भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] ४ संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता तथा ज्ञानका उत्तम माहात्म्य * ८३

श्रीराम ! संसाररूपी विषके आवेशसे उत्पन्न हुई विषूचिका बड़ी दुस्सह होती है। विषनिवारक गारुडमन्त्रसे ही उसका समूल नाश होता है। जीव और ब्रह्मका एकात्मबोध ही वह गारुडमन्त्र है। वही परमार्थज्ञानका भी मूलमन्त्र है। सत्पुरुषोंके साथ शास्त्रानुशीलन करनेसे निःसन्देह उस योगकी प्राप्ति होती है।

शास्त्रचिन्तन करनेपर इसी जन्ममें अवश्य ही सम्पूर्ण दुःखोंका समूल विनाश होता है—ऐसा मानना चाहिये; इसलिये उन विवेकशील सत्पुरुषोंको अवहेलनाकी दृष्टिसे नहीं देखना चाहिये। जिस विवेकी पुरुषको सम्यग्दृष्टिकी उपलब्धि हो चुकी है, वह पुरानी केंचुलका त्याग करके संतापरहित हुए सर्पकी भाँति मानसिक व्यथाओंसे परिपूर्ण इस संसारके अनुरागका परित्याग करके संतापरहित हो जाता है। उसका अन्तःकरण शीतल हो जाता है। वह सम्पूर्ण जगत्को विनोदपूर्वक इन्द्रजालकी तरह सुखरूप देखता है; परन्तु जो उस सम्यग्दृष्टिसे रहित है, उसके लिये यह संसार परम दुःखदायी ही है। यह संसारानुराग बड़ा ही कष्टदायक है। यह अनर्थकी आशङ्का किये बिना ही मोहवश विषयोंमें फँसे हुए पुरुषोंको सर्पकी तरह डँस लेता है, खड्गकी भाँति काट डालता है, भालेके समान बेध देता है, रस्सीकी तरह आवेष्टित कर लेता है, आगके सदृश जला देता है, रात्रिकी तरह अंधा बना देता है, सिरपर गिरे हुए पत्थरके समान मूर्च्छित कर देता है, विचार-शक्तिको हर लेता है, मर्यादाका विनाश कर देता है और मोहरूपी अन्धकूपमें गिरा देता है। तृष्णा तुम्हें जर्जर कर देती है। अधिक क्या, संसारमें ऐसा कोई दुःख नहीं है जो संसारी मनुष्यको तृष्णासे न प्राप्त होता हो। यह विषयमोहरूपिणी विषूचिका दुष्परिणामवाली है। यह नरक-नगररूप शरीर-समुदायके साथ अनुराग उत्पन्न करनेवाली है। यदि इसकी चिकित्सा न की जाय तो यह अवश्य ही उन-उन हजारों नारकीय दुर्गत्तियोंको प्राप्ति कराती है, जहाँ नरकोंमें पाषाणभक्षण, खड्गद्वारा अङ्गोंका छेदन, पर्वतशिखरसे निपातन, पत्थरद्वारा घट्टन और अग्निदाहको हिमाभिषेककी भाँति, अङ्गोंके झुलसनेको चन्दनके लेपकी तरह, असिपत्रवाले वृक्षोंके वनमें दौड़ने, कीड़ोंके द्वारा शरीरमें छिद्र किये जाने और लोहेकी गरम जंजीरोंद्वारा देहके लपेटनेको शरीर-रक्षाके समान, युद्धमें काम आनेवाले अग्नि-बुझे बाणोंकी धारावाहिक वृष्टिको ग्रीष्मऋतुमें विनोदके लिये किये गये जलयन्त्रोंके फुब्बारोंकी बूँद-वर्षाके सदृश, सिरके काटे जानेको सुखनिद्राके तुल्य, मुख बंद करके बलपूर्वक किये गये मूकीभावको स्वाभाविक मुखमुद्राके समान और अकिञ्चित्करताको महती सम्पद्वृद्धिकी तरह सहन करना पड़ता है। राघव ! इस प्रकार सहस्रों कष्टप्रद चेष्टाओंसे परिपूर्ण इस दारुण संसारचक्रमें उपर्युक्त उपदेशकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; बल्कि ऐसा विचार और निश्चय अवश्य करना चाहिये कि शास्त्रानुशीलनसे निश्चय ही कल्याण होता है। सत्पुरुषोंके साथ शास्त्रचिन्तन करनेसे जिसका देहाभिमान नष्ट हो गया है, उसे तत्त्वका ज्ञान हो जानेसे सर्वव्यापक आत्माका स्वरूप विदित हो जाता है। वह शुद्ध बुद्धिद्वारा परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है और अज्ञानरूपी घने बादलके विलीन हो जानेपर उसके मोहका विनाश हो जाता है। फिर तो उसके लिये यह जगत्में विचरण करना रमणीय हो जाता है।

श्रीराम ! जिन्हें आत्मस्वरूपका ज्ञान हो गया है, ऐसे उत्तम बुद्धिसम्पन्न महापुरुष इस पूर्वोक्त दृष्टिका अवलम्बन करके इस संसारमें विचरते हैं। उन्हें न शोक होता है, न कामना होती है और न वे शुभाशुभकी याचना ही करते हैं। वे इस संसारमें सब कुछ करते हुए भी अकर्त्ताके समान रहते हैं। वे हेय और उपादेयके पक्षपातसे रहित होकर अपने आत्मामें स्थित रहते हैं, पवित्रतासे रहते हैं और सत्-शास्त्रोंमें प्रतिपादित स्वच्छ कर्म करते हुए सन्मार्गपर चलते हैं। अन्य लोगोंकी दृष्टिसे वे सोते हैं,

८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जाते हैं, कर्म करते हैं और बोलते हैं; परन्तु वास्तवमें वे न आते हैं न जाते हैं, न कर्म करते हैं और न बोलते ही हैं। क्योंकि परमानन्दस्वरूप परमात्माको प्राप्त हुआ पुरुष न तो इन्द्रजालरूप मायिक कार्य करता है और न सांसारिक वासनाओंके पीछे ही दौड़ता है। वह बालकोंकी-सी भ्रममूलक चपलताका परित्याग करके पूर्वकथित परमात्माके स्वरूपमें ही सदा विराजमान रहता है। इस प्रकारकी स्थितियाँ आत्मतत्त्वके साक्षात्कारके अतिरिक्त अन्य उपायसे नहीं उपलब्ध होतीं। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह जीवनपर्यन्त आत्माकी ही खोज करे, उसीकी उपासना करे और उसीका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे। इसके अतिरिक्त उसके लिये और कोई कर्तव्य नहीं है।

जिस पुरुषको अपने अनुभव, शास्त्रवचन और गुरुके उपदेशकी एकवाक्यताका निश्चय हो गया है वह निरन्तर किये गये उपर्युक्त अभ्यासके द्वारा परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है। चाहे भारी-से-भारी आपत्ति क्यों न आ पड़े, परन्तु जो शास्त्र और उसके अर्थकी अवहेलना करनेवाले तथा तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंकी अवज्ञा करनेवाले हैं—ऐसे मूर्खोंका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। क्योंकि भूतलपर मनुष्योंको जितना कष्ट अपने शरीरमें स्थित अकेली मूर्खतासे प्राप्त होता है, उतना दुःख शारीरिक क्लेश, विष, आपत्ति और मानसिक व्यथाएँ नहीं दे सकतीं। जिनकी बुद्धि कुछ भी उत्तम संस्कारोंसे संस्कृत हो चुकी है, उनकी मूर्खताका विनाश करनेमें जैसा यह शास्त्र समर्थ है, वैसा अन्य कोई शास्त्र नहीं है। जैसे खैरसे काँटे उत्पन्न होते हैं, उसी तरह जितनी दुस्तर आपत्तियाँ और अधम कुत्सित योनियाँ हैं, वे सभी मूर्खतासे पैदा होती हैं। जिस संसारी पुरुषको मोक्षके उपायभूत इस शास्त्ररूप प्रकाशकी प्राप्ति हो गयी है वह मोहान्धकारमें भी पुनः अन्धताको नहीं प्राप्त होता। तृष्णा मानवरूपी कमलको तभीतक संकुचित करती है, जबतक विवेकरूपी सूर्यकी निर्मल प्रभाका उदय नहीं होता। रघुनन्दन ! जैसे इस संसारमें भगवान् विष्णु एवं शंकर आदि तथा अन्यान्य महर्षिगण जीवन्मुक्त हो विचरते रहते हैं, उसी प्रकार तुम भी सांसारिक दुःखसे छुटकारा पानेके लिये मेरे-जैसे आत्मीयजनोंके साथ बैठकर गुरूपदेश एवं शास्त्रप्रमाणद्वारा अपने स्वरूप-को जानकर जगत्में विहार करो। इस जगत्में सुख तो तुच्छ-से-तुच्छ तिनकेके सदृश है, परंतु दुःखोंका तो अन्त ही नहीं है; इसलिये जो दुःखरूप परिणामसे परिपूर्ण है, उन लौकिक सुखोंमें आस्था नहीं करनी चाहिये।

ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह परम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये जो अनन्त और आयासरहित है, उस परम पदको प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करे; क्योंकि जिनका मन संतापरहित होकर सर्वोत्कृष्ट परम पदरूप परमात्मामें लीन हो गया है, वे ही पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं और उन्हींको परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। जो दुरात्मा पुरुष राज्य आदि जागतिक सुखोंके उपलब्ध होनेपर उनके उत्तम भोगोंके आस्वादनमात्रसे ही तृप्त बने रहते हैं, उन्हें तो तुम अंधे मेढक समझो।* जिनकी बुद्धि अज्ञानके कारण मन्द पड़ गयी है, वे मूर्ख वञ्चकों, प्रबल दुराचारियों, लौकिक भोगोंमें रचे-पचे रहनेवालों और मित्रका-सा व्यवहार करनेवाले शत्रुओंमें आसक्ति करने लगते हैं, जिससे उन्हें एक संकटसे दूसरे संकटकी, एक दुःखसे दूसरे दुःखकी, एक भयसे दूसरे भयकी और एक नरकसे दूसरे नरककी प्राप्ति होती रहती है।† इसलिये उत्तम विवेकका आश्रय


* संभोगाशनमात्रेण राज्यादिषु सुखेषु च।
संतुष्टा दुष्टमनसो विद्धि तानन्धदर्दुरान् ॥
( मुमुक्षु० १३ । २६ )
† ये शठेषु दुरन्तेषु दुष्कृतारम्भशालिषु ।
द्विपत्सु मित्ररूपेषु भक्ता वै भोगभोगिषु ॥
ते यान्ति दुर्गमाद् दुर्गं दुःखाद् दुःखं भयाद्भयम् ।
नरकान्नरकं मूढा मोहमन्थरबुद्धयः ॥
( मुमुक्षु० १३ । २७-२८ )

१०—विचार, संतोष और सत्समागमका विशेष-रूपसे वर्णन तथा चारों गुणोंमेंसे एक ही गुणके सेवनसे सद्गतिका कथन

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता तथा ज्ञानका उत्तम माहात्म्य *


लेकर अभ्यास और वैराग्यके सहयोगसे दुःखरूपिणी इस भयंकर संसार-नदीको पार करना चाहिये। जिसे प्राप्त कर लेनेपर पुनर्जन्म नहीं होता और जहाँ पहुँच जानेपर शोकका अस्तित्व मिट जाता है, वह परम पद ज्ञानद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है — इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। इस संसारमें जब पुरुषकी शीघ्र मोक्ष-प्राप्तिके उपायके चिन्तनमें प्रवृत्ति होती है, तब वह मोक्षप्राप्तिका पात्र कहा जाता है। उस प्रवृत्तिके प्राप्त हो जानेपर उत्तम कैवल्य-पदकी प्राप्तिमें कष्ट नहीं उठाना पड़ता। उस केवलरूप परमात्माकी प्राप्तिमें धन-सम्पत्ति, मित्र, भाई-बन्धु, हाथ-पैरका संचालन, देशान्तरगमन, शारीरिक कष्ट-सहन और तीर्थसेवन आदि उपकारी नहीं हो सकते। वह तो एक मात्र पुरुषार्थसे साध्य केवल परमात्माकी प्राप्तिकी वासनारूप कर्मसे एवं मनोजयसे प्राप्त किया जा सकता है। सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य आसनपर बैठकर उस परब्रह्मका चिन्तन करनेवाले पुरुषको उपर्युक्त परमपदकी प्राप्ति हो जाती है। फिर तो उसे न शोक करना पड़ता है और न संसारमें उसका पुनर्जन्म ही होता है। जैसे मृगतृष्णामें जलाभास दीखता है, वास्तवमें वहाँ जल नहीं रहता, उसी तरह स्वर्गलोक और मनुष्य-लोकके सम्पूर्ण भावोंके विनाशी होनेके कारण इन दोनों लोकोंमें वास्तविक सुख नहीं है।

