संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
विवाहप्रकरणम् १४५ से सिद्ध कर सकते हैं॥४॥ हे मनुष्यो ! यदि तुम पूर्ण ब्रह्मचर्य से सुशिक्षित विद्यायुक्त अपने सन्तानों को कराके स्वयंवर विवाह कराओ तो वे (वन्द्येभिः) कामना के योग्य (चितयद्भिः) सब सत्य विद्याओं को जाननेवाले, (अर्कैः) सत्कार के योग्य, (शूषैः) शरीरात्म- बलों से युक्त होके (वः) तुम्हारे लिए (एषे) सब सुख प्राप्त कराने को समर्थ होवें और वे (उषासानक्ता) जैसे दिन और रात तथा जैसे (विदुषीव) विदुषी स्त्री और विद्वान् पुरुष (विश्वम्) गृहाश्रम के सम्पूर्ण व्यवहार को (आवहतः) सब ओर से प्राप्त होते हैं, (ह) वैसे ही इस (यज्ञम्) संगतरूप गृहाश्रम के व्यवहार को वे स्त्री-पुरुष पूर्ण कर सकते हैं और (मर्त्याय) मनुष्यों के लिए यही पूर्वोक्त विवाह पूर्ण सुखदायक है और (यह्वी) बड़े ही शुभ गुण-कर्म-स्वभाववाले स्त्री-पुरुष दोनों (दिवः) कामनाओं को (उप प्र वहतः) अच्छे प्रकार प्राप्त हो सकते हैं, अन्य नहीं॥५॥ जैसे ब्रह्मचर्य में कन्या का ब्रह्मचर्य वेदोक्त है, वैसे ही सब पुरुषों को ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़, पूर्ण जवान हो, परस्पर परीक्षा करके, जिससे जिसकी विवाह करने में पूर्ण प्रीति हो, उसी से उसका विवाह होना अत्युत्तम है। जो कोई युवास्था में विवाह न कराके बाल्यावस्था में अनिच्छित, अयोग्य वर- कन्या का विवाह करावेंगे, वे वेदोक्त ईश्वराज्ञा के विरोधी होकर महादुःखसागर में क्योंकर न डूबेंगे? और जो पूर्वोक्त विधि से विवाह करते-कराते हैं, वे ईश्वराज्ञा के अनुकूल होने से पूर्ण सुख को प्राप्त होते हैं। प्रश्न—विवाह अपने-अपने वर्ण में होना चाहिए, वा अन्य वर्ण में भी? उत्तर—अपने-अपने वर्ण में, परन्तु वर्णव्यवस्था गुणकर्मों के अनुसार होनी चाहिए, जन्ममात्र से नहीं।
१४६ संस्कारविधिः जो पूर्ण विद्वान्, धर्मात्मा, परोपकारी, जितेन्द्रिय, मिथ्या- भाषणादि दोषरहित, विद्या और धर्म-प्रचार में तत्पर रहे—इत्यादि उत्तम गुण जिसमें हों, वह ब्राह्मण-ब्राह्मणी। विद्या, बल, शौर्य, न्यायकारित्वादि गुण जिसमें हों, वह क्षत्रिय-क्षत्रिया और विद्वान् होके कृषि, पशु-पालन, व्यापार, देशभाषाओं में चतुरतादि गुण जिसमें हों, वह वैश्य-वैश्या और जो विद्याहीन मूर्ख हो, वह शूद्र-शूद्रा कहावे। इसी क्रम से विवाह होना चाहिए, अर्थात् ब्राह्मण का ब्राह्मणी, क्षत्रिय का क्षत्रिया, वैश्य का वैश्या और शूद्र का शूद्रा के साथ ही विवाह होने में आनन्द होता है, अन्यथा नहीं। इस वर्णव्यवस्था में प्रमाण— धर्मचर्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ ॥ १ ॥ अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ ॥ २ ॥ —आपस्तम्बे ॥ शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्। क्षत्रियाज्जातमेवन्तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ ३ ॥ —मनुस्मृतौ ॥ अर्थः—धर्माचरण से नीच वर्ण उत्तम-उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है और उस वर्ण में जो-जो कर्तव्य-अधिकाररूप कर्म हैं, वे सब गुण-कर्म उस पुरुष और स्त्री को प्राप्त होवें ॥ १ ॥ वैसे ही अधर्माचरण से उत्तम-उत्तम वर्ण नीचे-नीचे के वर्ण को प्राप्त होवें और वे ही उस-उस वर्ण के अधिकार और कर्मों के कर्त्ता होवें ॥ २ ॥ उत्तम गुण-कर्म-स्वभाव से जो शूद्र है, वह वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य क्षत्रिय, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय ब्राह्मण वर्ण के अधिकार और कर्मों को प्राप्त होता है। वैसे ही नीच कर्म और गुणों से जो ब्राह्मण है, वह क्षत्रिय, वैश्य,
