सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
✻ समर्पणम् ✻ तन्त्रविद्या मयावाप्ता यत्पादाम्बुजसेवया । मिश्रोपनामकं हीरामणिं गुरुं नमाम्यहम् ॥ न्यर्त्तुशमन्ययुग्माब्दे (२०६०) वैक्रमीये सुवत्सरे । शुद्धश्रावणपूर्णायां सोमे माङ्गलिके दिने ॥ कृतिरियं कराब्जेषु हीरामणिमहात्मनाम् । कृतश्रमाणां तन्त्रेषु सादरं वै समर्प्यते ॥ —सुधाकर मालवीयः ✻
इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (text) उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ (blank page) है।
पुरो वाक् ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैः त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ सङ्कीर्त्य केशवम् ॥ —विष्णुपुराण ६.२.१७ विष्णुपुराण के अनुसार कृतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में अर्चन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य कलियुग में मात्र केशव के संकीर्तन से प्राप्त हो जाता है। कलियुग में मानवमात्र की आध्यात्मिक शक्ति में क्षीणता दृष्टिगोचर होती है। इसके लिए त्याग, तितिक्षा तथा धैर्य की आवश्यकता है। अध्यात्मिक साधक को बाह्य एवं आन्तरिक रूप से शुद्ध रहना चाहिए। ये यथेष्ट आचरण कलियुग में सम्भव नहीं है। तन्त्र में इसकी इतनी आवश्यकता नहीं है। फिर तन्त्र में तो स्त्री तथा शूद्र दोनों का अधिकार होता है। निगम के क्रियाकलाप त्रिवर्ण के लिए सीमित हैं और फिर उनमें से अधिकांश क्रियाएँ कलिवर्ज्य भी हैं। किन्तु आगम ने अपना द्वार प्रत्येक वर्ण के लिए खोल रक्खा है। तन्त्र या आगम का यही सार्वभौम तथा सार्ववर्णिक रूप उसकी लोकप्रियता का कारण है। समर्थ एवं योग्य गुरु और योग्य अधिकारी शिष्य ही तन्त्र विद्या की चरितार्थता में प्रधान हेतु हैं। क्योंकि तान्त्रिक गुरु प्रयोग के द्वारा अधिकारी शिष्य को ही शास्त्र की सत्यता का प्रमाण देकर उसे 'तन्त्र' की व्यावहारिक शिक्षा देते हैं। फलतः तन्त्र का मार्ग सर्वसाधारण के लिए उन्मुक्त होने पर भी अधिकारी की अपेक्षा रखता है। योग्य गुरु की शिक्षा की उचित समीक्षा की जाय तो फल की सिद्धि में विलम्ब नहीं होता और इसी प्रयोगात्मकता के कारण तन्त्र भी आधुनिक विज्ञान के समकक्ष ठहरता है। आज दोनों की ही मानव मात्र को आवश्यकता है—व्यवहार में विज्ञान की तथा आध्यात्म विद्या में तन्त्र की। महानिर्वाणतन्त्र में कहा भी है—विना ह्यागममार्गेण कलौ नास्ति गतिः प्रिये । सात्त्वतसंहिता का प्रस्तुत संस्करण अलशिङ्ग कृत संस्कृत भाष्य एवं इदं प्रथमतया कृत हिन्दी व्याख्या के साथ भगवान् विष्णु एवं उनकी शक्ति महालक्ष्मी के उपासकों के सम्मुख प्रस्तुत है। प्रस्तुत संस्करण का मूल एवं संस्कृत भाष्य सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से मुद्रित, आचार्य श्रीव्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा सम्पादित संस्करण पर आधृत है। 'सुधा' हिन्दी व्याख्या में पूर्णरूप से इसी संस्करण से सहायता ली गई है। इसके लिए मैं गुरुवर्य आचार्य श्रीव्रजवल्लभ द्विवेदी का हृदय से आभारी हूँ।
८ सात्वतसंहिता सात्वतसंहिता पाञ्चरात्र आगम की प्रमुख संहिताओं में से एक है । लक्ष्मीतन्त्र एवं अहिर्बुध्न्य संहिता से प्रस्तुत संहिता का अविनाभाव सम्बन्ध है । जैसे 'जितन्ता' श्लोक मन्त्र का स्वरूप लक्ष्मीतन्त्र में है किन्तु अहिर्बुध्न्य एवं सात्वतसंहिता में मात्र प्रतीक का ग्रहण किया गया है । इस संहिता को बिना पारमेश्वर संहिता, ईश्वर संहिता और जयाख्य संहिता के नहीं समझा जा सकता है । सौभाग्य से अलशिङ्ग का भाष्य सात्वत संहिता पर प्राप्त है जिससे इस संहिता को समझने में सरलता होती है । अलशिङ्ग का भाष्य आदरणीय गुरुकल्प प्रो० व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा अत्यन्त विद्वत्तापूर्ण रूप से सम्पादित है जिसके लिए मैं और पाञ्चरात्र आगम के समस्त विद्वान् पाठक अत्यन्त ऋणी हैं । यह भाष्य सामने न होता तो सम्भवतः इसकी हिन्दी ही न हो पाती । अहिर्बुध्न्य संहिता की हिन्दी व्याख्या में कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा यह मैं क्या कहूँ ? बस गुरु स्मरण ही कल्प है । पाञ्चरात्र आगम की संहिताओं को बचाना ही मेरा उद्देश्य है । मैं अनुवाद इसीलिए करता हूँ कि मुझे आगम ग्रन्थों की विरासत में जो शास्त्र प्राप्त हुए हैं उन्हें out of Print (मूल्य देकर भी सहजता से प्राप्त न हो सके) होने से बचाया जा सके । इन ग्रन्थों की हिन्दी करना और प्रयोग-पद्धति को जानकर प्रयोग करना अलग- अलग पहलू हैं । मैं प्रयोग पद्धति बिलकुल नहीं जानता । फिर भी जो अनुवाद करके ग्रन्थों को बचाने का प्रयास मैं कर रहा हूँ उसमें (पद्धति न जानकर भी अनुवाद करना) गुरु कृपा ही कारण है । अतः पद्धति जानने के लिए भक्तगण किसी गुरु की खोज करें । एक सन्त का दूरभाष पर मुझे आग्रह प्राप्त हुआ कि आपके पास जो भी इस प्रकार के ग्रन्थ हों उनकी फोटो प्रति आप मुझे दे दें । मेरे पास ऐसे कोई ग्रन्थ नहीं हैं जो पहले छपे न हों और अभी तक मैंने जो अनुवाद भी किए हैं, उन्हीं छपे हुए ग्रन्थों के अनुवाद किए हैं । मैं एक पुस्तक (जो बाजार में उपलब्ध न हो) उसे प्राप्त कर तुरन्त अनुवाद में संलग्न हो जाता हूँ और मेरे प्रकाशक 'चौखम्बा' के श्रेष्ठीगण सहयोग प्रदान कर देते हैं । अतः विद्वान् पाठकों से निवेदन है कि पद्धति के लिए गुरु खोजें और अनुपलब्ध तन्त्रग्रन्थों को मुझे उपलब्ध कराएँ । मेरे पास हैं नहीं । इसीलिए तो निवेदन है । इससे हमारी संस्कृति की रक्षा हो सकेगी । शास्त्रों की रक्षा करना समस्त मानवमात्र का कर्तव्य है । यह आश्चर्य है कि मुझे श्री सर्वजीत सिंह जी ने (जो लखनऊ में पेशे से डॉक्टर हैं और सरदार हैं) पाराशर संहिता के विषय में यह फोन पर बताया कि यह ग्रन्थ तिरुपति से १९६७ में मात्र १०० कापी ही छपा था, जिसकी अत्यन्त जीर्ण प्रति मैंने किसी के हाथ में सारनाथ में ३०.