भारतकोश
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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( ८४ ) भाव ( बड़प्पन ) एक दूसरे की निस्बत से होता है, जैसे— नेत्र आदि के व्यापार में अहङ्कार मुख्य है, इसी तरह अहङ्कार के व्यापार में मन प्रधान है । प्र०—इस पुरुष की मन इन्द्रियाँ ही मुख्य हैं, अर्थात् अन्य इन्द्रियाँ गौण हैं ? उ०—तत्कर्मार्जितत्वात् तदर्थमभिचेष्टा लोक- वत् ॥ ४६ ॥ अर्थ—जैसेकि संसार में दीखता है, कि जो आदमी कुल्हाड़ी को खरीदता है, उस कुल्हाड़ी के व्यापार से खरीदने वाले को फल भी होता है, इस प्रकार मन भी पुरुष के कर्मों से पैदा होता है, अतएव मन आदि का फल पुरुष को मिलता है । इस कारण मनुष्य की मन इंद्रिय ही मुख्य है । यह समाधान पहले कर भी आये हैं, कि पुरुष कर्म से रहित है, लेकिन पुरुष में कर्म का आरोपण होता है । दृष्टान्त भी इस विषय का दे चुके हैं, जैसे—राजा के सेवक इत्यादि युद्ध करें और हार-जीत राजा की गिनी जाती है, इस प्रकार ही पुरुष में कर्म का आरोपण होता है । समानकर्मयोगे बुद्धेः प्राधान्यं लोकवल्लोकवत् ॥४७ अर्थ—यद्यपि सब इन्द्रियों के साथ पुरुष का समान कर्मयोग है, तथापि बुद्धि ही को मुख्यता है, जैसे—राज्य के रहने वाले चांडाल को आदि ले द्विजाति पर्यंत सब ही लोग राजा की प्रजा हैं तथापि जमींदार से मुख्य मंत्री ही गिना जाता है । इस दृष्टान्त को संसार परंपरा के समान यहाँ समझ लेना चाहिये । प्र०—लोकवत् यह शब्द दुबारा क्यों कहा ? उ०—यह दुबारा का कहना अध्याय की समाप्ति दिखाता है । प्र०—इस अध्याय में कितने विषय कहे गये हैं ?

तृतीयोऽध्यायः

( ८५ ) उ०—प्रकृति का कार्य, प्रकृति की सूक्ष्मता, दो प्रकार की इंद्रियाँ, अन्तःकरण आदि का वर्णन है । इतने विषय कहे गये हैं । इति सांख्यदर्शने द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ तृतीयोऽध्यायः अब इस तीसरे अध्याय में प्रधान जो प्रकृति है उसका स्थूल कार्य और महाभूत ( पृथ्बी आदि ) और दो तरह के शरीर यह सब कहते हैं । अविशेषाद्विशेषारम्भः ॥ १ ॥ अर्थ—अविशेषात् अर्थात् जिससे छोटी और कोई वस्तु न हो सके ऐसे भूत सूक्ष्म अर्थात् पंचतन्मात्राओं से विशेष स्थूलमहाभूतों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि सुखादिकों का ज्ञान स्थूलभूतों में हो सकता है, और सूक्ष्मभूत योगी महात्माओं के हृदय में प्रकाश होते रहते हैं । तस्माच्छरीरस्य ॥ २ ॥ तिन पूर्वोक्त [ पहिले कहे हुए ] बाईस तत्वों में से स्थूल सूक्ष्म शरीरों की उत्पत्ति होती है । प्र०—स्थूल शरीर किसको कहते हैं ? उ०—जिसका जाग्रतावस्था में अभिमान होता है । प्र०—लिङ्ग-शरीर किसको कहते हैं ? उ०—मन, अहङ्कार और इन्द्रियाँ, जिसके द्वारा अपने अपने काम करने में तत्पर रहते हैं, उसको लिङ्ग-शरीर कहते हैं । प्र०—कारण-शरीर किसको कहते हैं ?

( ८६ ) उ०—लिङ्ग-शरीर के कारण को कारण-शरीर कहते हैं। प्र०—बाईस तेईस तत्त्वों के बिनां संसार की उत्पत्ति नहीं होसकती ? उ०—तद्बीजात् संसृतिः ॥ ३ ॥ अर्थ—बाईस तत्त्व शरीर के कारण हैं, और देखने में ऐसा ही आता है, कि कारण के बिना कार्य्य की उत्पत्ति नहीं होती, अतः उन्हीं बाईस तत्त्वों से संसार की उत्पत्ति होती है। अब संसार की अवधि को भी कहते हैं— आविवेकाच्च प्रवर्त्तनमविशेषाणाम् ॥ ४ ॥ अर्थ—अविशेष जो सूक्ष्म भूत है उनकी सृष्टि प्रवृत्ति तभी तक रहती है जब तक विवेक ( ज्ञान ) नहीं होता। ज्ञान के होते ही सूक्ष्म भूतों की प्रवृत्ति नहीं रहती। प्र०—यदि अविवेक के ही वास्ते सृष्टि का होना है तो महाप्रलय में भी सृष्टि का होना योग्य है, क्योंकि उस अवस्था में भी अविवेक बना रहता है ? उ०—उपभोगादितरस्य ॥ ५ ॥ अर्थ—जब अविवेक के कार्य्य प्रारब्ध का उपभोग पूरा होजाता है, तब ही महाप्रलय होती है। जबकि अविवेक का भोग ही विशेष रहा है। तब सूक्ष्म-भूत इस शरीर को क्यों उत्पन्न करेंगे ? और महाप्रलयावस्था में प्रारब्ध कर्म का भोग नाश होजाता है तब भी संचित कर्म बने रहते हैं, क्योंकि कर्म प्रवाह से अनादि हैं। सम्प्रति परिमुक्तो द्वाभ्याम् ॥ ६ ॥ अर्थ—सृष्टि समय में पुरुष दोनों वासना और भोग-बद्ध होता है।

