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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः. जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः.. (५) सोमरस बुद्धिदायी, स्वर्गलोक को प्रकाशित करने वाला, पृथ्वी को पुष्ट करने वाला व आनंददायी है. वह अग्नि, इंद्र और विष्णु को आनंद देने वाला है. इसे पात्र में तैयार किया जाता है. (५) अभि त्रिपृष्ठं वृषणं वयोधामङ्गोषणमवावशन्त वाणीः. वना वसानो वरुणो न सिन्धुर्वि रत्नधा दयते वार्याणि.. (६) सोम तीन स्थानों— अंतरिक्ष, वनस्पति और शरीर में वास करने वाले हैं. वे शक्तिमान और अन्नदाता हैं. उपासक ऊंची वाणी से उन की स्तुति करते हैं. जल के देवता वरुण की तरह जल में मिलने वाले सोम उपासकों को धन देते हैं. (६) अक्रांत्समुद्रः प्रथमे विधर्मन् जनयन् प्रजा भुवनस्य गोपाः. वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः.. (७) सोम जलमय हैं. वे यज्ञ के रक्षक, इच्छा पूरक और शक्तिवर्धक हैं. वे यजमानों को सब से ज्यादा उत्साह और उन्नति देने वाले हैं. (७) कनिक्रन्ति हरिरा सृज्यमानः सीदन्वनस्य जठरे पुनानः. नृभिर्यतः कृणुते निर्णिजं गामतो मतिं जनयत स्वधाभिः.. (८) यजमान सब ओर से दबा व कूट कर सोमरस निकालते हैं. वह हरा व पवित्र है. वह लकड़ी के बरतन में गिरता हुआ बारबार आवाज करता है. उसे गाय के दूध में मिलाया जाता है. इस से हवि बनाई जाती है. यजमान इस की स्तुति करते हैं. (८) एष स्य ते मधुमाँ इन्द्र सोमो वृषा वृष्णः परि पवित्रे अक्षाः. सहस्रदाः शतदा भूरिदावा शश्वत्तमं बर्हिरा वाज्यस्थात्.. (९) हे इंद्र! आप का प्रिय सोमरस इच्छा पूरी करता है. आप के लिए यह मधुर शक्तिदायी सोमरस छन रहा है. यह सैकड़ों, हजारों प्रकार का धन देने वाला है. सोम प्राचीन काल से ही यज्ञ में जा कर विराजते हैं. (९) पवस्व सोम मधुमाँ ऋतावापो वसानो अधि सानो अव्ये. अव द्रोणानि घृतवन्ति रोह मदिन्तमो मत्सर इन्द्रपानः.. (१०) हे सोम! आप मधुर, जल में मिलने वाले व ऊंचे स्थान पर विराजते हैं. आप छन कर पवित्र होते हैं. आप आनंददायी व इंद्र के लिए जल में मिल कर तैयार होते हैं. (१०) सातवां खंड ebook converter DEMO Watermarks*

प्र सेनानीः शूरो अग्रे रथानां गव्यन्नेति हर्षते अस्य सेना. भद्रान् कृण्वन्निन्द्रहवांत्सखिभ्य आ सोमो वस्त्रा रभसानि दत्ते.. (१) हे सोम! आप सेनानायक व वीर हैं. आप यजमान के लिए गौ आदि धनों को देने की इच्छा रखते हैं. आप रथ के आगेआगे चलते हैं. आप को देख कर सेना का हौसला बढ़ता है. आप मित्रों और यजमानों के लिए इंद्र की प्रार्थनाओं को कल्याणकारी बनाते हैं. आप तेजस्वी हैं. (१) प्र ते धारा मधुमतीरसृग्रन्वारं यत्पूतो अत्येष्यव्यम्. पवमान पवसे धाम गोनां जनयंत्सूर्यमपिन्वो अर्कैः.. (२) हे सोम! जब आप भेड़ों की ऊन को पार कर के छनते हुए कलश में जाते हैं तब आप की धाराएं आनंद बरसाती हैं. पवित्र हो कर आप तेजस्वी सूर्य देव की तरह चमकने लगते हैं. (२) प्र गायताभ्यर्चाम देवान्त्सोम ॐ हिनोत महते धनाय. स्वादुः पवतामति वारमव्यमा सीदतु कलशं देव इन्दुः.. (३) हे यजमानो! हम सोम व अन्य देवताओं की स्तुति करें. हम बहुत धन पाने की इच्छा से अपनी स्तुतियों से सोम को प्रेरित करें. भेड़ के बालों से बनी छलनी से इस सोमरस को छानें. वह घड़ों में भरा रहे. (३) प्र हिन्वानो जनिता रोदस्यो रथो न वाज ॐ सनिषन्न्यासीत्. इन्द्रं गच्छन्नायुधा स ॐ शिशाणो विश्वा वसु हस्तयोराधधानः.. (४) सोम स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को उत्पन्न करने वाले हैं. वे दोनों लोकों को गति देने वाले हैं. वे तेजी से इंद्र के पास जाते हैं. वे यजमानों को बहुत वैभव देने के लिए आते हैं. (४) तक्षद्यदी मनसो वेनतो वाग् ज्येष्ठस्य धर्मं द्युक्षोरनीके. आदीमायन्वरमा वावशाना जुष्टं पतिं कलशे गाव इन्दुम्.. (५) स्तुति उन्नति की भावना लिए व विचारों से प्रेरित होती है. उपासकों की स्तुतियां यज्ञों में देवताओं का गुणगान करती हैं. इस प्रकार तैयार कर के सोमरस में गायों का दूध मिलाया जाता है. यह सोमरस सब के लिए बहुत पौष्टिक होता है. (५) साकमुक्षो मर्ज्यन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः. हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी.. (६) कर्मठ (काम करने वाली) अंगुलियां सोमरस को तैयार व उस को शुद्ध करती हैं. दसों अंगुलियां बलशाली सोम को धारण करती हैं. हरा सोमरस उसी तरह सभी दिशाओं में जाता है, जैसे गतिशील घोड़ा. वह घड़े में भरा रहता है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

