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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

२० संस्कारविधिः शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽआपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शं योर॒भि स्र॑वन्तु नः॥ १७॥ द्यौः शान्ति॑र॒न्तरि॑क्षँ शान्तिः॑ पृथि॒वी शान्ति॒रापः॒ शान्ति॒रोष॑धयः॒ शान्तिः॑। वन॒स्पत॑यः॒ शान्ति॒र्विश्वे॑ दे॒वाः शान्ति॒र्ब्रह्म॒ शान्तिः॒ सर्वँ॒ शान्तिः॒ शान्ति॑रे॒व शान्तिः॒ सा मा॒ शान्ति॑रेधि॥ १८॥ तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता᳝च्छु॒क्रमुच्चर॑त्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तँशृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥ १९॥ —यजुः० अ० ३६। मं० ८, १०-१२, १७, २४॥ यज्जाग्र॑तो दू॒रमु॒दैति॒ दैवं॒ तदु॑ सु॒प्तस्य॒ तथै॒वैति॑। दू॒र॒ङ्ग॒मं ज्योति॑षां॒ ज्योति॒रेकं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ २०॥ येन॒ कर्म्मा॑ण्य॒पसो॑ मनी॒षिणो॑ य॒ज्ञे कृ॒ण्वन्ति॑ वि॒दथै॑षु॒ धीराः॑। यद॑पू॒र्वं य॒क्षम॒न्तः प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ २१॥ यत् प्र॒ज्ञान॑मु॒त चेतो॒ धृति॑श्च॒ यज्ज्योति॑र॒न्तर॒मृतं॑ प्र॒जासु॑। यस्मा॒न्नऽऋ॒ते किं च॒न क॒र्म क्रि॒यते॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ २२॥ येने॒दं भू॒तं भुव॑नं भवि॒ष्यत् परि॑गृहीतम॒मृते॑न॒ सर्व॑म्। येन॑ य॒ज्ञस्ता॒यते स॒प्तहोता॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ २३॥ यस्मि॒न्नृचः॒ साम॒ यजूं॑꣯षि॒ यस्मि॒न् प्रति॑ष्ठिता रथना॒भाविवाराः॑। यस्मिँ॑श्चि॒त्त꣯सर्व॒मोतं॑ प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒व- स॑ङ्कल्पमस्तु॥ २४॥

शान्तिकरणम् २१ सु॒षा॒र॒थिरश्वा॑निव॒ यन्म॑नु॒ष्या॒न्नेनी॒यते॒ऽभीशु॑भिर्वा॒जिन॑ इव। हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यद॒जिरं॒ जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मन॑: शि॒वस॑न्कल्पमस्तु ॥ २५ ॥ —यजुः० अ० ३४। मं० १-६॥ १ २ ३ २उ ३ १ २२ ३ १ २२ स॑ नः॒ पव॑स्व॒ शं गवे॒ शं जना॑य॒ शमर्व॑ते। १ २ ३ १ २ शं नो॒ राज॑न्नोष॑धीभ्यः ॥ २६ ॥ —साम० उत्तरा० प्रपा० १। मं० ३॥ अभ॑यं नः करत्यन्तरि॑क्षमभ॑यं द्यावा॑पृथि॒वी उ॒भे इ॒मे। अभ॑यं प॒श्चादभ॑यं पु॒रस्ता॑दुत्त॒रादध॑रादभ॑यं नो अस्तु ॥ २७ ॥ अभ॑यं मि॒त्रादभ॑यम॒मित्रा॒दभ॑यं ज्ञा॒तादभ॑यं पु॒रोक्षा॑त्। अभ॑यं नक्त॒मभ॑यं दिवा॑ नः॒ सर्वा॒ आशा॒ मम॑ मि॒त्रं भवन्तु ॥ २८ ॥ —अथर्व० कां० १९। सू० १५। मं० ५, ६ ॥ ॥ इति शान्तिकरणम् ॥

अथ सामान्यप्रकरणम् नीचे लिखी हुई क्रिया सब संस्कारों में करनी चाहिए, परन्तु जहाँ कहीं विशेष होगा वहाँ सूचना कर दी जाएगी कि यहाँ पूर्वोक्त अमुक कर्म न करना और इतना अधिक करना, स्थान-स्थान में जना दिया जाएगा। यज्ञदेश—यज्ञ का देश पवित्र, अर्थात् जहाँ स्थल, वायु शुद्ध हो, किसी प्रकार का उपद्रव न हो। यज्ञशाला—इसी को 'यज्ञमण्डप' भी कहते हैं। यह अधिक-से-अधिक सोलह हाथ सम चौरस, चौकोण और न्यून-से-न्यून आठ हाथ की हो। यदि भूमि अशुद्ध हो, तो यज्ञशाला की पृथिवी और जितनी गहिरी वेदी बनानी हो, उतनी पृथिवी दो-दो हाथ खोद अशुद्ध [मट्टी] निकालकर उसमें शुद्ध मट्टी भरें। यदि सोलह हाथ की सम चौरस हो तो चारों ओर बीस खम्भे और जो आठ हाथ की हो तो बारह खम्भे लगाकर उनपर छाया करें। वह छाया की छत्त वेदी की मेखला से दश हाथ ऊँची अवश्य होवे और यज्ञशाला के चारों दिशा में चार द्वार रक्खें और यज्ञशाला के चारों ओर ध्वजा, पताका, पल्लव आदि बाँधें। नित्य मार्जन तथा गोमय से लेपन करें और कुंकुम, हल्दी, मैदा की रेखाओं से सुभूषित किया करें। मनुष्यों को योग्य है कि सब मङ्गलकार्यों में अपने और पराये कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा ईश्वरोपासना करें। इसीलिए निम्नलिखित सुगन्धित आदि द्रव्यों की आहुति यज्ञकुण्ड में देवें।