५.२००७ को देखी है । दुःख है कि इसकी फोटो कापी जीर्णता के कारण नहीं की जा सकी । यह ग्रन्थ ८०० पृष्ठों का है जिसमें हनुमानजी के चार अष्टोत्तर शतनाम हैं । इनमें से एक विभीषण कृत भी है । हनुमान
पुरो वाक् ९ जी के सहस्रनाम तो प्राप्त होते हैं किन्तु अष्टोत्तर शतनाम विरले ही हैं। एक बार हिन्दी विभाग के प्रो० रमाशङ्कर शुक्ल ने पाठभेदों के सहित इसे छपवाया था जो आधा-अधूरा ही है। बीकानेर से आए एक उत्तमकोटि के साधक श्रीगिरिधर रङ्गा जी से मेरी मुलाकात काशी में बटुकभैरव मन्दिर के सान्निध्य में हुई। वह सौन्दर्यलहरी की 'लक्ष्मीधरा' व्याख्या के लिए अत्यन्त लालायित थे। यह ग्रन्थ भी पराम्बा भगवती अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से पूर्ण हो गया है। इन्होंने कुछ शक्ति से सम्बन्धित दुर्लभ ग्रन्थों की छाया प्रति भेजने का आश्वासन मुझे दिया है। एतदर्थ मैं इनका आभारी हूँ। तन्त्र एवं पाञ्चरात्र शास्त्र के इस अनुपम ग्रन्थ में जो कुछ भी मेरी गति हो सकी है अथवा मैं इस शास्त्र को जो कुछ समझ सका हूँ, इसमें मेरे पूज्य गुरुवर्य पं० हीरामणि मिश्र का ही कृपा प्रसाद है। उनकी अमोघ कृपा मेरे ऊपर बनी रहे और मुझे आशीर्वाद प्रदान करते रहें। मुझमें किसी भी प्रकार का अहङ्कार कदापि न आवे। इसी कामना के साथ उनके चरणों में शतशः प्रणाम है और ग्रन्थ भी उन्हीं को समर्पित है। पाञ्चरात्र आगम का यह अत्यन्त उपादेय ग्रन्थ जो आज इस रूप में विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत हो सका है उसके लिए मैं 'चौखम्बा संस्कृत सीरीज' के पूर्व संचालक स्वर्गीय श्रीविठ्ठलदासजी गुप्त का हृदय से आभारी हूँ। उन्होंने ही इस ग्रन्थ के हिन्दी व्याख्या के लिए मुझे प्रेरित किया था। सम्प्रति चौखम्बा कृष्णदास अकादमी के संचालकद्वय श्री ब्रजमोहनदासजी गुप्त एवं श्री कमलेश कुमार गुप्त को अत्यन्त धन्यवाद है जो यह ग्रन्थ इस साज-सज्जा के साथ विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत है। १९९२ ई० में सौ वर्ष पूर्ण करने वाली इस संस्था के भविष्य को सुरक्षित रखने वाली चौथी एवं पाँचवीं पीढ़ी में प्राप्त चि० सचिन कुमार गुप्त एवं श्री कौशिक गुप्त को आशीर्वाद है और भगवान् विश्वनाथ से प्रार्थना है कि अपने पूर्वजों के द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलकर इसी प्रकार अनवरत सरस्वती की सेवा करते रहें। मैं अपने सहयोगी सम्पादक श्री चक्रपाणि भट्ट को उनके प्रूफ संशोधन के सहयोग के लिए धन्यवाद प्रकाश करना नहीं भूल सकता। मेरे चिरञ्जीव श्रीरामरञ्जन एवं श्रीचित्तरञ्जन ने कम्प्यूटर कार्य तथा सम्पादन में मेरी भरसक सहायता की है। उनकी स्नेहमयी माता का आध्यात्मिक एवं नैतिक सहयोग ही ग्रन्थ की पूर्णता में कारण है। विश्वात्मा भगवान् विष्णु एवं भगवती पराम्बा महालक्ष्मी इनका निरन्तर अभ्युदय करें तथा सदैव प्रसन्न रक्खें। अन्ततः भगवान् विष्णु एवं भगवती महालक्ष्मी से प्रार्थना है कि इस ग्रन्थ से मानवमात्र का अजस्र कल्याण करते रहें। श्रीगंगासप्तमी, २३.४.२००७ विद्वद्वशंवदः वैशाख शुक्ल, वि.सं. २०६४ सुधाकर मालवीयः
॥ श्रीः ॥ यथाम्बरस्थः सविता त्वेक एव महामते । जलाश्रयाणि चाश्रित्य बहुत्वं सम्प्रदर्शयेत् ॥ एवमेकोऽपि भगवान् नानामन्त्राश्रयेषु च । तुर्यादिपदसंस्थेषु बहुत्वमुपयाति च ॥ —सात्वतसंहिता ४.३३-३४ हे महामते ! जिस प्रकार आकाश स्थित एक ही सूर्य जल के आश्रय में प्रतिबिम्बित होकर अपना बहुत्व रूप प्रकट करते हैं इसी प्रकार एक भगवान् भी अपना बहुत्व रूप अनेक मन्त्रों में तथा चार प्रकार के अपने रूपों (व्यूहों) में प्रकट करते हैं अर्थात् बहुत्व को प्राप्त करते हैं । ✻
प्राक्कथनम् यतो वासुदेवेऽभिप्रद्युम्नमन्तः समाकर्षयच्चानिरुद्धं निरोद्धुम्। ततश्चाख्यया चाति सङ्कर्षणो य- स्तमीशं फणीशं गुरुं शेषमीडे॥ पाञ्चरात्रागमविमर्शः भागवतस्याथवा सात्त्वतधर्मस्यातिविकसितं रूपं 'पाञ्चरात्रधर्म' एवोपलभ्यते, यः ख्रिष्टाब्दात् पूर्वं तृतीयशतकात् प्रचलित आसीत्। महाभारतस्य नारायणीयोपाख्याने (शान्तिपर्वणि) सर्वप्रथममस्य सिद्धान्तानां वर्णनं लभ्यते। महर्षिनारदो यदा पाञ्चरात्रतत्त्वजिज्ञासुरभवत्, तदा श्वेतद्वीपं गत्वा नारायणर्षेरस्य ज्ञानमवाप, तथा स एवास्य प्रचारमकरोत्। एवमस्यादिप्रवर्तको नारायणर्षिरिव ज्ञायते। पाञ्चरात्रीयग्रन्थेष्विमं वेदसम्मतं साधयितुं विविधास्तर्काः संस्थापिताः। सम्बन्धमप्यस्य वेदस्यैकया शाखयाऽस्ति। 'एष ऐकायनो वेदः प्रख्यातः सर्वतो भुवि' (१।४३) इत्यनेन ईश्वरसंहिताया वचनेनाप्यस्य पुष्टिः कृता। दशमशतकोत्पन्नेनोत्पलाचार्येणाऽपि स्पन्दप्रदीपिकायां पाञ्चरात्रसंहिता तथा पाञ्चरात्रोपनिषदं विविधान्युदाहरणान्युपनिबद्धानि। 