अधि यदस्मिन्वाजिनीव शुभः स्पर्धन्ते धियः सूरे न विशः. अपो वृणानः पवते कवीयान्व्रजं न पशुवर्धनाय मन्म.. (७) सोम को अपने किरण रूपी आभूषणों से सूर्य उसी तरह सजाते हैं, जिस तरह आभूषणों से घोड़े को सजाया जाता है. उसे निकालने में अंगुलियां एकदूसरे से होड़ करती हैं. जैसे ग्वाला गायों को पोसने के लिए गोशाला में ले जाता है, वैसे ही सोमरस को यजमान मटकों में ले जाते हैं. (७) इन्दुर्वाद्वी पवते गोन्योघा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय. हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिं वरिवस्कृण्वन्वृजनस्य राजा.. (८) सोमरस इंद्र का बल बढ़ाने वाला, यजमानों को धन देने वाला व शक्ति में राजा है. ज्यादा आनंद के लिए इसे छाना जाता है. यह दुष्टों का दलन करता है. यह राक्षसों और शत्रुओं का नाश करने वाला है. (८) अया पवा पवस्वैना वसूनि माँ श्रुत्व इन्दो सरसि प्र धन्व. ब्रध्नश्चिद्यस्य वातो न जूतिं पुरुमेधाश्चित्तकवे नरं धात्.. (९) हे सोम! आप की धाराएं पवित्र हैं. आप हमें धन प्रदान करने की कृपा करें. जिस प्रकार सूर्य सृष्टि के मूलाधार हैं, वे वायु को बहाते हैं वैसे ही आप वसतीवरी नामक घड़े में बहिए. बुद्धिशाली इंद्र आप को प्राप्त करें और हम अच्छी संतान प्राप्त करें. (९) महत्तत्सोमो महिषश्चकारापां यद्गर्भो ऽ वृणीत देवान्. अदधादिन्द्रे पवमान ओजो ऽ जनयत्सूर्ये ज्योतिरिन्दुः.. (१०) सोम महान हैं. वे महान कार्य करने वाले हैं. वे गर्भ में जल धारण करते हैं. वे देवताओं को पालते हैं. वे इंद्र को बलशाली और सूर्य को तेजस्वी बनाते हैं. (१०) असर्जि वक्वा रथ्ये यथाजौ धिया मनोता प्रथमा मनीषा. दश स्वसारो अधि सानो अव्ये मृजन्ति वह्नि ॐ सदनेष्वच्छ.. (११) जिस प्रकार युद्धों में घोड़े भेजे जाते हैं, वैसे ही सोमरस में जल भेजा (मिलाया) जाता है. दसों अंगुलियां सोम को भेड़ के बालों से बनी छलनी में छानती हैं. यह सोम सभी को श्रेष्ठ धन प्रदान कराता है. (११) अपामिवे दूर्म यस्तर्तुराणाः प्र मनीषा ईरते सोममच्छ. नमस्यन्तीरुप च यन्ति सं चाच विशन्त्युशतीरुशन्तम्.. (१२) तेजी से उठने वाली लहरों की तरह यजमान की स्तुतियां उठती हैं. यजमान जल्दी से जल्दी अपनी स्तुति देवता के पास पहुंचाना चाहते हैं. स्तुतियां देवता की प्रशंसा करती हैं, उन के पास पहुंचती हैं और उन्हीं में एकमेक हो जाती हैं. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

आठवां खंड पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे. अप श्वानं श्रथिष्टन सस्नखायो दीर्घजिह्वयम्.. (१) हे यजमानो! आप के आगे आनंददायी सोमरस रखा हुआ है. लंबीलंबी जीभ वाले कुत्ते इस के पास जाना चाहते हैं. आप उन कुत्तों को दूर भगाओ. (१) अयं पूषा रयिर्भर्गः सोमः पुनानो अर्षति. पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे.. (२) सोमरस पोषक, पीने योग्य व शोभादायी है. वह छन कर बरतन में गिरता है. वह सभी प्राणियों का पालनहार है. वह स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक दोनों को अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है. (२) सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः. पवित्रवन्तो अक्षरन् देवान् गच्छन्तु वो मदाः.. (३) इंद्र के लिए मीठा और मादक सोमरस तैयार किया जाता है. हे सोम! आप का यह आनंददायी रस देवताओं तक अवश्य पहुंचे. (३) सोमाः पवन्त इन्दवो ऽ स्मभ्यं गातुवित्तमाः. मित्राः स्वाना अरेपसः स्वाध्यः स्वर्विदः.. (४) सोम सभी रास्तों को भलीभांति जानने वाले हैं. वे मित्रों के समान हैं. सोम आत्मज्ञाता, मन को पाप रहित करने वाले व उस को एकाग्र करने वाले हैं. उस को हमारे लिए छाना जाता है. (४) अभी नो वाजसातम रयिमर्ष शतस्पृहम्. इन्दो सहस्रभर्णसं तुविद्युम्नं विभासहम्.. (५) हे सोम! सैकड़ों लोग आप की प्रशंसा करते हैं. आप हजारों जीवों के पालनहार व बहुत अन्न, धन और प्रकाश वाले हैं. आप हमें बुद्धिशाली और बलशाली पुत्र प्रदान कीजिए. (५) अभी नवन्ते अद्रुहः प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्. वत्सं न पूर्व आयुनि जात रिहन्ति मातरः.. (६) गाएं जैसे बछड़ों को चाटती हैं, वैसे ही जल सोमरस में मिलते हैं. वे किसी प्रकार का विद्रोह नहीं करते. वे इंद्र को चाहने वाले सोमरस में मिल जाते हैं. (६) आ हर्यताय धृष्णवे धनुष्टन्वन्ति पौंस्यम्. ebook converter DEMO Watermarks*