सामान्यप्रकरणम् २३ यज्ञकुण्ड का परिमाण—जो लक्ष आहुति करनी हों, तो चार-चार हाथ का चारों ओर सम चौरस चौकोण कुण्ड ऊपर और उतना ही गहिरा और चतुर्थांश नीचे, अर्थात् तले में एक हाथ चौकोण लम्बा-चौड़ा रहे। इसी प्रकार जितनी आहुति करनी हों, उतना ही गहिरा-चौड़ा कुण्ड बनाना, परन्तु अधिक आहुतियों में दो-दो हाथ [अधिक] अर्थात् दो लक्ष आहुतियों में छह हस्त परिमाण का चौड़ा और सम चौरस कुण्ड बनाना और जो पचास हज़ार आहुति देनी हों, तो एक हाथ घटावे, अर्थात् तीन हाथ गहिरा-चौड़ा सम चौरस और पौन हाथ नीचे तथा पच्चीस हज़ार आहुति देनी हों, तो दो हाथ चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ नीचे। दश हज़ार आहुति तक इतना ही, अर्थात् दो हाथ चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ नीचे रखना। पाँच हज़ार आहुति तक डेढ़ हाथ चौड़ा-गहिरा सम चौरस और साढ़े आठ अंगुल नीचे रहे। यह कुण्ड का परिमाण विशेष घृताहुति का है। यदि इसमें ढाई हज़ार आहुति मोहनभोग, खीर और ढाई हज़ार घृत की देवें, तो दो ही हाथ का चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ नीचे कुण्ड रक्खें। चाहे घृत की हज़ार आहुति देनी हों, तथापि सवा हाथ से न्यून चौड़ा-गहिरा सम चौरस और चतुर्थांश नीचे न बनावें और इन कुण्डों में पन्द्रह अंगुल की मेखला अर्थात् पाँच-पाँच अंगुल की ऊँची तीन बनावें और ये तीन मेखला यज्ञशाला की भूमि के तले से ऊपर करनी। प्रथम पाँच अंगुल ऊँची और पाँच अंगुल चौड़ी, इसी प्रकार दूसरी और तीसरी मेखला बनावें। यज्ञसमिधा—पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आंब [आम], बिल्व आदि की समिधा वेदी के प्रमाणे छोटी-बड़ी कटवा लेवें, परन्तु ये समिधा कीड़ा लगी, मलिन-देशोत्पन्न और अपवित्र पदार्थ आदि से दूषित न हों। अच्छे प्रकार देख लेवें और चारों ओर बराबर और बीच में चिनें।

२४ संस्कारविधिः होम के चार प्रकार के द्रव्य—(प्रथम—सुगन्धित) कस्तूरी, केशर, अगर, तगर, श्वेतचन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री आदि। (द्वितीय—पुष्टिकारक) घृत, दूध, फल, कन्द, अन्न, चावल, गेहूँ, उड़द आदि। (तीसरे—मिष्ट) शक्कर, सहत, छुवारे, दाख आदि। (चौथे—रोगनाशक) सोमलता अर्थात् गिलोय आदि ओषधियाँ। स्थालीपाक—नीचे लिखे विधि से भात, खिचड़ी, खीर, लड्डू, मोहनभोग आदि सब उत्तम पदार्थ बनावें। इसका प्रमाण— ओं देवस्त्वा सविता पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण वसोः सूर्यस्य रश्मिभिः ॥ इस मन्त्र का यह अभिप्राय है कि होम के सब द्रव्य को यथावत् शुद्ध अवश्य कर लेना चाहिए, अर्थात् सबको यथावत् शोध-छान, देख-भाल, सुधार कर करें। इन द्रव्यों को यथायोग्य मिलाके पाक करना। जैसेकि सेर घी के मोहनभोग में रत्तीभर कस्तूरी, मासेभर केशर, दो मासे जायफल-जावित्री, सेरभर मीठा, सब डालकर मोहनभोग बनाना। इसी प्रकार अन्य मीठा भात, खीर, खीचड़ी, मोदक आदि होम के लिए बनावें। चरु अर्थात् होम के लिए पाक बनाने का विधि:— 'ओम् अग्नये त्वा जुष्टं निर्वपामि' अर्थात् जितनी आहुति देनी हों, प्रत्येक आहुति के लिए चार-चार मूठी चावल आदि लेके (ओम् अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि) अर्थात् अच्छे प्रकार जल से धोके पाकस्थाली में डाल अग्नि से पका लेवें। जब होम के लिए दूसरे पात्र में लेना हो, तभी नीचे लिखी आज्यस्थाली में निकालके यथावत् सुरक्षित रक्खें और उसपर घृत सेचन करें। यज्ञपात्र—विशेषकर चाँदी, सोना अथवा काष्ठ के पात्र होने चाहिएँ। निम्नलिखित प्रमाणे—