'पाञ्चरात्रश्रुतिः', 'पाञ्चरात्रसंहिता' तथा 'पाञ्चरात्रोपनिषद्' इत्येवं त्रयो विभागा दशमशतकावधि सञ्जाता आसन्। श्रुतिष्वपि पाञ्चरात्रागममुख्यसिद्धान्ताः प्रतिपादिताः शतपथब्राह्मणे (१३।६।१) पाञ्चरात्रसत्रस्योल्लेखः प्राप्यते। यस्याऽनुसारं समस्तप्राणिष्वाधिपत्यस्थापनाय नारायणेन पञ्चदिनाभ्यन्तरे इदं सम्पादितम्। वेदान्तदेशिकप्रणीतपाञ्चरात्ररक्षायाम्, एवं भट्टारकवेदोत्तमविरचिततन्त्रशुद्धाख्ये ग्रन्थरत्ने पाञ्चरात्रधर्मस्य तलस्पर्शिनी मीमांसा समुपलभ्यते। पञ्चरात्राणां विषये तेषां प्रामाणिकता तत्रभवता रामानुजा- चार्येण वेदवदेव स्वीकृता। यथा— सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा। आत्मप्रमाणान्येतानि न हन्तव्यानि हेतुभिः॥ पाञ्चरात्रशब्दस्य व्याख्याप्रसङ्गे नानामतानि संलक्ष्यन्ते। महाभारतस्य शान्ति- पर्वणि तस्य 'महोपनिषत्' इति संज्ञा दृश्यते। तदनुसारेण तस्य गायनं नारायणेनैव
१२ सात्त्वतसंहिता स्वमुखारविन्दनिःसृतशब्दैः कृतम् । तत्र चतुर्वेदसांख्यशास्त्रसमावेशाय च स 'पाञ्च-रात्र' इति संज्ञया अभिहितः । नारदपाञ्चरात्रमतेन परमतत्त्व-मुक्ति-भुक्ति योगविषयाख्यपञ्च- शब्दार्थनिरूपणप्रसङ्गात् पाञ्चरात्रसंज्ञा प्राप्ता । रात्रशब्दस्तु ज्ञानस्यैव संज्ञान्तरम् । तदुक्तं नारदपाञ्चरात्रे—'रात्रं च ज्ञानवचनं ज्ञानं पञ्चविधं स्मृतम्' (१।१४) इति । पाञ्चरात्रीयं वाङ्मयं तु अतीव विपुलतरम्, परन्तु साम्प्रतमप्रकाशितरूपेणैव तिष्ठति । कालप्रभावेणास्य बहवोंऽशा विलुप्ताः । अस्य प्राचीनसंहितासु प्राक्- स्थितानां संहितानामुल्लेखेनास्य विपुलता विलुप्तता च ज्ञायते । तमवलम्ब्य 'इन्ट्रोडक्शन टू दी पाञ्चरात्र' इति नाम्ना ख्याते श्रोडरमहोदयेन सम्पादिते आङ्ग्ल- भाषोपनिबद्धग्रन्थे पाञ्चरात्रसंहितानां संख्या पञ्चविंशत्यधिकशतत्रयमिता (३२५) निर्दिष्टा । तासु संहितासु—अगस्त्यसंहिता, सनत्कुमारसंहिता, वासुदेवसंहिता, नारदीयसंहिता, विष्णुरहस्यसंहिता—इत्यादिसंहितानां चर्चा कृता । प्रकाशितरूपेण साम्प्रतं निम्ननिर्दिष्टाः संहिता एव दृश्यन्ते— पाञ्चरात्रागमस्य प्रकाशिताः संहिताः १. ईश्वरसंहिता (सुदर्शन प्रेस, काञ्ची); २. कपिञ्जलसंहिता; ३. जयाख्य- संहिता (गायकवाड ओरियण्टल सीरीज); ४. पाराशरसंहिता (तिरुपति); ५. पाद्म- तन्त्रम्; ६. लक्ष्मीतन्त्रम् (आड्यारसंस्करणम्, हिन्दीसहित चौखम्बासंस्करणम्) ७. बृहद्ब्रह्मसंहिता (आनन्दाश्रम, पूना); ८. सात्त्वतसंहिता (काञ्ची, अलशिङ्ग भाष्य सहिता, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय); ९. भारद्वाजसंहिता (आड्यार- संस्करणम्, मद्रास, हिन्दीसहित खेमराज संस्करणम्); १०. श्रीप्रश्नसंहिता; ११. विष्णुसंहिता; १२. विष्णुतिलकम्; १३. अहिर्बुध्न्यसंहिता (आड्यारसंस्करणम्, हिन्दी सहित चौखम्बासंस्करणम्, दिल्ली) । निर्दिष्टासु संहितासु जयाख्यसंहिताया ऐतिहासिकं महत्त्वं प्रामाणिकरूपेणाव- गन्तव्यम् । इयं संहिताऽतिविस्तृतत्रयस्त्रिंशत्पटलेषु समाप्ता । विष्णूपासका एव सात्त्वत-पाञ्चरात्र-भागवतेत्यादिसंज्ञाभिः समलङ्कृताः । सुदीर्घ- कालादेव विष्णूपासनपरम्परा भारतीये वाङ्मये दरीदृश्यते । कालक्रमेण विष्णुभक्तौ विविधानि परिवर्तनानि समजायन्त । वैदिकसंहितायां विष्णुः आदिमग्रन्थ ऋग्वेदे विष्णुसम्बद्धा बहवो मन्त्रा उपलभ्यन्ते— (क) इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । —१.२२.१७ (ख) द्वे इदस्य क्रमणे स्वर्दृशोऽभिख्याय मर्त्यो भुरण्यति । तृतीयमस्य नकिरा दधर्षति वयश्चन पतयन्तः पतत्रिणः ॥ —१.१५५.५
प्राक्कथनम् १३ (ग) तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥ —१.२२.२० ब्राह्मणग्रन्थेषु विष्णोः पर्याप्तं वर्णनं लभ्यते । वेदवर्णितविष्णुशक्तिरुत्तरोत्तरं विकासोन्मुखोऽपि ब्राह्मणग्रन्थेषु वर्णितः । शतपथब्राह्मणे यज्ञनिष्ठादृष्ट्या विष्णुग्रणीः प्रमाणितः, तथा विष्णोर्लौकिकीनां चमत्कारपूर्णानां कथानामपि बहुशश्चर्चाः कृताः । उपनिषत्साहित्ये विष्णोः परं धामैव सर्वोत्तमं स्थानं प्रमाणप्रतिपन्नमिति स्वीकृत्य जगतः परिकल्पितः । यथा— विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ —कठोपनिषत्, ३-९ विष्णुर्यस्मिन् रूपे वैदिकसंहितासु वर्णितस्तदेव रूपमधिकं व्यापकं तथा भास्वरं दृश्यते । वेदे यानि विशेषणानि पूर्वमिन्द्राय प्रयुज्यन्ते स्म, तान्यधुना विष्णु- प्रशंसायां प्रयुक्ता बभूवन् । यथा—हरिः, केशवः, वासुदेवः, वृष्णीपतिः, वृष्णः, ऋषभ इत्यादयः शब्दाः पूर्वमिन्द्राय प्रयुक्ता भवन्ति स्म, आहोस्वित् तत्सम्बद्ध- पदार्थप्रतीतिप्रतिपादका आसन्; त एव कालक्रमेण विष्णोर्विविधोपाधीनां तथा नाम्नामाधारा अजायन्त । विष्णुमाहात्म्याभिव्यञ्जका व्युत्पत्तिलभ्यार्था अपि प्रसङ्गतो- ऽपेक्षिताः । यथा—यास्काचार्यविरचितनिरुक्त (१२.१९) एवं प्रतिपादितम्—'अथ यद् विषितो भवति, तद् विष्णुर्भवति । विष्णुर्विशतेर्वा व्यश्नोतेर्वा' इति । भगवता दुर्गाचार्येण (निरुक्तभाष्ये २.३.३)—'यदा रश्मिभिरतिशयेनायं व्याप्तो व्याप्तो व्याप्नोति वा रश्मिरथं सर्वम् । तद्विष्णुरादित्यो भवति' इत्येवं विष्णुशब्दस्य निर्वचनमकारि । वेवेष्टि व्याप्नोति चराचरं जगत् स विष्णुरित्यनया व्युत्पत्त्याऽपि विष्णोर्विशिष्टं माहात्म्यमभिव्यज्यते । विष्णोरुपर्युक्तं स्वरूपं तथा व्यक्तित्वं मनोहार्यनुरञ्जकं तथा व्यापकं विधाय ग्राह्यं कर्तुं स नराकाराकारितरूपे विमर्शितः (दृष्टः) । एवं विष्णुरेव नारायण- शब्देनाभिहितः । नारायण शब्दोऽपि वैष्णवे धर्मे उपास्यरूपेण स्वीकृतः । यथाह मनुस्मृतौ— आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ इति कथनेन क्षीरशायिविष्णुना नारायणशब्दसाम्यं प्रदर्शितम् । महाभारतेऽपि विष्णु नारायणरूपेण वर्णितः । अनेन प्रकारेण विष्णुभक्तेः प्राचीनता, विष्णुशब्दस्य नारायणशब्दसमानार्थता च द्योत्यते । भागवत (= सात्त्वत) सम्प्रदायस्य कालविमर्शः वैष्णवधर्मस्य सर्वप्राचीनं नाम भागवतधर्म आसीत् । भागवतशब्दः पाञ्च-
