भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

निर्वाण-प्रकरण पू०] * शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ * ४३७


आप दया कीजिये। बिना इच्छाके प्राप्त हुए राज्यका त्याग करना उचित नहीं।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! इस प्रकार प्रजावर्गके प्रार्थना करनेपर राजा भगीरथने उनकी बात मान ली और वे सात समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीके स्वामी हो गये। राजा भगीरथ सर्वत्र समभाव रखनेवाले, शान्तचित्त, मननशील, वीतराग एवं मत्सर-रहित थे। जिन्होंने अश्वका अन्वेषण करनेके लिये भूमि खोदकर सागरके सदृश गर्त निर्माण किया था और जो कपिलकी क्रोधाग्निसे पातालतलमें भस्मीभूत हो चुके थे, उन अपने पितामहोंको तारनेमें गङ्गाजल ही समर्थ है, जब यह बात राजाने सुनी; तब भूतलपर गङ्गाजीको लानेके लिये जितेन्द्रिय पृथ्वी-पति भगीरथ मन्त्रियोंके सिरपर समस्त राज्यभार छोड़कर तपके लिये निर्जन अरण्यमें चले गये। उस अरण्यमें हजार वर्षतक ब्रह्माजी, शंकरजी और जह्नु मुनिकी बार-बार आराधना करके वे इस पृथ्वीतलपर गङ्गाजीको ले आये। तभीसे ये पुण्यतोया त्रिपथगा गङ्गाजी, जो निर्मल तरङ्ग-मालाओंसे रक्षित जगत्पति शशिभूषण शिवजीके मस्तकमें सुशोभित तथा महात्माओंके महान् पुण्योंकी राशि हैं, आकाशतलसे पृथ्वीपर गिरती हैं। चञ्चल तरङ्गमालाओंसे सुशोभित, अपने फेनपुञ्जरूप हाससे युक्त, प्रसन्न पुण्यरूपा मञ्जरीसे समन्वित तथा धर्मकी संततिस्वरूप यह त्रिमार्गगामिनी गङ्गा उसी समयसे इस पृथ्वी-पर पृथ्वीपति भगीरथकी समुद्रपर्यन्त कीर्ति विस्तार करनेके लिये एक तरहकी वीथिका ही बन गयी हैं। (सर्ग ७५-७६)


शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ, शिखिध्वजके गुणोंका तथा चूडालाके साथ विवाह और क्रीडाका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! अब तुम अविचल राजा शिखिध्वजकी तरह शान्तिपूर्वक अपने स्वरूपमें स्थित रहो।

श्रीरामजीने पूछा—महान्! यह शिखिध्वज कौन था और उसने परमपद कैसे प्राप्त किया? गुरुवर! उसका चरित्र मुझसे कहिये, जिससे मैं उसे अच्छी प्रकार जान सकूँ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम! अतीतकालीन सातवें मन्वन्तरकी चतुर्थ चतुर्युगीके द्वापर युगमें कुरुवंशमें इसी महासर्गमें शिखिध्वज नामका राजा हुआ था। जम्बूद्वीपमें प्रसिद्ध विन्ध्याचलके समीपवर्ती मालवदेशकी उज्जयिनी नगरीमें वह राजा राज्य करता था। वह धैर्य, औदार्य आदि गुणोंसे युक्त था। उसमें क्षमा, शम, दम विद्यमान थे। वह वीरतासे पूर्ण था। शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें लगा रहता था। मितभाषी था। इस प्रकार वह अनेक गुणोंका खजाना था। समस्त यज्ञोंका निरन्तर अनुष्ठान

४३८          * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *          [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


करता था। उसने बड़े-बड़े धनुर्धारियोंको जीत लिया था। वह लोकोपयोगी शुभकार्योंको करता था और पृथ्वीका पालन करता था। वह कोमल, स्निग्ध और मधुर स्वभाववाला दक्ष तथा प्रेमका समुद्र-सा था । वह सुन्दर, शान्त, भाग्यवान्, प्रतापी और धर्मवत्सल था। वह विनययुक्त वाक्योंका प्रयोग करता था तथा याचकोंको सभी प्रकारके पदार्थ देता था। वह उत्तम पदार्थोंका भोक्ता, सत्सङ्गसे युक्त और समस्त वेद-शास्त्रोंका उत्तम श्रोता था। वह शिखिध्वज सब बातोंको जानते हुए भी जानकारीके अभिमानसे रहित था, स्त्री-व्यसन आदिका तो उसने तृणवत् त्याग कर दिया था। बाल्यकालमें ही उसके पिता स्वर्ग चल दिये थे। उसके बाद अपने बाहुबलसे उस जितेन्द्रिय शिखिध्वजने सोलह वर्षतक स्वयं ही दिग्विजय करके अखिल भूमण्डलको अपनी साम्राज्य-सम्पत्तिमें परिणत कर दिया । तदनन्तर निःशङ्क होकर धर्मसे प्रजाका पालन करते हुए वे बुद्धिमान् राजा शिखिध्वज मन्त्रियोंके साथ अपने यशसे दिशाओंको उज्ज्वल करते हुए स्थित थे।

जब वे युवा हो गये, तब उन्होंने अनेक वन और उपवनोंमें, लीला-सरोवरोंमें, लतागृहोंमें तथा विविध भूमियोंमें विचरण किया । उन्होंने वन और उपवनके गुण-वर्णनसे युक्त शृङ्गाररससे परिपूर्ण कथाओंमें रस लिया तथा सुवर्ण-कलशके सदृश स्तनवाली, हारसे सुशोभित शरीर तथा चञ्चल केशोंसे युक्त कुमारियोंका मनसे आदर किया । चतुर मन्त्रियोंने राजाका अभिप्राय जान लिया । तदनन्तर राजाके विवाहके लिये विचार करके मन्त्रियोंने सौराष्ट्रदेशके राजासे युवती कन्याकी याचना की । राजा शिखिध्वजने नवीन यौवनसे सम्पन्न तथा अपने अनुरूप उस उत्तम कन्याके साथ विधिपूर्वक विवाह किया । राजा शिखिध्वजकी पत्नी संसारमें चूडाला नामसे विख्यात थी । वह भी अपने अनुरूप पति प्राप्तकर प्रफुल्लित हो रही थी । राजा शिखिध्वज नील कमलके सदृश नेत्रवाली उस चूडालाको स्नेहसे प्रसन्न रखते थे । एक दूसरेके प्रति अर्पित चित्तवाले उन दोनोंकी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती थी । हाव, भाव, विलास आदि शृङ्गारमयी चेष्टाविशेषोंसे परिपूर्ण अङ्गोंके कारण वह चूडाला सुन्दर नवीन लताके समान शोभित हो रही थी । शिखिध्वज राजाको मन्त्रियोंद्वारा सभी उपभोग-सामग्री समयानुसार समर्पित की जाती थी । उसकी प्रजा सुव्यवस्थित थी । परम सुखी वह राजा कमलिनीके साथ राजहंसके सदृश उस प्रियतमाके साथ रमण करता था । वे दोनों निरन्तर एक दूसरेसे मिले हुए थे । एक दूसरेकी चेष्टाएँ उन्हें प्रिय लगती थीं । एक दूसरेसे शिक्षाग्रहण करनेके कारण वे दोनों सम्पूर्ण कलाओंके ज्ञाता हो गये थे । परस्पर अत्यन्त मित्रताको प्राप्त हुए वे दोनों एकदूसरेके हृदयमें

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * क्रमसे उन दोनोंकी वैराग्य एवं अध्यात्मज्ञानमें निष्ठा * ४३९

बस जानेके कारण मानो एकरूप ही हो गये थे । जैसे ब्रह्मचारी नियतकालतक गुरुमुखसे अध्ययन करके समस्त शास्त्रोंका पण्डित हो जाता है, वैसे ही कुछ नियतकाल-तक अपने स्वामीके मुखसे सुन-सुनकर समस्त शास्त्रोंके तात्पर्यमें और चित्रकला आदिमें भी चातुर्य प्राप्तकर चूडाला समस्त विषयोंकी पण्डिता हो गयी थी तथा चूडालाके द्वारा इस शिखिध्वजने भी नृत्य, वाद्य आदि जितने कला-कौशल हैं, उन सबका शिक्षण ग्रहण किया और वे कलाओंके पारंगत विद्वान् हो गये । उन दोनोंकी बुद्धि चातुर्यसे युक्त तथा सुन्दर थी । वे दोनों स्नेहसे प्रसन्न और मधुर लगते थे । ज्ञानतत्त्वका कथन करनेमें भी वे समान थे । श्रेष्ठ पुरुषोंका अनुकरण करते थे । सदाचार-परायण थे । प्रजाजनोंके वृत्तान्तका भी ज्ञान रखते थे । वे समस्त कलाओंके पण्डित एवं शृङ्गारादि नवरसरूपी रसायनोंसे सुशोभित थे ।

(सर्ग ७७)


क्रमसे उन दोनोंकी वैराग्य एवं अध्यात्मज्ञानमें निष्ठा तथा चूडालाको यथार्थ ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इसी प्रकार अनेक वर्षोंतक दृढ़ प्रेमसे सम्पन्न उस दम्पतीने प्रतिदिन यौवनकी आनन्द लीलाओंद्वारा रमण किया । यों एकके बाद एक करके अनेक वर्ष बीत गये और फूटे हुए घड़ेसे जलके क्षय होनेकी भाँति धीरे-धीरे तारुण्यका क्षय होते देख उन दोनोंने विचार किया—'समुद्रकी तरङ्गोंके समान चञ्चल, क्षणभङ्गुर शरीरसे व्यवहार करनेवाले जीवका पके हुए फलके पतनकी तरह मरण अवश्यम्भावी है । अब इस देहमें वृद्धावस्था आनेकी तैयारी कर रही है; क्योंकि आयु निरन्तर क्षीण होती जाती है । यह जीर्ण जीवन इन्द्रजालके सदृश असत्य ही है । यह शरीर वर्षाकालमें जलके बुद्बुदकी भाँति क्षणभरमें ही विलीन हो जानेवाला है । विचार -करनेसे जगत्‌का यह व्यवहार कदली-गर्भके सदृश निस्सार ही सिद्ध होता है । इस संसारमें ऐसी कौन वस्तु है, जो शुभ, सुस्थिर एवं अत्यन्त सुन्दर हो, अर्थात् कोई भी नहीं है ।' उस दम्पतीने इस प्रकार निश्चय करके संसाररूपी व्याधिकी असली औषध अध्यात्मशास्त्रका दीर्घकालतक विवेकपूर्वक विचार किया । केवल आत्मज्ञानसे ही संसाररूपी महामारी शान्त हो जाती है, यह निर्णयकर वे दोनों आत्माका ज्ञान सम्पादन करनेमें तत्पर हो गये । अध्यात्मज्ञानमें ही उनका चित्त लग गया था । प्राण भी उसीमें लगे थे । उसीमें उनकी निष्ठा थी । अध्यात्मज्ञानका ही उन्होंने आश्रय लिया था । वे उसीकी अर्चनामें लगे रहते थे । उनकी इच्छा भी अध्यात्म-ज्ञानकी ही रहती थी और उस समय इस संसारसे वे दोनों विरक्त हो गये थे । उन्होंने अध्यात्मज्ञानमें ही दृढ़ अभ्यास बढ़ा लिया था । वे एक दूसरेको अध्यात्मज्ञानका ही प्रबोध कराते थे । उनकी प्रीति उसी ज्ञानमें थी एवं परस्पर उनका समस्त आरम्भ उसीमें होता था ।

