शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
शतपथ ब्राह्मण र स्वरचिह्न
( ८ ) शतपथ ब्राह्मण और स्वरचिह्न वेद-संहिताओं में स्वरचिह्न लगाने की परिपाटी अतीत काल से चली आ रही है। वैदिक स्वर साधारणतया उदात्त, अनुदात्त और स्वरित कहलाते हैं, जिनका विवरण महर्षि दयानन्द ने सौवर प्रकरण में दिया है। हमारी समस्त वर्णमाला दो वर्गों में विभक्त हैं—स्वर और व्यञ्जन। इस प्रकरण से स्वयं राजन्त इति स्वरा:—अर्थात् जिनके प्रकाशमान होने में किसी की सहायता की अपेक्षा न हो वह स्वर है। ये स्वर स्वयं प्रकाशमान हैं, अर्थात् बोले जा सकते हैं, सुने जा सकते हैं। अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ और औ (और इनमें से प्रथम पांच के दीर्घ आ, ई, ऊ, ॠ, ॡ)—ये स्वर हैं। अष्टाध्यायी के प्रारम्भ के माहेश्वर सूत्रों में वैदिक वाङ्मय की समस्त वर्णमाला (स्वर और व्यंजन) परिगणित की गई है। वर्णमाला के स्वरों से अलग दो वर्गों के १४ स्वरों का और उल्लेख किया जाता है— प्रथम वर्ग—उदात्त, अनुदात्त और स्वरित-भेद से सात स्वर—(१) उदात्त, (२) उदात्ततर, (३) अनुदात्त, (४) अनुदात्ततर, (५) स्वरित, (६) स्वरिते यः उदात्तः (स्वरित में जो उदात्त हो) और (७) एकश्रुति । द्वितीय वर्ग—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद (सरेगमपधनि) यः सामगानां प्रथमः स वेणोर्मध्यमः स्वरः । यो द्वितीय सः गान्धारस्तृतीयस्त्वृषभः स्मृतः ॥ चतुर्थ षड्ज इत्याहुः पञ्चमो धैवतो भवेत् । षष्ठ निषादो विज्ञेयः सप्तमः पञ्चमः स्मृतः ॥ अर्थात् वीणा के स्वरों में, और सामगान में निम्न सम्बन्ध है— सामगान वीणा प्रथम मध्यम (म) द्वितीय गान्धार (ग) तृतीय ऋषभ (रे) चतुर्थ षड्ज (स) पञ्चम धैवत (ध) षष्ठ निषाद (नि) सप्तम पञ्चम (प) एक और भेद से स्वर तीन भागों में विभाजित हैं—मन्द (bass), मध्य (medium), और तार (high) । इसी प्रकार त्रिधा गानविद्या में द्रुत (fast), मध्यम (medium) और विलम्बित (slow) पाठ या उच्चारण होता है। ऋषि दयानन्द का कहना है कि ऋग्वेद के स्वरों का उच्चारण द्रुत अर्थात् शीघ्रवृत्ति में होता है, यजुर्वेद के स्वरों का उच्चारण मध्यमवृत्ति में और सामवेद के स्वरों का उच्चारण विलम्बित में। तीनों का उच्चारण-काल १:२:३ अनुपात में है (ऋग् की द्रुतगति से दुगुना समय यजुर्वेद के पाठ में, और तिगुना समय सामवेद के पाठ में)। शतपथ ब्राह्मण के वाक्य गद्य श्रेणी के हैं। इनमें स्वरों का लगाना कोई आवश्यक बात नहीं है। डॉ० वेबेर को बॉडलिअन लाइब्रेरी से जो पाण्डुलिपि मिली, उसका मूल लिपिकार
