संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
गर्भाशयके रोग ।
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११. गर्भाशयके मुखका बन्द हो जाना ।
इसके अनेक कारण हैं ।
१. गर्भाशयके मुखपर चोट लगनेसे उसमें सूजन आ जाती है । इस कारण दोनों किनारे चिपट जाते हैं और सूजन हलकी पड़ कर मुख मोटा पड़ जाता है तथा चिपका रहता है ।
२. गर्भाशयके मुखके दोनों किनारोंमें सवाद पड़कर आपसमें चिपट जानेसे ।
३. गर्भाशयके मुखपर चोट लगनेसे, जब कि सूजन आ जाने पेसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. पेड़का भारीपन और उसमें पीड़ा ।
२. हाथ, पाँच, पीठ और साथैलामें दर्द ।
३. गर्भाशयमें सफेद, चिकना और बहनेवाला पदार्थ भरा रहता जब कि गर्भाशयका मुख जन्मसे बन्द न हो ।
गर्भाशयका मुख दो प्रकारसे बन्द होता है । एक तो वह कि जो जन्मसे ही बन्द हो, दूसरा वह जो किसी रोग के होनेसे बन्द हो । जब रोगसे बन्द होता है तब गर्भाशयके मुखके आगे एक परदासा पड़ जाता है । पेसी दशामें रज नहीं निकलता ज्यों ज्यों रोग बढ़ता जाता है, कष्ट भी उसीके साथ बढ़ता जाता है । अधिक रज इकट्ठा हो जानेपर जरा जरासा गिरता है ।
१२. गर्भाशयका अर्बुद ।
इसके कई कारण हैं ।
१. जन्महीसे होना ।
२. जिस जगहसे गर्भाशय मुड़ जाना है वहाँ दवाब पड़नेके कारण पोषण न होनेसे ।
सन्तति-शास्त्र ।
- ३. संकामक रोगोंके संसर्गसे ।
- १. ऐसी दशामें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
- १. योनिसे दुर्गंधका आना ।
- २. एक प्रकारका गाढा पानी निकलना ।
- ३. पेड़के सामने अत्यन्त कठिन पीडा ।
- ४. कै और प्रायः दस्तोंका आना ।
- ५. घावके कारण समागममें पीडा होना ।
- ६. समयपर रजस्वला न होना ।
- ७. गर्भाशयके आगेका मुख सिक्कुड जाना ।
- ८. गर्भाशय और योनिमें दर्द, शोथ और दाहका होना ।
- ९. कभी कभी एक चारगी रज-स्त्राव हो जाना ।
- १०. घावमें खुजलाहट मालूम होना ।
- ११. मन्दाग्नि हो जाना और पेटका अफार ।
- १२. रज कम निकलना ।
- १३. रजका अत्यन्त पीडासे निकलना ।
- १४. रजका गर्भाशयमें जम जाना और कञ्जियत ।
- १५. गर्भाशयका दग्ध हो जाना ।
- १६. सूत्र बन्द हो जाना, या बूंद बूंद गिरना ।
- १७. गर्भाशय और उसके आस पास शोथ होना ।
- १८. जाँघ, पेड़, रीढ़, कमर, नाभी तंत्रों और सरमें दर्द होना ।
- १९. अण्ड और रजवाही नलियोंमें शोथ ।
- २०. गर्भाशयका नीचे उतर आना ।
- २१. पेटपर सूजन हो जाना ।
यह रोग पहले पहल गर्भाशयके मुखपर होता है, और बढ़ते तेबढ आस पास फैल जाता है । घाव जब फैलता है, तो
गर्भाशयके रोग ।
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गर्भाशयका कुछ भाग सड़ जाता है । जब रोग बढ़ जाता है, तो स्त्री बन्ध्या हो जाती है ।
१३. गर्भाशयमें दाने पड़ जाना ।
इसके कई कारण हैं ।
१. रक्त-विकारसे ।
२. रज अशूद्ध होनेसे ।
३. बच्चा पैदा होते समयमें गन्धगी पहुँचनेसे ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. पेट्टु दवानेसे दर्द होना ।
२. कभी रक्त और कभी मवाद मिले हुए रक्तका निकलना ।
३. रक्तमें बदबू आना ।
इस रोगमें गर्भाशयकी श्रीवापर छोटे छोटे दाने पड़ जाते हैं और एक दूसरे सम्बन्धसे बढ़ते जाते हैं ।
१४. गर्भाशयके धाव ।
ये दो प्रकारके होते हैं । ( १ ) बाहरी और ( २ ) भीतरी ।
१. बाहरी धाव—इसके अनेक कारण हैं ।
१. गर्भाशयमें बाहरसे चोट लगनेपर ।
२. रज और फिल्लीके फट जानेपर ।
३. गर्भाशयमें धमक पहुँचनेपर ।
२. गर्भाशयके भीतरी धाव—इसके अनेक कारण हैं ।
१. मरे हुए बालकके खोंचनेमें रंगड़ लगने या चोट लगनेसे ।
२. रज वा किसी फिल्लीके फट जानेसे ।