[Heading Left] सामान्यप्रकरणम् [Heading Right] २५

अथ पात्रलक्षणान्युच्यन्ते—बाहुमात्र्यः पाणिमात्रपुष्कराः, षडङ्गुलखातास्त्वग्बिला हंसमुखप्रसेकाः, मूलदण्डाश्चतस्रः स्रुचो भवन्ति। तत्र पालाशी जुहूः, आश्वत्थ्युपभृत्, वैकङ्कती ध्रुवा, अग्निहोत्रहवणी च। अरत्निमात्रः खादिरः स्रुवः, अंगुष्ठपर्वमात्रपुष्करः, तथाविधो द्वितीयो वैकङ्कतः स्रुवः। वारणं बाहुमात्रं मकराकारम्, अग्निहोत्रहवणीनिधानार्थं कूर्चम्। अरत्निमात्रं खादिरं खड्गाकृतिवज्रम्। वारणान्यहोमसंयुक्तानि—तत्रोलूखलं नाभिमात्रम्। मुसलं शिरोमात्रम्। अथवा मुसलोलूखले वार्क्षे सारदारुमये शुभे इच्छाप्रमाणे भवतः। तथा— खादिरं मुसलं कार्यं पालाशः स्यादुलूखलः। यद्वोभौ वारणौ कार्यों तदभावेऽन्यवृक्षजौ॥ शूर्पं वैणवमेव वा ऐषीकं नलमयं वाऽचर्मबद्धम्। प्रादेशमात्री वारणी शम्या। कृष्णाजिनमखण्डम्। दृषदुपले अश्ममये। वारणीं २४ हस्तमात्रीं, २२ अरत्निमात्रीं वा खातमध्यां मध्यसंग्रहीतामिडापात्रीम्। अरत्निमात्राणि ब्रह्मयजमानहोतृपत्न्यासनानि। मुञ्जमयं त्रिवृतं व्याममात्रं योक्त्रम्। प्रादेशदीर्घे अष्टाङ्गुलायते षडङ्गुलखातमण्डलमध्ये पुरोडाशपात्र्यौ। प्रादेशमात्रं द्व्यङ्गुलपरीणाहं तीक्ष्णाग्रं शृतावदानम्। आदर्शाकारे चतुरस्रे वा प्राशित्रहरणे। तयोरेकमीषत्खात- मध्यम्। षडङ्गुलं कङ्कतिकाकारमुभयतःखातं षड्वत्तम्।

२६ संस्कारविधिः द्वादशाङ्गुलमर्द्धचन्द्राकारमष्टाङ्गुलोत्सेधमन्तर्द्धानकटम्। उपवेशोऽरत्निमात्रः। मुञ्जमयी रज्जुः। खादिरान् द्वादशाङ्गुलदीर्घान् चतुरङ्गुलमस्तकान् तीक्ष्णाग्रान् शङ्कून्। यजमानपूर्णपात्रं पत्नीपूर्णपात्रं च द्वादशाङ्गुलदीर्घं चतुरङ्गुल- विस्तारं चतुरङ्गुलखातम्। तथा प्रणीतापात्रञ्च। आज्यस्थाली द्वादशाङ्गुलविस्तृता प्रादेशोच्चा। तथैव चरुस्थाली। अन्वाहार्यपात्रं पुरुषचतुष्टयाहारपाकपर्याप्तम्। समिदिध्मार्थं पलाशशाखामयम्। कौशं बर्हिः। ऋत्विग्वरणार्थं कुण्डलाङ्गुलीयकवासांसि। पत्नीयजमानपरिधानार्थं क्षौमवासश्चतुष्टयम्। अग्न्याधेयदक्षिणार्थं चतुर्विंशतिपक्षे एकोनपञ्चाशद् गावः, द्वादशपक्षे पञ्चविंशतिः, षट्पक्षे त्रयोदश, सर्वेषु पक्षेषु आदित्येष्टौ धेनुः। वरार्थं चतस्रो गावः। स्रुवः ४, अंगुल २४ शम्या प्रादेश १ अरणी ४ उपल शृतावदान प्रादेशमात्र कूर्च बाहुमात्र १

१. गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन व जातकर्म संस्कार

सामान्यप्रकरणम् २७ पाटला ४, लम्बा २४ अंगुल उलूखल नाभिमात्र मुसल पूर्णपात्र अ० १२, चौड़ा अंगुल ६ स्रुच सर्व ४, बाहुमात्र अभ्रि १, अं० २४ ओवली अं० १२ चात्र अं० १२ षडवत्त अं० २४ पुरोडाशपात्री इडा अंगुल २४ अंगुल ६ पोली अंगुल प्राशित्रहरणे पिष्टपात्री ४ ऊँची अधरारणी दर्पणकार

२८ संस्कारविधिः प्रणीता अं० १२ प्रोक्षणी अं० १२ अंगोछा २४ अं० लंबा अन्तर्धान १, अं० १२ खाँडा अंगुल २४ उत्तरारणी टुकड़ा १८ मूलेखात दृषद् उपवेश १, अं० २४ शूर्प समिध पलाश की १८ हस्तमात्र, इध्म परिधि ३ पलाश की बाहुमात्र। सामिधेनी समिद् प्रदेशमात्र। समीक्षण लेर ५। शाटी १। दृषदुपल १ दीर्घ अंगुल १२ पृ० ५३। उपल अंगुल ६। नेतु व्याम=हाथ ४, त्रिवृत् तृण वा गोबाल का। अथ ऋत्विग्वरणम् यजमानोक्तिः—'ओमावसोः सदने सीद'। इस मन्त्र का उच्चारण करके ऋत्विज् को कर्म कराने की इच्छा से स्वीकार करने के लिए प्रार्थना करे।

सामान्यप्रकरणम् २९ ऋत्विगुक्तिः—ओं सीदामि। ऐसा कहके जो उसके लिए आसन बिछाया हो उसपर बैठे। यजमानोक्तिः—अहमद्योक्तकर्मकरणाय भवन्तं वृणे। ऋत्विगुक्तिः—वृतोऽस्मि। ऋत्विजों के लक्षण—अच्छे विद्वान्, धार्मिक, जितेन्द्रिय, कर्म करने में कुशल, निर्लोभ, परोपकारी, दुर्व्यसनों से रहित, कुलीन, सुशील, वैदिक मत वाले, वेदवित् एक, दो, तीन अथवा चार का वरण करें। जो एक हो तो उसका पुरोहित, और जो दो हों तो ऋत्विक्, पुरोहित और तीन हों तो ऋत्विक्, पुरोहित और अध्यक्ष और जो चार हों तो होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा। इनका आसन वेदी के चारों ओर, अर्थात् होता का वेदी से पश्चिम आसन पूर्व मुख, अध्वर्यु का उत्तर आसन दक्षिण मुख, उद्गाता का पूर्व आसन पश्चिम मुख, और ब्रह्मा का दक्षिण आसन उत्तर में मुख होना चाहिए और यजमान का आसन पश्चिम में और वह पूर्वाभिमुख, अथवा दक्षिण में आसन पर बैठके उत्तराभिमुख रहे। इन ऋत्विजों को सत्कारपूर्वक आसन पर बैठना, और वे प्रसन्नतापूर्वक आसन पर बैठें और उपस्थित कर्म के बिना दूसरा कर्म वा दूसरी बात कोई भी न करें। और अपने-अपने जलपात्र से सब जने, जोकि यज्ञ करने को बैठे हों, वे इन मन्त्रों से तीन-तीन आचमन करें, अर्थात् एक-एक से एक-एक बार आचमन करें। वे मन्त्र ये हैं— ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥ १ ॥ इससे एक। ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा ॥ २ ॥ इससे दूसरा। ओं सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥ ३ ॥ इससे तीसरा आचमन करके, तत्पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रों से जल ले-

३० संस्कारविधिः करके अङ्गों का स्पर्श करें— ओं वाङ् म आस्येऽस्तु ॥ इस मन्त्र से मुख। ओं नसोर्मे प्राणोऽस्तु ॥ इस मन्त्र से नासिका के दोनों छिद्र। ओम् अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु ॥ इस मन्त्र से दोनों आँखें। ओं कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु ॥ इस मन्त्र से दोनों कान। ओं बाह्वोर्मे बलमस्तु ॥ इस मन्त्र से दोनों बाहु। ओम् ऊर्वोर्मऽओजोऽस्तु ॥ इस मन्त्र से दोनों जंघा और ओम् अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा मे सह सन्तु ॥ इस मन्त्र से दाहिने हाथ से जल-स्पर्श करके मार्जन करना। (पुनः) पूर्वोक्त समिधाचयन वेदी में करें। पुनः— ओं भूर्भुवः स्वः ॥ इस मन्त्र का उच्चारण करके ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य के घर से अग्नि ला, अथवा घृत का दीपक जला, उससे कपूर में लगा, किसी एक पात्र में धर, उसमें छोटी-छोटी लकड़ी लगाके यजमान वा पुरोहित उस पात्र को दोनों हाथों से उठा, यदि गर्म हो तो चिमटे से पकड़कर अगले मन्त्र से अग्न्याधान करे। वह मन्त्र यह है— ओं भूर्भुव॒ः स्व॒द्यौरि॑व भू॒म्ना पृ॑थि॒वीव॑ वरि॒म्णा। तस्या॑स्ते पृथिवी देवयजनि पृ॒ष्ठेऽग्निम॑न्नाद॒मन्नाद्या॑यादधे ॥ —यजुः० अ० ३। मं० ५॥ इस मन्त्र से वेदी के बीच में अग्नि को धर, उसपर छोटे- छोटे काष्ठ और थोड़ा कपूर धर, अगला मन्त्र पढ़के व्यजन से अग्नि को प्रदीप्त करे— ओम् उद्बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृहि त्वमि॑ष्टापू॒र्ते सꣳसृ॑जेथाम॒यं च॑। अ॒स्मिन्त्स॒धस्थे॒ऽअध्युत्त॑रस्मि॒न् विश्वे॑ दे॒वा यज॑मानश्च सीदत ॥ —यजुः० अ० १५। मं० ५४॥ जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे, तब चन्दन की

