ति = व्यथित नहीं होते।

व्याख्या —‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने उत्तम और पर—इन दो विशेषणोंसे जिस ज्ञानकी महिमा कही थी, उस ज्ञानका अनुभव करना ही उसका आश्रय लेना है। उस ज्ञानका अनुभव होनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण संशय मिट जाते हैं और वह ज्ञानस्वरूप हो जाता है।

‘मम साधर्म्यमागताः’ —उस ज्ञानका आश्रय लेकर मनुष्य मेरी सधर्माका प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जैसे मेरेमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है, ऐसे ही उनमें भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं रहता। जैसे मैं सदा ही निलिप्त-निर्विकार रहता हूँ, ऐसे ही उनको भी अपनी निलिप्तता-निर्विकारताका अनुभव हो जाता है।

ज्ञानी महापुरुष भगवान्के समान निलिप्त-निर्विकार तो हो जाते हैं, पर वे भगवान्के समान संसारकी उत्पत्ति, पालन और संहारका कार्य नहीं कर सकते। हाँ, योगाभ्यासके बलसे किसी योगीमें कुछ सामर्थ्य आ जाती है, पर वह सामर्थ्य भी भगवान्की सामर्थ्यके समान नहीं होती। कारण कि वह ‘युंजान योगी’ है अर्थात् उसने अभ्यास करके कुछ सामर्थ्य प्राप्त की है। परन्तु भगवान् ‘मुक्त योगी’ हैं अर्थात् भगवान्में सामर्थ्य सदासे स्वतःसिद्ध है। भगवान् सब कुछ करनेमें समर्थ हैं—‘कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थः।’

योगीकी सामर्थ्य तो सीमित होती है, पर भगवान्की सामर्थ्य असीम होती है।

‘सर्गैऽपि नोपजायन्ते’ —यहाँ ‘अपि’ पदसे यह मालूम होता है कि वे ज्ञानी महापुरुष महासर्गके आरम्भमें भी उत्पन्न नहीं होते। महासर्गके आदिमें चौदह लोकोंकी तथा उन लोकोंके अधिकारियोंकी उत्पत्ति होती है, पर वे महापुरुष उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनको फिर कर्मपरवश होकर शरीर धारण नहीं करना पड़ता।

‘प्रलये न व्यथन्ति च’ —महाप्रलयमें संवर्तक अगिन्से चर-अचर सभी प्राणी भस्म हो जाते हैं। समुद्रके बढ़ जानेसे पृथ्वी डूब जाती है। चौदह लोकोंमें हलचल, हाहाकार मच जाता है। सभी प्राणी दुःखी होते हैं, नष्ट होते हैं। परन्तु महाप्रलयमें उन ज्ञानी महापुरुषोंको कोई दुःख नहीं होता, उनमें कोई हलचल नहीं होती, विकार नहीं होता। वे महापुरुष जिस तत्त्वको प्राप्त हो गये हैं, उस तत्त्वमें हलचल, विकार है ही नहीं, तो फिर वे महापुरुष व्यथित कैसे हो सकते हैं? नहीं हो सकते।

महासर्गमें भी उत्पन्न न होने और महाप्रलयमें भी व्यथित न होनेका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी महापुरुषका

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

११७

प्रकृति और प्रकृतिजन्य गुणोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इसलिये प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जो जन्म-मरण

होता है, दुःख होता है, हलचल होती है, प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित महापुरुषमें वह जन्म-मरण, दुःख आदि नहीं होते।

परिशिष्ट भाव —कारणशरीरके सम्बन्धसे 'निर्विकल्प स्थिति' होती है और कारणशरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर (स्वयंमें) 'निर्विकल्प बोध' होता है। निर्विकल्प स्थिति तो सविकल्पमें बदल जाती है, पर निर्विकल्प बोध सविकल्पमें नहीं बदलता। तात्पर्य है कि निर्विकल्प स्थितिमें परिवर्तन होता है, पर निर्विकल्प बोधमें कभी परिवर्तन नहीं होता, वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। इस बातको यहाँ 'सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' पदोंसे कहा गया है।

महासर्ग और महाप्रलय प्रकृतिमें होते हैं। प्रकृतिसे अतीत तत्त्व (परमात्मा)-की प्राप्ति होनेपर महासर्ग और महाप्रलयका कोई असर नहीं पड़ता; क्योंकि प्रकृतिसे सम्बन्ध ही नहीं रहता। प्रकृतिसे सम्बन्ध न रहनेको 'आत्यन्तिक प्रलय' भी कहा गया है। तात्पर्य है कि प्रकृतिके कार्य शरीरको पकड़नेसे मनुष्य परतन्त्र हो जाता है*, जन्म-मरणमें पड़ जाता है; परन्तु प्रकृतिके कार्यसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर वह स्वतन्त्र हो जाता है, निरपेक्ष जीवन हो जाता है, जन्म-मरणसे सदाके लिये छूट जाता है।

'मम साधर्म्यमागताः' पदोंका तात्पर्य है कि जैसे परमात्मा सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे ही उनको प्राप्त होनेवाले ज्ञानी महापुरुष भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाते हैं।

सम्बन्ध —जो भगवान्की सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं, वे तो महासर्गमें भी पैदा नहीं होते; परन्तु जो प्राणी महासर्गमें पैदा होते हैं, उनके उत्पन्न होनेकी क्या प्रक्रिया है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्नार्भ दधाम्यहम्।

सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥

भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! | योनिः | = उत्पत्ति-स्थान है (और) | दधाभि | = स्थापन करता हूँ। ---|---|---|---|---|--- मम | = मेरी | अहम् | = मैं | ततः | = उससे महत, ब्रह्म | = मूल प्रकृति | तस्मिन् | = उसमें | सर्वभूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंकी तो | | गर्भम् | = जीवरूप गर्भका | सम्भवः | = उत्पत्ति | | | | भवति | = होती है।