( ८७ ) प्र०—परिमुक्त शब्द का अर्थ तो छूटना है, आप बद्ध अर्थ करते हैं ? उ०—पहले अध्याय के सूत्रों में पुरुष को भोक्तृत्वादि विशेषण दे चुके हैं, इस कारण यहां अभोक्ता कहना अयोग्य है। दूसरे संसार दशा में ही पुरुष को सुख-दुःख न होंगे, तो क्या मुक्त अवस्था में होंगे और जो सुख-दुःख ही नहीं है, तो मुक्ति का उपाय भी कोई न करेगा। तीसरे परिमुक्त शब्द का अर्थ मुक्त करना भी अयोग्य है। यहाँ 'परि' शब्द का अर्थ बद्ध करना ही ठीक है। अब स्थूल और सूक्ष्म दोनों तरह के शरीरों के भेद कहते हैं। मातापितृजं स्थूलं प्रायश इतरन्न तथा ॥ ७ ॥ अर्थ—स्थूल शरीर दो तरह के होते हैं—एक तो वह जो माता के संगम से पैदा होते हैं; दूसरे वह जो बिन माता-पिता के उत्पन्न हों, जैसे वर्षाऋतु में वीरबहूटी इत्यादिक होते हैं। प्र०—पूर्व सूत्रों से साबित हुआ कि तीन प्रकार के शरीर हैं, लेकिन पुरुष कौनसे शरीर की उपाधियों से सुख-दुःख का भोक्ता होता है ? उ०—पूर्वोत्पत्तेस्तत्कार्यत्वं भोगादेकस्यनेतरस्य ८ अर्थ—लिङ्ग-शरीर की उपाधियों से ही पुरुष को सुख-दुःख होते हैं, क्योंकि संसार के आदि में लिङ्ग-शरीर की ही उत्पत्ति है, इस कारण सुखादिक इसके कार्य हैं; अतः एक लिङ्ग- शरीर की उपाधियों से ही पुरुष को सुखादिक हैं, किन्तु स्थूल शरीर की उपाधियों से नहीं होते; क्योंकि जब स्थूल शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तब उसमें सुखादिक नहीं देखने में आते। प्र०—सूक्ष्म शरीर का स्वरूप क्या है ?

( ८८ ) उ०—सप्तदशैकं लिङ्गम् ॥ ६ ॥ अर्थ—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, अहंकार, और पंचतन्मात्रा ( रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द ), यह सूक्ष्म शरीर हैं। प्र०—यदि लिङ्ग शरीर एक ही है, तो अनेक शरीरों की आकृति ( चेष्टा ) में भेद क्यों होता है ? उ०—व्यक्तिभेदः कर्मविशेषात् ॥ १० ॥ अर्थ—स्थूल शरीर अनेक प्रकार के अनेक कर्मों के करने से होते हैं। अब विचार किया जाता है, तो इससे यही बात सिद्ध होती है कि जीवों के भोग का हेतु कर्म ही हैं। प्र०—जब कि भोगों के स्थान लिंग शरीर को ही शरीरत्व है तो स्थूल शरीर को शरीर क्यों कहते हैं ? उ०—तदधिष्ठानाश्रये देहे तद्वादात्ते तद्वादः ॥११॥ अर्थ—पञ्चभूतात्मक ( स्थल ) शरीर में उस लिङ्ग शरीर का अधिष्ठान ( रहने का स्थान ) के सबब से देह वाद है, अर्थात् लिंग शरीर का आश्रय स्थूल शरीर है, इसलिये स्थूल शरीर को शरीर कहते हैं। प्र०—स्थूल शरीर लिंग शरीर से दूसरा है, इसमें क्या प्रमाण है ? उ०—न स्वातन्त्र्यात् तदृते छायावच्चित्रवच्च ॥१२ अर्थ—वह लिङ्ग शरीर बिना किसी आश्रय के नहीं रह सकता, जैसे—छाया किसी आश्रय के बिना नहीं रह सकती, और तसवीर बिना आधार के नहीं खिंच सकती, इस तरह लिङ्ग शरीर भी स्थूल शरीर के बिना नहीं ठहर सकता है ।