शुक्रा वि यन्त्यसुराय निर्णिजे विपामग्रे महीयुवः.. (७) योद्धा जैसे धनुष पर डोरी चढ़ाते हैं, वैसे ही यजमान सोमरस को छानते हैं. सोम शत्रुओं को हराने वाले और पूजनीय हैं. गाय का दूध मिला कर सोमरस को और श्रेष्ठ बनाया जाता है. (७) परि त्य हर्यत हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण. यो देवान्विश्वाँ इत्परि मदेन सह गच्छति.. (८) सोमरस हराभरा और सुंदर है. उसे भेड़ के बालों से बनी छलनी से छाना जाता है. यह आनंददायी गुणों वाला है. यह अपने इन्हीं गुणों के साथ इंद्र और अन्य देवों के पास जाता है. (८) प्र सुन्वानायान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः. अप श्वानमराधस हता मखं न भृगवः.. (९) छाने जाने के समय सोम के वचन (ध्वनि को) विघ्न पैदा कर के संतोष पाने वाले लोग न सुनें. भृगु नामक ऋषि ने जैसे मख नामक राक्षस को यज्ञ स्थल से दूर हटा दिया था, वैसे ही यजमान यज्ञ स्थल के पास आने के इच्छुक कुत्तों को हटा दें. (९) नौवां खंड अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्वो अधि येषु वर्धते. आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विश्वञ्चमरुहद्विचक्षणः.. (१) हे सोम! आप दिव्य दृष्टि वाले हैं. सूर्य का रथ सब जगह जा सकता है. आप उस रथ पर विराजमान होते हैं और सारे संसार को देखते हैं. आप प्रिय जल में मिलते हैं एवं अन्नों को बढ़ाते हैं. आप व्यापक होते हुए बहते हैं. (१) अचोदसो नो धन्वन्तिन्दवः प्र स्वानासो बृहद्दवेषु हरयः. वि चिदश्राना इषयो अरातयो ऽ र्यो नः सन्तु सनिषन्तु नो धियः.. (२) हे सोम! आप दूसरों से प्रेरित नहीं होते. आप का रस हरा है. आप को विधिवत निचोड़ा जाता है. आप हमारे यज्ञ में पधारिए. आप यज्ञ और यजमान के दुश्मन तथा दान न देने वाले लोगों को अन्न की इच्छा होने पर भी अन्न, धन मत दीजिए. हमारी प्रार्थनाएं जिनजिन देवताओं के लिए हैं, वे उनउन देवताओं तक पहुंचें. (२) एष प्र कोशे मधुमाँ अचिक्रददिन्द्रस्य वज्रो वपुषो वपुष्टमः. अभ्यू ३ त्स्य सुदुघा घृतश्चुतो वाश्रा अर्षन्ति पयसा च धेनवः.. (३) हे सोम! आप का रस इंद्र के वज्र की भांति बहुत ही बलवान और मीठा है. यह रस ध्वनि करता हुआ द्रोणकलश में प्रवेश करे. सोमरस की धाराएं फलों को मधुर बनाने वाली, ebook converter DEMO Watermarks*

जल बरसाने वाली व दुधारू गायों के समान आवाज करने वाली हैं. (३) प्रो अयासीदिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतं २४ सखा सख्युर्न प्र मिनाति सङ्गिरम्. मर्य इव युवतिभिः समर्पति सोमः कलशे शतयामना पथा.. (४) यह सोमरस इंद्र के पेट में पहुंचता है. मित्र की तरह सोम इंद्र को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट नहीं देते. युवक जैसे युवतियों के साथ घुलमिल कर रहता है, वैसे ही सोमरस जल के साथ घुलमिल कर रहता है. वह छलनी के अनेक छेदों से छनछन कर मटके में जाता है. (४) धर्ता दिवः पवते कृत्व्यो रसो दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः. हरिः सृजानो अत्यो न सत्वभिर्वृथा पाजा २४ सि कृणुषे नदीष्वा.. (५) सोमरस सब को धारण कर सकता है. यह कर्म करने वाला और देवताओं की शक्ति बढ़ाने वाला है. यह छनछन कर घड़े में प्रवेश करता है. शक्तिशाली यजमान इस को निचोड़ते हैं. यह शक्तिशाली घोड़े की तरह वेग से नदियों के जल में स्वयं को मिला लेता है. (५) वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः. प्राणा सिन्धूनाँ कलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्द्याविशन्मनीषिभिः.. (६) सोम सब की इच्छा पूरी करने वाले, विशेष कृपा दृष्टि रखने वाले, उषा और सूर्य की शक्ति बढ़ाने वाले हैं. विद्वान् यजमान इसे छानते हैं. नदियों का जल मिला कर इसे तैयार किया गया है. इंद्र के पेट में पहुंचने के लिए यह शब्द करता हुआ घड़े में प्रवेश करता है. (६) त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुहिरे सत्यामाशिरं परमे व्योमनि. चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत.. (७) सोम श्रेष्ठ यज्ञ में निवास करने वाले हैं. इन के लिए इक्कीस गाएं नियमित रूप से शुद्ध दूध देती हैं. चारों लोकों के जल, शुद्ध दूध होने के लिए कल्याणकारी रूप से बहते हैं. (७) इन्द्राय सोम सुषुतः परि स्रवापामीवा भवतु रक्षसा सह. मा ते रसस्य मत्सत द्वयाविनो द्रविणस्वन्त इह सन्त्विन्दवः.. (८) हे सोम! भलीभांति आप का रस निकाला जाता है. आप को इंद्र के लिए तैयार किया गया है. रोग और राक्षस आप के पास न फटकें. जो पापी लोग झूठा और सच्चा दोनों तरह का व्यवहार करते हैं, उन पर आप की कृपा न हो. आप हमें इस यज्ञ में धन प्रदान कीजिए. (८) असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत्. पुनानो वारमत्येष्यव्ययं २४ श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदत्.. (९) सोमरस प्रकाशमान, शक्तिवर्द्धक और हरा है. वह राजा के समान सुंदर और देखने ebook converter DEMO Watermarks*