व्याख्या —'मम योनिर्महद्ब्रह्म'—यहाँ मूल प्रकृतिको 'महद्ब्रह्म' नामसे कहा गया है, इसके कई कारण हो सकते हैं; जैसे—

(१) परमात्मा छोटे-पन और बड़े-पनसे रहित हैं; अतः वे सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी हैं और महान्-से-महान् भी हैं—'अणोरणीयान्महतो महीयान्' (श्वेताश्वतरोपनिषद् ३।२०)। परन्तु संसारकी दृष्टिसे सबसे बड़ी चीज मूल प्रकृति ही है अर्थात् संसारमें सबसे बड़ा व्यापक तत्त्व मूल प्रकृति ही है। परमात्माके सिवाय संसारमें इससे बड़कर कोई व्यापक तत्त्व नहीं है। इसलिये इस मूल प्रकृतिको यहाँ 'महद्ब्रह्म' कहा गया है।

(२) 'महत' (महतत्त्व अर्थात् समष्टि बुद्धि) और 'ब्रह्म'-(परमात्मा- के बीचमें होनेसे मूल प्रकृतिको 'महद्ब्रह्म' कहा गया है।

(३) पीछेके (दूसरे) श्लोकमें 'सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' पदोंमें आये 'सर्ग' और 'प्रलय' शब्दोंका अर्थ क्रमशः ब्रह्माका दिन और ब्रह्माकी रात माना जा सकता है। अतः उनका अर्थ महासर्ग (ब्रह्माका प्रकट होना) और महाप्रलय (ब्रह्माका लीन होना) सिद्ध करनेके लिये यहाँ 'महद्ब्रह्म' शब्द दिया है। तात्पर्य है कि जीवन्मुक्त महापुरुषोंका इस मूल प्रकृतिसे ही सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, इसलिये वे महासर्गमें भी पैदा

  • 'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः' (३।५)

'अवशं प्रकृतेर्वशात्' (१।८)

'रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहगामे' (८।१९)

१२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।

सबका उत्पत्ति-स्थान होनेसे इस मूल प्रकृतिको ‘योनि ’ कहा गया है। इसी मूल प्रकृतिसे अनन्त ब्रह्माण्ड पैदा होते हैं और इसीमें लीन होते हैं। इस मूल प्रकृतिसे ही सांसारिक अनन्त शक्तियाँ पैदा होती हैं।

इस मूल प्रकृतिके लिये ‘मम ’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि यह प्रकृति मेरी है। अतः इसपर आधिपत्य भी मेरा ही है। मेरी इच्छाके बिना यह प्रकृति अपनी तरफसे कुछ भी नहीं कर सकती। यह जो कुछ भी करती है, वह सब मेरी अध्यक्षातमें ही करती है (गीता—नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)।

मैं मूल प्रकृति—(महद्वब्रह्म—) से भी श्रेष्ठ साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हूँ—इसको बतानेके लिये भगवान्ने ‘मम महद्वब्रह्म ’ पदोंका प्रयोग किया है।

महद्व ब्रह्मसे भी श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माका अंश होते हुए भी जीव परमात्मासे विमुख होकर प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है। इतना ही नहीं, वह प्रकृतिके कार्य तीनों गुणोंसे सम्बन्ध जोड़ लेता है और उससे भी नीचे गिरकर गुणोंके भी कार्य शरीर आदिसे सम्बन्ध जोड़ लेता है और बँध जाता है। अतः भगवान् ‘मम महद्वब्रह्म ’ पदोंसे कहते हैं कि जीवका सम्बन्ध वास्तवमें मूल प्रकृतिसे भी श्रेष्ठ मुझ परमात्माके साथ है—‘मम एव अंशः ’ (गीता १५।७), इसलिये प्रकृतिके साथ सम्बन्ध मानकर उसको

परिशिष्ट भाव —भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि जन्म-मरणमें पड़ा हुआ होनेपर भी जीव मेरा ही अंश है। उसकी सधर्मता, एकता मेरे साथ है, शरीरके साथ नहीं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें समष्टि संसारकी उत्पत्तिकी बात बतायी, अब आगेके श्लोकमें व्यक्ति शरीरोंकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!सम्भवन्ति= पैदा होते हैं,अहम्= मैं
सर्वयोनिषु= सम्पूर्ण योनियोंमेंतासाम्= उन सबकीबीजप्रदः= बीज-स्थापन करनेवाला
याः= (प्राणियोंके) जितनेमहत, ब्रह्म= मूल प्रकृति तोपिता= पिता हूँ।
मूर्तयः= शरीरयोनिः= माता है (और)

व्याख्या —‘सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ’—जरायुज (जेरेके साथ पैदा होनेवाले मनुष्य, पशु आदि), अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले पक्षी, सर्प आदि),

अपना पतन नहीं करना चाहिये।

‘तस्मिन्नार्थं दधाम्यहम्’ —यहाँ ‘गर्भम् ’ पद कर्म-संस्कारोंसहित जीव-समुदायका वाचक है। भगवान् कोई नया गर्भ स्थापन नहीं करते। अनादिकालसे जो जीव जन्म-मरणके प्रवाहमें पड़े हुए हैं, वे महाप्रलयके समय अपने-अपने कर्म-संस्कारोंसहित प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। प्रकृतिमें लीन हुए जीवोंके कर्म जब परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं, तब महासर्गके आदिमें भगवान् उन जीवोंका प्रकृतिके साथ पुनः विशेष सम्बन्ध (जो कि कारणशरीररूपसे पहलेसे ही था) स्थापित करा देते हैं—यही भगवान्के द्वारा जीव-समुदायरूप गर्भको प्रकृतिरूप योनिमें स्थापन करना है।