सामान्यप्रकरणम् ३१ अथवा उपरिलिखित पलाशादि की तीन लकड़ी आठ-आठ अंगुल की घृत में डुबा, उनमें से एक-एक निकाल नीचे लिखे एक-एक मन्त्र से एक-एक समिधा को अग्नि में चढ़ावें। वे मन्त्र ये हैं— ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा॥ इदमग्नये जातवेदसे—इदं न मम॥ १ ॥ —इस मन्त्र से एक। ओं स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॒धय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन् स्वाहा॑॥ इदमग्नये—इदं न मम॥ २ ॥ —इससे, और सुस॑मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे स्वाहा॑॥ इदमग्नये जातवेदसे—इदं न मम॥ ३ ॥ —इस मन्त्र से अर्थात् इन दोनों से दूसरी। तन्त्वा॑ स॒मिद्भि॑िरङ्गिरो घृ॒तेन॑ वर्धयामसि। बृ॒हच्छो॑चा यविष्ठ्य॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नयेऽङ्गिरसे—इदं न मम॥ ४ ॥ —यजुः० अ० ३। मं० १, २, ३॥ इस मन्त्र से तीसरी समिधा की आहुति देवें। इन मन्त्रों से समिदाधान करके होम का शाकल्य, जोकि यथावत् विधि से बनाया हो, सुवर्ण, चाँदी, काँसा आदि धातु के पात्र अथवा काष्ठ-पात्र में वेदी के पास सुरक्षित धरें, पश्चात् उपरिलिखित घृतादि जोकि उष्ण कर छान, पूर्वोक्त सुगन्ध्यादि पदार्थ मिलाकर पात्रों में रक्खा हो, उसमें से कम-से-कम ६ मासाभर घृत वा अन्य मोहनभोगादि जो कुछ सामग्री हो, अधिक-से-अधिक छटांकभर की आहुति देवें, यही आहुति का परिमाण है।

३२ संस्कारविधिः उस घृत में से चमसा कि जिसमें छह मासा ही घृत आवे ऐसा बनाया हो, भरके नीचे लिखे मन्त्र से पाँच आहुति देनी— ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा॥ इदमग्नये जातवेदसे—इदन्न मम॥ ५॥ तत्पश्चात् अञ्जलि में जल लेके वेदी के पूर्व आदि दिशा और चारों ओर छिड़कावें। उसके ये मन्त्र हैं— ओम् अदितेऽनुमन्यस्व॥ इस मन्त्र से पूर्व। ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व॥ इससे पश्चिम। ओं सरस्वत्यनुमन्यस्व॥ इससे उत्तर और— ओं देव॑ सवितः प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व य॒ज्ञप॑तिं भगा॑य। दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॒त॒पूः केतं॑ नः पुनातु वा॒चस्पति॒र्वाचं॑ नः स्वदतु॥ —यजुः० अ० ३०। मं० १॥ इस मन्त्र से वेदी के चारों ओर जल छिड़कावें। इसके पश्चात् सामान्यहोमाहुति गर्भाधानादि प्रधान संस्कारों में अवश्य करें। इसमें मुख्य होम के आदि और अन्त में जो आहुति दी जाती हैं, उनमें से यज्ञकुण्ड के उत्तरभाग में जो एक आहुति, और यज्ञकुण्ड के दक्षिणभाग में दूसरी आहुति देनी होती है, उनका नाम “आघाराहुति” है और जो कुण्ड के मध्य में आहुतियाँ दी जाती हैं, उनका नाम “आज्यभागाहुति” है। सो घृतपात्र में से स्रुवा को भर अंगूठा, मध्यमा, अनामिका से स्रुवा को पकड़के— ओम् अग्नये स्वाहा॥ इदमग्नये—इदं न मम॥ - —इस मन्त्र से वेदी के उत्तरभाग अग्नि में। ओं सोमाय स्वाहा॥ इदं सोमाय—इदं न मम॥ —इस मन्त्र से वेदी के दक्षिणभाग में प्रज्वलित समिधा पर आहुति देनी। तत्पश्चात्—