३. जनन समयमें दर्दकी अधिकतासे ।
४. गर्भाशयमें सूजन और फुसियोंके उत्पन्न होनेसे ।
५. बच्चा कठिनाईसे पैदा होना ।
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सन्तति-शास्त्र ।
६. बच्चा पैदा होनेपर फिल्लीके खाँचनेकी असावधानीसे ।
७. गर्भाशयमें गंदगी आ जानेसे ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. हर समय दर्द व जलनका रहना और मैथुनम कष्ट ।
२. यदि मवाद जलनके साथ आवे, तो जानना चाहिये कि घाव शुद्ध होकर छूट रहा है ।
३. यदि खून और मवाद आवे तो जानना चाहिये कि कोई रग फट गई है ।
४. यदि गाड़ी पदार्थ निकले, तो जानना चाहिये कि सजन समयके पहले ही फट गई है ।
५. यदि काला चट्कुदार रक्त आवे और मवाद न पड़ी हो और दर्द हो, तो जानना चाहिये कि मांस गल रहा है ।
६. यदि मांस पतला और जलजुक्त निकल रहा हो, तो जानना चाहिये कि घाव सड़ गया है और मांस गल रहा है ।
१५. गर्भाशयकी रसौली ।
इसका कारण ।
एकमात्र रजोधर्मका विवाद और प्रदर है ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१ जब यह रसौली भीतरको बढ़ती है, तब गर्भाशय बढ़ता है ।
२ जब यह रसौली गर्भाशयके बाहरके भागमें बढ़ती है, तो गर्भाशय नहीं बढ़ता, किंतु दवाव पढ़नेसे सूख जाता है ।
३. ज्यों ज्यों रसौली बढ़ती जाती है रजोधर्ममें रुकावट पड़ती जाती है ।
४. जांघ कमर और रीढ़में दर्द होता है ।
गर्भाशयके रोग ।
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५. पेड़ में घोंफ सरीखा जान पड़ता है और जी मचला ता है ।
६. भोजन नहीं पचता ।
यह रसौली गर्भाशय में होती है और रस से भरी रहती है यह गर्भाशय की परत के भीतरी हिस्से में बढ़ती है और कभी अगले हिस्से में भी सुपारी से लेकर नारियल के आकार तक देखी गई है । यह एक से अधिक भी होती है । प्रारम्भ में कुछ जान नहीं पड़ता—परन्तु विकार उत्पन्न होते ही रजो धर्म में खराबी आ जाती है । ज्यों ज्यों यह बढ़ती है आस पास के गर्भस्थानों पर दबाव पड़ता है । इसमें गर्भ नहीं रहता यदि रोग के प्रारम्भ होते समय में गर्भ रह जाय, तो पात हो जाता है । प्रारम्भ में रजचिकार का मामूली रोग सम्भकर बहुत कम ध्यान दिया जाता है ।
१६. गर्भाशयका नासूर ।
१. पुराने जखम से नासूर हो जाता है । जब गर्भाशय में फुन्सी बगीरह हो जाय और वह पके या फूटकर अथवा चहा करे, तो उसको नासूर कहते हैं । इस में से पतली मवाद या पानी सा निकला करता है । दर्द रहता है और खाज मालूम होती है ।
१७. गर्भाशयका टेढ़ा हो जाना ।
यह आगे और पीछे से टेढ़ा होता है ।
इसके कई कारण हैं ।
१. जब मूत्राशय खाली है, तो पाखाना जाते समय अधिक जोर पड़ने से ।
२. तीक्ष्ण मरोड़े होने और बन्धनों के ढीले पड़ जानेसे ।
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सन्तति-शास्त्र ।
३ ठोकर लगकर आँधे गिर पड़ने से ।
जब ऐसा होता है, तो अनेक लक्षण प्रकट होने हैं ।
१ आगे को बोफ और गर्भश्राद्ध तथा नली में शोय ।
२ ऋतुवर्ष में रक्तावट और कष्ट से नाव होता है ।
३ मुखाशय पर दवाव पड़ता है ।
४ सूत्र प्रायः एक एक एक वृद्ध आता है ।
५ पेट्टू के सामने उर्द्ध होता है ।
जब यह रोग होता है, तो स्त्री बन्ध्या हो जाती है और गर्भाशय का मुख कुछ छोटा पड़ जाता है । यह जन्म से भी होता है । ऐसी दुशा में गर्भाशय का मुख चपटा और संकुचित होता है ।
६ गर्भाशयका पीछेमें देहा होना—इसके कई कारण हैं ।
१ मरण बालक पैदा होने पर मिल्ली के विच जाने से ।
२ नितर्वा के बल विच गिर पड़ने से ।
३ भारी बोफ उठाने से ।
४ गर्भाशय के बन्धनों के ढीले पड़ जाने से ।