( ६ ) दामोदर था (१७०५ वि०)। इसी लिपि पर ४० वर्ष बाद विद्याधर नामक दूसरे व्यक्ति ने स्वर- चिह्न लगाये थे (१७४८ वि० के लगभग)। शतपथ ब्राह्मण के स्वरचिह्नों के सम्बन्ध में डॉ० वेबेर का कथन है—शतपथ ब्राह्मण की पुरानी पाण्डुलिपियों में एक ही स्वरचिह्न मिलता है—पंक्ति के नीचे 'पड़ी' (horizontal) रेखा (—)। शतपथ में इस रेखा द्वारा उदात्त और स्वरित दोनों स्वरों को व्यक्त किया जाता है (ऋग्वेद और यजुर्वेद में पंक्ति के नीचे की यह 'पड़ी' रेखा अनुदात्त का सूचक होती है)। उदात्त का सूचक जब यह रेखा (—) होती है, तो इसे तत्सम्बन्धी वर्णस्वर के नीचे ही लगाया जाता है, पर जब यह स्वरित होती है, तो इसे पहले के (बगलवाले) वर्णस्वर के नीचे लगाते हैं। उदात्त का उदाहरण—नृ॒षदम् (ष उदात्त है) स्वरित का उदाहरण—वी॒र्यम् (य स्वरित है) उदात्त और स्वरित चिह्नों में अन्तर व्यक्त करने के लिए डॉ० वेबर ने स्वरितसूचक 'पड़ी', रेखा को एक जगह दो पड़ी रेखाओं (=) से व्यक्त किया है। यह युग्म स्वरित स्वर के वाम पार्श्व के वर्ण- स्वर में लगाया जाता है—वी॒॒र्यम्। उदात्त के सम्बन्ध में निम्न नियम स्मरण रखने चाहिएँ— १. अकारादि स्वरों से युक्त वर्ण ही उदात्त, अनुदात्त या स्वरित होते हैं—हलन्त व्यंजन न उदात्त होंगे, न अनुदात्त, न स्वरित। २. किसी भी एक पद में एक से अधिक उदात्त नहीं हो सकता। यह तो हो सकता है कि किसी पद में कोई भी उदात्त न हो। ३ एक पद में अनुदात्त कई हो सकते हैं—हो सकता है कि सभी स्वरान्त-वर्ण अनुदात्त हों। इसी प्रकार एक पद में एक से अधिक स्वरित भी हो सकते हैं। शतपथ ब्राह्मण में अनुदात्त व्यक्त करने के लिए कोई चिह्न नहीं है। हमने अपने शतपथब्राह्मण में समस्त पाठ वेबेर का लिया है, और इसलिए इस ग्रन्थ के स्वरचिह्न उदात्त (—), और स्वरित (=) वे ही हैं जिनका उपयोग डॉ० वेबेर ने किया है। स्वर-संकेत का एक उदाहरण यहाँ दिया जाता है— १. अग्ने॑ने॒वृ जुहुयात्। सजू॒र्देवे॒न सवि॒त्रेति। तत्सवितृ॒मुत्प्रस॒वाय सजू रा॒त्रेन्द्रे व॒ण्येति तद्रा॒त्र्या मिथुनं करोति। —(शत० २।३।१।३७) इसमें जिन-जिन स्वर-वर्णों के नीचे 'पड़ी' लकीरें '(-)' खिंची हैं वे सब उदात्त-स्वर- सूचक हैं। २. य॒ त्नै॒॒ याग्निहोत्रस्य देवताग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहेति तन्न॒॒ नाग्नये स्वाहा। —(शत० २।३।१।३६) इस उदाहरण में त्नै और न्न के नीचे रेखा-युग्म (=) है। इसका अर्थ यह है कि इनके अगले अक्षर "या" से लेकर 'ता' तक स्वरित या एकश्रुति (या प्रचय) हैं, अर्थात् बराबर एक ही स्वर चल रहा है। डॉ० वेबेर ने अपनी भूमिका में स्पष्ट इंगित कर दिया है कि यदि अगले वर्ण पर स्वर- चिह्न लगा हो तो उससे पूर्व के उदात्त पर स्वर-चिह्न लगाना अनावश्यक हो जाता है। [Be- fore a following accented syllable, the preceding udatta loses its denota- tion.]