सामान्यप्रकरणम् ३३ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदं न मम ॥ ओम् इन्द्राय स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय—इदं न मम ॥ इन दोनों मन्त्रों से वेदी के मध्य में दो आहुति देनी। उसके पश्चात् चार आहुति अर्थात् आधारावाज्यभागाहुति देके, जब प्रधानहोम अर्थात् जिस-जिस कर्म में जितना-जितना होम करना हो करके, पश्चात् भी पूर्णाहुति से पूर्व पूर्वोक्त चार (आधारावाज्यभागा०) देवें। पुनः शुद्ध किये हुए उसी घृत में से स्रुवा को भरके प्रज्वलित समिधाओं पर व्याहृति की चार आहुति देवें— ओं भूरग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदं न मम ॥ ओं भुवर्वायवे स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदं न मम ॥ ओं स्वरादित्याय स्वाहा ॥ इदमादित्याय—इदं न मम ॥ ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः स्वाहा ॥ इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः—इदं न मम ॥ ये चार घी की आहुति देकर, स्विष्टकृत् होमाहुति एक ही है, यह घृत की अथवा भात की देनी चाहिए। उसका मन्त्र— ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात् सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां समर्द्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्द्धय स्वाहा ॥ इदमग्नये स्विष्टकृते—इदं न मम ॥ इससे एक आहुति करके, प्राजापत्याहुति करें। यह नीचे लिखे मन्त्र को मन में बोलके देनी चाहिए— ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदं न मम ॥ इससे मौन करके एक आहुति देकर चार आज्याहुति घृत की देवें, परन्तु ये नीचे लिखी आहुति चौल, समावर्त्तन और विवाह में मुख्य हैं, वे चार मन्त्र ये हैं—

३४ संस्कारविधिः ओं भूर्भुव॒: स्व॑: । अग्न॒ आयू॑ंषि पवस॒ आ सु॒वोर्ज॒मिषं॑ च नः । आ॒रे बा॑धस्व दु॒च्छुनां॑ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये पवमानाय—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओं भूर्भुव॒: स्व॑: । अ॒ग्निरृषि॒: पव॑मान॒: पाञ्च॑जन्यः पु॒रोहि॑तः । तमी॑महे महा॒गयं॑ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये पवमानाय—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओं भूर्भुव॒: स्व॑: । अग्ने॒ पव॑स्व॒ स्वपा॑ अ॒स्मे वर्च॑: सु॒वीर्य॑म् । दध॑द्र॒यिं मयि॒ पोषं॑ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये पवमानाय—इदन्न मम ॥ ३ ॥ —ऋ० मं० ९ । सू० ६६ । मं० १९-२१ ॥ ओं भूर्भुव॒: स्व॑: । प्र॒जाप॑ते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव । यत्का॑मास्ते जु॒हुमस्तन्नो॑ अस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णां स्वाहा॑ ॥ इदं प्रजापतये—इदं न मम ॥ ४ ॥ —ऋ० मं० १० । सू० १२१ । मं० १० ॥ इनसे घृत की चार आहुति करके “अष्टाज्याहुति” निम्नलिखित मन्त्रों से सर्वत्र मङ्गल-कार्यों में आठ आहुति देवें, परन्तु किस-किस संस्कार में कहाँ-कहाँ देनी चाहिएँ, यह विशेष बात उस-उस संस्कार में लिखेंगे। वे आठ आहुति-मन्त्र ये हैं— ओं त्वं नो॑ अग्ने॒ वरु॑णस्य वि॒द्वान् दे॒वस्य॑ हेळोऽव॑ यासिसीष्ठाः । यजि॑ष्ठो वह्नि॑तमः शोशु॑चा॒नो विश्वा॒ द्वेषां॑सि प्र मु॑मु॒ग्ध्य॒स्मत् स्वाहा॑ ॥ इदमग्निवरुणाभ्याम्—इदं न मम ॥ १ ॥ ओं स त्वं नो॑ अग्नेऽव॒मो भ॑वो॒ती नेदि॑ष्ठो अ॒स्या उ॒षसो॑ व्यु॑ष्टौ । अव॑ यक्ष्व नो॒ वरु॑णं ररा॑णो वी॒हि मृ॑ळी॒कं सु॒हवो॑ न एधि॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्निवरुणाभ्याम्—इदं न मम ॥ २ ॥ —ऋ० मं० ४ । सू० १ । मं० ४, ५ ॥