तदनन्तर वह चूडाला अध्यात्मविषयको जाननेवाले महात्माओंके मुखसे संसार-दुःखसमुद्रसे पार करनेमें समर्थ आत्मज्ञानोपयोगी मनोहर पदक्रमोंसे संयुक्त शास्त्रार्थोंका निरन्तर श्रवण करके बाह्य शरीरके व्यापारोंसे उपरत और उज्ज्वल प्रबुद्धबुद्धिसे युक्त हो अपनी आत्माके विषयमें इस प्रकार अहर्निश विचार करने लगी ।

'अब मैं स्वयं विवेचन करके अपने आपका पता लगाती हूँ कि मैं क्या हूँ तथा यह संसाररूप मोह किसको, कैसे, कहाँसे प्राप्त हुआ है । यह देह तो जड़ है; इसलिये देह मैं नहीं हूँ, यह अटल निश्चय है । हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रिय-समुदाय भी इस शरीरसे अभिन्न अवयवरूप ही हैं । कभी अवयव और अवयवीमें भेद नहीं होता, इसलिये वे भी जड़ ही हैं । ज्ञानेन्द्रिय-

४५० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ-

समुदाय भी शरीरावयवरूप ही है, इसलिये वह भी जड ही दीख पड़ता है। संकल्पात्मक शक्ति रखनेवाला जो मन है, उसे भी मैं जड ही मानती हूँ; क्योंकि ज्ञानेन्द्रियाँ मनसे ही प्रेरित होती हैं। जैसे गोफनसे पाषाण प्रेरित होता है, वैसे ही मन भी बुद्धिके निश्चयोंसे प्रेरित होता है; इस तरह निश्चयरूपा बुद्धि भी जड ही है, यह अटल निश्चय है। अहंकार भी सारशून्य तथा मुर्देके सदृश है, इसलिये जड ही है; क्योंकि बुद्धि अहंकारसे प्रेरित होती है। अहंकार भी जड ही है, क्योंकि वह जीवात्मासे अध्यस्त है। यह चेतन जीव प्राणवायुरूप उपाधिसे उपहित हुआ हृदयमें रहता है। वह परमात्माका अंश होनेके कारण परमात्माकी सत्तासे ही सत्तावान् है। चेतनस्वरूप आत्मा मिथ्या जड विषयोंके साथ तादात्म्य एवं संसर्गका अभ्यास करके ही जड-जैसा बन जाता है और अपने असली शुद्ध चिन्मय स्वरूपको भूल जाता है। चेतन जीवात्माकी विषयोंके साथ एकाग्रता होनेपर वह एक क्षणमें अपने स्वरूपको भूलकर तत्स्वरूप हो जाता है। इस प्रकार जब विषयोंके सम्मुख होनेसे यह चेतन जीवात्मा जड, शून्य, मिथ्याके समान हो जाता है, तब चिन्मय परमात्माके द्वारा प्रबोधित किया जाता है।'

इस प्रकार विचारकर फिर उस चूडालाने यह सोचा कि किस उपायसे यह जीवात्मा प्रबुद्ध हो। बहुत समयके बाद उसने आत्मतत्त्वको जान लिया और वह कहने लगी—'अहो! बड़े आनन्दका विषय है कि दीर्घकालके बाद मुझे उस निर्विकार जानने योग्य परमात्माके स्वरूपका अनुभव हो गया, जिसे जान लेनेपर पुरुष फिर उससे च्युत नहीं होता। वास्तवमें एक महान् चेतन परमात्मा ही इस संसारमें सत्यरूपसे विराजमान है। उसको महासत्ता भी कहते हैं। यह निष्कलङ्क, समरूप, विशुद्ध और अहंकाररहित है। उसका स्वरूप शुद्ध विज्ञान ही है। वह परम मङ्गलमय केवल सत्यस्वरूप है। वह अपने परमानन्द-स्वरूपसे कभी विचलित नहीं होता। एक बार उसका साक्षात्कार हो जानेपर वह फिर सदा प्रत्यक्ष रहता है, उसका कभी अभाव नहीं होता। वह ब्रह्म, परमात्मा आदि नामोंसे कहा गया है। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयरूप त्रिपुटी इस परमात्मासे भिन्न कोई वस्तु नहीं है। वह चेतन परमात्मा ही मन, बुद्धि, आदि इन्द्रिय पदार्थोंके रूपमें प्रकट होकर क्रियाशील होता है। जैसे समुद्रके जलमें तरङ्ग आदि वास्तवमें उत्पन्न न हुए भी उत्पन्न हुए-से प्रतीत होते हैं, वैसे ही महाचेतनमें जगत् वास्तवमें उत्पन्न न होते हुए भी उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। इस नित्य चिन्मय परमात्माके जन्म, मरण, सद्गति, असद्गति या नाशकी कहीं सम्भावना ही नहीं है। यह परमात्मा अच्छेद्य, अदाह्य और परम विशुद्ध है। अहा! मैं बहुत कालके बाद शान्त होकर सब ओरसे परम निर्वाणपदको प्राप्त हुई हूँ। कुम्हार आदिके द्वारा बनायी गयी मृत्तिकाकी सेना जैसे मृत्तिकारूप ही है, वैसे ही सुर, असुर आदिसे युक्त यह विश्व स्वभावतः परब्रह्मस्वरूप ही है तथा द्रष्टा एवं दृश्यरूप सत्ता भी एक चैतन्य-स्वरूप ही है। यह ऐक्य है, यह द्वैत है; यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ इत्यादि भ्रमजनित मोह क्या चीज है और वह किस तरह, किसको, कहाँसे और कहाँ हुआ है? अर्थात् किसीको कहीं नहीं। यह सब मिथ्या है। अतः मैं अपने अंदर अनन्त पारमार्थिक स्वरूपको अनायास प्राप्तकर अब शान्तरूपसे स्थित हूँ। न तो इदं है, न अहं है और न दूसरा है एवं न भाव है ओर न अभाव ही है। सब कुछ शान्त, निरालम्ब केवल परब्रह्मस्वरूप परमात्मा ही है।' इस प्रकार परमात्माके मननमें परायण वह चूडाला यथार्थ ज्ञानके द्वारा उस परमात्माके वास्तविक स्वरूपको तत्त्वसे जानकर राग, भय, मोह आदि अज्ञान-विकारोंके शान्त होनेसे उसी प्रकार शान्त हो गयी, जैसे शरत्-कालमें आकाश बादलोंसे रहित हो जाता है। (सर्ग ७८)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चूडालाको अपूर्व शोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना * ४४१

चूडालाको अपूर्व शोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना और उससे वार्तालाप करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! चूडाला संसारके सम्बन्धों, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों, राग और इच्छाओंसे रहित हो गयी थी। वह न किसी पदार्थका ग्रहण करती थी और न किसीका त्याग करती थी। केवल न्यायसे प्राप्त आचरण करती थी। संसाररूपी महासमुद्रको वह पार कर गयी थी। संदेहरूपी जालसे मुक्त हो गयी थी। वह परमात्माके महान् लाभसे परिपूर्ण हो गयी थी। इस प्रकार सुन्दर वर्णवाली शिखिध्वजकी श्रेष्ठ धर्मपत्नी वह चूडाला थोड़े ही कालमें जाननेयोग्य परमात्माको यथार्थ जान गयी। अपने विवेकके दृढ़ अभ्यास-बलसे परमात्माका यथार्थ अनुभव हो जानेपर वह परम शोभा पाने लगी। किसी समय उस सुन्दर अङ्गोंवाली चूडालाको अपूर्व शोभासे युक्त देख राजा शिखिध्वजने हँसते हुए कहा—'प्रिये ! इस समय तुम वैसे ही अत्यन्त सुशोभित हो रही हो, जैसे तुमने अमृतका सार पी लिया हो या अलभ्य परमात्मपदकी प्राप्ति कर ली हो अथवा आनन्दप्रवाहसे तुम परिपूर्ण हो गयी हो। इस समय मैं तुम्हारे चित्तको भोग लालसासे रहित, शान्त, विवेकसे बलिष्ठ, समताको प्राप्त, गम्भीर और चञ्चलतारहित देख रहा हूँ। तुम्हारे मनके साथ किसी भी विभ्रमानन्दकी वस्तुसे उपमा नहीं दी जा सकती। भद्रे ! क्या तुमने अमृत पी लिया है या किसी साम्राज्यकी प्राप्ति कर ली है या मन्त्रके प्रयोग या योगके साधनसे अमरता प्राप्त कर ली है? नीलकमलके सदृश नेत्रोंवाली ! क्या तुमने राज्य, चिन्तामणि और त्रैलोक्यसे भी बढ़कर किसी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति कर ली है?'

चूडालाने कहा—आर्य ! इस समस्त विनाशशील संसारका त्यागकर इससे भिन्न सत्-असत्-स्वरूप सर्वात्मक परमात्माका मैंने आश्रय लिया है, इसीलिये मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। एकमात्र आकाश-सदृश विमल अद्वितीय केवल हृदयरूप चिन्मय हृदमें अकेली ही मैं रमण करती हूँ, राजलीलाओंमें मैं कभी रमण नहीं करती; इसलिये मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। मूल्यवान् आसन, उद्यान और घरोंमें रहकर भी मैं परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहती हूँ तथा विषय-भोगोंसे दूर हूँ; इसीलिये मैं परम शोभायुक्त हुई स्थित हूँ। मैं सुख-सम्पत्ति नहीं चाहती, न अर्थ और अनर्थको ही चाहती हूँ; दूसरी किसी प्रकारकी स्थिति भी नहीं चाहती। जो कुछ न्यायसे प्रारब्धानुसार प्राप्त होता है, उसीसे संतुष्ट रहती हूँ। इसीसे मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। राग और विद्वेषको विनष्ट कर देनेवाली आत्मविषयक बुद्धि और शान्तदृष्टिरूपी सखियोंके साथ मैं रमण करती हूँ; इसलिये मैं परम शोभासम्पन्न होकर स्थित हूँ।

(सर्ग ७९)

४३२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


राजा शिखिध्वजका चूडालाके वचनोंको अयुक्त बतलाना, चूडालाका एकान्तमें योगाभ्यास करना एवं श्रीरामचन्द्रजीके पूछनेपर श्रीवसिष्ठजीके द्वारा कुण्डलिनीशक्तिका तथा विभिन्न शरीरोंमें जीवात्माकी स्थितिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परमात्माके स्वरूपमें स्थित उस चूडालाके इस प्रकार कहनेपर उसके वचनोंका रहस्य न जाननेके कारण राजा शिखिध्वज हँसते हुए कहने लगे।