१४ सात्त्वतसंहिता रात्रस्य नामान्तरम् । कियान् प्राचीनो 'भागवतसम्प्रदाय' इति विषयस्यावश्यक- सामग्र्यभावाद् निश्चितरूपेण विवेचनं दुस्तरं वर्तते, तथापि यथोपलब्धसामग्रीमेवोररी- कृत्य किञ्चित् प्रकाश्यते— १. सर्वप्रथममस्य विवेचनं महाभारतस्य नारायणीयोपाख्याने लभ्यते । २. पाणिनीयाष्टाध्यायीभाष्यप्रणेत्रा भगवता पतञ्जलिनाऽपि कृष्णरूपावतीर्णस्य विष्णोः कंसवधबलिबन्धननामकयोर्नाटकयोरुल्लेखः कृतः, येन दैत्यराजबलेः पातालप्रेषणस्य कंसवधस्यापि च पुष्टिर्जायते । यथा—'अयःशूलदण्डाजिनाभ्यां ठक्ठञौ' (५।२।७६) इति सूत्रे भाष्ये शैवभागवतसम्प्रदाययोश्चर्चा अकारि, यथा—'किञ्च, योऽये शूलेनान्विच्छति स आयःशूलिकः । किञ्चातः शिवभागवतेऽपि प्राप्नोति, एवं तर्ह्युत्तरपदलोपोऽत्र द्रष्टव्यः' इति । विदुषां मतानुसारेण पतञ्जलेराविर्भावकालः विक्रमसंवत्सरपूर्वतृतीयशतकमस्ति। एतेनेदमपि सिद्ध्यति यत् तृतीये शतके भागवतसम्प्रदायाभ्युदयः संजातः । ३. महाभारतस्य शान्तिपर्वानुसारमिदं सिद्ध्यति यदयं सात्त्वतोऽथवा भागवतो धर्मो वासुदेवेन कृष्णेनार्जुनं प्रत्युपदिष्टः । अतो भागवतधर्मस्याद्योपदेशके कृष्णे भगवति वासुदेव ऐतिहासिक दृष्ट्या विचारणमस्योद्भवविकासादिज्ञानप्रकाशनाय संगतं प्रतीयते । ४. वैदिकसाहित्ये संहितासु, ब्राह्मणग्रन्थेषु, उपनिषत्सु वा वासुदेवस्यो- ल्लेखो नोपलभ्यते । किन्तु तैत्तिरीयारण्यकदशमप्रपाठकेऽयं विष्णुवदेव व्यव- हृतोऽस्ति । डॉ० राजेन्द्रलालमित्रमतेऽस्य रचना पश्चादभूत्, अतो वासुदेवोल्लेख- सम्बन्धिवर्णनमिदं परिशिष्टमेवास्ति । वासुदेववर्णनञ्च तत्रैवं प्रकारेणास्ति, यथा— 'नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्' इति । भारतीयदार्शनिकसम्प्रदायानां लब्धप्रतिष्ठान्वेषका डॉ० कीथमहोदया आरण्य- करचनासमयः ई०पूर्वं तृतीयं शतकमिति स्वीकुर्वते । अतस्तृतीयशतकावधि विष्णु- वासुदेवयोरैक्यं प्रतीयते । महाभारतस्य विविधस्थलेषु प्रयुक्तोऽयं वासुदेवशब्दो विष्णुशब्देनाधिकं साम्यं भजति । तत्रैकस्थले उद्घोषितमस्ति यद् मया लोकोत्तर- ज्योतिषा तथा सर्वं कर्तुं पटीयस्या मम मायाख्यया शक्त्या चराचरं सञ्छादितमस्ति । यथा— वसनात् सर्वभूतानां वसुत्वादेव योनितः । वासुदेवस्ततो .... .... ... .... .... ॥ इत्यादौ महाभारतस्य तस्मिन्नेव प्रसङ्गे इदमपि वर्णितं यदहं रविरश्मिरूपे निखिलं जगत् संछादयामि, तथाऽहमेव सर्वप्राणिनामधिवासत्वाद् वासुदेवोऽस्मि ।
प्राक्कथनम् १५
पतञ्जलेस्तथा वैष्णवमतीयपाञ्चरात्रतन्त्रस्यानुसारमेवंविधस्य वासुदेवद्वयस्य चर्चा अस्ति, ययोरेको वृष्णिकुलोद्भवस्तथाऽपरः क्षत्रिय आसीत् । वासुदेवस्य वृष्णिकुलोद्भवप्रसङ्गो महाभारतस्य विशिष्टांशभूतया श्रीमद्भगव- द्गीतयाऽपि सिद्धयति । यत्र ‘वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि’ इति वाक्येन प्रतिपादित- मस्ति । कौटिल्यार्थशास्त्रे वृष्णिकुलचर्चया सह वृष्णीनां कस्यापि संघस्य वर्णन- मप्युपलभ्यते, तथा द्वैपायनविरुद्धाचरणेन नाशस्याप्युल्लेखोऽस्ति । बौद्धानां घटजातके वासुदेवो मथुराप्रान्तस्योत्तरीयभागे शासनं कुर्वतां राज्ञां राजवंशस्य सन्ततिरूपेण स्वीकृतः । तत्रेदमपि प्रतिपादितं यदुक्तराजवंशः कान्ह- द्वीपायनावज्ञया अनशत् । महाभारतीयभीष्मपर्वणः पञ्चषष्टितमेऽध्याये ब्रह्मदेवेन पुरुषपरमेश्वरस्य स्तुतिर- कारि । तथोक्तं च यद् भवान् यादववंशेऽवतरतु । पुरुषपरमेश्वरस्तत्र ‘वासुदेवः’ इति सम्बोधनपदेनाभिहितः । उक्तं च यद् भवानेव संकर्षणरूपेणावतीर्य स्वकीयं प्रद्युम्ना- ख्यं तनयमप्रकटयत्, तथा प्रद्युम्नाद् विष्णुस्वरूपादनिरुद्धं जनयामास । येनायमुत्पा- दितः । अतस्तदेव रूपं स्वीकृत्य पुनः कृपया मनुष्ययोनावायातु । शान्तिपर्वणः पञ्चषष्टितमाध्यायस्य प्रारम्भ एवोल्लिखितं यत् प्रजापतिना परमेश्वरो मानवयोनौ वासुदेवरूपेणागमनाय प्रार्थितः । पुनस्तस्मिन्नेवाध्याये आद्यन्तावधि परमेश्वरस्थाने वासुदेवशब्द एव व्यवहृतः । अस्मिन् विषये वैष्णवदर्शनस्य प्रामाणिका अन्वेषका डॉ० भण्डारकरमहोदया एवं विचारयन्ति यद् वासुदेवेन भक्तिसम्प्रदायस्याधिष्ठात्रा भाव्यम् । प्रथमे युगेऽपि स सङ्कर्षणानिरुद्धप्रद्युम्नैः सह आसीदित्यस्याप्याभासो महाभारतीयोल्लेखेन प्राप्यते । वासुदेवस्य धर्मप्रवर्तकत्वं पाणिनिरेकेन सूत्रेणापि ज्ञायते, यत्रास्य सम्प्रदायानुयायिनो वासुदेवकपदेनाभिहिताः । यथा—‘वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्’ (४।३।९८) इति । सूत्रस्यास्योपरि भाष्यं विरचय्य भगवता पतञ्जलिनाऽपीदं दृढीकृतम् । एवम- न्यस्मिन् ‘ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च’ इति सूत्रव्याख्यानेऽपि कथितमस्ति यद् वासु- देवस्तथा बलदेव इत्युभे नामनी वृष्णिनामनी स्तः, तथा क्रमशौ वसुदेवबलदेव- शब्दाभ्यां निष्पन्ने स्तः । शतपथब्राह्मणेऽप्येकत्र स्थाने वार्ष्णेयशब्दप्रयोगोऽस्ति, येन वृष्णिवंश-प्राचीनत्वं ज्ञातुं शक्यते । महाभारतस्यादिपर्वणि एकत्रायातमस्ति यत् पार्थोऽथवा अर्जुनः सात्त्वतान् लोभिनो नावगच्छति, तथा तस्मिन्नेव पर्वण्यन्यत्र वासुदेव एव सात्वतसंज्ञयाऽभि- हितः । एवं च वासुदेवसात्त्वतशब्दयोः साम्यं प्रकटितं भवति । विष्णुपुराणे— वृषस्य पुत्रो मधुरोऽभवत्, तस्यापि वृष्णिप्रमुखं पुत्रशतमासीत्, यतो वृष्णि- संज्ञामेतद् गोत्रमवाप । यादवश्च यदुनामप्रत्यक्षणादिति (विष्णुपु० ४.११)। पुन- र्विष्णुपुराणेऽस्यैवान्यतमे प्रसङ्गे यदुकुलस्य मर्यादा लौकिकैश्वर्यवर्णनप्रसङ्गे कथिता-