सामान्यप्रकरणम् ३५ ओम् इ॒मं मे॑ वरुण श्रु॒धी हव॑म॒द्या च॑ मृळय। त्वाम॑व॒स्युराच॑के॒ स्वाहा॑॥ इदं वरुणाय—इदं न मम॥ ३॥ —ऋ० मं० १। सू० २५। मं० १९॥ ओं तत्त्वा॑ यामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान॒स्तदा शा॑स्ते॒ यज॑मानो ह॒विर्भि॑:। अहे॑ळमानो वरुणे॒ह बो॒ध्युरु॑शंस॒ मा न॒ आयु॒: प्र मौषी॒: स्वाहा॑॥ इदं वरुणाय—इदं न मम॥४॥ —ऋ० मं० १। सू० २४। मं० ११॥ ओं ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यः—इदं न मम॥५॥ ओम् अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमया असि। अया नो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भेषजꣳ स्वाहा॥ इदमग्नये अयसे—इदं न मम॥ ६ ॥ ओम् उदु॑त्त॒मं व॑रुण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मं श्र॑थाय। अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम॒ स्वाहा॑॥ इदं वरुणायाऽऽदित्यायाऽदितये च—इदं न मम॥७॥ —ऋ० मं० १। सू० २४। मं० १५॥ ओं भवत॑न्नः॒ सम॑नसौ॒ सचै॑तसावरे॒पसौ॑। मा य॒ज्ञꣳ हि॑ꣳसिष्टं मा य॒ज्ञप॑तिं जातवेदसौ शि॒वौ भ॑वत॒मद्य न॒: स्वाहा॑॥ इदं जातवेदोभ्याम्—इदं न मम॥८॥ —युजः० ५।३ सब संस्कारों में मधुर स्वर से मन्त्रोच्चारण यजमान ही करे। न शीघ्र न विलम्ब से उच्चारण करे, किन्तु मध्यभाग

३६ संस्कारविधिः जैसाकि जिस वेद का उच्चारण है, करे। यदि यजमान न पढ़ा हो, तो इतने मन्त्र तो अवश्य पढ़ लेवे। यदि कोई कार्यकर्त्ता जड़, मन्दमति, काला अक्षर भैंस बराबर जानता हो, तो वह शूद्र है, अर्थात् शूद्र मन्त्रोच्चारण में असमर्थ हो, तो पुरोहित और ऋत्विज् मन्त्रोच्चारण करें, और कर्म उसी मूढ़ यजमान के हाथ से करावें। पुनः निम्नलिखित मन्त्र से पूर्णाहुति करें। स्रुवा को घृत से भरके— ओं सर्वं वै पूर्णँᳵ स्वाहा ॥ इस मन्त्र से एक आहुति देवें। ऐसे दूसरी और तीसरी आहुति देके, जिसको दक्षिणा देनी हो देवें, वा जिसको जिमाना हो जिमा, दक्षिणा देके सबको विदाकर स्त्री-पुरुष हुतशेष घृत, भात वा मोहनभोग को प्रथम जीमके पश्चात् रुचिपूर्वक उत्तमान्न का भोजन करें। मङ्गलकार्य अर्थात् गर्भाधानादि संन्यास-संस्कार पर्यन्त पूर्वोक्त [कार्य] और निम्नलिखित सामवेदोक्त महावामदेव्यगान अवश्य करें। वे मन्त्र ये हैं— १ २उ ३क २२ १ २ ३ १ २२ ३ २ ३ १ २ ३ १ २ ओं भूर्भुवः स्वः। कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा। २ ३ १ २ ३ २ कया शचिष्ठया वृता ॥ १ ॥ १ २उ ३क २२ १ २ ३ १ २२ ३ १ २ ३ १ २ ओं भूर्भुवः स्वः। कस्त्वो सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः। ३ १ २ ३ २ ३ १ २ दृढा चिदारुजे वसु ॥ २ ॥ १ २उ ३क २२ ३ २उ ३ १ २ ३ १ २ ३ २ ओं भूर्भुवः स्वः। अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्। ३ १ १ ३ १ २ शतं भवास्यूतये ॥ ३ ॥

सामान्यप्रकरणम् ३७ महावामदेव्यम् क॑ाऽ५या । नश्चा४३ यित्रा२३ आभुवा४त् ५। ऊ१ । ती स२दा१वृ२धः स१। खा। औ२३ हो२हा२यि। कया२३ शचायि१। ष्ठयौ३हो२३। हुँम१ा५२। वाऽ२र्तॊ३ऽ५हा२यि ॥ (१)॥ क१ाऽ५स्त्व२ाँ। सत्यो४३मा२३दा४ना५म्। मा१। हिष्ठो३मा२त्सा१दन्ध२। सा। औ२३हो२हा२यि। दृढा२३ चिदा१। रुजौ३हो२३। हुँम१ा५२। वा१ऽ२सो२३ऽ५हा२यि ॥ (२)॥ आ३ऽ५भी१। षुणाँ४३ः स२ा३खीना४म् ५। आ१। वि२ता जरा१यि तृ२। णाँ१म्। औ२२३ हो२ हायि२। शंता२३म्२भवा। सियौ३हो२३ हुँम१ा५२। ता१ऽ२ यो२३ऽ५हा२यि ॥ (३)॥ —साम० उत्तरार्चिके। अध्याये १। खं० ४। मं० १, २, ३॥ यह [महा] वामदेव्यगान होने के पश्चात् गृहस्थ स्त्रीपुरुष, कार्यकर्त्ता सद्धर्मी, लोकप्रिय, परोपकारी, सज्जन, विद्वान् वा त्यागी, पक्षपातरहित संन्यासी, जो सदा विद्या की वृद्धि और सबके कल्याणार्थ वर्त्तनेवाले हों उनको नमस्कार, आसन, अन्न, जल, वस्त्र, पात्र, धन आदि के दान से उत्तम प्रकार से यथासामर्थ्य सत्कार करें। पश्चात् जो कोई देखने ही के लिए आये हों, उनको भी सत्कारपूर्वक विदा कर दें। अथवा जो संस्कार-क्रिया को देखना चाहें, वे पृथक्- पृथक् मौन करके बैठे रहें, कोई बातचीत हल्ला-गुल्ला न करने पावें। सब लोग ध्यानावस्थित प्रसन्नवदन रहें। विशेष कर्मकर्त्ता और कर्म करानेवाले शान्ति, धीरज और विचारपूर्वक क्रम से कर्म करें और करावें। यह सामान्यविधि अर्थात् सब संस्कारों में कर्त्तव्य है॥ ॥ इति सामान्यप्रकरणम्॥

