सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)
Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)
राजीव दीक्षित द्वारा
स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)
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को और मज़बूत बनाकर 'ओऽम्' का मानसिक जप करते हुए सोने की तैयारी करिए। वैसे तो प्रातःजागरण, शयनकालीन और संध्या के लिए वेदों में बड़े सुन्दर मंत्र हैं, जिनकी विशेष रुचि हो वे अलग से जानकारी कर सकते हैं। इसके अलावा आत्मसुधार के इच्छुक लोगों को महात्मा गाँधी की आत्मकथा(मेरे सत्य के प्रयोग) भी अवश्य पढ़नी चाहिए।
यह मन और विचार को सुन्दर बनाने का अनुभूत अभ्यासक्रम है। लेखक ने ध्यान-संध्या के अभ्यास से अपने कई दुगुणों को दूर भगाने में सफलता पाई है, इसलिए उम्मीद है कि जनसामान्य को भी इस तरह के अभ्यासक्रम से अवश्य ही लाभ होगा।
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द्वितीय खण्ड
कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से सावधान !
एक फोटो स्टूडियो वाले ने एक ही साइज़ के फोटो खिंचवाने के तीन रेट लिख रखे थे—10 रु., 20 रु. और 30 रु.। एक ग्राहक ने उत्सुकता जताते हुए पूछा — क्यों जनाब ! एक ही साइज़ के फोटो उतारने के तीन तरह के रेट क्यों लिख रखे हैं? क्या लोग इतने मूर्ख हैं, कि जो फोटो 10 रु. में उतर सकता है, उसके 30 रु. दें? फोटोग्राफर बोला—देखिए महाशय, लोग मूर्ख हैं या बुद्धिमान, इस पर तो मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता, पर इतना सत्य जानें कि जब से मैंने स्टूडियो खोला है तब से जितने भी ग्राहक आ रहे हैं, सब खिंचवाते 30 रु. रेट वाला ही फोटो हैं। आज तक कोई 10 रु. या 20 रु. वाला फोटो खिंचवाने को तैयार नहीं हुआ। ग्राहक चकित होकर बोला—क्यों भई ऐसा क्यों? तो फोटोग्राफर ने समझाते हुए कहा— इसकी वजह यह है कि 10 रु. वाला फोटो वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप वास्तव में हैं, 20 रु. वाला वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप दिखाई देते हैं; और 30 रु. वाला वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप दिखाई देना पसन्द करते हैं। दरअसल कोई भी वैसा दिखना नहीं चाहता जैसा वास्तव में होता है या जैसा दिखता है और इसलिए सब 30 रु. देकर वैसा ही फोटो उतरवाते हैं जैसे कि वे दिखाई देना पसन्द करते हैं।
यह बोधकथा जिस मानसिकता को उजागर करती है, यह वास्तव में वही मानसिकता है जिसके चलते भाँति-भाँति के कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों की बाढ़ सी आ गई है। लोग दरअसल जैसा दिखना पसन्द करते हैं, वैसा दिखने के लिए ही तरह-तरह के बाजारू सौन्दर्य प्रसाधनों को आजमाने में लगे हुए हैं। गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह ब्यूटी पालर खुलने लगे हैं तो इसकी भी वजह वही है। यूँ सुन्दर दिखना कोई बुरी बात नहीं है, पर सुन्दरता में इतनी कृत्रिमता आ जाए, सौन्दर्यबोध विकृत हो जाए और दो पल की चमक-दमक के पीछे लोग प्रकृति, स्वास्थ्य और अपनी संस्कृति तक भूल जाएं, तो बात चिन्ताजनक हो जाती है। महिलाएं जिस तरह से इस बाजारू सौन्दर्य के मायाजाल में फँस रही है वह ज्यादा गंभीर स्थिति है, इसलिए कि महिलाएं ही वास्तव में सांस्कृतिक परम्पराओं के निर्वहन का सबसे अहम दायित्व निभाती रही हैं।
लेखक देश की नारियों को इस बात के लिए सचेत करना अपना कर्तव्य मानता है कि अगर वे बाजारू सौन्दर्य प्रसाधनों के पीछे की पागल दौड़ में शामिल हो रही हैं तो निश्चित जान लें कि
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वर्तमान और भावी पीढ़ियों के चारित्रिक पतन की आधारभूमि भी तैयार कर रही हैं। इसके अलावा बनावटी सौन्दर्य के इस पश्चिमी तौर-तरीके के चलते सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण के लिए जिस तरह से जीव-जन्तुओं की बड़े पैमाने पर क्रूर हत्याएं की जा रही हैं, वह भी निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के खिलाफ है। होठों को लिपिस्टिक से लाल करते समय यह बात एक बार जरूर याद कर लेना चाहिए कि इसे बनाने के लिए जाने कितने पशु-पक्षियों का खून निचोड़ा गया होगा। संवेदनशील व्यक्ति के लिए कितना हृदय विदारक दृश्य होता होगा जबकि 'स्लेण्डलोरिस' नामक बन्दर की आँखें और दिल निकालकर बेस पाउडर जैसी चीजें बनाने में इस्तेमाल की जाती होंगी। भाँति-भाँति के इत्रों की खुशबुओं में तर रहने वाले लोगों को शायद ही मालूम होगा कि बिज्जू को बेंतां से पीटा जाता है और उसकी ग्रन्थियों को चाकू से खरांचा जाता है तो वह व्यग्र होकर एक प्रकार का स्राव छोड़ता है। इसी स्राव को इकट्ठा करके इस्तेमाल किया जाता है। तालाबां से कछुए पकड़कर मारना और उनका तेल निकालकर सौन्दर्य प्रसाधन निर्माताओं को बेचना तो जैसे कुछ जातियों का पेशा ही बनता जा रहा है। स्थिति यह है सौन्दर्य प्रसाधनों के अंधाधुंध व्यापार के चलते जीव-जन्तुओं की तमाम प्रजातियाँ विलुप्त के कगार पर पहुँच गई हैं।
इस तरह के बाकी सारे मुद्दों को किनारे रखते हुए सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो भी कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से यथासंभव दूरी बनाये रखने में ही भलाई है। भाँति-भाँति के शैम्पू, साबुन, क्रीम, फेस पाउडर, टेलकम पाउडर, नेल पालिश, पालिश रिमूवर, हेअर डाई, हैंड व बाडी लोशन, आई लाइनर, हेअर रिमूवर, हेअर स्प्रे, आई शैडो, लिपिस्टिक, परफ्यूम आदि जितनी भी सौन्दर्य प्रसाधन की चीजें हैं, ज्यादातर में हानिकारक किस्म के रसायन होते हैं। लिपिस्टिक में इस्तेमाल किये जाने वाले रसायन इतने नुकसानदेह होते हैं कि अक्सर इनके प्रभाव से होठों का प्राकृतिक रंग तक समाप्त हो जाता है और उन पर सफेद धब्बे उभर आते हैं। महिलाओं के होठों के काले पड़ जाने के पीछे भी सबसे बड़ा कारण रसायन मिश्रित लिपिस्टिक ही है। लिपिस्टिक में कई तरह के अघुलनशील एवं अखाद्य रंग आदि पदार्थ मिले होते हैं। इनमें मिलाए जाने वाले मोम, सीसा और कैडमियम जैसे पदार्थ भी शरीर के लिए नुकसानदेह ही होते हैं। ये पदार्थ होठों के सहारे पेट में पहुँचते हैं तो शारीरिक विकृतियों, एलर्जी तथा कैंसर जैसे रोगों के कारण बनते हैं। एओसिन, एमरेन्थ, बिस्मथ, रोडोगाइन-बी, टारटूजीन, लैनोनिन सरीखे तत्व भी हर तरह से हानिकारक ही हैं। एमरेन्थ तो प्रजजन प्रणाली तक में विकृतियाँ पैदा कर देता है।
