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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तत्त्वज्ञानी महात्मा, जो उन सबमें प्रधान थे, वहाँ विराजमान हुए। तत्पश्चात् वसिष्ठ और विश्वामित्रजीके साथ नारद आदि, जो साङ्गवेदोंका अध्ययन कर चुके थे, मस्तक झुकाये हुए श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्य करके इस प्रकार बोले—'अहो ! बड़े आश्चर्यकी बात है कि राजकुमार श्रीरामने इस प्रकार अनेक कल्याणमय गुणोंसे सुशोभित वैराग्यरससे पूर्ण तथा परम उदारतासे युक्त बातें कही हैं। श्रीरामके भाषणमें वक्तव्य अर्थ 'इदमित्थम्' रूपसे व्यवस्थापूर्वक निहित है। उसे ऐसी सुबोध भाषामें कहा गया है, जिसे सुनते ही श्रोता वास्तविक अभिप्रायको समझ ले। जो बात कही गयी है, वह सर्वथा उचित और स्पष्ट शब्दोंमें प्रतिपादित है। श्रीरामकी यह वाणी उदार है—इसके भीतर बहुत-से उत्कृष्ट अभिप्राय छिपे हुए हैं। यह सुननेमें प्रिय और श्रेष्ठ पुरुषोंके योग्य है। इसमें जो कुछ कहा गया है, वह चञ्चल चित्तसे नहीं, स्थिरबुद्धिसे विचारकर व्यक्त किया गया है। इसका भाव स्पष्टरूपसे समझमें आ जाता है। इस भाषणका प्रत्येक पद अभिव्यक्त (व्याकरण-विशुद्ध) तथा सुस्पष्ट—ग्रस्त आदि दोषोंसे रहित है। यह वाणी इष्ट (प्रिय एवं हितकर) तथा आन्तरिक सन्तोष-की सूचक है। श्रीरघुनाथजीके मुखसे निकला हुआ यह वचन किसको आश्चर्यमें नहीं डाल देता ? सैकड़ोंमें किसी एक पुरुषकी ही वाणी सम्पूर्णतः उत्कृष्ट, चमत्कारपूर्ण और अभीष्ट अर्थको प्रकट करनेमें समर्थ होती है।

'राजकुमार ! आपके सिवा दूसरा कौन है, जिसकी बाणके समान सूक्ष्म अर्थका भेदन करनेवाली कुशाग्र बुद्धिरूपिणी लता विवेकरूपी फलसे सुशोभित हो विचार-वैराग्यरूपी उत्तम विकासको प्राप्त हो रही हो। श्रीरामकी भाँति जिसके हृदयमें अनुपम प्रकाश फैलानेवाली प्रज्ञा-रूपिणी दीप-शिखा प्रज्वलित हो रही हो, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा जाता है। जिनमें ऐसी प्रज्ञा नहीं है, वे मनुष्य रक्त, मांस और हड्डियोंके यन्त्ररूपी देहमें आत्मबुद्धि रखनेके कारण रक्त-मांसादिरूप ही बहुत-से शब्द-स्पर्शादि पदार्थोंका उपभोग करते रहते हैं। ऐसा लगता है, उनके भीतर कोई चेतन पदार्थ है ही नहीं—वे जड़के तुल्य हो गये हैं। जो लोग सर्वथा मोहाच्छन्न होनेके कारण संसारका विचार नहीं करते, वे निरे पशु हैं। वे ही बारंबार जन्म, मृत्यु और जरा आदि रूपोंको प्राप्त होते हैं। जैसे लोकमें सर्वोत्तम मधुर फल और सुन्दर आकृतिवाले आमके वृक्ष विरले ही होते हैं, उसी प्रकार उत्कृष्ट चमत्कारसे पूर्ण तत्त्व-साक्षात्काररूप फलसे सम्पन्न एवं सुन्दर शरीरवाले भव्य पुरुष इने-गिने ही होते हैं। इन आदरणीय बुद्धिवाले श्रीराममें अभी इसी अवस्थामें अपने ही विवेकके कारण उस तत्त्वदर्शनरूप चमत्कारका उदय देखा जाता है, जिसके द्वारा जगत्‌के व्यवहारका सम्यक्‌रूपसे समीक्षण हुआ है। जो देखनेमें सुन्दर हों, जिनपर सरलतासे चढ़ा जा सके तथा जो उत्तम फलों और पल्लवोंसे सुशोभित हों, ऐसे वृक्ष प्रायः सभी देशोंमें उत्पन्न होते हैं; परंतु चन्दनके वृक्ष सर्वत्र नहीं होते (इसी तरह श्रीराम-जैसे पुरुष सर्वत्र दुर्लभ हैं)। फल और पल्लवोंसे भरे-पूरे वृक्ष प्रत्येक वनमें सदा सुलभ होते हैं। परंतु अपूर्व चमत्कारसे युक्त लौंगका वृक्ष सदा और सर्वत्र सुलभ नहीं है (इसी तरह श्रीराम-जैसे पुरुष सर्वत्र दुर्लभ हैं)। जैसे चन्द्रमासे शीतल चाँदनी उत्पन्न होती है, सुन्दर वृक्षसे मञ्जरी प्रकट होती है और फूलसे सुगन्धका प्रवाह प्रादुर्भूत होता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजीसे यह तत्त्वदर्शनरूपी चमत्कारका आविर्भाव देखा गया है। जो लोग सदा तत्त्वचिन्तनमें तत्पर हो विवेकके द्वारा आत्मज्ञान या परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप सार पदार्थके लिये प्रयत्नशील रहते हैं, वे ही सुयशके भंडार, सत्पुरुषोंमें अग्रगण्य, धन्य एवं समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। तीनों लोकोंमें श्रीरामचन्द्रजीके समान विवेकशील और उदारचित्त पुरुष न तो अबतक कोई देखा गया है और न भविष्यमें ही कोई होगा, ऐसी हमारी मान्यता है।' (सर्ग ३२-३३)

वैराग्य-प्रकरण सम्पूर्ण


१. अर्द्धोच्चारित शब्द या वाक्य, जिससे पूरी बात समझमें नहीं आती, ग्रस्तदोषसे युक्त माना गया है।

६५

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण

विश्वामित्रजीका श्रीरामको तत्त्वज्ञानसम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना, शुकदेवजीका तत्त्वज्ञान प्राप्त करके परमात्मामें लीन होना

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! इस प्रकार सभामें आये हुए सिद्ध पुरुषोंने जब उच्चस्वरसे श्रीरामके भाषणकी भूरि-भूरि प्रशंसा की, तब विश्वामित्रजीने अपने सामने बैठे हुए श्रीरामसे प्रेमपूर्वक कहा—'ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! तुम्हारे लिये और कुछ जानना शेष नहीं है। तुम अपनी ही सूक्ष्मबुद्धिसे सब कुछ जान चुके हो—सर्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माको तत्त्वसे जानते हो। तुम्हारी बुद्धि भगवान् व्यासके पुत्र शुकदेवजीकी-

सी है। उसे जाननेयोग्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त हो चुका है। श्रीराम ! मैं तुमसे व्यासपुत्र शुकदेवजीका यह वृत्तान्त कह रहा हूँ, जो तुम्हारे अपने ही वृत्तान्तके समान है, इसे सुनो। यह सुननेवाले मनुष्योंके जन्म-

मरणरूप संसारके अन्त ( मोक्ष ) का कारण है। वे जो तुम्हारे पिताके बगलमें अञ्जनगिरिके समान श्याम तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी भगवान् व्यास बैठे हैं, इनके शुकदेव नामसे प्रसिद्ध एक महाज्ञानी पुत्र हुआ, जिसका मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर था। शुकदेवजी सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता थे। वे एक दिन मन-ही-मन इस लोकयात्रा ( जागतिक व्यवहार ) पर विचार कर रहे थे। उस समय उनके हृदयमें भी तुम्हारी ही तरह विवेकका उदय हुआ। उन महामना शुकदेवने अपने विवेकसे स्वयं ही चिरकालतक विचार करके जो परम मनोहर परमार्थ सत्य वस्तु ( या परमार्थ—साधनकी उच्च स्थिति ) है, उसे प्राप्त कर लिया। उसे प्राप्त करके भी उनके हृदयमें 'यही परमार्थ वस्तु ( सच्चिदानन्दघन परमात्मा ) है' ऐसा पूर्ण विश्वास नहीं हुआ; इसलिये उस परम वस्तुके स्वतः प्राप्त हो जानेपर भी उनके मनको शान्ति नहीं मिली। इतना अवश्य हुआ कि उनके चित्तकी चञ्चलता दूर हो गयी और जैसे चातक वर्षाकी जलधाराके अतिरिक्त अन्य जलधाराओंसे मुँह मोड़ लेता है, उसी प्रकार उनका मन अत्यन्त क्षणभङ्गुर भोगोंसे विरत हो गया।

एक दिन निर्मल बुद्धिवाले शुकदेवजीने मेरुगिरि-पर एकान्त स्थानमें बैठे हुए अपने पिता मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्याससे भक्तिभावके साथ पूछा—'मुने ! यह संसाररूपी आडम्बर कैसे उत्पन्न हुआ है ? कैसे इसकी शान्ति या नाश होता है ? यह कितना बड़ा है ? किसका है ? और कबतक रहेगा ?' पुत्रके इस प्रकार प्रश्न करने-पर आत्मज्ञानी मुनिवर व्यासने उन्हें जो कुछ बताने योग्य

२—विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश करनेके लिये अनुरोध करना और वसिष्ठजीका उसे स्वीकार कर लेना

६६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बात थी, वह सब यथावत् एवं विशुद्ध रूपसे बता दी। उनका उपदेश सुननेके अनन्तर शुकदेवजीने सोचा, यह तो मैं पहले ही जान गया था। ऐसा विचारकर उन्होंने पिताजीके उस उपदेश-वाक्यका अपनी शुभ बुद्धिके द्वारा अधिक आदर नहीं किया। भगवान् व्यास भी अपने पुत्रके इस अभिप्रायको समझकर उससे बोले—'बेटा! भूतलपर जनक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं, जो जाननेयोग्य तत्त्व (सच्चिदानन्दघन परमात्माको) यथार्थरूपसे जानते हैं। उनसे तुम्हें सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जायगा।'

पिताके ऐसा कहनेपर शुकदेवजी सुमेरु पर्वतसे उतरकर पृथ्वीपर आये और महाराज जनकके द्वारा पालित विदेहपुरीमें जा पहुँचे। वहाँ छड़ीदार द्वारपालोंने महात्मा जनकको यह सूचना दी—'राजन्! राजद्वारपर व्यासजीके पुत्र शुकदेवजी खड़े हैं।' उन्होंने शुकदेवजीकी परीक्षा लेनेके लिये द्वारपालोंसे अवहेलनापूर्वक कहा—'शुकदेवजी आये हैं तो वहीं ठहरें।' ऐसा कहकर

राजा सात दिनोंतक चुपचाप बैठे रहे--उनकी कोई खोज-खबर नहीं ली। तत्पश्चात् राजा जनकने शुकदेवजीको राजमहलके आँगनमें बुलवाया। वहाँ आनेपर भी शुकदेवजी पूरे सात दिनोंतक उसी प्रकार उपरत होकर बैठे रहे। इसके बाद जनकने शुकदेवजीको अन्तःपुरमें ले आनेकी आज्ञा दी, किंतु वहाँ भी राजाने सात दिनोंतक उन्हें दर्शन नहीं दिया। वे चन्द्रमाके समान मुखवाले शुकदेवजीका अन्तःपुरमें यौवनके मदसे उन्मत्त कमनीय कान्तिवाली सुन्दरियोंद्वारा भाँति-भाँतिके भोजनों तथा भोगसामग्रियोंसे लालन-पालन कराते रहे।

परंतु जैसे मन्द गतिसे बहनेवाली वायु दृढ़मूल अविचल वृक्षको नहीं उखाड़ सकती, उसी प्रकार वे भोग तथा अनादर एवं उपेक्षाजनित दुःख भी व्यासपुत्रके मनको अपनी ओर खींच न सके, उसमें विकार पैदा न कर सके। शुकदेव वहाँ पूर्ण चन्द्रमाके समान निर्विकार, भोग और अनादरमें भी समान (हर्ष-विषादसे रहित), स्वस्थ, मौन तथा प्रसन्न-चित्त बने रहे।

३—जगत्‌की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण, सदेह और विदेह मुक्तिकी समानता तथा शास्त्र-नियन्त्रित पौरुषकी महत्ताका वर्णन

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विश्वामित्रजीका श्रीरामके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना * ६७


इस प्रकार परीक्षाद्वारा शुकदेवजीके स्वभावको जानकर राजा जनकने उन्हें सादर अपने पास बुलवाया और प्रसन्नचित्त देखकर प्रणाम किया । तत्पश्चात् शीघ्रतापूर्वक उनका स्वागत करके राजाने उनसे कहा—'ब्रह्मन् ! जगत्में परम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये जो-जो आवश्यक कर्तव्य हैं, वे सब आपने पूर्ण कर लिये हैं । सारे मनोरथोंको प्राप्त कर लिया है (इस तरह आप कृतकृत्य तथा आप्तकाम हो चुके हैं)। अब आपको किस वस्तुकी इच्छा है ?'