‘सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत’ —भगवान्के द्वारा प्रकृतिमें गर्भ-स्थापन करनेके बाद सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है अर्थात् वे प्राणी सूक्ष्म और स्थूल शरीर धारण करके पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं। महासर्गके आदिमें प्राणियोंका यह उत्पन्न होना ही भगवान्का विसर्ग (त्याग) है, आदिकर्म है (गीता—आठवें अध्यायका तीसरा श्लोक)।

[जीव जबतक मुक्त नहीं होता, तबतक प्रकृतिके अंश कारण-शरीरसे उसका सम्बन्ध बना रहता है और वह महाप्रलयमें कारणशरीरसहित ही प्रकृतिमें लीन होता है।]

स्वेदज (पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जूँ, लीख आदि) और उद्भिज्ज (पृथ्वीको फोड़कर उत्पन्न होनेवाले वृक्ष, लता आदि)—सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिके ये चार खानि अर्थात्

स्थान हैं। इन चारोंमेंसे एक-एक स्थानसे लाखों योनियाँ

पैदा होती हैं। उन लाखों योनियोंमेंसे एक-एक योनिमें भी

जो प्राणी पैदा होते हैं, उन सबकी आकृति अलग-अलग

होती है। एक योनिमें, एक जातिमें पैदा होनेवाले प्राणियोंकी

आकृतिमें भी स्थूल या सूक्ष्म भेद रहता है अर्थात् एक समान

आकृति किसीकी भी नहीं मिलती। जैसे, एक मनुष्योनिमें

अरबों वर्षोंसे अरबों शरीर पैदा होते चले आये हैं, पर

आजतक किसी भी मनुष्यकी आकृति परस्पर नहीं

मिलती। इस विषयमें किसी कविने कहा है-

पाग भाग वाणी प्रकृति, आकृति वचन विवेक।

अक्षर मिलत न एक-से, देखे देश अनेक॥

अर्थात् पगड़ी, भाग्य, वाणी (कण्ठ), स्वभाव,

आकृति, शब्द, विचार-शक्ति और लिखनेके अक्षर-ये

सभी दो मनुष्योंके भी एक समान नहीं मिलते। इस तरह

चौरासी लाख योनियोंमें जितने शरीर अनादिकालसे पैदा

होते चले आ रहे हैं, उन सबकी आकृति अलग-अलग

है। चौरासी लाख योनियोंके सिवाय देवता, पितर, गन्धर्व,

भूत, प्रेत आदिको भी यहाँ 'सर्वयोनिषु' पदके अन्तर्गत

ले लेना चाहिये।

'तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता'-उपर्युक्त

चार खानि अर्थात् चौरासी लाख योनियाँ तो शरीरोंके पैदा

होनेके स्थान हैं और उन सब योनियोंका उत्पत्ति-स्थान

(माताके स्थानमें) 'महद्ब्रह्म' अर्थात् मूल प्रकृति है। उस मूल

प्रकृतिमें जीवरूप बीजका स्थापन करनेवाला पिता मैं हूँ।

भिन्न-भिन्न वर्ण और आकृतिवाले नाना प्रकारके

शरीरोंमें भगवान् अपने चेतन-अंशरूप बीजको स्थापित

करते हैं-इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक प्राणीमें स्थित

परमात्माका अंश शरीरोंकी भिन्नतासे ही भिन्न-भिन्न प्रतीत

होता है। वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक ही परमात्मा

विद्यमान हैं (गीता-तेरहवें अध्यायका दूसरा श्लोक)। इस

बातको एक दृष्टान्तसे समझाया जाता है। यद्यपि दृष्टान्त

सर्वांशमें नहीं घटता, तथापि वह बुद्धिको दाष्ट्रान्तिकके

नजदीक ले जानेमें सहायक होता है। कपड़ा और पृथ्वी-

दोनोंमें एक ही तत्त्वकी प्रधानता है। कपड़ेको अगर जलमें

डाला जाय तो वह जलके निचले भागमें जाकर बैठ जाता

है। कपड़ा ताना (लम्बा धागा) और बाना-(आड़ा

धागा-) से बुना जाता है। प्रत्येक ताने और बानेके बीचमें

एक सूक्ष्म छिद्र रहता है। कपड़ेमें ऐसे अनेक छिद्र होते

हैं। जलमें पड़े रहनेसे कपड़ेके सम्पूर्ण तन्तुओंमें और

अलग-अलग छिद्रोंमें जल भर जाता है। कपड़ेको जलसे

बाहर निकालनेपर भी उसके तन्तुओंमें और असंख्य

छिद्रोंमें एक ही जल समानरीतिसे परिपूर्ण रहता है। इस

दृष्टान्तमें कपड़ा 'प्रकृति' है, अलग-अलग असंख्य छिद्र

'शरीर' हैं और कपड़े तथा उसके छिद्रोंमें परिपूर्ण जल

'परमात्मतत्त्व' है। तात्पर्य है कि स्थूल दृष्टिसे तो प्रत्येक

शरीरमें परमात्मतत्त्व अलग-अलग दिखायी देता है, पर

सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो सम्पूर्ण शरीरोंमें, सम्पूर्ण संसारमें

एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है।

परिशिष्ट भाव-चौरासी लाख योनियाँ, देवता, पितर, गन्धर्व, भूत-प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, बालग्रह, स्थावर-

जंगम, जलचर-थलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज आदि सभी 'सर्वयोनिषु' पदके अन्तर्गत लेने

चाहिये। इसी बातको सातवें अध्यायके छठे श्लोकमें 'एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय' पदोंसे और तेरहवें

अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें 'यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम्' पदोंसे कहा गया है।