विवाहप्रकरणम् १४७ शूद्र और क्षत्रिय वैश्य, शूद्र तथा वैश्य शूद्र वर्ण के अधिकार और कर्मों को प्राप्त होता है॥३॥ इसी प्रकार वर्णव्यवस्था होने से पक्षपात न होकर सब वर्ण उत्तम बने रहते और उत्तम बनने में प्रयत्न करते और उत्तम वर्ण इस भय से कि मैं नीच वर्ण न हो जाऊँ, इसलिए बुरे कर्म छोड़ उत्तम कर्मों ही को किया करते हैं। इससे संसार की बड़ी उन्नति है। आर्यावर्त्त देश में जब तक ऐसी वर्णव्यवस्था और पूर्वोक्त ब्रह्मचर्य, विद्याग्रहण, उत्तमता से स्वयंवर विवाह होता था, तभी देश की उन्नति थी। अब भी ऐसा ही होना चाहिए, जिससे आर्यावर्त्त देश अपनी पूर्वावस्था को प्राप्त होकर आनन्दित होवे। अब वधू-वर एक-दूसरे के गुण-कर्म और स्वभाव की परीक्षा इस प्रकार करें— दोनों का तुल्य शील, समान बुद्धि, समान आचार, समान रूपादि गुण, अहिंसकता, सत्य, मधुर भाषण, कृतज्ञता, दयालुता, निर्लोभता, देश का सुधार, विद्याग्रहण, सत्योपदेश करने में निर्भयता, उत्साह, अहंकार, मत्सर, ईर्ष्या, काम-क्रोध, कपट, द्यूत, चोरी, मद्यमांसाहारादि दोषों का त्याग, गृह्य-कार्यों में अति चतुरता हो। जब-जब प्रातःसायं वा परदेश से आकर मिलें, तब-तब 'नमस्ते' इस वाक्य से परस्पर नमस्कार कर, स्त्री पति के चरणस्पर्श, पादप्रक्षालन आसनदान करे तथा दोनों परस्पर प्रेम बढ़ानेहारे वचनादि व्यवहारों से वर्त्तकर आनन्द भोगें। वर के शरीर से स्त्री का शरीर पतला और पुरुष के स्कन्धे के तुल्य स्त्री का शिर होना चाहिए। तत्पश्चात् भीतर की परीक्षा स्त्री-पुरुष वचनादि-व्यवहारों से करें। ओम् ऋतमग्रे प्रथमं जज्ञ ऋते सत्यं प्रतिष्ठितम्। यदियं कुमार्य्यभिजाता तदियमिह प्रतिपद्यताम्। यत्सत्यं तद् दृश्यताम्॥
१४८ संस्कारविधिः अर्थ—जब विवाह करने का समय निश्चय हो चुके, तब कन्या चतुर पुरुषों से वर की और वर चतुर स्त्रियों से कन्या की परोक्ष में परीक्षा करावे। पश्चात् उत्तम विद्वान् स्त्री-पुरुषों की सभा करके दोनों परस्पर संवाद करें कि—"हे स्त्री वा हे पुरुष ! इस जगत् के पूर्व ऋत—यथार्थस्वरूप महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ था और उस महत्तत्त्व में सत्य, त्रिगुणात्मक, नाशरहित प्रकृति प्रतिष्ठित है। जैसे पुरुष और प्रकृति के योग से सब विश्व उत्पन्न हुआ है, वैसे मैं कुमारी और मैं कुमार पुरुष इस समय में दोनों विवाह करने की सत्य प्रतिज्ञा करती वा करता हूँ। उसको यह कन्या और मैं वर प्राप्त होवें और अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करने के लिए दृढ़ोत्साही रहें॥" विधि—जब कन्या रजस्वला होकर पृष्ठ ४१-४२ में लिखे प्रमाणे शुद्ध हो जाए, तब जिस दिन गर्भाधान की रात्रि निश्चित की हो, उस रात्रि में विवाह करने के लिए प्रथम ही सब सामग्री जोड़ रखनी चाहिए और पृष्ठ २२-२८ में लिखे प्रमाणे यज्ञशाला, वेदी, ऋत्विक्, यज्ञपात्र, शाकल्य आदि सब सामग्री शुद्ध करके रखनी उचित है। पश्चात्* एक घण्टेमात्र रात्रि जाने पर— ओं काम वेद ते नाम मदो नामासि समानयामुँः सुरा ते अभवत्। परमत्र जन्माग्रे तपसो निर्मितोऽसि स्वाहा ॥ १ ॥ ओम् इमं त उपस्थं मधुना सँसृजामि प्रजापतेर्मुखमेतत् द्वितीयम्। तेन पुँसोभिभवासि सर्वानवशान्वशिन्यसि राज्ञि स्वाहा ॥ २ ॥ ओम् अग्निं क्रव्यादमकृन्वन् गुहानाः स्त्रीणामुपस्थमृषयः पुराणाः। तेनाज्यकृण्वँस्त्रै शुङ्गं त्वाष्ट्रं त्वयि तद्दधातु स्वाहा ॥ ३ ॥ * यदि आधी रात तक विधि पूरा न हो सके तो मध्याह्नोत्तर आरम्भ कर देवे कि जिससे मध्यरात्रि तक विवाह विधि पूरा हो जावे।
विवाहप्रकरणम् १४९ इन मन्त्रों से सुगन्धित शुद्ध जल से पूर्ण कलशों को लेके वधू और वर स्नान कर, पश्चात् वधू उत्तम वस्त्रालङ्कार धारण करके उत्तम आसन पर पूर्वाभिमुख बैठे। तत्पश्चात् पृष्ठ ९ से २१ तक लिखे प्रमाणे ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक आदि यथोक्त कर वेदी के समीप रक्खें। वैसे ही वर भी अपने एकान्त घर में जाके उत्तम वस्त्रालङ्कार धारण करके, यज्ञशाला में आ, उत्तमासन पर पूर्वाभिमुख बैठके पृष्ठ ९-१२ में लिखे प्रमाणे ईश्वरस्तुति-प्रार्थनोपासना* कर वधू के घर को जाने का ढंग करे। तत्पश्चात् कन्या और वरपक्ष के पुरुष बड़े सम्मान से वर को घर ले-जावें। जिस समय वर वधू के घर में प्रवेश करे, उसी समय वधू और कार्यकर्त्ता मधुपर्क आदि से वर का निम्नलिखित प्रकार से आदर-सत्कार करें। उसकी रीति यह है कि वर-वधू के घर में प्रवेश करके पूर्वाभिमुख खड़ा रहे और वधू तथा कार्यकर्त्ता वर के समीप उत्तराभिमुख खड़े रहके, वधू और कार्यकर्त्ता— साधु भवानास्तामर्चयिष्यामो भवन्तम्॥ इस वाक्य को बोलें। उसपर वर— ओम् अर्चय॥ ऐसा प्रत्युत्तर देवे। पुनः वधू और कार्यकर्त्ता ने वर के लिए जो उत्तम आसन सिद्ध कर रक्खा हो, उसे वधू हाथ में लेकर आगे खड़ी रहके— ओं विष्टरो विष्टरो विष्टरः प्रतिगृह्यताम्॥
- विवाह में आये हुए स्त्री-पुरुष भी एकाग्रचित्त, ध्यानावस्थित होके इन तीन कर्मों के अनुसार ईश्वर का चिन्तन किया करें।
१५० संस्कारविधिः यह उत्तम आसन है, आप ग्रहण कीजिए। वर— ओम् प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके वधू के हाथ से आसन ले, बिछा, उसपर सभामण्डप में पूर्वाभिमुख बैठके, वर— ओं वर्ष्मोऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूर्यः। इमं तमभितिष्ठामि यो मा कश्चाभिदासति ॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सुन्दर पात्र में पूर्ण जल भरके कन्या के हाथ में देवे और कन्या— ओं पाद्यं पाद्यं पाद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ इस वाक्य को बोलके वर के आगे धरे। पुनः वर— ओम् प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से उदक ले पग*— प्रक्षालन करे और उस समय— ओं विराजो दोहोऽसि विराजो दोहमशीय मयि पाद्यायै विराजो दोहः ॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता दूसरा शुद्ध लोटा पवित्र जल से भर कन्या के हाथ में देवे पुनः कन्या— ओम् अर्घोऽर्घोऽर्घः प्रतिगृह्यताम् ॥ इस वाक्य को बोलके वर के हाथ में देवे और वर— ओं प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से जलपात्र लेके
- यदि घर का प्रवेशक द्वार पूर्वाभिमुख हो तो वर उत्तराभिमुख और वधू तथा कार्यकर्त्ता पूर्वाभिमुख खड़े रहके यदि ब्राह्मण वर्ण हो तो प्रथम दक्षिण पग पश्चात् बायाँ और अन्य क्षत्रियादि वर्ण हों तो प्रथम बायाँ पग धोवे पश्चात् दाहिना।
विवाहप्रकरणम् १५१ उससे मुखप्रक्षालन करे और उसी समय मुख धोके वर— ओम् आप स्थ युष्माभिः सर्वान् कामानवाप्नवानि ॥ १ ॥ ओं समुद्रं वः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत । अरिष्टास्माकं वीरा मा परासेचि मत्पयः ॥ २ ॥ इन मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वेदी के पश्चिम में बिछाये हुए उसी शुभासन पर पूर्वाभिमुख बैठे। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सुन्दर उपपात्र जल से पूर्ण भर, उसमें आचमनी रख, कन्या के हाथ में देवे और उस समय कन्या— ओम् आचमनीयमाचमनीयमाचमनीयं प्रतिगृह्यताम् ॥ इस वाक्य को बोलके वर के सामने करे और वर— ओं प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ में से जलपात्र को ले, सामने धर, उसमें से दाहिने हाथ में जल, जितना अंगुलियों के मूल तक पहुँचे उतना लेके, वर— ओम् आमागन् यशसा सँसृज वर्चसा । तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं पशूनामरिष्टिं तनूनाम् ॥ इस मन्त्र से एक आचमन । इसी प्रकार दूसरी और तीसरी बार इसी मन्त्र को पढ़के दूसरा और तीसरा आचमन करे। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता मुधपर्क* का पात्र कन्या के हाथ में देवे और कन्या— ओं मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम् ॥
- मधुपर्क उसको कहते हैं जो दही में घी वा शहद मिलाया जाता है। उसका परिमाण १२ (बारह) तोले दही में ४ (चार) तोले शहद अथवा ४ (चार) तोले घी मिलाना चाहिए, और यह मधुपर्क कांसे के पात्र में होना उचित है।