श्रीशुकदेवजीने कहा —महाराज ! मैं जानना चाहता हूँ कि यह संसाररूपी आडम्बर कैसे उत्पन्न हुआ है और इसकी शान्ति या विनाश कैसे होता है। आप शीघ्र ही मुझसे इस विषयका यथावत् रूपसे प्रतिपादन कीजिये ।

श्रीविश्वामित्रजी कहते हैं—महाराज ! इस प्रकार पूछे जानेपर राजा जनकने शुकदेवजीको उस समय वही बात बतायी, जो पहले उनके महात्मा पिता व्यासजीके द्वारा बतायी गयी थी।

तब शुकदेवजीने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज ! मैंने पहले विवेकसे स्वयं ही यह बात जान ली थी। फिर जब पिताजीसे इसके विषयमें पूछा, तब उन्होंने भी मुझे यही बात बतायी और आज आपने भी यही बात कही है। शास्त्रोंमें भी महावाक्योंका यही अर्थ दृष्टिगोचर होता है। वह इस प्रकार है—'यह विनाशशील संसार अपने संकल्पसे उत्पन्न हुआ है और संकल्पका आत्यन्तिक विनाश होनेसे नष्ट हो जाता है अतः सर्वथा निःसार है। यही शास्त्रोंका निश्चय है।' महाबाहो ! क्या यही अविचल सत्य है ? यदि हाँ, तो इसका इस तरह उपदेश कीजिये, जिससे यह मेरे हृदयमें अचल—असंदिग्धरूपसे बैठ जाय । संसारके विषयोंमें भटकते हुए चित्तके द्वारा इधर-उधर भटकाया जाता हुआ मैं आज आपसे शान्ति लाभ करना चाहता हूँ।

राजा जनकने कहा—मुने ! इस ब्रह्माण्डमें एक अखण्ड चिन्मय परम पुरुष परमात्माके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आपने स्वयं विवेकके द्वारा इस तत्त्वको जाना है और फिर गुरुरूप पिताके मुखसे इसको सुना है। इससे बढ़कर दूसरा कोई निश्चय (जानने योग्य तत्त्व) नहीं है। मुनिकुमार ! आप बालक होते हुए भी विषयभोगोंके त्यागमें शूरवीर होनेके कारण महान् वीर हैं। आपकी बुद्धि दीर्घ कालतक बने रहनेवाले रोगरूपी भोगोंसे पूर्णतः विरक्त हो गयी है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ! ब्रह्मन् ! जो प्राप्त करने योग्य वस्तु है, उसे पूर्णरूपसे आपने पा लिया है। आपका चित्त पूर्णकाम हो गया है। आप दृश्य वस्तु (बाह्य विषय) की ओर दृष्टिपात नहीं करते हैं, अतः मुक्त हैं। अभी और कुछ पाना या जानना शेष रह गया है, इस भ्रमको त्याग दीजिये।

(विश्वामित्रजी कहते हैं—श्रीराम !) महात्मा जनकके द्वारा इस प्रकार उपदेश पाकर शुकदेवजी अत्यन्त शुद्ध परम वस्तु परमात्मामें चुपचाप स्थित हो गये। उनके शोक, भय और श्रम—सभी नष्ट हो गये। वे सर्वथा निरीह एवं संशयरहित हो गये। तदनन्तर वे मेरुगिरिके प्रशस्त शिखरपर समाधि लगानेके लिये चले गये। वहाँ दस हजार वर्षोतक निर्विकल्प समाधिमें स्थित रहे और जैसे तेल समाप्त होनेपर दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार वे प्रारब्ध क्षीण हो जानेपर परमात्मामें लीन हो गये ।

(सर्ग १)

६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश करनेके लिये अनुरोध करना और वसिष्ठजीका उसे स्वीकार कर लेना

श्रीविश्वामित्रजी कहते हैं—मुनीश्वरो ! श्रीरामचन्द्रजीने ज्ञातव्य वस्तुको पूर्णतः जान लिया है; क्योंकि इन शुद्ध-बुद्धिवाले श्रीरामको भोग अच्छे नहीं लगते। वे इन्हें रोगके समान प्रतीत होते हैं। जिसने ज्ञेय वस्तुको जान लिया है, उसके मनका अवश्य ही यही लक्षण है कि उसे सारे भोगसमूह फिर कभी रुचिकर नहीं जान पड़ते हैं। भोगोंके चिन्तनसे अज्ञान-जनित बन्धन दृढ़ होता है और भोग-वासनाके शान्त हो जानेपर संसार-बन्धन क्षीण हो जाता है।*

श्रीराम ! विद्वान् लोग भोगवासनाके क्षयको ही मोक्ष कहते हैं और विषयोंमें होनेवाली सुदृढ़ वासनाको ही बन्धन बताते हैं। जिसकी दृष्टि राग आदि दोषोंसे रहित है, वही तत्त्वज्ञ है। उसीने जाननेयोग्य वस्तुको जाना है और वही विद्वान् है। उस महात्मा पुरुषको भोग हठात् अच्छे नहीं लगते। जैसे मरुभूमिमें लता नहीं उगती, उसी प्रकार जबतक जाननेयोग्य तत्त्वका कुछ भी ज्ञान नहीं होता, तबतक मनुष्यके हृदयमें विषयोंकी ओरसे वैराग्य नहीं होता। अतः मुनिवृन्द ! आपलोग यह निश्चितरूपसे समझ लें कि रघुकुलतिलक श्रीरामको ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो गया है; क्योंकि इन्हें ये भोगोंके रमणीय स्थान आनन्दित नहीं कर रहे हैं। मुनीश्वरो ! श्रीरामचन्द्रजी जिस तत्त्वको बुद्धिके द्वारा जानते हैं, उसके विषयमें जब सद्गुरुके मुखसे यह सुन लेंगे कि 'यही परमार्थ वस्तु है' तब इनके चित्तको अवश्य विश्राम प्राप्त होगा। जैसे शरत्कालकी शोभा मेघरहित निर्मल आकाशमात्रकी अपेक्षा रखती है, उसी तरह श्रीरामचन्द्रजीकी बुद्धिको केवल अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परमात्माके तत्त्वमें विश्रामकी अपेक्षा है। अतः महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके चित्तके विश्रामके लिये ये पूज्यपाद श्रीवसिष्ठजी ही यहाँ युक्तिका प्रतिपादन करें; क्योंकि ये समस्त रघुवंशियोंके ही (नहीं, समूचे इक्ष्वाकुवंशियोंके) सदासे प्रभु (नियन्ता एवं शिक्षक) और कुलगुरु हैं। इसके सिवा ये सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी तथा तीनों कालोंमें मोह आदिसे रहित निर्मल दृष्टिवाले हैं।

पूज्यपाद वसिष्ठजी ! क्या वह पहलेकी बात आपको स्मरण है, जब कि हम दोनोंके वैरकी शान्ति तथा परम बुद्धिमान् मुनियोंके कल्याणके लिये देवदारुके वृक्षोंसे आवृत्त निषद पर्वतके शिखरपर साक्षात् पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने महत्त्वपूर्ण ज्ञानका उपदेश दिया था ? ब्रह्मन् ! उस युक्तियुक्त ज्ञानसे यह सांसारिक वासना अवश्य उसी तरह नष्ट हो जाती है, जैसे भगवान् भास्करके उदयसे अँधेरी रात। विप्रवर ! आप उसी युक्तियुक्त ज्ञेय वस्तुका


* भोगभावनया याति बन्धो दार्ढ्यमवस्तुजः।
तयोपशान्त्या याति बन्धो जगति तानवम्॥

४—शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा, पुरुषार्थसे भिन्न प्रारब्धवादका खण्डन तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * जगत्‌की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण * ६९


अपने शिष्य श्रीरामको शीघ्र उपदेश दीजिये, जिससे ये विश्राम ( शान्ति ) को प्राप्त हों । इसमें आपको अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ेगा; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी सर्वथा निष्पाप हैं । अतः जैसे निर्मल दर्पणमें बिना यत्नके ही मुँहका प्रतिबिम्ब दिखायी देने लगता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको अनायास ही ज्ञेय वस्तुका बोध एवं विश्राम प्राप्त हो जायगा । महात्मन् ! वही ज्ञान, वही शास्त्रार्थ और वही पाण्डित्य सार्थक एवं प्रशंसित है, जिसका वैराग्ययुक्त उत्तम शिष्यके लिये उपदेश दिया जाता है । जिसमें वैराग्य नहीं है तथा जो शिष्यभावसे रहित है, उसे जो कुछ भी उपदेश दिया जाता है, वह कुत्तेके चमड़ेसे बने हुए कुप्पेमें रखे हुए गायके दूधकी भाँति अपवित्रताको प्राप्त हो जाता है । जहाँ आप-जैसे वीतराग, निर्भय, क्रोधशून्य, अभिमानरहित तथा निष्पाप महापुरुष तत्त्वज्ञानका उपदेश देते हैं, वहाँ तत्काल बुद्धिको विश्राम प्राप्त होता है ।

गाधिनन्दन विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर व्यास और नारद आदि उन सभी मुनियोंने साधु-साधु कहकर उनके उस कथनकी ही भूरि-भूरि प्रशंसा की। तत्पश्चात् राजा दशरथके बगलमें बैठे हुए ब्रह्माजीके पुत्र महातेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने, जो ब्रह्माजीके समान ही ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न थे, कहा ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—मुने ! आप जिस कार्यके लिये मुझे आज्ञा दे रहे हैं, उसे मैं बिना किसी विघ्न-बाधाके आरम्भ कर रहा हूँ । शक्तिशाली होकर भी संतोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ! पूर्वकालमें निषध पर्वतपर पूजनीय पद्मयोनि ब्रह्माजीने संसाररूपी भ्रमको दूर करनेके लिये जिस ज्ञानका उपदेश किया था, वह सब अविकलरूपसे मुझे याद है । ( सर्ग २ )


जगत्‌की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण, सदेह और विदेह मुक्तिकी समानता तथा शास्त्रनियन्त्रित पौरुषकी महत्ताका वर्णन

श्रीवसिष्ठजीने कहा—पूर्वकालमें सृष्टिके प्रारम्भके समय भगवान् ब्रह्माने संसाररूपी भ्रमके निवारणके लिये जिस ज्ञानका उपदेश दिया था, उसीका मैं यहाँ वर्णन करता हूँ । यह जगत् सङ्कल्पके निर्माण, मनोराज्यके विलास, इन्द्रजालद्वारा रचित पुष्पहार, कथा-कहानीके अर्थके प्रतिभास, वातरोगके कारण प्रतीत होनेवाले भूकम्प, बालकको डरानेके लिये कल्पित पिशाच, निर्मल आकाशमें कल्पित मोतियोंके ढेर, नावके चलनेसे तथा प्रतीत होनेवाली वृक्षोंकी गति, स्वप्नमें देखे गये नगर अन्यत्र देखे गये फूलोंके स्मरणसे आकाशमें कल्पित हुए पुष्पकी भाँति भ्रमद्वारा निर्मित हुआ है । मृत्युकालमें पुरुष स्वयं अपने हृदयमें इसका अनुभव करता है ।