यहाँ 'मूर्ति' शब्दका अर्थ है-शरीर। इसके अन्तर्गत मूर्त-अमूर्त, व्यक्त-अव्यक्त दोनों शरीर लेने चाहिये। पृथ्वी,

जल और अग्नि मूर्त हैं। वायु और आकाश अमूर्त हैं। वायुप्रधान शरीर होनेसे भूत-प्रेत-पिशाच भी अमूर्त हैं।

भगवान्ने पहले-दूसरे श्लोकोंमें बताया कि प्रकृतिका सम्बन्ध न रहे तो जन्म-मरण नहीं होता और तीसरे-

चौथे श्लोकोंमें बताया कि प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जन्म-मरण होता है। इसी (तीसरे-चौथे श्लोकोंकी) बातको

आगे पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक विस्तारसे कहा है।

सम्बन्ध-परमात्मा और उनकी शक्ति प्रकृतिके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जीव प्रकृतिजन्य गुणोंसे कैसे बँधते हैं-

इस विषयका विवेचन आगेके श्लोकसे आरम्भ करते हैं।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५॥

१२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

महाबाहो= हे महाबाहो!रजः= रज (और)अव्ययम्= अविनाशी
प्रकृतिसम्भवाः= प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवालेतमः= तमदेहिनम्= देही (जीवात्मा)-को
सत्त्वम्= सत्त्व,इति= —ये (तीनों)देहे= देहमें
गुणाः= गुणनिबध्नन्ति= बाँध देते हैं।

व्याख्या—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति-सम्भवाः’ —तीसरे और चौथे श्लोकमें जिस मूल प्रकृतिको ‘महद् ब्रह्म’ नामसे कहा है, उसी मूल प्रकृतिसे सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण पैदा होते हैं।

यहाँ ‘इति’ पदका तात्पर्य है कि इन तीनों गुणोंसे अनन्त सृष्टियाँ पैदा होती हैं तथा तीनों गुणोंके तारतम्यसे प्राणियोंके अनेक भेद हो जाते हैं, पर गुण न दो होते हैं, न चार होते हैं, प्रत्युत तीन ही होते हैं।

‘निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्’ —ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो ये तीनों गुण अपनी तरफसे किसीको भी नहीं बाँधते, प्रत्युत यह पुरुष ही इन गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर बाँध जाता है। तात्पर्य है कि गुणोंके कार्य पदार्थ, धन, परिवार, शरीर, स्वभाव, वृत्तियाँ, परिस्थितियाँ, क्रियाएँ आदिको अपना मान लेनेसे यह जीव स्वयं अविनाशी होता हुआ भी बाँध जाता है, विनाशी पदार्थ, धन आदिके वशमें हो जाता है; सर्वथा स्वतन्त्र होता हुआ भी पराधीन हो जाता है। जैसे, मनुष्य जिस धनको अपना मानता है, उस धनके घटने-बढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है; जिन व्यक्तियोंको अपना मानता है, उनके जन्मने-मरनेसे स्वयंपर असर पड़ता है; जिस शरीरको अपना मानता है, उसके घटने-बढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है। यही गुणोंका अविनाशी देहीको बाँधना है।

यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि यह देही स्वयं अविनाशीरूपसे ज्यों-का-त्यों रहता हुआ भी गुणोंके, गुणोंकी वृत्तियोंके अधीन होकर स्वयं सात्त्विक, राजस और तामस बन जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—

ईश्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी ॥ (मानस ७।११७।१)

जीवका यह अविनाशी स्वरूप वास्तवमें कभी भी गुणोंसे नहीं बाँधता; परन्तु जब वह विनाशी देहको ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिये’ मान लेता है, तब वह अपनी मान्यताके कारण गुणोंसे बाँध जाता है और उसको

परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें कठिनता प्रतीत होती है (गीता—बारहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। देहाभिमानके कारण गुणोंके द्वारा देहमें बाँध जानेसे वह तीनों गुणोंसे परे अपने अविनाशी स्वरूपको नहीं जान सकता। गुणोंसे देहमें बाँध जानेपर भी जीवका जो वास्तविक अविनाशी स्वरूप है, वह ज्यों-का-त्यों ही रहता है, जिसका लक्ष्य भगवान्ने यहाँ ‘अव्ययम्’ पदसे कराया है।

यहाँ ‘देहिनम्’ पदका तात्पर्य है कि देहमें तादात्म्य, ममता और कामना होनेसे ही तीनों गुण इस पुरुषको देहमें बाँधते हैं। यदि देहमें तादात्म्य, ममता और कामना न हो, तो फिर यह परमात्मस्वरूप ही है।

विशेष बात

शरीरके साथ जीव दो तरहसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है—(१) अभेदभावसे —अपनेको शरीरमें बैठाना, जिससे ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा दीखने लगता है, और (२) भेदभावसे —शरीरको अपनेमें बैठाना, जिससे ‘शरीर मेरा है’ ऐसा दीखने लगता है। अभेदभावसे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव अपनेको शरीर मान लेता है, जिसको ‘अहंता’ कहते हैं; और भेदभावसे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव शरीरको अपना मान लेता है, जिसको ‘ममता’ कहते हैं। इस प्रकार शरीरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेपर सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण अपनी वृत्तियोंके द्वारा शरीरमें अहंता-ममता दृढ़ करके जीवको बाँध देते हैं।

जैसे विवाह हो जानेपर पत्नीके पूरे परिवार-(ससुराल-) के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है, पत्नीके वस्त्राभूषण आदिकी आवश्यकता अपनी आवश्यकता प्रतीत होने लगती है, ऐसे ही शरीरके साथ मैं-मेरेका सम्बन्ध हो जानेपर जीवका पूरे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और शरीर-निर्वाहकी वस्तुओंको वह अपनी आवश्यकता मानने लग जाता है। अनित्य शरीरसे सम्बन्ध (एकात्मता) माननेके कारण वह अनित्य शरीरको नित्य रखनेकी इच्छा करने लगता है; क्योंकि वह स्वयं नित्य है। शरीरके साथ सम्बन्ध माननेके कारण ही उसको मरनेका भय लगने लगता है; क्योंकि शरीर मरनेवाला है। यदि शरीरसे सम्बन्ध न रहे, तो