१५२ संस्कारविधिः ऐसी विनती वर से करे और वर— ओं प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से ले और उस समय— ओं मि॒त्रस्य॑ त्वा॒ चक्षु॑षा प्रती॑क्षे ॥ इस मन्त्रस्थ वाक्य को बोलके मधुपर्क को अपनी दृष्टि से देखे और— ओं दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनोर्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यां॒ प्रति॑गृह्णामि ॥ इस मन्त्र को बोलके मधुपर्क के पात्र को वाम हाथ में लेवे और— ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॒ वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः । माध्वी᳖र्नः स॒न्त्वोष॑धीः ॥ १ ॥ ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑व॒ꣳ रज॑: । मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता ॥ २ ॥ ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माँ अस्तु॒ सूर्य॑: । माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः ॥ ३ ॥ इन तीन मन्त्रों से मधुपर्क की ओर अवलोकन करे। ओं नमः श्यावास्यायान्नशने यत्त आविद्धं तत्ते निष्कृन्तामि ॥ इस मन्त्र को पढ़, दाहिने हाथ की अनामिका और अंगुष्ठ से मधुपर्क को तीन बार बिलोवे और उस मधुपर्क में से वर— ओं वसवस्त्वा गायत्रेण च्छन्दसा भक्षयन्तु ॥ इस मन्त्र से पूर्व दिशा। ओं रुद्रास्त्वा त्रैष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयन्तु ॥
विवाहप्रकरणम् १५३ इस मन्त्र से दक्षिण दिशा। ओम् आदित्यास्त्वा जागतेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥ इस मन्त्र से पश्चिम दिशा, और— ओं विश्वे त्वा देवा आनुष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥ इस मन्त्र से उत्तर दिशा में थोड़ा-थोड़ा छोड़े, अर्थात् छींटे देवे। ओं भूतेभ्यस्त्वा परिगृह्णामि॥ इस मन्त्रस्थ वाक्य को बोलके पात्र के मध्य भाग में से लेके ऊपर की ओर तीन बार फेंकना। तत्पश्चात् उस मधुपर्क के तीन भाग करके तीन काँसे के पात्रों में धर, भूमि में अपने सम्मुख तीनों पात्र रक्खे। रक्खे— ओं यन्मधुनो मधव्यं परमं रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि॥ इस मन्त्र को एक-एक बार बोलके एक-एक भाग में से वर थोड़ा-थोड़ा प्राशन करे वा सब प्राशन करे। जो उन पात्रों में शेष उच्छिष्ट मधुपर्क रहा हो, वह किसी अपने सेवक को देवे वा जल में डाल देवे। तत्पश्चात्— ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा॥ ओं सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा॥ इन दो मन्त्रों से दो आचमन, अर्थात् एक से एक और दूसरे से दूसरा वर करे। तत्पश्चात् वर पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे चक्षुरादि इन्द्रियों का जल से स्पर्श करे। पश्चात् कन्या— ओं गौर्गौर्गौः प्रतिगृह्यताम्॥ इस वाक्य से वर की विनती करके अपनी शक्ति के योग्य वर. को गोदानादि द्रव्य, जोकि वर के योग्य हो, अर्पण करे और वर— ओं प्रतिगृह्णामि॥
१५४ संस्कारविधिः इस वाक्य से उसको ग्रहण करे। इस प्रकार मधुपर्क विधि यथावत् करके, वधू और कार्यकर्त्ता वर को सभामण्डपस्थान* से घर में ले-जाके शुभ आसन पर पूर्वाभिमुख बैठाके, वर के सामने पश्चिमाभिमुख वधू को बैठावे और कार्यकर्त्ता उत्तराभिमुख बैठके— ओम् अमुक¹ गोत्रोत्पन्नामिमाममुकनाम्नीम्² अलङ्कृतां कन्यां प्रतिगृह्णातु भवान्॥ इस प्रकार बोलके वर का हाथ चत्ता, अर्थात् हथेली ऊपर रखके, उसके हाथ में वधू का दक्षिण हाथ चत्ता ही रखना, और वर— ओम् प्रतिगृह्णामि॥ ऐसा बोलके— ओं जरां गच्छ परिधत्स्व वासो भवा कृष्टीनामभि- शस्तिपावा। शतं च जीव शरदः सुवर्चा रयिं च पुत्राननुसंव्ययस्वा- युष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥ इस मन्त्र को बोलके वधू को उत्तम वस्त्र देवे। तत्पश्चात्— ओं या अकृन्तन्नवयन् या अतन्वत याश्च देवीस्तन्तूनभितो ततन्थ। तास्त्वा देवीर्जरसे संव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥ इस मन्त्र को बोलके वधू को वर उपवस्त्र देवे। वह उपवस्त्र