इस प्रकार जगत् मिथ्या होनेपर भी चिरकालतक अत्यन्त परिचयमें आनेके कारण घनीभाव ( दृढ़ता ) को प्राप्त होकर जीवके हृदयाकाशमें प्रकाशित हो बढ़ने लगता है । यही 'इहलोक' कहलाता है । जन्मसे लेकर मृत्युतककी चेष्टाओं तथा मरण आदिका अनुभव करनेवाला जीव वही ( हृदयाकाशमें ही ) इहलोककी कल्पना करता है, जैसा कि ऊपर कहा गया है । फिर मरनेके अनन्तर वह वहीं परलोककी कल्पना करता है । वासनाके भीतर अन्य अनेक शरीर और उनके भीतर भी दूसरे-दूसरे शरीर—ये इस संसारमें केलेके वृक्षकी त्वचा ( छिलके वा वल्कल ) के समान एकके पीछे एक प्रतीत होते हैं ( वस्तुतः इस संसारमें कोई सार नहीं है ) । न तो पृथिवी आदि पञ्च महाभूतोंके समुदाय हैं और न जगत्‌की सृष्टिका कोई क्रम ही है । ये सब-के-सब मिथ्या हैं। तथापि मृत और जीवित जीवोंको

७०* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

इनमें संसारका भ्रम होता है। यह अविद्यारूपिणी नदी ही है, जिसका कहीं अन्त नहीं है। यह विभिन्न धाराओंके रूपमें फैलती हुई शोभा पाती है। मूढ़ पुरुषोंके लिये यह इतनी विशाल है कि वे इसे पार नहीं कर सकते। सृष्टिरूपी चञ्चल तरङ्गोंसे ही यह तरङ्गवती जान पड़ती है।

श्रीराम ! परमार्थ सत्य (परमात्मा) रूपी विशाल महासागरमें बारंबार वे पुरानी और नयी सृष्टिरूप असंख्य तरङ्गों उठती और विलीन होती रहती हैं। इस समय ब्रह्मकल्पका अवयवभूत बहत्तरवाँ त्रेतायुग चल रहा है। यह पहले भी अनेक बार हो चुका है और आगे भी होता रहेगा। यह वही पहलेवाला त्रेतायुग है और उससे विलक्षण भी। ये जितने लोक हैं, वे भी पूर्ववत् हुए हैं और उनकी अपेक्षा नवीन भी हैं। इसी प्रकार तुम श्रीराम भी अनेक वार त्रेतायुगमें अवतार ले चुके हो और भविष्यमें भी लोगे। मैं भी कितनी ही बार वसिष्ठ-रूपमें उत्पन्न हो चुका हूँ और आगे भी होऊँगा। हमारे ये सभी रूप पूर्वके तुल्य होंगे और उनसे भिन्न भी। इस बातको मै अच्छी तरह जानता हूँ। सभी प्राणी कभी धन-वैभव, बन्धु-बान्धव, अवस्था, कर्म, विद्या, विज्ञान और चेष्टाओंमें पूर्वकल्पोंके समान होते हैं और कभी नहीं भी होते। जो अविद्यारूपी आवरणसे रहित है, जिसका अन्तःकरण एकाग्र हो चुका है, जिसके सभी संकल्प-विकल्प शान्त हो चुके हैं तथा जो स्वरूपभूत सारतत्त्व (सच्चिदानन्दघन)—मय हो गया है, वह विद्वान् पुरुष परम शान्तिरूपी अमृतसे तृप्त रहता है।

सौम्य श्रीराम ! समुद्रकी जलराशि शान्त हो या उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त, दोनों दशाओंमें उसकी जलरूपता समान ही है—उसमें किसी प्रकारका अन्तर नहीं है। उसी तरह देहके रहते हुए और उसके न रहनेपर भी मुक्त महात्मा मुनिकी स्थिति एक-सी ही होती है, उसमें कोई भेद नहीं होता है। सदेह मुक्ति हो या विदेहमुक्ति, उसका विषयोंसे कोई सम्बन्ध नहीं है। जिसने सत्य मानकर भोगोंका आस्वादन ही नहीं किया, उस पुरुषमें भोगोंकी अनुभूति कहाँसे होगी? जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त दोनों ही प्रकारके महात्मा बोधस्वरूप हैं। उनमें क्या भेद है? (इन दोनोंमें भेद करानेवाला है अज्ञान। उसके नष्ट हो जानेपर जब केवल ज्ञान ही अवशिष्ट रह जाता है, तब उन दोनोंमें भेद कौन हो सकता है !) जैसे समुद्रकी तरङ्गावस्थामें जो जल है, वही उसकी प्रशान्तावस्थामें भी है—उसमें कोई अन्तर नहीं है। सदेह और विदेहमुक्तमें थोड़ा-सा भी भेद नहीं हैं। पवन सस्पन्द (वेगवान्) हो या निष्पन्द (शान्त अथवा वेगहीन), दोनों ही दशाओंमें वह है वायु ही।

अतः अब मैं जिसका प्रकरण चल रहा है, उस उत्तम ज्ञानका ही उपदेश कर रहा हूँ, तुम इसका निरूपण सुनो। यह ज्ञान कानोंका आभूषण है और अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है। रघुनन्दन ! इस संसारमें सदा अच्छी तरह पुरुषार्थ (प्रयत्न) करनेसे सबको सब कुछ मिल जाता है। (जहाँ कहीं किसीको असफल देखा जाता है, वहाँ उसके सम्यक् प्रयत्नका अभाव ही कारण है।) साधनके परिपक्व होनेपर हृदयमें, जैसे चन्द्रमासे शीतलतायुक्त आह्लाद प्राप्त होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अतिशय शीतल आनन्दका उदय होता है। यह आत्यन्तिक आनन्द पुरुषके प्रयत्नसे ही प्राप्त हो सकता है, अन्य हेतु (प्रारब्ध) से नहीं। (इसलिये पुरुषको प्रयत्नपर ही निर्भर रहना चाहिये।) शास्त्रज्ञ सत्पुरुषोंके बताये हुए मार्गसे चलकर अपने कल्याणके लिये जो मानसिक, वाचिक और कायिक चेष्टा की जाती है, वही पुरुषार्थ है और वही सफल चेष्टा है। उससे भिन्न जो शास्त्र-विपरीत मनमाना आचरण है, वह पागलोंकी-सी चेष्टा है। जो मनुष्य जिस पदार्थको पाना चाहता है, उसकी

५—ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन * ७१


प्राप्तिके लिये यदि वह क्रमशः यत्न करता है और बीचमें ही उससे मुँह नहीं मोड़ लेता तो अवश्य उसे प्राप्त कर लेता है। कोई एक विशेष प्राणी ही पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा तीनों लोकोंके ऐश्वर्यसे युक्त होनेके कारण परम सुन्दर प्रतीत होनेवाली इन्द्रपदवीको प्राप्त हो गया है। निरन्तर यत्नमें लगे रहकर सुदृढ़ अभ्यासमें तत्पर हुए बुद्धिमान् और साहसी पुरुष मेरुपर्वतको भी निगल जानेकी शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। श्रुति-स्मृति आदि शास्त्रसे नियन्त्रित पुरुषार्थके सम्पादनमें तत्पर जो पुरुषका पौरुष (उद्योग) है, वही मनोवाञ्छित फलकी सिद्धिका कारण होता है। शास्त्रके विपरीत किया हुआ प्रयत्न अनर्थकी ही प्राप्ति करानेवाला होता है। कोई पुरुष जब शास्त्रीय प्रयत्नको शिथिल कर देता है, तब स्वयं दरिद्रता, रोग और बन्धन आदि अपनी दुर्दशाके कारण वह ऐसी अवस्थामें पहुँच जाता है, जहाँ उसके लिये पानीकी एक बूँद भी बहुत समझी जाती है। (दुर्लभ हो जाती है); परंतु किसीको शास्त्रानुसार आचरणके प्रभावसे ऐसी उत्तम अवस्था प्राप्त होती है, जहाँ समुद्र, पर्वत, नगर और द्वीपोंसे व्याप्त विशाल भूमण्डलका साम्राज्य भी अधिक नहीं समझा जाता (वह अनायास सुलभ हो जाता है)।

(सर्ग ३-४)


शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा, पुरुषार्थसे भिन्न प्रारब्धवादका खण्डन तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे नीले, पीले आदि भिन्न-भिन्न रंगोंकी अभिव्यक्तिमें प्रकाश ही मुख्य कारण है, उसी प्रकार शास्त्रके अनुसार मन, वाणी और शरीरद्वारा व्यवहार करनेवाले अधिकारी पुरुषोंके समस्त पुरुषार्थोंकी सिद्धिमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्ति ही प्रधान साधन है। मनुष्य केवल मनसे किसी वस्तुकी इच्छा करता है, शास्त्रानुसार कर्मसे नहीं, वह पागलोंकी-सी चेष्टा करता है। उसकी वह चेष्टा केवल मोहमें डालनेवाली है, पुरुषार्थको सिद्ध करनेवाली नहीं। जो मनुष्य जैसा प्रयत्न (कर्म) करता है, वह वैसा ही फल भोगता है, (जो यह कहते हैं कि दैववश फलमें विपरीतता भी आ जाती है तो उनका कथन ठीक नहीं; क्योंकि) अपना पूर्वकृत कर्म ही फल देनेके लिये उन्मुख होनेपर दैव कहलाता है। उससे अतिरिक्त दैव नामकी कोई वस्तु नहीं दिखायी देती। पुरुषार्थ दो प्रकारका है—एक शास्त्रानुमोदित (पुण्य-कर्म) और दूसरा शास्त्रविरुद्ध (पाप-कर्म)। इन दोनोंमें जो शास्त्रविरुद्ध पुरुषार्थ है, वह अनर्थका कारण होता है और शास्त्रानुमोदित पौरुष परमार्थ वस्तुकी प्राप्तिमें कारण है। इसलिये पुरुषको शास्त्रीय प्रयत्नसे तथा साधु पुरुषोंके सङ्गसे ऐसा उद्योग करना चाहिये कि इस जन्मका पौरुष पूर्वजन्मके पौरुष (प्रारब्ध) को शीघ्र जीत ले। अपने उत्तम पुरुषार्थका आश्रय लेकर दाँतोंसे दाँतोंको पीसते हुए (तत्परतापूर्वक प्रयत्नमें लगे हुए) पुरुषको अपने शुभ पौरुषके द्वारा विघ्न करनेके लिये उद्यत पूर्वजन्मके अशुभ पौरुषको जीत लेना चाहिये। 'यह पूर्व जन्मका पुरुषार्थ (प्रारब्ध) मुझे प्रेरित करके विशेष परिस्थितिमें डाल देता है, इस प्रकारकी बुद्धिको बलपूर्वक कुचल डालना चाहिये; क्योंकि वह प्रत्यक्ष प्रयत्नसे अधिक प्रबल नहीं है। तबतक प्रयत्नपूर्वक उत्तम पुरुषार्थके लिये सचेष्ट रहना चाहिये, जबतक कि पूर्वजन्मका अशुभ पौरुष स्वयं पूर्णतः शान्त न हो जाय। अर्थात् जबतक पहले जन्मोंका किया हुआ अशुभ कर्म समूल नष्ट न हो जाय, तबतक तत्परतासे उत्साहपूर्वक साधन करते रहना चाहिये।