इसलिये जो शम और संतोषका साधन है, उस मनोजयकी प्राप्तिके लिये उपाय सोचना चाहिये। उससे वह आनन्द उपलब्ध होता है, जो परमात्माके साथ ऐकात्म्य-सम्बन्धसे मिलता है। अतः देवता, दानव, राक्षस और मनुष्यको बैठते, चलते, गिरते-पड़ते अथवा घूमते हुए सदा ही मनोजय-जनित उस परम सुखको अवश्य प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि वह शान्तिरूप विकसित पुष्पोंसे लदे हुए विवेकरूप महान् वृक्षका फल है। पूर्णरूपसे शान्त मन अत्यन्त निर्मल और भ्रमरहित हो जाता है। उस विश्रान्त मनमें किसी प्रकारकी स्पृहा नहीं रह जाती। उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते [हैं।] उस समय वह न तो किसी वस्तुकी अभिलाषा [करता] है और न किसीका त्याग ही करता है।

राघव ! अब मोक्षद्वारपर स्थित रहनेवाले [चार] द्वारपालोंको क्रमशः सुनो, जिनमेंसे एकके प्रति प्रीति हो जानेसे मोक्षद्वारमें प्रविष्ट होनेका अधिकार] प्राप्त हो जाता है। शम मङ्गलमय, शान्तिदायक [और] भ्रमका निराकरण करनेवाला है। शमसे परम कल्याण] की प्राप्ति होती है और शम ही परम पद है। [शमकी] प्राप्तिसे पूर्णतया तृप्त हुए जिस पुरुषका चित्त शमयुक्त] होनेके कारण शीतल एवं निर्मल हो गया है, [उसका] शत्रु भी मित्र बन जाता है। जैसे चन्द्रोदय [से] क्षीरसागरकी शुभ्रता बढ़ जाती है, उसी प्रकार [जिनका] चित्त शमरूपी चन्द्रमासे भलीभाँति शोभित हो [रहा] है, उनकी परम शुद्धताकी अभिवृद्धि होती है। [जिनके] कलङ्करहित मुखचन्द्रमें शमश्री शोभित होती [है, वे] अपने गुणरूप सौन्दर्यसे दूसरेकी इन्द्रियोंको वश [में कर] लेते हैं तथा वे ही कुलीनशिरोमणि एवं वन्दनीय [हैं।] त्रिलोकीकी राज्यलक्ष्मी भी वैसा आनन्द नहीं [प्रदान] कर सकती, जैसी आनन्ददायिनी साम्राज्य-स[म्पत्तिके] सदृश शम-विभूतियाँ होती हैं। लोकमें जितने [शोक,] जितनी दुःसह तृष्णाएँ और जितनी दुःख[प्रद] मानसिक व्यथाएँ हैं, वे सब शान्तचित्तवाले [पुरुषके] निकट जाकर वैसे ही विलीन हो जाती हैं, जैसे [सूर्यकी] किरणोंके सम्पर्कसे अन्धकारका विनाश हो जाता है।] शमपरायण पुरुषके दर्शनसे समस्त प्राणियोंका मन जैसा] आह्लादपूर्ण एवं प्रसन्न होता है, वैसा चन्द्रमाके [दर्शनसे भी] नहीं होता। इस जगत्में जैसे अपनी मातापर [प्राणियोंको] विश्वास रहता है, उसी प्रकार शमयुक्त पुरुषपर [—चाहे वह दुष्ट हो] अथवा धर्मात्मा—सभी प्राणी विश्वास करते [हैं।] इसलिये रघुकुलभूषण राम ! तुम भी अपने मन[को] समस्त शारीरिक क्लेशों तथा मानसिक [दुःखोंसे...]

८६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कम्पित और तृष्णारूपी रस्सीसे आबद्ध है, शमरूपी अमृतके अभिषेकसे प्रकृतस्थ करो; क्योंकि जो शमनिष्ठ है, उस पुरुषसे पिशाच, राक्षस, दैत्य, शत्रु, व्याघ्र अथवा सर्प—कोई भी द्वेष नहीं करते ।

जिसके समस्त अङ्ग उत्कृष्ट शमरूपी अमृत-कवचसे भली-भाँति सुरक्षित हैं, उसे दुःख उसी प्रकार पीड़ा नहीं पहुँचा सकते, जैसे बाण हीरेको बेधनेमें असमर्थ होते हैं । निर्मल तथा शमविभूषित समबुद्धिसे पुरुषकी जैसी शोभा होती है, वह शोभा अन्तःपुरमें विराजमान राजाको भी नसीब नहीं होती । शमयुक्त अन्तःकरणवाले पुरुषका दर्शन करनेसे मनुष्यको जो शान्ति प्राप्त होती है, वह प्राणोंसे भी अधिक प्रिय स्वजनके मिलनेसे भी नहीं उपलब्ध होती । इस लोकमें जो शमसे सुशोभित तथा लोगोंद्वारा प्रशंसित समवृत्तिसे सबके साथ उत्तम बर्ताव करता है, उसीका जीवन सार्थक है; इसके विपरीतका जीवन तो निरर्थक ही है। जिसका मन उद्दण्डतारहित हो गया है, ऐसा शमपरायण श्रेष्ठ पुरुष जो कर्म करता है, उसके उस कर्मकी ये समस्त प्राणी प्रशंसा करते हैं ।

जो पुरुष प्रिय और अप्रियको सुनकर, स्पर्शकर, देखकर, खाकर और सूँघकर न तो हर्षित होता है और न खिन्न होता है, वह 'शान्त' कहा जाता है। जो प्रयत्नपूर्वक इन्द्रियोंको अपने वशमें करके समस्त प्राणियोंके साथ समतापूर्ण व्यवहार करता है तथा न तो भविष्यकी आकाङ्क्षा करता है और न प्राप्तका परित्याग करता है, वह 'शान्त' कहलाता है । जिसका मन मरण, उत्सव और युद्धके अवसरपर भी व्याकुल न होकर चन्द्रमण्डलके समान निर्मल आभासे युक्त रहता है, वह 'शान्त' कहा जाता है । हर्ष और कोपका अवसर उपस्थित होनेपर भी जो पुरुष वहाँ अनुपस्थितके समान न तो हर्षको प्राप्त होता है और न क्रोध ही करता है, बल्कि उसका मन गाढ़ निद्रामें सोये हुए पुरुषके मनके समान निर्विकार रहता है, वह 'शान्त' पदसे व्यवहृत होता है । जिसकी अमृत-प्रवाहके सदृश सुखदायिनी तथा प्रेमपूर्ण दृष्टि सभी प्राणियोंपर समानरूपसे पड़ती है, उसकी 'शान्त' संज्ञा होती है । जिसका अन्तःकरण शीतल हो गया है एवं जिसकी बुद्धि मोहाच्छन्न नहीं है तथा जो लौकिक विषयोंके साथ व्यवहार करता हुआ भी उनमें आसक्त नहीं होता, उसे लोग 'शान्त' कहते हैं । सम्यक् प्रकारसे व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषकी बुद्धि आकाशके सदृश निर्विकार रहती है, राग-द्वेषरूप कलङ्कसे लिप्त नहीं होती, उसे 'शान्त' कहा जाता है ।

तपस्वियों, विद्वानों, याजको, नरेशों, बलवानो और गुणियोंके समुदायमें शमयुक्त पुरुषकी ही विशेष शोभा होती है । जिन गुणशाली महापुरुषोंका मन शममें आसक्त हो गया है, उनके चित्तसे निवृत्तिका उदय होता है, ठीक उसी तरह जैसे चन्द्रमासे चाँदनी प्रकट होती है । जो गुणसमूहोंकी परमावधि है तथा जो पुरुषार्थका मुख्य भूषण है, वह श्रीसम्पन्न शम संकटों तथा सम्पूर्ण स्थानोंमें भी अपने प्रभावसे सुशोभित होता रहता है । रघुनन्दन ! जिसका अन्य पुरुष अपहरण नहीं कर सकते, जो पूज्य जनोंद्वारा सावधानी-के साथ सुरक्षित एवं अमृतस्वरूप है, उस शमरूप उत्कृष्ट साधनका आश्रय लेकर बहुत-से महानुभाव जिस क्रमसे परम पदको प्राप्त हो चुके हैं, तुम भी परम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये उसी क्रमका अनुसरण करो ।

(सर्ग १२-१३)

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन * ८७

विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन तथा चारों गुणोंमेंसे एक ही गुणके सेवनसे सद्गतिका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! ( विषय, संदेह, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त और प्रयोजनरूप ) कारणोंके ज्ञाता पुरुषको शास्त्रज्ञानसे निर्मल हुई अतएव परम पवित्र बुद्धिद्वारा निरन्तर आत्मचिन्तन करना चाहिये; क्योंकि आत्मविषयक विचार करनेसे बुद्धि तीव्र होकर परम पदका साक्षात्कार कर लेती है। संसाररूपी महारोगके लिये विचार ही महौषध है। जो अनन्त कामनारूपी पल्लवोंसे सुशोभित है, ऐसा आपत्तिरूपी वन विचाररूपी आरेसे काट दिये जानेपर पुनः अङ्कुरित नहीं होता। लौकिक दुःखसे पार होनेके लिये विद्वानोंके पास विचारके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है। सत्पुरुषोंकी बुद्धि विचारसे अशुभका परित्याग करके शुभको प्राप्त होती है। बुद्धिमानोंके बल, बुद्धि, सामर्थ्य, कर्तव्यका ज्ञान, क्रिया और उसका फल—ये सभी विचारसे ही सफल होते हैं। अतः जो उचित-अनुचितके रहस्योद्घाटनके लिये महान् दीपकके समान है तथा अभीष्टकी सिद्धि करनेवाला है, उस उत्कृष्ट विचारका आश्रय लेकर संसार-सागरको पार करना चाहिये। क्योंकि विशुद्ध विचाररूपी सिंह हृदयस्थित विवेकरूपी कमलोंको उखाड़ फेंकनेवाले महामोहरूपी गजराजोंको विदीर्ण कर डालता है। जो लोग विचारका अभ्युदय करनेवाली बुद्धिद्वारा सबके साथ व्यवहार करते हैं, वे निश्चय ही अत्यन्त श्रेष्ठ फलोंके भागी होते हैं। सद्विचारपरायण मनुष्य अत्यन्त विस्तृत महान् आपत्तियोंसे युक्त मोहकी परिस्थितियोंमें उसी प्रकार निमग्न नहीं होता, जैसे सूर्य अन्धकारमें नहीं डूबते। जितने क्रूर कर्म, निषिद्धाचरण और कुत्सित मानसिक कष्ट हैं, वे सभी विचारहीनतासे ही आविर्भूत होते हैं। जिस अधिकारी पुरुषका मन आशाकी परवशतासे रहित और विचारयुक्त है, वह पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति अपने आत्मामें परमानन्दका अनुभव करता है। जब मनमें विवेकशीलताका उदय होता है, तब वह सारे विश्वको शीतल एवं सुशोभित करनेवाली चन्द्रमाकी चाँदनीकी भाँति सबको अत्यन्त शीतल और अलंकृत कर देती है। जगत्‌के सारे पदार्थ तभीतक सत्यकी तरह रमणीय प्रतीत होते हैं, जबतक विचार नहीं किया जाता। वस्तुतः उनका कोई अस्तित्व नहीं है, अतः विचार करनेपर वे नष्ट हो जाते हैं। जो समस्वरूप, आनन्दमय, अक्षय, अनन्त और अनन्याधीन है, उस कैवल्य पदको तुम विचाररूप महान् वृक्षका फल समझो। जो चित्तमें स्थित होकर उत्तम अचल स्थिति प्रदान करनेवाली है, उस आत्म-विचाररूपी महौषधिसे युक्त श्रेष्ठ पुरुष न तो अप्राप्तकी आकाङ्क्षा करता है और न प्राप्तका परित्याग ही। विचारशील पुरुष गयी हुई वस्तुकी उपेक्षा कर देता है और प्राप्त वस्तुका शास्त्रानुसार उपयोग करता है। वह मनकी प्रतिकूलतामें न तो क्षुब्ध होता है और न अनुकूलतामें प्रसन्न ही। उस समय जलसे परिपूर्ण सागरकी तरह उसकी शोभा होती है। इस प्रकार जिन उदाराशय महात्मा योगियोंका मन पूर्णकाम हो गया है, वे जीवन्मुक्त होकर इस जगत्‌में विचरण करते हैं। बुद्धिमान् पुरुषको आपत्तिकालमें भी 'मैं कौन हूँ ! यह संसार किसका है ?' यों उसके प्रतीकारके लिये प्रयत्नपूर्वक विचार करना चाहिये। जैसे रात्रिमें भूतलपर पदार्थोंका ज्ञान दीपकसे होता है, उसी प्रकार परमात्मस्वरूपमें स्थिति प्राप्त करनेके लिये वेद-वेदान्तके सिद्धान्तोंकी स्थितियोंका निर्णय विचारद्वारा होता है। विचाररूपी सुन्दर नेत्र अन्धकारमें नष्ट नहीं होता, उग्र तेजस्वी सूर्य आदिकी ओर देखनेपर भी उसकी ज्योति प्रतिहत नहीं होती और वह व्यवधानयुक्त पदार्थोंको