( ८६ ) प्र०—यदि लिङ्ग शरीर मूर्त्त द्रव्य है तो वायु आदि के समान उसका भी आधार आकाश हो सकत है, और जगह कल्पना करने से क्या तात्पर्य्य है ? उ०—मूर्त्तत्वेऽपि न संघातयोगात्तरणिवत् ॥१३ अर्थ—यदि लिङ्ग शरीर मूर्त्तत्व भी है तथापि वह किसी स्थान के बिना नहीं रह सकता, जैसे—बहुत से तेज इकट्ठे होकर बिना पार्थिव (पृथिवी से पैदा होने वाले) द्रव्य के आधार के नहीं रह सकते, इस तरह लिंग शरीर भी बिना किसी आधार के नहीं रह सकता । प्र०—लिंग-शरीर का परिमाण क्या है ? उ०—अणुपरिमाणं तत् कृतिश्रुतेः ॥ १४ ॥ अर्थ—लिंग शरीर अणु परिमाण वाला अर्थात् ढका हुआ है, बहुत अणु नहीं है ; क्योंकि बहुत ही अणु ( सूक्ष्म ) अवयव रहित होता है, और लिंग शरीर अवयव वाला है। कारण यह है, कि लिंग शरीर के कार्य दीखते हैं, इस में युक्ति भी प्रमाण है । तदन्नमयत्वश्रुतेश्च ॥ १५ ॥ अर्थ—वह लिंग शरीर अन्नमय है, इस कारण अनित्य है ; क्योंकि इस विषय में श्रुतियाँ प्रमाण देती हैं । "अन्नमयं हि सौम्य ! मन आपो मयः प्राणः तेजोमयीवाक्” । हे सौम्य ! यह मन अन्नमय है, प्राण जलमय है, वाणी तेजोमयी है । यद्यपि मन आदि कार्य भौतिक नहीं हैं, तथापि दूसरे के मेल से इन में घटना-बढ़ना दीखता है, इस कारण से ही अन्नमय मन को माना है । प्र०—यदि लिंग शरीर अचेतन है, तो उसकी अनेक शरीरों के वास्ते उत्पत्ति क्यों है ?

( ६० ) उ०—पुरुषार्थं संसृतिर्लिङ्गानां सूपकारवद्राज्ञः॥१६ अर्थ—लिंग शरीर की उत्पत्ति पुरुष के वास्ते है, जैसे— पाकशाला ( भोजन बनाने की जगह ) में रसोइये को अपने स्वामी के वास्ते जाना है, इस ही तरह लिंग शरीर का होना भी पुरुष के वास्ते है। लिंग शरीर का विचार हो चुका। अब स्थूल शरीर का विचार किया जाता है— पाञ्चभौतिको देहः ॥ १७ ॥ अर्थ—यह शरीर पाञ्चभौतिक कहलाता है, अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, इनसे इसकी उत्पत्ति है। चातुर्भौतिकमित्येके ॥ १८ ॥ कोई ऐसा कहते हैं, कि चार ही भूतों से स्थूल शरीर होता है, क्योंकि आकाश तो अवयव रहित है, इस कारण आकाश किसी के साथ विकार को प्राप्त नहीं हो सकता है। एकभौतिकमित्यपरे ॥ १९ ॥ और कोई ऐसा कहते हैं, कि यह स्थूल शरीर एक भौतिक है, अर्थात् शरीर पार्थिव ( पृथिवी का विकार है ) और जो विशेष चार भूत हैं वे केवल नाम-मात्र ही हैं। या इस प्रकार जानना चाहिये, कि एक-एक भूत के सब शरीर हैं। मनुष्यों के शरीर में पृथिवी का अंश ज्यादा है, इस कारण यह शरीर पार्थिव है, और तैजस लोक वासियों में तेज ज्यादा है, इससे उनका शरीर तैजस है। शरीर स्वभाव से चैतन्य नहीं है, इस पक्ष को दूर करते हैं— न सांसिद्धिकं चैतन्यं प्रत्येकादृष्टेः ॥ २० ॥ अर्थ—जब पृथिवी आदि भूतों को भिन्न-भिन्न करते हैं, तब उनमें चेतन-शक्ति नहीं दीखती, अतः इससे सिद्ध होता

( ६१ ) है, कि देह स्वभाव से चैतन्य नहीं है, किन्तु किसी दूसरे चैतन्य के मेल से चैतन्य-शक्ति को धारण करती है । प्रपंचमरणाद्यभावश्च ॥ २१ ॥ अर्थ—यदि शरीर को स्वभाव से चैतन्य माना जाय, तो यह भी दोष हो सकता है कि प्रपंच, मरण, सुषुप्ति आदि भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ नहीं हो सकेंगी ; क्योंकि जो देह स्वभाव से चैतन्य- है, तो मृत्यु-काल में इसकी चेतन-शक्ति कहाँ को भाग जाती है, और बीसवें सूत्र में जो यह बात कही है कि हरेक भूत के भिन्न- भिन्न करने पर चेतनता नहीं दीखती, अब इस पक्ष को भी पुष्ट करते हैं । मदशक्तिवच्चेत् प्रत्येकपरिदृष्टेसांहत्ये तदुद्भवः॥२२ अर्थ—यदि मदिरा की शक्ति के समान माना जाय, जैसे— अनेक पदार्थों के मिलने से मादकता, शक्ति उत्पन्न हो जाती है, इस ही तरह पाँच भूतों के मिलने से शरीर में चैतन्य- शक्ति उत्पन्न हो जाती है, ऐसा कहना भी योग्य नहीं है, क्योंकि मदिरा में जो मादक शक्ति है, वह शक्ति उन पदार्थों में भी है, जिनसे मदिरा बनी है । यदि यह कहा जाय कि हर एक भूत में थोड़ी चेतनता है, और सब मिलकर बड़ी चेतनता हो जाती है, ऐसा कहना भी असत्य है ; क्योंकि बहुत-सी चैतन्य-शक्तियों की कल्पना करने में गौरव हो जायगा, इस कारण एक ही चैतन्य-शक्ति का मानना योग्य है, और पहिले जो इस बात को कह आये हैं, कि लिंग शरीर की सृष्टि पुरुष के वास्ते है, और लिंग शरीर का स्थूल शरीर में सञ्चार भी पुरुष के वास्ते है, उस का तात्पर्य अब कहते हैं, जो अत्यन्त पुरुषार्थ का हेतु है । ज्ञानान्मुक्तिः ॥ २३ ॥