शिखिध्वजने कहा—सुन्दरी राजपुत्रि ! तुम बालबुद्धि हो। तुम्हारा वचन युक्तिसंगत नहीं है। तुम जिस प्रकार राजलीलाओंमें रमण करती आयी हो, उसी प्रकार रमण किया करो। भद्रे ! बतलाओ तो सही जो वस्तु आकार-सामान्यका परित्याग करके कभी भी प्रत्यक्ष न होनेवाली निराकारताको प्राप्त हो चुकी है, वह प्रत्यक्ष और अस्तित्वसे शून्य वस्तु कैसे शोभित हो सकती है ? धनादि समस्त भोग-वस्तुओंका परित्याग करके जो एक शून्य आकाशमें ही रमण करता है, वह शोभित होता है—यह कहना कैसे संगत हो सकता है ? जो धीरबुद्धि पुरुष वस्त्र, भोजन, शय्या आदि सारे साधनोंका परित्याग करके अकेला स्वरूपमें ही स्थित रहता है, वह कैसे शोभित हो सकता है ? इसलिये सुन्दरी ! तुम बाला हो, मुग्धा हो और चपल हो । विलासिनि ! अनेक प्रकारके आलाप-विलासोंसे जिस तरह मैं क्रीड़ा करता हूँ, उसी तरह तुम भी क्रीडा करो।

राजा शिखिध्वजने इस प्रकार अपनी प्रिया चूडालाके प्रति कहकर अट्टहास करते हुए मध्याह्नमें स्नान करनेके लिये उठकर चूडालाके महलसे प्रस्थान किया । 'बड़े दुःखका विषय है कि अभीतक राजा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं हुए हैं। मेरे वचनोंको भी वे न समझ सके— इस प्रकारके विचारसे खिन्न हुई वह चूडाला अपने कार्यमें संलग्न हो गयी । रामभद्र ! तदनन्तर वहींपर उस प्रकारके भिन्न-भिन्न आशयसे युक्त उन दोनोंका उस समय भी पहलेकी सांसारिक क्रीड़ाओंमें उसी तरह बहुत काल चला गया । एक समयकी बात है, नित्यतृप्त और इच्छारहित चूडालाको लीलावश आकाशमें गमनागमन करनेकी स्फुरणा हुई । तब वह राजपुत्री आकाशमें गमनागमनकी सिद्धिके लिये सम्पूर्ण भोगोंकी अवहेलना करके और निर्जन स्थानमें आकर अकेली ही एकान्तमें आसन लगाकर ऊर्ध्वगामी प्राणवायुका निरोध करनेके लिये अभ्यास करने लगी ।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा शिखिध्वजका चूडालाके वचनोंको अयुक्त बतलाना * ४५३


श्रीरामजीने कहा—प्रभो ! जो-अनात्मज्ञ पुरुष हैं, वे अपनी सफलताके लिये अथवा जो आत्मज्ञ हैं, वे केवल लीलाके लिये किस क्रमसे इन सिद्धियोंको सिद्ध करते हैं, वह मुझसे कहिये ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—प्रिय राघव ! इस जगत्‌में सभी जगह ग्राह्य वस्तु तीन तरहकी होती है—उपादेय (ग्रहण करनेयोग्य), हेय (त्याज्य) और उपेक्षाके योग्य । सद्बुद्धे ! जो वस्तु साक्षात् या परम्परासे सुखदायक होती है, वह उपादेय होती है; जो सुख-विघातक होती है, वह हेय होती है एवं जो वस्तु इन दोनोंके बीचकी होती है, वह उपेक्ष्य होती है—ऐसा अनुभवी लोगोंका कहना है । परमात्मतत्त्वको जाननेवाले श्रेष्ठबुद्धि विद्वान्‌की दृष्टिमें जब यह सब परमात्मस्वरूप हो जाता है, तब इन तीनों पक्षोंमेंसे कोई भी पक्ष नहीं रहता । किसी समय ज्ञानी व्यवहारकालमें लीलासे ही इस समस्त जगत्‌को

उपेक्षा-बुद्धिसे केवल देखता है और समाधिकालमें नहीं देखता । ऐश्वर्यादि एक ही वस्तु ज्ञानीकी दृष्टिमें उपेक्षाके योग्य, मूढ़की दृष्टिमें उपादेय और उत्तम वैराग्यसम्पन्न पुरुषकी दृष्टिमें हेय हो जाती है । श्रीराम ! आकाशगमन आदि सिद्धियोंका क्रम कैसा है, उसे तुम अब सुनो । देश, काल, क्रिया एवं द्रव्यकी अपेक्षा रखनेवाली सब तरहकी सिद्धियों यहाँ जीवको मोहित करती हैं । मणि, ओषधि, तप, मन्त्र और क्रियासे होनेवाली सिद्धिके क्रमका निरूपण अनावश्यक, है; क्योंकि यह अध्यात्मविषयमें विघ्न ही है । कृतार्थ श्रीराम ! सिद्धदेशके नामसे प्रसिद्ध श्रीशैल अथवा मेरु पर्वत-पर निवास करनेवाले पुरुषको सिद्धि होती है—उसका भी विस्तारपूर्वक वर्णन करना अध्यात्मविषयमें हानिकर है । इसलिये शिखिध्वजकी कथाके प्रसङ्गसे प्राप्त सिद्धिरूपी फलसे युक्त इस प्राणादि वायुकी अभ्यास-क्रियाको तुम श्रवण करो । साध्य अर्थसे भिन्न पदार्थोंकी वासनाओंका त्याग करके गुदा आदि द्वारोंके संकोचसे; सिद्धादि आसन, काया, मस्तक और गर्दनकी समता, निश्चलता तथा नासिकाके अग्रभागमें दृष्टिको स्थिर करना आदि योगशास्त्रोक्त क्रियाओंसे; भोजन और आसनकी पवित्रतासे, भलीभाँति योगशास्त्रके परिशीलनसे, उत्तम आचरणसे, सज्जनोंके सङ्गसे, सर्वत्यागसे, सुखासनसे बैठकर कुछ कालतक प्राणायामके दृढ़ अभ्याससे, क्रोध-लोभ आदिके सर्वथा त्यागसे तथा भोगोंके त्यागसे एवं रेचक, पूरक और कुम्भकका अच्छी तरह अभ्यास हो जानेपर प्राणोंपर पूर्ण प्रभुत्व हो जानेसे योगीके पाँचों प्राण उसी तरह उसके अधीन हो जाते हैं, जिस तरह राजाके सेवक राजाके वशमें होते हैं ।

राघव ! प्राणायामके द्वारा देहमें स्थित प्राण-समान वायुके अपने अधीन हो जानेपर राज्यसे लेकर मोक्षपर्यन्त सभी सम्पत्तियाँ सुखसाध्य हो जाती हैं । मण्डलाकार (गोल कुण्डलाकार) से युक्त, मर्म (नाभि) स्थानमें

५४४* अविच्छिन्नविचारैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

समाश्रित, सौ नाड़ियोंकी आश्रय आन्त्रवेष्टनिका (सुषुम्ना) नामकी नाड़ी है। श्रीराम ! देव, असुर, मनुष्य, मृग, नक्र, खग, कीट, पतङ्ग आदि सब प्रकारके प्राणियोंमें वह नाड़ी स्थित है। गुदासे लेकर भौंहके बीचतक सब छिद्रोंका स्पर्श करती हुई वह सुषुम्ना नाडी मनकी वृत्तियोंसे भीतर चञ्चल और बाहर प्राणादिसे स्पन्दयुक्त होकर सदा स्थित रहती है। वह कुण्डलाकार वाहिनी है, इसलिये कुण्डलिनी नामसे कही गयी है। वह सब प्राणियोंकी परमा शक्ति है तथा प्राण, इन्द्रिय, बुद्धि आदि सभी शक्तियोंकी सत्तास्फूर्तिकी निर्वाहक होनेसे सबको वेग प्रदान करनेवाली है। वही अपने मुखसे प्राणवायुको ऊपर फेंकती है और अपानको नीचे खींचती है, इसलिये सदा साँस खींचती हुई स्पन्दनमें हेतु बनी वह ऊपरकी ओर मुँह करके कुपित सर्पिणीकी तरह स्थित रहती है। यह कोमल स्पर्शवाली कुण्डलिनी कमलमें भ्रमरकी तरह देहमें जैसे-जैसे स्फुरित होती है, वैसे-वैसे अन्तःकरणमें ज्ञान होता है। उस कुण्डलिनीमें हृदयकोशकी समस्त नाड़ियाँ सम्मिलित हैं। वे सब नाड़ियाँ सागरमें नदियोंकी तरह उसीसे बारंबार उत्पन्न होती हैं तथा उसीमें विलीन होती जाती हैं। प्राणरूपसे उसके ऊर्ध्वगमनमें उत्सुक होने तथा अपानरूपसे अधःप्रवेशकी ओर उन्मुख होनेसे एक वही सम्पूर्ण ज्ञानोंकी साधारण बीज कही गयी है।

निष्पाप श्रीराम ! पशुओंसे लेकर स्थावर आदि देहोंमें तथा मनुष्यादि शरीरोंमें जिस तारतम्यसे जीवात्मा रहता है, यह मैं तुमसे क्रमशः कहता हूँ, सुनो। यह सत्य, नित्य चेतन, विकारशून्य और अनामय जीवात्मा अपनी कल्पनासे पञ्चभूतोंके रूपसे स्थित होता है। पूर्वकृत कर्मोंके अनुसार जीवात्माकी कल्पनासे पञ्चभूत मनुष्यादि देहभावकी, तिर्यग् देहभावकी, सुवर्णभावकी, देशादिभावकी और द्रव्यादिभावकी प्राप्ति होती है। रघुनन्दन ! इस तरह यह संसार केवल पञ्चभूतका विकासमात्र ही है और वह चेतन जीवात्मा ही यहाँ सर्वत्र विद्यमान है। वही जीवात्मा केवल पञ्चभूतोंके सम्बन्धसे मनुष्यादि देहोंमें बौद्धिक ज्ञानकी विशेषताके कारण चेतन-प्रधान, कहीं (तिर्यगादिमें) जड-चेतन उभय-प्रधान और वृक्ष, पहाड़ आदि स्थावर योनियोंमें जड-प्रधान रहता है। निष्पाप श्रीराम ! देहादि आकारमें परिणत पञ्चभूत जीवका संकल्प होनेके कारण जीव कहलाता है और पहाड़ आदि तो केवल जड ही हैं एवं वृक्षादि स्थावर बाहरकी वायुसे स्पन्दनशील (चेष्टावान्) होते हैं।। पञ्चभूतसमूहात्मक मेरु पर्वत आदि तो तृणकी भाँति जड हैं; किंतु ये वृक्ष, कीट आदि स्थावर-जंगम प्राणी चेतन हैं। इनमें वृक्ष आदि स्थावर जातिकी वासना निद्राग्रस्त मनुष्यकी वासनाकी भाँति प्रसुप्त है तथा मनुष्य और देवता आदिमें बुद्धिकी अधिकताके कारण उनकी वासना प्रबुद्ध है। पशु, पक्षी आदि मलिन वासनासे युक्त हैं, किंतु मनुष्योंमें कुछ मोक्षमार्गी मनुष्य वासनाओंसे रहित हैं; क्योंकि वे विवेकको प्राप्त हो गये हैं। अतः वे इस संसारमें पुनः जन्म-धारण नहीं करते; किंतु इनसे भिन्न अविवेकी मनुष्य बार-बार संसारमे भ्रमण करते रहते हैं।