यह भी एक भ्रम है कि सख्त नाखूनों के ऊपर लगे होने के कारण नेल पालिश से कोई नुकसान नहीं हो पाता। वास्तव में नेल पालिश में कई तरह के जटिल रसायन मिले होते हैं। ऐसे में इसके नियमित इस्तेमाल से नाखून रोगग्रस्त हो सकते हैं। नेल पालिश नाखूनों की प्राकृतिक चमक को तो नष्ट करता ही है, वे कमजोर होकर टूटने लगते हैं और खुरदुरेपन के शिकार भी हो सकते हैं। इसी तरह नेल पालिश रिमूवर के इस्तेमाल से भी नाखून और समीप की त्वचा पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
सुहाग के प्रतीक के तौर पर प्रयोग किया जाने वाला सिन्दूर आज जिस तरह से बनाया जाता है वह भी कम घातक नहीं है। सिन्दूर में प्रायः बेहद खतरनाक किस्म का रसायन लेड
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आक्साइड मिला होता है। इसका विषैला प्रभाव कैंसरकारक तो है ही, यह रक्त में पहुँचकर हीमोग्लोबिन के निर्माण को प्रभावित करके रक्ताल्पता भी पैदा कर सकता है। गर्भस्थ शिशु भी इससे प्रभावित हो सकता है। इसलिए एक तो महिलाएं रसायन मिश्रित सिन्दूर की जगह माँग में प्राकृतिक लालिमा लगाएं तो अति उत्तम; अन्यथा, सिन्दूर लगाएं भी तो कम से कम मात्रा में लगाएं और जिस हाथ से लगाएं उस हाथ को अच्छी तरह से अवश्य धो लें। सिन्दूर की ही भाँति आजकल बाजारों में बिकने वाला सुरमा भी अक्सर अपमिश्रित होता है। आजकल के सुरमा निर्माता कम लागत में ज्यादा मुनाफा बटोरने के लोभ में प्राकृतिक उपादानों के बजाय लेड सल्फाइड जैसे जहरीले रसायन इस्तेमाल करने लगे हैं। लगभग ऐसा ही हाल काजल का भी है। आँखें कजारी करने के चक्कर में कई बार आँखों की रोशनी तक चली जा सकती है। बेहतर है कि काजल या सुरमा घर में ही शुद्धता से बना लिया जाय। बाज़ार से खरीदना पड़े तो विश्वसनीय आयुर्वेदिक सुरमा या काजल ही लेना चाहिए। माथे पर लगाई जाने वाली छोटी सी बिन्दी के पीछे चिपकाने के लिए लगा गोंद अगर अच्छे दर्जे का न हो तो वह भी नुकसानदेह हो सकता है। जहाँ बिन्दी चिपकाई जाती है वहाँ की खाल उधड़ सकती है, खुजली हो सकती है और दूसरे किस्म के चर्मरोग भी हो सकते हैं। इसलिए बिन्दी लगाने में भी सावधानी बरतने की जरूरत है।
तमाम तरह के सुगन्धित सौन्दर्य प्रसाधन शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। इस तरह के प्रसाधनों के निर्माण में लगभग 5000 प्रकार के घटक द्रव्य इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें से कोई भी घटक त्वचा में एलर्जी, जलन या विकार पैदा कर सकता है। आजकल पसीना निरोधक प्रसाधनों का व्यापक उपयोग होने लगा है। ऐसे प्रसाधनों को लगाने से त्वचा के रोमछिद्र बन्द हो जाते हैं और पसीने के जरिए शरीर के विजातीय तत्त्व बाहर नहीं निकल पाते। नतीजन, त्वचा पर बुरा असर तो होता ही है, गुर्दों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है और वे विकारग्रस्त हो सकते हैं। ऐसे प्रसाधनों में प्रायः आक्सीक्विनोलिन सल्फा नामक रसायन मिला रहता है जो केन्द्रीय नाड़ी संस्थान पर बुरा प्रभाव डालता है। इसके अलावा इस तरह के प्रसाधनों में ज़िंक सल्फोकार्बोनेट, प्रोपेलेनि ग्लाइकोल, कास्टिक, बेंजोइक अम्ल, फ्लोरल हाइड्रेट तथा फार्मैलिडहाइड जैसे हानिकारक रसायन भी मिले होते हैं, जो त्वचा में जलन, एलर्जी या दूसरी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इनमें से फार्मैलिडहाइड शैम्पू, एण्टिसेप्टिक क्रीम, प्रिजर्वेटिव, नाखूनों को सख्त बनाने वाले घोलों, स्नानघर में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों आदि में भी मिलाया जाता है। इसका विषैला प्रभाव कैंसर रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी कर रहा है।
बालों को खिज़ाब (हेअर डाई) से रंगने का प्रचलन जिस स्फ़ुतार से बढ़ रहा है, वह भी कम हानिकारक नहीं है। खिज़ाब में मिला हुआ विषैला रसायन पैराफिनेलेन डाई एमीन रोग प्रतिरक्षक प्रणाली पर बुरा प्रभाव डालता है। इसमें कई ऐसे रसायन मिले होते हैं जो शरीर में एलर्जी की समस्या पैदा कर सकते हैं। कई खिज़ाब त्वचा में जलन, पीड़ा व चकत्ते की समस्या उत्पन्न करते हैं। खिज़ाब की गन्ध से सर्दी-जुकाम की भी समस्या पैदा हो सकती है। इसी तरह से मिनी आक्सीडिल रसायन मिले हुए हेअर क्रीम व लोशन के अधिक इस्तेमाल से सिर में भारीपन, झनझनाहट, धमक व झंझलाहट बढ़ती है व निम्न रक्तचाप हो सकता है।
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ब्यूटी पार्लरों की दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ती तादाद को देखते हुए इनके भी नुकसानदेह पक्ष पर एक नजर डालना जरूरी है। ब्यूटी पार्लरों के सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रमुख रूप से अमोनिया, हाइड्रोजन-पर-आक्साइड, चर्बी, एसीटोन वैक्सीन, वैसलीन, ज़िंक, स्पिरिट, अल्कोहल, ग्रीस जैसे पदार्थ प्रयोग किये जाते हैं। वास्तव में ये सभी चीज़ें त्वचा को किसी न किसी प्रकार से हानि पहुँचाती हैं। त्वचा में निखार लाने के लिए ब्लैचिंग की जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसमें अमोनिया का इस्तेमाल होता है और यह त्वचा को जलाकर कड़ी कर देता है। बालों को काला करने के लिए ब्यूटी पार्लरों में हाइड्रोजन पर-आक्साइड और आर्गनिक हाइड्रोकार्बन जैसे रसायन प्रयोग किए जाते हैं। ये इतने नुकसानदेह होते हैं कि बालों का झड़ना और पकना दोनों ही तेज़ हो जाते हैं। हेअर स्प्रे जैसे साधनों से भी सिर में जलन और सूजन की समस्या पैदा हो सकती है।
कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के इतने सारे नुकसानों को जानने के बाद भी अगर लोग इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से बाज़ न आएँ और ब्यूटी पार्लरों के चक्कर लगाएँ तो इसे एक तरह के पागलपन के अलावा और क्या कहा जा सकता है? वास्तव में कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के पीछे भागने के बजाय नींबू, खीरा, नीम, तुलसी, बेसन, गुलाबजल, चन्दन, चिरौंजी, दूध, हल्दी, दही, बादाम आदि ढेरों प्राकृतिक चीज़ों के सहारे सौन्दर्य को ज्यादा बेहतर तरीके से निखारा जा सकता है। यह भी मज़े की बात है कि जो फिल्मी अभिनेत्रियाँ कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों का दिन-रात विज्ञापन करती नज़र आती हैं वे खुद निजी तौर पर इनसे दूर ही रहती हैं। पत्रिकाओं-अख़बारों में प्रकाशित होने वाले अभिनेत्रियों के व्यक्तिगत साक्षात्कारों से इस तथ्य का खुलासा होता है कि वे अपना रूप और लावण्य बनाये रखने के लिए प्राकृतिक-आयुर्वेदिक उपायों को ही प्राथमिकता देती हैं। ऐसे में देश की नारियों को विशेष रूप से चाहिए कि वे विज्ञापनी मायाजाल से बाहर आएँ और कृत्रिमता से दूर हटकर प्राकृतिक सौन्दर्य प्रसाधनों को अपनाएँ। इस तरह से यदि देश की स्त्रियाँ ऐसा करने लगेँ तो वे अपने स्वास्थ्य और अपनी संस्कृति दोनों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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सुन्दरता का शत्रु है साबुन
दुनिया का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा, जहाँ साबुन का साम्राज्य न फैला हुआ हो। आज की पीढ़ी को नहाने के समय साबुन की ज़रूरत कुछ वैसे ही महसूस होती है जैसे कि भूख के समय भोजन की। शायद ही इने-गिने लोग हों जो साबुन के गुलाम न होंगे। आदत तो कुछ ऐसी हो गई है कि अगर एक-दो दिन भी बगैर साबुन के नहाना पड़ जाय तो लगता है कि जैसे कई दिनों से शरीर पर पानी ही न पड़ा हो।
वास्तव में विज्ञापनी मायाजाल ने साबुन को हमारी अनिवार्यताओं में शामिल कर दिया है। अन्यथा, त्वचा के स्वास्थ्य की दृष्टि से साबुन एकदम गैरज़रूरी और नुकसानदेह चीज़ है। साबुन में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन तमाम चर्मरोगों के कारण बनते हैं। हालाँकि जैसे-जैसे की स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ रही है वैसे-वैसे त्वचा के प्रति अहानिकर होने का दावा करने वाले साबुनों की संख्या भी बढ़ने लगी है। कई साबुन निर्माता दावा करते हैं कि उनका साबुन रसायन मुक्त है या जड़ी-बूटियां के मिश्रण से बनाया गया है, परंतु यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि उच्च से उच्च कोटि के साबुन में भी झाग पैदा करने के लिए कम से कम एक नुकसानदेह रसायन एस.एल.एस. (सोडियम लॉरेल सल्फेट) तो प्रायः मिलाया ही जाता है। अलबत्ता, कुछ निर्माता साबुन या शैम्पू के रैपर पर जड़ी-बूटियां की लंबी फेहरिस्त तो लिखते हैं पर हानिप्रद रसायन मिलाने के बावजूद इनका नाम नहीं देते। भक्त किस्म के जो लोग साबुन मल-मलकर नहाने के बाद पवित्र (?) होकर घंटों भजन-पूजन करते हैं, उन्हें यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि ज्यादातर साबुनों में बूचड़खानों से भारी मात्र में निकली चर्बी धड़ल्ले से मिलाई जाती है।
जो लोग यह सोचकर शरीर पर साबुन मलते हैं कि इससे मैल साफ होती है या सौन्दर्य में निखार आता है, वे बहुत हद तक भ्रम में जीते हैं। याद रखें कि साबुन से अगर कुछ ऊपरी गंदगी साफ होती है तो रसायनों की कहीं ज्यादा खतरनाक गंदगी त्वचा के रोम छिद्रों से शरीर के भीतर भी प्रवेश कर जाती है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आजकल की अपने को सभ्य और आधुनिक समझने वाली कई माँएं अपने नन्हे-मुन्ने शिशुओं तक को भाँति-भाँति के साबुनों से खूब रगड़-रगड़कर इसलिए नहलाती हैं कि इससे धीरे-धीरे उनके वर्ण में कुछ निखार आ जाएगा। अब इन सभ्य किस्म की मूर्ख माताओं को कौन समझाए कि अपने बच्चों का हित साधने की कोशिश में वे उनका अहित ही कर रही हैं। साबुन रगड़ने से रंग सुधरने के बजाय त्वचा कुछ बदरंग ही होगी, यह तय है। भाँति-भाँति के 'बेबी-सोप' भी अंततः निरापद नहीं हैं।
गौर करने वाली बात यह भी है कि जो फिल्मी हिरोइनें साबुनों के लुभावने विज्ञापनों में नज़र आती हैं वे ही अपनी असली जिन्दगी में उन साबुनों को इस्तेमाल करने लायक नहीं समझतीं। साबुन के बजाय अपनी सौन्दर्य-रक्षा के लिए वे प्राकृतिक और घरेलू तरीके ही ज्यादा अपनाती हैं।
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साबुन विरोधी इतनी बातों के बाद सवाल यह है कि अब अगर साबुन न लगाएँ तो कैसे नहाएँ ? साबुन लगाने की जिनकी रोज की आदत है, उनके लिए बगैर साबुन के स्नान की कल्पना तो और भी कष्टदायी है। पर यह वास्तव में एकदम से मुश्किल नहीं है। मन को थोड़ा दृढ़ कर लीजिए तो साबुन की ज़रूरत बड़ी आसानी से समाप्त हो जाएगी। त्वचा प्रकरण में वर्णित नुस्खों में साबुन के कई बेहतर घरेलू विकल्प मिल जाएँगे। उन्हें इस्तेमाल करके त्वचा के सौन्दर्य की ज्यादा अच्छी देखभाल की जा सकती है। यूँ शरीर पर कुछ भी न लगाएँ तो भी नहाते समय गीले तौलिये से रगड़-रगड़कर त्वचा की सफाई कर लेना पर्याप्त है। अगर तेल मालिश करते हों तो एक छोटी तौलिया अलग से रखें। स्नान के बाद इसी सूखी तौलिया से शरीर को रगड़-रगड़कर पांछ लें, तो आपकी त्वचा स्निग्ध और स्वस्थ तो बनेगी ही और साबुन की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी। इसके अलावा सुविधा हो तो बेसन, मुलतानी मिट्टी और कई तरह के उबटन बेहतर विकल्प हैं। इनकी विधियाँ इसी पुस्तक के 'त्वचा प्रकरण' और 'स्वदेशी चिकित्सा' नामक पुस्तक में वर्णित हैं। आगे के पृष्ठों पर वर्णित दूध से दाढ़ी बनाने और नहाने का नुस्खा भी आजमा सकते हैं। अब यदि इतने पर भी साबुन को अलविदा कह पाना मुश्किल ही लग रहा हो तो नीम, रीठा, शिकाकाई आदि जड़ी-बूटियों के योग से बने कुछ अच्छे किस्म के साबुन यदा-कदा इस्तेमाल किए जा सकते हैं। बच्चों के लिए साबुन के बजाय स्नान कराने से पहले उबटन लगाना सबसे अच्छा उपाय है।
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टूथब्रशः स्वास्थ्य का साधन या रोगाणुओं की सराय
हमेशा स्वास्थ्यप्रद आहार-विहार का पालन करने वाले भी अगर अचानक बीमार पड़ जाएं उनकी बीमारी रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले उन्हीं के टूथब्रश से उपहार में मिल गई हो। जी हाँ, दाँतों, मसूड़ों को स्वस्थ, सुंदर रखने की मंशा से अपनाया जाने वाला स्वास्थ्य का यह साधन कभी भी बीमारियों की सौगात ला सकता है।