( ६२ ) अर्थ—लिंग शरीर में जो मन आदि हैं, उन से ज्ञान उत्पन्न होता है, और ज्ञान से ही मुक्ति होती है। बन्धोविपर्ययात् ॥ २४ ॥ अर्थ—विपर्यय नाम मिथ्याज्ञान का है, मिथ्याज्ञान से ही सुख-दुःख रूप बन्धन होता है। ज्ञान से मुक्ति और मिथ्या ज्ञान से बंधन होता है, इस विषय को तो कह चुके, अब मुक्ति का विचार किया जाता है— नियतकारणत्वान्न समुच्चयविकल्पौ ॥ २५ ॥ अर्थ—ज्ञान से ही मुक्ति होती है, इस कारण मुक्ति का नियत कारण ज्ञान है, इस वास्ते मुक्ति में ज्ञान और कर्म दोनों हेतु नहीं हो सकते; क्योंकि मुक्ति में इस बात का कोई विकल्प भी नहीं है, क्योंकि कर्म से मुक्ति हुई, या ज्ञान से, क्योंकि इसका तो ज्ञान ही नियत कारण, और इस बात को भी इस सूत्र से प्रत्यक्ष करते हैं। स्वप्नजागराभ्यामिव मायिकामायिकाभ्यां नोभयोर्मुक्तिः पुरुषस्य ॥ २६ ॥ अर्थ—जैसे स्वप्नावस्था और जाग्रतावस्था इन दोनों में पहला तो प्रतिबिम्ब है, दूसरा सच्चा है। यह स्वप्नावस्था और जाग्रतावस्था दोनों आपस में विरुद्ध धर्म वाले हैं, अतः ( इस कारण ) एक वक्त में नहीं रहसकते, इसी तरह ज्ञान और कर्म भी एक वक्त में नहीं रह सकते हैं। बस इसी से सिद्ध हो गया कि विरुद्ध धर्म वाले पदार्थ न तो मिल सकते हैं, और न मुक्ति का हेतु हो सकते हैं, और न इस विषय पर विकल्प करना चाहिये, कि किस से मुक्ति होती है; क्योंकि मुक्ति का नियत कारण ज्ञान है, और “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेने के

( ६३ ) अमृतत्त्वमानशुः” ( कर्म से, सन्तान से, दान से, किसी ने अमृतत्त्व नहीं पाया है ) इत्यादि श्रुतियाँ भी कर्म को मुक्ति का अहेतु कहती हैं । प्र०-यदि कर्म का कुछ भी फल न रहा, तो कर्म का करना ही व्यर्थ है ? उ०—इतरस्यापि नात्यन्तिकम् ॥ २७ ॥ अर्थ-कर्म का विशेष फल नहीं है, किन्तु सामान्य ही फल है । इस सूत्र में 'इतर' शब्द से कर्म का ग्रहण इसलिये होसकता है कि इस प्रकरण में ज्ञान से मुक्ति होती है, कर्म से नहीं । इसी का प्रतिपादन करते चले आते हैं, इसवास्ते ज्ञान के अतिरिक्त कर्म का ही ग्रहण हो सकता है। यदि ऐसा कहा जाय, कि ज्ञान के अतिरिक्त अज्ञान का ग्रहण किया सो भी ठीक नहीं ; क्योंकि इस सूत्र में आचार्य का अपि और नात्यन्तिक शब्द कहना कर्म से न्यून ( कमती ) फल का जतानेवाला है, जब इतर से अज्ञान का ग्रहण किया जाय, तो ऐसा अर्थ होगा, कि अज्ञान का थोड़ा फल है बहुत नहीं, इससे थोड़े फल का अभिलाषी अज्ञान को ही उत्तम समझ सकता है, इस वास्ते ऐसा अनर्थ करना अच्छा नहीं । इससे आचार्य ने कर्म की अपेक्षा ज्ञान को उत्तम माना है । योगी के संकल्प-सिद्ध पदार्थ भी मिथ्या नहीं हैं, इस बात का आगे के सूत्र से और भी प्रत्यक्ष करेंगे । संकल्पितेऽप्येवम् ॥ २८ ॥ अर्थ-योगी के संकल्प किये हुए पदार्थ भी इसी प्रकार सच्चे हैं। प्र०-जबकि योगी के संकल्पित पदार्थों का कोई कारण प्रत्यक्ष नहीं दीखता, तो वह मिथ्या क्यों नहीं ?