११—प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन, ग्रन्थकी प्रशंसा, शान्ति, ब्रह्म, द्रष्टा और दृश्यका विवेचन, परस्पर सहायक प्रज्ञा और सदाचारका वर्णन

८८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भी देख लेता है। यह विचार-चमत्कृति परमात्ममयी, आदरणीया और परमानन्दकी एकमात्र साधिका है; अतः एक क्षणके लिये भी इसका परित्याग नहीं करना चाहिये। जैसे पक जानेके कारण मधुर रससे परिपूर्ण आमका फल सबके लिये रुचिकर होता है, उसी तरह उत्तम विचारसे युक्त पुरुष, सामान्य जनोंकी तो बात ही क्या, महापुरुषोंके लिये भी आदरणीय हो जाता है। विचारद्वारा जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो गयी है और विचारसे ही जिन्हें ज्ञानमार्गमें जानेकी युक्ति ज्ञात है, वे मनुष्य नाना प्रकारके दुःखरूप गड्ढोंमें बार-बार नहीं गिरते अर्थात् आवागमनसे मुक्त हो जाते हैं। सैकड़ों अनर्थोंके संयोगसे जिसका शरीर जर्जर हो गया है तथा जो रोगग्रस्त है, वह वैसा रुदन नहीं करता, जैसा वह मूर्ख विलाप करता है, जिसने विचारहीनतासे अपने आत्माका हनन कर दिया है। विचारहीनता सारे अनर्थोंका निजी निवासस्थान है। सभी सत्पुरुष उसका तिरस्कार करते हैं और वह सारी दुर्गतियोंकी चरम सीमा है, अतः उसका परित्याग कर देना चाहिये। विचारपूर्वक स्वयं ही अपनी बुद्धिद्वारा अपने मनको वशमें करके मोहमय संसारसागरसे अपने मनरूपी मृगका उद्धार करना चाहिये। मैं कौन हूँ और यह संसारनामक दोष मेरे निकट कैसे आ गया—इस विषयमें न्यायपूर्वक किया गया अनुसंधान 'विचार' कहलाता है। रघुनन्दन ! इस जगत्में सत्यके ग्रहण और असत्यके त्यागकी बुद्धिसे सम्पन्न पुरुषोंको विचारके बिना उत्तम तत्त्वका कुछ भी ज्ञान नहीं होता। विचारसे ही तत्त्वका ज्ञान होता है, तत्त्वज्ञानसे मनकी निश्चलता प्राप्त होती है और मनके शान्त हो जानेसे सम्पूर्ण दुःखोंका सर्वथा विनाश हो जाता है। भूतलपर सभी लोग स्पष्ट विचारदृष्टिसे ही समस्त कर्मोंकी सफलता लाभ करते हैं तथा उत्तम परमात्मसाक्षात्कारतां भी विचारसे ही उपलब्ध होती है, इसलिये श्रीराम ! शमादि साधनसम्पन्न तुम्हें उपर्युक्त विचारशीलता रुचिकर होनी चाहिये।

परंतप राम ! संतोष ही परम श्रेय है और संतोष परम सुख भी कहा जाता है। संतोषयुक्त पुरुष परम विश्रामको प्राप्त होता है। जो संतोषरूपी ऐश्वर्यके सुखसे सम्पन्न हैं तथा जिनका चित्त निरन्तर विश्रामपूर्ण रहता है, ऐसे शान्त पुरुषोंको विशाल साम्राज्य भी पुराने घासके टुकड़ेके समान प्रतीत होता है। श्रीराम ! संतोषयुक्त बुद्धि संसारकी विषम परिस्थितियोंमें भी न तो उद्विग्न होती है और न कभी उसका विनाश ही होता है। जो शान्त पुरुष संतोषामृतके पानसे पूर्णतः तृप्त हो चुके हैं, उनके लिये यह अपरिमित भोगसम्पत्ति विष-सी जान पड़ती है। रागादि दोषोंका विनाशक तथा अत्यन्त मधुर आस्वादसे युक्त संतोष जैसा सुखद होता है, वैसा सुख ये अमृतरसकी लहरियाँ नहीं दे सकतीं। जो अप्राप्त वस्तुकी आकाङ्क्षाका परित्याग करके प्राप्त हुई वस्तुमें समभाव रखनेवाला है तथा जिसमें हर्ष-शोकके विकार परिलक्षित नहीं होते, वह मनुष्य इस लोकमें संतुष्ट कहा जाता है। जबतक मन आत्माके द्वारा आत्मामें संतुष्ट नहीं हो जाता, तबतक उस मनरूपी गड्ढेसे उसी प्रकार आपत्तियाँ उद्भूत होती रहती हैं, जैसे गड्ढेसे लताएँ। संतोषसे शीतल हुआ मन विशुद्ध विज्ञानकी दृष्टियोंसे अत्यन्त विकासको प्राप्त होता है—ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कसे कमल विकसित हो जाता है। जैसे मलिन दर्पणमें मुखकी छाया नहीं दीखती, उसी प्रकार आशाकी परवशतासे व्याकुल एवं संतोषरहित चित्तमें ज्ञानका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता। जिसका मन शारीरिक तथा मानसिक क्लेशोंसे मुक्त एवं संतुष्ट है, वह प्राणी दरिद्र होते हुए भी सच्चे साम्राज्यसुखका उपभोग करता है। अपने आत्मामें आत्मासे ही स्वयं सम्यक् प्रकारसे निरतिशय पूर्णानन्दका आश्रय लेकर पुरुषार्थद्वारा प्रयत्नपूर्वक सभी विषयोंमें तृष्णा-

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन * ८९


का परित्याग कर देना चाहिये। चन्द्रमाकी भाँति संतोषामृतसे परिपूर्ण मनुष्यका मन शान्त एवं शीतल बुद्धिद्वारा स्वयं ही शाश्वती स्थिरताको प्राप्त हो जाता है। जब संतोषसे सम्पन्न पुरुष अपने आत्मामें आत्माद्वारा स्वस्वरूपसे स्थित हो जाता है, उस समय उसकी सारी मानसिक व्यथाएँ उसी प्रकार अपने-आप शीघ्र ही समूल विनष्ट हो जाती हैं, जैसे वर्षा-ऋतुमें धूल शान्त हो जाती है। श्रीराम ! जिसकी वृत्ति सदा शीतल और कलङ्कसे सर्वथा रहित है, वह पुरुष अपनी उस शुद्ध वृत्तिद्वारा चन्द्रमाकी भाँति पूर्णतया शोभित होता है। रघुनन्दन ! इस जगत्में जो पुरुषश्रेष्ठ गुणी पुरुषोंद्वारा अभिमत समतासे सुशोभित है, उस विशुद्ध पुरुषको आकाशचारी देवता और महामुनि भी प्रणाम करते हैं।

महाबुद्धिमान् राम ! इस संसारमें श्रेष्ठ संत-समागम मनुष्योंका संसार-सागरसे उबारनेमें सर्वत्र विशेषरूपसे उपकार करता है। जो महात्मा पुरुष सत्संगतिरूपी वृक्षसे उत्पन्न हुए विवेक नामक निर्मल पुष्पकी रक्षा करते हैं, वे मोक्ष-फलरूपी सम्पत्तिके अधिकारी होते हैं। जो आपत्तीरूपी कमलिनीके लिये हिम और मोहरूपी कुहरेके लिये वायुके समान है, वह उत्तम संत-समागम ही इस जगत्में सर्वोत्कृष्ट है। श्रीराम ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि संत-समागम विशेषरूपसे बुद्धिपूर्वक, अज्ञानरूपी वृक्षका उच्छेदक और मानसिक व्यथाओंको दूर भगानेवाला है। सत्सङ्गसे प्राप्त हुई दिव्य विभूतियाँ ऐसा परम उत्तम निर्वाण-सुख प्रदान करती हैं, जो सतत वर्धनशील, अविनाशी और बाधारहित होता है। अतएव अत्यन्त कष्टदायिनी दशामें पड़कर विवशताको प्राप्त हुए मनुष्योंको भी थोड़े समयके लिये भी सत्संगतिका परित्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि लोकमें सत्संगति सन्मार्गको प्रकाशित करनेवाली और हृदयान्धकारको दूर करनेके लिये ज्ञानरूपी सूर्यकी प्रभा है। जिसने सत्संगतिरूपी गङ्गामें, जो शीतल एवं निर्मल है, स्नान कर लिया, उसे दान, तीर्थ, तप और यज्ञोंसे क्या लेना है अर्थात् सत्संगति इन सबसे बढ़कर है। जो रागशून्य और संशयरहित हैं तथा जिनकी चिज्जड-ग्रन्थियाँ विनष्ट हो चुकी हैं, ऐसे सत पुरुष यदि लोकमें विद्यमान हैं तो तप एवं तीर्थोंके संग्रहसे क्या लाभ ! अर्थात् वह फल तो उन संतोंकी संगतिसे ही प्राप्त हो सकता है। इसलिये जिनकी चिज्जडग्रन्थियोंका विनाश हो गया है एवं जो ब्रह्मज्ञानी हैं, उन सर्वसम्मत संतोंकी सभी उपायोंद्वारा भलीभाँति सेवा करनी चाहिये, क्योंकि वे भवसागरसे पार होनेके लिये साधन हैं। किंतु जो लोग नरकाग्निको बुझानेके लिये मेघस्वरूप संतोंको अवहेलनाकी दृष्टिसे देखते हैं, वे स्वयं उस नरकाग्निकी सूखी लकड़ी बन जाते हैं।

संतोष, सत्संगति, विचार और शम—ये ही चारों मनुष्योंके लिये भवसागरसे तरनेके साधन हैं। इनमें संतोष परम लाभ है। सत्संगति परम गति है। विचार उत्तम ज्ञान है और शम परमोत्कृष्ट सुख है। ये चारों संसारका समूल विनाश करनेके लिये विशुद्ध उपाय हैं। जिन्होंने इनका भलीभाँति सेवन किया, वे मोहजलसे परिपूर्ण भवसागरसे पार हो गये। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राम ! इन चारों साधनोंमेंसे विशुद्ध प्रकाशवाले एक ही साधनका अभ्यास हो जानेपर शेष तीनों भी अवश्य अभ्यस्त हो जाते हैं; क्योंकि इनमेंसे एक-एक भी क्रमशः इन चारोंकी जन्मभूमि है। अतः सबकी सिद्धिके लिये यत्नपूर्वक एकका तो पूर्णरूपसे आश्रय लेना ही चाहिये। जैसे प्रशान्त सागरमें जलयान स्वच्छन्द गतिसे चलते हैं, उसी प्रकार शमद्वारा निर्मल हुए हृदयमें सत्समागम, संतोष और विचार उत्तम धारणापूर्वक प्रवृत्त होते हैं। जो प्राणी विचार, संतोष, शम और सत्समागमसे सम्पन्न है, उसे दिव्य ज्ञान-सम्पत्तियाँ उपलब्ध हो जाती हैं—ठीक उसी तरह, जैसे कल्पवृक्षका आश्रय लेनेवाले पुरुषको लौकिक

९० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सम्पत्तियाँ सुलभ होती हैं। पूर्ण चन्द्रमामें परिलक्षित हुए सौन्दर्य आदि गुणोंकी तरह विचार, शम, सत्समागम और संतोषयुक्त मानवमें प्रसाद आदि गुण प्रादुर्भूत हो जाते हैं। जैसे श्रेष्ठ मन्त्रिगणोंसे युक्त राजाके पास विजयलक्ष्मी उपस्थित होती है, उसी तरह जिस पुरुषकी बुद्धि सत्सङ्ग, संतोष, शम और विचारसे युक्त होनेके कारण उत्तम हो गयी है, उसे दिव्य ज्ञान-सम्पत्ति सुलभ हो जाती है। इसलिये रघुनन्दन ! मनुष्यको चाहिये कि वह पुरुषार्थसे मनको वशमें करके इनमेंसे एक गुणका नित्य यत्नपूर्वक उपार्जन करे; क्योंकि जबतक मनुष्य परम पुरुषार्थके आश्रयसे अपने चित्तरूपी गजराजको जीतकर हृदयमें एक गुण भी धारण नहीं कर लेता, तबतक उत्तम गतिकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जिसके चित्तमें उत्तम फलदायक एक ही गुण सुदृढ हो गया है, उसके सारे दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि एक ही गुणकी विशेष वृद्धि होनेपर दोषोंपर विजय प्रदान करनेवाले अनेक गुणोंकी वृद्धि होती है और एक दोषके अधिक बढ़ जानेपर बहुत-से गुण-विनाशक दोष बढ़ जाते हैं। (सर्ग १४—१६)