(सर्ग ८०)


आधि और व्याधिके नाशका तथा सिद्धिका और सिद्धोंके दर्शनका उपाय

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—मुनीश्वर ! इस शरीरमें आधि (मानसिक) और व्याधि (शारीरिक) रोग किससे उत्पन्न होते हैं तथा किससे विनष्ट होते हैं ! यह मुझको समझाकर कहिये।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * आधि और व्याधिके नाशका तथा सिद्धिका और सिद्धोंके दर्शनका उपाय * ४५५


श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! आधि और व्याधि—ये दोनों दुःखके कारण हैं। औषधादिके द्वारा इनकी निवृत्तिसे सुख प्राप्त होता है तथा ज्ञानके द्वारा इनका समूल नाश होता है। वही मोक्ष कहलाता है। शरीरके अंदर आधि और व्याधियाँ कभी परस्पर एक दूसरेकी कारण बनकर उत्पन्न होती हैं अर्थात् कभी आधिसे व्याधि हो जाती है और कभी व्याधिसे आधि हो जाती है। कभी आधि-व्याधि—दोनों एक साथ हो जाती हैं और कभी सुखके अनन्तर दुःखरूप ये आधि-व्याधि क्रमसे उत्पन्न होती हैं। शारीरिक दुःखको व्याधि कहते हैं और वासनामय मानसिक दुःखको आधि। श्रीराम ! यह जान लेना चाहिये कि अज्ञान ही इन दोनोंका मूल कारण है। यथार्थ ज्ञान होनेपर इनका अवश्य विनाश हो जाता है। यथार्थ परमात्म-ज्ञान और इन्द्रिय-निग्रहके अभावसे, राग-द्वेषमें फँस जानेसे तथा यह प्राप्त हो गया, यह प्राप्त होना शेष है—इस तरह रात-दिन चिन्ता करनेसे जड़ताके कारण महामोहदायिनी आधियाँ (मानसिक व्यथाएँ) उत्पन्न होती हैं। प्रबल इच्छाओंके पुनः-पुनः स्फुरित होनेसे, मूर्खतासे, चित्तके न जीतनेसे, दुष्ट अन्न खानेसे तथा श्मशान आदि निकृष्ट स्थानोंमें निवास करनेसे शरीरमें व्याधियाँ (शारीरिक रोग) उत्पन्न होती हैं। आधी रातमें तथा प्रदोषादि कालमें भोजन एवं मैथुनादि व्यवहारसे, दुष्कर्म करनेसे, दुर्जनोंकी सङ्गतिरूप दोषसे तथा विष, सर्प, व्याघ्र और चोर आदिका मनमें भय होनेसे शरीरमें व्याधि उत्पन्न होती हैं। नाड़ियोंके छिद्रोंमें अन्नके रसका प्रवेश न होनेके कारण नाड़ियोंके क्षीण होनेसे अथवा उन छिद्रोंमें अन्नके रस एवं वायु आदिके अधिक प्रवेश हो जानेके कारण नाड़ियोंके एकदम भर जानेसे, कफ, पित्त आदिके प्रकोपसे, प्राण तथा शरीरके व्याकुल हो जाने आदि अनेक दोषोंके द्वारा रोग उत्पन्न होता है।

अभिमतपदार्थोंकी प्राप्ति होनेसे व्यावहारिक व्याधियाँ तथा आधि (अज्ञान) के क्षयसे आधिसे उत्पन्न मानसिक व्याधियाँ भी भलीभाँति नष्ट हो जाती हैं। राघव ! आत्मज्ञानके बिना जन्मादि विकारोंकी जड़ व्याधि (अज्ञान) नष्ट नहीं होती, क्योंकि रज्जुके यथार्थ ज्ञानसे ही रज्जुमें प्रतीत होनेवाला सर्प नष्ट होता है। जैसे वर्षाकालकी नदी अपने तटके सभी वृक्षोंको जड़से उखाड़ फेंकती है, वैसे ही सम्पूर्ण आधि और व्याधियोंको जड़से उखाड़ फेंकनेवाला जन्मादि विकारोंकी मूल अज्ञानरूपी व्याधिका क्षय ही है, जो परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे होता है। सामान्य व्याधियाँ तो आयुर्वेदोक्त ओषधियों तथा मन्त्रादि शुभ कर्मोंसे अथवा वृद्धोंकी परम्परासे कथित औषधोंसे नष्ट हो जाती हैं। श्रीराम ! तीर्थोंमें स्नान, मन्त्र, औषध आदि उपाय, वृद्धजनोंसे प्राप्त हुई ओषधियाँ तथा आयुर्वेदशास्त्रको तो आप स्वयं खूब जानते हैं। इनसे अतिरिक्त और मैं क्या आपको उपदेश दूँ।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—गुरुवर ! आधिसे व्याधि कैसे उत्पन्न होती है और औषधके अतिरिक्त मन्त्र, पुण्य आदिरूप युक्तिसे वह कैसे नष्ट होती है ?

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! मानसिक पीड़ाओंसे चित्तके व्याकुल हो जानेपर शरीरमें क्षोभ हो जाता है; इसलिये क्रोधी मनुष्य अपने आगेका उचित मार्ग नहीं देख पाता। वह उचित मार्गको न देखकर कुमार्गकी ओर उसी प्रकार दौड़ता है, जिस प्रकार बाणसे घायल हुआ हरिण अपने स्वाभाविक मार्गको छोड़कर अन्य मार्गकी ओर दौड़ता है। प्राण-वायुके विषम चलनेपर कफ, पित्त आदिके भर जानेसे नाड़ियाँ विषम स्थितिको प्राप्त हो जाती हैं, जैसे राजाके अव्यवस्थित हो जानेपर वर्णाश्रमकी मर्यादा विषम-स्थितिको—विप्लवदशाको प्राप्त हो जाती है। प्राण-वायुके संचारका क्रम बिगड़ जानेसे खाया हुआ अन्न कुजीर्णता, अजीर्णता

४५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


या अजीर्णतारूप दोषको ही प्राप्त होता है । इस तरह आधिसे व्याधि उत्पन्न होती है और आधिके अभावसे व्याधि भी नष्ट हो जाती है । जिस प्रकार मन्त्रोंसे व्याधियाँ विनष्ट होती हैं—वह भी क्रम तुम सुनो। जिस तरह हर्रेका फल खानेसे स्वाभाविक ही दस्त लग जाते हैं, उसी तरह वायु, अग्नि, पृथ्वी, जल आदिके बीजरूप यँ रँ लँ वँ आदि मन्त्रोंके वर्ण भी मान्त्रिक भावनाके वशमें नाड़ियोंमें रोगाकारमें परिणत अन्नरसोंका उत्सारण, पाचन आदि कार्य करते हैं । साधु-सेवारूप पवित्र पुण्यक्रियासे मन निर्मलताको प्राप्त होता है । चित्तके शुद्ध हो जानेपर शरीरमें आनन्द बढ़ता है । अन्तः-करणकी शुद्धिसे ये प्राणवायु अपने क्रमसे बहते हैं और अन्नका उचित परिपाक करते हैं। इससे सब व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं । श्रीराम ! इस प्रकार आधि और व्याधिके नाश तथा उत्पत्तिके क्रमका वर्णन मैंने तुमसे कर दिया । अब तुम प्रकृत प्रसंगको सुनो ।

राघव ! पुर्यष्टक नामक लिङ्गात्मक जीवकी आधार-भूत कुण्डलिनीको तुम सुगन्धकी आधारभूत पुष्पमञ्जरीकी भाँति जानो । पूरकके अभ्याससे जब प्राणी कुण्डलिनीको भर करके यानी कूर्माकार नाड़ीमें प्राणवायुको रोक-कर समरूपसे स्थित होता है, तब मेरु पर्वतके समान स्थिरता अर्थात् भैरवी सिद्धि तथा कायाकी गुरुता ( गरिमा नामक सिद्धि ) उसे प्राप्त होती है । जिस समय पूरकसे पूर्ण शरीरके भीतर मूलाधारसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त लंबा करके प्राणवायुको ऊपर खींचकर प्राणवायुके निरोधसे उत्पन्न गरमी और तद्युक्त शारीरिक और मानसिक कष्ट सहन करनेके लिये संवित् ( कुण्डलिनी ) ऊपरकी ओर पहुँचायी जाती है । उस समय प्राणवायुको ऊपर खींचनेसे दण्डके सदृश लंबी होकर वह कुण्डलिनी देहमें बँधी हुई लताके समान सब नाड़ियोंको अपने साथ लेकर अधिक अभ्यास होनेके कारण सर्पिणीकी भाँति शीघ्र ऊपर चली जाती है । उस समय नाड़ियोंमें वायु भर जानेसे पैरसे लेकर मस्तकतक बिल्कुल हलके हुए इस शरीरको कुण्डलिनी इस प्रकार ऊपर उठा ले जाती है, जिस प्रकार पवनमें पूर्ण जलगत भारी मनुष्यको जलके ऊपर उठा ले जाती है, यही योगियोंका आकाशगमन है । इस प्रकार अभ्याससे युक्त आकाशगामी योगसे* अर्थात् आकाशके साथ शरीरका सम्बन्ध रखनेके लिये किये गये संयमरूप योगसे योगी लोग ऊर्ध्व गतिको प्राप्त हो जाते हैं । जिस समय दूसरी नाड़ियोंके व्यापारको रोक देनेवाले रेचक प्राणायामके प्रयोगसे ऊपरकी ओर खींच ली गयी कुण्डलिनीरूपा प्राणशक्ति सुषुम्ना नाड़ीके भीतर प्राणवायुके प्रवाहसे मस्तकके दोनों कपालोंकी संधिरूप कपाट ( किवाड़ ) के बारह-बारह अंगुल स्थानमें मुहूर्तभरके लिये स्थित रहती है, उस समय आकाशगामी सिद्धोंके दर्शन होते हैं;† किंतु अज्ञानका आश्रय करनेवाला मलिन पुरुष इन्द्रियोंसे या दूसरे किसी अदिव्य उपायसे या इस पृथ्वीपर विचरण करनेवाला कोई भी पुरुष वायुरूप आकाशगामी सिद्धोंको कभी नहीं देख सकता । परंतु राघव ! योगके अभ्याससे मनके संस्कृत हो जानेपर विषयोंसे दूर संस्थित बुद्धिरूपी नेत्रसे स्वप्नकी भाँति आकाशगामी सिद्ध दिखायी देते हैं और वे अभीष्ट अर्थोंको भी देते


* इसका वर्णन योगदर्शनमें इस प्रकार आया है—
'कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतू-
लसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ।'
( योग० विभूति० ४२ )
'शरीर और आकाशके सम्बन्धमें संयम करनेसे अथवा हल्की वस्तु ( रूई आदि ) में संयम करनेसे आकाशमें चलनेकी शक्ति आ जाती है ।'