- ·यदि सभामण्डप स्थापन न किया हो तो जिस घर में मधुपर्क हुआ हो उससे दूसरे घर में वर को ले-जावे। १. अमुक इस पद के स्थान में जिस गोत्र और कुल में वधू उत्पन्न हुई हो उसका उच्चारण अर्थात् उसका नाम लेना। २. ‘‘अमुकनाम्नीम्’’ इस स्थान पर वधू का नाम द्वितीया विभक्ति के एकवचन से बोलना।
विवाहप्रकरणम् १५५ को यज्ञोपवीतवत् धारण करे। ओं परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोषमभिसंव्ययिष्ये॥ इस मन्त्र को पढ़के वर आप अधोवस्त्र धारण करे और— ओं यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्राबृहस्पती। यशो भगश्च मा विन्दद्धाशो मा प्रतिपद्यताम्॥ इस मन्त्र को पढ़के द्विपट्टा धारण करे। इस प्रकार वधू वस्त्र-परिधान करके जबतक सँभले, तबतक कार्यकर्त्ता अथवा दूसरा कोई यज्ञमण्डप में जा कुण्ड के समीपस्थ हो पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे ईंधन और कर्पूर वा घृत से कुण्ड की अग्नि को प्रदीप्त करे और आहुति के लिए सुगन्ध डाला हुआ घी बटलोई में करके कुण्ड की अग्नि पर गरम कर, कांसे के पात्र में रक्खे और स्रुवादि होम के पात्र तथा जलपात्र इत्यादि सामग्री यज्ञकुण्ड के समीप जोड़कर रक्खे। और वरपक्ष का एक पुरुष शुद्ध वस्त्र धारण कर, शुद्ध जल से पूर्ण एक कलश को लेके यज्ञकुण्ड की परिक्रमा कर, कुण्ड के दक्षिणभाग में उत्तराभिमुख हो कलशस्थापन, अर्थात् भूमि पर अच्छे प्रकार अपने आगे धरके जबतक विवाह का कृत्य पूर्ण न हो जाए, तबतक उत्तराभिमुख बैठा रहे। और उसी प्रकार वर के पक्ष का दूसरा पुरुष हाथ में दण्ड लेके कुण्ड के दक्षिणभाग में कार्य-समाप्ति-पर्यन्त उत्तराभिमुख बैठा रहे। और इसी प्रकार सहोदर वधू का भाई अथवा सहोदर न हो तो चचेरा भाई, मामा का पुत्र अथवा जो मौसी का लड़का हो, वह चावल वा ज्वार की धाणी और शमी वृक्ष के सूखे पत्ते इन दोनों को मिलाकर शमीपत्रयुक्त धाणी की चार अञ्जलि
१५६ संस्कारविधिः एक शुद्ध सूप में रखके धाणीसहित सूप लेके यज्ञकुण्ड के पश्चिमभाग में पूर्वाभिमुख बैठा रहे। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सपाट शिला, जोकि सुन्दर, चिकनी हो उसको तथा वधू और वर को कुण्ड के समीप बैठाने के लिए दो कुशासन वा यज्ञिय तृणासन अथवा यज्ञिय वृक्ष की छाल के जोकि प्रथम से सिद्ध कर रक्खे हों, उन आसनों को रखवावे। तत्पश्चात् वस्त्र धारण की हुई कन्या को कार्यकर्त्ता वर के सम्मुख लावे और उस समय वर और कन्या— ओं सम॑ञ्जन्तु विश्वे॑ दे॒वाः समापो॒ हृदया॑नि नौ। सं मा॒तरि॑श्वा सं धा॒ता समु॑ दे॒ष्ट्री द॑धातु नौ*॥ इस मन्त्र को बोलें। तत्पश्चात् वर अपने दक्षिण हाथ से वधू का दक्षिण हाथ पकड़के—
- वर और कन्या बोलें कि हे (विश्वेदेवाः) इस यज्ञशाला में बैठे हुए विद्वान् लोगो ! आप हम दोनों को (समञ्जन्तु) निश्चय करके जानें कि हम अपनी प्रसन्नतापूर्वक गृहाश्रम में एकत्र रहने के लिए एक दूसरे का स्वीकार करते हैं, कि (नौ) हमारे दोनों के (हृदयानि) हृदय (आपः) जल के समान (सम्) शान्त और मिले हुए रहेंगे। जैसे (मातरिश्वा) प्राणवायु हमको प्रिय है वैसे (सम्) हम दोनों एक दूसरे से सदा प्रसन्न रहेंगे। जैसे (धाता) धारण करनेहारा परमात्मा सबमें (सम्) मिला हुआ सब जगत् को धारण करता है, वैसे हम दोनों एक दूसरे को धारण करेंगे। जैसे (समुदेष्ट्री) उपदेश करनेहारा श्रोताओं से प्रीति करता है वैसे (नौ) हमारे दोनों का आत्मा एक-दूसरे के साथ दृढ़ प्रेम को (दधातु) धारण करे॥ १ ॥
विवाहप्रकरणम् १५७ ओं यदैषि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा। हिरण्यपर्णो वैकर्णः स त्वा मन्मनसां करोतु* असौ॥ इस मन्त्र को बोलके, उसको लेके घर के बाहर मण्डपस्थान में कुण्ड के समीप हाथ पकड़े हुए वधू तथा वर दोनों आवें और वर निम्न दो मन्त्रों को बोले— ओं भूर्भुवः॒ स्वः॑। अघोर॑च॒क्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑। वी॒रसूर्देवृ॑कामा स्यो॒ना शं नौ॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ∞ ॥