जब ऐसा होता है तो अनेक लक्षण प्रकट होने हैं ।
१ पेट्टू और नितर्वा के बीच में उर्द्ध होना ।
२ पीठ में उर्द्ध और जाड़ा लगकर रोमांच हो जाना ।
३ गर्भाशय से लुवावदार पदार्थ बहना ।
४ एक एक वृद्ध सूत्र गिरना ।
५ कन्च और गर्भाशय के आस पास के म्यालों में सुजन जाना ।
६ पेट के अन्दर दूसरे म्यालों में रक्त इकट्ठा होना ।
७ चलने के समय जाँच, पेट्टू, कमर और नाभी में उर्द्ध होना ।
८ गरीर में भड़कन और उर्द्ध होना ।
९ गर्भश्राद्ध और नली में शोय होना ।
गर्भाशयके रोग ।
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जब यह रोग होता है, तो गर्भ रह जाता है; परन्तु गिर जानेका भी भय रहता है। जब वरावर गर्भ-पात हो जाता हो, तो इस रोगका होना बहुत सम्भव है। इसका जन्मसे ही पीछेसे देढ़ा होना स्त्रीको अवश्य वन्ध्या कर देता है।
१८. गर्भाशयका टल जाना—
यह चार प्रकारसे टलता है। (१) आगे (२) पीछे (३) दहिने और (४) बाएँ।
१. गर्भाशयका आगे टलना—इसके अनेक कारण हैं—
१ गर्भाशय पर पीछे से किसीप्रकार का दबाव पड़नेसे।
२ औंधे झुँह गिर पड़ने से।
३ मैथुन की असावधानी से।
४ गर्भाशय के वन्धनोंके ढीलेपड़ जाने से।
५ रजविकार के अनेक उपद्रवों से।
ऐसी दशा में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं।
१ सूत्राशय पर दबाव के कारण वाधा पहुँचता।
२ सूत्र का एक एक वृद्ध निकलना।
३ पेंड्रूके सामने दर्द और बोभ जान पड़ना।
४ रजका ठीक तीरसे न निकलना।
५ रजका अत्यन्त कष्ट के साथ निकलना।
६ गर्भाशय में रज इकट्ठा हो जाना।
गर्भाशय के मुखका छोटा हो जाना।
जब यह रोग होता है तो स्त्री वन्ध्या हो जाती है। गर्भाशय का मुख छोटा पड़ जाता है। बहुत सी स्त्रियों में जन्मसे ही गर्भाशय आगे को टला हुआ रहता है।
२. गर्भाशयका पीछेकी ओर टलना—इसके कई कारण हैं।
१. मैथुन के समय की असावधानी से।
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सन्तति-शास्त्र ।
- २. नितर्वां के बल चित्त गिर पड़ने से ।
- ३. भारी बोभ उठाने से ।
- ४. गर्भाशय के बन्धनों के ढीले पड़ जाने से ।
- ५. किसी प्रकार की चोट कि जिसमें आगे से धक्का लगे । ऐसी दशा में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
- ६. मूत्रमार्ग में जलन होना ।
- २ मूत्र का टपक टपक कर निकलना ।
- ३ मलाशय पर बोभ सा मालूम होना ।
- ४ पेट्टू और नितर्वां के बीच में दर्द ।
- ५ पीठ और रीढ़ में दर्द का होना ।
- ६ कञ्ज और गर्भाशय के आस पास सूजन ।
- ७ रज में रुकावट और जलन ।
जब यह रोग होता है, तो स्त्रीके गर्भ रहता अवश्य है, परन्तु प्रायः उसका पात हो जाता है । बराबर गर्भपात होनेसे इस रोगकी संभावना होती है । जब जन्मसे ही यह रोग हो, तो स्त्री अवश्य बन्ध्या होती है ।
३—४. दहिने और बाएँ गर्भाशयका टलना—
इसके कई कारण हैं ।
१ मैथुन की असावधानी ।
२ दहिने बल गिरने से बाईं और बाएँ बल गिरने से दहिनी और दल जाता है ।
३ भारी बोभ उठाने से । जिस और बोभ पड़ जावे उस और का गर्भाशय दल जाता है यदि दहिने और पड़े, तो बाईं और दल जायगा और यदि बाईं और पड़े तो दहिनी और दल जायगा ।
४ यदि दहिनी बन्धन ढीला पड़ गया है, तो बाईं और
गर्भाशयके रोग ।
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और यदि बायाँ वन्धन डीला पड़े गया है तो दहिने ओर दल जायगा ।
५-दहिनी ओर चोट लगनेसे बाईं ओर और बाईं ओर चोट लगनेसे दहिनी ओर दल जाता है ।
जब ऐसा होता है, तो अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. गर्भाशय चाहे जिस ओर दले, दोनों ओर के गर्भ-श्रएड और फलवाहिनी नलौमें खिंचाव और तनावके कारण सूजन होगी ।