† योगदर्शनमें बतलाया गया है—
'मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ।' ( योग० विभूति० ३२ )
'सिरके कपालमें एक छिद्र है, इसीको ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं, वहाँ जो प्रकाशमयी ज्योति है उसमें संयम करनेवालेको पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें विचरण करनेवाले सिद्धोंके दर्शन होते हैं ।'

निर्वाण-प्रकरण पू०] * ज्ञानसाध्य वस्तु और योगियोंकी परकाय-प्रवेश-सिद्धिका वर्णन * ५४७

हैं। जिस प्रकार स्वप्नमें पदार्थोंका अवलोकन होता है, उसी प्रकार सिद्धोंके भी दर्शन होते हैं। केवल स्वप्नकी अपेक्षा विशेषता यही है कि सिद्धोंकी प्राप्तिमें संवाद, वरदान आदि फलरूप पदार्थोंकी प्राप्ति होती है।

रेचक प्राणायामके अभ्यासरूप युक्तिसे मुखसे बारह-बारह अंगुलपरिमित देशमें प्राणको चिरकालतक स्थित रखनेपर योगी अन्य शरीरमें प्रवेश कर सकता है। सारे शरीरमें प्रदीप्त उस जाठराग्निसे स्वभावतः शीत-वातात्मक वह शरीर ऐसे ही उष्णताको प्राप्त होता है जैसे सूर्यसे तीनों लोक। तारोंके आकारके समान तथा हृदयपद्ममें सुवर्ण-भ्रमरके सदृश वह तेज इस शरीरमें चारों ओर विचरता है, जो योगियोंकी—चिन्त्य दशाको प्राप्त है अर्थात् योगी लोग जिसकी उपासना करते हैं। इस प्रकारसे उपासित वह तेज प्रकाशस्वरूप ज्ञान प्रदान करता है, जिससे लाख योजनकी दूरीपर स्थित वस्तु भी सदा आँखोंके सामने दिखायी देती है। उष्ण-प्रकृति प्राणवायु अग्निरूप हैं तथा शीतल-प्रकृति अपान वायु चन्द्र-स्वरूप हैं। छाया और घामकी भाँति ये दोनों मुखरूप मार्गमें स्थित रहते हैं। (सर्ग ८१)


ज्ञानसाध्य वस्तु और योगियोंकी परकाय-प्रवेश-सिद्धिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! योगके द्वारा साध्य अणिमादि पदार्थोंका साधन तुम सुन चुके। अब श्रवण-मनन ज्ञानके द्वारा साध्य विषयको सुनो। इस संसारमें एक, अद्वितीय, शुद्ध, सौम्य, अनिर्देश्य, सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर और शान्तिमय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है। न यह दृश्य जगत् है, न इसकी कोई क्रिया है। यह जीव इस मिथ्या शरीरको सङ्कल्प-भ्रमसे उसी प्रकार देखता है, जिस प्रकार बालक उद्दण्ड प्रेतको। जब प्रज्वलित ज्ञानदीपसे उत्तम प्रकाश हो जाता है, तब इस जीवका सङ्कल्पमोह उसी तरह विनष्ट हो जाता है, जिस तरह शरत्कालमें मेघ। जागनेपर जैसे प्राणी स्वप्नके संसारको नहीं देखता, वैसे ही सच्चिदानन्द परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर जीवात्मा देहको आत्मबुद्धिसे नहीं देखता। अनात्त्विक शरीर आदिमें तात्त्विक भावनासे यह जीव देहसे आवृत होकर स्थित रहता है; किंतु एक ब्रह्मतत्त्वकी भावनासे देहसे रहित, श्रीमान् और परम सुखी हो जाता है। अनात्म शरीर आदिमें जो आत्माकी भावना है, वह हृदयका बड़ा भारी अन्धकार है। वह सूर्य आदिके प्रकाशसे दूर नहीं किया जा सकता। वह अज्ञान-अन्धकार तो परमात्मामें ही आत्म-भावनासे—'सर्वव्यापक निरञ्जन और निर्मल सच्चिदानन्द ब्रह्म मैं ही हूँ'—इस यथार्थ ज्ञानरूपी सूर्यसे ही नष्ट होता है।

अन्य तत्त्वज्ञानी योगी लोग जिस पदार्थकी जिस रीतिसे भावना करते हैं, वे उस पदार्थको उसी रीतिसे शीघ्र अपनी उस दृढ़भावनाके बलसे देख लेते हैं किंतु राघव ! दृढ़भावनाके अनुसन्धानसे विमूढ़ अज्ञानी प्राणी तो विष-को अमृतके समान और अमृतको भी विषके समान समझ लेते हैं। इस प्रकार दृढ़ भावनासे जिस विमूढ़ अज्ञानी प्राणीके द्वारा जिस पदार्थकी जिस रीतिसे भावना की जाती है, उसी समय वह प्राणी वही बन जाता है, यह संसारमें देखा भी जाता है। जैसे स्वप्नका संसार स्वप्नमें प्रत्यक्षकी ज्यों दीखता है, वैसे ही सत्यकी भावनासे देखा गया यह शरीर हो जाता है और असत्यकी भावनासे विवेकपूर्वक देखा गया यह शरीर शून्यताको—अभावको प्राप्त हो जाता है।

साधुस्वभाव श्रीराम ! अणिमादि पदकी प्राप्तिमें तुमने इस प्रकारसे ज्ञानयुक्ति तो सुन ली। अब तुम वह दूसरी युक्ति सुनो। जिस तरह वायु पुष्पमेंसे गन्ध खींचकर उसको घ्राणेन्द्रियके साथ सम्बन्ध कर देता है, उसी तरह योगी

४५८ * नविच्छिन्नश्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रेचकके अभ्यासरूप योगसे कुण्डलिनीरूप घरसे बाहर निकलकर ज्यों ही दूसरे शरीरमें जीवका सम्बन्ध करता है, त्यों ही यह शरीर परित्यक्त हो जाता है। जीव-रहित यह देह चेष्टाओंसे रहित होकर काठ और मिट्टीके ढेलेके सदृश पड़ा रहता है। जैसे सिंचन करनेवाला पुरुष जलपूर्ण कुम्भसे वृक्ष और लताको सींचनेकी इच्छा करता है, उसे ही सींचता है, वैसे ही अपनी रुचिके अनुसार देह, जीव, बुद्धि, स्थावर और जङ्गम सबमें उनकी सम्पत्तिका भोग करनेके लिये जीवको प्रविष्ट किया जाता है।

उक्त प्रणालीसे परदेहमें सिद्धिश्रीका उपभोग कर स्थित हुआ योगी यदि अपना पहला शरीर विद्यमान रहा तो उसमें पुनः प्रविष्ट हो जाता है और यदि न रहा तो दूसरे शरीरमें जबतक उसकी रुचि रहती है, तबतक उसमें प्रविष्ट होकर स्थित रहता है। अथवा देहादि सम्पूर्ण कल्पित पदार्थोंको और जगत्‌को सर्वव्यापी ज्ञानसे परिपूर्ण करके पूर्णरूपसे स्थित रहता है। श्रीराम ! योगरूप ऐश्वर्यसे सम्पन्न चेतन जीवात्मा सदा प्रकट दोषशून्य परमात्म-तत्त्वको जानकर जो भी कुछ जैसा चाहता है, वैसा ही उसे तत्काल प्राप्त कर लेता है। वास्तवमें अनावरणतारूप उत्तम पद ही यथार्थ पद है, यों अनुभवी लोग कहते हैं। (सर्ग ८२)


चूड़ालाकी सिद्धिका वैभव, गुरूपदेशकी सफलतामें किरातका आख्यान, शिखिध्वजका वैराग्य, चूड़ालाका उन्हें समझाना, राजा शिखिध्वजका आधी रातके समय राजमहलसे निकलकर चल देना और मन्दराचलके काननमें कुटिया बनाकर निवास करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार निरन्तर योगका अभ्यास करनेवाली वह राजरानी सती-साध्वी चूड़ाला अणिमा आदि अष्ट सिद्धियोंके गुणोंके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गयी। मोह आदि दोषों तथा त्रिविध तापोंका उपशम हो जानेसे उसका हृदय गङ्गाजीकी भाँति निर्मल और शीतल हो गया। वह कभी आकाशमार्गसे गमन करती थी, कभी समुद्रके भीतर द्वीपोंमें पहुँच जाती थी और कभी स्वेच्छानुसार भूतलपर विचरण करती थी। यों बिजलीकी प्रभाके समान चमकीले आभूषणोंसे विभूषित वह सुन्दरी चूड़ाला आकाशगामिनी होकर यत्र-तत्र घूमने-फिरने लगी। वह मोतियोंमें प्रविष्ट हुए धागेकी भाँति काष्ठ, तृण, पत्थर, भूत, आकाश, वायु, अग्नि, जल आदि सभी पदार्थोंमें निर्विघ्नतापूर्वक प्रवेश कर जाती थी। इस प्रकार उसने मेरुगिरिके शिखरोंपर, लोकपालोंके नगरोंमें और दिशा एवं आकाशके मध्यमें स्थित सारे भुवनोंमें सुखपूर्वक विचरण किया तथा पशु-पक्षी, भूत-पिशाच आदि एवं नाग, देवता, असुर, विद्याधर, अप्सरा और सिद्धोंके साथ सम्भाषण आदि व्यवहार भी किया।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चूडालाकी सिद्धिका वैभव, गुरूपदेशकी सफलतामें किरातका आख्यान * ४४९


चूडाला अपने स्वामी राजा शिखिध्वजको अनेक बार यत्नपूर्वक ज्ञानामृत का उपदेश करती, परंतु उनकी समझमें कुछ भी नहीं आता। जैसे बालकको विद्याके गुणका अनुभव नहीं होता, वैसे ही इतने लंबे कालतक सम्पर्कमें रहनेपर भी राजा शिखिध्वज यह न जान सके कि मेरी पत्नी चूडाला ऐसी गुणशालिनी है। चूडालाने भी अनधिकारी समझकर आत्मशान्तिकी प्राप्तिसे रहित राजाके सामने अपनी अणिमादि सिद्धियोंके ऐश्वर्यको उसी प्रकार प्रकट नहीं किया, जैसे शूद्रको यज्ञक्रिया नहीं दिखलायी जाती।

श्रीरामजीने पूछा— ऐश्वर्यशाली गुरुदेव ! इतनी बड़ी सिद्धयोगिनी चूडालाके प्रयत्नसे भी जब राजा शिखिध्वज ज्ञान नहीं प्राप्त कर सके, तब भला, अन्य साधारण व्यक्तिको ज्ञानकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुकुलभूषण राम ! गुरुद्वारा उपदेश प्राप्त करनेका क्रम केवल शास्त्र-मर्यादाका पालन-मात्र है। ज्ञान-प्राप्तिका कारण तो शिष्यकी विश्वासयुक्त विशुद्ध प्रज्ञा ही है; क्योंकि जाननेयोग्य ब्रह्म शास्त्रोंके श्रवणसे अथवा किसी पुण्यकर्मसे नहीं जाना जाता, उसे तो आत्मा ही जानता है।