प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन, ग्रन्थकी प्रशंसा, शान्ति, ब्रह्म, द्रष्टा और दृश्यका विवेचन, परस्पर सहायक प्रज्ञा और सदाचारका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिसका हृदय पूर्वोक्त प्रकारके विवेकसे युक्त है, वही इस जगत्में महान् है और वही ज्ञानोपदेश सुननेका योग्य अधिकारी है—ठीक उसी तरह, जैसे राजा नीति-शास्त्रके श्रवणका उत्तम पात्र होता है। जैसे मेघजालसे रहित शरत्काल-का आकाश चन्द्रमाके लिये योग्य होता है, उसी तरह जो मूर्खोंके सङ्गसे रहित एवं महान् आशयवाला है, वह निर्मल पुरुष विशुद्ध विचारका योग्य भाजन है। श्रीराम ! तुम इस समग्र गुणलक्ष्मीसे सम्पन्न हो; अतः मैं आगे जिसका वर्णन करूँगा, उस मनके मोहको हरनेवाले वाक्यको सुनो। जिसका पुण्यरूपी कल्पवृक्ष फलोंके भारसे अत्यन्त झुका हुआ खड़ा है, वही पुरुष मुक्ति-प्राप्तिके निमित्त इसे श्रवण करनेके लिये उद्योग करता है। अतः उपर्युक्त गुणसम्पन्न पुरुष ही कल्याण-प्राप्तिके लिये पवित्र, उदार तथा परायेको ज्ञान प्रदान करनेवाले वचनोंके सुननेका अधिकारी होता है।

यह संहिता मोक्ष-साधनकी प्रतिपादिका, सारभूत अर्थोंसे परिपूर्ण और मोक्षदायिनी है। इसमें बत्तीस हजार* श्लोक बतलाये जाते हैं। जैसे गाढ निद्राके वशीभूत हुए पुरुषके सामने दीपक जला दिये जानेपर यद्यपि उसे प्रकाशकी कामना नहीं रहती तो भी प्रकाश होता है, उसी प्रकार इस संहिताके परिशीलनसे इच्छा न रहने-पर भी निर्वाणकी प्राप्ति हो जाती है। यह संहिता स्वयं सम्यक् प्रकारसे परिशीलन करके जानी गयी हो अथवा अन्यद्वारा वर्णन किये जाते समय सुनी गयी हो, तो भी पाप-तापकी शान्तिद्वारा सुखकी हेतुभूता


* इस ग्रन्थके छहों प्रकरणोंमें क्रमशः वैराग्यप्रकरणमें ११४५, मुमुक्षुव्यवहारप्रकरणमें ८०७, उत्पत्तिप्रकरणमें ५४०४, स्थितिप्रकरणमें २४०४, उपशमप्रकरणमें ४२७७ और निर्वाणप्रकरणमें १४२७५ श्लोक-संख्या है—इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें श्लोकोंकी संख्या २८३१२ मिलती है। किंतु यहाँ इस सर्गमें, वैराग्यप्रकरणमें १५००, मुमुक्षुव्यवहारप्रकरणमें १०००, उत्पत्तिप्रकरणमें ७०००, स्थितिप्रकरणमें ३०००, उपशमप्रकरणमें ५००० और निर्वाणप्रकरणमें १४५००—इस प्रकार कुल ३२००० श्लोक बताये गये हैं। ग्रन्थमें आये हुए बड़े श्लोकोंके और गद्यभागके अक्षरोंकी सख्याको ३२ अक्षरके एक अनुष्टुप् श्लोकके हिसाबसे गिननेपर यह संख्या प्रायः ठीक हो सकती है।

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९१


देवनदी गङ्गाके समान यह अज्ञानके उपशमद्वारा तुरंत सुख प्रदान करती है । जैसे रस्सीका पूर्ण ज्ञान हो जानेसे उसमें उत्पन्न हुई सर्पभ्रान्ति विनष्ट हो जाती है, उसी तरह इस संहिताके सम्यक् परिशीलनसे संसार- दुःख शान्त हो जाता है । इस संहितामें पृथक्-पृथक् रचे गये छ प्रकरण हैं, जो युक्तियुक्त अर्थवाले वाक्यों- से युक्त और सार-सार दृष्टान्तोंसे भरी हुई सूक्तियोंसे समन्वित हैं । उनमें पहला प्रकरण 'वैराग्य' नामसे कहा गया है, जिसके अध्ययनसे उसी प्रकार विरागकी वृद्धि होती है, जैसे मरुस्थलमें भी जलके सिंचनसे वृक्ष बढ़ता है । जैसे मणिके भलीभाँति मार्जित किये जानेके कारण उत्पन्न हुए प्रकाशसे उसमें निर्मलता प्रकट हो जाती है, उसी तरह डेढ़ हजार श्लोकोंसे युक्त इस वैराग्य- प्रकरणका विचार करनेसे विषयोंके दोषोंका परिज्ञान होनेके कारण उत्पन्न हुए विवेकके प्रकाशसे हृदयमें शुद्धताका उदय हो जाता है । तदनन्तर 'मुमुक्षुव्यवहार' नामक प्रकरणकी रचना की गयी है । इस प्रकरणमें केवल एक हजार श्लोक हैं । युक्तियोंसे भरा होनेके कारण यह अत्यन्त सुन्दर है और इसमें मुमुक्षु पुरुषोंके स्वभावका वर्णन किया गया है । इसके बाद तीसरा 'उत्पत्तिप्रकरण' आता है, जो दृष्टान्त और आख्यायिकाओं- से परिपूर्ण तथा विज्ञानका प्रतिपादक है । उसमें सात हजार श्लोक हैं । इस प्रकरणमें 'अहं' और 'त्वं' जिसका स्वरूप है एवं जो वास्तवमें उत्पन्न न होकर भी प्रकट हुई-सी प्रतीत होती है, द्रष्टा और दृश्यके भेदसे समन्वित उस सांसारिक सम्पत्तिका वर्णन किया गया है । इस प्रकरणके सुननेपर श्रोता इस सम्पूर्ण जगत्को अपने हृदयमें ऐसा समझता है कि यह 'त्वं' और 'अहं'के विस्तारसे युक्त, लोक, पर्वत और आकाशसे समन्वित, संकल्परूपमय नगरके तुल्य क्षणध्वंसी, स्वप्नमें प्राप्त हुए पदार्थोंके समान सत्तारहित, मनोराज्यकी तरह विस्तारवाला, अर्थशून्य होनेके कारण गन्धर्वनगरके सदृश, दो चन्द्रमाओंकी भ्रान्तिके समान मृगतृष्णामें जलभ्रान्तिकी तरह, नौकाके चलनेसे पर्वतादिके संचलन भ्रमकी भाँति चञ्चल और यथार्थ लाभसे रहित है तथा जैसे सुवर्णमें कङ्कण, जलमें तरङ्ग और आकाशमें नीलिमा असत् है, वस्तुतः ये क्रमशः अपने-अपने अधिष्ठानके ही अङ्ग हैं, उसी तरह यह जगत् असत् होकर भी सत्-रूपसे उत्पन्न हुआ है । परमार्थ दृष्टिसे तो यह उस विज्ञानरूपी शरत्कालके आकाशके समान है, जिसका अज्ञानरूपी कुहरा पूर्णरूपसे शान्त हो गया है ।

तत्पश्चात् चौथे 'स्थितिप्रकरण'की अवतारणा की गयी है । इस प्रकरणमें तीन हजार श्लोक हैं और यह व्याख्यान और आख्यायिकाओंसे भरा हुआ है । ब्रह्म ही द्रष्टा और दृश्य भावको स्वीकार करके इस प्रकार जगत्-रूप एवं अहंरूपसे स्थितिको प्राप्त हुआ है— ऐसा इस प्रकरणमें कहा गया है । इसी तरह यह जगद्धम जो दसों दिशाओंके मण्डलकी विशालतासे देदीप्यमान है और चिरकालसे वृद्धिको प्राप्त होता आया है, यह विषय भी उस प्रकरणमें समझाया गया है ।

तदुपरान्त पाँचवाँ 'उपशान्ति' प्रकरण कहा गया है । इसमें पाँच हजार श्लोक हैं । यह परम पावन तथा विविध युक्तियोंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर है । इस प्रकरणमें 'यह जगत् है, यह मैं हूँ, यह तुम हो और यह वह है—यों उत्पन्न हुई भ्रान्ति किस प्रकार पूर्णरूपसे शान्त होती है' यह विषय बहुत-से श्लोकों- द्वारा बतलाया गया है । उपशमप्रकरणका श्रवण करनेसे यह संसार प्रायः शान्त हो जाता है; क्योंकि जिसका भ्रान्त स्वरूप सम्यक् प्रकारसे शान्त हो गया है—ऐसी संसृतिका शतांशमात्र अवशिष्ट रह जाता है ।

तदनन्तर 'निर्वाण' नामक छठे प्रकरणका वर्णन किया गया है । उसमें शेष साढ़े चौदह हजार श्लोक हैं । यह प्रकरण ज्ञानरूपी महान् पुरुषार्थका देनेवाला है । उसे जान लेनेपर सारी कल्पनाएँ शान्त हो जाती

९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


हैं और परमात्माकी प्रतिरूप परम कल्याण हस्तगत हो जाता है। अधिक क्या, उक्त प्रकरणके ज्ञाता पुरुषके सम्पूर्ण सांसारिक भ्रम मिट जाते हैं। वह निर्विषय चैतन्य प्रकाशरूप, विज्ञानस्वरूप, आधि-व्याधियोंसे रहित और आकाशमण्डलके समान निर्विकार हो जाता है। उसकी सभी जगद्-यात्राएँ शान्त हो जाती हैं और वह कृतकृत्य होनेके कारण स्वस्थ हो जाता है। वह प्रकृति एवं प्रकृतिके कार्यभूत सम्पूर्ण विषयोंमें कर्ताके अभिमान और ग्रहण-त्यागकी दृष्टिसे रहित हो जाता है, इसलिये वह देहधारी होते हुए विदेह-सा एव संसारी होनेपर भी असंसारी-सा प्रतीत होता है। उसका अहङ्काररूप पिशाच नष्ट हो जाता है और वह देहयुक्त होते हुए भी शरीर-रहित-सा रहता है। चैतन्यघन परमात्मा अपने अंदर कल्पित आकाशमें प्रत्येक परमाणुमें सहस्रों लोकोंकी रचना करके उन्हें धारण करता है और स्वयं उन्हें देखता है।

श्रीराम ! जैसे उपजाऊ खेतमें उचित समयपर बोये गये उत्तम बीजसे अवश्य ही श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है, उसी तरह इस संहिताको हृदयगम कर लेनेसे परमार्थ-विषयक ज्ञान सुलभ हो जाता है। जैसे प्रातःकाल होनेपर प्रकाशका होना अवश्यम्भावी है, वैसे ही इस संहिताको चित्तमें धारण कर लेने मात्रसे निश्चय ही उत्तम विवेककी उपलब्धि होगी। विद्वानोंके मुखसे इसका श्रवण करके अथवा स्वयं ही इसे समझकर धीरे-धीरे विचार करनेसे जब बुद्धि सुदृढ़रूपसे संस्कृत हो जाती है, तब पहले हृदयमें सभास्थानको विभूषित करनेवाली ऊँची लताके समान संस्कारयुक्त विशुद्ध वाणीका उदय होता है। फिर महान् गुणोंसे सुशोभित वह श्रेष्ठ चतुरता प्रकट होती है, जिससे राजा तथा देवगण भी प्रसन्न होते हैं। जैसे सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पुरुष रात्रिके समय दीपक हाथमें लेकर सभी पदार्थोंको देख लेता है, उसी तरह बुद्धिमान् मनुष्य सर्वत्र पूर्वा-परका ज्ञाता हो जाता है। इस ग्रन्थके अभ्याससे जिसका अज्ञानान्धकाररूप आवरण फट गया है अतएव जो पदार्थोंके प्रविभाजनमें समर्थ हो गयी है; ऐसी प्रज्ञा कालिमारहित रत्नदीपककी लौके समान उत्कृष्ट प्रकाशवाली हो जाती है। प्रस्तुत ग्रन्थका ज्ञाता पुरुष चाहे भयहेतुओंके सम्मुख ही क्यों न खड़ा हो, फिर भी जैसे बाण बड़ी-बड़ी चट्टानोंको विदीर्ण नहीं कर सकते, उसी तरह भयंकर सांसारिक भय उसके हृदयको पीड़ा नहीं पहुँचा सकते। इस ग्रन्थके अध्ययनसे जन्ममें प्रारब्धकी और कर्ममें पुरुषार्थकी कारणता कैसे होगी !—इस प्रकारके संशय-समुदाय दिनमें अन्धकार-की भाँति विलीन हो जाते हैं। इस ग्रन्थका विचार करनेवाले पुरुषके हृदयमें समुद्रकी-सी गम्भीरताका, सुमेरुगिरिकी-सी धीरताका और चन्द्रमाकी-सी शीतलता-का उदय हो जाता है। जब हृदयाकाशमें शमके आलोकसे विभूषित विवेकरूपी निर्मल सूर्यका उदय हो जाता है, तब निश्चय ही अनर्थसूचक कामादि धूमकेतु अपना उदय नहीं ले पाते। धैर्यकी पराकाष्ठाको प्राप्त हुई जो बुद्धि धर्मरूपी दीवालमें गाढ़रूपसे संलग्न हो गयी है, उसे मानसिक चिन्ताएँ विचलित नहीं कर सकतीं, जैसे वायु चित्रलिखित लताको नहीं कँपा सकती। तत्त्वज्ञ पुरुष विषयासक्तिरूप गड्ढेमें नहीं गिरता; क्योंकि जिसे उत्तम मार्गका ज्ञान है, वह भला गड्ढेकी ओर क्यों दौड़ेगा। सत्-शास्त्रोंके परिशीलनसे जिनका चरित्र उत्तम हो गया है, उनकी बुद्धि यथायोग्य प्राप्त शास्त्रानुकूल कर्ममें ही रमण करती है—ठीक उसी तरह, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने अन्त:पुरके आँगनमें ही प्रसन्न रहती है। जिस पुरुषका अन्तःकरण मोक्ष-साधनके अनुभवसे शुद्ध हो गया है, उसे भोगसमुदाय न तो कभी पीडित ही करते हैं और न आनन्द ही देते हैं। वह अनिष्ट कार्योंके प्राप्त होनेपर न तो द्वेष करता है और न इष्ट कार्योंके नष्ट हो जानेपर उनकी आकाङ्क्षा