योग्य है. गाय का दूध मिलाने और छानने के समय यह आवाज करता है. भेड़ों के बालों से बनी छलनी से छान कर इसे साफ किया जाता है. यह जलमय है. श्येन पक्षी के समान यह घड़े में स्थित रहता है. (९) प्र देवमच्छा मधुमन्त इन्दवो ऽ सिष्यदन्त गाव आ न धेनवः. बर्हिषदो वचनावन्त ऊधभिः परिस्रुतमुसिया निर्णिजं धीरे.. (१०) सोमरस मीठा है. इसे देवताओं के लिए तैयार किया जाता है. दुधारू गाएं जैसे अपने बछड़ों के पास जाती हैं, वैसे ही सोमरस कलश में जाता है. यज्ञ मंडप में गाएं इंद्र के लिए अपने स्तनों से टपकने वाले दूध में सोमरस धारण करती हैं. (१०) अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतु ꣹ रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते. सिन्धोरुच्छवासे पतयन्तमुक्षणं ꣹ हिरण्यपावाः पशुमप्सु गृभ्णते.. (११) यजमान सोमरस में गाय के दूध को एकमेक कर के मिलाते हैं. देवतागण सोमरस का आनंद लेते हैं. यजमान इस सोमरस में गाय का घी और शहद मिलाते हैं. नदी के जल में रहने वाले सोम को सोने से शुद्ध कर के चमकाया जाता है. (११) पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः. अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इदृहन्तः सं तदाशत.. (१२) हे सोम! आप ज्ञान के स्वामी हैं. आप अपने पवित्र अंगों से सर्वव्यापक व सामर्थ्यवान हैं. आप पीने वाले को बल (स्फूर्ति) देते हैं. जिस ने तप, व्रत आदि से अपने को नहीं तपाया, उस पर आप कृपा नहीं करते. तपाने या परिपक्व होने के बाद ही उपासक यजमान पर आप की कृपा होती है. (१२) दसवां खंड इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः. श्रुष्टे जातास इन्दवः स्वर्विदः.. (१) सोमरस बहुत जल्दी तैयार किया गया है. यह ज्ञान की बढ़ोतरी करने वाला और हरा है. यह शीघ्र ही इच्छा पूर्ण करने वाले शक्तिमान इंद्र के पास पहुंचे. (१) प्र धन्वा सोम जागृविरिन्द्रायेन्दो परि स्रव. द्युमन्त ꣹ शुष्ममा भर स्वर्विदम्.. (२) हे सोम! आप उत्साह और फुर्ती देने वाले हैं. आप इंद्र के पीने के लिए इस कलश में प्रवेश कीजिए. आप हमें प्रकाशवान और ज्ञानवान बनाइए. (२) सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्र गायत. शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये.. (३) हे यजमानो! आप हमारे मित्र हैं. आप आइए व बैठिए. आप सोम को छानते समय की जाने वाली स्तुति गाइए. जैसे बच्चे को आभूषणों से सजाया जाता है, वैसे ही आप हवि और ebook converter DEMO Watermarks*

यज्ञ के अन्य साधनों से सोम को सजाइए. (३) तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत. शिशुं न हव्यैः स्वदयन्त गूर्तिभिः.. (४) हे मित्र यजमानो! आप प्रसन्नता बढ़ाने के लिए सोम की स्तुति कीजिए. आप छानते हुए सोम की स्तुति कीजिए. आप बालक को सजाने की तरह हवियों से इन्हें सजाइए. (४) प्राणा शिशुर्महीना २४ हिन्वन्मृतस्य दीधितिम्. विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता.. (५) सोम आदरणीय जल के पुत्र हैं. ये यज्ञ को प्रकाशित और परिपूर्ण करने वाले हैं. इन का रस सभी हवियों में रहता है. ये स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों में रहते हैं. (५) पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा. आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः.. (६) हे सोम! देवताओं के पीने के लिए आप जल्दी से धाराधार हो कर छनिए. आप मदकारी हैं. आप हमारे कलश में विराजिए. (६) सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति. अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत्.. (७) सोमरस पवित्र और छना हुआ है. छनने में आवाज करता हुआ वह भेड़ के बालों से बनी छलनी से छनता जाता है. (७) प्र पुनानाय वेधसे सोमाय वच उच्यते. भृतिं न भरा मतिभिर्जुजोषते.. (८) पवित्र तथा कर्म करने वाले सोम के लिए प्रार्थनाएं की जाती हैं. सेवक की सेवा से जैसे हम प्रसन्न हो जाते हैं, वैसे ही विशेष प्रार्थनाओं से हम उन को प्रसन्न करें. (८) गोमन्न इन्दो अश्ववत्सुतः सुदक्ष धन्विव. शुचिं च वर्णमधि गोषु धारय.. (९) हे सोम! आप शक्तिमान हैं. रस निचोड़ने के बाद आप हमें गोधन और अश्व धन दीजिए, फिर गाय के दूध में मिल कर आप सफेद रंग वाले हो जाइए. हम सब तरह से आप की स्तुति करते हैं. (९) अस्मभ्यं त्वा वसुविदमभि वाणीरनूषत. गोभिष्टे वर्णमभि वासयामसि.. (१०) हे सोम! आप धनदाता हैं. हमें धन दीजिए. हम आप की स्तुति करते हैं. हम आप के रस को गोरस में मिलाते हैं. (१०) पवते हर्यतो हरिरति ह्ररा २४ सि र २४ ह्रा. अभ्यर्ष स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः.. (११) हे सोम! आप मनोहर व हरे रंग के हैं. आप छनते जाइए. न छनने वाले भाग को छलनी में रहने दीजिए. आप हम उपासकों को यशस्वी पुत्र दीजिए. (११) परि कोशं मधुश्चुत २४ सोमः पुनानो अर्षति. अभि वाणीर्ऋषीणा २४ सप्ता नूषत.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

पवित्र सोमरस छनछन कर घड़े में टपकता और अपना मीठा रस द्रोणकलश में पहुंचाता है. सात छंदों (पदों) वाली ऋषियों की वाणी सोम की स्तुति करती है. (१२) ग्यारहवां खंड पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम क्रतुवित्तमो मदः. महि द्युक्षतमो मदः.. (१) हे सोम! आप अत्यंत मधुर हैं. आप यज्ञ के बारे में सब कुछ जानने वाले हैं. आप सर्वोत्तम, प्रकाशमान व तेजस्वी हैं. आप इंद्र को आनंद देने के लिए पवित्र होइए. (१) अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दीदिहि देव देवयुम्. वि कोशं मध्यमं युव.. (२) हे सोम! आप अन्न के स्वामी, प्रकाशमान, स्तुति व देवताओं के पीने (पाने) योग्य हैं. आप हमें यश और बल दीजिए. आप द्रोणकलशों को लबालब भर दीजिए. (२) आ सोता परि षिञ्चताश्वं न स्तोममप्तुर ꣳ रजस्तुरम्. वनप्रक्षमूदप्रुतम्.. (३) हे यजमानो! सोम घोड़े जैसे वेगवान व स्तुति करने योग्य हैं. वे पानी की तरह प्रवहमान (बहने वाले) हैं तथा प्रकाश की किरणों की तरह कहीं भी शीघ्र पहुंचने वाले हैं. आप सोमरस को निचोड़िए और उसी में जल मिलाइए. उस के बाद उसे गो दूध से सींचिए. (३) एतमु त्यं मदच्युत ꣳ सहस्रधारं वृषभं दिवोदुहम्. विश्वा वसूनि बिभ्रतम्.. (४) सोमरस प्रसन्नतादायी है, कई धाराओं से द्रोणकलश में झरता है, शक्ति बढ़ाने वाला है तथा सभी धनों का स्वामी है. विद्वान् यजमान सोमरस निचोड़ते हैं. (४) स सुन्वे यो वसूनां यो रायामानेता य इडानाम्. सोमो यः सुक्षितीनाम्.. (५) सोम धन, दूध आदि रस व शक्ति के स्वामी हैं. ये श्रेष्ठ संतान देने वाले हैं. यजमान श्रेष्ठ सोमरस निचोड़ते हैं. (५) त्वं ह्या ३ ङ्ग दैव्यं पवमान जनिमानि द्युमत्तमः अमृतत्वाय घोषयन्.. (६) हे सोम! आप पवित्र, पूजनीय व प्रकाशवान हैं. आप देवताओं के बारे में सब कुछ जानते हैं. आप उन की अमरता की घोषणा करते हैं. आप यजमान से उन की स्तुति कराते हैं. (६) एष स्य धारया सुतो ऽ व्या वारेभिः पवते मदिन्तमः. क्रीळन्नूर्मिरपामिव.. (७) सोम अत्यंत आनंददायी हैं. ये जल की लहरों की तरह खेलतेकूदते हैं. सोमरस को भेड़ के बालों से बनी छलनी से कलश में धार बना कर छाना जाता है. (७) य उस्रिया अपि या अन्तरश्मनि निर्गा अकृन्तदोजसा. अभि व्रजं तत्निषे गव्यमश्व्यं वर्मीव धृष्पवा रुज.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