जैसे अपने द्वारा कल घटित हुए दोषका आज

६—विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन

७२ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्रायश्चित्त कर लेनेपर नाश हो जाता है, उसी प्रकार इस जन्मके गुणोंसे ( शुभ पौरुषसे ) पूर्व-जन्मका दोष ( अशुभ पौरुष ) अवश्य नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। पूर्वजन्मके अशुभ या दुःखदायक प्रारब्धको इस जन्मके शुभ कर्मोंसे विशुद्ध एवं पुष्ट हुई बुद्धिके द्वारा तिरस्कृत करके संसार-सागरसे पार होनेके उद्देश्यकी सिद्धिके लिये अपने भीतर दैवी सम्पत्तिके संग्रहके निमित्त सदा यत्न करना चाहिये। उद्योगशून्य आलसी मनुष्य गदहोंके समान गये-बीते हैं। अतः स्वयं भी उद्योग छोड़कर उन्हींकी श्रेणी या तुलनामें नहीं जाना चाहिये। शास्त्रके अनुसार किया हुआ उद्योग इहलोक और परलोक दोनोंकी सिद्धिमें कारण है। मनुष्यको पुरुषार्थरूपी प्रयत्नका आश्रय लेकर इस संसाररूपी गड्ढेसे स्वयं बलपूर्वक निकल जाना चाहिये। अपने शरीरको प्रतिदिन नाश होता हुआ समझे। पशुओं-के समान आचरणका त्याग करे और सत्पुरुषोंके योग्य आचार-व्यवहारका आश्रय ले। जैसे कीड़ा घावमें पीब आदिका आस्वादन करके ही अपना जीवन समाप्त कर देता है, उसी तरह मनुष्यको घरमें स्त्री, अन्न, पान आदि द्रव्ययुक्त एवं कोमल तुच्छ पदार्थोंका किंचित् आस्वाद लेकर सम्पूर्ण पुरुषार्थोंके साधनभूत आयुको भस्म नहीं कर देना चाहिये (मानव-जीवनको व्यर्थ नहीं गवाँ देना चाहिये)। शुभ पुरुषार्थसे शीघ्र ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है और अशुभ पुरुषार्थसे सदा अशुभ फल ही मिलता है। इन शुभ-अशुभ पुरुषार्थोंके सिवा दैव नामकी दूसरी कोई वस्तु नहीं है (इन्हींका नाम दैव या प्रारब्ध है)। इसलिये पहले पुरुषार्थके द्वारा विवेकका आश्रय लेकर आत्मज्ञानरूपी महान् प्रयोजनवाले शास्त्रोंका विचार करना चाहिये। जो शास्त्रके अनुसार अपनी श्रवण, मनन आदि चेष्टाओंके द्वारा साधन नहीं करते और चित्तमें विषयोंका ही चिन्तन करते रहते हैं, उन मूढ़ पुरुषोंकी अत्यन्त दूषित भोगेच्छाको धिक्कार है। पूर्वोक्त पुरुषप्रयत्न यदि सत्-शास्त्रके अनुकूल तथा सत्सङ्ग और सदाचारसे युक्त होता है तो वह परमात्मसाक्षात्काररूप अपने फलको देता है। यह उसका स्वभाव है। अन्यथा (सत्-शास्त्रके प्रतिकूल तथा सत्सङ्ग और सदाचारसे रहित होनेपर) उससे परमात्म-साक्षात्काररूप परम फलकी सिद्धि नहीं होती। यही पौरुषका स्वरूप है। इस प्रकार व्यवहार करनेवाले किसी भी पुरुषका प्रयत्न कभी विफल नहीं होता। बाल्यावस्था-से लेकर भलीभाँति अभ्यासमें लाये हुए सत्-शास्त्रानुशीलन और सत्पुरुषोंके सङ्ग आदि सद्गुणोंद्वारा पुरुषार्थ करनेसे परम स्वार्थरूप परमात्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रत्यक्ष देखी हुई, अनुभवमें आयी हुई, सुनी हुई और साधनोंद्वारा प्राप्त की हुई परमार्थ वस्तुको जो लोग दैवके अधीन मानते हैं, उनकी बुद्धि कुत्सित है और वे साधनसे नष्ट-भ्रष्ट हो गये हैं। निरन्तर कल्पित क्रीड़ाओं (खेल-कूद) के कारण अत्यन्त चञ्चलतापूर्ण बाल्यावस्थाके व्यतीत हो जानेपर जब (दुखी और गुरुजनोंकी सेवामें समर्थ) बाहुदण्डसे अलंकृत यौवन-अवस्थाका आरम्भ हो जाय, तभीसे मनुष्यको पद-पदार्थके ज्ञानसे विशुद्ध-बुद्धि होकर सत्पुरुषोंके सङ्गसे अपने गुणों और दोषोंका विचार करना चाहिये। तात्पर्य यह कि विचारपूर्वक दोषोंको त्याग करके गुणोंको ग्रहण करना चाहिये।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! मुनिवर वसिष्ठजीके इस प्रकार प्रवचन करनेपर वह दिन व्यतीत हो गया। सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये तथा उस सभाके लोग वसिष्ठजीको नमस्कार करके सायंकालिक कृत्य (संध्योपासना और अग्निहोत्र आदि) करनेके लिये चले गये और रात्रि व्यतीत होनेपर पुनः सूर्यदेवकी किरणोंके साथ ही उस सभाभवनमें आ गये। (सर्ग ५)

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण * ७३


ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! पूर्वजन्मके पौरुषसे भिन्न दैव कोई वस्तु नहीं है ( पूर्वजन्मोंका पुरुषार्थ ही दैव है ) । इसलिये 'मैं दैवके अधीन हूँ, कर्म करनेमें स्वतन्त्र नहीं हूँ' ऐसी बुद्धि या विचारधाराको सत्सङ्ग तथा सत्-शास्त्रके अभ्यासद्वारा मनसे दूर करके जीवात्माका इस संसार सागरसे बलपूर्वक उद्धार करे ( आलस्यवश सत्कर्म अथवा साधन कभी नहीं छोड़े ) । जैसे-जैसे प्रयत्न होगा, वैसे-ही-वैसे शीघ्रतापूर्वक फल प्राप्त होगा। इसीका नाम पौरुष है । पूर्वजन्मके उस पौरुषको ही कोई दैवकी संज्ञा देना चाहे तो दे सकता है । जो तुच्छ विषय-सुखोंके क्षणिक लोभमें फँसकर उस पूर्वकृत पौरुष या दैवको वर्तमान जन्मके पुरुषार्थद्वारा जीतनेका प्रयत्न नहीं करते और सदा दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे दीन, पामर और मूढ़ हैं ( क्योंकि पुरुषार्थके बिना आत्म-कल्याण सिद्ध नहीं होता ) । पूर्वजन्मके तथा इस जन्मके पुरुषार्थ (कर्म) दो मेढ़ोंकी तरह आपसमें लड़ते हैं । उनमें जो भी बलवान् होता है, वही दूसरेको क्षणभरमें पछाड़ देता है* । इस जन्ममें किया गया प्रबल पुरुषार्थ अपने बलसे पूर्वजन्मके पौरुष या दैवको नष्ट कर देता है और पूर्वजन्मका प्रबल पौरुष इस जन्मके पुरुषार्थको अपने बलसे दबा देता है । पूर्वकृत कर्मोंके फलरूप प्रारब्ध


* जैसे पूर्वजन्मके किसी प्रतिबन्धक कर्मके कारण किसी मनुष्यको पुत्रकी प्राप्ति नहीं होनेवाली है; परन्तु यदि वह पुत्र-प्राप्तिके लिये शास्त्रीय विधानके साथ पुत्रेष्टि-यज्ञ अथवा उसी कोटिके दूसरे किसी सत्कर्मका अनुष्ठान करता है तो उसे पुत्रकी प्राप्ति हो जाती है । यहाँ पूर्वजन्मके प्रतिबन्धक कर्मसे इस जन्मका पुरुषार्थ अधिक बलवान् होनेके कारण नवीन प्रारब्धका निर्माण करके विजयी हो जाता है । इसी प्रकार पूर्वजन्मके कर्मानुसार यदि किसीकी मृत्यु अवश्यम्भावी है तो उसके प्रतीकारके लिये अनेक प्रकारके उपाय करनेपर भी मनुष्य उसे टाल नहीं पाता । अतः यहाँ पूर्वकृत कर्म ( दैव या प्रारब्ध ) ही प्रबल होनेके कारण विजयी होता है ।


और वर्तमान जन्मके पुरुषार्थ--इन दोनोंमें वर्तमान जन्मका पुरुषार्थ ही प्रत्यक्षतः बलवान् है, इसलिये अधिकारी मनुष्यको पुरुषार्थका सहारा लेकर सत्-शास्त्रोंके अभ्यास और सत्सङ्गद्वारा बुद्धिको निर्मल बनाकर संसार-सागरसे अपना उद्धार कर लेना चाहिये । इस जन्मके और पूर्व-जन्मके दोनों पुरुषार्थ पुरुषरूपी वनमें उत्पन्न हुए फल देनेवाले वृक्ष हैं । उन दोनोंमें जो अधिक बलवान् होता है, वही विजयी होता है (अर्थात् धर्माचरण और मुक्तिके विषयमें तो इस जन्मका पुरुषार्थ बलवान् है और अर्थ एवं कामके विषयमें पूर्वजन्मका फलदानोन्मुख कर्म या दैव प्रबल है । )

जो पुरुष उदार स्वभावसे युक्त एवं सत्कर्मके लिये प्रयत्न करनेमें कुशल है, सदाचार ही जिसका लीला-विहार है, वह जगत्‌के मोहरूपी फंदेसे उसी प्रकार निकल जाता है, जैसे सिंह पिंजड़ेसे । जो मनुष्य दृष्ट (पुरुषार्थ या परम कल्याणके लिये प्रयत्न) का त्याग करके 'मुझे तो कोई ऐसा करनेके लिये प्रेरित कर रहा है,' ऐसी अनर्थकारिणी कुत्सित कल्पनामें स्थित हैं, उसे दूरसे ही त्याग देना चाहिये; क्योंकि वह मनुष्योंमें अधम हैं । संसारमें सहस्रों व्यवहार हैं, जो आते-जाते रहते हैं । उनमें सुख और दुःख बुद्धि (अनुकूलता तथा प्रतिकूलताजनित राग-द्वेष) का त्याग करके शास्त्रके अनुसार आचरण करना चाहिये । शास्त्रके अनुकूल और कभी उच्छिन्न न होनेवाली अपनी मर्यादाका जो त्याग नहीं करता, उस पुरुषको सारी अभीष्ट वस्तुएँ उसी प्रकार प्राप्त होती हैं, जैसे सागरमें गोता लगानेवालेको रत्न । सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्ति—यही मनुष्यका स्वार्थ है । उस स्वार्थकी प्राप्ति करानेवाले जो आवश्यक कर्तव्य या साधन हैं, एकमात्र उन्हींमें तत्पर रहनेको ही विद्वान् लोग पौरुष कहते हैं । वह तत्परता यदि शास्त्रसे नियन्त्रित हो तो परम पुरुषार्थकी

७—पुरुषार्थकी प्रबलता बताते हुए दैवके स्वरूपका विवेचन तथा शुभ वासनासे युक्त होकर सत्कर्म करनेकी प्रेरणा

७४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्राप्ति करानेवाली होती है। कर्तव्यपालनके लिये जो शरीर आदिका संचालन होता है, वही जिसका धर्म है, उस क्रिया (श्रवण-मनन आदि साधन) से, सत्सङ्गसे और सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे शुद्ध एवं तेज की हुई अपनी बुद्धिके द्वारा जो स्वयं ही आत्माका उद्धार किया जाता है, वही परम स्वार्थकी सिद्धि है। विद्वान्लोग अन्तरहित, समतारूप परमानन्दसे पूर्ण परमार्थ वस्तु (परब्रह्म) को जानते हैं। जिन साधनोंसे उसकी प्राप्ति होती है, उनका नित्य-निरन्तर सेवन करना चाहिये। वे साधन हैं शास्त्रोंका स्वाध्याय और सत्सङ्ग आदि। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक आत्म-कल्याणके साधनमें संलग्न होता है, उसे अपने पुरुषार्थसे ही हाथपर रखे हुए आँवलेकी भाँति वह अभीष्ट फल प्रत्यक्ष दिखायी देता है। जो इस प्रत्यक्ष पुरुषार्थको छोड़कर दैवरूपी मोहमें निमग्न होता है, वह मूढ़ है।