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९३


ही करता है; बल्कि यह कार्य-फलादिके स्वरूपका ज्ञाता होकर भी जड वृक्षकी भाँति अनभिज्ञका-सा आचरण करता है। वह साधारण जनकी तरह समयानुकूल प्राप्त हुए पदार्थोंसे ही निर्वाह करता हुआ देखा जाता है—यहाँतक कि अथवा अनिष्ट फलके प्राप्त होनेपर भी उसके हृदयमें स्वल्पमात्र भी विकार नहीं होता। राघव ! इस सम्पूर्ण शास्त्रको बँचवाकर और समझकर फिर इसपर विचार करो। यह कथनमात्र नहीं है, बल्कि देवोंके वरदान और शापकी भाँति इसका फल अवश्य प्राप्त होता है। यह सुन्दर शास्त्र उत्तम ज्ञानसे युक्त अलंकारोंसे विभूषित, काव्यस्वरूप और सरस है। इसमें दृष्टान्तोंद्वारा विषयका प्रतिपादन किया गया है। जिसे थोड़ा भी पद पदार्थका ज्ञान है, वह स्वयं ही उसे समझ लेता है; किंतु जो स्वयं इसे जाननेमें असमर्थ है, उसे पण्डितके मुखसे सुनना चाहिये। जैसे संकल्पद्वारा निर्मित नगरमें पुरुषको हर्ष-विषाद बाधा नहीं पहुँचाते उसी तरह संसार-भ्रमका परिज्ञान हो जानेपर यह भी कष्टदायक नहीं होता। जैसे यह चित्रलिखित सर्प है, वास्तविक सर्प नहीं है—ऐसा जान लेनेपर वह सर्प-जनित भयका दाता नहीं होता, उसी तरह इस दृश्य संसाररूपी सर्पका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर यह भी सुख अथवा दुःख नहीं देता। जैसे चित्रलिखित सर्पका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर उसका सर्पत्व ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार संसारका वास्तविक स्वरूप ज्ञात हो जानेपर यह स्थित रहते हुए भी शान्त हो जाता है अर्थात् इसका प्रभाव नहीं पड़ता।

रघुनन्दन ! यह शास्त्र ज्ञानका विस्तार करनेवाला और बुद्धिद्वारा ग्रहण किये जानेवाले सारभूत पदार्थोंकी परमावधि है। अब मैं इसका वर्णन करता हूँ, सुनो। पहले जिस विधिसे यह शास्त्र श्रवण किया जाता है तथा जिस परिभाषासे इसका यथार्थरूपसे विचार करनेका विधान है, वह अवतरणिका श्रवण करो। जिस देखे हुए पदार्थके सादृश्यसे अनुभवमें न आये हुए पदार्थका ज्ञान कराया जाता है, बोधोपकाररूप फल प्रदान करनेवाले उस सादृश्यको विद्वान् लोग दृष्टान्त कहते हैं। श्रीराम ! जैसे रात्रिमें दीपकके बिना घरमें रखे हुए बर्तन आदि सामग्रियोंका ज्ञान नहीं हो सकता, उसी तरह दृष्टान्तके बिना अपूर्व अर्थका बोध होना असम्भव है। उपमान और उपमेयके जिस कार्य-कारणभावका प्रतिपादन किया गया है, वह परब्रह्मको छोड़कर शेष सभी पदार्थोंके साथ लागू होता है। मैं यहाँ ब्रह्मोपदेशके प्रसङ्गमें तुमसे जो दृष्टान्त कह रहा हूँ, उसमें एकदेशके साधर्म्यसे प्रकृतार्थका परिग्रहण किया जाता है। यहाँ ब्रह्मतत्त्वका बोध करानेके लिये जो-जो दृष्टान्त दिया जाता है, वह स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले पदार्थोंकी तरह मिथ्याभूत जगत्के अन्तर्गत ही है—ऐसा समझना चाहिये। उत्पत्तिके पूर्व और विनाशके उत्तरकालमें जैसे यह जगत् अभावग्रस्त था, उसी तरह वर्तमान कालमें भी विचार करनेपर अवस्तुभूत ही है; अतः मिथ्यात्वके कारण जाग्रत् और स्वप्न—इन दोनोंकी समानता है। यह प्रसिद्ध बात बालकोंतककी समझमें आ सकती है। मोक्षसाधनोंके निर्माता ग्रन्थकर्ता महर्षि वाल्मीकिने दूसरे भी जिन ग्रन्थोंकी रचना की है, उनमें भी ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान करानेके लिये केवल यही व्यवस्था रक्खी है कि दृष्टान्तोंके जिस अंशमें समता सम्भव हो, उसी अंशके साथ समता रक्खी जाय। चूँकि यह जगत् स्वप्न, संकल्प और ध्यानसे कल्पित नगरके समान मिथ्या है, इसी कारण यहाँ वे ही दृष्टान्त दिये गये हैं, दूसरे नहीं। ज्ञानप्राप्तिके लिये कारणरहित ब्रह्ममें जो कारणताकी उपमा दी जाती है, वहाँ उपमाप्रयुक्त पदार्थोंके साथ सर्वांशमें साधर्म्य सम्भव नहीं हो सकता। अतः विवादरहित बुद्धिमान् पुरुषको ज्ञानप्राप्तिके लिये उपमानसे उपमेयका एक अंशमें ही साधर्म्य स्वीकार करना चाहिये। पदार्थोंके

१—दृश्य जगत्‌के मिथ्यात्वका निरूपण, दृश्य ही बन्धन है और उसका निवारण होनेसे ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा द्रष्टाके हृदयमें ही दृश्यकी स्थितिका कथन

९४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


अवलोकनमें दीपकके प्रकाशमात्रके अतिरिक्त उसके पात्र, तेल और बत्ती आदि किसीका भी उपयोग नहीं होता। केवल एकदेशके सादृश्यं, उपमान उपमेयका ज्ञान करा देता है। जैसे 'मणिदीप इव' इस दृष्टान्तमें उपमान दीपक केवल प्रकाशसे उपमेय मणिका बोधक होता है। दृष्टान्तके अंशमात्रसे ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो जानेपर 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके अर्थका निश्चय उपादेयरूपसे ग्रहण करना चाहिये। कुतार्किकताका आश्रय लेकर अनुभवविरुद्ध अपवित्र विकल्पोंद्वारा प्रबुद्धताका नाश नहीं करना चाहिये।

श्रीराम ! दृष्टान्तके द्वारा अद्वितीय आत्मज्ञानस्वरूप शास्त्रार्थके ज्ञानसे महावाक्यार्थभूत ब्रह्मस्वरूपसे सम्यक् प्रकारसे सिद्ध हुई शान्तिको ही निर्वाण कहा जाता है। इसलिये दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तके विविध विकल्पोंके पचड़ेसे कोई प्रयोजन नहीं है। किंतु जिस किसी भी युक्तिसे महावाक्यार्थका भलीभाँति आश्रय लेना चाहिये। राघव ! तुम शान्तिको ही परम श्रेय जानो, अतः उसकी प्राप्तिके लिये यत्नशील हो जाओ; क्योंकि शान्ति और शास्त्र-ज्ञानसे विभूषित विचारपरायण पुरुषको दृष्टान्त एवं शास्त्रोपदेश, सौजन्य, उत्तम बुद्धि और शास्त्रज्ञ पुरुषोंके समागमद्वारा यत्नका आश्रय लेकर उत्तम परम पदको प्राप्त करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको तबतक विचार करते रहना चाहिये, जबतक पुनः नष्ट न होनेवाली तुर्यपद नामक शान्तिमयी आत्मविश्रान्ति प्राप्त न हो जाय। जो पुरुष तुर्यपद नामक शान्तिसे युक्त होकर भवसागरसे पार हो गया है, वह गृहस्थ हो या संन्यासी, उसका जीने या न जीनेसे अथवा कर्म करने या न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। जैसे सम्पूर्ण जलोंका अधिष्ठान समुद्र है, उसी तरह सारे प्रमाणोंकी सत्ताका प्रमाण एकमात्र प्रत्यक्ष ही है; अतः अब तुम उसके विषयमें श्रवण करो। श्रेष्ठ पुरुष सारी इन्द्रियोंके सारभूत ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं। जिस इन्द्रियके प्रति जो ज्ञान सिद्ध होता है, वही प्रत्यक्ष कहा जाता है। अनुभूति, वेदन और प्रतिपत्तिके नामानुसार इस शास्त्रमें उसीका प्रत्यक्ष नाम रखा गया है। वही हमलोगोंका जीव है, वही संवित् है, वही 'अहंता' की प्रतीतिका विषयभूत साक्षी पुरुष है। वह जब संवित्‌के सहयोगसे उदित होता है, तब उसे पदार्थ कहा जाता है। जैसे जल तरङ्ग आदिके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार वह परमात्मा संकल्प-विकल्प आदि नाना प्रकारके भ्रमोंके कारण जगद्रूपसे प्रकाशित होता है। सृष्टिके पूर्व जो कारणरहित था, वही सृष्टिके आरम्भमें सृष्टिलीलावश स्वयं ही अपनेमें स्फुरित होकर प्रत्यक्ष कारण हुआ। जीवका अज्ञानजनित कारण यद्यपि असत् है, तथापि वह सत्-सा प्रतीत होता है। वही इस प्रकृतिमें जगद्रूपसे व्यक्त हुआ है। विचार तो स्वयं ही स्वकर्मा-नुसार प्राप्त हुए अपने शरीरका नाश करके शीघ्र ही महान् परम पदको प्रकट कर देता है । विचारवान् पुरुष जब परमात्माको प्राप्त कर लेता है, तब उसका विचार भी उसीमें विलीन हो जाता है, उस समय वर्णनातीत केवल परमात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है।

इस प्रकार प्रपञ्चका अभाव हो जानेके कारण अपने बुद्धि, इन्द्रिय और कर्मोंद्वारा मनके इच्छारहित अतएव शान्त हो जानेपर उसका न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न न करनेसे ही। फिर तो जैसे संचालकके द्वारा बिना चलाया हुआ यन्त्र काम नहीं देता, उसी तरह इच्छारहित मनके शान्त हो जानेपर कर्मेन्द्रियाँ कर्म आदिमें प्रवृत्त ही नहीं होतीं। बाह्य इन्द्रियोंद्वारा विषय-ग्रहण एवं मनद्वारा विषयानुसंधान-रूप पदार्थोंसे समाकुल यह जगत् विचारके अन्तर्गत विद्यमान है—ठीक उसी तरह, जैसे स्पन्दन वायुके भीतर ही होता है। शुद्ध सर्वात्मविषयक विचार जिस प्रकार कर्मानुसार भोगके लिये प्रकट होता है, तदनुरूप ही वह दिशा, काल तथा बाह्य एवं आन्तर पदार्थोंके

२—द्रष्टाकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्‌की असत्ता तथा ज्ञाताके कैवल्यकी ही मोक्षरूपताका प्रतिपादन

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९५


रूपमें विस्तृत रूपसे शोभित होता है। वह विचार शरीर आदिमें दृश्यताभासको देखकर 'यही मेरा स्वरूप है' यों मोहवश धारणा करके स्थित है। उसको अपना रूप जहाँ, जैसे और जिस प्रकारका प्रतीत होता है, वह वैसा ही हो जाता है। वह सर्वात्मा जहाँ जिस प्रकार आविर्भूत होता है, वहाँ वैसे ही तत्काल स्थिर हो जाता है और उसे अपना ही स्वरूप मानकर सुशोभित होता है। सर्वात्मकताके कारण द्रष्टा में दृश्यत्वका आरोप होता है। वह दृश्यत्व द्रष्टाकी उपस्थिति में ही सम्भव है, अन्यथा दृश्यता भी वास्तविक नहीं है। अतः प्रत्यक्ष ही कारणरहित अद्वितीय ब्रह्मरूपसे सिद्ध हुआ स्थित है। वही सभी प्रमाणोंका निर्माता है, क्योंकि अनुमान आदि प्रमाण प्रत्यक्षपूर्वक होनेके कारण उसीके अंश हैं। स.शुद्धभाव राम! अपने कर्ममात्रको दैव—प्रारब्ध मानकर उसकी उपासना करनेवाला इन्द्रियजयी पुरुष उस दैव-शब्दार्थ अर्थात् प्रारब्धको दूर हटाकर अपने पुरुषार्थ-द्वारा उस परम पदको अपने भीतर ही प्राप्त करता है।