श्रीरामजीने पूछा— मुनिश्रेष्ठ ! यदि ऐसी ही बात है कि गुरूपदेश आत्मज्ञानमें कारण नहीं है तो जगत्‌में जो यह क्रम प्रचलित है कि आत्मज्ञानका कारण गुरूपदेश है, यह कैसे उचित होगा ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— राघव ! (मैं इस विषयमें एक दृष्टान्त देता हूँ, सुनो—) विन्ध्याचलके जंगली प्रदेशमें एक किरात रहता था। वह धन-धान्यसम्पन्न होनेपर भी अत्यन्त कृपण था। श्रीराम ! एक बार वह उस जंगली मार्गसे कहीं जा रहा था कि उसकी एक कौडी किसी घास-फूससे ढके हुए स्थानमें गिर पड़ी। कृपण-शिरोमणि तो वह था ही; अतः उस एक कौड़ीको वह तीन

सं० यो० वं० अं० १६—

दिनोंतक चारों ओर सारे घास-फूसोंको उलटकर खोजनेका प्रयत्न करता रहा। उसके मनमें बारंबार ऐसी कल्पना उठ रही थी कि यदि यह कौड़ी मिल जाती तो समयानुसार इस एकसे चार, चारसे आठ, आठसे सौ, सौसे हजार और हजारसे कई हजार कौड़ियों हो जातीं। उस समय सहस्रों मनुष्य उस कृपणका उपहास कर रहे थे; परंतु वह उनकी तनिक भी परवा न करके उस वनमें आलस्यरहित होकर रात-दिन खोजता ही रहा। तदनन्तर तीन दिनोंतक अथक परिश्रम करनेके पश्चात् उसे उस जङ्गलमें एक महान् चिन्तामणि प्राप्त हुई, जो पूर्णिमाके चन्द्रमण्डल-सी आकार-प्रकार एवं प्रकाशवाली थी। उसे पाकर किरातका हृदय प्रसन्न हो गया और वह आनन्दपूर्वक घर लौट आया। वह चिन्तामणि जगत्‌के सम्पूर्ण ऐश्वर्यके समान थी। उसकी प्राप्ति हो जानेसे वह सुख-शान्तिपूर्वक रहने लगा। निष्पाप राम ! यह सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे अतीत है और शास्त्रोपदेशसे इन्द्रियसम्बन्धी वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, इसलिये गुरूपदेशसे आत्मज्ञान नहीं

४५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


प्राप्ति नहीं होती अर्थात् आत्मज्ञानमें उपदेश कारण नहीं है। फिर भी गुरूपदेशके बिना आत्मतत्त्वकी प्राप्ति हो भी नहीं सकती; वह कृपण कौड़ीकी खोज न करता तो चिन्तामणिकी उपलब्धि उसे कैसे होती ! इसलिये जैसे चिन्तामणिकी प्राप्तिमें कौड़ीकी खोज कारण है, वैसे ही इस महान् अर्थरूप आत्मतत्त्वकी प्राप्तिमें गुरूपदेश पूर्णतया कारण न होनेपर भी कारणताको प्राप्त है। क्योंकि श्रीराम ! पुरुष कार्य तो कुछ और ही करता है और उसे उस कार्यका फल अन्य ही मिलता है। यह बात तीनों लोकोंमें देखी-सुनी जाती है; इसलिये आत्मज्ञानके अनन्तर इस काल्पनिक जगत्‌को अनासक्ति और निष्कामभावसे वहन करना ही श्रेयस्कर है।

राघव ! तदनन्तर राजा शिखिध्वज तत्त्वज्ञानरूप परमपदकी प्राप्तिके बिना वैसे ही अत्यन्त मोहको प्राप्त हो गये, जैसे संतानहीन पुरुष पुत्र-अभावरूपी तमसे अंधा-सा हो जाता है। उनका मन दुःखाग्निसे संतप्त हो उठा। अतः प्रियवर्गद्वारा लायी गयी भोग-सामग्रियाँ उन्हें आगकी लपट-सी प्रतीत होने लगीं। वैराग्यके कारण उनका मन उनमें तनिक भी सुखका अनुभव नहीं करता था। उन्हें अब एकान्त प्रदेशोंमें, निर्झर-तटोंपर और गुफाओंमें ही निवास करना वैसे ही अधिक रुचने लगा, जैसे व्याधके बाणप्रहारसे मुक्त हुआ जन्तु एकान्तमें छिपना ही पसंद करता है। रघुनन्दन ! राजा शिखिध्वज सान्त्वनापूर्वक अनुनय-विनय करनेवाले एवं समझाने-बुझानेवाले भृत्योंके प्रार्थना करनेपर दिनका सारा कामकाज करते थे। परंतु उनका वैराग्य प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। उनकी बुद्धि अत्यन्त शान्त थी। वे परिव्राजककी भाँति रहते थे। इसलिये विशाल विषयभोगों तथा राज्यश्रीका उपभोग करनेमें उनका मन खिन्न हो जाता था। दूसरोंको मान देनेवाले श्रीराम ! वे देवकार्यके निमित्त तथा ब्राह्मणों और स्वजनोंके लिये गौ, भूमि और सुवर्ण आदिका खुले हाथों दान करने लगे। वे तप करनेके

हेतु कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंका अनुष्ठान तथा तीर्थों, वनों और आश्रमोंमें भ्रमण करने लगे। इतनेपर भी, उन्हें तनिक-सी भी शोकशून्य स्थिति वैसे ही नहीं प्राप्त हुई, जैसे धनार्थी पुरुषको खानरहित भूमिके खोदनेसे निधिकी प्राप्ति नहीं होती। इस प्रकार महान् बुद्धिमान् होते हुए भी राजा शिखिध्वज चिन्तारूपी अग्निसे संतप्त होकर सूखते जा रहे थे। तब वे संसाररूपी व्याधिकी औषधिके विषयमें विचार करने लगे। यों चिन्तापरवश होकर वे दीन हो गये। उन्हें अपना राज्य विष-सा प्रतीत होने लगा। इस प्रकार उनकी बुद्धि विषयोंसे खिन्न हो गयी, अतः बहुमूल्य भोगपदार्थ सामने रखे जानेपर भी वे वैराग्ययुक्त राजा उनकी ओर ताकते भी नहीं थे। इसी स्थितिमें एक दिन चूडाला महलमें बैठी हुई थी, तब राजा उससे मधुर वाणीमें बोले।

शिखिध्वजने कहा—सूक्ष्माङ्गी प्रिये ! मैंने बहुत दिनोंतक राज्यका उपभोग किया और विभवपूर्ण पदोंको

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चूडालाकी सिद्धिका वैभव, गुरुपदेशको सरलतामें किरातका आख्यान *


भी भोग लिया। अब मुझे वैराग्य हो गया है, अतः मैं वन जाना चाहता हूँ; क्योंकि वनवासी मुनिपर सांसारिक सुख, दुःख, आपत्ति, सम्पत्ति—ये कोई भी अपना अधिकार नहीं जमा सकते। न तो उन्हें देशके विनाशसे मोहपूर्वक दुःख होता है और न संग्राममें प्रजाजनोंका क्षय ही करना-कराना पड़ता है; अतः मैं वनवासी मुनियोंके सुखको राज्य-सुखकी अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट मानता हूँ। वैराग्ययुक्त मन जैसा एकान्तमें सुखका अनुभव करता है, वैसा सुख उसे न तो चन्द्रवदनी रमणियोंके मुखमण्डलोंमें मिलता है और न ब्रह्मा एवं इन्द्रके भवनोंमें ही प्राप्त होता है। इसलिये सुन्दरि ! मैंने जो यह वनगमनका उत्तम विचार किया है, इसमें बाधा डालना तुम्हारे लिये उचित नहीं है; क्योंकि कुलीन स्त्रियाँ स्वप्नमें भी पतिकी इच्छाको भङ्ग नहीं करतीं।

चूडाला बोली—नाथ ! जैसे वसन्त ऋतुमें पुष्पकी शोभा होती है और शरद् ऋतुमें पुष्प भला मालूम देता है, उसी तरह जिस कार्यके करनेका अवसर प्राप्त हो, उसीका सम्पादन करनेसे उनकी शोभा होती है, अकालके कार्यमें नहीं। इसलिये जिनके शरीर वृद्धभावको प्राप्त हो गये हैं, उन्हींके लिये वनका आश्रय लेना शोभनीय है, आप जैसे युवकोंके लिये नहीं। इसी कारण आपका यह विचार मुझे पसन्द नहीं है। प्रियतम ! जब वृद्धावस्था आनेपर हम दोनोंके सिरके बाल श्वेत पुष्पोंके समान बिल्कुल सफेद हो जायँगे, उस समय हम दोनों एक साथ ही घरसे निकलकर वनको चले चलेंगे। राजन् ! बिना समयके ही प्रजापालन रूप कर्मका परित्याग कर देनेवाले राजाके राज्यका विनाश हो जाता है और उसे महान् पापका भागी होना पड़ता है। समयानुकूल अवसरके ही कार्य करनेवाले राजाको प्रजाएँ रीझती हैं। इसी प्रकार न करनेयोग्य कार्यसे नौकर स्वामीको और स्वामी नौकरको परस्पर मना करते ही हैं।

शिखिध्वजने कहा—कमलनयनी प्रिये ! मेरे अभीष्ट कार्यमें विघ्न मत डालो। अब तुम मुझे यहाँसे दूर एकान्त वनमें गया हुआ ही समझो। अनिन्दिते ! कठोर-से-कठोर अङ्गवाली स्त्रियाँ भी वनवासके लिये उपयुक्त नहीं हो सकतीं, फिर तुम्हारे अङ्ग तो बहुत कोमल हैं। तुम अभी नवयुवती हो, अतः तुम्हें तो वनमें नहीं जाना चाहिये। वनवास तो पुरुषोंके लिये भी बड़ा कठिन होता है; अतः तुम्हें तो प्रजाका पालन करते हुए इस उत्तम राज्यमें ही रहना चाहिये; क्योंकि पतिके बाहर जानेपर कुटुम्बका भार वहन करना स्त्रीका धर्म है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! अपनी उस कल्याणप्राणप्रियासे ऐसा कहकर जितेन्द्रिय राजा शिखिध्वज स्नान करनेके लिये उठकर चल दिये और स्नान करके उन्होंने अपने सम्पूर्ण दैनिक कार्योंका सम्पादन किया। जब सायंकाल हुआ, तब पुनः संध्योपासन सम्पन्न करके तथा भोजन पूरा करके वे अपनी प्रिय पत्नी चूडालाके साथ शय्यापर सो गये। तदनन्तर आधी रातके समय जब चारों ओर सन्नाटा छा गया, सारी जनता गाढ़ निद्रामें लीन हो गयी,

४५२* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

और कोमल बिछावनसे युक्त पलंगपर सोयी हुई चूडाला भी गाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयी, तब जिस पलंगके आधे बिस्तरपर पत्नी सोयी हुई थी, उस पलंगसे राजा उठ खड़े हुए और 'हे राजलक्ष्मि ! तुम्हें नमस्कार है' यों कहकर अकेले ही अपने राजमहलसे चल पड़े ।