अतः शुभाशय श्रीराम ! अपनी कोरी कल्पनाके बलसे उत्पन्न, मिथ्याभूत तथा सम्पूर्ण कारण और कार्यसे रहित दैवकी अपेक्षा न रखकर आत्मकल्याणके लिये अपने उत्तम पुरुषार्थका आश्रय लो। शास्त्रोंद्वारा तथा महापुरुषोंके सदाचारसे विस्तारको प्राप्त हुए विविध देश धर्मोंद्वारा समर्थित जो परमात्माकी प्राप्तिरूप अतिशय प्रसिद्ध फल है, उसके लिये हृदयमें अत्यन्त उत्कट अभिलाषा होनेपर उसकी प्राप्तिके लिये चित्तमें स्पन्दन या चेष्टा होती है। तत्पश्चात् इन्द्रियों और हाथ-पैर आदि अङ्गोंमें क्रिया होती है—इनके द्वारा श्रवण-मनन आदि एवं यम-नियमादि साधनोंका आरम्भ होता है, इसीको उत्तम पुरुषार्थ कहते हैं। अधिकारी पुरुषका जन्म पुरुषार्थके सिद्ध होनेपर ही सफल होता है, अन्यथा नहीं—ऐसा जानकर सदा आत्मकल्याणके प्रयत्नमें ही संलग्न रहना चाहिये। तत्पश्चात् साधनविषयक उस तत्परताको सत्-शास्त्रोंके अभ्यास एवं संत-महात्माओं तथा ज्ञानी पुरुषोंके सेवनद्वारा आत्मज्ञानरूप फलकी प्राप्तिसे सफल बनाना चाहिये। आत्मकल्याणके विषयमें यदि परम पुरुषार्थका आश्रय लिया जाय तो वह अवश्य दैवको जीत लेता है, ऐसी धारणा रखकर दैव और पौरुषके बलाबलका विचार करनेके कारण जो परम सुन्दर प्रतीत होते हैं तथा जिनमें शम, दम आदि साधन भी विद्यमान हैं एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सेवासे जिनका अन्त करण सदा भावित रहता है, ऐसे अधिकारी पुरुषोंको तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये अवश्य उद्यम करना चाहिये। इस जन्ममें सम्पादन करनेयोग्य स्वाभाविक प्रयत्न ही परम पुरुषार्थकी सिद्धिका हेतु है, ऐसा निश्चितरूपसे जानकर यह अधिकारी जीव नित्य संतुष्ट एवं उत्तम ज्ञानीजनोंकी सेवारूप अमोघ, मधुर और उत्कृष्ट औषधसे जन्म मरणकी परम्परारूप भवरोगको शान्त करे। (सर्ग ६)

विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन

जो लोग उद्योगका त्याग करके केवल दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे आलसी मनुष्य स्वयं ही अपने शत्रु हैं। वे अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका नाश कर डालते हैं।* बुद्धि, मन और कर्मेन्द्रियोंके द्वारा की जानेवाली चेष्टाएँ पौरुषके रूप हैं। इन्हींसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। साक्षी चेतनमें पहले जैसी विषयकी अनुभूति होती है, मन वैसी ही चेष्टा करता है। मनके व्यापारके अनुसार शरीर चलता है—शारीरिक क्रिया होती है और उसके अनुसार ही फलकी सिद्धि होती है। लोकमें जहाँ-जहाँ जैसे-जैसे पुरुषार्थकी आवश्यकता होती है, वहाँ-वहाँ वैसे-ही-वैसे पौरुषके उपयोगसे तदनुरूप लौकिक या वैदिक फलकी सिद्धि होती है। पुरुषार्थसे ही बृहस्पति देवताओंके गुरु बने हुए हैं और पुरुषार्थसे शुक्राचार्यने दैत्यराजोंके गुरुका पद प्राप्त किया


* ये समुद्योगमुत्सृज्य स्थिता दैवपरायणाः।
ते धर्ममर्थं कामं च नाशयन्त्यात्मविद्विषः॥
(मुमुक्षु० ७। ३)

८—श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन, ज्ञानप्राप्तिका विस्तार, श्रीरामजीके वैराग्यकी प्रशंसा, वक्ता और प्रश्नकर्ताके लक्षण आदिका विशेषरूपसे वर्णन

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन * ७५

है । जो नाना प्रकारके आश्चर्यजनक वैभवके आश्रय ( अधिपति ) थे और वैभवभोगकी दृष्टिसे महान् समझे जाते थे, ऐसे पुरुष भी अपने दोषयुक्त पौरुष (पापाचरण) से ही नरकोंके अतिथि हुए हैं—उच्च पदवीसे भ्रष्ट हो गये हैं । सहस्रों सम्पदाओं और हजारों विपत्तियोंसे पूर्ण नाना प्रकारकी अनुकूल-प्रतिकूल दशाओंमें पड़े हुए विभिन्न जातियोंके प्राणी अपने पुरुषार्थसे ही उन्हें लाँघकर कल्याणके मार्गपर अग्रसर होते हैं । शास्त्रोंके अभ्यास, गुरुके उपदेश और अपने प्रयत्न—इन तीनोंसे ही सर्वत्र पुरुषार्थकी सिद्धि देखी जाती है । कल्याणकामी पुरुष अशुभ कर्मोंमें लगे हुए मनको वहाँसे हटाकर प्रयत्नपूर्वक शुभ कर्मोंमें ही लगाये । यही सम्पूर्ण शास्त्रोंके सारांशका संग्रह है । वत्स ! जो वस्तु कल्याणकारी है, जो तुच्छ नहीं ( सबसे उत्कृष्ट ) है तथा जिसका कभी विनाश नहीं होता, उसीका यत्नपूर्वक आचरण करो । यही सब गुरुजन उपदेश देते हैं । पौरुषसे ही अभीष्ट वस्तुकी सिद्धि होती देखी जाती है । पौरुषसे ही बुद्धिमानोंकी कल्याणमार्गमें प्रगति होती है । दैव तो दुःख-सागरमें डूबे हुए कोमल एवं दुर्बल चित्तवाले लोगोंके लिये आश्वासनमात्र है ।

लोकमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंद्वारा पुरुषका प्रयत्न सदा सफल होता देखा जाता है । पुरुष अपने पौरुषसे ही देशान्तरमें आता-जाता है । उत्तम बुद्धिवाले मनुष्य पौरुषसे ही उन भीषण संकटोंसे अनायास पार हो जाते हैं, जिनसे पार पाना अत्यन्त कठिन होता है । यह जो व्यर्थ दैवकी कल्पना की गयी है, उसके भरोसे वे संकटोंसे पार नहीं होते । जो मनुष्य जैसा प्रयत्न करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है । इस जगत्में चुपचाप बैठे रहनेवाले किसी भी मनुष्यको अभीष्ट फलकी प्राप्ति नहीं होती । श्रीराम ! शुभ पुरुषार्थसे शुभ फल प्राप्त होता है और अशुभ पुरुषार्थसे अशुभ । अतः तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो । अपने परम अभीष्ट वस्तुको प्राप्त करानेवाले एकमात्र कार्यके प्रयत्नमें जो तत्पर हो जाना है, उसीको विद्वान् पुरुष पौरुष कहते हैं । उस तत्परतासे ही सब कुछ प्राप्त किया जाता है । अपने पैरोंद्वारा एक स्थानसे दूसरे स्थानमें जाना, हाथका किसी द्रव्यको धारण करना तथा दूसरे-दूसरे अङ्गोंका तदनुकूल व्यापारमें प्रवृत्त होना—यह सब पुरुषार्थसे ही सम्भव होता है, दैवसे नहीं । अनर्थकी प्राप्ति करानेवाले एकमात्र कार्यके प्रयत्नमें जो तत्पर होना है, उसे विद्वानोंने पागलोंकी-सी चेष्टा बतायी है । उससे कोई भी शुभ फल नहीं प्राप्त होता ( अशुभ फलकी ही प्राप्ति होती है )। कर्तव्य-पालनके लिये जो शरीर आदिका संचालन होता है, वही जिसका धर्म है, उस क्रियासे, सत्सङ्गसे और सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे शुद्ध एवं तेज की हुई अपनी बुद्धिके द्वारा जो स्वयं ही आत्माका उद्धार किया जाता है, वही परम स्वार्थकी सिद्धि है । विद्वान्लोग अनन्त, समतारूप परमानन्दसे पूर्ण अपने परम प्राप्य अर्थ (परब्रह्म परमात्मा) को जानते हैं । जिन साधनोंसे उसकी प्राप्ति होती है, उन्होंका नित्य-निरन्तर सेवन करना चाहिये । वे साधन हैं शास्त्रोंके स्वाध्याय और सत्सङ्ग आदि । जैसे शरत्कालमें सरोवर और कमल एक दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार सद्बुद्धिसे सत्-शास्त्रोंका अभ्यास और सत्सङ्गरूपी गुण विकसित होता है तथा सत्-शास्त्रोंके स्वाध्याय और सत्सङ्गरूपी गुणसे सद्बुद्धिकी वृद्धि होती है । चिरकालके अभ्याससे ये दोनों एक दूसरेके वर्धक और पोषक होते हैं । बाल्यावस्थासे ही पूर्णतः अभ्यासमें लाये गये शास्त्र और सत्सङ्ग आदि गुणोंसे पौरुषद्वारा अपना हितकारी कार्य सिद्ध होता है । ( सर्ग ७ )


सं० यो० व० अं० ४-

७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


पुरुषार्थकी प्रबलता बताते हुए दैवके स्वरूपका विवेचन तथा शुभ वासनासे युक्त होकर सत्कर्म करनेकी प्रेरणा

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! बताओ तो सही, इस लोकमें जो शूरवीर, पराक्रमी, बुद्धिमान् और पण्डित हैं, वे किस दैवकी प्रतीक्षा करते हैं ? इन महामुनि विश्वामित्रजीने दैवको दूरसे ही त्यागकर पौरुषसे ही ब्राह्मणत्व प्राप्त किया है, और किसी साधनसे नहीं। हमने तथा दूसरे-दूसरे पुरुषोंने, जो इस समय मुनि-पदवीको प्राप्त हैं, चिरकालतक किये गये पौरुषसे ही आकाशमें विचरण करनेकी शक्ति प्राप्त की है। हिरण्यकशिपु आदि दानवेन्द्रोंने पुरुषोचित प्रयत्नसे ही देवसमुदायको दूर भगाकर त्रिलोकीका साम्राज्य प्राप्त किया था। फिर इन्द्र आदि देवेश्वरोंने पुरुषोचित प्रयत्नसे ही शत्रुसेनाको छिन्न-भिन्न एवं जर्जर करके दानवोंसे बलपूर्वक इस विशाल जगत्‌का राज्य छीन लिया था।

श्रीरामने पूछा—भगवन् ! आप सब धर्मोंके ज्ञाता हैं। ब्रह्मन् ! लोकमें जो बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है, वह दैव क्या है ? किसे दैव कहते हैं, यह बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अवश्यम्भावी फलसे सुशोभित होनेवाले पुरुषार्थके द्वारा प्राप्त हुए फलका जो शुभ और अशुभ भोग है, उसीको 'दैव' शब्दसे कहा जाता है। अथवा पौरुषद्वारा इष्ट और अनिष्ट कर्मका जो प्रिय और अप्रियरूप फल प्राप्त होता है, उसीको 'दैव' नाम दिया गया है। एकमात्र पुरुषार्थसे सिद्ध होनेवाला जो अवश्यम्भावी फल है, वही इस जनसमुदायमें 'दैव' शब्दसे प्रतिपादित होता है। सिद्ध पुरुषार्थके शुभ और अशुभ फलका उदय होनेपर जो यह कहा जाता है कि 'यह इसी रूपमें मिलनेवाला था—यही होनहार थी,' इसीको 'दैव' कहते हैं। कर्मफलकी प्राप्ति होनेपर जो यह कहा जाता है कि 'ऐसी ही मेरी बुद्धि हुई थी, ऐसा ही मेरा निश्चय था,' इसीका नाम 'दैव' है। इष्ट और अनिष्ट फलके प्राप्त होनेपर जो आश्वासनमात्रके लिये यह कहा जाता है कि 'मेरा पूर्वजन्मका कर्म ही ऐसा था' इस तरहकी भावनाको व्यक्त करनेवाला वचन ही 'दैव' कहलाता है।