रघुनन्दन ! पहले संत-समागमरूपी युक्तिके द्वारा बलपूर्वक अपनी बुद्धिको बढ़ाना उचित है। तत्पश्चात् महापुरुषोंके लक्षणोंके अनुकरणसे अपनेमें महापुरुषता लानी चाहिये। इस जगत्में जो-जो पुरुष जिस-जिस गुणसे विशेषरूपसे सम्पन्न है, वह उसी गुणके द्वारा विशिष्ट समझा जाता है; अतः शीघ्र ही उस पुरुषसे वह गुण प्राप्त करके अपनी बुद्धिकी वृद्धि करनी चाहिये। जैसे कमलसे सरोवर और सरोवरसे कमल परस्पर उन्नति-लाभ करते हैं, उसी तरह ज्ञानसे शम आदि गुण और शम आदि गुणोंसे ज्ञान—ये परस्पर वृद्धिगत होते रहते हैं। सत्पुरुषोंके सदाचरणसे ज्ञानकी और ज्ञानसे सत्पुरुषोंके आचरणकी वृद्धि होती है। यों ज्ञान और सत्पुरुषोंके आचरण परस्पर एक-दूसरेके सहयोगसे बढ़ते रहते हैं। तात ! जबतक इस संसारमें ज्ञान और सदाचारका समानरूपसे अभ्यास नहीं किया जाता, तबतक पुरुषको इन दोनोंमेंसे एककी भी सिद्धि नहीं होती। रघुनन्दन ! जिस प्रकार मैंने सदाचारके क्रमका वर्णन किया है, उसी तरह अब आगे ज्ञानक्रमका भलीभाँति उपदेश करूँगा। यह सद्-शास्त्र कीर्तिकारक, आयुवर्धक और परम पुरुषार्थरूप फल प्रदान करनेवाला है; अतः बुद्धिमान् पुरुषको इस शास्त्रके ज्ञानसे सम्पन्न आप्त पुरुषसे इसका श्रवण करना चाहिये।

( सर्ग १७—२० )

॥ मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण सम्पूर्ण ॥

उत्पत्ति-प्रकरण

दृश्य जगत्के मिथ्यात्वका निरूपण, दृश्य ही बन्धन है और उसका निवारण होनेसे ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा द्रष्टाके हृदयमें ही दृश्यकी स्थितिका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जिसमें मुमुक्षुओंके व्यवहारोंका ही प्रधानरूपसे वर्णन है, उस मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरणके बाद अब मैं इस उत्पत्ति-प्रकरणका वर्णन करता हूँ । जबतक दृश्य जगत्‌की सत्ता है, तभीतक यह जन्म-मृत्युरूप संसारका बन्धन है । दृश्य-का अभाव हो जानेसे बन्धन कदापि नहीं रह सकता । यह दृश्य जगत् जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह बता रहा हूँ । तुम क्रमशः ध्यान देकर सुनो । संसारमें जो उत्पन्न होता है, वही वृद्धि एवं क्षयको प्राप्त होता है । वही बँधता और मोक्षको प्राप्त होता है तथा वही स्वर्ग या नरकमें पड़ता है । अपने स्वरूपका बोध न होनेसे ही बन्धन है । इसलिये स्वरूपके बोधके लिये ही मैं आगेकी बात बता रहा हूँ ( इससे तुम्हें यह ज्ञात होगा कि यह दृश्य प्रपञ्च कभी हुआ ही नहीं ) । उत्पत्ति आदिका सम्बन्ध इस दृश्य जगत्‌से ही है ( आत्मासे नहीं ) । आत्मा तो दृश्यकी उत्पत्तिसे पहले जैसा रहा है, वैसा ही उसकी उत्पत्तिके बाद भी है ( वह सदा ही एकरस रहता है ) जैसे सुषुप्तिमें स्वप्नके संसारका अभाव हो जाता है, उसी तरह यह जो समस्त चराचर जगत् दिखायी देता है, इसका कल्पके अन्तमें विनाश ( अभाव ) हो जाता है । तत्पश्चात् निष्क्रिय गम्भीर ( अपरिच्छिन्न ), नाम-रूपसे रहित और अव्यक्त कोई अनिर्वचनीय सद् वस्तु ही शेष रह जाती है वह तेजस्तत्त्व नहीं है, क्योंकि उसके रूप नहीं होता । तथा वह तमोमय भी नहीं है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है। विद्वानोंने व्यवहार-निर्वाहके लिये उस सत्-स्वरूप परमात्माके ऋत, आत्मा, परब्रह्म तथा सत्य इत्यादि नाम रख छोड़े हैं ।

सोनेका बना हुआ कड़ा सोना ही है । उस सोनेसे 'कटक' शब्दका अर्थ ( कडा ) जैसे पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार 'जगत्' शब्दका जो अर्थ है वह परब्रह्मपर ही आधारित है, अतः उससे पृथक् नहीं है । जैसे कड़ेका स्वरूप सुवर्णके स्वभावके ही अन्तर्गत है, कड़ेके स्वभावके अन्तर्गत नहीं, उसी प्रकार यह दृश्यमान जगत् भी अपने परिच्छिन्न स्वभावको त्याग देनेपर ब्रह्मभावमें ही प्रतिष्ठित है, 'जगत्' शब्दके अर्थमें नहीं । ( तात्पर्य यह कि सोनेमें ही कड़ेकी कल्पना हुई है, कड़ेमें नहीं । इसी तरह ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना हुई है, जगत्‌में नहीं; अतः वह ब्रह्मसे भिन्न नहीं है । ) जैसे मरु-मरीचिकामें प्रतीत होनेवाली नदी अपने भीतर न होनेपर भी चञ्चल तरङ्गोंका विस्तार करती है और वे तरङ्गें सच्ची सी जान पड़ती हैं, उसी प्रकार मन ही इस जगत्रूपी इन्द्रजालकी सम्पत्ति-का विस्तार करता है और वह सम्पत्ति असत् होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है । जिसके कारण असत् वस्तु भी सत्-सी प्रतीत होती है, वह माया है । सर्वज्ञ विद्वानोंने उसके अविद्या, संसृति, बन्ध, माया, मोह, महत् और तम आदि अनेक नामोंकी कल्पना की है ।

प्रिय श्रीराम ! दृश्य-प्रपञ्चका अस्तित्व ही द्रष्टाका बन्धन कहा गया है । दृश्यके बलसे ही द्रष्टा बन्धनमें पड़ा है । दृश्यका निवारण हो जानेपर वह उस बन्धनसे मुक्त हो जाता है । 'त्वम्' ( तू ), 'अहम्' ( मैं ) और 'इदम्' ( यह ) इत्यादि रूपोंमें कल्पित जो मिथ्या जगत् है, उसीको दृश्य कहते हैं । जबतक वह दृश्य बना रहता है, तबतक मोक्ष नहीं होता । यदि यह दृश्यजगत् वास्तवमें है, तब तो किसीके लिये उसका

३—मनके स्वरूपका विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्‌की असत्ताका निरूपण तथा महाप्रलय-कालमें समस्त जगत्‌को अपनेमें लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सबके मूल हैं, इसका प्रतिपादन

उत्पत्ति प्रकरण ] * ब्रह्माकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्‌की असत्ताका प्रतिपादन * ९७


निवारण नहीं हो सकता; क्योंकि जो असत् वस्तु है, उसका अस्तित्व नहीं है और जो सत् वस्तु है, उसका कभी अभाव नहीं होता। चित्-स्वरूप आत्माका जिसे बोध नहीं है, वह द्रष्टा जहाँ कहीं भी रहता है, वहीं उसकी दृष्टिके समक्ष इस दृश्य जगत्‌का वैभव प्रकट हो जाता है। इस दृश्य-प्रपञ्चके रहते हुए निर्विकल्प समाधि कैसे हो सकती है ? निर्विकल्प समाधि होनेपर ही चेतनता और तुरीय पदकी उपपत्ति होती है। जैसे सुषुप्ति (प्रगाढ निद्रा) के पश्चात् यह सारा सांसारिक दुःख अनुभवमें आने लगता है, उसी प्रकार समाधिसे उठनेपर यह सम्पूर्ण दुःखमय जगत् जैसेका तैसा प्रतीत होने लगता है। इस मनोरूप दृश्यके रहते हुए कोई समाधिके लिये कितना ही प्रयत्नशील क्यों न हो, क्या उसे दृश्य प्राप्त नहीं होता ? (अवश्य होता है); क्योंकि जहाँ-जहाँ इसकी चित्तवृत्ति जाती है, वहाँ-वहाँ उससे सम्बन्ध रखनेवाले जगत्रूपी भ्रमका निवारण नहीं किया जा सकता। जैसे कमलगट्टेके भीतर कमलिनीका वह बीज विद्यमान है, जिसमें उसका मृणालमय रूप छिपा हुआ है, उसी प्रकार अज्ञानी द्रष्टामें वह बुद्धि रहती है, जिसमें दृश्य जगत् अन्तर्हित होता है। जैसे पदार्थोंमें रस, तिल आदिमें तेल और फूलोंमें सुगंध रहती है, उसी प्रकार उपद्रष्टामें दृश्य बुद्धि रहती ही है। कपूर या कस्तूरी आदि जहाँ कहीं भी हों, उनकी सुगंध प्रकट हो ही जाती है, उसी प्रकार द्रष्टा कहीं भी हो, उसके उदरमें दृश्य जगत्‌का प्रादुर्भाव होता ही है। जैसे तुम्हारे हृदयमें स्थित मनो-राज्य-बुद्धि अपने अनुभवसे ही देखी गयी है और जैसे हृदयस्थित स्वप्न एव संकल्प तुम्हारे द्वारा अनुभवसे ही देखे जाते हैं, उसी प्रकार यह दृश्य जगत् तुम्हारे हृदयमें ही स्थित है और अपने अनुभवसे ही दृष्टिगोचर होता है। (सर्ग १)


ब्रह्माकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्‌की असत्ता तथा ज्ञाताके कैवल्यकी ही मोक्षरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मन्वन्तर आरम्भ होनेपर जब सम्पूर्ण प्राणियोंको अपना ग्रास बनानेवाली मृत्यु प्रजाका संहार करती हुई सबल हो उठी, तब उसने स्वयं ही ब्रह्माजीपर आक्रमण करनेका उद्योग आरम्भ किया। उस समय धर्मराज यमने उसे शीघ्र ही इस प्रकार शिक्षा दी—'मृत्यो ! ब्रह्मा परम (चिन्मय) व्योमरूप हैं। उनकी आकृति पृथ्वी आदि पाँचों भूतोंसे रहित है। वे मनोमय और संकल्परूप हैं। भला, उनपर कैसे आक्रमण किया जा सकता है ? जो चेतन आकाशके समान चमत्कारपूर्ण और चिन्मय आकाशके समान अनुभवरूप हैं, वे ब्रह्मा चिन्मय आकाश ही हैं। उनमें कार्य-कारण-भाव नहीं है। जैसे आकाशमें इन्द्रनील मणिसे बने हुए तथा औंधे रक्खे हुए महान् कड़ाहका-सा आकार पृथ्वी आदिसे रहित प्रतीत होता है और जैसे संकल्पनिर्मित पुरुष भी पृथ्वी आदिसे रहित ही ज्ञात होता है, उसी प्रकार स्वयम्भू ब्रह्मा भी पृथ्वी, जल आदि तत्त्वोंसे रहित ही भासित होते हैं। केवल (अद्वितीय) परमात्मामें न दृश्य है और न द्रष्टा ही है। यह स्वयं चिन्मात्रस्वरूप ही हैं, तथापि 'स्वयम्भू' नामसे प्रकाशित होता हैं। आदि, मध्य और अन्तसे रहित चिदाकाशरूप अद्वितीय ब्रह्म ही अपने संकल्पके कारण स्वयम्भू ब्रह्माके नामसे पुरुष अथवा देहधारी-सा भासित होता है।'

श्रीराम ! जिसका पूर्वजन्मोंमें उपार्जित कर्मोंसे युक्त पूर्व-शरीर रहा है, उसीको इस जन्ममें संसार-स्थितिकी कारणभूत स्मृतिका होना सम्भव है। जब ब्रह्माका कोई प्राक्तन कर्म है ही नहीं, तब उन्हें पूर्व-जन्मकी स्मृतिका उदय कहाँसे और कैसे होगा ?