चलते-चलते वे महासागरमें प्रवेश करनेवाले नदकी तरह एक भयंकर अरण्यमें जा पहुँचे। पुनः प्रातःकाल होनेपर राजा शिखिध्वज वेगपूर्वक वहाँसे आगे चले और बारह दिनोंमें बहुत-से नगरों, देशों, पर्वतों और नदियोंको लाँघ गये ।

तत्पश्चात् वे मन्दराचलके तटवर्ती एक काननमें जा पहुँचे, जो मनुष्यके लिये अति दुर्गम था। वहाँसे मनुष्योंकी बस्ती और नगर अत्यन्त दूर पड़ते थे। वहाँ उन्होंने एक चौरस एवं शुद्ध स्थानमें, जो जलसे घिरा हुआ, शीतल, हरी-हरी घासोंसे आच्छादित होनेके कारण श्याम, स्निग्ध तथा फलोंसे लदे हुए वृक्षोंसे सम्पन्न था, मञ्जरीयुक्त लताओंसे बाँधकर अपने लिये एक पर्णशाला बना ली। फिर राजाने अपनी उस कुटियामें बाँसका चिकना डंडा, फलाहारके लिये पात्र, अर्घ्यपात्र, पुष्पपात्र, कमण्डलु, रुद्राक्षकी माला, शीतका निवारण करनेके लिये गुदड़ी, चटाई और मृगचर्म आदि लाकर यथास्थान रख दिये। इनके सिवा और भी जो कोई वस्तु तापस-कर्मोपयोगी प्रतीत हुई, राजाने उसे भी लाकर वहाँ रख लिया। फिर दिनके प्रथम प्रहरमें प्रातःकाल उन्होंने संध्यापूर्वक. जप और दूसरे प्रहरमें पुष्प आदिका संचय कर लेनेके बाद स्नान और देवार्चन किया। तत्पश्चात् कुछ जंगली फल, कन्दमूल और कमलदण्ड आदि खाकर उन जितेन्द्रिय नरेशने जपपरायण हो अकेले ही वह रात बितायी। इस प्रकार मन्दराचलकी तलहटीमें अपने द्वारा बनायी गयी पर्णशालाके भीतर बैठकर जप करते हुए मालव-नरेश शिखिध्वज खेदरहित होकर दिन बिताने लगे। वे अपने पूर्वानुभूत नित्य नूतन राजसी भोगविलासौंका कुछ भी स्मरण नहीं करते थे। भला, जिसके हृदयमें विवेकपूर्वक वैराग्यका उदय हो जायगा, उसके मनका अपहरण राज्यलक्ष्मियाँ कैसे कर सकती हैं !
( सर्ग ८३-८४)


सोकर उठी हुई चूडालाके द्वारा राजाकी खोज, वनमें राजाके दर्शन और राजाके भविष्यका विचार करके चूडालाका लौटना, नगरमें आकर राज्य-शासन करना, तदनन्तर कुछ समय बाद राजाको ज्ञानोपदेश देनेके लिये ब्राह्मणकुमारके वेषमें उनके पास जाना, राजाद्वारा उसका सत्कार और परस्पर वार्तालापके प्रसंगमें कुम्भद्वारा कुम्भकी उत्पत्ति, वृद्धि और ब्रह्माजीके साथ उसके समागमका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार राजा शिखिध्वज वनमें, एक तापसको जिन-जिन

वस्तुओंकी आवश्यकता पड़ती है, उन पदार्थोंका संग्रह करके कुटियामें रहने लगे । इधर घरपर चूडालाने क्या

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सोकर उठी हुई चूडालाके द्वारा राजाकी खोज * ४५३

किया—अब उसे सुनो। आधी रातके समय जब राजा शिखिध्वज महलसे निकलकर दूर चले गये, तब अकस्मात् चूडालाकी नींद टूटी। वह तत्काल उठकर शय्यापर बैठ गयी और चिन्ताग्रस्त होकर यों विचार करने लगी—

'दुःखकी बात है, जो मेरे पतिदेव राज्यका परित्याग करके घरसे वनको चले गये; अतः अब मेरा यहाँ रहना किस कामका ! मैं भी उनके समीप ही जाऊँगी; क्योंकि ब्रह्माने स्त्रियोंके लिये पतिको ही एकमात्र गति निर्धारित किया है।' यों सोच-विचारकर चूडाला पतिका अनुगमन करनेके लिये उठ खड़ी हुई और झरोखेके रास्ते निकलकर आकाशमें जा पहुँची। वहाँ आकाशमण्डलमें स्थित होकर उसने अपने पतिको निर्जन वनमें भटकते देखा। फिर वह उनके भविष्यके विषयमें पूर्णरूपसे विचार करने लगी। राघव ! उसने अपने योगबलसे राजाको जैसे, जिस निमित्तसे, जिस देश और कालमें जितने कार्यका जिस रीतिसे सम्पादन तथा जिस प्रकार निर्वाणकी प्राप्ति आदि करनी होगी, उन सभी अवश्यंभावी विषयोंका योगके द्वारा अनुभव किया और फिर उन्हींके अनुकूल आचरण करनेके लिये वह ऐसा सोचकर आकाशसे लौट पड़ी कि दैवका यही निश्चित विधान मालूम पड़ता है कि कुछ कालके बाद ही मैं इनके समीप जाऊँ, अतः अभी मेरा वनमें जाना ठीक नहीं है। इस प्रकार निश्चय करके चूडालाने वहाँसे लौटकर पुनः अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया।

दूसरे दिन उसने ऐसी घोषणा करा दी कि 'किसी विशेष कारण वश महाराज इस समय बाहर गये हुए हैं।' इस प्रकार समस्त पुरवासी जनोंको आश्वासन देकर सुन्दरी चूडाला वहाँ रहने लगी। जैसे धानकी रखवाली करनेवाली स्त्री समयानुसार पके हुए धानके खेतकी रक्षा करती है, वैसे ही वह समतापूर्वक अपने स्वामीकी शासनप्रणालीके अनुसार राज्यकी देख-भाल करने लगी। इस प्रकार वनमें राजा शिखिध्वजके और अपने महलमें चूडालाके क्रमशः दिन, पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष बीतने लगे। यों सुन्दरी चूडालाको राजमहलमें और शिखिध्वजको जंगली लताकुञ्जोंमें निवास करते अठारह वर्ष बीत गये। तदनन्तर बहुत वर्षोंतक उस महाशैलकी तलहटीमें निवास करते हुए राजा शिखिध्वज वृद्धावस्थाको प्राप्त हो गये। इधर चूडाला अपने पतिकी रागादि वासनाओंके परिपाकको लक्ष्य करके उतने कालतक प्रतीक्षा करती रही। जब वनमें रहते हुए जरावस्थासे युक्त राजा शिखिध्वजके बहुत-से वर्ष व्यतीत हो गये, तब पतिके प्रति अपने कर्त्तव्यकी भावनासे प्रेरित होकर चूडालाके मनमें ऐसा विचार उदय हुआ कि अब मेरे लिये पतिके समीप जानेका समय आ गया है। यों सोचकर वह मन्दराचलकी उपत्यकामें जानेके लिये तैयार हो गयी और रात्रिके समय अन्तःपुरसे निकलकर आकाशमार्गसे उड़ चली। यह वायुमण्डलमें होकर यात्रा कर रही थी। जब वह आकाशके मध्यमें पहुँची, तब उसने बादलोंमें चमकती हुई बिजलियोंका बारंबार अवलोकन किया। उस समय वह मन-ही-मन कहने लगी—'अहो ! प्राणियोंका स्वभाव जीवनपर्यन्त शान्त नहीं होता, इसी कारण आज मेरा भी मन उत्कण्ठित हो ही गया। किंतु सखे चित्त ! यह तुम्हारा कोई दोष नहीं है; क्योंकि तुम्हारी उत्कण्ठा तो अपने स्वामीके प्रति है न। फिर भी तुम उत्कण्ठासे परिपूर्ण होकर स्थित रहो, तुम्हारे भलीभाँति उत्कण्ठित होनेसे मेरा क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है; क्योंकि मेरे स्वामी तो अब तपस्वी हैं। अतः वे क्षीणकाय एवं वासनाशून्य हो गये होंगे। मैं तो ऐसा समझती हूँ कि उनका मन सब राज्य आदि भोगोंकी ओरसे उपरत हो गया होगा। जैसे वर्षाकालकी क्षुद्र नदी महानदमें मिलकर उसीमें विलीन हो जाती है, वैसे ही उनकी वासनालता महान् आत्मामें एकमेक हो गयी होगी। वे एकात्मा होकर एकान्तमें ही रम रहते होंगे तथा उन वीतरागकी वासनाएँ शान्त हो गयी होंगी।

४५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मेरे विचारमें तो ऐसा आता है कि अब मेरे स्वामीकी स्थिति सूखे वृक्षकी-सी हो गयी होगी। तथापि चित्त ! तुम्हें उत्कण्ठित होनेकी क्या आवश्यकता है। मैं स्वयं अपने योगबलसे पतिदेवकी बुद्धिको उद्बुद्ध करके उन्हें उत्कण्ठित कर दूँगी और फिर तुम्हारे साथ मिला दूँगी। मैं अपने मुनिरूप स्वामीके इच्छारहित मनको समतायुक्त बनाकर राज्यमें ही नियुक्त करूँगी और फिर हम दोनों चिरकालतक सुखपूर्वक निवास करेंगे । अहो ! निश्चय ही चिरकालके पश्चात् मैं इस शुभ मनोरथको प्राप्त करूँगी।

यों सोचकर चूडाला आकाशमार्गसे उड़ती हुई पर्वतों, देशों, मेघों तथा दिग्दिगन्तोंको लाँघकर मन्दराचलकी उस कन्दराके निकट जा पहुँची । वहाँ वह अदृश्यरूपसे आकाशमें ही स्थित रही । फिर वृक्षों और लताओंके स्पन्दनसे गमनागमनको सूचित करनेवाली वायुकी तरह उसने वनके भीतर प्रवेश किया। वहाँ उसने वनके किसी एक प्रदेशमें पर्णशाला बनाकर उसमें बैठे हुए अपने पतिको देखा । जो पहले हार, बाजूबंद, कड़े और कुण्डल आदिसे विभूषित होकर सुमेरुके समान कान्तिमान् दीखते थे, उन्हींको आज चूडालाने कृशकाय, कृष्णवर्ण तथा जीर्ण-शीर्ण पत्तेकी तरह शुष्क शरीरवाला देखा । उनके सिरपर जटाएँ बँध गयी थीं तथा शरीरपर वल्कल-वस्त्र शोभा दे रहा था । शान्त तो वे थे ही; अतः अकेले ही भूमिपर बैठकर पुष्पोंकी माला गूँथ रहे थे । उन्हें देखकर सर्वाङ्गसुन्दरी चूडालाका मन कुछ खिन्न हो गया; फिर वह मन-ही-मन कहने लगी—'अहो ! मेरे पतिकी यह कैसी अज्ञानभरी मूर्खता है। इसी मूर्खताके प्रसादसे ही ऐसी दशाएँ आया करती हैं । ये शोभाशाली नरेश मेरे परम प्रिय पति हैं। इनका हृदय गाढ़ मोहसे आहत हो गया है, इसी कारण ये इस दशाको प्राप्त हो गये हैं। अतः अब मैं इन्हें सर्वोत्तम ज्ञान प्रदान करनेके लिये अपने इस रूपका परित्याग करके किसी अन्य रूपसे इनके समीप जाऊँगी; क्योंकि यदि मैं इसी रूपसे जाती हूँ तो 'यह बाला मेरी प्रेयसी प्रिया है' यों समझ-कर ये मेरे कथनपर भलीभाँति ध्यान नहीं देंगे, इसलिये तपस्वीका वेष धारण करके इनके सामने उपस्थित होकर मैं क्षणभरमें इन्हें प्रबुद्ध कर दूँगी। इस समय मेरे स्वामीकी बुद्धि रागादि वासनाओंके परिपाक-से परिपक्व हो गयी है, अतः अब इनके निर्मल चित्तमें आत्मतत्त्व भलीभाँति प्रकट हो सकता है।' यों मन-ही-मन विचार करके चूडाला थोड़ी देरतक ध्यानमग्न हो गयी। फिर, तत्काल ही जल-तरङ्गकी तरह उसका रूप बदल गया और वह एक ब्राह्मणकुमारके रूपमें परिवर्तित हो गयी । फिर तो वह उसी रूपसे उस जङ्गलमें उतर पड़ी और अपने पतिदेवके सामने जाकर खड़ी हो गयी । उस समय उसका मुख मन्द मुसकानसे सुशोभित हो रहा था ।