सोम बादलों में जल को छिन्नभिन्न करते हैं. वे बादल फैलाने वाले और जल को धारण करने वाले हैं. वे राक्षसों द्वारा हरे गए गायों और घोड़ों को घेर लेते हैं. वे शत्रुनाशक हैं. कवचधारी वीर के समान सोम शत्रुओं को मार देते हैं. (८)

आरण्यक पर्व

आरण्यक पर्व छठा अध्याय पहला खंड इन्द्र ज्येष्ठं न आ भर ओजिष्ठं पुपुरि श्रवः. यद्धिधृक्षेम वज्रहस्त रोदसी उभे सुशिप्र पप्राः.. (१) हे इंद्र! आप वज्रपाणि (हाथ में वज्र धारण करने वाले) हैं. आप सुंदर ठुड्डी वाले हैं. आप हमें यश और बलदायी अन्न प्रदान कीजिए. आप हमें स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों को पुष्ट बनाने वाला धन प्रदान कीजिए. (१) इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमा विश्वरूपं यदस्य. ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद्राध उपस्तुतं चिदर्वाक्.. (२) इंद्र चराचर व पृथ्वी की सभी वस्तुओं और धनों के स्वामी हैं. वे दानदाता को सब प्रकार का धन देते हैं. अच्छी तरह स्तुति किए जाने पर वे पर्याप्त धन देते हैं. (२) यस्येदमा रजायुजस्तुजे जने वन ३४ स्वः. इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत्.. (३) तेजस्वी इंद्र का दान दानियों और स्वर्ग दोनों में प्रशंसनीय है. इंद्र का दान श्रेष्ठ और संतोष देने वाला है. (३) उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यम ३४ श्रथाय. अथादित्य व्रते वयं तवानागसो अदितये स्याम.. (४) हे वरुण! आप ऊपर और नीचे की ओर के बंधनों को हम से दूर कीजिए. आप हमारे सारे बंधनों को शिथिल कीजिए. जिस से हम आप के विधिविधान के अनुसार चल कर पाप और कष्ट रहित जीवन जी सकें. (४) त्वया वयं पवमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुयाम शश्वत्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (५) हे सोम! आप जग को पवित्र करने वाले हैं. आप की मदद से हम युद्ध में अपना कर्तव्य भलीभांति निबाह सकें. अदिति, मित्र, वरुण, पृथ्वी, सिंधु देवता तथा स्वर्गलोक हमें यशस्वी बनाने की कृपा करें. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

इमं वृषणं कृणुतैकमिन्माम्.. (६) हे देवताओ! आप इस सोम को बलवान बनाइए, ताकि वे हमारी मनोकामनाएं पूरी कर सकें. हमें बलवान बना सकें. (६) स न इन्द्राय यज्यवे मरुद्भ्यः वरिवोवित्परिस्रव.. (७) हे सोम! आप धनदाता व पूजनीय हैं. आप इंद्र, मरुद्गण और वरुण के लिए धारा के रूप में टपकिए. (७) एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (८) सोम की कृपा से मनुष्यों के लिए चाहे गए सभी प्रकार के धन हमें प्राप्त हों. हम उन धनों के श्रेष्ठ उपयोग की इच्छा रखते हैं. (८) अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाम. यो मा ददाति स इदेवमावदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि.. (९) मैं (अन्न) सभी देवताओं से पहले उत्पन्न हुआ हूं. मैं विनाशरहित हूं. जो व्यक्ति अच्छे पात्र को मेरा दान करता है, वह सब का कल्याण करता है. जो किसी को दान नहीं करता है, अकेला ही अन्न खाता है, उसे मैं समाप्त कर देता हूं. (९) दूसरा खंड त्वमेतदधारयः कृष्णासु रोहिणीषु च. परुष्णीषु रुशत्पयः.. (१) हे इंद्र! काली, लाल और अनेक रंग वाली गायों में (सब में) आप ने एक जैसा चमचमाता सफेद दूध स्थापित किया है. हम आप के इस आश्चर्यजनक सामर्थ्य की प्रशंसा करते हैं. (१) अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयुः. मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमादधुः.. (२) उषा के संबंधी सूर्य खास हैं. वे स्वयं प्रकाशमान और सब को प्रकाशित करने वाले हैं. वे ही जल बरसाने वाले मेघ का रूप भी हैं. वे ही आकाश में गर्जना करते हैं. बुद्धिमान देवताओं ने बुद्धि से इस जग को रचा. मनुष्यों को देखने वाले पितरों ने माता के पेट (गर्भ) में इसे स्थापित किया. (२) इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (३) इंद्र के संकेत (इशारे) मात्र से घोड़े एक साथ रथ में जुत जाते हैं. इंद्र वज्रधारी व आभूषणधारी हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्र वाजेषु नो ऽ व सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (४) हे इंद्र! आप अत्यंत बलवान हैं. आप को कोई नहीं हरा सकता. आप छोटे और बड़े सभी प्रकार के युद्धों में हमारी रक्षा कीजिए. (४) प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्. धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः.. (५) वसिष्ठ के पुत्र प्रथ एवं भरद्वाज के पुत्र सप्रथ के लिए अनुष्टुप् छंद में स्तुति करते हैं. उन के लिए श्रेष्ठ हवि समर्पित करते हैं. वसिष्ठ ऋषि ने रथंतर नामक सोम को धाता और सब को उत्पन्न करने वाले विष्णु से प्राप्त किया. (५) नियुत्वान्यायवा गह्यय 28 शुक्रो अयामिते. गन्तासि सुन्वतो गृहम्.. (६) हे वायु! आप अपने वाहन से पधारिए. आप के लिए चमकता हुआ सोमरस तैयार किया गया है. आप विधिविधान से सोमरस तैयार करने वाले यजमान के घर पधारते हैं. आप हमारे यहां पधारिए. (६) यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय. तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तभ्ना उतो दिवम्.. (७) हे इंद्र! आप अत्यंत वैभवशाली व अपूर्व हैं. वृत्रासुर के नाश के समय आप ने पृथ्वी को दृढ़ और विस्तृत किया. स्वर्गलोक को भी भलीभांति स्थिर किया. आप की सामर्थ्य अद्भुत है. (७) तीसरा खंड मयि वर्चो अथो यशो ऽ थो यज्ञस्य यत्पयः. परमेष्ठी प्रजापतिर्दिवि द्यामिव दृ 28 हतु.. (१) प्रजाओं का पालन करने वाले प्रजापति स्वर्गलोक में निवास करते हैं. वे हमें आत्मज्ञान व यश देने की कृपा करें. वे हमें यज्ञ से संबंध रखने वाली उत्तम हवि और अन्न सामग्री प्रदान करने की कृपा करें. (१) सं ते पया 28 सि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः. आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवा 28 स्युत्तमानि धिष्व.. (२) हे सोम! आप शत्रुनाशक हैं. आप हवि के लिए निर्धारित दुग्ध सामग्री प्राप्त कीजिए. अमरता पाने के लिए आप स्वर्गलोक में श्रेष्ठ अन्न और श्रेष्ठ बल को प्राप्त कीजिए. (२) त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः. त्वमातनोर्वा ३ न्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ.. (३) हे सोम! आप ने पृथ्वीलोक में मौजूद सारी ओषधियों को उत्पन्न किया है. आप ने जल ebook converter DEMO Watermarks*