९८* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

इसलिये ब्रह्माका शरीर पृथ्वी आदि कारणोंसे रहित है। ब्रह्मा अपने कारणभूत परब्रह्म परमात्मासे अभिन्न एवं स्वयं आत्मस्वरूप हैं। श्रीराम! स्वयम्भू ब्रह्माका वह शरीर आतिवाहिक¹ ही है। जो अजन्मा है, उसे आधिभौतिक शरीरकी प्राप्ति हो ही नहीं सकती।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुदेव! सभी प्राणियोंके एक 'आतिवाहिक' शरीर होता है और दूसरा 'आधिभौतिक'। किंतु ब्रह्माके केवल आतिवाहिक ही शरीर क्यों है?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम! सभी भूत कारणात्मा हैं—पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न देह आदिसे युक्त हैं; इसलिये उनके दो-दो शरीर होते हैं; परंतु अजन्मा ब्रह्माके लिये ऐसा कोई कारण नहीं है। इसलिये उनके एक ही आतिवाहिक शरीर है। एकमात्र अजन्मा ब्रह्मा ही सभी जातिके प्राणियोंके परम कारण हैं। उसका दूसरा कोई कारण नहीं है। इसलिये भी उनके एक ही शरीर है। सङ्कल्परूप ही उनका शरीर है। पृथ्वी आदि भूतोंके क्रमशः सम्मिश्रणसे उनके शरीरका निर्माण नहीं हुआ है। वे चिदाकाशस्वरूप आदिप्रजापति ब्रह्मा ही विविध जीवोंकी सृष्टि करके उनका विस्तार करते हैं। वे जीव ब्रह्माके संकल्पके सिवा अन्य कारणोंसे उत्पन्न नहीं हुए हैं। अतः वे भी चिदाकाश-स्वरूप ही हैं। जिस उपादानसे जिसकी उत्पत्ति होती है, वह तद्रूप ही होता है (जैसे मृत्तिकासे निर्मित हुआ घट मृत्तिकारूप ही है)। स्वर्णके कटक-कुण्डल आदि दृष्टान्तोंके द्वारा इस बातका सभीको अनुभव होता है। संसारमें व्यवहार करनेवाले समस्त प्राणियोंमें ब्रह्मा ही सबसे प्रथम चेष्टाशील चेतन भूत हैं। अन्तःकरण ही उनका स्वरूप है। उन्हींसे अहंकारका उदय होता है। जैसे वायुसे हिलना-चलना आदि चेष्टाएँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार उन प्रथम प्रतिस्पन्द (पहले प्रकट हुए चेष्टाशील चेतन भूत) ब्रह्मासे अभिन्न रूपवाली यह सृष्टि प्रकट हुई और फैली है। प्रतिभास ही जिनकी आकृति है, उन ब्रह्मासे उत्पन्न होनेके कारण यह दृश्यमान सृष्टि भी प्रतिभासरूप ही है। फिर भी लोगोंकी दृष्टिमें यह सत्य-सी प्रतीत होती है। इस विषयमें दृष्टान्त है—स्वप्नमें दीखनेवाले स्वप्नान्तरमें प्राप्त होनेवाला स्त्रीका समागम। जैसे स्वप्नमें स्त्री-समागमका स्वप्न देखा जाय तो उससे भी वीर्यपात होता है, उसी प्रकार व्यवहार और प्रयोजनकी सिद्धिकी दृष्टिसे असत् वस्तु भी सत्य वस्तुके समान व्यवहारका प्रकाश करती है। तात्पर्य यह कि स्वप्नमें स्त्रीका समागम जाग्रत्-कालमें सर्वथा असत्य सिद्ध होता है, तो भी उससे सत्यके समान कार्य होता देखा जाता है। इसी प्रकार प्रतिभासमात्र शरीरवाले ब्रह्मासे उत्पन्न यह सृष्टि भी यद्यपि प्रतिभासरूपा ही है, तथापि सत्यके समान प्रयोजनको सिद्ध करती है।

जिनका शरीर पृथ्वी आदि तत्त्वोंसे नहीं बना है, जो चिदाकाशस्वरूप और निराकार हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति स्वयम्भू ब्रह्मा सशरीर पुरुषकी भाँति प्रतीत होते हैं। पृथ्वी आदि तत्त्वोंसे शून्य आकारवाले संकल्प-पुरुष ब्रह्माका शरीर चित्तमात्र है। वे ही तीनों लोकोंकी स्थितिके कारण हैं। स्वयम्भू ब्रह्माका यह संकल्प प्राणियोंके कर्मोंके अनुसार जिस-जिस प्रकारसे विकासको प्राप्त होता है, चिदाकाशस्वरूप आत्मा उसी प्रकारसे प्रतीत होता है। ब्रह्मा मनोमय ही हैं, पृथ्वी-आदि-निर्मित नहीं हैं। इसलिये उनसे उत्पन्न हुआ यह विश्व भी मनोमय ही है; क्योंकि जो जिससे उत्पन्न होता है, वह तद्रूप ही होता है। (जैसे सोनेका बना हुआ कटक-कुण्डल आदि सुवर्णरूप ही होता है।) अजन्मा ब्रह्माके कोई सहकारी कारण


१. अर्चि आदि मार्गके द्वारा लोकान्तरमें पहुँचना 'अतिवहन' कहलाता है। इस अतिवहन कर्ममें कुशल अत्यन्त सूक्ष्म शरीरको 'आतिवाहिक' कहते हैं।

उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनके स्वरूपका विवेचन तथा मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्‌की असत्ताका निरूपण * ९९

नहीं हैं। सुतरां उनसे उत्पन्न हुए जगत्‌के भी कोई सहकारी कारण नहीं हैं। अतः यहाँ कारणसे कार्यमें कोई विचित्रता या विलक्षणता नहीं है। इसलिये जैसे कारण शुद्ध है, वैसे कार्य भी शुद्ध ब्रह्म ही है—यह सिद्धान्त स्थिर हुआ। इस जगत्‌के विषयमें कार्य-कारण-भावकी किंचिन्मात्र भी संगति नहीं है। जैसा परब्रह्म है वैसे ही तीनों लोक हैं। जल द्रवत्वसे अभिन्न ही है। उस अभिन्नरूप जलसे जिस तरह द्रवत्वका विस्तार होता है, उसी प्रकार मनोरूपताको प्राप्त हुए ब्रह्मा अपने शुद्ध आत्मा (स्वरूप) से ही जगत्‌का विस्तार करते हैं। वह जगत् उनके विशुद्ध आत्मस्वरूपसे भिन्न नहीं है जैसे ज्ञानियोंकी दृष्टिमें रस्सीमें सर्पभाव नहीं है, उसी प्रकार जगत्‌में आधिभौतिकता (जडता) नहीं है। फिर वे प्रबुद्ध ब्रह्मा आदि आधिभौतिक देहमें कैसे रह सकते हैं।

मन ही ब्रह्माके स्वरूपको प्राप्त हुआ है। वह मन संकल्परूप है। मन अपने ही स्वरूपको विकसित करके इस जगत्‌का निर्माण एवं विस्तार करता है! मनका रूप ब्रह्मा है और ब्रह्माका रूप मन। इसमें पृथ्वी आदिका प्रवेश नहीं है। मनने ही परमात्मामें पृथ्वी आदिकी कल्पना की है। जैसे कमलगट्टेके अंदर कमलिनी (भावी कमल-नाल) विद्यमान है उसी प्रकार मनके भीतर सम्पूर्ण दृश्यवर्ग स्थित है। मन, दृश्यवर्ग और इन दोनोंका द्रष्टा—इनका कभी किसीने विवेक नहीं किया। (जबतक द्रष्टा और दृश्यका विवेक न किया जाय, तबतक अज्ञानका उच्छेद न होनेसे मनमें दृश्यवर्गकी प्रतीति होती ही है।) यदि दृश्यरूप दुःख सत् हो तो उसकी कभी शान्ति नहीं हो सकती और दृश्यकी शान्ति न होनेपर ज्ञातामें कैवल्य (मोक्ष) की सिद्धि नहीं हो सकती। दृश्यका अभाव हो जानेपर ज्ञातामें ज्ञातृभाव स्थित हो, तो भी वह शान्त या निवृत्त हो जाता है। वही (ज्ञाताका कैवल्य ही) उसका मोक्ष कहा गया है। (सर्ग २-३)


मनके स्वरूपका विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्‌की असत्ताका निरूपण तथा महाप्रलय-कालमें समस्त जगत्‌को अपनेमें लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सबके मूल हैं, इसका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! मनका स्वरूप कैसा है, यह मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि मन ही इस सम्पूर्ण लोकमञ्जरीका* विस्तार करता है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे शून्य तथा जड आकारवाले आकाशका नाममात्रके अतिरिक्त दूसरा कोई रूप दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार शून्य एवं जड रूप इस संकल्पात्मक मनका नामके सिवा कोई भी वास्तविक रूप नहीं दिखायी देता। यह जगत् क्षणिक संकल्परूपी मनसे उत्पन्न हुआ है। मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जल तथा चन्द्रमामें भ्रमसे दीखनेवाले द्वितीय चन्द्रमाके समान ही इस मनःकल्पित जगत्‌का स्वरूप है। रघुनन्दन ! संकल्पको ही मन समझो। जैसे द्रवत्व (द्रवरूपता) से जलका भेद नहीं है और जैसे वायुसे स्पन्दन (चेष्टा या गतिशीलता) भिन्न नहीं है, उसी प्रकार संकल्पसे मन भिन्न नहीं है। प्रियवर श्रीराम ! जिस विषयके लिये सङ्कल्प होता है, उसमें मन सङ्कल्परूपसे स्थित रहता है। तात्पर्य यह कि जो सङ्कल्प है वही मन है। सङ्कल्प और मनको कभी कोई पृथक् नहीं कर पाया है (इन दोनोंके पार्थक्यका अनुभव किसीको नहीं हुआ है)। मनको सङ्कल्पमात्र समझो।

वह समष्टिगत मन ही पितामह ब्रह्मा है। आतिवाहिक देह


* १. जगत्-रूपिणी लता ।

४—ज्ञानसे ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्तिका प्रतिपादन तथा ज्ञानके उपायोंमें सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायकी प्रशंसा

१००* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

( सङ्कल्पमय शरीर ) रूपी ब्रह्माको लोकमें समष्टिगत मन कहा गया है। अविद्या, संसार, चित्त, मन, बन्धन, मल और तम—इन्हें श्रेष्ठ विद्वानोंने दृश्यके पर्यायवाची नाम माना है। संकल्परूप दृश्यसे अतिरिक्त मनका कुछ भी स्वरूप नहीं है। यह दृश्य-प्रपञ्च वास्तवमें उत्पन्न ही नहीं हुआ है, यह बात मैं आगे चलकर फिर बताऊँगा। जैसे प्रकाशका आलोक* स्वभाव है, जैसे चपलता वायुका स्वभाव है और जिस प्रकार द्रवीभूत होना जलका स्वभाव है, उसी प्रकार द्रष्टामें दृश्यत्व स्वभावसे ही विद्यमान है ( अर्थात् द्रष्टासे दृश्य भिन्न नहीं है ), जैसे सुवर्णमें बाजूबंद और कटक-कुण्डल आदिकी स्थिति है, जैसे मृगतृष्णाकी नदीमें जलकी स्थिति है और जैसे सपनेकी नगरीमें उठायी गयी दीवारकी स्थिति है, उसी प्रकार द्रष्टामें दृश्यकी स्थिति मानो गयी है। अर्थात् जैसे उपर्युक्त वस्तुएँ अपने अधिष्ठानसे भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार द्रष्टासे दृश्यकी पृथक् सत्ता नहीं है।

द्रष्टासे दृश्यकी पृथक् सत्ता न होनेके कारण दृश्यका अभाव हो जानेपर जो द्रष्टामें बलात् द्रष्टापनका अभाव प्राप्त होता है, उसीको तुम असत् ( मिथ्या दृश्य ) के बाधित होनेसे सन्मात्र चिन्मयरूपमें अवशिष्ट हुए आत्माका केवलीभाव ( या कैवल्य ) समझो। जब चित्त आत्माके कैवल्य ( अद्वितीय चिन्मात्रस्वरूपता ) के बोधसे तदाकार ( कैवल्यभावको प्राप्त ) हो जाता है, तब उसकी राग-द्वेष आदि वासनाएँ उसी तरह शान्त हो जाती हैं, जैसे हवाके न चलनेपर वृक्षोंमें कम्पन और जलाशय आदिमें लहरोंका उठना बंद हो जाता है। दिशा, भूमि और आकाशरूपी सभी प्रकाशनीय पदार्थोंके न रहनेपर जिस तरह प्रकाशका शुद्ध रूप ही अवशिष्ट रहता है, उसी प्रकार तीनों लोक, तू और मैं इत्यादि दृश्य प्रपञ्चकी सत्ता न होनेपर शुद्धरूपसे अवशिष्ट चिन्मय द्रष्टाका केवलीभाव ( कैवल्य ) ही रह जाता है।


* अन्धकारकी निवृत्तिपूर्वक समस्त पदार्थोंको नेत्रोंके समक्ष ला देना।


श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! यदि दृश्य सत् है, तब तो यह शान्त या निवृत्त नहीं हो सकता; क्योंकि सद्‌का कभी अभाव नहीं होता और यदि यह दोष प्रदान करने-वाला दृश्य असत् है, तब यह बात हमारी समझमें आती नहीं। इसलिये यह दृश्यरूपिणी विषूचिका ( हैजा ), जो मनसे जन्म आदिके भ्रमको उत्पन्न करनेवाली और दुःखकी परम्पराको देनेवाली है, कैसे शान्त होगी ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिस वस्तुकी सत्ता है, उसका कभी नाश नहीं होता। यह जो कुछ आकाश आदि भूत और अहंकारके रूपमें लक्षित होता है, वह सब व्यवहार-दशामें जगत् है, किंतु परमार्थ दशामें ब्रह्म है। ब्रह्मके सिवा 'जगत्' शब्दका दूसरा कोई वास्तविक अर्थ है ही नहीं। हमारे सामने यह जो कुछ दृश्य-प्रपञ्च दृष्टिगोचर होता है, वह सब अजर, अमर एवं अव्यय परब्रह्म ही है। सर्वत्र पूर्णका प्रसार हो रहा है। शान्त परब्रह्ममें शान्त जगत् स्थित है। आकाशमें ही आकाशका उदय हुआ है तथा ब्रह्ममें ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है * । वास्तवमें न तो दृश्य सत्-रूप