( ६४ ) उ०—भावनोपचयाच्छुद्धस्यसर्वं प्रकृतिवत् ॥२६ अर्थ—प्राणायामादिकों से योगियों की भावना अर्थात् ध्यान अधिक होता है, इसवास्ते सब पदार्थ सिद्ध हैं, उनमें प्रत्यक्ष कारण देखने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि हम लोगों के समान योगियों के संकल्प झूठे नहीं होते, जैसे—प्रकृति बिना किसी का सहारा लिये महदादिकों को करती है, और उसमें प्रत्यक्ष कारण की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती, इसी प्रकार योगी का ज्ञान भी जानना चाहिये। पूर्वोक्त सूत्रों से यह बात सिद्ध हो गई कि ज्ञान ही मोक्ष का साधन है। अब ज्ञान किस तरह होता है, इस बात को आगे के सूत्रों से प्रत्यक्ष करेंगे। रागोपहतिर्ध्यानम् ॥३०॥ अर्थ—ज्ञान के रोकनेवाले रजोगुण के कार्य जो विषय-वास- नादिक हैं उनका जिनसे नाश हो जाय, उसे ध्यान कहते हैं। यहाँ- पर ध्यान शब्द से धारणा, ध्यान, समाधि, इन तीनों का ग्रहण है; क्योंकि पातञ्जलि में योग के आठ अङ्गों को ही विवेक साक्षात् में हेतु माना है। इनके अवान्तर भेद भी उसी शास्त्र में विशेष मिलेंगे, बाक़ी पाँच साधनों को आचार्य आप ही कहेंगे। अब ध्यान की सिद्धि के लक्षणों को कहते हैं— वृत्तिनिरोधात् तत्सिद्धिः ॥३१॥ जिसका ध्यान किया जावे, उसके अतिरिक्त वृत्तियों के निरोध से अर्थात् सम्प्रज्ञात योग से उसकी सिद्धि जानी जाती है, और ध्यान तबतक ही करना चाहिये जबतक ध्येय (जिस- का ध्यान किया जाता है) के सिवाय दूसरे की तरफ़ को चित्त की वृत्ति न जावे। अब ध्यान के साधनों को कहते हैं— धारणासनस्वकर्मणा तत्सिद्धिः ॥३२॥

( ६५ ) धारणा, आसन और अपने कर्म से ध्यान की सिद्धि होती है। प्रथम धारणा का लक्षण कहते हैं— निरोधश्छर्दिर्विधारणाभ्याम् ॥३३॥ अर्थ—छर्दि ( वमन ) और विधारण ( त्याग ) अर्थात् प्राण का पूरक, रेचक और कुम्भक से निरोध ( वश में रखने ) को धारणा कहते हैं । यद्यपि आचार्य ने धारणा शब्द का उच्चारण इस सूत्र में नहीं किया है तथापि आगे के दो सूत्रों में आसन और स्वकर्म का लक्षण किया है। इसी परिशेष से धारणा शब्द का अध्याहार इस सूत्र में कर लिया जाता है, जैसे—पाणिनि- मुनि ने भी लाघव के वास्ते “लट्, शेषे च” इत्यादि सूत्र कहे हैं। अब आसन का लक्षण कहते हैं— स्थिरसुखमासनम् ॥३४॥ अर्थ—स्थिर होने पर जो सुख का साधन हो, उसी का नाम आसन, जैसे—स्वस्तिका ( पालकी ) आदि स्थिर होने पर सुख के साधन होते हैं, तो उनको भी आसन कह सकते हैं। किसी विशेष पदार्थ का नाम आसन नहीं है। अथ स्वकर्म का लक्षण कहते हैं— स्वकर्म स्वाश्रमविहितकर्मानुष्ठानम् ॥३५॥ अर्थ—जो कर्म अपने आश्रम के वास्ते शास्त्रों ने प्रतिपादन किये हैं उनके अनुष्ठान को स्वकर्म कहते हैं। यहाँ पर कर्म शब्द से यम, नियम, और प्रत्याहार, इन तीनों को समझना चाहिये ; क्योंकि इनका सब वर्णों के वास्ते समान सम्बन्ध है, और इन यमादिकों को योगशास्त्र में योग का अङ्ग तथा ज्ञान का साधन भी माना है, और भी जो ज्ञान प्राप्ति में उपाय हैं, उनको भी कहेंगे—

( ६६ ) प्र०- यम किसको कहते हैं ? उ०- अहिंसा ( जीव का न मारना ) सत्य, अस्तेय ( चोरी न करना ), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ( विषयों से बचना ); इनका नाम यम है । प्र०- नियम किसको कहते हैं ? उ०- शुद्धि, सन्तुष्ट रहना, अपने कर्मों का अनुष्ठान करना, वेदादि का पढ़ना, ईश्वरभक्ति; इसको नियम कहते हैं । प्र०- प्रत्याहार किसको कहते हैं ? उ०- जिसमें चित्त इन्द्रियों सहित अपने विषय को त्याग कर ध्यानावस्थित होजाय, उसको प्रत्याहार कहते हैं ॥ वैराग्यादभ्यासाच्च ॥३६॥ अर्थ- सांसारिक पदार्थों के विराग अथवा धारणादि पूर्वोक्त तीन साधनों के अभ्यास से ज्ञान प्राप्त होता है । यहाँ चकार का अर्थ पूर्वार्थ का समुच्चय और आरम्भित जो "ज्ञानान्मुक्तिः" इस विषय के प्रतिपादन की समाप्ति के वास्ते है । इससे आगे "बन्धो विपर्ययात्" इसपर विचार आरम्भ करते हैं— विपर्ययभेदाः पंच ॥३७॥ अर्थ- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, यह पाँच योगशास्त्रों में कहे हुए बन्ध के हेतु विपर्यय ( मिथ्या ज्ञान ) के अवान्तर भेद हैं । अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म में नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि करने का नाम अविद्या है। जिसमें आत्मा और अनात्मा की एकता मालूम होवे, जैसे—शरीर के अतिरिक्त और कोई आत्मा नहीं, ऐसी बुद्धि का होना अस्मिता है—राग और द्वेष के तो लक्षण प्रसिद्ध ही हैं । मृत्यु से डरने का नाम अभिनिवेश है, यह पाँचों बातें बद्ध जीव में होती