१६ सात्त्वतसंहिता ऽस्ति यद् यदुकुले अंशनाम्नी एका व्यक्तिरभूद् यस्याः सुतः सात्त्वतसंज्ञया प्रख्यातः, तथा तेनैव कारणेन सात्त्वते तद्वंशीयाः सात्त्वतपदवाच्या अभूवन् । भागवतमहापुराणेनाऽपि सात्त्वतैर्वासुदेवस्य परमेश्वररूपेण पूजनं सिद्ध्यति । भागवते वासुदेवः सत्त्वतर्षभाख्ययाऽपि ख्यातः । सात्त्वतशब्दप्रयोग ऐतरेयब्राह्मणेऽ- प्युपलभ्यते, यथा— 'एतस्यां दक्षिणस्यां दिशि ये के च सात्त्वता राजानो भोग्यायैव तेऽभिषिच्यन्ते भोगेत्येनानभिषिक्तान् आचक्षते' इति । डॉ० भण्डारकरमहोदयाः सात्त्वतशब्दं वृष्णिवंशपर्यायस्वरूपमेव स्वीकुर्वन्ति । 'वैष्णविज्म एण्ड शैविज्म' नाम्नि ग्रन्थे तेषामिदं मतमस्ति यत् सात्त्वतानां वृष्णि- वंशसम्बद्ध एकोऽन्य एव सम्प्रदाय आसीद् यस्मिन् वासुदेवप्रद्युम्नसंकर्षणानिरुद्धाः प्रादुरभवन् । तेषु वासुदेवं जनाः परमात्मबुद्ध्या पूजयन्ति स्म । सात्वतसंहिताविमर्शः सात्त्वतधर्मः सूर्यद्वारा प्रवर्तित इति महाभारते प्रतिपादितमस्ति । शतपथब्राह्मणे (१३।५।४।२१) सात्त्वतशब्दोऽपि वार्ष्णेयशब्द इव प्रयुक्तः । पाराशरभट्टेन (विष्णु- सहस्रनामभाष्ये) सात्त्वतशब्दो भागवतस्य पर्यायरूपेण स्वीकृतः । यथा— 'सातयति सुखयति आश्रितानिति सातः परमात्मा, स एषामस्तीति वा सात्त्वताः सात्त्वन्तो वा महाभागवताः' इति । एवं सात्त्वतवार्ष्णेययोरुभयोः शब्दयोः प्राचीनत्वं तथा समर्थताऽपि प्रमाणी- भवतः । महाभारतस्य नारायणीयाख्याने यत्र वासुदेवधर्मो व्याख्यातस्तत्र कथितं यत् सङ्कर्षणो वासुदेवस्यापरं रूपं तथा सर्वजनप्रतिनिधित्वञ्च प्रतिपादयति । सङ्कर्षणाद् अर्थात् मनसः प्रद्युम्नस्योत्पत्तिर्जायते, प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽहङ्कारस्वरूपः प्रादुर्भवति । इमे चत्वारो वासुदेवप्रतिमाभूताः सन्ति । देवादिकं निखिलं जगद् नारायणादुत्पन्नं भूत्वा पुनर्नारायण एव लीयते । अनेन प्रकारेण वासुदेवनारायणशब्दयोर्बहुविधं साम्यं सिद्ध्यति । कतिपयैरुल्लेखैः प्रमाणीभवति यत् ख्रिष्टाब्दात् पूर्वं द्वितीये शतके वासुदेवातिरिक्तं सङ्कर्षणबलदेवावप्युपास्यभूतावास्ताम् । इदं दृढीकर्तुं २।२।३४ पाणिनीयसूत्रे भाष्यं द्रष्टव्यमस्ति । किन्तु महाभारतस्य नारायणीयाख्यानके वासुदेवः परमात्मरूपे सङ्कर्षणो जीवरूपे वर्णितः । तत्त्वतो विचारे कृते इदं स्पष्टं प्रतीयते यद् वासुदेवसङ्कर्षणयोः पूज्यत्व एवास्माभिः सर्वप्रथमं पाञ्चरात्राणां व्यूहवादस्य बीजभूतं तत्त्वं समवलोक्यते । भागवतधर्मस्य सात्त्वतधर्मस्य पाञ्चरात्रधर्मस्य वा आदिनाम वासुदेवधर्मो- ऽथवा वासुदेवोपासना आसीत् । तृतीये शतके भागवतसंज्ञा तु प्रसिद्धप्राया एवासीत् । ख्रिष्टाब्दस्य पूर्वाभ्यां तृतीयचतुर्थशतकाभ्यां प्रथमशतकावधि वासुदेवो- पासनाया विविधानि प्रमाणानि पुरातत्त्वप्राचीनसाहित्यादिषूपलभ्यन्ते ।
प्राक्कथनम् १७ अर्हतां सलाकापुरुषेषु वासुदेवबलदेवावपि स्तः, तथा अरिष्टनेमिवासुदेव- सम्बन्धिन्यश्चर्चाः प्राचीनजैनसाहित्ये भृशमुपलभ्यन्ते। बौद्धजातके (घटमहामग्गादौ) वासुदेवकथा वर्णिता। बौद्धसाहित्यस्य चुल्लनिर्देशग्रन्थे आजीवकनिगण्ठजटिलवासुदेवादिभिः श्रावकैः सह वसुदेवपूजकानां वासुदेवानाम्प्युल्लेखो लभ्यते। यस्याधारेणास्य सम्प्रदायस्य स्थितिः ख्रिष्टाब्दात् पूर्वं तृतीये चतुर्थे वा शतक आसीदिति निश्चीयते। ख्रिष्टाब्दात् शतद्वयवर्षपूर्वं बेसनगरे (भिलसा) स्थितस्यैकस्य शिलालेखस्यानुसारं विक्टोरियायां राजदूतेन हेलियोटोरसेन देवाधिदेववासुदेवप्रतिष्ठायामेकं गरुडस्तम्भं निरमायि। स आत्मानं भागवतसंज्ञया समलङ्करोति स्म। ख्रिष्टाब्दात् पूर्वं प्रथमे शतके नानाघाटीयगुहाभिलेखेऽन्यदेवैः सह सङ्कर्षण- वासुदेवयोरप्युल्लेखो लभ्यते। अस्यैव शतकस्यैकः शिलालेखो घोसुण्डी (चित्तौड़) नामके स्थाने प्राप्यते, यस्मिन्नश्वमेधवेलायामितिहासप्रसिद्धकण्ववंशीयनृपतिना वासु- देवसङ्कर्षणयोर्देवायतननिर्माणाय पूजाशिलाप्राकाररचनाया अप्युल्लेखोऽस्ति। एवं ज्ञायते यदयं सम्प्रदायोऽतीव प्राचीनः, तथा स एव कालक्रमेणानेकदृष्टिभिरवलोकितः। पाञ्चरात्रसंहितासु ज्ञान-योग-क्रिया-चर्याख्यानां चतुर्णां विषयाणां विस्तृतं तात्त्विकं च वर्णनं विद्यते। पाञ्चरात्रीयसंहितासु दार्शनिकतत्त्वानि सूक्ष्ममीमांसया सम्यक्प्रकारेण प्रमाणप्रतिपन्नरीत्या प्रकटीकृतानि। तासु जीवब्रह्मरहस्योद्घाटनम्, एवमखण्डब्रह्माण्डोत्पत्तिविमर्शौ ज्ञानपदेनोदीरिते (ईश्वरसंहिता २.