यह ताज्जुब की बात जरूर लग सकती है, पर है एकदम सच। और, यह आश्चर्यजनक खोज की है स्वानंद अनुसंधान पीठम, पुणे के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की एक टीम ने। आजादी बचाओ आन्दोलन के यवतमाल (महाराष्ट्र) जिले के वरिष्ठ कार्यकर्ता जितेन्द्र लोड्या और उनके चिकित्सा विशेषज्ञ साथियों की टीम फिलहाल टूथब्रश के नुकसानदेह पहलुओं को काफी गम्भीरता से आमजन के बीच उजागर करने में लग गए हैं। शुरुआती दौर में ही टूथब्रश में पनपने वाली कई बीमारियों के जीवाणु ढूँढ़ निकाले गये हैं। इनमें हैजा जैसे संक्रामक रोगों तक के भी जीवाणु शामिल हैं। सेहत बरकरार रखने के नाम पर पूरी दुनिया में इस्तेमाल हो रहे टूथब्रश के कई दूसरे नुकसान तो खेर पूरी रिपोर्ट आ जाने के बाद ही पता चलेंगे, पर शुरुआती सूचनाओं से ही ख़तरे का संकेत तो मिल ही जाता है।
टूथब्रश और टूथपेस्ट जैसी चीजों के परीक्षण में लगे चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार मुँह से निकली गन्दगी की एक परत दरअसल टूथब्रश में नीचे की ओर ब्रश की जड़ों में धुलने के बाद भी अक्सर जमी ही रहती है। अब ऐसा तो होता नहीं कि ब्रश करने के बाद आप पानी गरम करें
टूथब्रश अच्छी तरह धुलकर रखें। यूँ गरम पानी से भी कोई गारण्टी नहीं है कि ब्रश की जड़ें ठीक से धुल ही जाएँ। वैसे भी काफी साफ़-सुथरी चिकनी चीजों को लगातार पानी से साफ़ करते रहने पर भी हफ़्ते दो हफ़्ते में जब साबुन वगैरह से अच्छी तरह रगड़ने की जरूरत महसूस होने लगती है, तो फिर साल-छः महीने लगातार इस्तेमाल होने वाले टूथब्रश को साफ़ रख पाना कितना कठिन होगा, यह समझा जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रश की जड़ों में जमी गन्दगी तरह-तरह की बीमारियों के जीवाणुओं के पनपने का अच्छा साधन है। इसके अलावा टूथब्रश सामान्यतः बाथरूम में लगे किसी स्टैंपड पर ही रखे जाते हैं। आधुनिकता के चलते लैट्रिन और बाथरूम अक्सर एक साथ जुड़े तो रहते ही हैं। ऐसे में पूरे घर में तरह-तरह के रोगाणुओं की संभावना वाली एकमात्र यही जगह है। स्पष्टतः यहाँ रखे टूथब्रश में जमे अन्न-कण रोगाणुओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बड़ी आसानी से बन ही जाते हैं और इस तरह इनका हमारे शरीर में पहुँचना एकदम आसान हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि तमाम तकनीकी बाजीगरी दिखाने के बावजूद भाँति-भाँति के टूथब्रश अंततः निरापद नहीं ही हैं।
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स्वास्थ्य की दृष्टि से निश्चित रूप से सबसे अच्छा उपाय नीम या बबूल की दातून है, पर दुर्भाग्य कि मुनाफ़ाखोरों की बिरादरी ने आधुनिकता और क्वालिटी के नाम पर दातून को दकियानूसी और घटिया प्रचारित कर-करके उसे हाशिए पर पहुँचा दिया। आज हालत यह हो गई है कि गाँव तक के लोग ब्रश से दाँत रगड़ते मिल जाते हैं। यह टूथब्रश और टूथपेस्ट का ही कमाल है कि आजकल के युवाओं की बत्तीसी कम उम्र में ही जवाब देने लगती है। कितनी विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि विदेशी लोग टूथब्रश से तौबा करके हिन्दुस्तानी नीम की दातून के हिमायती बन रहे हैं और हिन्दुस्तान के नौनिहाल अपनी ही उच्च क्वालिटी की विरासत को भूलाने में लगे हैं।
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शीतल पेय भी हैं सौन्दर्य के शत्रु
‘लाइफ स्टेटस’ का प्रतीक बन चुके कोका-पेप्सी जैसे शीतल पेय स्वास्थ्य और सौन्दर्य की दृष्टि से धीमे जहर ही हैं। शीतल पेय ज्यादा पीने से होठों व त्वचा का रूखापन तो बढ़ता ही है, बुढ़ापे का आक्रमण भी जल्दी होता है। पर इस जमाने की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि लोग बेवकूफ़ियाँ करते जाते हैं और तब तक नहीं चेतते जब तक कि पानी नाक से ऊपर नहीं पहुँच जाता। मैक्सिको में पानी सचमुच लोगों की नाक तक पहुँच आया है तो अब वे चेतने और चेताने का जोर-शोर से अभियान शुरू कर रहे हैं। यह अभियान पेप्सी, कोका जैसे विभिन्न ब्रांड के शीतल पेयों के ही खिलाफ़ है। मैक्सिकोवासी और मामलों में भले ही फ़िसड़ि हों, पर पेप्सी और कोकाकोला जैसे पेय गटकने की बहादुरी में दुनिया भर में अव्वल नम्बर पर रहे हैं। मैक्सिको का आम आदमी साल भर में औसतन 160 लीटर शीतल पेय उदरस्थ कर जाता है। यानि मैक्सिको के लोग नशे की हद तक शीतल पेयों की गिरफ़्त में हैं। नतीजा यह है कि वहाँ के लोगों की खान-पान की आदतें गड़बड़ा गई हैं और काफी लोगों को शीतल पेयों के साइड-इफ़ेक्ट्स झेलने पड़ रहे हैं।
पिछले एक साल पूर्व हालात बिगड़ते दिखे तो मैक्सिको के डॉक्टरों और उपभोक्ता मामलों में नज़र रखने वाली संस्था ने मिलकर शीतल पेयों के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर व्यापक अध्ययन और परीक्षण करके एक चौकाने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत की है। रिपोर्ट में आश्चर्यजनक रूप से कुछ वैसी ही बातें उभरकर आई हैं जैसी कि भारत में बहुराष्ट्रीय गुलामी के खिलाफ़ संघर्ष कर रहा आज़ादी बचाओ आंदोलन लंबे अरसे से करता रहा है। मैक्सिको के डॉक्टरों की रिपोर्ट इतनी प्रभावी और प्रामाणिक है कि पेप्सी और कोक जैसी कंपनियों की बोलती बंद है और वे कोई भी सफ़ाई देने से कतरा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक शीतल पेय ज्यादा पीने से डि-कैल्सीफ़िकेशन जैसी ख़तरनाक बीमारी हो सकती है। सिरदर्द, गैस्ट्रिक अल्सर व चिंता जैसी बीमारियों का ख़तरा तो बना ही रहता है। मैक्सिकन एसोसिएशन ऑफ़ स्टडीज फ़ॉर कंज्यूमर डिफ़ेन्स और चिकित्सकों के स्वास्थ्य अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार इन शीतल पेयों में प्रोटीन,
की मात्रा शून्य होती है। इसलिए इन्हें लेने से भूख घट जाती है और कुपोषण हो सकता है। स्वास्थ्य अध्ययन की विभिन्न रिपोर्टों से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि कोला पेय से बनाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। कैफीन, फ़ॉस्फ़ेट जैसी चीजों की मौजूदगी से दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर असामान्य तो होते ही हैं, रिफ़ाइण्ड शर्करा और फ़्रक्टोज़ जब फ़ॉस्फ़ोरिक अम्ल के साथ मिलते हैं तो फ़ॉस्फ़ोरस और कैल्सियम का संतुलन भी बिगड़ जाता है। नतीजतन बच्चों, किशोरों और महिलाओं को विशेष रूप से हड्डी संबंधी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ सकता है। डॉक्टरों ने चौकाने वाली एक नई जानकारी यह दी है कि