को उत्पन्न किया है. आप ने गायों को उत्पन्न किया है. आप ने आकाश को फैलाया है. आप ने अंधकार को दूर किया है. (३) अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्. होतार 𑖊 रत्नधातमम्.. (४) हम यजमान संसार का कल्याण करने की इच्छा रखते हैं. हम अग्नि की स्तुति करते हैं. वे यज्ञ में देवताओं के दूत हैं. हम यज्ञ में अग्नि प्रज्वलित करते हैं. वे हमें सुख और ऐश्वर्य प्रदान करते हैं. (४) ते मन्वत प्रथमं नाम गोनां त्रिः सप्त परमं नाम जानन्. ता जानतीरभ्यनूषत क्षा आविर्भुवन्नरुणीर्यशसा गावः.. (५) ऋषियों ने सब से पहले यह जाना कि वाणी के शब्द पूजनीय हैं. उस के बाद उन्होंने सात के तिगुने यानी इक्कीस छन्दों में स्तोत्र होते हैं, यह ज्ञान प्राप्त किया. उस के बाद वाणी से उषा की स्तुति की. उस के बाद सूर्य के तेज के साथ ही प्रकाशमान अन्य स्तुतियां (वाणियां) उत्पन्न हुईं. (५) समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यस्पृणन्ति. तमू शुचि 𑖊 शुचयो दीदिवा 𑖊 समपात्रापातमुप यन्त्यापः.. (६) बरसात का पानी जमीन पर गिर कर जमीन के पानी के साथ मिल जाता है. ये दोनों पानी नदी का रूप धारण कर लेते हैं और समुद्र में मिल जाते हैं. वहां ये पानी समुद्री अग्नि को आनंद देते हैं. इसी प्रकार सोमरस पानी में मिल कर आनंदित करता है. (६) आ प्रागाद्भद्रा युवतिरहः केतून्त्समीर्त्सति. अभूद्भद्रा निवेशनी विश्वस्य जगतो रात्री.. (७) सूर्य की किरणों को समेटने वाली रात्रि रूपी स्त्री आ गई है. यह सारे संसार को आराम देने वाली है. यह सारे संसार का कल्याण चाहने वाली है. (७) प्रक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू महः प्र नो वचो विदथा जातवेदसे. वैश्वानराय मतिर्नव्यसे शुचिः सोम इव पवते चारुरग्नये.. (८) अग्नि सर्वत्र व्याप्त व प्रकाशमान हैं. हम उन की स्तुति करते हैं. हम यज्ञ में उन के लिए स्तोत्र गाते हैं. वे सभी मनुष्यों का हित करने वाले हैं. उन के पास स्तोत्र वैसे ही जाते हैं, जैसे यज्ञ में सोम जाते हैं. (८) विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञमुभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म. मा वो वचा 𑖊 सि परिचक्ष्याणि वोच 𑖊 सुम्नेष्विद्धो अन्तमा मदेम.. (९) सभी देवगण हमारे पूजनीय स्तोत्रों को सुनने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों हमारे स्तोत्रों को सुनने की कृपा करें. अग्नि हमारे स्तोत्र सुनें. हम कभी भी अप्रिय और ebook converter DEMO Watermarks*