५६)। योगस्तु व्यावहारिकसैद्धान्तिकधरातले मुक्तिसाधकानां कर्मणां विवेचनमेवमनुगमनमेव। देवा- लयनिर्माणमचेतनमूर्तिप्राणप्रतिष्ठाविधानमेवं मूर्तिसम्बन्धिन्य उक्तयः संहितासु क्रिया- विवेचनक्रमे उट्टङ्कितानि। चर्याविवेचनप्रसङ्गे वैष्णवागमेष्वधिकतरा दत्तचित्ता दृश्यते। तदेश्वरस्य षड्गुणानां चर्चा वर्तते। ज्ञान-शक्ति-ऐश्वर्य-बल-वीर्य-तेजसां तस्य निर्गुणस्यापीश्वरस्य षड्गुणानां तत्र विवेचनं कृतम्, यैर्गुणैस्तस्मिन् सगुणता समागच्छति। एषां गुणानां स्थाने स्थाने सर्वत्रैव व्याख्या अतितार्किकरीत्या कृता आगमाचार्यैः। व्यूहवादः पाञ्चरात्रस्य प्रधानतया दार्शनिकस्वरूपनिर्देशकस्य व्यूहवादस्यापि विवेचनं प्रसङ्गतः समीचीनं प्रतिभाति। गीतायां वासुदेवस्य अष्टधा प्रकृतिपर्यालोचनप्रसङ्गे पञ्चतत्त्वविवेचनकाले मनोबुद्धिजीवाहङ्काराणां चर्चा विद्यते। 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च' इत्यादि। कालक्रमेण जीवमनोऽहङ्काराणां सङ्कर्षणप्रद्युम्ना- निरुद्धा इति नामान्तराण्याभवन्। व्यूहवादस्य 'जनार्दनस्त्वात्मचतुर्थ एव' इति कथयित्वा पतञ्जलिनापि सम्भवतोऽस्य चर्चा विहितेत्यनुमीयते। किन्तु विषयेऽस्मिन् महान् विवादः। सा० सं० - 2
१८ सात्वतसंहिता संक्षेपतो व्यूहवादस्यैतत् स्वरूपम्—सृष्टिकाले वासुदेवोऽव्यक्तां प्रकृतिमेव न सृजति, किन्तु प्रकृत्या सार्धं सङ्कर्षणाख्यस्य विशिष्टजीवस्यापि रचनां करोति । तस्य सङ्कर्षणस्य प्रकृत्या संयोगे सति मनस उत्पत्तिर्जायते, यत् सांख्यस्य बुद्धिस्थानापन्न- त्वेन ज्ञातुं शक्यते । एवं तस्मिन्नेव काले तस्य प्रतिरूपभूतस्य प्रद्युम्नस्योत्पत्ति- र्भवति । प्रद्युम्नत एव मनःसंयोगे सति सांख्याभिमतस्याहङ्कारस्योत्पत्तिर्जायते । एवं तस्मिन् क्षण एव तस्य तृतीयप्रतिरूपभूतस्यानिरुद्धस्य प्रादुर्भावो भवति । अनिरुद्धत एव सांख्यसम्मतस्याहङ्कारस्य संयोगे सति महाभूतानामेवं तेषां गुणानामाविर्भावो भवति । तस्मिन्नेव क्षणे विविधानि तत्त्वान्यादाय पृथिव्यादिनिर्माणक्षमस्य ब्रह्मणः प्रादुर्भावो भवति । ईश्वरस्य षड्गुणाः पूर्वमेव वर्णिताः । तेषु गुणेषु गुणद्वयस्य प्राधान्ये सति त्रित्वसंख्याविशिष्टस्य व्यूहस्य रचना भवति । उदाहरणं यथा— सङ्कर्षणे ज्ञानस्य बलस्य चाधिक्यं भवति, प्रद्युम्ने ऐश्वर्यस्य वीर्यस्य चाधिक्यमस्ति, अनिरुद्धे शक्तितेजसोराधिक्यं भवति । एवं क्रमशॊ यथापूर्वं वर्णनानुसारं व्यूहरचना सम्पादिता भवति । अयमेव चतुर्व्यूहवादः । श्रीशङ्कराचार्येण शारीरकभाष्ये (२।२।४२-४५) अस्य खण्डनं कृतम् । किन्तु रामानुजाचार्यस्य एतद्विषयकं मण्डनमपि मननीयम् । सृष्टौ शुद्धाध्वा अथ च विशाखयूपविमर्शः श्रियः सिसृक्षया चत्वारो भगवद्व्यूहा आविर्भूताः, ते यथा—वासुदेवः, सङ्कर्षणः, प्रद्युम्नः, अनिरुद्धः । एते व्यूहा जगद्व्यापारकरणार्थं चतुर्व्यूहोपासन- निरतानां योगिनां ध्यानालम्बनार्थं चाविर्भूय ध्यानसौकर्याय रूपचतुष्केण प्रकाशन्ते । यथा— तुर्यस्थानम् —|— व्यूहचतुष्कं रेखारूपेणापि न दृश्यम् । सुषुप्तिस्थानम् —|— व्यूहचतुष्कं रेखारूपेण दृश्यम् । स्वप्नस्थानम् —|— व्यूहचतुष्कं अत्यन्तमलिनरूपम् । जाग्रत्स्थानम् —|— व्यूहचतुष्कं स्पष्टरूपम् । इदं च ध्वजस्तम्भाकारं रूपं विशाखयूपनाम्ना प्रथितम् । पूजितस्तम्भाभिप्रायेण यूपशब्दप्रयोगः । एभ्यो व्यूहेभ्यो द्वादश देवा व्यूहान्तरनाम्ना आविर्भूताः । यथा— वासुदेवात् केशवनारायणमाधवाः । सङ्कर्षणात् गोविन्दविष्णुमधुसूदनाः । प्रद्युम्नात् त्रिविक्रमवामनश्रीधराः । अनिरुद्धात् हृषीकेशपद्मनाभदामोदराः । शुद्धाध्वगता एते सर्वेऽपि देवा अप्राकृतलोके विराजन्ते, शुद्धसत्त्वमयाश्च । पूर्वोक्तात् विशाखयूपात् पद्मनाभादयोऽष्टत्रिंशत् विभवदेवा आविर्भूताः । एभ्यो विभवेभ्यो विभवान्तरनामानः बहवोऽवतारा बादरायणादिरूपेणास्मिन् लोके भवन्ति । पूर्वोक्तात् विशाखयूपादेवाचार्चारूपा देवा आविर्भूय देवालयेषु सम्पूजिता विराजन्ते ।
प्राक्कथनम् १९ एते विभवादयो देवाः प्राकृतलोके कृतावतरणाः, शुद्धसत्त्वमयाश्च । अत एवायं क्रमः शुद्धाध्वेत्युच्यते । अशुद्धाध्वा— पूर्वनिर्दिष्टया देव्याः सिसृक्षयैवाशुद्धाध्वाविर्भावः । यथा—षाड्गुण्ये ज्ञानं सत्त्वात्मना, ऐश्वर्यं रजोरूपेण, शक्तिः तमोरूपेण च परिणम्य त्रैगुप्यरूपमवापुः । ततो देव्याः श्रिय एव रजोगुणप्रधाना महालक्ष्मीः, तमोगुणप्रधाना महामाया, सत्त्वगुणप्रधाना महाविद्या चाविर्बभूवुः । ततः प्रद्युम्नांशात् महालक्ष्म्यां मानसः धाता श्रीश्च, सङ्कर्षणांशात् महामायायां मानसः रुद्रः त्रयी च, अनिरुद्धांशात् महाविद्यायां मानसः केशवः गौरी चेति संजाताः । एतत् प्रथमं पर्व । ततो धाता त्रय्या सह संभूय अण्डमजीजनत् । रुद्रः गौर्या सह संभूय तत् अभिनत् । केशवः श्रिया सह संभूयाण्डमध्यस्थं प्रधानमरक्षत् । ततः केशवः प्रधानं सलिलीकृत्य तत्र श्रिया सहाशयिष्ट । एतत् द्वितीयं पर्व । सलिले शयानस्य केशवस्य नाभेः कालमयं कमलं समभवत् । तस्मिन् नाभिकमले त्रय्या सह धाता पुनः प्रादुर्बभूव । नाभिकमलं त्रयी धाता चेति त्रयमपि मिलित्वा तामसो महान् जातः । महतोऽहंकारः संजातः । स चाहंकारस्त्रिविधः— सात्त्विकः राजसः, तामसश्चेति । सात्त्विकात् पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि, राजसात् पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयस्मान्मनश्च संजातानि । तामसात् शब्दतन्मात्रम्, तस्मात् शब्दः स्पर्शतन्मात्रं च, ततः स्पर्शः रूपतन्मात्रं च, ततो रूपं रसतन्मात्रं च, ततो रसः गन्धतन्मात्रं च, ततो गन्ध इत्युत्पद्यन्ते । महान्तमारभ्य गन्धान्तं