- (असौ) इस पद के स्थान में कन्या का नाम उच्चारण करना। हे वरानने वा हे वरानन! (यत्) जो तू (मनसा) अपनी इच्छा से मुझको जैसे (पवमानः) पवित्र वायु (वा) जैसे (हिरण्यपर्णो वैकर्णः) तेजोमय जल आदि को किरणों से ग्रहण करनेवाला सूर्य (दूरम्) दूरस्थ पदार्थों और (दिशोऽनु) दिशाओं को प्राप्त होता है, वैसे तू प्रेमपूर्वक अपनी इच्छा से मुझको प्राप्त होती वा होता है, उस (त्वा) तुझको (सः) वह परमेश्वर (मन्मनसाम्) मेरे मन के अनुकूल (करोतु) करे, और हे (वीर) जो आप मन से मुझको (ऐषि) प्राप्त होते हो उस आपको जगदीश्वर मेरे मन के अनुकूल सदा रक्खे ॥ २॥ ∞ हे वरानने (अपतिघ्नि) पति से विरोध न करनेहारी तू जिसके (ओम्) अर्थात् रक्षा करनेवाला (भूः) प्राणदाता (भुवः) सब दुःखों को दूर करनेहारा (स्वः) सुखस्वरूप और सब सुखों के दाता आदि नाम हैं, उस परमात्मा की कृपा और अपने उत्तम पुरुषार्थ से (अघोरचक्षुः) प्रियदृष्टि (एधि) हो, (शिवा) मंगल करनेहारी (पशुभ्यः) सब पशुओं को सुखदाता, (सुमनाः) पवित्रान्तःकरणयुक्त, प्रसन्नचित्त, (सुवर्चाः) सुन्दर शुभ, गुण, कर्म, स्वभाव और विद्या से सुप्रकाशित, (वीरसूः) उत्तम वीर पुरुषों
१५८ संस्कारविधिः ओं भूर्भुवः स्वः। सा नः पूषा शिवतमामैरय सा न ऊरू उशती विहर। यस्यामुशन्तः प्रहराम शेफं यस्यामु कामा बहवो निविष्ट्यै॥ इन दो मन्त्रों को वर बोलके, दोनों वर-वधू यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, कुण्ड के पश्चिम भाग में प्रथम स्थापन किये हुए आसन पर पूर्वाभिमुख वर के दक्षिण-भाग में वधू और वधू के वाम-भाग में वर बैठके, वधू— ओं प्र मे पतियानः पन्था कल्पताथं शिवा अरिष्टा पतिलोकं गमेयम्॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड के समीप दक्षिणभाग में उत्तराभिमुख पुरोहित की स्थापना करनी। तत्पश्चात् पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि तीन मन्त्रों में प्रत्येक मन्त्र से एक-एक आचमन, वैसे तीन आचमन वर-वधू और पुरोहित और कार्यकर्त्ता करके, हस्त और मुख-प्रक्षालन एक शुद्धपात्र में करके दूर रखवा दें। हाथ और मुख पोंछके पृ० ३० में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड में (ओं भूर्भुवः स्वद्यौरिव०) इस मन्त्र से अग्न्याधान पृ० ३१ में लिखे प्रमाणे (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि मन्त्रों से समिदाधान और पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि तीन मन्त्रों से कुण्ड के तीन ओर और (ओं देव सवितः प्रसुव०) इस मन्त्र से कुण्ड की चारों ओर दक्षिण हाथ की अञ्जलि से शुद्ध जल सेचन करके, कुण्ड में डाली हुई समिधा प्रदीप्त को उत्पन्न करनेहारी (देवृकामाः) देवर की कामना करती हुई, अर्थात् नियोग की भी इच्छा करनेहारी, (स्योना) सुखयुक्त होके (नः) हमारे (द्विपदे) मनुष्यादि के लिए (शम्) सुख करनेहारी (भव) सदा हो, और (चतुष्पदे) गाय आदि पशुओं को भी (शम्) सुख देनेहारी हो, वैसे ही मैं तेरा पति भी वर्त्ता करूँ॥३॥
विवाहप्रकरणम् १५९ हुए पश्चात् पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वधू-वर पुरोहित और कार्यकर्त्ता आघारावाज्यभागाहुति चार घी की देवें। तत्पश्चात् पृ० ३२-३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार घी की और पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ, ये सब मिलके १६ सोलह आज्याहुति देके प्रधान होम का प्रारम्भ करें। प्रधान होम के समय वधू अपने दक्षिण हाथ को वर के दक्षिण स्कन्धे पर स्पर्श करके पृ० ३४ में लिखे प्रमाणे (ओम् भूर्भुवः स्वः। अग्न आयूंषि०) इत्यादि चार मन्त्रों से, अर्थात् एक-एक से एक-एक मिलके चार आज्याहुति क्रम से करें और— ओं भूर्भुव॒: स्व॒:। त्वम॑र्य॒मा भ॑वसि॒ यत्क॒नीनां॒ नाम॑ स्व॒धाव॑न्गुह्यं॑ बिभर्षि। अ॒ञ्जन्ति॑ मि॒त्रं सुधि॑तं॒ न गोभि॒र्यद्दम्प॑ती सम॑नसा कृ॒णोषि॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये— इदन्न मम ॥ इस मन्त्र को बोलके पाँचवीं आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्— ओम् ऋ॒ताषाड् ऋ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वः। स न॑ इदं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ॥ इदमृताषाहे ऋतधाम्नेऽग्नये गन्धर्वाय—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओम् ऋ॒ताषाड् ऋ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वस्तस्यौषधयोऽप्स॒रसो॑ मुदो॒ नाम॑। ताभ्य॒: स्वाहा॑ ॥ इदमोषधिभ्योऽप्सरोभ्यो मुद्भ्यः—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओं सं॒हितो वि॒श्वसा॑मा॒ सूर्यो॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इदं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ॥ इदं संहिताय विश्वसाम्ने सूर्याय गन्धर्वाय—इदन्न मम ॥ ३ ॥
१६० संस्कारविधिः ओँ सँꣳहि॒तो वि॒श्वसा॑मा॒ सूर्यो॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॑ मरी॑चयोऽ प्स॒रस॑ आ॒युवो॒ नाम॑। ताभ्य॒ स्वाहा॑। इदं मरीचिभ्योऽ प्सरोभ्य आयुभ्यः-इ॒दन्न म॒म॥४॥ ओँ सु॒षुम्णः सूर्य॑रश्मिश्च॒न्द्रमा॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदं सुषुम्णाय सूर्यरश्मये चन्द्रमसे गन्धर्वाय-इ॒दन्न म॒म॥५॥ ओँ सु॒षुम्णः सूर्य॑रश्मिश्च॒न्द्रमा॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॑ नक्ष॑त्राण्यप्स॒रसौ भेकु॒रयो॒ नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं नक्षत्रेभ्योऽप्सरोभ्यो भेकुरिभ्यः-इ॒दन्न म॒म॥६॥ ओम् इ॑षि॒रो वि॒श्वव्य॑चा॒ वातो॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदमषिराय विश्वव्यचसे वाताय गन्धर्वाय-इ॒दन्न म॒म॥७॥ ओम् इ॑षि॒रो वि॒श्वव्य॑चा॒ वातो॑ गन्ध॒र्वस्तस्यापो॑ अ॒प्स॒रस॒ ऊर्जा॒ नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदमद्भ्योऽप्सरोभ्यऽ- ऊर्गभ्यः-इ॒दन्न म॒म॥८॥ ओँ भु॒ज्युः सु॑प॒र्णो य॒ज्ञो ग॑न्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदं भुज्यवे सुपर्णाय यज्ञाय गन्धर्वाय-इ॒दन्न म॒म॥९॥ ओँ भु॒ज्युः सु॑प॒र्णो य॒ज्ञो ग॑न्ध॒र्वस्तस्य॒ दक्षि॑णा अ॒प्स॒रस॑ स्ता॒वा नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं दक्षिणाभ्योऽप्सरोभ्यः स्तावाभ्यः-इ॒दन्न म॒म॥१०॥
विवाहप्रकरणम् १६१ ओं प्र॒जाप॑तिर्वि॒श्वक॑र्मा मनो॑ गन्ध॒र्वः । स न॑ इदं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ॥ इदं प्रजापतये विश्वकर्मणे मनसे गन्धर्वाय—इदन्न मम ॥ ११ ॥ ओं प्र॒जाप॑तिर्वि॒श्वक॑र्मा मनो॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॑ ऋक्सामान्य॑प्स॒रस॑ ए॒ष्टयो॒ नाम॑ । ताभ्यः स्वाहा॑ ॥ इदमृक्सामे- भ्योऽप्सरोभ्य एष्टिभ्यः—इदन्न मम ॥ १२ ॥ इन बारह मन्त्रों से बारह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् जयाहोम करना— ओं चित्तं च स्वाहा ॥ इदं चित्ताय—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओं चित्तिश्च स्वाहा ॥ इदं चित्त्यै—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओम् आकृतं च स्वाहा ॥ इदमाकूताय—इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओम् आकृतिश्च स्वाहा ॥ इदमाकृत्यै—इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओं विज्ञातं च स्वाहा ॥ इदं विज्ञाताय—इदन्न मम ॥ ५ ॥ ओं विज्ञातिश्च स्वाहा ॥ इदं विज्ञात्यै—इदन्न मम ॥ ६ ॥ ओं मनश्च स्वाहा ॥ इदं मनसे—इदन्न मम ॥ ७ ॥ ओं शक्करीश्च स्वाहा ॥ इदं शक्करीभ्यः—इदन्न मम ॥ ८ ॥ ओं दर्शश्च स्वाहा ॥ इदं दर्शाय—इदन्न मम ॥ ९ ॥ ओं पौर्णमासं च स्वाहा ॥ इदं पौर्णमासाय—इदन्न मम ॥ १० ॥ ओं वृहच्च स्वाहा ॥ इदं बृहते—इदन्न मम ॥ ११ ॥ ओं रथन्तरं च स्वाहा ॥ इदं रथन्तराय—इदन्न मम ॥ १२ ॥ ओं प्रजापतिर्जयानिन्द्राय वृष्णो प्रायच्छदुग्रः पृतना जयेषु। तस्मै विशः समनमन्त सर्वाः स उग्रः स इ ह॒व्यो बभूव स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये जयानिन्द्राय— इदन्न मम ॥ १३ ॥