* परब्रह्म परमात्माके साथ जीवात्माकी एकताका जो बोध है, वही पूर्णमें पूर्णका प्रसार या प्रवेश है। परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र व्यापक होनेके कारण पूर्ण है। जीवात्मा भी उससे अभिन्न होनेके कारण पूर्ण ही है। इनमें जो भेदका भ्रम था, उसका मिट जाना ही उनकी एकता है। इस एकताकी अनुभूति ही पूर्णमें पूर्णका प्रवेश है। वास्तवमें जीवात्मा न तो कभी ब्रह्मसे पृथक् होता है और न वह कहीं अन्यत्रसे आकर ब्रह्ममें प्रविष्ट ही होता है। ये प्रवेश और निर्गम औप-चारिक हैं, वह ( जीवात्मा ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होता है, जैसा कि श्रुतिका कथन है—'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।' मूल ग्रन्थमें जो 'शान्ते शान्तं व्यवस्थितम्' कहा गया है, इसमें प्रथम 'शान्त' शब्द ब्रह्मके लिये प्रयुक्त हुआ है और दूसरा 'शान्त' शब्द जगत्‌के लिये। जहाँ तीनों अवस्थाओं तथा सब प्रकारकी भेद-भ्रान्तियोंका सदाके लिये शमन हो गया है, वह ब्रह्म शान्तस्वरूप कहा गया है। ब्रह्मदृष्टि प्राप्ति होनेपर जगत-दृष्टि शान्त हो जाती है, इसलिये जगत्‌को भी शान्त कहा गया

५—परमात्माके ज्ञानकी महिमा, उसके स्वरूपका विवेचन, दृश्य जगत्‌के अत्यन्ताभाव एवं ब्रह्मरूपताका निरूपण तथा आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये योगवासिष्ठ ही सर्वोत्तम शास्त्र है—इसका प्रतिपादन

उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनके स्वरूपका विवेचन तथा मन एवं मनःकल्पित दृश्य-जगत्की असत्ताका निरूपण * १०१

है, न द्रष्टा, न दर्शन, न शून्य, न जड और न चित् ही सद्रूप है। केवल शान्तस्वरूप ब्रह्म ही सद्रूप है, जो सर्वत्र व्याप्त है।

यह जगत् सृष्टिके आदिमें उत्पन्न नहीं हुआ था, इसलिये इसका अस्तित्व सर्वथा नहीं है। जैसे स्वप्न आदिमें मनसे ही नगरकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनसे ही उत्पन्न होकर प्रतीतिको विषय हो रहा है। स्वयं मन ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न न होनेके कारण असत्-स्वरूप है, उस असत्-रूप मनसे कल्पित होनेके कारण भी यह जगत् असत् ही है। फिर जिस प्रकार इसका अनुभव होता है, वह बता रहा हूँ, सुनो। मन निरन्तर क्षीण होनेवाले इस दृश्यरूपी दोषका विस्तार करता है। वह स्वयं असत्-रूप ही है, तो भी सत्-सा प्रतीत होनेवाले जगत्की सृष्टि करता है—ठीक उसी तरह, जैसे स्वप्न असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होनेवाले जगत्की सृष्टि करता है। मन ही अपनी इच्छाके अनुसार स्वयं शीघ्र ही शरीरकी कल्पना कर लेता है। वही चिरकालकी भावनासे विस्तारको प्राप्त होकर इस ऐन्द्रजालिक वैभवरूप दृश्य-जगत्का विस्तार करता है। चञ्चल शक्तिसे युक्त होनेके कारण केवल यह मन ही स्वयं स्फुरित होता, उछलता, कूदता, जाता, आता, याचना करता, घूमता, गोते लगाता, संहार करता और अपकर्षको प्राप्त होता है।

श्रीराम ! महाप्रलय होनेपर जब जगत् अति सूक्ष्म रूपसे स्थित होनेके कारण अपने कार्यमें असमर्थ हो जाता है, उस समय वह सम्पूर्ण भावी दृश्यवर्गकी सृष्टिसे पहले विक्षेपरहित शान्तावस्थामें ही शेष रहता है। उस प्रलयकालमें केवल कभी अस्त न होनेवाले सूर्यदेव—स्वयञ्ज्योति, अजन्मा, रोग-शोकसे रहित, सदा सर्वशक्तिमान्, सर्वस्वरूप, परमात्मा महेश्वर ही विराजमान होते हैं। जहाँसे वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है अर्थात् जहाँ वाणीकी पहुँच नहीं हो पाती, जो जीवन्मुक्त महात्माओंके द्वारा जाने जाते हैं, साङ्ख्यदर्शनके अनुयायी जिन्हें 'पुरुष' कहते हैं, वेदान्तवादी 'ब्रह्म' नामसे जिनका चिन्तन करते हैं, विज्ञानवेत्ताओंकी दृष्टिमें जो परम निर्मल विज्ञानमात्र हैं, जिन्हें शून्यवादी शून्य कहते हैं, जो सूर्यके प्रकाशके भी प्रकाशक हैं; जैसे नदी-नाले आदिके जल अन्ततोगत्वा महासागरमें ही गिरते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण दृश्यसमूह महाप्रलयकालमें जिनमें ही विलीन होते हैं; जो आकाशमें, विभिन्न शरीरोंमें, प्रस्तरोंमें, जलमें, लताओंमें, धूलिकणोंमें, पर्वतोंमें, वायुमें और पाताल आदि सभी देश, काल एवं वस्तुओंमें समान भावसे स्थित हैं; जिन्होंने आकाशको शून्य पर्वतोंको घनीभूत और जलको द्रवीभूत बनाया है, जगत्‌को दीपककी भाँति प्रकाशित करनेवाले सूर्य जिनके अधीन हैं; जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी तपती हुई किरणोंके भीतर जलराशि लहराती दिखायी देती है, उसी प्रकार जिन अत्यन्त व्यापक परमात्मारूपी महासागरमें आविर्भाव और तिरोभाव (उत्पत्ति और प्रलय)—से युक्त त्रिलोकरूपिणी तरङ्ग उठती रहती हैं, जो सम्पूर्ण व्यावहारिक सत्ताओंसे ऊँचे उठे हुए—सर्वविलक्षण पारमार्थिक सत्तासे सम्पन्न हैं, जिनसे ही नियति, देश, काल, चलन, चेष्टा और क्रिया आदि समस्त भावोंको कार्य निर्वाहकी क्षमता प्राप्त हुई है—वे एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही उक्त महाप्रलयके समय शेष रहते हैं। वे परमात्मा उत्पत्ति-स्थिति आदिसे रहित, कभी अस्त न होनेवाले, नित्य प्रकाशमान ज्ञानसे परिपूर्ण एव विकारशून्य अपने स्वरूपमें ही स्थित हैं। वे एकमात्र—अद्वितीय ही हैं। अतएव वे मायासे अनेक विशाल संसारों—अगणित ब्रह्माण्डोंकी रचना करते हुए भी वास्तवमें न कोई कार्य करते हैं और न उनसे कोई चेष्टाएँ ही बनती हैं।

(सर्ग ४-५)


है। मृत्तिकामें घटकी भाँति ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना हुई है; इसलिये वह उसीमे स्थित है। घट आदि उपाधियोंके नष्ट होनेपर घटाकाश, मठाकाश आदिकी जो महाकाशमें प्रतिष्ठा होती है, वही आकाशमें आकाशका उदय है। इसी तरह जगत्-दृष्टिका निवारण होकर जो ब्रह्मभावका साक्षात्कार होता है, वही ब्रह्ममें ब्रह्मकी प्रतिष्ठा है।

१०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


ज्ञानसे ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्तिका प्रतिपादन तथा ज्ञानके उपायोंमें सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायकी प्रशंसा

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परब्रह्म परमात्मा देवताओंके भी देवता हैं। उनके ज्ञानसे ही परम सिद्धि (मोक्ष) की प्राप्ति होती है, क्लेशयुक्त सकाम कर्मोंके अनुष्ठानसे नहीं। संसार-बन्धनकी निवृत्ति या मोक्षकी प्राप्तिके लिये ज्ञान ही साधन है, ज्ञानके अतिरिक्त सकाम कर्म आदिका इसमें कोई भी उपयोग नहीं है; क्योंकि मृगतृष्णामें होनेवाले जलके भ्रमका निवारण करनेके लिये ज्ञानका ही उपयोग देखा गया है—ज्ञानसे ही उस भ्रमकी निवृत्ति होती है, किसी कर्मसे नहीं। सत्सङ्ग तथा सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर होना ही ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिमें हेतु है। वह स्वाभाविक साधन ही मोहजालका नाशक होता है। यह परमात्मा सत्स्वरूप ही है, ऐसे ज्ञानमात्रसे ही जीवके दुःखका निवारण होता है तथा वह जीवन्मुक्त अवस्थाको प्राप्त होता है।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुदेव ! सबके आत्मस्वरूप इन परमात्माके ज्ञानमात्रसे कष्टप्रद जन्म-मरण आदि फिर कभी बाधा नहीं देते। अतः बताइये, ये महान् देवाधिदेव परब्रह्म परमात्मा किस उपायसे शीघ्र प्राप्त होते हैं ? किस तीव्र तपस्यासे अथवा कितने महान् क्लेश उठानेसे इनके ज्ञानकी उपलब्धि हो सकती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! अपने पौरुषजनित प्रयत्नसे विकासको प्राप्त हुए विवेकके द्वारा उन परमात्म-देवका यथार्थ ज्ञान होता है। इसलिये पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा भवरोगके निवारणके लिये मुख्य औषधोंका संग्रह करना चाहिये। सत्-शास्त्रोंका अभ्यास और सत्पुरुषोंका सङ्ग—ये दो प्रधान औषधें संसाररूपी रोगका नाश करनेवाली हैं। इस जगत्‌में सम्पूर्ण दुःखोंके विनाशकी सिद्धिके लिये एकमात्र पुरुषप्रयत्न ही प्रधान साधन है। उसे छोड़कर दूसरी कोई गति या उपाय काम दे सके, यह सम्भव नहीं। रघुनन्दन ! आत्म-ज्ञानकी प्राप्तिके लिये अपेक्षित उस पुरुषप्रयत्नका स्वरूप कैसा है, जिसका पूर्णतया पालन करनेसे राग-द्वेष-मयी महामारी शान्त हो जाती है—यह बताता हूँ, सुनो। मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि वह यथासम्भव ऐसी वृत्तिके द्वारा जो लोक और शास्त्रके विरुद्ध न हो, निष्कामभावसे जीवन-निर्वाह करता हुआ संतुष्टचित्त हो भोगवासनाका परित्याग करे। अपनी अनुद्विग्नता (उद्वेगशून्यता अथवा शान्तवृत्ति) के द्वारा यथासम्भव उद्योग करके सत्सङ्ग और सत्-शास्त्रोंका अभ्यास—इन दो साधनोंकी सबसे पहले शरण लेनी चाहिये। जो पुरुष प्रारब्धके अनुसार जो कुछ भी मिल जाय, उसीसे संतुष्ट रहता है, सत्पुरुषों अथवा शास्त्रोंद्वारा निन्दित वस्तुकी ओर आँख उठाकर नहीं देखता और सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके अभ्यासमें तत्पर रहता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। देशमें प्रायः सज्जन (शास्त्रोक्त सदाचारमें प्रतिष्ठित) पुरुष जिसे श्रेष्ठ महात्मा कहते हैं, वह यदि ज्ञान-वैराग्य आदि उत्तम गुणोंसे युक्त हो तो अवश्य ही श्रेष्ठ महात्मा है। ऐसे महात्माकी प्रयत्नपूर्वक शरण लेनी चाहिये। सम्पूर्ण विद्याओंमें अध्यात्मविद्या प्रधान है। उस अध्यात्मतत्त्वकी चर्चासे युक्त जो उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं गीता आदि सद्ग्रन्थ हैं, उन्हींको सत्-शास्त्र कहते हैं। उनका विवेकपूर्वक विचार करनेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। जैसे निर्मलीके चूर्णके संसर्गसे जलकी मैल साफ हो जाती है तथा जिस प्रकार योगके अभ्याससे लोगोंकी बुद्धि शुद्ध हो जाती है, उसी प्रकार सत्-शास्त्र और सत्सङ्गसे प्राप्त हुए विवेकके द्वारा अज्ञानका बलपूर्वक निवारण हो जाता है। (सर्ग ६)