( ६७ ) हैं, और इनका होना ही बन्धन का हेतु है। अब बुद्धि को बिगाड़नेवाली अशक्तियों के भेद कहते हैं— अशक्तिरष्टाविंशतिधातु ॥३८॥ अर्थ—अशक्ति अट्ठाईस प्रकार की है, वह प्रकार अब कहते हैं। ग्यारह इन्द्रियों के विघात होजाने से ग्यारह प्रकार की, और नौ प्रकार की तुष्टि, तथा आठ प्रकार की सिद्धि से बुद्धि का प्रति- कूल होना—यह सब मिलकर अट्ठाईस प्रकार की बुद्धि अशक्ति बुद्धि में होती है। इन्द्रियों का विघात इस तरह होता है, कि कान से सुनाई न देना, त्वचा में कोढ़ का होजाना, आँखों से अंधा हो जाना इत्यादि ग्यारह इन्द्रियों का विषय होना तथा तुष्टि आदि के जो भेद जिस प्रकार कहे हैं, उनसे बुद्धि का विपरीत होना, अशक्ति का लक्षण है। जब तक बुद्धि में अशक्ति नहीं होती, तब- तक अज्ञान भी नहीं होता। अब तुष्टि के भेद कहते हैं— तुष्टिर्नवधा ॥३६॥ अर्थ—तुष्टि नौ प्रकार की है। इसका भिन्न-भिन्न प्रत्यक्ष आचार्य आगे के सूत्रों में आप ही करेंगे। अतः यहाँ व्याख्या लिखना व्यर्थ है। सिद्धिरष्टधा ॥४०॥ अर्थ—सिद्धि आठ प्रकार की है, इसका प्रत्यक्ष भी आगे लिखेंगे। अब पूर्व कहे हुए विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि और सिद्धि के भेदों की व्याख्या आगे के चार सूत्रों में करेंगे। अवान्तरभेदाः पूर्ववत् ॥४१॥ अर्थ—विपर्यय अर्थात् मिथ्या ज्ञान के अवान्तर भेद जो सामान्य रीति से पूर्वाचार्यों ने किये हैं, उनको उसी तरह समझना

( ६८ ) चाहिये, यहाँ विस्तारभय से नहीं कहे गये। अविद्यादिकों के जितने भेद हैं, उनकी विशेष व्याख्या विस्तारभय के कारण छोड़ दी है। यदि कहे जावें तो कारिकाकार ने अविद्या के बासठ भेद माने हैं, जिसमें आठ-आठ प्रकार का तम और मोह, दश प्रकार का महामोह, अठारह प्रकार का तामिस्र और अठारह ही प्रकार का अन्धता मिश्र—यह सब मिलकर बासठ प्रकार के हुए। यदि इतने प्रकार के भेदों की भिन्न-भिन्न व्याख्या की जावै, तो बड़ा भारी दफ़्तर भरने को चाहिये, लेकिन हमारे विचार से इतने भेद मानना और उनकी व्याख्या करना केवल झगड़ा ही है। एवमितरस्याः ॥४२॥ इसी प्रकार अशक्ति के भेद भी पूर्वाचार्यों के कथना- नुसार समझने चाहियें। आध्यात्मिकादिभेदान्नवधा तुष्टिः ॥४३॥ अर्थ—प्रकृति, उपादान, काल, भाग्य—यह चार प्रकार के भेद होने से आध्यात्मिक तुष्टि कहलाती है, और पाँच प्रकार की बाह्य विषयों से उपराम को प्राप्त होनेवाली तुष्टि है। एवम् आध्यात्मिकादि भेदों के होने से नौ प्रकार से है, कि जो कुछ दीखता है, वह सब प्रकृति का ही परिणाम है, और उसको प्रकृति ही करती है। मैं कूटस्थ हूँ—ऐसी प्रकृति के संबन्ध में बुद्धि होने का नाम प्रकृति तुष्टि है, और जो संन्यासी होकर आश्रम ग्रहण रूपी उपादान से तुष्ट मानते हैं, वह उपादान तुष्टि है। जो संन्यासी होकर भी समाधि आदि अनुष्ठानों से बहुत समय में तुष्टि मानते हैं उसे काल तुष्टि कहते हैं, और उसके बाद धर्ममेघ समाधि में जो तुष्टि होती है, उसे भाग्य- तुष्टि कहते हैं। बाह्य पांच प्रकार की तुष्टि इस तरह है कि माला, चन्दन, वनिता ( स्त्री ) आदि के प्राप्त करने में दुःख उत्पन्न होगा,