त्याज्य वाणी न बोलें. हम देवताओं की कृपा में रहें. उन के द्वारा दिए गए सुख से सुखी रहें. (९) यशो मा द्यावापृथिवी यशो मेन्द्रबृहस्पती. यशो भगस्य विन्दतु यशो मा प्रतिमुच्यताम्. यशसा ३ स्याः स ꣳ सदो ऽ हं प्रवह्रिता स्याम्.. (१०) हम यजमानों को स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक का यश प्राप्त हो. हमें इंद्र और बृहस्पति का यश भी प्राप्त हो. सूर्य का यश मुझे मिले. यह यश कभी हम से मुंह न मोड़े. इस सभा में मुझे यश मिले. इस में मैं विचार व्यक्त करने की अच्छी क्षमता (देवताओं की कृपा से) पा जाऊं. (१०) इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री. अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्.. (११) इंद्र वज्रधारी और शक्तिशाली हैं. वे बादलों को भेद कर बरसात करने वाले हैं. उन्होंने नदियों के तट बना कर पर्वतों से जल बहाया. मैं उन के इन अच्छे कामों का बारबार वर्णन करता हूं. (११) अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन्. त्रिधातुरर्को रजसो विमानो ऽ जसं ज्योतिर्हविरस्मि सर्वम्.. (१२) मैं (आत्मा) जन्म से ही अग्नि स्वरूप हूं. सब कुछ जानने वाला हूं, प्रकाशमान हूं. मुंह में अमरता देने वाली वाणी है. मैं प्राण, अपान, व्यान इन तीनों प्रकार का प्राण हूं, आकाश को नापने वाला वायु हूं, प्रकाशमान सूर्य हूं, सभी की हवि हूं. (१२) पात्यग्निर्विपो अग्रं पदं वेः पाति यह्वश्चरण ꣳ सूर्यस्य. पाति नाभा सप्तशीर्षाणमग्निः पाति देवानामुपमादमृष्वः.. (१३) अग्नि देव सर्वव्यापक हैं. वे पृथ्वी के मुख्य स्थानों की रक्षा करते हैं. वे महान हैं. वे सूर्य के मार्ग व अंतरिक्ष की रक्षा करते हैं. वे अंतरिक्षलोक में मरुद्गणों व देवताओं को प्रिय लगने वाले यज्ञ की रक्षा करते हैं. वे सुंदर तथा दर्शनीय हैं. (१३) चौथा खंड भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि. स त्वं नो अग्ने पयसा वसुविद्रयिं वर्चो दृशे ऽ दाः.. (१) हे अग्नि! आप चमचमाते हैं. आप का मुख प्रकाशित है. उस मुख में जीभ अग्नि की ज्वाला में डाली गई हवि खाती है. आप धन देने वाले हैं. आप अन्न व रमणीय धन दीजिए. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

वसन्त इन्तु रन्त्यो ग्रीष्म इन्तु रन्त्यः. वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिर इन्तु रन्त्यः.. (२) वसंत ऋतु लुभावनी है. ग्रीष्म ऋतु लुभावनी है. वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ऋतुएं भी लुभावनी हैं. (२) सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्. स भूमि ꣳ सर्वतो वृत्वार्त्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्.. (३) पूर्ण पुरुष हजारों सिरों वाला है. वह हजारों आंखों वाला है, हजारों पैरों वाला है. वह सारे ब्रह्मांड को घेर सकने में समर्थ है. फिर भी वह बाकी रहता है. (३) त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादो ऽ स्येहाभवत्पुनः. तथा विष्वङ् व्यक्रामदशनानशने अभि.. (४) पूर्ण पुरुष तीन पैरों वाला है. वह ऊंचे स्थान पर वास करता है. इस पूर्ण पुरुष से ही सारा संसार पैदा होता है. चेतन और अचेतन सभी में इसी पूर्ण पुरुष का विस्तार है. यह विविध स्वरूपों वाला है. यह सर्वत्र व्याप्त है. (४) पुरुष एवेद ꣳ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्. पादो ऽ स्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. (५) भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों का कर्ता पूर्ण पुरुष ही है. इस के तीन पैर अमर स्वर्गलोक में हैं. इस के शेष चौथे चरण में सारे प्राणी हैं. (५) तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँ श्च पूरुषः. उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति.. (६) पूर्ण पुरुष जड़चेतन और समस्त पृथ्वी से भी विस्तृत (बड़ा) है. वह अमरता का स्वामी है. अन्न से बढ़ने वाले प्राणियों का भी स्वामी है. (६) ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः. स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः.. (७) उस पुरुष से विराट् (ब्रह्मांड) पुरुष उत्पन्न हुआ. उस से अन्य पुरुष उत्पन्न हुए. उस के बाद उस ने पशुपक्षियों और अन्य जीवों को उत्पन्न किया. (७) मन्ये वां द्यावापृथिवी सुभोजसौ ये अप्रथेथाममितमभि योजनम्. द्यावापृथिवी भवत ꣳ स्योने ते नो मुञ्चतम ꣳ हसः.. (८) हे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक! आप हमारे पालनहार हैं. हम आप को इसी रूप में जानते हैं. आप हमारा अपार वैभव बढ़ाइए. हे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के देवता! आप हमें सुख दीजिए. आप हमें पापों से दूर कीजिए. (८) हरी त इन्द्र श्मश्रूण्युतो ते हरितौ हरी. ebook converter DEMO Watermarks*

तं त्वा स्तुवन्ति कवयः परुषासो वनर्गवः.. (९) हे इंद्र! आप की दाढ़ीमूंछें हरी हैं. आप के घोड़े भी हरे हैं. आप श्रेष्ठ गोपालक हैं. विद्वान् कविजन आप की स्तुति करते हैं. (९) यद्वर्चो हिरण्यस्य यद्वा वर्चो गवामुत. सत्यस्य ब्रह्मणो वर्चस्तेन मा स ॐ सृजामसि.. (१०) स्वर्ण, गाय और सत्यज्ञान में जो तेजस्विता है, हम उस तेजस्विता को अपने में धारण करना (पाना) चाहते हैं. (१०) सहस्तन्न इन्द्र दद्ध्वयोज ईशे ह्यस्य महतो विरप्शिन्. ऋतुं न नृम्ण ॐ स्थविरं च वाजं वृत्रेषु शत्रून्तसहना कृधी नः.. (११) हे इंद्र! आप शत्रु का नाश करने वाले हैं. आप हमें बल प्रदान कीजिए क्योंकि आप महान बल के स्वामी हैं. आप हमारे यज्ञ की स्थिति जैसा धन और सामर्थ्य हमें दीजिए. आप हमें ऐसी शक्ति दीजिए, जिस से हम संग्रामों में अपने दुश्मनों को हरा सकें. (११) सहर्षभाः सहवत्सा उदेत विश्वा रूपाणि बिभ्रतीद्वर्यूध्नीः. उरुः पृथुर्यं वो अस्तु लोक इमा आपः सुप्रपाणा इह स्त.. (१२) कई रंगों वाली, बड़ेबड़े थनों (स्तनों) वाली गौएं, बछड़ों और बैलों के साथ हमें प्राप्त हों. यह पृथ्वीलोक महान व विशाल है. यह आप के निवास योग्य है. आप को यहां सुख से पीने योग्य जल प्राप्त हो. (१२) पांचवां खंड अग्न आयू ॐ षि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (१) हे अग्नि! आप हमारे अन्नों की आयु बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप हमारी आयु बढ़ाइए. हमारे बल की आयु बढ़ाइए. आप दुष्टों को हम से दूर कीजिए. (१) विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्. वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपर्ति बहुधा वि राजति.. (२) सूर्य बहुत प्रकाशमान हैं. वे खूब सोमरस पीएं. वे यजमानों को निष्कंटक रखें. उन्हें दीर्घायु करें. वायु सूर्य की किरणों को दूरदूर तक पहुंचाते हैं. उन से वे प्रजा का पालन करते हैं. अनेक प्रकार से प्रकाशित होने में समर्थ होते हैं. (२) चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः. आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (३) सूर्य देवताओं के दिव्य तेज का समूह हैं. वे मित्र, वरुण तथा अग्नि के नेत्र हैं. सूर्य के ebook converter DEMO Watermarks*