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२१

फिर न तो नित्य बने रहनेकी इच्छा होगी और न मरनेका भय ही होगा। अतः जबतक नित्य बने रहनेकी इच्छा और मरनेका भय है, तबतक वह गुणोंसे बँधा हुआ है।

जीव स्वयं अविनाशी है और शरीर विनाशी है। शरीरका प्रतिक्षण अपने-आप वियोग हो रहा है। जिसका अपने-

परिशिष्ट भाव —प्रकृतिसे पैदा होनेके कारण सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति-विभागमें ही हैं। परन्तु प्रकृतिके कार्य शरीरसे अपना सम्बन्ध ('मैं' और 'मेरा') मान लेनेके कारण ये गुण अविनाशी चेतनको नाशवान् जड़ शरीरमें बाँध देते हैं अर्थात् 'मैं शरीर हूँ और शरीर मेरा है'—ऐसा देहाभिमान पैदा कर देते हैं। तात्पर्य है कि सभी विकार प्रकृतिके सम्बन्धसे पैदा होते हैं। सत्तामात्र स्वरूपमें कोई भी विकार नहीं है—'असंगो ह्ययं पुरुषः' (बृहदारण्यक ४।३।१५), 'देहेऽस्मिन्पुरुषः परः' (गीता १३।२२)। विकारोंके कारण ही जन्म-मरण होता है।

वास्तवमें गुण जीवको नहीं बाँधते, प्रत्युत जीव ही उनका संग करके बँध जाता है (इसी अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। अगर गुण बाँधनेवाले होते तो गुणोंके रहते हुए कोई उनसे छूट सकता ही नहीं, जीवन्मुक्त हो सकता ही नहीं!

सम्बन्ध —पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके द्वारा देहीके बाँधे जानेकी बात कही। उन तीनों गुणोंमेंसे सत्त्वगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।

सुखसङ्घेन बध्नाति ज्ञानसङ्घेन चानघ ॥ ६ ॥

अनघ= हे पापरहित अर्जुन!होनेके कारणआसक्तिसे
तत्र= उन गुणोंमेंप्रकाशकम्= प्रकाशक (और)
सत्त्वम्= सत्त्वगुणअनामयम्= निर्विकार है।
निर्मलत्वात्= निर्मल (स्वच्छ)सुखसङ्घेन= (वह) सुखकी
बध्नाति
= (देहीको) बाँधता है।

व्याख्या —'तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्'—पूर्वश्लोकमें सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंकी बात कही। इन तीनों गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (मलरहित) है। तात्पर्य है कि रजोगुण और तमोगुणकी तरह सत्त्वगुणमें मलिनता नहीं है, प्रत्युत यह रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा निर्मल, स्वच्छ है। निर्मल होनेके कारण यह परमात्मतत्त्वका ज्ञान करानेमें सहायक है।

'प्रकाशकम्'—सत्त्वगुण निर्मल, स्वच्छ होनेके कारण प्रकाश करनेवाला है। जैसे प्रकाशके अन्तर्गत वस्तुएँ साफ-साफ दीखती हैं, ऐसे ही सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे रजोगुण और तमोगुणकी वृत्तियाँ साफ-साफ दीखती हैं। रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्स्य आदि दोष भी साफ-साफ दीखते हैं अर्थात् इन सब विकारोंका साफ-साफ ज्ञान होता है।

आप वियोग हो रहा है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें क्या कठिनता और क्या उद्योग? उद्योग है तो केवल इतना ही है कि स्वतः विमुक्त होनेवाली वस्तुको पकड़ना नहीं है। उसको न पकड़नेसे अपने अविनाशी, गुणातीत स्वरूपका अपने आप अनुभव हो जायगा।

सत्त्वगुणकी बुद्धि होनेपर इन्द्रियोंमें प्रकाश, चेतना और हलकापन विशेषतासे प्रतीत होता है, जिससे प्रत्येक पारमार्थिक अथवा लौकिक विषयको अच्छी तरह समझनेमें बुद्धि पूरी तरह कार्य करती है और कार्य करनेमें बड़ा उत्साह रहता है।

सत्त्वगुणके दो रूप हैं—(१) शुद्ध सत्त्व, जिसमें उद्देश्य परमात्माका होता है, और (२) मलिन सत्त्व, जिसमें उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रहका होता है*।

शुद्ध सत्त्वगुणमें परमात्माका उद्देश्य होनेसे परमात्माकी तरफ चलनेमें स्वाभाविक रुचि होती है। मलिन सत्त्वगुणमें पदार्थोंके संग्रह और सुखभोगका उद्देश्य होनेसे सांसारिक प्रवृत्तियोंमें रुचि होती है, जिससे मनुष्य बँध जाता है।

मलिन सत्त्वगुणमें भी बुद्धि सांसारिक विषयको अच्छी

  • परमात्माका उद्देश्य न रहनेके कारण इसको 'मलिन सत्त्व' कहा गया है। मलिन सत्त्वमें रजोगुण साथ रहता है।

१२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

तरह समझनेमें समर्थ होती है। जैसे, सत्त्वगुणकी वृद्धिमें ही वैज्ञानिक नये-नये आविष्कार करता है; किन्तु उसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्ति न होनेसे वह अहंकार, मान-बड़ाई, धन आदिसे संसारमें बँधा रहता है।