२. रजका समयपर ठीक ठीक न निकलना ।
३. जिस ओर गर्भाशय दला हो उस ओर कुछ भारीपन मालूम होना ।
यह भी दो प्रकारसे होता है । जब यह रोग जन्मसे होता है, तो स्त्री वन्ध्या होती है । ऐसी दसामें गर्भ रह जाता है, परन्तु पात होने का भय रहता है । अतएव ऐसे रोगोंमें उचित उपचार करना चाहिये ।
१६. गर्भाशयका उलट जाना ।
१. गर्भाशयके वन्धनोंके अत्यन्त ढीले पड़ जानेसे ।
२. अत्यन्त निर्बलता और गर्भाशयमें एकदम किसीप्रकारकी चोटसे ।
३. अपने स्थानसे दलते समयके गर्भाशयकी भटकसे । इसके अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. स्त्रीके हृदयपर कठिन आघात पहुँचता है ।
२. स्त्री एक दम बेहोश हो जाती है ।
३. हाथ पैर ठंडे पड़ जाते हैं और कै होने लगती है ।
४. योनिसे रक्त निकलता है । निर्बलोंमें कम और बलवती स्त्रियोंमें अधिक ।
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सन्तति-शास्त्र ।
५. पेड़ और पीठमें कठिन पीड़ा होती है ।
६. धीरे धीरे नाड़ीकी चाल कम पड़ती जाती है ।
यह बड़ा ही भयंकर रोग है । कुशल इतनी ही है कि यह रोग आम तौरसे नहीं होता । इस रोगमें गर्भाशय इस प्रकार उलट जाता है कि उसका रूप ही बदल जाता है । नीचेका भाग ऊपर और ऊपरका नीचे हो जाता है । इसका कोई समय नहीं है । बच्चा पेटमें आनेके पहले गर्भ-समयमें और बच्चा पैदा हो जानेके बाद भी उलटता है । उस समय इसकी तीन दशाएँ होती हैं ।
१. पैंदेका भीतरकी ओर दक्कड़ घुसना और वहाँ गड़्दा पड़ जाना ।
२. दवे हुए पैंदेके भागका मुखमें आ जाना या पैंदेका मुखकी ओर गहरा घुस जाना ।
३. गर्भाशयका उलट जाना ।
जब पेसी दशा होती है, तो बड़ी कठिनाई पड़ती है । यदि शीघ्र यत्न न किया जाय तो अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं; खासकर गर्भावस्थामें बहुत बड़ी कठिनाई होती है ।
२०. गर्भाशयके मुखका अधिक खुल जाना ।
१. जन्मसे ही अधिक खुला रहना ।
२. निर्बलता और वन्यनाके ढीले पड़ जानेसे ।
३. श्रुतिमंथन और गर्भाशयके मुखपर पेसी दवा लगाने से कि जिससे जलन इत्यादि हो ।
४. गिर पड़ने या पेट मसलने इत्यादिसे ।
५. गर्भाशयका मुख किसी यंत्रके द्वारा फैलानेसे जब कि वह पुनः सिकुड़ न सके ।
गर्भाशयके रोग।
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६. बच्चा जनते समयकी असावधानी से, जब कि फेले मुखका संकोचन न हो और वह वैसा ही रह जाय। इस में अनेक लक्षण प्रकट हो जाते हैं।
१. हर समय पानी सरीखा कुछ बहा करता है।
२. कभी कभी रक्त भी आ जाता है।
३. रजोधर्मके समय में कुछ पीड़ा पेड़ के सामने होती है।
४. उठने बैठने और चलने फिरने में कष्ट होता है।
यह दशा अच्छी नहीं है, इसमें गर्भ नहीं रहता। यदि गर्भ के समय में पेशा हो तो वह गिर जाता है।
२१. गर्भाशयके मस्से।
इसमें अनेक कारण होते हैं।
१. रज-विकार से।
२. अति मैथुन प्रिय और आरामतलव होने से।
३. अधिक बैठने और वादी पदार्थों के खाने से।
४. बार बार गर्भ गिर जाने से।
५. रक्त विकार के अनेक कारणों से।
इस रोग में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं।
१. रजका अपने समयपर और ठीक तौरसे न निकलना।
२. आगे कुछ थोड़ा-सा बोझ जान पड़ना जब कि मस्सा बड़ा होजावे।
३. पेड़के सामने दर्द का होना।
४. ऋतुधर्म के समय को छोड़कर और समय में भी रक्त निकलना।
जब यह रोग होता है तो मस्से दो जगह होते हैं। गर्भाशयके भीतर और गरदन पर। बढ़ने पर बाहर के मस्से कुछ
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सन्तति-ग्रन्थ ।