श्रीराम ! मनुष्योंके मनमें पहले जो अनेक प्रकारकी वासनाएँ थीं, वे ही इस समय कायिक, वाचिक, कर्म-रूपमें परिणत हुई हैं। जीवमें जिस प्रकारकी वासना होती है, वह शीघ्र वैसा ही कर्म करता है। मनमें वासना और हो और वह कर्म किसी और ही प्रकारका करे, यह सम्भव नहीं। जो गाँवमें जानेकी इच्छा रखता है, वह गाँवमें और जो नगरमें जाना चाहता है, वह नगरमें पहुँचता है। जो-जो मनुष्य जिस-जिस वासनासे युक्त होता है, वह-वह उसी-उसीके लिये सदा प्रयत्न करता है। पूर्वजन्ममें फलकी उत्कट अभिलाषा होनेसे जो कर्म प्रबल प्रयत्नके द्वारा किया जाता है, वही इस जन्ममें 'दैव' शब्दसे कहा जाता है। पूर्वजन्मके उस कर्मका पर्यायवाची शब्द 'दैव' है। कर्म करनेवालोंके सभी कर्म इसी रीतिसे होते हैं। अपनी प्रबल वासना ही कर्म है। वासना मनसे भिन्न नहीं है और मन ही पुरुष है, अर्थात् पुरुषका संकल्प होनेसे वह पुरुषरूप ही है। मन आदि भावको प्राप्त हुआ यह प्राणी ही अपने हितके लिये जो जो प्रयत्न करता है, 'दैव' नामसे प्रसिद्ध अपने उस कर्मसे ही वह तदनुरूप फल पाता है। श्रीराम ! मन, चित्त, वासना, कर्म, दैव और निश्चय—ये सब कठिनतासे समझमें आनेवाले मनकी (मनोरूपताको प्राप्त हुए पुरुषकी) संज्ञाएँ हैं, ऐसा सत्पुरुषोंका कथन है।

श्रीराम ! इस प्रकार पूर्वोक्त संज्ञाएँ धारण करनेवाला पुरुष अपनी सुदृढ़ वासनाके द्वारा प्रतिदिन जैसा प्रयत्न करता है, उसके अनुसार ही उसे पर्याप्त फल मिलता

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] ❖ श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन ❖ ७७

है । रघुनन्दन ! इस प्रकार पौरुषसे मनुष्य इस जगत्में सभी कुछ प्राप्त कर सकता है, दैवसे नहीं । अतः वह पुरुषार्थ तुम्हारे लिये शुभफल देनेवाला हो । तुम अपने प्रयत्नसे प्राप्त परम पुरुषार्थद्वारा ही सदा बने रहनेवाले परम कल्याणको प्राप्त होओगे, अन्यथा नहीं । श्रुतिमें जो चैतन्यमात्रस्वरूप प्राज्ञ पुरुष बताया गया है, वही तुम हो, जड शरीर नहीं हो । तुम स्वयंप्रकाशरूप चेतन हो । अन्य चेतनसे प्रकाशित होनेकी योग्यता तुममें कहाँ है ? यदि तुम्हें दूसरा कोई चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा मान लिया जाय तो फिर उसे दूसरा कौन प्रकाशित करता है, यह प्रश्न खड़ा हो जायगा । यदि उसका भी कोई अन्य चेतन प्रकाशक हो तो फिर इसको कौन प्रकाशित करेगा ? इस प्रकार अनवस्था-दोष प्राप्त होता है, जो वस्तुका साधक नहीं है । इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह शुभ और अशुभ मार्गोंसे बहती हुई वासनारूपिणी नदीको पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा अशुभ मार्गसे हटाकर शुभ मार्गमें ही लगाये ।

मनुष्यका चित्त शिशुके समान चञ्चल होता है, उसे अशुभ मार्ग ( पाप ) से हटा दिया जाय तो शुभ मार्ग ( पुण्य ) में जाता है और यदि शुभ मार्गसे हटाया जाय तो अशुभ मार्गमें चला जाता है । इसलिये उसे यत्नपूर्वक पापमार्गसे हटाकर पुण्यके मार्गमें लगाना चाहिये । इस प्रकार मनुष्यके लिये उचित है कि वह पूर्वोक्त क्रमसे चित्तरूपी बालकको शीघ्र ही समतारूप सान्त्वना देकर पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा धीरे-धीरे आत्मस्वरूपमें लगाये, हठपूर्वक एकाएक उसका निरोध न करे । यही उसका लालन-पालन है । लोकमें मनुष्य जिस-जिस विषयका अभ्यास करता है, निस्संदेह उसीमें तन्मय हो जाता है । यह बात बालकोंसे लेकर बड़े बड़े विद्वानोंतकमें देखी गयी है । अतः श्रीराम ! तुम परम कल्याणकी प्राप्तिके लिये उत्तम पुरुषार्थका आश्रय ले पाँचों इन्द्रियोंको जीतकर यहाँ शुभ वासनासे युक्त हो जाओ । तुम श्रेष्ठतम पुरुषोंद्वारा सेवित और अत्यन्त सुन्दर शुभ वासनाका अनुसरण करके मनोरम भावयुक्त बुद्धिसे परम पुरुषार्थद्वारा सदा शोकरहित पदको प्राप्त करो । तत्पश्चात् उस शुभ वासनाका भी परित्याग करके परब्रह्म परमात्मामें भलीभाँति स्थित हो जाओ ।

( सर्ग ८-९ )


श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन, ज्ञानप्राप्तिका विस्तार, श्रीरामजीके वैराग्यकी प्रशंसा, वक्ता और प्रश्नकर्ताके लक्षण आदिका विशेषरूपसे वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जो सर्वत्र नित्य समतारूपसे स्थित सच्चिदानन्दमय ब्रह्मतत्त्व है, उससे सम्बन्ध रखनेवाली सत्ताको नियति कहते हैं । वही नियन्ताकी नियन्त्रण-शक्ति है तथा नियन्त्रणमें रहनेवाले पदार्थोंमें जो नियन्त्रित होनेकी योग्यता है, वह भी सत्ता ही है । अब मैं उस सारगर्भित संहिताका वर्णन करूँगा, जो इहलोक तथा परलोककी सिद्धिके लिये परमपुरुषार्थ-रूप फल प्रदान करनेवाली और मोक्षके उपायभूत साधनोंसे सम्पन्न है । उसे तुम सावधानतया श्रवण करो ।

प्राचीन कालकी बात है—सृष्टिके आदिमें परमेष्ठी ब्रह्माने इस मोक्षकथाका वर्णन किया था । यह सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली है और बुद्धिको परम शान्ति प्रदान करती है । सारे विवेकशील पुरुषोंके साथ इस मोक्षकथाको सुनकर तुम उस दुःखरहित सच्चिदानन्दमय परमपदको प्राप्त कर लोगे, जहाँ पहुँच जानेपर पुनः विनाशका भय नहीं रह जाता ।

श्रीरामने पूछा—ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने किस लिये इस कथाका वर्णन किया था ? और आपको इसकी प्राप्ति कैसे हुई ? प्रभो ! यह वृत्तान्त मुझे बताइये ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! परब्रह्म परमात्मा

७८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सर्वव्यापक, सबका आश्रय-स्थान, नित्य चेतन, अविनाशी, समस्त प्राणियोंमें प्रकाशकरूपसे वर्तमान और अनन्त विलासोंका एकमात्र अधिष्ठान है। प्रकृतिक़ी साम्यावस्था तथा विषमावस्थामें भी वह निर्विकाररूपसे स्थित रहता है। उसी परमात्मासे विष्णुका प्राकट्य हुआ, ठीक उसी तरह जैसे प्रवहणशील जलसे परिपूर्ण सागरसे तरङ्ग उत्पन्न होती है। उन विष्णुके हृदयकमलसे ब्रह्मा प्रकट हुए, जो वेद तथा वेदार्थके तत्त्वज्ञ हैं। उन्होंने देवताओं और मुनियोंके समुदायोंसे संयुक्त होकर अनेकविध विकल्पोंकी सृष्टि करनेवाले मनकी भाँति विभिन्न प्रकारकी सृष्टि-रचना की। जम्बूद्वीपके इस भागमें, जो भारतवर्ष नामसे प्रसिद्ध है, ब्रह्माजीद्वारा रचित सारा प्राणिसमुदाय आधि-व्याधिसे संयुक्त, लाभ-हानिसे पीड़ित और जन्म मरणशील था। प्राणियोंकी इस सृष्टिमें सारे जनसमुदायको नाना प्रकारके व्यसनजन्य कष्टोंसे पीड़ित देख सर्वलोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माका हृदय उसी प्रकार दयार्द्र हो गया, जैसे पुत्रको दुखी देखकर पिताको दया आ जाती है। फिर तो वे उनके कल्याणके लिये क्षणभर एकाग्रचित्त हो यों विचार करने लगे कि इन हताश तथा अल्पायु जीवोंके दुःखका अन्त किस प्रकार होगा ऐसा विचारकर सामर्थ्यशाली स्वयं भगवान् ब्रह्माने उनके कष्टपहरणके लिये तप, धर्म, दान, सत्य और तीर्थ-सेवन आदि साधनोंका निर्माण किया। इन्हें उत्पन्न करके सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माने पुनः स्वयं विचार किया कि इन साधनोंसे लोगोंके सांसारिक दुःखका समूल विनाश नहीं हो सकता; बल्कि परम निर्वाणरूप मोक्ष ही परम सुख है, जिसकी प्राप्ति हो जानेपर जीव जन्म-मृत्युके चक्रसे छूट जाता है। उस मोक्षकी प्राप्ति ज्ञानसे ही होती है। इसलिये जीवके लिये संसार-सागरसे पार होनेका एकमात्र उपाय ज्ञान ही है। तप, दान और तीर्थसेवन आदि भव-तरणके लिये सीधे उपाय नहीं कहे गये हैं। अतः मैं इस हताश जनसमुदायके दुःखकी निवृत्तिके लिये संसारसे उद्धार पानेका एक नूतन उपाय शीघ्र ही प्रकट करूँगा।

यों विचारकर कमलपर विराजमान भगवान् ब्रह्माने अपने मानसिक संकल्पद्वारा तुम्हारे सामने बैठे हुए मुझको उत्पन्न किया। निष्पाप श्रीराम ! जैसे एक तरङ्गसे शीघ्र ही दूसरी तरङ्ग प्रकट हो जाती है, उसी प्रकार मैं भी अनिर्वचनीय मायासे उत्पन्न हुआ और फिर तुरंत ही अपने उन पितृदेवके समीप जा पहुँचा, जिनके हाथमें कमण्डलु और रुद्राक्षकी माला शोभा पा रही थी। मैंने नम्रतापूर्वक उनको प्रणाम किया। उस समय मैं भी कमण्डलु और रुद्राक्षकी मालासे संयुक्त था। तब 'बेटा! यहाँ आओ' मुझसे यों कहकर उन्होंने अपने आसनभूत कमलके ऊपरी पत्तेपर श्वेत बादलपर बैठे हुए चन्द्रमाकी भाँति मुझे अपने हाथसे पकड़कर बैठा लिया। फिर मृगचर्म ही जिसका परिधान था, ऐसे मुझसे मृगचर्मधारी मेरे पितृदेव ब्रह्माजीने कहा—'बेटा ! जैसे चन्द्रमामें कलङ्क प्रविष्ट होता है, उसी प्रकार वानरके समान

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन * ७९


चञ्चल अज्ञान दो घड़ीके लिये तुम्हारे चित्तमें प्रवेश करे।'