‘अनामयम्’—सत्त्वगुण रज और तमकी अपेक्षा विकाररहित है। वास्तवमें प्रकृतिका कार्य होनेसे यह सर्वथा निर्विकार नहीं है। सर्वथा निर्विकार तो अपना स्वरूप अथवा परमात्मत्व ही है, जो कि गुणातीत है। परमात्मत्वकी प्राप्तिमें सहायक होनेसे भगवान्ने सत्त्वगुणको भी विकाररहित कह दिया है।

‘सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ’—जब अन्तःकरणमें सात्त्विक वृत्ति होती है, कोई विकार नहीं होता है, तब एक सुख मिलता है, शान्ति मिलती है। उस समय साधकके मनमें यह विचार आता है कि ऐसा सुख हरदम बना रहे, ऐसी शान्ति हरदम बनी रहे, ऐसी निर्विकारता हरदम बनी रहे। परन्तु जब ऐसा सुख, शान्ति, निर्विकारता नहीं रहती, तब साधकको अच्छा नहीं लगता। यह अच्छा लगना और अच्छा न लगना ही सत्त्वगुणके सुखमें आसक्ति है, जो बाँधनेवाली है।

जब सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंका, इनकी वृत्तियोंका, विकारोंका साफ-साफ ज्ञान होता है और साधकको ऐसी बहुत-सी आश्चर्यजनक बातोंकी जानकारी होती है, जो पहले कभी जानी हुई नहीं होती, तब साधकके मनमें आता है कि यह ज्ञान हरदम बना रहे। यह ज्ञानमें आसक्ति है, जो बाँधनेवाली है। ‘मैं दूसरोंकी अपेक्षा अधिक (विशेष) जानता हूँ’—यह अभिमान भी बाँधनेवाला होता है।

परिशिष्ट भाव — यहाँ भगवान्ने सत्त्वगुणको अनामय (निर्विकार) बताया है—यह सत्त्वगुणकी विलक्षणता है। कारण कि सत्त्वगुण गुणातीत होनेके बहुत नजदीक है। यद्यपि सत्त्वगुण निर्विकार है, पर संगके कारण वह विकारी हो जाता है—‘सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ’; क्योंकि संग रजोगुणका स्वरूप है—‘रजो रागात्मकं विद्धि’ (गीता १४।७)। सुख और ज्ञान बाधक नहीं हैं, प्रत्युत उनका संग बाधक है। संग है—उनको अपना मान लेना। वास्तवमें सत्त्वगुण अपना है ही नहीं, वह तो प्रकृतिका है।

मनुष्यमें रजोगुणकी मुख्यता रहती है—‘रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते’ (१४।१५), ‘मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः’ (१४।१८)। अतः जबतक संग रहता है, तबतक मुक्ति नहीं होती; क्योंकि स्वरूप असंग है।

भगवान्ने सत्त्वगुणको भी अनामय कहा है और परमपदको भी अनामय कहा है—‘पदं गच्छन्त्यानामयम्’ (२।५१)। इससे यह समझना चाहिये कि सत्त्वगुण तो सापेक्ष अनामय है और परमपद निरपेक्ष अनामय है।

तीनों गुण प्रकृतिजन्य होते हुए भी रजोगुण तृष्णा तथा आसक्तिसे पैदा होनेवाला और तमोगुण अज्ञानसे पैदा होनेवाला है (इसी अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक); परन्तु सत्त्वगुण केवल प्रकृतिजन्य है। तात्पर्य है कि सत्त्वगुण प्रकृतिजन्य तो है, पर किसी विकारसे जन्य नहीं है। इसलिये इसको ‘अनामय’ कहा गया है।

सात्त्विक सुख और सात्त्विक ज्ञान भी स्वयंके नहीं हैं, प्रत्युत प्रकृतिजन्य होनेसे ‘पर’ के हैं अर्थात् पराधीन-

इस तरह सत्त्वगुण सुख और ज्ञानके संग- (आसक्ति-) से साधकको बाँध देता है अर्थात् उसको गुणातीत नहीं होने देता। यह संग ही रजोगुण है, जो बाँधनेवाला है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

यदि साधक सुख और ज्ञानका संग न करे तो सत्त्वगुण उसको बाँधता नहीं, प्रत्युत उसको गुणातीत कर देता है। तात्पर्य है कि यदि संग न हो तो साधक सत्त्वगुणसे भी ऊँचा उठ जाता है और अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेता है।

सत्त्वगुणसे सुख और ज्ञान होनेपर साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि यह सुख और ज्ञान मेरा लक्ष्य नहीं है। ये मेरे भोग्य नहीं हैं। ये तो लक्ष्यकी प्राप्तिमें कारण हैं। मेरेको तो उस लक्ष्यको प्राप्त करना है, जो इस सुख और ज्ञानको भी प्रकाशित करनेवाला है।

सुख, ज्ञान आदि सभी सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ हैं। ये कभी घटती हैं, कभी बढ़ती हैं; कभी आती हैं, कभी जाती हैं। परन्तु अपना स्वरूप निरन्तर एकरस रहता है। उसमें कभी घट-बढ़ नहीं होती। अतः साधकको सत्त्वगुणकी वृत्तियोंसे सदा तटस्थ, उदासीन रहना चाहिये। उनका उपभोग नहीं करना चाहिये। इससे वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिमें फँसेगा नहीं।

अगर साधक सत्त्वगुणसे होनेवाले सुख और ज्ञानका संग न करे, तो उसको शीघ्र ही परमात्मप्राप्ति हो जाती है। परन्तु अगर वह इनके संगका त्याग न करे तो (परमात्मप्राप्तिका लक्ष्य होनेसे) समय पाकर उसकी इस सुख और ज्ञानसे स्वतः अरुचि हो जाती है और वह परमात्मप्राप्ति कर लेता है।