कुछ दिखलायी पढ़ते हैं और बहुत बढ़ने पर आगे तक योनि में लटक आते हैं। ऐसे मस्से भरते और फूटते हैं। उस समय बड़ी पीड़ा होती है। यह छोटे से छोटा चनेके बराबर और बड़े से बड़ा छोटे अमरुद के बराबर होता है। दूसरे तरफ का मस्सा जिल्द से चिपटा रहता है। इसमें रक्त भरा रहता है। कभी एक ही मस्सा होता है, और कभी कई देखे जाने हैं। काले रंग की स्त्रियाँ में यह रोग अधिक होता है। जिनका गर्भ बार बार गिर जाया करता है, उनमें इस रोग की शंका अवश्य होती है। यह रोग प्रायः चालीस वर्ष की अवस्था के लग भग होता है। इसमें स्त्री बन्ध्या हो जाती है।
२२. गर्भाशयका दग्ध हो जाना ।
इसके कई कारण हैं ।
१ थोड़ी अवस्था में बड़ी अवस्थावाले पूरे ज्वान पुरुष से संयोग करने पर ।
२ गर्भाशय में संक्रामक रोगों का असर पहुंचने में । इस रोग में अनेक लक्षण प्रकट होने हैं ।
१ द्वाव पड़ने के कारण नर्सों का फट जाना ।
२ मासिक धर्म के समय रक्त अधिक निकलना ।
३ अतुष्टधर्म के समय के अनिरक्त और समर्यों में भी रक्त निकलना या आठ दिनदितक बराबर ज्वर का होना ।
ऐसे रोग में द्वाव के कारण नालियों के फट जाने में प्रायः रक्त निकला करता है और ऐसी स्थिति में गर्भ नहीं उतरता ।
२३. गर्भाशयमें रक्तका जमकर भस्त्र जाना ।
इसके कई कारण हैं ।
१. गर्भाशय में टंडक का पहुंचना और मुख में रक्तावृत होना ।
गर्भाशयके रोग ।
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२. गर्भाशयसे रज न निकलना ।
इस रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. रजका देरमें और थोड़ा निकलना ।
२. पैहूके सामने उभार और दर्द होना ।
३. अचानक सरदी लगकर शरीरमें ज्वरका प्रकोप हो जाना ।
४. भोजनमें अरुचि, कैं और जी मचलाना ।
यह रोग उस दशामें होता है जब कि मुख संकुचित होनेके कारण गर्भाशयसे रज न निकले । ऐसी दशामें रज गर्भाशयमें जमकर सूख जाता है ।
२४. गर्भाशयमें वीर्य न ठहरना ।
इसके ये कारण हैं ।
१. गर्भाशयमें ऐसे चिकने पदार्थका फैल जाना कि जिससे वीर्य न ठहर सके या गर्भाशय ट्रेढ़ा पड़ गया हो ।
२. हर समय एक प्रकारकी लुवाबदार वस्तुका बहा करना ।
इस दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. गर्भाशयमें कुछ भारीपन मालूम होना ।
२. कभी कभी कुछ थोड़ासा दर्द होना ।
यह रोग उस समय होता है जब कि चर्बी बढ़ जाय, जिसके कारण गर्भाशयमें चिकनापन अधिक आ जाय । ऐसी दशामें वीर्य बाहर निकल आता है । गर्भ धारण नहीं होता ।
२५. गर्भाशयमें मांसका बढ़ जाना ।
इसको हफ्म लोग 'औराने रहम' कहते हैं । कारण ये हैं ।
१. रजका गिलाड़ और उसमें भारी तब्दीली ।
२. गर्भाशयके दूसरे रोगोंके संबन्धसे ।
इस दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
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सन्तति-शास्त्र ।
१. कमरमें दर्द और चक्कीसी चलना ।
२. पेड़में पीड़ा और भारीपन मालूम होना ।
३. रजका कम निकलना और उसमें कुछ बदबूका आना ।
यह दशा भयानक होती है । जब ऐसा होता है, तो सबसे पहले स्त्रियोंको मोटे होनेका सन्देह होता है । ज्यों ज्यों रोग बढ़ता जाता है, दशा विगड़ती जाती है ।
२६. गर्भाशयमें कीड़ोंका पैदा हो जाना ।
इसको हकीम लोग 'सरत्तान रहम' कहते हैं । इसके कई कारण हैं ।
१. रज दूषित होनेसे ।
२. किसी प्रकारकी छूत पहुँचनेसे ।
३. गर्भाशयमें कोई जगह पक जानेसे और उसमें छूत या किसी प्रकारकी गन्दगी पहुँचनेसे ।
४. गरमी और सूजाकके अनेक विकारोंसे ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. बदबूदार पतला और रंगीन स्त्राव होना ।
२. पेड़में दर्द और अन्दर खुजली ।
३. पिड़लियोंमें दर्द और रीढ़में पीड़ा होना ।
४. रज अधिक निकलना और उसमें बदबू आना ।