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कोला को भूरा रंग देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ई-150 जैसे डाई से शरीर में विटामिन बी-6 की कमी हो सकती है।
फिलहाल मैक्सिको में शीतल पेयों से होने वाले खतरों के प्रति सावधान करने के लिए प्रेस कांग्रेस से लेकर जगह-जगह कार्यशालाएं तक आयोजित की जा रही हैं। इन आयोजनों के मार्फत एक तरफ लोगों को पोषण संबंधी जरूरतों के बारे में जानकारी दी जा रही है, दूसरी तरफ इन कार्बोनेटेड शीतल पेयों के नुकसानों के प्रति लोगों को सावधान किया जा रहा है। शुभ संकेत यह है कि कोला विरोधी मुहिम को मैक्सिको के लोगों का जबरदस्त समर्थन मिलना शुरू हो गया है और वे कोला कंपनियों के विज्ञापनी भ्रमजाल से बाहर निकलने को कसमसाने लगे हैं।
मुश्किल हिन्दुस्तान की 'सांस्कृतिक बंदर' बनती जा रही पीढ़ी के लिए है। यह पीढ़ी तो आधुनिकता की बयार में बेरोक-टोक बही जा रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ नवजवानों को 'कल्चर्ड' बनाने के लिए लाखों डॉलर विज्ञापनों पर पानी की तरह बहा रही हैं और नतीजे के तौर पर देश के नवजवानों पर कल्चर्ड होने की खुमारी भी कायदे से चढ़ने लगी है। अलबक्ता, आजादी बचाओ आंदोलन जैसे संगठन शीतल पेयों को कार्बोनेटेड जहरीला पानी, लहर पेप्सी को जहर पेप्सी और कोकाकोला को धोखा कोला की संज्ञा देकर लोगों को उनके खतरों से सावधान करने के लिए कमर कसे हुए हैं।
इस मुहिम का नतीजा कुछ तो हुआ है कि अब हिन्दुस्तान में भी तमाम लोग इन शीतल पेयों से तौबा करने का मन बनाने लगे हैं। इनमें ऐसे भी धनी टाइप के लोग शामिल हैं जिन्होंने अपने घरों में पेप्सी-कोक के कैन पर कैन बतौर स्टॉक जमा कर रखे हैं। मुश्किल ये है कि जब इन्हें अहसास हुआ है कि स्टैण्डर्ड बनाने के चक्कर में पेप्सी-कोक का एक घूँट भी हलक नीचे उतारना मूर्खता के अलावा और कुछ नहीं है तो ये लोग इन शीतल पेयों के जहर से अब दूर तो रहना चाहते हैं पर अपने घरों में स्टॉक के तौर पर जो जमा कर रखा है उसका क्या करें? फिलहाल, इनकी इच्छाशक्ति इतनी प्रबल नहीं हुई है कि पेप्सी-कोक के कैन पर कैन नालियों में उड़ेले सकें। तो ऐसे सभी लोगों के लिए आजादी बचाओ आन्दोलन की सलाह है कि जिनके पास पेप्सी या कोकाकोला जैसे शीतल पेयों का स्टॉक है वे इन्हें फेंकने के बजाय संडास की सफाई के काम में ले लें। है न जोरदार सलाह ! आन्दोलन का कहना है कि आखिर लोग अपने घरों में संडास की सफाई के लिए हाइड्रोकलोरिक एसिड का इस्तेमाल करते ही हैं। पेप्सी-कोक में भी फास्फोरिक एसिड और कार्बोलिक एसिड जैसी चीजें हैं। संडास की सफाई वाले एसिड और पेप्सी-कोक का पी.एच. मान भी तीन के आस-पास लगभग एक जैसा ही है। इस पी.एच मान की चीजों को आँतों में पहुंचाना निश्चित रूप से नुकसानदेह है। ऐसे में अगर आपने गलतीवश पेप्सी या कोकाकोला खरीद ही लिया है तो पैसे और सेहत के नुकसान से बचने के लिए इनसे संडास की सफाई कर लेना ही बेहतर उपाय है।
आन्दोलन के कार्यकर्ता कोई हवा में ये बातें नहीं कर रहे हैं। उन्होंने बाकायदा प्रयोग करके देखा और पाया है कि पेप्सी और कोकाकोला जैसे शीतल पेयों से संडास की गन्दगी वैसे ही चमाचम साफ होती है जैसे कि दूसरे एसिड से। तो चलिए, आप भी अपने घर में पड़े
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पेप्सी-कोक की बोतल या कैन निकालिए और फटाफट अपने संडास की सफाई में लग जाइए। आखिर पेप्सी-कोक असलियत में हैं तो इसी लायक न !
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सौन्दर्य का नाश करता है नशा
नशा, या थोड़ा और व्यापक अर्थ में कहें तो 'व्यसन', मनुष्य के मन और शरीर दोनों को ही असुंदर बनाता है। नशेड़ी या व्यसनी व्यक्ति की मानसिक शक्तियाँ कमजोर पड़ जाती हैं, स्मरणशक्ति दुर्बल हो जाती है, संकल्प-क्षमता ढीली हो जाती है और विवेक कुंद हो जाता है। व्यसनी व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ परिवार व समाज की भी तबाही का कारण बनता है।
शराब, सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू, गुटखा आदि व्यसन के जितने भी रूप हैं, सारे के सारे ही शरीर को जर्जर बनाते हैं और स्थिति ऐसी हो जाती है कि असाध्य किसिम के तमाम रोग बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमकते हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि नशा करने वालों का सौन्दर्य धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने यह भी अच्छी तरह सिद्ध कर दिया है कि धूम्रपान करने वालों पर बुढ़ापा जल्दी झलकने लगता है। दरअसल धूम्रपान का धुआँ शरीर के अंदर जाकर कुछ ऐसी क्रियाओं को बढ़ावा देता है जिससे त्वचा ढीली और पतली होने लगती है। त्वचा में झुर्रियाँ भी पड़ने लगती हैं तथा कम उम्र में ही बुढ़ापे का शारीरिक झुकाव शुरू हो जाता है। लंदन के सेंट थामस नामक अस्पताल में 50 समान जोड़ों का अध्ययन करने पर मालूम हुआ कि धूम्रपान करने वालों की त्वचा धूम्रपान न करने वालों से 28 प्रतिशत पतली हो गई थी। यह एक सच्चाई है कि सिगरेट, सिगार आदि ज्यादा पीने वालों के चेहरों पर इतना स्पष्ट परिवर्तन आ जाता है कि सामान्य लोग भी दूर से देखकर ही अक्सर उनकी पहचान कर लेते हैं।
रोजमर्रा सिगरेट पीने वालों को फेफड़ों का कैंसर 90 प्रतिशत, अन्य प्रकार के कैंसर 80 प्रतिशत, ब्रोंकाइटिस 80 प्रतिशत, हृदय रोग 30 प्रतिशत और एम्फिसीमा 20 प्रतिशत तक होने की आशंका रहती है। इसके अलावा पायरिया, बहरापन, मोतियाबिंद, श्वासनलियों में सूजन, अल्सर, भाँति-भाँति के मुख व मसूड़ों के रोग, हड्डी का कैंसर, मूत्राशय का कैंसर, आँतों का कैंसर, श्वासनली का कैंसर, शुक्राणुओं की कमी, नपुंसकता, मानसिक विकार आदि भी होने की संभावना बनी रहती है। सिगरेट आदि के धुएँ में मौजूद कार्बन-मोनो-ऑक्साइड खून के ऑक्सीजन को अवशोषित करके मस्तिष्क में इसकी आपूर्ति बाधित कर देती है। इसका नतीजा यह होता है कि मनुष्य की सहनशक्ति व स्मरणशक्ति कम होने लगती है और नाना प्रकार के मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार धूम्रपान से आँखों के लेंस पर धुँधलापन छाने लगता है और मोतियाबिन्द की संभावना बढ़ जाती है। धूम्रपान के धुएँ में मौजूद हाइड्रोजन साइनाइड व अन्य हानिकारक रसायन श्वासनलिका को मोटी कर देते हैं, जिससे दमे की आशंका बढ़ जाती है। धूम्रपान से पेट में एसिड अधिक बनने लगता है, जिससे अल्सर की संभावना भी प्रबल हो जाती है। इसके अलावा धूम्रपान रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ाकर मधुमेह को भी आमंत्रण देता है। धूम्रपान का हृदय पर घातक असर होता है। सिगरेट के धुएँ की कार्बन-मोनो-ऑक्साइड गैस रक्त में हीमोग्लोबिन कम कर देती है तथा रक्त वाहिनियाँ की भीतरी सतह पर वसा का जमाव ज्यादा कर