यों पिताद्वारा अभिशप्त हुआ मैं उनके संकल्पके अनन्तर अपने सम्पूर्ण शुद्ध स्वरूपको भूल गया। फिर तो मेरी बुद्धि तत्त्वज्ञानसे रहित हो गयी और मैं दुःख-शोकसे संतप्त हो दीनताको प्राप्त हो गया। उस समय मैं 'हाय ! बड़े कष्टकी बात हुई। यह संसार नामक दोष मुझे कहाँसे प्राप्त हो गया ?' यों हृदयमें विचार करके चुपचाप बैठा रहता था। मेरी यह दशा देखकर मेरे पिताजीने मुझसे कहा—'बेटा ! तुम क्यों दुखी हो रहे हो ? अपने इस दुःखके नाशका उपाय मुझसे पूछो। उसे जानकर तुम नित्य परमात्माको प्राप्त हो जाओगे।' तब मैंने उनसे पूछा—'नाथ ! यह महान् दुःखमय संसार मुझ प्राणीको कहाँसे प्राप्त हो गया ? और इसका विनाश किस प्रकार होता है ?' मेरे यों प्रश्न करनेपर उन्होंने मुझे ऐसे प्रचुर ज्ञानका उपदेश दिया, जिस परम पावन ज्ञानको प्राप्तकर मैं पिताजीके अभिप्रायके अनुरूप अधिक ज्ञानसम्पन्न हो गया। इस प्रकार जब मुझे ज्ञातव्य तत्त्वकी जानकारी हो गयी और मैं अपनी प्रकृतिमें स्थित हो गया, तब जगत्-स्रष्टा तथा सबकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप और उपदेष्टा ब्रह्माजीने मुझसे कहा—'पुत्र ! मैंने प्रथमतः तुम्हें शापद्वारा ज्ञान-हीन करके पुनः समस्त अधिकारी जनोंकी ज्ञान-सिद्धिके लिये इस सारभूत ज्ञानका पिपासु बनाया है। अब तुम्हारा शाप शान्त हो गया है और तुम्हें परमोत्कृष्ट ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है, जिससे तुम मेरे ही सदृश अद्वितीय आत्मस्वरूप हो गये हो। साधो ! अब तुम प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये भूलोकमें जम्बूद्वीपके मध्यभागमें स्थित भारतवर्षमें जाओ। परोपकारनिष्ठ पुत्र ! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो; अतः वहाँ जो लोग कर्मकाण्ड-परायण हों, उन्हें कर्मकाण्डके क्रमसे शिक्षा देना और जो लोग विवेकशील, विरक्तचित्त तथा महाबुद्धिमान् हों, उन्हें परमानन्ददायक ज्ञानका उपदेश करना।'

रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार मैं अपने पिता ब्रह्माजीद्वारा नियुक्त होकर इस लोकमें निवास कर रहा हूँ और जबतक यह सृष्टिपरम्परा रहेगी, तबतक यहाँ रहूँगा। जिस प्रकार भगवान् ब्रह्माने मुझे यहाँ आनेका आदेश दिया, उसी प्रकार उन्होंने सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार तथा नारद आदि अन्यान्य बहुत-से महर्षियोंको भी यह कहकर प्रेरित किया कि तुमलोग भारतवर्षमें जाकर पवित्र कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्डके उपदेशद्वारा वहाँके निवासियोंका, जो अन्तःकरणके अज्ञानरूपी रोगके वशीभूत होकर महान् कष्ट भोग रहे हैं, उद्धार करो।

प्राचीन कालमें सत्ययुगके समाप्त होनेपर जब भूतलपर कालक्रमसे पवित्र कर्मकाण्डका ह्रास हो गया, तब उन महर्षियोंने कर्मकाण्डकी स्थापना तथा मर्यादाकी रक्षाके लिये पृथक्-पृथक् देशोंका विभाजन किया और उन देशोंपर भूपालोंकी स्थापना की। तदनन्तर उन्होंने भूतलपर धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये उन-उन कर्मोंके

९—संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता, ज्ञानका उत्तम माहात्म्य, श्रीराममें प्रश्नकर्ताके गुणोंकी अधिकताका वर्णन, जीवन्मुक्तिरूप फलके हेतुभूत वैराग्य आदि गुणोंका तथा शमका विशेषरूपसे निरूपण

८० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

उपयुक्त बहुत-से स्मृति-ग्रन्थों तथा यज्ञविधायक शास्त्रोंका निर्माण किया। तत्पश्चात् इस कालचक्रके चलते रहनेपर जब उस क्रमका विनाश हो गया तथा लोग प्रतिदिन भोजनमात्रपरायण और खाद्य पदार्थोंके उपार्जनमें तत्पर हो गये, तब हमलोगों ने उनकी दीनताका विनाश करने तथा लोकमें आत्मतत्त्वज्ञानके प्रचारके लिये बड़े-बड़े ज्ञानोत्पादक शास्त्रोंका उपदेश किया। यह अध्यात्मविद्या प्रथमतः राजसमाजमें उपदिष्ट हुई। तदनन्तर इसका प्रसार लोकमें हुआ। इसी कारण इसे 'राजविद्या' कहा गया है। रघुनन्दन ! राजविद्या एवं राजगुह्य नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, उस उत्तम अध्यात्मज्ञानको पाकर राजालोग दुःखरहित हो परमानन्दको प्राप्त हो गये। श्रीराम ! कालक्रमानुसार निर्मल कीर्तिवाले बहुसंख्यक राजाओंके स्वर्गवासी हो जानेपर इस समय तुम इस भूतलपर इन महाराज दशरथके यहाँ प्रकट हुए हो। शत्रुओंका मर्दन करनेवाले राम ! तुम्हारा मन अत्यन्त निर्मल है, इसीलिये किसी निमित्तके बिना स्वाभाविक ही तुम्हारे मनमें यह परम पावन तथा उत्तम वैराग्य जाग उठा है; क्योंकि समस्त विवेकशील पुरुषोंमें जिसकी ख्याति है, उस श्रेष्ठ पुरुषका भी वैराग्य किसी निमित्तको लेकर होता है, इसलिये वह राजस कहलाता है, परंतु तुम्हारे मनमें उत्पन्न हुआ यह वैराग्य अपूर्व है। यह किसी निमित्तकी अपेक्षा न रखकर स्वतः अपने विवेकसे उत्पन्न हुआ है और सत्पुरुषोंको आश्चर्यमें डालनेवाला है, अतः सात्त्विक है। जिन्हें निमित्तके बिना ही वैराग्य हो जाता है, वे ही महापुरुष तथा ज्ञानवान् हैं और उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध है।* जो लोग ज्ञानद्वारा इस सृष्टिपरम्पराका विचार करके वैराग्यको प्राप्त होते हैं, वे ही उत्तम पुरुष हैं।

श्रीराम ! जो लोग इस संसारकी असारता एवं दुःखरूपताको देखकर अपनी सांसारिक बुद्धिका परित्याग कर देते हैं, वे साँकलसे छूटे हुए गजराजोंकी भाँति संसार-बन्धनसे मुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। यह जगत्-परम्परा विभ्रम और अनन्त है। इसमें पड़ा हुआ महान् जीव देहाध्याससे युक्त रहता है, अतएव ज्ञानके बिना उसे परमपदकी प्राप्तिका मार्ग नहीं सूझता। परंतु रघुनन्दन ! जिनकी बुद्धि अगाध है—ऐसे विवेकशील पुरुष इस दुस्तर भवसागरको ज्ञानरूपी नौकाद्वारा क्षणमात्रमें ही पार कर जाते हैं। संसार-सागरसे उबारनेवाले उस ज्ञानरूप उपायको तुम अपनी बुद्धिसे, जो नित्य विवेक-वैराग्य आदिसे समन्वित है, एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो; क्योंकि इस निर्दोष ज्ञानयुक्तिके बिना अनन्त विक्षेपोंसे परिपूर्ण ये सांसारिक दुःख और भय चिरकालतक हृदयको संतप्त करते रहते हैं। राघव ! श्रेष्ठ पुरुषोंमें शीत, उष्ण, वात आदि द्वन्द्वजनित दुःखोंको सहन करनेकी क्षमता ज्ञानके बलपर ही आती है, अन्यथा ज्ञानयुक्तिके अतिरिक्त वे किसी प्रकार सह्य नहीं हो सकते। दुःखकी चिन्ताएँ अज्ञानी मनुष्यको पद-पदपर आ घेरती हैं और समयानुसार उसे उसी प्रकार संतप्त करती रहती हैं, जैसे अग्निकी लपटें तृणको जलाकर भस्म कर डालती हैं; परंतु जिस प्रकार वर्षाके जलसे अभिषिक्त हुए वनपर उन अग्नि-ज्वालाओंका प्रभाव नहीं पड़ता, उसी तरह जिसे जाननेयोग्य अध्यात्मशास्त्रका ज्ञान प्राप्त हो गया है तथा जिसने भलीभाँति ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे ज्ञानी पुरुषको मानसिक व्यथाएँ संताप नहीं पहुँचा सकतीं। इस संसाररूपी मरुस्थलमें बहनेवाली वायु शारीरिक तथा मानसिक कष्टरूपी आवर्तोंसे परिपूर्ण है। यह क्षुब्ध होकर भी तत्त्वज्ञानीको वैसे ही पीड़ित नहीं कर सकती, जैसे प्रचण्ड आँधी कल्पवृक्षका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह तत्त्वज्ञानकी


* ते महान्तो महाप्राज्ञा निमित्तेन विनैव हि।
वैराग्यं जायते येषां तेषां ह्यमलमानसस्॥
(मुमुक्षु० ११। २४)

[ मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन * ८१


प्राप्तिके लिये, जो श्रुति आदिका प्रमाण देनेमें कुशल और आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञाता हो, ऐसे ज्ञानी पुरुषके पास जाकर प्रयत्नपूर्वक विनयभावसे प्रश्न करे। फिर जैसे केसरसे रँगा हुआ वस्त्र उसके रंगको पकड़ लेता है, उसी प्रकार जिससे प्रश्न किया गया है, उस प्रमाणकुशल तथा विशुद्ध चित्तवाले उपदेष्टाके वचनको प्रयत्नपूर्वक ग्रहण करना चाहिये। किंतु वाग्वक्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! जो तत्त्वका ज्ञाता नहीं है, अतएव जिसके वचन अग्राह्य हैं, ऐसे पुरुषसे जो तत्त्वविषयक प्रश्न करता है, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कोई नहीं है। इसी प्रकार जिससे पूछा गया है, उस प्रमाणकुशल तथा तत्त्वज्ञानी वक्ताके उपदेशका जो पुरुष यत्नपूर्वक अनुसरण नहीं करता, उससे बढ़कर दूसरा कोई नराधम नहीं है। अतः वक्ताके व्यवहार आदि कार्योंसे उसकी अज्ञता तथा तत्त्वज्ञताका पहले निर्णय करके जो पुरुष उससे प्रश्न करता है, वह प्रश्नकर्ता उत्कृष्ट बुद्धिवाला माना जाता है; परंतु जो मूर्ख जिज्ञासु उत्तम वक्ताका निर्णय किये बिना ही उससे प्रश्न करता है, वह अधम कहलाता है और उसे तत्त्वज्ञानरूप महान् अर्थकी प्राप्ति भी नहीं होती। ज्ञानीको भी चाहिये कि पूर्वापरका विवेचन करके उसका निश्चय करनेमें जिसकी बुद्धि समर्थ हो और जो निन्दनीय न हो, ऐसे पुरुषको उसके पूछे हुए तत्त्वका उपदेश दे; परंतु जो आहार-निद्रा-भय-मैथुन आदि पशुधर्मसे संयुक्त है, ऐसे अधमको तत्त्वका उपदेश न दे। क्योंकि प्रश्नकर्ताकी श्रुति आदि प्रमाणोंद्वारा निर्णीत पदार्थके ग्रहणकी योग्यताका विचार किये बिना ही जो वक्ता उसे उपदेश देता है, उस पुरुषको ज्ञानीजन इस लोकमें महान् मूर्ख बतलाते हैं। रघुनन्दन ! तुम प्रशंसनीय गुणोंसे युक्त अत्यन्त श्रेष्ठ प्रश्नकर्ता हो और मैं उपदेश देना जानता हूँ, अतः हम दोनोंका यह समागम उचित ही है। शब्दार्थके ज्ञाता राम ! जनसमाजमें तुम महापुरुष माने जाते हो। तुममें रागका लेशमात्र भी नहीं है। तुम तत्त्वके ज्ञाता हो। इसलिये तुम्हारे प्रति किया हुआ उपदेश तुम्हारे अन्तर्हृदयमें चिपक जाता है, ठीक उसी तरह जैसे घोला हुआ रंग वस्त्रमें लग जाता है। तुम्हारी तीक्ष्ण बुद्धि उक्त पदार्थके ग्रहण करनेमें निपुण और परमार्थका विवेचन करनेवाली है। वह परमार्थ-विषयमें उसी प्रकार प्रवेश करती है, जैसे सूर्यकी किरणें जलके भीतर घुस जाती हैं। इसलिये मैं जिस पदार्थका उपदेश करूँ, उसे तुम 'यह तत्त्व-वस्तु है' यों निश्चय करके यत्नपूर्वक अपने हृदयमें पूर्णतया धारण कर लो।