यह दशा भयानक होती है, इसमें गर्भाशयको बड़ी हानी उठानी पड़ती है ।
इस प्रकार गर्भाशयके अनेक रोगोंसे स्त्रियाँ पीड़ित रहती हैं । इनमें सबसे बड़ा कारण रजो-धर्मका विगाड़ और स्त्री पुरुषकी असावधानी है । रोग उत्पन्न होते ही उपचार करना आवश्यक है ।
10. रजो-धर्म और संयोग-शक्ति
रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
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(१०) रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
निरोग स्त्रियों में नियम के अनुसार रज हर महीने अरुंडोत्पादक कोष से होकर जलोत्पादक कोष में पहुंचता है और अरुंडाधार से बाहर होकर डिम्बकोष से गर्भाशय में आता है। ऐसे समय में गर्भाशय की भिल्ली मोटी पड़जाती है। इसकी धमनियों में खून अधिक जम जाता है। बलगमी या श्लैष्मिक गांठे (Mucous glands) बढ़जाती हैं। पतली धमनियों (Capillaries) और पतले सिरों से खून निकलने के कारण कहीं कहीं धमनियों फट जाती हैं। बलगम अधिक बनने लगता है और खून के साथ बाहर आता है। इसी को रजोधर्म कहते हैं। इस विषय में लोगों ने यही मान लिया है कि कन्यायें गरम देशों में गरमी के कारण जल्द और सर्द देशों में सर्दी के कारण देरसे रजस्वला होती हैं, परन्तु यह सिर्फ मान ही लेने की बात है। किसी भी देश की कन्याओं को देखिए, उनके रजस्वला होने का समय एक न मिलेगा। देशको जाने दीजिये एकही शहर को लीजिये जहाँ की सरदी गरमी वहाँ की रहने वाली कन्याओं को बराबर मिलती है वहाँ भी कन्याएँ एक समय में रजस्वला नहीं होतीं सर्द या गरम देशको किसी घर में एक ही माता पिता की दो कन्याओं को—जिनका पालन एक ही ढंग पर हुआ है—देखिए वे भी एक समय में रजवती नहीं होतीं इस से स्पष्ट है कि रजस्वला होने का समय देश की गरमी और सरदी पर निर्भर नहीं है ॥
जगत् प्रसिद्ध डाक्टर हालिक (Halliek) की राय है कि संसार की सब जातियों में कन्याएँ लगभग एक ही उमर में रजस्वला होती हैं यदि आफिका जैसे गरम देशकी
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सन्तति-शास्त्र ।
हवसी लड़की और यूरोप जैसे सर्व देशकी गोरी लड़की एक ही ढंग से परवरिश पावें, तो दोनों एक ही साथ ऋतुमती होंगी ।
(The origin of life )
डाक्टर रावर्टसन कहते हैं कि भारत और इङ्ग्लैंड दोनों जगह नौ नौ वर्ष की लड़कियाँ रजस्वला हुआ करती हैं या हो सकती हैं ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
डाक्टर हटक्रिन्स कहते हैं कि दो गोरी लड़कियाँ इतनी जल्दी रजस्वला हुईं कि वे ग्यारह वर्ष सात मास की आयु में माताएँ बन सकती थीं ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
टेलर साहबका कहना कि किसी भी देश में नौ वर्षकी लड़कियाँ गर्भवती हो सकती हैं, अर्थात् ऐसा हो जाना असम्भव नहीं है ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
एक बार इङ्ग्लैंड के मॅचेस्टर लाईगन अस्पताल में २४० लड़कियों की परीक्षा ली गई तो उनमें १० ग्यारह वर्ष की, १६ बारह वर्ष की, ५३ तेरह वर्ष की, ८५ चौदह वर्ष की, ६७ पन्द्रह वर्ष की और ७६ सोलह वर्ष की उम्र में रजस्वला हुईं ।
(Dr Fayer Calcutta European Female Orphan Asylum
इन बातों से पता चलता है कि सर्वत्र करीब २ एकही बात है । हमारे देशके लिये ऋषियों का मत है कि बारह वर्ष की अवस्था के पीछे रजोधर्म प्रारम्भ होता है और बुढ़ापे से शरीर निर्बल होने पर पचास वर्ष की अवस्था तक रहता है ।
( सु० श० ५० ३ श्लो० १० )
अब विचारणीय विषय यह है कि क्या कारण है कि हमारे देशमें कन्याएँ इस समय के पहले ही रजस्वला होजाती हैं ?
रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
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इस विषयमें माताओंका बहुत बड़ा दोष है। उनको इसका कुछ भी विचार नहीं है। कैसी शर्मकी बात है कि मूर्ख, निर्लज्ज और शौकके पंजेमें फँसी हुई स्त्रियाँ किसी बातका विचार न करती हुई बुरी संगत और बुरे कामोंसे कन्याओंको जल्दी सयानी बना लेती हैं। कन्याओंको सयानी बनानेके लिये ये बातें कारणभूत होती हैं—प्रेमकी बातें, मनमाना भोजन, दिल-चाहा शृंगार, हँसी-मजाककी बातें, वेहदे गाने, पेशाशीके वृत्तांत-से भरी हुई पुस्तकें, स्त्री और पुरुषोंकी परस्पर बात-चीतके रसभरे किस्से, शौकका सामान और निर्लज्ज स्त्रियोंका साथ। यही कारण है कि आजकल शहरोंमें कन्याएँ दस वर्षकी अवस्थामें रजवती होकर बारहवें वर्षमें पूर्ण युवतियाँ बन जाती हैं और उनके शरीरमें सारी बातें जवान स्त्रियोंकी सी देखनेमें आती हैं। यह तो भले घरानेकी अच्छे भले मानस और पद्वें रहनेवाली धनाढ्य स्त्रियोंकी दशा है, साधारण दशावाली स्त्रियाँ, जो पद्वीनशीन नहीं हैं, और भी बुरी दशामें होती हैं। बाजारू कन्याएँ (रिटियोंके यहाँ) तो इससे भी कहीं ज्यादा बुरी तरकीबोंसे जवान बनाई जाती हैं। उन दशाओंको याद करते हुए यही कहना पड़ता है कि हे भगवन् क्या होगा। यही कारण है कि देहातोंकी अपेक्षा शहरोंमें कन्याएँ बहुत जल्द रजवती हो जाती हैं, क्योंकि कन्याओंके कोमल चित्तको विगाड़कर जवानीकी गर्मी पैदा करनेके लिये शहरोंमें बहुत बड़े बड़े सामान प्रस्तुत रहते हैं।
जो लोग रजस्वला होनेका समय देशकी गरमी और सरदी पर निर्भर मानते हैं वे बङ्गाल देशका प्रमाण देते हैं। वहाँ गरमी विशेष होनेसे कन्याएँ जल्दी रजवती होती हैं। इस बातका हमने स्वयं अनुभव किया है कि बङ्गालमें कन्याएँ
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सन्तति-शास्त्र ।
इतनी जल्दी क्यों रजवती होती है ? जहाँतक पता चला, बात यह मालूम हुई कि वहाँका भोजन और व्यवहार ही इस रीतिका है । सबसे पहले भोजनको देखिये । वहाँ सब साधारणमें मछली खानेकी प्रथा है । क्या मछली कुछ कम कामोद्दीपक है ? क्या वहाँ स्त्रियोंका भ्रृंगार और प्रान्तोंसे कम है ? अतएव इस बातको मान लेना पड़ेगा कि जिन कारणोंसे कन्यायें जल्द रजवती होती हैं यद्गुलमें उनकी कमी नहीं है, मत्स्य अधिकता ही है । वे यद्गुली कि जो पञ्जाबके सर्व जिलों में बहुत दिनोंसे हैं, उनके यहाँ भी दस वर्ष की कन्यायें रजवती होती देखी गयी हैं । इससे साफ जाहिर है कि भोजन और खाने पीने आदिकी स्वतंत्रता ही पर रजस्वला होनेका समय निर्भर है ।
हम उन्हीं स्त्रियोंको निरोध मानेंगे कि जिनका ठीक समय पर रजोधर्म प्रारम्भ हुआ हो और हर महीनेमें ठीक ठीक होता हो । जो समय रजोधर्म प्रारम्भ होने का है ? उस समय कन्याओंके शरीरकी क्या कैसी होनी चाहिये ? उस समय वे खिलनेवाली फलीके समान फोमल, और चढ़ती हुई नदी के समान बढ़नेवाली होती हैं । ऐसे समयमें कन्याओंका अंग बढ़ता है, मनकी शक्तियोंका विकास होता है । अगड़े, फल-वाहिनी नली और गर्भाशय पूर्ण रूपसे खिलते हैं । ऐसे समयमें यदि कोई इनसे सन्तान उत्पन्न करनेकी इच्छा करे, तो उसके बराबर मूर्ख कौन होगा ।