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देती है। इसके साथ ही निकोटीन हृदय की गति को अनावश्यक रूप से बढ़ाता है तथा यह कैटा कोलामीन की मात्रा भी बढ़ाता है जिसकी वजह से रक्त में वसा की मात्रा बढ़ने लगती है। इन सब वजहों से हृदयाघात, पैरालिसिस आदि बीमारियाँ बड़ी आसानी से धर दबोचती हैं।
अनुसंधानों से यह बहुत पहले साबित हो चुका है कि सिगरेट के धुएँ में पाया जाना वाला पायरिन फेफड़ के कैंसर का कारण बनता है। इसका धुआँ फेफड़े की कार्यप्रणाली को भी अव्यवस्थित कर देता है तथा धुएँ में मौजूद टार फेफड़ों में संक्रमण, फेफड़ों की कोशिकाओं में सूजन तथा श्वासावरोध उत्पन्न करता है। महिलाएं अगर धूम्रपान करती हैं तो अपने साथ-साथ अपनी आने वाली संतानों का भी भविष्य बिगाड़ती हैं। धूम्रपान से गर्भपात का भय तो रहता ही है, गर्भस्थ शिशु के रोगग्रस्त पैदा होने या उसके मरने का भी डर रहता है। स्तन कैंसर या स्तन के अन्य रोग, गर्भाशय कैंसर, मासिक धर्म की गड़बड़ी, चेहरे का लावण्य खत्म होने जैसी तमाम परेशानियाँ धूम्रपान की वजह से महिलाओं को झेलनी पड़ सकती हैं। शोधों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि धूम्रपान करने वाली महिलाओं की मृत्युदर पुरुषों की तुलना में ज्यादा होती है। चूंकि माताओं के स्वास्थ्य पर उनकी आने वाली संतानों का भी स्वास्थ्य बहुत हद तक निर्भर होता है इसलिए महिलाओं को नशे से बचना कहीं ज्यादा जरूरी है। धूम्रपान इतना नुकसानदेह है फिर भी चिन्ताजनक बात यह है कि इसकी गिरफ्त में लोग फँसते ही जा रहे हैं। इस समय दुनिया की लगभग 110 करोड़ की विशाल आबादी धूम्रपान की शिकार है। इसमें से 80 करोड़ लोग विकासशील देशों के हैं और 30 करोड़ लोग विकसित देशों के। एशिया में 55.8 प्रतिशत पुरुष, 3.71 प्रतिशत महिलाएं तथा 33 प्रतिशत बच्चे धूम्रपान करते हैं। रिक्शा चालक और मजदूर किस्म के लोग तो 80 से 90 प्रतिशत तक धूम्रपान के शिकार हैं। स्थिति यह है कि ये सभी नशेड़ी मिलकर पूरे साल में लगभग 60000 करोड़ सिगरेट पी जाते हैं। भारत जैसे देशों के नशेबाज 55 करोड़ सिगरेट रोज अर्थात् लगभग 20000 करोड़ सिगरेट साल भर में पीते हैं। विकसित देशों में 41 प्रतिशत पुरुष तथा 21 प्रतिशत महिलाएं नियमित रूप से धूम्रपान करते हैं। विकासशील देशों में लगभग 50 प्रतिशत पुरुष और 8 प्रतिशत महिलाएं नियमित धूम्रपान के आदी हैं।
धूम्रपान तथा विभिन्न रूपों में तम्बाकू सेवन से पूरी दुनिया में हर साल लगभग 30 लाख लोग असमय मौत के मुँह में पहुँचते हैं। इसमें भी लगभग एक तिहाई संख्या तो सिर्फ विकासशील देशों के लोगों की ही होती है। भारत में कैंसर से 10 प्रतिशत, साँस की बीमारी से 70 प्रतिशत तथा दिल की बीमारी से 25 प्रतिशत मृत्यु का कारण धूम्रपान होता है। केन्द्रीय स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो के अनुसार हमारे यहाँ हर साल लगभग 2200 करोड़ रुपया तंबाकू जनित बीमारियों के इलाज पर खर्च हो जाता है। सांख्यिकी और नियोजन विभाग के एक अनुमान के अनुसार 1989-90 में तम्बाकू सेवन करने वालों द्वारा किया गया मासिक खर्च 5060 करोड़ रुपये था, जो 1991-92 में 7964 करोड़ रुपये तक जा पहुँचा। स्थिति यह है कि यदि प्रति सिगरेट एक पैसे भी दाम बढ़ा दिया जाय तो सिगरेट बनाने वाली कंपनी का सालाना मुनाफा 200 करोड़ रुपये अतिरिक्त हो जाएगा। अंदेशा यह है कि नाना रूपों में तम्बाकू सेवन के नतीजे के तौर पर सन् 2020 के बाद हर साल पूरी दुनिया में लगभग एक करोड़ लोग मरेंगे। सिगरेट को होंठों तक लाने से पहले अपने को
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विवेकवान मानने वाले लोगों को एक बार यह जरूर सोच लेना चाहिए कि आदमी का फेफड़ा सिगरेट का धुआँ भरने के लिए नहीं बनाया गया है।
इसी तरह नशे के और रूपों के ख़तरे भी भयावह हैं। तम्बाकू युक्त गुटखा व पान-मसाला की वजह से संपूर्ण भारत में, खासतौर से उत्तरी भारत में तो 'औरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस' जैसी कष्टदायी बीमारी महामारी का ही रूप लेती जा रही है। इस बीमारी में धीरे-धीरे मुँह बंद होने लगता है। इसी तरह 'ल्यूकोप्लेकिया' का प्रकोप भी बढ़ रहा है। ये बीमारियाँ कैंसर की शुरुआती स्थिति भी साबित हो सकती हैं। गुटखा, पान-मसाला खाने वालों को याद रखना चाहिए कि इनमें मिलाए जाने वाले विभिन्न पदार्थ जैसे- सैक्रिन, रंग, मेन्थॉल, इत्र आदि स्वास्थ्य के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। इनमें डाली जाने वाली खालिस सुपारी भी कम नुकसानदेह नहीं है। सुपारी की टैनिन प्रोटीन के पाचन में बाधा पहुँचाती है। सुपारी के ज्यादा सेवन से शरीर में विटामिन 'ए' की भी कमी हो जाती है। कथा को प्रायः लोग हानिरहित समझते हैं, पर इसमें भी टैनिन की काफी मात्रा होती है। जब से सिन्थेटिक कथा तैयार होने लगा है तब से स्थिति को और भी ख़तरनाक ही समझिए।
शराब के नशे का तो ख़ैर पूछिए मत। इसने स्वास्थ्य और सामाजिक मूल्यों, दोनों का जितना नुकसान किया है वह आसानी से वर्णन नहीं किया जा सकता। शराब के चलते उजड़े घरों के दास्तान आये दिन सुनने-पढ़ने को मिलते ही रहते हैं। अब तो सड़क दुर्घटनाओं का एक सबसे बड़ा कारण भी शराबखोरी ही बन चुका है। शराब कितनी ख़तरनाक है इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि सामान्य हालत में जो व्यक्ति मार-काट की बात सोच भी नहीं सकता वह शराब के नशे में आसानी से हत्या करने पर आमादा हो सकता है। शराब मस्तिष्क को इतने हद तक अनियंत्रित कर सकती है कि आदमी पागल हो जाए। वास्तव में शराब की वजह से पागलों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। पागलों के दवाखानों के सर्वेक्षण से यह चोंकाने वाला तथ्य सामने आया कि हर दस पागलों में से छः शराब की वजह से पागल हुए थे।