·( ६६ ) ऐसा करके उनका त्याग करदेना, यह एक प्रकार की तुष्टि हुई। पैदा किये हुये धन को या तो चोर चुरा ले जायँगे या राजा दण्ड देकर छीन लेगा तो बड़ाभारी दुःख उत्पन्न होगा—ऐसा विचार कर जो त्यागना है, यह दूसरी तुष्टि है। यह धनादिक बड़े परिश्रम से संचय किया गया है, इसकी रक्षा करनी योग्य है। व्यर्थ न खोना चाहिये—ऐसा विचार करके जो विषय-वासना से बचना है, इसको तीसरी तुष्टि कहते हैं, भोग के अभ्यास से काम वृद्धि होती है और विषय के न प्राप्त होने से कामियों को बड़ाभारी कष्ट होता है। ऐसा विचार कर जो भोगों से बचना है, यह चौथी तुष्टि का लक्षण है। हिंसा वा दोषों के देखने से उपराम हो जाना, पाँचवीं तुष्टि का लक्षण है। यह पाँच प्रकार की तुष्टियों की व्याख्या केवल उपलक्षण मात्र की गई है। इनकी अवधि यहीं तक न समझकर इसी प्रकार की और भी तुष्टियाँ इन्हीं पाँच प्रकार की तुष्टियों में परिगणित कर लेनी चाहियें। ऊहादिभिः सिद्धिः ॥४४॥ अर्थ—'ऊह' शब्द, अध्ययन और तीनों प्रकार के दुःखों का नाश होना, मित्र का मिलना, दान करना—इस तरह आठ प्रकार की सिद्धि होती है। बिना किसी के उपदेश के पूर्वजन्म के संस्कारों से-तत्व को अपने आप विचारने का नाम ऊह है। दूसरे से सुनकर वा अपने आप शास्त्र को विचार कर जो ज्ञान उत्पन्न किया जाता है, उसका नाम शब्द है। शिष्य और आचार्य- भाव से शास्त्र पढ़कर ज्ञानवान् होने को अध्ययन कहते हैं। यदि कोई दयावान् अपने स्थान पर ही उपदेश देने आया हो, और उसी उपदेश से ज्ञान होगया हो, इसको सुहृत्प्राप्ति कहते हैं और धन आदि देकर ज्ञान का जो प्राप्त करना है, उसको दान कहते हैं, और पूर्वोक्त आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक, तीन

( १०० ) प्रकार के दुःखों के विवरण को शास्त्र के आदि में हम वर्णन कर चुके हैं। प्र०-ऊह आदिकों से ही सिद्धि क्यों मानी जाती है ? क्योंकि बहुतेरे मनुष्य मन्त्रों से अणिमादिक आठ सिद्धि मानते हैं, तब क्या उनका सिद्धान्त मिथ्या होसकता है ? उ०-नेतरादितरहानेन विना ॥ ४५ ॥ अर्थ-ऊहादि पञ्चक के विना मन्त्र आदिकों से तत्व की सिद्धि प्राप्त नहीं होती, क्योंकि वह सिद्धि इतर अर्थात् विपर्य्यय ज्ञान के विना भी प्राप्त होती है; अतएव सांसारिकी सिद्धि होने के कारण यह पारमार्थिकी नहीं कहला सकती। बस यहाँ तक समष्टिसर्ग और प्रत्ययसर्ग समाप्त होगया, इस से आगे “व्य- क्तिभेदः कर्मविशेषात्” इस संक्षेप से कहे हुए सूत्र को विशेष रूप से प्रतिपादन करेंगे। दैवादिप्रभेदा ॥४६॥ अर्थ-दैव आदि सृष्टि के प्रभेद हैं, अर्थात् एक दैवी सृष्टि, दूसरी मनुष्यों की सृष्टि है। यहाँ पर दैव और मनुष्यों के कहने से यह न समझना चाहिये, कि देवता जैसे और साधारण मनुष्य मानते हैं, वही हैं, किन्तु विद्वानों का नाम देव है और जो मिथ्या बोलते हैं वे मनुष्य हैं। किन्नर, गन्धर्व, पिशाच आदि यह सब मनुष्यों के ही भेद हैं, जैसा कि श्रुतियाँ कहती हैं। “सत्यं वै देवा अनृतं मनुष्याः, विद्वां ꣳ सो हि देवाः” इत्यादि। और महर्षि कपिलजी को भी यही बात अभीष्ट (मंजूर) है, जैसाकि उन्होंने आगे ५३ वें सूत्र में प्रतिपादन किया है। अब सृष्टि का प्रयोग कहते हैं- आब्रह्मस्तम्भपर्यन्तं तत्कृते सृष्टिरविवेकात् ॥४७

( १०१ ) अर्थ—ब्राह्मणों से लेकर स्थावरादि तक जितनी सृष्टि है, वह सर्व पुरुष के ही वास्ते है, और उसे भी विवेक के होने तक ही सृष्टि रहती है, बाद को मुक्ति होने से छूट जाती है। अब तीन सूत्रों से सृष्टि के विभाग को कहते हैं— ऊर्ध्वं सत्वविशाला ॥४८॥ अर्थ—जो सृष्टि ऊपर है, वह सत्व-प्रधान है। यहाँपर ऊपर कहने से आचार्य का प्रयोजन ज्ञान के मार्ग से उन्नति करने वालों से है, अर्थात् सतोगुणी उन्नति करते हैं, क्योंकि सतो- गुण प्रकाश करता है, इस कारण सतोगुणी अर्थात् ज्ञानी लोग सदा उन्नति करते हैं, इस कारण ऊपर जाते हैं। तमोविशाला मूलतः ॥४९॥ अर्थ—तमोगुणी अन्तःकरण वाले जीव नीच गति अर्थात् पशु-पक्षी और कीड़े आदि की योनियों को प्राप्त होते हैं। मध्ये रजोविशाला ॥५०॥ अर्थ—और बीच में जो शरीर हैं, वे रजोगुण प्रधान हैं। बीच का शरीर सामान्य मनुष्य का जन्म है, और सब शरीर इसकी अपेक्षा ऊँचे हैं, या नीचे। सामान्य मनुष्य रजोगुणी होता है। सत्पुरुष सतोगुणी, पशु आदि तमोगुणी। इस के अन्दर भी भेद हैं। प्र०—प्रकृति तो एक ही है, लेकिन सृष्टि अनेक तरह की क्यों होती है ? उ०—कर्मवैचित्र्यात् प्रधानचेष्टा गर्भदासवत् ॥५१ अर्थ—यह सब प्रधान अर्थात् प्रकृति की चेष्टा कर्मों की विचित्रता से होती है, इस में दृष्टान्त भी है, जैसे—कोई दासी