१६२ संस्कारविधिः इन मन्त्रों से प्रत्येक से एक-एक करके जयाहोम की तरह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् अभ्यातान होम करना। इसके मन्त्र ये हैं— ओम् अग्निर्भूतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदमग्नये भूतानामधिपतये-इदन्न मम ॥ १ ॥ ओम् इन्द्रो ज्येष्ठानामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदमिन्द्राय ज्येष्ठानामधिपतये-इदन्न मम ॥ २ ॥ ओं यमः पृथिव्याऽधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं यमाय पृथिव्यां अधिपतये-इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओं वायुरन्तरिक्षस्याधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं वायवे अन्तरिक्षस्याधिपतये-इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओं सूर्यो दिवोऽधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं सूर्याय दिवोऽधिपतये-इदन्न मम ॥ ५ ॥ ओं चन्द्रमा नक्षत्राणामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं चन्द्रमसे नक्षत्राणामधिपतये-इदन्न मम ॥ ६ ॥ ओं बृहस्पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं बृहस्पतये ब्रह्मणोऽधिपतये-इदन्न मम ॥ ७ ॥
विवाहप्रकरणम् १६३ ओं मित्रः सत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं मित्राय सत्यानामधिपतये–इदन्न मम॥८॥ ओं वरुणोऽपामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं वरुणायापामधिपतये–इदन्न मम॥९॥ ओं समुद्रः स्रोत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं समुद्राय स्रोत्यानामधिपतये–इदन्न मम॥१०॥ ओम् अन्नꣳ साम्राज्यानामधिपतिस्तन्मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदमन्नाय साम्राज्यानामधिपतये–इदन्न मम॥११॥ ओं सोमऽओषधीनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं सोमाय ओषधीनामधिपतये–इदन्न मम॥१२॥ ओं सविता प्रसवानांमधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं सवित्रे प्रसवानांमधिपतये–इदन्न मम॥१३॥ ओं रुद्रः पशूनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं रुद्राय पशूनामधिपतये–इदन्न मम॥१४॥
१६४ संस्कारविधिः ओं त्वष्टा रूपाणामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं त्वष्ट्रे रूपाणामधिपतये—इदन्न मम ॥ १५ ॥ ओं विष्णुः पर्वतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्य- स्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं विष्णवे पर्वतानामधिपतये—इदन्न मम ॥ १६ ॥ ओं मरुतो गणानामधिपतयस्ते मावन्त्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं मरुद्भ्यो गणानामधिपतिभ्यः—इदन्न मम ॥ १७ ॥ ओं पितरः पितामहाः परेऽवरे ततास्ततामहा इह मावन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधा- यामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं पितृभ्यः पितामहेभ्यः परेभ्योऽवरेभ्यस्ततेभ्यस्ततामहेभ्यश्च—इदन्न मम ॥ १८ ॥ इस प्रकार अभ्यातन होम की अठारह आज्याहुति दिये पीछे, पुनः— ओम् अग्निरैतु प्रथमो देवतानाꣳ सोऽस्यै प्रजां मुञ्चतु मृत्युपाशात्। तदयꣳ राजा वरुणोऽनुमन्यतां यथेयꣳ स्त्री पौत्रमघन्न रोदात् स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओम् इमामग्निस्त्रायतां गार्हपत्यः प्रजामस्यै नयतु दीर्घमायुः। अशून्योपस्था जीवतामस्तु माता पौत्रमानन्द- मभिविबुध्यतामियꣳ स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओम् स्वस्ति नोऽग्ने दिवा पृथिव्या विश्वानि धेह्ययथा यजत्र। यदस्यां मयि दिवि जातं प्रशस्तं तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रꣳ स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ३ ॥