शराब पाचनतंत्र में गड़बड़ी तो पैदा ही करती है, यह स्नायुओं से लेकर यकृत और हृदय तक पर बहुत बुरा असर डालती है। नुकसानों का परीक्षण करने के लिए इसे भोजन में मिलाकर सियार, कुत्ता, कबूतर, उल्लू आदि पशु-पक्षियों को दिया गया तो वे अकाल ही मृत्यु के शिकार हो गए। मदिरा का मद पेड़-पौधों तक पर अपना ख़तरनाक असर छोड़ता है। परीक्षणों में यह पाया गया है कि अगर मदिरायुक्त पानी पौधों की जड़ों में डाला जाए तो उनमें फल नहीं लगेंगे और वे धीरे-धीरे सूख जाएंगे। शराब मनुष्य की जिन्दगी को भी कुछ इसी तरह नष्ट करती है।
शरीर के बाह्य सौन्दर्य पर भी शराब का प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। शराबी व्यक्ति की आँखों में धीरे-धीरे रक्त धँस आता है और वे रक्तितम दिखाई देने लगती हैं। अच्छी भली सुंदर आँखें भी शराब पीने से डरावनी लगने लगती हैं और उनका तेज समाप्त हो जाता है। ज्यादा शराब चेहरे को भी जल्दी ही बूढ़ों की कतार में खड़ा कर देती है। यह बात अलग है कि सम्यन् शराबी खान-पान में पोषकता का विशेष ध्यान रखकर शराब के दुष्प्रभावों पर परदा डालने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि वे इसके दुष्परिणामों से भी पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं।
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धूम्रपान की तरह मदिराप्रेमियों को भी अन्ननली का कैंसर तथा यकृत व मुँह के रोग हो सकते हैं। मद्यपान से शरीर में विटामिन 'बी' की भी कमी हो सकती है। इसके अलावा शराब छोटी आँतों के थायमिन व फोलिक अम्ल का अवशोषण करने वाले स्थान को भी क्षतिग्रस्त कर देती है। इसका फल यह होता है कि शरीर की अंदरूनी कार्यप्रणाली अव्यवस्थित और जर्जर होने लगती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि शराब का नशा शरीर में तो गड़बड़ी पैदा ही करता है, यह मन में भी गड़बड़ी फैलाता है। अगर, मन में गड़बड़ी आ जाए तो विचारों में गड़बड़ी आना लाजिमी ही है और आखिरकार शराबी की वाणी का भी लड़खड़ाना अनिवार्य हो ही जाता है।
अभी तक जिस तरह के व्यसनों की चर्चा की गई है उनसे प्रायः पूरा समाज परिचित है, परंतु अब नशे के इतने सारे नए-नए रूप पैदा हो गए हैं कि उनकी खोज-खबर रख पाना भी एक टेढ़ा काम है। इस संदर्भ में नशीली दवाइयों की चर्चा कर देना विशेष ज़रूरी है क्योंकि नशे के इस तरीके ने घर-परिवार और समाज के सीमित दायरों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर भी गम्भीर समस्याएं पैदा कर दी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था 'इंटरनेशनल नारकोटिक ड्रग कंट्रोल बोर्ड' ने चेतावनी दी है कि नशीली दवाइयों की खपत जिस गति से पूरी दुनिया में बढ़ रही है, उसके चलते कई देशों की सुरक्षा के लिए ही खतरा पैदा हो गया है। मौजूदा हालात ये हैं कि अमरीका, इंग्लैण्ड, जापान, चीन, हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि अमीर-गरीब सभी देश ही नशे के व्यापारियों के जाल में फँसते जा रहे हैं।
एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ़ अमरीका जैसे देश में ही ग्यारह करोड़ से अधिक लोग नशीली दवाइयों के शिकार बन चुके हैं। अमरीका की संस्था 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ड्रग एव्यूस' की रिपोर्ट के मुताबिक 30 से 40 प्रतिशत अमरीकी बच्चे नशीली दवाइयों का इस्तेमाल करने लगे हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ नशीली दवाइयों के सेवन में भी बढ़ोतरी हो रही है, यह चिंताजनक और भयावह तस्वीर है। इसके अलावा अमरीका में करीब 50 लाख लोग कोकीन, 2 करोड़ लोग मार्जुआना तथा 50 लाख लोग हिरोइन का भी नशा करते हैं। अनुमान है कि हिन्दुस्तान में दस से पन्द्रह करोड़ लोग भाँग, गाँजा, चरस, हिरोइन, एल.एस.डी. तथा विभिन्न नशीली दवाइयों की आदत के शिकार हैं। आलम यह है कि अब होटल, ढाबे, स्कूल, कॉलेज से लेकर झुग्गी झोपड़ियों तक में नशीली दवाइयों के अड़डे बनते जा रहे हैं। महानगरों की स्थिति इस मामले में ज्यादा भयावह है। देश की युवा-पीढ़ी बुरी तरह दिग्भ्रमित हो रही है।
नशीली दवाइयों में अफीम, मार्फिन, पैथेडिन, हिरोइन, मैक्सिकन कैकटस, भाँग, गाँजा, चरस, एल.एस.डी., मेथम फेहाइन, शाबएफिटेमिन, कोकीन, हिरोइन ग्रुप की दवा बारविचुरेट्स, मनोदैहिक एवं नींद लाने वाली दवा कम्पोज, लारपोज, तिबरियम, वैलियम आदि का इस्तेमाल नशेबाज़ धड़ल्ले से करते हैं। ये सभी नशीली दवाइयों मूर्छा, बेहोशी, जड़ता तथा संवेदनहीनता पैदा करती हैं। इन दवाइयों की गिरफ़्त में फँसने की एक वजह यह भी है कि ये दर्द, पीड़ा एवं शूल से मुक्ति तथा जटिल समस्याओं एवं परिस्थितियों से जूझने का भ्रम पैदा करती हैं। जबकि अंतिम परिणाम यह होता है कि समस्याएँ और जटिल हो जाती हैं।
वास्तव में नशीली दवाइयों और तरह-तरह के व्यसनों का प्रचलन युवा पीढ़ी में जिस तेज़ी से बढ़ रहा है, उसके चलते स्वास्थ्य के साथ-साथ चरित्र, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पर
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खतरा मँडराने लगा है। नशेड़ियों की जमात न अपनी सुरक्षा कर सकती है, न राष्ट्रीय अस्मिता की। ज़रूरत अब व्यसन-मुक्ति के प्रति गंभीर होने की है। सरकारों से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि उन्हें विभिन्न प्रकार के नशे के व्यवसाय से हज़ारों करोड़ रुपये सालाना राजस्व मिलता है। यही वजह है कि जनता को मूर्ख बनाने के लिए एक तरफ़ मद्य निषेध विभाग चलाया जाता है तो दूसरी ओर दारु की बिक्री बढ़ाने के लिए तरह-तरह के उपाय किए जाते हैं। नशाबंदी के लिए तो जनता में ही जागरूकता लानी होगी और व्यापक जनांदोलन छेड़ना होगा। इसके अलावा और कोई सरल उपाय नज़र नहीं आता।