उगते ही स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक आदि सभी उन के प्रकाश से जगमगा जाते हैं. (३) आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (४) सूर्य गतिशील व तेजस्वी हैं. वे उदित हो कर ऊपर स्थित हो जाते हैं. सब से पहले वे पृथ्वीलोक (माता), फिर स्वर्गलोक (पिता) फिर अंतरिक्षलोक को प्राप्त होते हैं. (४) अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन्महिषो दिवम्.. (५) सूर्य का प्रकाश अपनी किरणों से आकाश में घूमता है. सूर्य के उगने पर ये किरणें दिखती हैं और अस्त होने पर गायब हो जाती हैं. सूर्य अंतरिक्षलोक को विशेष रूप से प्रकाशित करते हैं. (५) त्रि ꣳ शद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभिः.. (६) दिन की तीस घड़ियों तक सूर्य अपनी किरणों से प्रकाशित होते हैं. इन सूर्य के लिए हर एक मुख वेदवाणी उचारता है (स्तुति करता है). (६) अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (७) दिन में जैसे चोर छिप जाते हैं, वैसे ही सूर्य के उगने पर ग्रह, नक्षत्र, तारागण आदि छिप जाते हैं. (७) अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (८) जैसे हम जलती हुई अग्नि की ज्वाला देख सकते हैं, वैसे ही सूर्य की प्रकाशित किरणों को हम देख सकते हैं. वे सब को देख सकती हैं. (८) तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमाभासि रोचनम्.. (९) हे सूर्य! आप सब को पार लगाने वाले हैं. आप सारे संसार को देख सकते हैं. आप सब को प्रकाशित कर सकते हैं. चंद्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि को आप ही चमकाते हैं. (९) प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्. प्रत्यङ् विश्व ꣳ स्वर्द्दशे.. (१०) हे सूर्य! आप मरुद्गणों के देखते हुए उन के सामने उदित होते हैं. आप मनुष्यों के देखते हुए उदित होते हैं. आप सभी के देखते हुए यानी सब के सामने प्रकट होते हैं. (१०) येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (११) हे सूर्य! आप सभी को पवित्र व प्रकाशित करने वाले हैं. आप जिस प्रकाश से सब को प्रकाशित करते हैं हम उस की उपासना करते हैं. (११) उद्यामेषि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः. पश्यञ्जन्मानि सूर्य.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे सूर्य! आप देहधारियों को प्रकाशित करते हैं. आप दिन को रात्रि से नापते हैं. आप स्वर्गलोक और अंतरिक्षलोक को भी अपने प्रकाश से प्रकाशित कर देते हैं. (१२) अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्र्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः.. (१३) सूर्य ने रथ में घोड़े जोत रखे हैं. वे सातों घोड़े शुद्धकारी हैं. किरण रूपी घोड़ों से सूर्य सर्वत्र जाते हैं. (१३) सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षण.. (१४) हे सूर्य! आप प्रकाशित करने वाले हैं. सात किरण रूपी घोड़े आप के रथ को ले जाते हैं. ये किरणें शुद्ध करने वाली हैं. (१४)

पहला अध्याय

उत्तरार्चिक पहला अध्याय पहला खंड उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे. अभि देवाँ इयक्षते.. (१) हे यजमानो! आप देवताओं के लिए यज्ञ करना चाहते हैं. आप छान कर साफ किए गए सोमरस की स्तुति कीजिए. (१) अभि ते मधुना पयो ऽ थर्वाणो अशिश्रयुः. देवं देवाय देवयु.. (२) सोमरस दिव्य है. यह देवताओं को प्रिय है. इसे देवताओं ने देवताओं के लिए खोजा है. अथर्वा ऋषियों ने गाय का दूध मिला कर इसे यजमान के लिए तैयार किया है. (२) स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते. शं राजन्नोषधीभ्यः.. (३) हे सोम! आप हितकारी हैं. आप हमारी गौओं को सुख दीजिए. आप हमारे पुत्रपौत्रों (आने वाली पीढ़ियों) व घोड़ों को सुख दीजिए. आप ओषधियों को हमारे लिए कल्याणकारी बनाइए. (३) दविद्युतत्या रुचा परिष्टोभन्त्या कृपा. सोमाः शुक्रा गवाशिरः.. (४) सोमरस बहुत चमकीला है. इस की धारा सब ओर टपकती हुई आवाज करती है. साफ निथारे हुए सोमरस को गाय के दूध में मिलाया जाता है. (४) हिन्वानो हेतुभिर्हित आ वाजं वाज्यक्रमीत्. सीदन्तो वनुषो यथा.. (५) जैसे युद्धों में शूरवीर की प्रशंसा होती है व उसे प्रतिष्ठा मिलती है, वैसे ही यज्ञ में सोमरस की यजमान प्रशंसा करते हैं व यज्ञ भूमि में सोम को प्रतिष्ठा मिलती है. (५) ऋध्वक्सोम स्वस्तये संजग्मानो दिवा कवे. पवस्व सूर्यो दृशे.. (६) हे सोम! आप बुद्धिमान व परमवीर हैं. आप सूर्य की भांति ऊपर चढ़ दिव्य प्रकाशमय हो कर सब का कल्याण कीजिए. (६) पवमानस्य ते कवे वाजिन्सर्गा असृक्षत. अर्वन्तो न श्रवस्यवः.. (७) हे सोम! आप शक्तिवर्धक हैं. छानते समय आप की धार ऐसी गतिशील होती है, जैसे ebook converter DEMO Watermarks*