संभूयाण्डमभवत् । तस्मात् चतुर्मुखः प्रजापतिर्जज्ञे । प्रजापतेर्मनवः । मनुभ्यो मानवादयः चेतना अचेतनाश्च समजायन्त । एतत् तृतीयं पर्व । एतानि त्रीण्यपि पर्वाणि त्रिगुणमयानि । अत एवायं क्रमोऽशुद्धाध्वेत्युच्यते । सात्त्वतसंहितायाः मुख्यविषयाः— प्रथमे परिच्छेदे प्रश्नप्रतिवचनम्, द्वितीये परिच्छेदे तुरीयव्यूहसमाराधनम्, तृतीये परिच्छेदे सुषुप्तिव्यूहसमाराधनम्, चतुर्थे परिच्छेदे स्वप्नव्यूहविधानम्, पञ्चमे परिच्छेदे जाग्रद्व्यूहसमाराधनम्, षष्ठे परिच्छेदे चातुरात्म्यबाह्याराधनम्, सप्तमे परिच्छेदे अमन्त्रकव्रतविधिः, अष्टमे परिच्छेदे समन्त्रकव्रतविधिः, नवमे परिच्छेदे विभवदेवतान्तर्यागविधिः, दशमे परिच्छेदे विभवदेवताबहिर्यागविधिः, एकादशे परिच्छेदे मण्डलकूण्डललक्षणविधानम्, द्वादशे परिच्छेदे विभवदेवताध्यानम्, त्रयोदशे परिच्छेदे भूषणास्त्रदेवताध्यानम्, चतुर्दशे परिच्छेदे पवित्रारोपणविधिः, पञ्चदशे परिच्छेदे पवित्रस्नपनविधिः, षोडशे परिच्छेदे त्रिविधदीक्षाविधानम्, सप्तदशे परिच्छेदे वैभवीयनृसिंहकल्पः, अष्टादशे परिच्छेदे अधिवासदीक्षाविधिः, एकोनविंशे परिच्छेदे दीक्षाविधिः, विंशे परिच्छेदे अभिषेकविधिः, एकविंशे परिच्छेदे समयविधिः, द्वाविंशे
२० सात्त्वतसंहिता परिच्छेदे समयिपुत्रकादिलक्षणम्, त्रयोविंशे परिच्छेदे विभवदेवतापिण्डमन्त्रोद्धारः, चतुर्विंशे परिच्छेदे प्रतिमापीठप्रासादलक्षणम् तथा पञ्चविंशे परिच्छेदे प्रतिष्ठाविधिः इत्यादि प्रधानविषयाः प्रतिपादिताः । समस्तागमा मूलमन्त्राश्च सर्वे यतः संप्रसूता यतः सिद्धिमन्त्राः । पुराणार्णमाद्यं दशार्णं जपन्ते नमामः पुरारिं मुरारेः प्रियं तम् ॥ श्रीगंगासप्तमी, २३.४.२००७ विद्वद्वशंवदः वैशाख शुक्ल, वि.सं. २०६४ सुधाकर मालवीयः
भूमिका कृष्णद्वैपायनं वन्दे व्यासं तमरणीपतिम् । शुको यन्मुखतो जातो यन्मुखात् परमागमम् ॥ पाञ्चरात्रागम पाञ्चरात्रशास्त्र का अध्यापन पाँच दिन एवं रात्रियों में पूर्ण होने के कारण 'पाञ्चरात्र' शास्त्र नाम पड़ा । जैसा कि ईश्वरसंहिता में वचन है— पञ्चायुधांशास्ते पञ्च शाण्डिल्यश्चौपगायनः । मौञ्जायनः कौशिकश्च भारद्वाजश्च योगिनः ॥ .....पञ्चापि पृथगेकैकदिवारात्रं जगत्प्रभुः । अध्यापयामास यतस्तदेतन्मुनिपुङ्गवाः । शास्त्रं सर्वजनैर्लोके पञ्चरात्रमितीर्यते ॥ (ईश्वरसंहिता २१.५१९-५३३) मार्कण्डेयसंहिता में भी ऐसा ही कहा है— सार्धकोटिप्रमाणेन कथितं तस्य विष्णुना । रात्रिभिः पञ्चभिः सर्वं पञ्चरात्रमतः स्मृतम् ॥ (पृ०४) पञ्चकाल प्रक्रिया प्रतिपादित होने से इस शास्त्र का नाम पाञ्चरात्र पड़ा है । दोनों ही पक्ष में रात्रि शब्द का अर्थ अहोरात्र ही है । यह पक्ष आचार्य की सूक्ति में प्रतिपादित है— पञ्चकालव्यवस्थित्यै वेङ्कटेशविपश्चिता । श्रीपाञ्चरात्रसिद्धान्तव्यवस्थेयं समर्थिता ॥ (पाञ्चरात्ररक्षा, पृ० ४४) भारद्वाजसंहिता में भी ऐसा ही कहा है— प्रथमं ब्रह्मरात्रं तु द्वितीयं शिवरात्रकम् । तृतीयमिन्द्ररात्रं तु चतुर्थं नागरात्रकम् ॥ पञ्चममृषिरात्रं तु पञ्चरात्रमिति स्मृतम् । एवं जातमृषिश्रेष्ठ पञ्चरात्रं पुरा युगे ॥ (भारद्वाजसंहिता २.१२.१३) सनत्कुमारसंहिता में 'नागरात्र' का उल्लेख नहीं है ।
२२ सात्वतसंहिता पाञ्चरात्र शास्त्र-विभाग लक्ष्मीतन्त्र के अनुसार पाञ्चरात्र शास्त्र के तीन विभाग हैं—१. दिव्य पाञ्चरात्र, २. मुनिभाषित पाञ्चरात्र और ३. मानुष पाञ्चरात्र । पाञ्चरात्र शास्त्र के तीन ग्रन्थ सात्वतसंहिता, पौष्करसंहिता एवं जयाख्यसंहिता इनमें से दिव्य पाञ्चरात्र के अन्तर्गत आते हैं क्योंकि भगवान् नारायण के द्वारा साक्षात् रूप से यह प्रतिपादित है । इनसे अन्य ब्रह्मादि के द्वारा प्रतिपादित होने से ईश्वरसंहिता, पारमेश्वरसंहिता एवं भारद्वाज आदि संहिता मुनिभाषित पाञ्चरात्र हैं । पाञ्चरात्रशास्त्र से अन्य ग्रन्थ आप्त मनुष्यों द्वारा कहे जाने के कारण मानुष पाञ्चरात्र के अन्तर्गत आते हैं । ये तीनों ही पाञ्चरात्रशास्त्र, दिव्यशास्त्र तथा सिद्धान्त पाञ्चरात्र शास्त्र के नाम से पुकारे जाते हैं । जैसा कि लक्ष्मीतन्त्र में कहा है— दिव्यशास्त्राण्यधीयीत निगमांश्चैव वैदिकान् । सर्वाननुचरेत्सम्यक् सिद्धान्तानात्मसिद्धये ॥ (लक्ष्मीतन्त्र २८.२९) दिव्य शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए । वैदिक निगमों का स्वाध्याय करना चाहिए और आत्मसिद्धि के लिये मन्त्र आगमादि सिद्धान्तों का स्वाध्याय करना चाहिए । आराधना के समय भगवान् वासुदेव एवं सङ्कर्षण आदि व्यूह के भेद से पुनः मन्त्र, आगम, तन्त्र एवं तन्त्रान्तर ये चार भेद पाञ्चरात्र के माने जाते हैं । पाञ्चरात्र आगम में भगवत्, सात्वत, एकान्तिक और परम एकान्तिक इन चार शब्दों का व्यवहार होता है । इनमें से भागवत् शब्द का अर्थ महाभारत में इस प्रकार है— द्वादशाक्षरतत्त्वज्ञश्चतुर्व्यूहविभागवित् । अच्छिद्रपञ्चकालज्ञः स वै भागवतः स्मृतः ॥ (महाभा०, आश्वमेधिक पर्व ११८.३३) द्वादशाक्षर मन्त्र—ॐ नमो भगवते वासुदेवाय के तत्त्व को जानने वाला, वासुदेव, सङ्कर्षण आदि चतुर्व्यूह के विभाग तथा पञ्चकाल का तत्त्वज्ञ साधक भागवत् शब्द से व्यवहृत होता है । सत् शब्द से वासुदेव परब्रह्म को कहा जाता है । उन परब्रह्म वासुदेव से युक्त साधक को सात्वत शब्द से अभिहित किया जाता है । वस्तुतः पाञ्चरात्रशास्त्र में षाड्गुण्य तथा चातुर्व्यूह आदि स्वार्थिक तद्धितान्त शब्दों का प्रयोग बहुशः प्राप्त होता है । उसी प्रकार सत्वन्त इस अर्थ में सात्वत (= वासुदेवाराधक) शब्द का प्रयोग है । इन्हीं प्रयोगों को देखकर ही भगवान् पतञ्जलि ने महाभाष्य में 'प्रियतद्धिताः दाक्षिणात्याः' (महाभाष्य १.१.१) में कहा है । वासुदेव में ही एक मात्र भक्ति होने से एकान्तिक शब्द का व्यवहार होता है । इन्हीं को परम एकान्तिक भी कहा जाता है ।