नशे के शिकार जो लोग इससे मुक्ति चाहते हैं उनके लिए यहाँ कुछ सुझाव अवश्य दिए जा सकते हैं। गुटखा या पान-मसाला खाने वालों की आदत कुछ ऐसी हो जाती है कि वे अक्सर मुँह में कुछ रखकर चबाते रहना चाहते हैं। ऐसे लोगों को सौँफ़ चबाने की आदत डालनी चाहिए। सौँफ़ सुगंधित तो होती ही है, स्वास्थ्य के लिए भी अच्छी होती है। यदि मन को मज़बूत करके गुटखा या पान-मसाला के स्थान पर 2-3 हफ़्ते तक भी सौँफ़ चबाएं तो गुटखे के व्यसन से आसानी से मुक्ति मिल सकती है। सौँफ़ के स्थान पर आँवले का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसका तरीका यह है कि ताज़े हरे आँवलों को उबाल लें और गुठली निकालकर फेंक दें। अब उबले हुए आँवलों में पिंसी हुई काली मिर्च, काला नमक और सेंधा नमक स्वाद के अनुसार डालकर खूब मसलकर मिला लें और सुपारी के टुकड़े जैसे बनाकर धूप में सुखाकर सुरक्षित रख लें। गुटखा या पान-मसाला की जगह इन टुकड़ों को जब चाहें मुँह में रखकर चूसें, व्यसन धीरे-धीरे छूटने लगेगा।
सिगरेट पीने वालों के लिए वैज्ञानिक डॉ. एडवर्ड डोमिनो का सुझाव है कि यदि 50 ग्राम आलू, 85 ग्राम पके टमाटर का रस तथा 93 ग्राम पत्तागोभी का रस दिन में दो बार नियमपूर्वक सेवन किया जाय तो सिगरेट पीने की इच्छा नहीं होगी, क्योंकि इनमें 'निकोटीन' तत्त्व प्राकृतिक रूप में मौजूद रहता है। वास्तव में यदि आहार-विहार की शुद्धि के साथ योग, ध्यान आदि की विधियाँ नियमित रूप से अपनाई जाएँ तो नशे की जटिल परिस्थितियों पर भी आसानी से काबू पाया जा सकता है। निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि यदि आप अपना स्वास्थ्य और सौन्दर्य बचाए रखना चाहते हैं तो नशे से दूर रहिए। यह भी याद रखिए कि नशे से दूर रहकर आप अपना ही नहीं बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र का भी भला करेंगे।
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कुछ फुटकर नुस्खे
शहद
शहद सिर्फ स्वाद में ही मीठा नहीं होता अपितु अपने अन्य गुणों में भी यह अतुलनीय है। इसमें अनेक महत्वपूर्ण विटामिन, खनिज, हार्मोन्स, अमीनो एसिड और एन्जाइम मौजूद रहते हैं। इसका एक प्राकृतिक गुण यह भी है कि इसके तत्व सीधे हमारे रक्त में पहुंच सकते हैं, इसलिए यह न केवल हमें तत्काल शक्ति प्रदान करता है, बल्कि अनेक बीमारियों से भी हमें बचाता है, साथ ही इससे हमारी पाचन शक्ति भी मजबूत होती है। चिकित्सा की दृष्टि से भी यह हमारे लिये बहुत उपयोगी है। हमारे मस्तिष्क और भावनाओं पर भी इसका चमत्कारी प्रभाव पड़ता है, जिससे मन को शांति मिलती है। तंत्रिका प्रणाली को विश्राम देकर तनाव को कम करता है। गुनगुने पानी में थोड़ा शहद डालकर पीने से अनिद्रा की बीमारी में लाभ होता है। इतना ही नहीं शहद शरीर की प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करता है, जिससे यह हमें अनेक बीमारियों से बचाता है
दही
दही भी ऐसा एक प्राकृतिक भोज्य पदार्थ है, जो हमें बढ़ती उम्र में भी युवा और आकर्षक बनाए रखने में सहायक है। विटामिन 'ए' और 'बी', कैल्शियम, लौह, पोटेशियम, फास्फोरस आदि से युक्त दूध से बना होने से यह बिना कोई नुकसान पहुंचाए हमारे प्रोटीन की जरूरतों को भी पूरा करता है। इस तरह यह अधिक उम्र के ऐसे लोगों के लिए एक आदर्श भोजन है, जो मांस खाने से बचना चाहते हैं। दही एक प्राकृतिक एंटीबायोटिक भी है। यह पाचन प्रणाली में हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करता है और पाचन शक्ति को ठीक रखता है। बीमार लोगों के लिए भी दही बहुत उपयोगी है, क्योंकि यह अत्यंत सुपाच्य है और इससे शरीर बलवान होता है। दूध की अपेक्षा यह ज्यादा सुपाच्य है और इसमें भरपूर पोषक तत्व होते हैं।
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स्वदेशी की स्थापना के लिये प्रतिबद्ध आंदोलन
हम सभी जानते हैं कि आज से 500 साल पहले 1498 में पुर्तगाली नाविक वास्को-डी-गामा ने भारत के लिये एक नये समुद्री मार्ग की खोज की और इसी समुद्री मार्ग से पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और बाद में अंग्रेज हमारे देश में आये और हमें गुलाम बनाया। वास्तव में वास्को-डी-गामा की खोज ने भारत की लूट का एक और मार्ग खोल दिया। उसके बाद अंग्रेजों ने भारत को न केवल लूटा बल्कि उसे अपना गुलाम भी बनाया। सन् 1600 में एक ईस्ट इंडिया कम्पनी और उसके साथ आयी अंग्रेजी फौज ने समूची भारतीय व्यवस्थाओं तथा शिक्षाप्रणाली, आर्थिक व्यवस्था, व्यावसायिक प्रणाली, कृषि प्रणाली एवं सामाजिक व्यवस्था को तोड़कर 300-350 वर्षों तक हमें गुलाम बनाकर अपनी हुकूमत चलाई। उसके बाद गांधीजी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी गई और लगभग 20 करोड़ की से ज्यादा क्रान्तिकारियों की कुर्बानियाँ देकर हमने आजादी हासिल की।
आज फिर से हम गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। पहले एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी आई और उसने 300 साल तक गुलाम बनाये रखा परन्तु आज तो कई हजार बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हैं, तो कितने साल की गुलामी होगी? आपको शायद मालूम होगा कि 100-200 साल पहले अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाने और उस पर अपना शासन चलाने के लिये जो कानून और नीतियाँ बनाई थीं वे देश की आजादी के 50 साल बाद भी चल रही हैं। बस अन्तर इतना ही है कि पहले गोरे अंग्रेज शासन करते थे, परन्तु आज काले अंग्रेज शासन कर रहे हैं, बाकी सारी व्यवस्थाएँ और नीतियाँ ज्यों की त्यों हैं। इतना ही नहीं, कार्यप्रणाली भी अंग्रेजी सभ्यता की ही है।
आज उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीति के नाम पर पूरे देश को गरीबी और बेरोजगारी के दलदल में धकेला जा रहा है। हमारे देश की संस्कृति और परम्पराओं को न बढ़ाकर पश्चिमी आतताई और शैतानी संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या यही सपना देखा था हमारे शहीदों ने? क्या उन्होंने अपनी कुर्बानी इसी भारत के लिये दी थी
इन्हीं सब परिस्थितियाँ को देखकर आजादी बचाओ आंदोलन ने पूरे देश में सोये हुए युवाओं को जगाने का संकल्प लिया है। और साथ ही आजादी बचाओ आन्दोलन अपने समाज व सभ्यता के नवीनीकरण के लिये आवश्यक ज़मीन तैयार करने में लगा हुआ है। आंदोलन की कोशिश है कि हमारे मन में अपने देश, समाज, संस्कृति और सभ्यता के प्रति जो अनादर और निराशा का भाव आ गया है वह ख़त्म होकर आजादी और आशा का भाव जाग्रत हो तथा अपने प्रति आत्मविश्वास पैदा हो।
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