( १०२ ) अपने स्वामी के वास्ते नाना प्रकार की चेष्टा ( टहल ) करती है, वैसे ही उसका पुत्र भी अपने स्वामी के प्रसन्नतार्थ नाना प्रकार की चेष्टा करने लगता है, अतएव जो जैसा कर्म करेगा उसकी सृष्टि भी वैसा ही कर्म करेगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है । प्र०—ऊर्ध्व की सृष्टि सत्त्वगुण प्रधान है, तो मनुष्य उसी से कृतार्थ हो सकता है, फिर मोक्ष से क्या करना है ? उ०—आवृत्तिस्तत्राप्युत्तरोत्तरयोनियोगाद्धेयः॥५२ अर्थ—उन ऊपर के और नीचे के देशों में भी आवृत्ति योग रहता है, अर्थात् जब वहाँ गये तब सात्विकी वृत्ति रही, और यहाँ रहे तब वही रजोगुण फिर आगया, और वहाँ भी छोटी बड़ी जातियाँ होती हैं, उनमें जन्म होने से ठीक-ठीक सत्व नहीं रहता ; इस वास्ते ऐसा विचार करना सब तरह छोड़ने योग्य है। और भी इस पक्ष को पुष्ट करते हैं । समानं जरामरणादिजं दुःखम् ॥५३॥ किसी शरीर में हों, चाहे देवता हों, चाहे सामान्य मनुष्य अथवा पशु, पक्षी—बुढ़ापे और मृत्यु का दुःख सब में होता है ; इस कारण सब शरीरों की अपेक्षा मुक्त होना ही उत्तम है । प्र०—जिस से यह शरीर उत्पन्न हुआ है, यदि उसी में लय हो जाय, तब क्या मुक्ति नहीं मानी जायगी ? उ०—न कारणलयात् कृतकृत्या मग्नव- दुत्थानात् ॥५४॥ अर्थ—कारण में लय हो जाने से भी कृतकृत्यता नहीं होती, क्योंकि जैसे मनुष्य जब जल में डूबता है, तो कभी तो ऊपर को आता है, और कभी नीचे को बैठ जाता है । इसी तरह जो मनुष्य कारण में लय हो गया है, कभी जन्म को प्राप्त होता

( १०३ ) है, कभी मरण को प्राप्त होता है, और ऐसा कहने से आचार्य का यह तात्पर्य नहीं है कि मुक्त-जीव कभी जन्म को नहीं प्राप्त होता ; क्योंकि प्रथम तो आचार्य जीव को नित्य मानते हैं, जब उसका कारण ही नहीं तो लय किसमें होगा। दूसरे जो डूबे हुये का दृष्टान्त दिया, अशान्ति का पोपक दिया तथा इस में पराधीनता दिखाई ; किन्तु मुक्त-जीवन तो न अशान्त है न पराये अधीन है। तीसरे यहाँ पर सृष्टि का प्रसंग चला आता है, किन्तु जीव का विषय भी नहीं है ; इसलिये अन्तःकरण के सुषुप्ति में प्रकृति में लय होने से तात्पर्य है। प्र०—जबकि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं, तो प्रकृति ही में सृष्टि का कर्तृत्व क्यों माना जाता है ? उ०—अकार्यत्वेऽपि तद्योगः पारवश्यात् ॥५५॥ अर्थ—यद्यपि प्रकृति और पुरुष दोनों अकार्य अर्थात् नित्य हैं तथापि प्रकृति को ही सृष्टि करने का योग है ; क्योंकि जो परवश होगा वही तो कार्य को करेगा। इस विचार से प्रकृति ही में परवशता दीखती है। प्र०—स हि सर्ववित् सर्वकर्त्ता ॥५६॥ अर्थ—यदि प्रकृतिरूपी पदार्थ को सर्वज्ञ और सर्ववित् ( "विद् सत्तायाम्" इस धातु का प्रयोग है ) सर्वशक्तिमान् मान लिया जाय तो क्या हानि है ? उ०—ईदृशेश्वरसिद्धिः सिद्धा ॥ ५७ ॥ अर्थ—इस तरह वेद के प्रमाणों से ईश्वर को सिद्धि सिद्ध है। प्रकृति में सर्वज्ञत्वादि गुण तो किसी सूरत में नहीं हो सकते हैं, सर्वज्ञत्वादि गुण तो ईश्वर ही में हैं। प्र०—प्रकृति ने सृष्टि को क्यों पैदा किया ?