समय और गरज दोनों बलवान हैं । सूखोंकी कौन कहे, अच्छे पड़े लिये, ताजे दिमागवालोंके इदयपर यह बात तोट रही है कि रजस्वला होते ही कन्याओंमें संयोग-शक्ति आ जाती है । पर यह बड़ी भारी भूल है । रजस्वला होना एक बात है
11. रजोधर्म के रोग
रजोधर्मके रोग ।
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और संयोग शक्ति कुछ दूसरी ही चीज है। रजस्वला होना बतलाता है कि अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशय अच्छी दशा में हैं और उनका विकास हो रहा है।
एक विद्वानकी राय है कि सोलह वर्ष के पहले स्त्री का शरीर संयोग करने योग्य नहीं होता, क्यों कि इसके पहिले रज कच्चे अण्ड और गर्भाशय से आता है। इनके पुष्ट होने का एक खास समय होता है। चारह वर्ष के बाद से इनका पुष्ट होना प्रारम्भ होता है और सोलह वर्ष की अवस्था तक अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशय तीनों पुष्ट होकर पूरे तौर से बढ़ जाते हैं। यदि इस अवस्था के पहिले संयोग किया जाय, तो ये तीनों बिगड़ जाते हैं। स्वार्थी पुरुष इन बातों पर ध्यान न देते हुए उत्तम सन्तान की इच्छा करते हैं। परिणाम यह होता है कि स्त्रियाँ अनेक रोगों में फँस कर जिन्दगी से हाथ धो बैठती हैं। अतएव यह शिक्षा मिलती है कि सोलह वर्ष से कम उमर वाली स्त्री से संयोग न करना चाहिये। रजस्वला होने के दिनों में मामूली स्त्री के—जो न बहुत निर्बल और न बहुत बलवती हो—उसके शरीर से दसतोला रज तो अवश्य ही निकलना चाहिये, परन्तु जो मोटी ताजी और अत्यन्त बलवती हैं उनके पन्द्रह तोला निकलना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं होता, तो समझना चाहिये कि कोई रोग अवश्य है। इन्हीं कारणों से प्रदर इत्यादि अनेक रोग उत्पन्न होकर बहुत बड़ी बड़ी बाधाएँ करते हैं।
( ११ ) रजोधर्म के रोग ।
शरीर एक फलकी भाँति है जिसप्रकार कल हजारों पुरजों के मिलाने से बनती है। उसी प्रकार हजारों नसों और इन्द्रियों से बनकर शरीर काम करता है। स्त्रियों के लिये रजस्वाव
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सन्तति-शास्त्र ।
शरीर का एक प्रधान धर्म है। इसके नियमपूर्वक होते रहने से स्त्रियाँ वही हुई नदी के समान स्वच्छ रहती हैं। जिस प्रकार नदी का बहाव रुक जाने पर उस में अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं, इसी प्रकार रजोधर्म विगड़ने पर स्त्रियों में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। इनके अनेक भेद हैं।
१. रजोधर्माका न होना ।
इसके दो भेद हैं (१) विलकुल न होना (२) प्रारम्भ होकर चन्द हो जाना । (रतिशान्त)
१. प्रथम भेद—रजोधर्म का विलकुल न होना। इसके कई कारण हैं।
१. अपूर्व भगका होना (यह जन्म से होता है)
२. गर्भ अण्डका न होना (यह जन्म से होता है)
३. भग के मुख का चन्द होना (यह जन्म से होता है)
४. भगके मुखका सूर्यके मुखके समान अत्यन्त भारीक होना (यह जन्मसे होता है)
५. भगकी दोनों शीवारोंका आपसमें जुड़ा होना (यह जन्मसे ही होता है)
जिन स्त्रियाँ के ये व्याधियाँ होती हैं, वचपन में तो कुछ नहीं परन्तु ऋतु-धर्म के समयमें उन्हें बड़ा कष्ट होता है
२. दूसरा भेद—रजोधर्म प्रारम्भ होकर बंद हो जाना। इसके कई कारण हैं।
१. गर्भ, अण्ड, फलवाहिनी नली, भग और गर्भाशय के अनेक रोगों से।
२. रज और रक्त-विकार के अनेक रोगों से।
३. शोक, चिन्ता और भय इत्यादि के अनेक प्रकोपों से।
४. विषम स्वर, संभ्रहणी और श्रुतिसार से।