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२३

हैं। इनमें पराधीनताका सुख है, अपने स्वरूपका सुख नहीं है।

सात्त्विक ज्ञान और तत्त्वज्ञानमें अन्तर —सात्त्विक ज्ञानमें तो ‘मैं ज्ञानी हूँ’ यह संग है, पर तत्त्वज्ञान सर्वथा असंग है अर्थात् तत्त्वज्ञान होनेपर ज्ञान रहता है, पर ‘मैं ज्ञानी हूँ’—यह (ज्ञानी) नहीं रहता। सात्त्विक ज्ञानमें द्रष्टा रहता है और अपनेमें विशेषताका भान होता है; परन्तु तत्त्वज्ञानमें कोई द्रष्टा नहीं रहता और अपनेमें कोई कमी भी नहीं रहती तथा विशेषताका भान भी नहीं होता; क्योंकि व्यक्तित्व नहीं रहता। अपनेमें विशेषताका अनुभव होना ही संग है। विशेषताका अनुभव ‘मैं ज्ञानी हूँ’—ऐसा स्वीकार करनेसे होता है। तत्त्वज्ञान होनेपर निजानन्दका अनुभव होता है। तेरहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें सात्त्विक ज्ञानका और अष्टाईसवें श्लोकमें तत्त्वज्ञानका वर्णन हुआ है।

सम्बन्ध—रजोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥७॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!रजः= रजोगुणको (तुम)कर्मसङ्गेन= कर्मोंकी आसक्तिसे
तृष्णासङ्गसमुद्भवम्= तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवालेरागात्मकम्= रागस्वरूपदेहिनम्= देही (जीवात्मा)–को
विद्धि= समझो।
तत्= वहनिबध्नाति= बाँधता है।

व्याख्या —‘रजो रागात्मकं विद्धि’—यह रजोगुण रागस्वरूप है अर्थात् किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, क्रिया आदिमें जो प्रियता पैदा होती है, वह प्रियता रजोगुणका स्वरूप है।

‘रागात्मकम्’ कहनेका तात्पर्य है कि जैसे स्वर्णके आभूषण स्वर्णमय होते हैं, ऐसे ही रजोगुण रागमय है। पातंजलयोगदर्शनमें ‘क्रिया’ को रजोगुणका स्वरूप कहा गया है। परन्तु श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् (क्रियामात्रको गौणरूपसे रजोगुण मानते हुए भी) मुख्यतः रागको ही रजोगुणका स्वरूप मानते हैं। इसीलिये ‘योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गेन त्यक्त्वा’ (२।४८) पदोंमें आसक्तिका

त्याग करके कर्तव्यकर्मोंको करनेकी आज्ञा दी गयी है। निष्कामभावसे किये गये कर्म मुक्त करनेवाले होते हैं (तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। इसी अध्यायके बाईसवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं कि ‘प्रवृत्ति’ अर्थात् क्रिया करनेका भाव उत्पन्न होनेपर भी गुणातीत पुरुषका उसमें राग नहीं होता। तात्पर्य यह हुआ कि गुणातीत पुरुषमें भी रजोगुणके प्रभावसे प्रवृत्ति तो होती है, पर वह रागपूर्वक नहीं होती। गुणातीत होनेमें सहायक होनेपर भी सत्त्वगुणको सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे बाँधनेवाला कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि आसक्ति ही बन्धनकारक है, सत्त्वगुण स्वयं नहीं। अतः भगवान् यहाँ रागको ही

१-प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्। (योगदर्शन २।१८) २-श्रीमद्भगवद्गीताकी एक बहुत बड़ी विलक्षणता यह है कि वह किसी मतका खण्डन किये बिना ही उस विषयमें अपनी मान्यता प्रकट कर देती है। गीतामें भगवान्ने क्रियाको भी रजोगुण माना है—‘लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्माणाम्’ (१४।१२), और क्रियाको सात्त्विक भी बताया है (अठारहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। इसलिये दोष क्रियाओंमें नहीं है, प्रत्युत राग या आसक्तिमें है। रागपूर्वक किये हुए कर्म ही बाँधते हैं। तात्पर्य है कि मनुष्य कर्मोंकी आसक्ति और फलेच्छासे ही बँधता है, कर्मोंको करनेमात्रसे नहीं। राग न रहनेपर सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी मनुष्य नहीं बँधता (चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। अगर क्रियामात्र ही बन्धनकारक होती तो जीवन्मुक्त महापुरुषोंको भी बाँध देती; क्योंकि क्रियाएँ तो उनके द्वारा भी होती ही हैं (चौदहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। भगवान्के द्वारा सृष्टिकी रचना करना भी ‘कर्म’ है तथा अवतार लेकर वे भी क्रियाएँ (लीलाएँ) करते हैं, पर कर्मोंमें आसक्ति न रहनेसे उनको कर्म बाँधते नहीं (नवें अध्यायका नवाँ श्लोक)। अठारहवें अध्यायके तेईसवें, चौबीसवें और पचीसवें श्लोकमें भगवान्ने सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके कर्मोंका वर्णन किया है। अगर मात्र कर्म रजोगुण ही होते, तो फिर उनके सात्त्विक और तामस भेद कैसे होते? इससे सिद्ध होता है कि गीता मुख्यतः रागको ही रजोगुण कहती है।

१२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १४ ]