भूमिका २३ पाञ्चरात्रशास्त्र में पादविभाग इस शास्त्र के ग्रन्थ 'संहिता' 'उपनिषद्' या 'तन्त्र' शब्द से व्यवहित होते हैं। उनमें पाद्मसंहिता आदि में ज्ञान, योग, क्रिया एवं चर्या-इन चारों पादों का प्रतिपादन मिलता है। संक्षिप्त रूप से इन्हीं चार विषयों का प्रतिपादन पाञ्चरात्र आगम ग्रन्थों में प्राप्त होता है। ज्ञानपाद में वासुदेव आदि चतुर्व्यूह एवं व्यूहान्तर के स्वरूप एवं उनकी महिमा के संबन्ध में विचार किया गया है। योगपाद में उनकी उपासना का प्रकार वर्णित है। क्रियापाद में उनके अर्चा विग्रह एवं मन्दिर निर्माण का विवेचन है। चर्यापाद में उनकी आराधना की विधि बताई गई है। पाञ्चरात्रागमों में भगवदर्चा का अधिकार पाञ्चरात्रागमों में भगवत्पूजा तो सर्वसाधारण है। यह पूजा पाञ्चरात्र तान्त्रिक मन्त्रों के द्वारा की जा सकती है। यहाँ विशेष यह है कि पाञ्चरात्रशास्त्रों में भगवद् अर्चा में वैदिक एवं तान्त्रिक दोनों ही मन्त्रों का विधान है। जहाँ वैदिक मन्त्रों में तीन वर्णों का ही अधिकार था वहाँ तान्त्रिक मन्त्रों में त्रैवर्णिकों या अत्रैवर्णिकों सभी का अधिकार है। पाञ्चरात्रागमों के प्रवक्ता पाञ्चरात्रागम ईश्वर द्वारा स्वयं प्रोक्त हैं। जैसा महाभारत में कहा भी है— सांख्यस्य वक्ता कपिल.....पाञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम्—शान्तिपर्व ३५९.६५-६८ इस प्रकार स्वयं ही नारायण ने इस शास्त्र को आविष्कृत किया है। महाभारत में वहीं पर यह भी कहा गया है कि वेदान्त के सार को लेकर भगवान् लक्ष्मीनारायण ने भक्तों के ऊपर अनुग्रह करके इस पाञ्चरात्रशास्त्र को प्रवर्तित किया— इदं महोपनिषदं चतुर्वेदसमन्वितम्। सांख्ययोगकृतान्तेन पञ्चरात्रानुशब्दितम् ॥ वेदान्तेषु यथासारं संगृह्य भगवान् हरिः । भक्तानुकम्पया विद्वान् संचिक्षेप यथासुखम् ॥ —महाभारत, शान्तिपर्व ३४८.६३-६४ पाञ्चरात्रशास्त्र का काल 'वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्' ४.३.९८ इस सूत्र में पाणिनि द्वारा भगवान् वासुदेव की पूजा का उल्लेख होने से पाणिनि के काल अर्थात् ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व इस शास्त्र का अस्तित्व विद्यमान था। वासुदेव यह नाम 'संज्ञैषा भगवतः' इस प्रकार महाभाष्य में उल्लेख होने से भगवान् वासुदेव की पूजा पाञ्चरात्रान्तर्गत होना निर्विवाद है। पाणिनि का काल विद्वानों ने ईसा से पूर्व चतुर्थ शतक स्वीकार किया है। सात्वतसंहिता एवं पाञ्चरात्रागम सात्वत शब्द वासुदेव के भक्त के लिए प्रयुक्त हुआ है। हेमचन्द्र ने इन्हें
२४ सात्त्वतसंहिता ‘बलदेव’ का पर्याय माना है। महाभारत १.२१९.१२ में इस शब्द को कृष्ण के पर्याय रूप में ग्रहण किया गया है। महाभारत १.२२२.३ में सम्पूर्ण यादवों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग हुआ है। वस्तुतः यह शब्द विष्णु के पर्याय के रूप में जाना जाता है। सच्छब्देन सत्त्वमूर्तिर्भगवान्। स उपास्यतया विद्यतेऽस्य इति, मतुप् ततः स्वार्थे अण् इस प्रकार व्युत्पत्ति की जाती है। पद्मपुराण के उत्तर खण्ड १९ अध्याय में ‘सात्वत’ का अर्थ विष्णु का भक्त किया गया है। इसका लक्षण इस प्रकार है— सत्त्वं सत्त्वाश्रयं सत्त्वगुणं सेवेत केशवम्। योऽनन्यत्वेन मनसा सात्वतः समुदाहृतः॥ विहाय काम्यकर्मादीन् भजेदेकाकिनं हरिम्। सत्यं सत्त्वगुणोपेतो भक्त्या तं सात्वतं विदुः॥ इस संहिता (तन्त्र) में महर्षि नारद ने सात्वत (=वासुदेव) आदि चतुर्व्यूह का २५ अध्यायों में प्रवचन किया है। उपनिषद् के समान पाञ्चरात्र आगमों में वासुदेव को ब्रह्म के रूप में वर्णित किया गया है। यही पाञ्चरात्रशास्त्रों का आगम तत्त्व है अर्थात् दार्शनिक परिप्रेक्ष्य है जिसके कारण इन्हें ‘पाञ्चरात्रागम’ की संज्ञा दी जाती है। उन्हें ही विष्णु, नारायण, विश्व और विश्वरूप कहा जाता है। यह सारा विश्व उन्हीं की अहन्ता से व्याप्त है। जिससे अहंभाव का स्मरण होता है वही परमात्मा है, वही भगवान् वासुदेव कहे जाते हैं, जिन्हें पर तथा क्षेत्रज्ञ भी कहा जाता है। इस जगत् में कोई भी ऐसी वस्तु या अवस्तु नहीं है, जो ‘अहन्ता’ से आक्रान्त न हो। इदन्तया प्रतीत होने वाला यह सारा जगत् उस ‘अहन्ता’ से आक्रान्त है। सर्वतः शान्त एवासौ निर्विकारः सनातनः। अनन्तो देशकालादिपरिच्छेदविवर्जितः॥ महाविभूतिरित्युक्तो व्याप्तिः सा महती यतः। तद् ब्रह्म परमं धाम निरालम्बनभावनम्॥ (लक्ष्मीतन्त्र २.८-९) शोक, मोह, जन्म-मृत्यु और सुख-दुःख इन छह तरङ्गों से रहित होने के कारण वह ‘अहन्ता’ सर्वथा शान्त है, निर्विकार और सनातन है। देशकाल आदि से परिच्छिन्न न होने के कारण वह अनन्त है। उस अहन्ता की व्याप्ति महती है, इसलिये उसे ‘महाविभूति’ कहते हैं। उसका कोई आलम्बन नहीं है, इसलिये वही ब्रह्म है, वही परम धाम (तेजःस्वरूप) है। निस्तरङ्गामृताम्भोधिकल्पं षाड्गुण्यमुज्ज्वलम्। एकं तच्चिद्घनं शान्तमुदयास्तमयोज्झितम्॥