मनुष्यको चाहिये कि वह विवेकहीन, अज्ञानी और दुर्जनोंसे प्रेम करनेवाले मनुष्यका दूरसे ही परित्याग करके साधु-महात्माओंकी सेवा करे; क्योंकि सदा सज्जनोंके सम्पर्कमें रहनेसे विवेककी उत्पत्ति होती है। यह विवेक एक वृक्षके समान है और भोग तथा मोक्ष उसके फल कहे गये हैं। उस मोक्षके द्वारपर निवास करनेवाले चार द्वारपाल बतलाये जाते हैं जिनके नाम हैं—शम, विचार, संतोष और चौथा साधुसंगम। मनुष्यको इन चारोंका ही प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये; क्योंकि इनका भलीभाँति सेवन होनेपर ये मोक्षरूपी राजमहलके द्वारको खोल देते हैं। यदि चारोंका सेवन न हो सके तो तीनका या दोका सेवन अवश्य करना चाहिये। दोका भी सेवन न हो सके तो सभी उपायोंद्वारा प्राणोंकी बाजी लगाकर भी एकका आश्रय तो अवश्य ही ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि जब एक वशमें आ जाता है, तब शेष तीनों भी अधीन हो जाते हैं।* विवेकी पुरुष तप, दान और


* मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारः परिकीर्तिताः ।
शमो विचारः सन्तोषश्चतुर्थः साधुसङ्गमः ॥
एते सेव्याः प्रयत्नेन चत्वारो द्वौ त्रयोऽथवा ।
द्वारमुद्घाटयन्त्येते मोक्षराजगृहे यथा ॥

८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ


शास्त्रके श्रवण-मनन आदिका उत्तम पात्र होता है। जैसे तेजस्वियोंमें सूर्य सर्वश्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार वह लोगोंमें आभूषणके समान आदरणीय होता है। जैसे शीतकी अधिकताके कारण जल जमकर पत्थरके सदृश हो जाता है, उसी प्रकार अविवेकियोंकी बुद्धि मन्दता—घनताको प्राप्त होकर अत्यन्त जड हो जाती है। रघुकुलभूषण राम ! तुम्हारा अन्तःकरण तो सूर्योदय होनेपर खिले हुए कमलकी भाँति सौजन्य आदि गुण एवं शास्त्रार्थकी दृष्टियोंसे विकसित हो गया है। मनुष्यको उचित है कि वह पहले आवागमनके चक्रसे छूटनेके लिये शास्त्राभ्यास और सत्संगतिपूर्वक तपस्या एवं इन्द्रियनिग्रहद्वारा अपनी बुद्धिका ही संवर्द्धन करे। यह संसार विषवृक्षके समान है। यह विपत्तियोंका एकमात्र स्थान है, जो अज्ञानी मनुष्यको सदा मोहित करता रहता है; इसलिये यत्नद्वारा अज्ञानका विनाश कर डालना ही उचित है। * जैसे मेघरहित आकाशमें निर्मल एवं पूर्ण मण्डलवाले चन्द्रमाको देखकर दृष्टि प्रसन्न होती है, उसी प्रकार यह पूर्वोक्त परमार्थ वस्तुदृष्टि ज्ञानीमें यथार्थ वस्तुके साथ एकरसताको प्राप्त होकर प्रसन्न हो जाती है। जिसकी बुद्धि पूर्वापरके विचारसे सूक्ष्मतम अर्थको ग्रहण करनेमें निपुण और चतुरतासे शोभित होकर पूर्ण विकसित हो गयी है, वही 'पुमान्' अर्थात् पुरुष कहा जाता है। श्रीराम ! तुम्हारा हृदय अज्ञानसे रहित अतएव विशुद्ध शान्ति आदि गुणोंसे विकसित एवं उत्तम विचारकी शीतल चाँदनीसे प्रकाशित है। उस हृदयसे युक्त होकर तुम उसी प्रकार सुशोभित हो रहे हो, जैसे निर्मल चन्द्रमासे आकाशकी शोभा होती है।

(सर्ग १०-११)


संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता, ज्ञानका उत्तम माहात्म्य, श्रीराममें प्रश्नकर्ताके गुणोंकी अधिकताका वर्णन, जीवन्मुक्तिरूप फलके हेतुभूत वैराग्य आदि गुणोंका तथा शमका विशेषरूपसे निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तुम्हारा मन उत्तम गुणोंसे परिपूर्ण है। तुम हमारे योग्य शिष्य हो और प्रश्न करनेका ढंग भी तुम्हें भलीभाँति ज्ञात है। तुम कही हुई बातको विशेषरूपसे समझ लेते हो, इसीलिये मैं आदरपूर्वक तुम्हें उपदेश देनेको उद्यत हुआ हूँ। अब तुम अपनी बुद्धिको, जो रजोगुण और तमोगुणसे रहित और शुद्ध सत्त्वगुणका अनुसरण करनेवाली है, आत्मामें स्थापित करके ज्ञानोपदेश श्रवण करनेके लिये तैयार हो जाओ। प्रश्नकर्तामें जितने गुण होने चाहिये, वे सभी गुण तुममें वर्तमान हैं और जैसे समुद्रमें रत्न आदि सम्पत्तियाँ भरी रहती हैं, उसी तरह वक्ताके सभी गुण मुझमें विद्यमान हैं। वत्स ! जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके सम्पर्कसे चन्द्रकान्तमणिमें आर्द्रता आ जाती है, उसी तरह तुम भी ज्ञानके संसर्गसे उत्पन्न हुए वैराग्यको प्राप्त हुए हो। तुम तो सर्वथा शुद्ध हो। तुम्हारा बाल्यावस्थासे ही शुद्ध, विस्तृत तथा अविच्छिन्न सद्गुणोंके साथ सम्बन्ध चला आ रहा है—ठीक उसी तरह जैसे कमलका अपने विस्तारवाले, निर्मल एवं दीर्घ तन्तुओंसे लगाव रहता है। इसलिये तुम्हीं इस कथाको सुननेके योग्य अधिकारी हो। अब मैं इस मोक्षकथाका वर्णन करूँगा, तुम सावधान होकर इसे सुनो। यह कथा उस परमपदसे सम्बन्ध रखनेवाली है, जिसका साक्षात्कार हो जानेपर जितने लौकिक कार्य तथा जितनी लौकिक दृष्टियाँ हैं, वे सब-के-सब पूर्णतया शान्त हो जाते हैं।


एकं वा संप्रयत्नेन प्राणांस्त्यक्त्वा समाश्रयेत् । एकस्मिन् वशगे यान्ति चत्वारोऽपि वशं यतः ॥
(मुमुक्षु० ११। ५९-६१)

* संसारविषवृक्षोऽयमेकमास्पदमपदाम् । अज्ञं सम्मोहयेन्नित्यं मौर्य्ये यत्नेन नाशयेत् ॥
(मुमुक्षु० ११। ६९)

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] ४ संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता तथा ज्ञानका उत्तम माहात्म्य * ८३

श्रीराम ! संसाररूपी विषके आवेशसे उत्पन्न हुई विषूचिका बड़ी दुस्सह होती है। विषनिवारक गारुडमन्त्रसे ही उसका समूल नाश होता है। जीव और ब्रह्मका एकात्मबोध ही वह गारुडमन्त्र है। वही परमार्थज्ञानका भी मूलमन्त्र है। सत्पुरुषोंके साथ शास्त्रानुशीलन करनेसे निःसन्देह उस योगकी प्राप्ति होती है।

शास्त्रचिन्तन करनेपर इसी जन्ममें अवश्य ही सम्पूर्ण दुःखोंका समूल विनाश होता है—ऐसा मानना चाहिये; इसलिये उन विवेकशील सत्पुरुषोंको अवहेलनाकी दृष्टिसे नहीं देखना चाहिये। जिस विवेकी पुरुषको सम्यग्दृष्टिकी उपलब्धि हो चुकी है, वह पुरानी केंचुलका त्याग करके संतापरहित हुए सर्पकी भाँति मानसिक व्यथाओंसे परिपूर्ण इस संसारके अनुरागका परित्याग करके संतापरहित हो जाता है। उसका अन्तःकरण शीतल हो जाता है। वह सम्पूर्ण जगत्को विनोदपूर्वक इन्द्रजालकी तरह सुखरूप देखता है; परन्तु जो उस सम्यग्दृष्टिसे रहित है, उसके लिये यह संसार परम दुःखदायी ही है। यह संसारानुराग बड़ा ही कष्टदायक है। यह अनर्थकी आशङ्का किये बिना ही मोहवश विषयोंमें फँसे हुए पुरुषोंको सर्पकी तरह डँस लेता है, खड्गकी भाँति काट डालता है, भालेके समान बेध देता है, रस्सीकी तरह आवेष्टित कर लेता है, आगके सदृश जला देता है, रात्रिकी तरह अंधा बना देता है, सिरपर गिरे हुए पत्थरके समान मूर्च्छित कर देता है, विचार-शक्तिको हर लेता है, मर्यादाका विनाश कर देता है और मोहरूपी अन्धकूपमें गिरा देता है। तृष्णा तुम्हें जर्जर कर देती है। अधिक क्या, संसारमें ऐसा कोई दुःख नहीं है जो संसारी मनुष्यको तृष्णासे न प्राप्त होता हो। यह विषयमोहरूपिणी विषूचिका दुष्परिणामवाली है। यह नरक-नगररूप शरीर-समुदायके साथ अनुराग उत्पन्न करनेवाली है। यदि इसकी चिकित्सा न की जाय तो यह अवश्य ही उन-उन हजारों नारकीय दुर्गत्तियोंको प्राप्ति कराती है, जहाँ नरकोंमें पाषाणभक्षण, खड्गद्वारा अङ्गोंका छेदन, पर्वतशिखरसे निपातन, पत्थरद्वारा घट्टन और अग्निदाहको हिमाभिषेककी भाँति, अङ्गोंके झुलसनेको चन्दनके लेपकी तरह, असिपत्रवाले वृक्षोंके वनमें दौड़ने, कीड़ोंके द्वारा शरीरमें छिद्र किये जाने और लोहेकी गरम जंजीरोंद्वारा देहके लपेटनेको शरीर-रक्षाके समान, युद्धमें काम आनेवाले अग्नि-बुझे बाणोंकी धारावाहिक वृष्टिको ग्रीष्मऋतुमें विनोदके लिये किये गये जलयन्त्रोंके फुब्बारोंकी बूँद-वर्षाके सदृश, सिरके काटे जानेको सुखनिद्राके तुल्य, मुख बंद करके बलपूर्वक किये गये मूकीभावको स्वाभाविक मुखमुद्राके समान और अकिञ्चित्करताको महती सम्पद्वृद्धिकी तरह सहन करना पड़ता है। राघव ! इस प्रकार सहस्रों कष्टप्रद चेष्टाओंसे परिपूर्ण इस दारुण संसारचक्रमें उपर्युक्त उपदेशकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; बल्कि ऐसा विचार और निश्चय अवश्य करना चाहिये कि शास्त्रानुशीलनसे निश्चय ही कल्याण होता है। सत्पुरुषोंके साथ शास्त्रचिन्तन करनेसे जिसका देहाभिमान नष्ट हो गया है, उसे तत्त्वका ज्ञान हो जानेसे सर्वव्यापक आत्माका स्वरूप विदित हो जाता है। वह शुद्ध बुद्धिद्वारा परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है और अज्ञानरूपी घने बादलके विलीन हो जानेपर उसके मोहका विनाश हो जाता है। फिर तो उसके लिये यह जगत्में विचरण करना रमणीय हो जाता है।

श्रीराम ! जिन्हें आत्मस्वरूपका ज्ञान हो गया है, ऐसे उत्तम बुद्धिसम्पन्न महापुरुष इस पूर्वोक्त दृष्टिका अवलम्बन करके इस संसारमें विचरते हैं। उन्हें न शोक होता है, न कामना होती है और न वे शुभाशुभकी याचना ही करते हैं। वे इस संसारमें सब कुछ करते हुए भी अकर्त्ताके समान रहते हैं। वे हेय और उपादेयके पक्षपातसे रहित होकर अपने आत्मामें स्थित रहते हैं, पवित्रतासे रहते हैं और सत्-शास्त्रोंमें प्रतिपादित स्वच्छ कर्म करते हुए सन्मार्गपर चलते हैं। अन्य लोगोंकी दृष्टिसे वे सोते हैं,