रजोगुणका मुख्य स्वरूप जाननेके लिये कह रहे हैं।

महासर्गके आदिमें परमात्माका 'बहु स्यां प्रजायेय'—यह संकल्प होता है। यह संकल्प रजोगुणी है। इसको गीताने 'कर्म' नामसे कहा है (आठवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। जिस प्रकार दहीको बिलोनेसे मक्खन और छाछ अलग-अलग हो जाते हैं, ऐसे ही सृष्टिरचनाके इस रजोगुणी संकल्पसे प्रकृतिमें श्लेष पैदा होता है, जिससे सत्त्वगुणरूपी मक्खन और तमोगुणरूपी छाछ अलग-अलग हो जाती है। सत्त्वगुणसे अन्तःकरण और ज्ञानेन्द्रियाँ, रजोगुणसे प्राण और कर्मेन्द्रियाँ तथा तमोगुणसे स्थूल पदार्थ, शरीर आदिका निर्माण होता है। तीनों गुणोंसे संसारके अन्य पदार्थोंकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार महासर्गके आदिमें भगवान्का सृष्टिरचनारूप कर्म भी सर्वथा रागरहित होता है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।

'तृष्णासंगसमुद्भवम्'—प्राप्त वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदि बने रहें तथा वे और भी मिलते रहें—ऐसी 'जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई' की तरह तृष्णा पैदा हो जाती है। इस तृष्णासे फिर वस्तु आदिमें आसक्ति पैदा हो जाती है।

व्याकरणके अनुसार इस 'तृष्णासंगसमुद्भवम्' पदके दो अर्थ होते हैं—(१) जिससे तृष्णा और आसक्ति पैदा होती है* अर्थात् तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाला और (२) जो तृष्णा और आसक्तिसे पैदा होता है अर्थात् तृष्णा और आसक्तिसे पैदा होनेवाला। जैसे बीज और वृक्ष अन्योन्य कारण हैं, अर्थात् बीजसे वृक्ष पैदा होता है और वृक्षसे फिर बहुत-से बीज पैदा हो जाते हैं, ऐसे ही रागस्वरूप रजोगुणसे तृष्णा और आसक्ति बढ़ती है तथा तृष्णा और आसक्तिसे रजोगुण बहुत बढ़ जाता है। तात्पर्य है कि ये दोनों ही एक-दूसरेको पुष्ट करनेवाले हैं। अतः उपर्युक्त दोनों ही अर्थ ठीक हैं।

'तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिन्म्'—रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है अर्थात् रजोगुणके बढ़नेपर ज्यों-ज्यों तृष्णा और आसक्ति बढ़ती है, त्यों-ही-त्यों मनुष्यकी कर्म करनेकी प्रवृत्ति बढ़ती है। कर्म करनेकी प्रवृत्ति बढ़नेसे मनुष्य नये-नये कर्म करना शुरू कर देता है। फिर वह रात-दिन इस प्रवृत्तिमें ही फँसा रहता है अर्थात् मनुष्यकी मनोवृत्तियाँ रात-दिन नये-नये कर्म आरम्भ करनेके चिन्तनमें लगी रहती हैं। ऐसी अवस्थामें

उसको अपना कल्याण, उद्धार करनेका अवसर ही प्राप्त नहीं होता। इस तरह रजोगुण कर्मोंकी सुखासक्तिसे शरीरधारीको बाँध देता है अर्थात् जन्म-मरणमें ले जाता है। अतः साधकको प्राप्त परिस्थितिके अनुसार निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्म तो कर देना चाहिये, पर संग्रह और सुखभोगके लिये नये-नये कर्मोंका आरम्भ नहीं करना चाहिये।

'देहिन्म्' पदका तात्पर्य है कि देहसे अपना सम्बन्ध माननेवाले देहीको ही यह रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे बाँधता है।

सकामभावसे कर्मोंको करनेमें भी एक सुख होता है और 'कर्मोंका अमुक फल भोगेंगे' इस फलासक्तिमें भी एक सुख होता है। इस कर्म और फलकी सुखासक्तिसे मनुष्य बाँध जाता है।

कर्मोंकी सुखासक्तिसे छूटनेके लिये साधक यह विचार करे कि ये पदार्थ, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदि कितने दिन हमारे साथ रहेंगे। कारण कि सब दृश्य प्रतिक्षण अदृश्यतामें जा रहा है; जीवन प्रतिक्षण मृत्युमें जा रहा है; सर्ग प्रतिक्षण प्रलयमें जा रहा है; महासर्ग प्रतिक्षण महाप्रलयमें जा रहा है। आज दिनतक जो बाल्य, युवा आदि अवस्थाएँ चली गयीं, वे फिर नहीं मिल सकतीं। जो समय चला गया, वह फिर नहीं मिल सकता। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं और धनियोंकी अन्तिम दशाको याद करनेसे तथा बड़े-बड़े राजमहलों और मकानोंके खण्डहरोंको देखनेसे साधकको यह विचार आना चाहिये कि उनकी जो दशा हुई है, वही दशा इस शरीर, धन-सम्पत्ति, मकान आदिकी भी होगी। परन्तु मैंने इनके प्रलोभनमें पड़कर अपनी शक्ति, बुद्धि, समयको बरबाद कर दिया है। यह तो बड़ी भारी हानि हो गयी! ऐसे विचारोंसे साधकके अन्तःकरणमें सात्त्विक वृत्तियाँ आयेंगी और वह कर्मसंगसे ऊँचा उठ जायगा।

अगर मैं रात-दिन नये-नये कर्मोंके करनेमें ही लगा रहूँगा, तो मेरा मनुष्यजन्म निरर्थक चला जायगा और उन कर्मोंकी आसक्तिसे मेरेको न जाने किन-किन योनियोंमें जाना पड़ेगा और कितनी बार जन्मना-मरना पड़ेगा! इसलिये मुझे संग्रह और सुख-भोगके लिये नये-नये कर्मोंका आरम्भ नहीं करना है, प्रत्युत प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अनासक्तभावसे कर्तव्य-कर्म करना है! ऐसे विचारोंसे भी साधक कर्मोंकी आसक्तिसे ऊँचा उठ जाता है।

१-तृष्णायाः संगस्य च समुद्भवो यस्मात्।

२-तृष्णायाः संगच्च समुद्भवो यस्य।