उस द्विजपुत्रका शरीर तपाये हुए सुवर्णके समान गौरवर्णका था, कंधेपर शुक्ल यज्ञोपवीत लटक रहा था और

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सोकर उठी हुई चूडालाके द्वारा राजाकी खोज * ४५५

वह दो निर्मल स्वच्छ वस्त्रोंसे आच्छादित था। इस प्रकार वह दूसरे वनसे आया हुआ मूर्तिमान् तप-सा ही प्रतीत होता था। उस शोभाशाली द्विजकुमारको अपने सामने देखकर राजा शिखिध्वजने समझा कि यह कोई देवपुत्र आया हुआ है, अतः वे अपनी खड़ाऊँ छोड़कर तुरंत ही उठ खड़े हुए और बोले—'देवपुत्र ! आपको नमस्कार है। आइये, इस आसनपर विराजिये।' यों कहकर उन्होंने अपने हाथसे उसके सामने एक पत्तेका आसन रख दिया। तब ब्राह्मणकुमारने भी कहा—'राजर्षे ! आपको प्रणाम है।'

शिखिध्वजने कहा—महाभाग देवपुत्र ! कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है ? आज मुझे जो आपका दर्शन प्राप्त हो गया, इससे मैं आजका दिन सफल समझता हूँ। मानद ! आपका कल्याण हो। आपके लिये यह अर्घ्य है, यह पाद्य है, ये पुष्प हैं और यह गूँथी हुई माला है--इन्हें आप ग्रहण करनेकी कृपा करें।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं-निष्पाप राम ! ऐसा कहकर राजा शिखिध्वजने ब्राह्मणकुमारके वेषमें आयी हुई अपनी उस प्रियतमा पत्नीको शास्त्रविधिके अनुसार अर्घ्य, पाद्य, पुष्प और माला आदि समर्पित किये।

तत्पश्चात् (ब्राह्मणकुमारके वेषमें) चूडाला बोली-सज्जनशिरोमणे ! आपने शान्त मनसे निर्वाण-प्राप्तिके लिये फलकी कामनासे रहित उत्कृष्ट तपका संचय तो कर लिया है न ? क्योंकि सौम्य ! आपने जो धन, धान्य-सम्पन्न राज्यका परित्याग करके महावनका आश्रय लिया है, आपका यह शान्त व्रत तलवारकी धारके समान है।

शिखिध्वजने कहा-भगवन् ! आपके लोकोत्तर चिह्न-स्वरूप सौन्दर्यसे ही ज्ञात हो रहा है कि आप कोई देवता हैं, इसीसे सब कुछ जानते हैं। इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है ? सौन्दर्यशाली देव ! अभी मेरी प्रियतमा भार्या वर्तमान है। आजकल वह मेरे राज्यका संचालन कर रही है। उसीके सारे अङ्गोंकी तरह आपके अङ्ग उद्भित हो रहे हैं। अभ्यागतका आदर-सत्कार करनेसे अपना जीवन सफल हो जाता है, इसलिये सत्पुरुष अभ्यागत-को देवतासे भी बढ़कर पूज्य मानते हैं। (इसी कारण मैंने आपका आतिथ्य किया है।) निर्मल चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखवाले देवपुत्र ! अब मेरे मनमें एक संशय है, उसका आप निवारण कीजिये। वह संशय यह है कि आप कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ! और मुझपर कृपा करके कहाँसे और किस लिये यहाँ पधारे हैं ?

ब्राह्मणकुमार बोला—राजन् ! आपके प्रश्नानुसार मैं सारी बातें कहता हूँ, सुनिये। इस जगन्मण्डलमें मुनिवर नारद रहते हैं। उनका हृदय परम विशुद्ध है। उनके शरीरका वर्ण पुण्यलक्ष्मीके कमनीय मुखमें सुशोभित कर्पूर-के तिलकके सदृश गौर है । किसी समय वे देवर्षि मेरुगिरिकी कन्दरामें स्नानार्थस्थित थे । उस गुहाके समीप ही उत्ताल तरङ्गोंवाली गङ्गाजी बह रही थीं, जिनका जल मेरुगिरिके सौन्दर्यसे उल्लसित हो रहा था, जिसमें वे

४५६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हारकी तरह सुशोभित हो रही थीं। उसी गङ्गा नदीके तटपर एक बार ध्यानसे विरत होनेपर नारद मुनि बैठे थे, तबतक उन्हें कङ्कणोंकी झनकारसे युक्त जलक्रीडाकी कल-कल ध्वनि सुनायी पड़ी। सुनते ही उनके मनमें कुछ कुतूहल उत्पन्न हो गया और उन्होंने यह जानना चाहा कि यह क्या है। फिर तो कौतुकवश चारों ओर दृष्टि दौड़ानेपर उन्हें नदीमें रम्भा, तिलोत्तमा आदि अप्सराओंका दल दिखायी पड़ा, जो जलक्रीडासे निवृत्त होकर बाहर निकल रहा था। भींग जानेके कारण उनके समस्त अङ्ग ऊपरसे नीचेतक दीख रहे थे और ये परस्पर एक दूसरेमें प्रतिबिम्बित हो रहे थे, जिससे वे एक दूसरीके लिये दर्पण-सी बन गयी थीं। एक ही स्थानपर एकत्रित किये गये चन्द्रमण्डलके कलापुञ्जकी भाँति उस कमनीय नारीदलको देखकर जब सहसा नारदमुनिका चित्त क्षुब्ध हो उठा, तब उनका वीर्य स्खलित हो गया।

तदनन्तर नारदमुनिने अपने मनरूपी उन्मत्त गजराज-को विशुद्ध बुद्धिरूपी रस्सेसे विवेकरूपी सुदृढ़ आलानमें बाँध दिया और उस स्खलित हुए वीर्यको, जो प्रलय-कालीन अग्निके तापसे पिघले हुए चन्द्रद्रवके सदृश तथा पारद और सुवर्ण आदि शम्भुके दिव्य वीर्यके समान था, अपने पास ही पड़े हुए एक अद्भुत कान्तिमान् स्फटिक कुम्भमें स्थापित कर दिया। फिर उन्होंने उस कुम्भको अपने संकल्पजनित दूधसे परिपूर्ण कर दिया, कुछ ही दिनोंमें वह घटस्थित शुभ गर्भ वृद्धिको प्राप्त हो गया। फिर तो जैसे मास चन्द्रमाको तथा वसन्त ऋतु पुष्पोंको उत्पन्न करती है, उसी प्रकार समय आनेपर उस घटने एक कमलदल-सदृश नेत्रोंवाले बालकको जन्म दिया। कुम्भ-से वह बालक सम्पूर्ण अङ्गोंसे परिपूर्ण होकर निकला था। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो क्षीरसागरसे दूसरा क्षयरहित पूर्ण चन्द्रमा निकला हो। शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान वह कुछ ही दिनोंमें बढ़कर बडा हो गया। उसका शरीर अनुपम सौन्दर्यसे युक्त था। जब वह जातकर्म आदि सभी संस्कारोंसे सम्पन्न हो गया, तब मुनिवर नारदने अपना सारा विद्याधन उस बालकमें उसी प्रकार स्थापित कर दिया, जैसे एक पात्रमें रखा हुआ धन दूसरे पात्रमें उँडेल दिया जाता है। थोड़े ही दिनों-में वह सम्पूर्ण वाङ्मयका विशिष्ट ज्ञाता हो गया। इस प्रकार मुनिवर नारदने उसे अपना प्रतिबिम्ब-सा बना दिया।

तदनन्तर नारदजी अपने पुत्रको साथ लेकर ब्रह्मलोक-को गये और वहाँ उससे अपने पिता ब्रह्माजीके चरणोंमें अभिवादन करवाया। प्रणाम कर चुकनेके बाद ब्रह्माजीने अपने पौत्रसे परीक्षार्थ वेदादि शास्त्रोंके विषयमें प्रश्न किये और उनका समुचित उत्तर पानेपर उन्होंने उसे पकड़कर अपनी गोदमें बैठा दिया। फिर तो, उन कमलयोनिने उस कुम्भ नामवाले पौत्रको केवल आशीर्वाद देकर सर्वज्ञ तथा ज्ञानका पारगामी विद्वान् बना दिया। साधुशिरोमणे! वह कुम्भ मैं ही हूँ। कुम्भसे उत्पन्न होनेके कारण मेरा ही नाम कुम्भ पड़ा है। मैं नारदमुनिका पुत्र और पद्मजन्मा ब्रह्माका पौत्र हूँ। ब्रह्मलोक ही मेरा घर है। वहीं मैं अपने पिताजीके साथ सुखपूर्वक निवास करता हूँ। चारों वेद मेरे सुहृद् हैं। मैं किसी कार्यवश नहीं, बल्कि कौतुकवश स्वेच्छानुसार सभी लोकोंमें विचरता हूँ। जब मैं भूलोकमें विचरण करता हूँ, उस समय मेरे पैर भूतलपर नहीं पड़ते, धूलिकण अङ्गोंका स्पर्श नहीं करते और मेरा शरीर कभी मलिन नहीं होता। आज मैं आकाशमार्गसे जा रहा था कि सामने आप दिखायी पड़ गये, इसलिये यहाँ चला आया हूँ। वनवासके गुणों तथा तज्जन्य फलोंके ज्ञाता साधो ! इस प्रकार अपने अनुभवके अनुसार मैंने सारा-का-सारा वृत्तान्त आपको बतला दिया।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—मुने ! महर्षि वसिष्ठके इस प्रकार कहते-कहते वह दिन समाप्त हो गया। जब भगवान् सूर्य अस्ताचलकी ओर जाने लगे, तब वह सभा