अथ गर्भाधानविधिं वक्ष्यामः निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। —मनुस्मृति-द्वितीयाध्याये, श्लोकः १६ ॥ अर्थ—मनुष्यों के शरीर और आत्मा के उत्तम होने के लिए निषेक अर्थात् गर्भाधान से लेके श्मशानान्त अर्थात् अन्त्येष्टि=मृत्यु के पश्चात् मृतक शरीर का विधिपूर्वक दाह करने पर्यन्त १६ संस्कार होते हैं। शरीर का आरम्भ गर्भाधान और शरीर का अन्त भस्म कर देने तक सोलह प्रकार के उत्तम संस्कार करने होते हैं। उनमें से प्रथम गर्भाधान-संस्कार है। गर्भाधान उसको कहते हैं कि जो "गर्भस्याऽऽधानं वीर्यस्थापनं स्थिरीकरणं यस्मिन् येन वा कर्मणा, तद् गर्भाधानम्" गर्भ का धारण, अर्थात् वीर्य का स्थापन गर्भाशय में स्थिर करना जिससे होता है। जैसे बीज और क्षेत्र के उत्तम होने से अन्नादि पदार्थ भी उत्तम होते हैं, वैसे उत्तम, बलवान् स्त्री-पुरुषों से [उत्पन्न] सन्तान भी उत्तम होते हैं। इससे पूर्ण युवावस्था [पर्यन्त] यथावत् ब्रह्मचर्य का पालन और विद्याभ्यास करके, अर्थात् न्यून-से- न्यून १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का पुरुष अवश्य हो और इससे अधिक वयवाले होने से अधिक उत्तमता होती है, क्योंकि बिना सोलहवें वर्ष के गर्भाशय में बालक के शरीर को यथावत् बढ़ने के लिए अवकाश और गर्भ के धारण-पोषण का सामर्थ्य कभी नहीं होता और २५ वर्ष के बिना पुरुष का वीर्य भी उत्तम नहीं होता। इसमें यह प्रमाण है—

गर्भाधानप्रकरणम् ३९ पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे । समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात्कुशलो भिषक् ॥ १ ॥ —सुश्रुते सूत्रस्थाने, अ० ३५ । १० ॥ ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् । यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥ २ ॥ जातो वा न चिरं जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः । तस्मादत्यन्तबालायां गर्भाधानं न कारयेत् ॥ ३ ॥ —सुश्रुते सूत्रस्थाने, अ० १० । ४७-४८ ॥ ये सुश्रुत के श्लोक हैं। शरीर की उन्नति वा अवनति का विधि जैसा वैद्यकशास्त्र में है, वैसा अन्यत्र नहीं। जो उसका मूल विधान है, वह आगे वेदारम्भ में लिखा जाएगा, अर्थात् किस-किस वर्ष में कौन-कौन धातु किस-किस प्रकार का कच्चा वा पक्का, वृद्धि वा क्षय को प्राप्त होता है, यह सब वैद्यकशास्त्र में विधान है, इसलिए गर्भाधानादि संस्कारों के करने में वैद्यकशास्त्र का आश्रय विशेष लेना चाहिए। अब देखिए सुश्रुतकार परम वैद्य कि जिनका प्रमाण सब विद्वान् लोग मानते हैं, वे विवाह और गर्भाधान का समय न्यून- से-न्यून १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का पुरुष अवश्य होवे, यह लिखते हैं। जितना सामर्थ्य २५वें वर्ष में पुरुष के शरीर में होता है, उतना ही सामर्थ्य १६वें वर्ष में कन्या के शरीर में हो जाता है। इसलिए वैद्य लोग पूर्वोक्त अवस्था में दोनों को समवीर्य अर्थात् तुल्य सामर्थ्यवाले जानें ॥ १ ॥ सोलह वर्ष से न्यून अवस्था की स्त्री में २५ वर्ष से कम अवस्था का पुरुष यदि गर्भाधान करता है, तो वह गर्भ उदर में ही बिगड़ जाता है ॥ २ ॥