उपाध्यायजीको हिन्दी अनुवाद
(१०) (क) केतपूःकेतम्, इसमें के॒ के नीचे स्वर-चिह्न है, अतः पूः के नीचे लगा उदात्त-चिह्न बेकार है, अतः इसे केतपूःकेतम् ही लिखेंगे (पूः के नीचे का स्वर-चिह्न निकाल देंगे।) (ख) 'महो ये॒ धूनम्' को ऐसा न लिखकर 'महो ये धूनम्' लिखेंगे (ये॒ के नीचे का चिह्न बेकार है।) (ग) 'प॒र्णं न॒ वे॒रनु' को ऐसा न लिखकर 'पर्णं न वेरनु' लिखेंगे—र् के पहले के सभी उदात्त बेकार हो गए—र्णं, न॒, वे॒,—इनके नीचे लगे उदात्त-चिह्न बेकार हो गए। जिन पाठकों को स्वर-विषयक गम्भीरता से विचार करना हो, वे डॉ० वेबेर के अंग्रेजी Preface को पढ़ें।
उपाध्यायजी का हिन्दी अनुवाद
प्रयाग के श्री पं० गंगाप्रसादजी उपाध्याय ने अपनी वृद्धावस्था में ऐतरेय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण के हिन्दी-अनुवाद किये। ऐतरेय ब्राह्मण के हिन्दी-अनुवाद का प्रकाशन (बिना मूल संस्कृत के) 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग' ने प्रकाशित किया था। प्रयाग के ही अथर्ववेद-भाष्य- कार पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी ने गोपथ ब्राह्मण का मूल और हिन्दी अनुवाद बड़े परिश्रम से सम्पादित और प्रकाशित किया। दिल्ली के स्व० पं० रामस्वरूप शर्मा के प्रयास से उपाध्यायजी का शतपथ ब्राह्मण तीन खण्डों में १६६७, १६६६ और १६७० ई० में प्रकाशित हुआ था। बहुत दिनों से यह अनुवाद अनुपलब्ध था। मूल शतपथ ब्राह्मण का पाठ वैदिक यन्त्रालय, अजमेर के एक संस्करण से लिया गया था, किन्तु मुद्रण की कठिनाई होने के कारण उसमें स्वर-चिह्न न दिये जा सके। शतपथ ब्राह्मण का एक पाठ काशी से अच्युत ग्रन्थमाला ने भी प्रकाशित किया था (१६६४ वि०) दो जिल्दों में—श्री चन्द्रधर शर्मा द्वारा सम्पादित, एशियाटिक सोसायटी ऑव् बंगाल, कलकत्ता से शतपथ ब्राह्मण और उस पर सायणाचार्य की टीका या भाष्य प्रकाशित हुए। खेमराज कृष्णदास यन्त्रालय, बम्बई से भी सायनानुवाद छपा। अंग्रेजी में जूलियस ऐगर्लिंग (Julius Eggeling) का शतपथ ब्राह्मण का पूर्ण अनुवाद विस्तृत टिप्पणियों और भूमिकाओं सहित १८८२-८५ में सेक्रेड बुक्स ऑव् द ईस्ट सीरीज (Sacred Books of the East Series— Max Muller) में प्रकाशित हुआ था, जिसका पुनर्मुद्रण मोतीलाल बनारसीदास (दिल्ली- वाराणसी) नामक विख्यात प्रकाशक ने कर दिया है। शतपथ ब्राह्मण मुख्यतया कर्मकाण्ड का ग्रन्थ है। ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ का प्रमाणत्व उतना ही स्वीकार किया है, जितना वेदार्थ में सहायक है। शतपथ ब्राह्मण की ही तरह कात्यायन श्रौतसूत्र का भी यजुर्वेदी कर्मकाण्ड से गहरा सम्बन्ध है। उवट और महीधर दोनों आचार्यों ने यजुर्वेद के भाष्य में इन दोनों को आधार माना है। ये आचार्य जब शतपथ के सन्दर्भों का उल्लेख करते हैं, तो उसे "इति श्रुतेः" कहते हैं, और साधारणतया कात्यायन श्रौतसूत्र का प्रामाण्य सभी प्रकार स्वीकार करते हैं। शतपथ का आधार धीरे-धीरे उनके भाष्यों में कम होता जाता है। (यजुर्वेद के १३-१४ अध्यायों के बाद शतपथ का प्रयोग बहुत कम है। कात्यायन श्रौतसूत्र और पाणिनि की अष्टाध्यायी का आधार महीधर ने अपने भाष्य में यजुर्वेद के अन्तिम अध्यायों तक लिया है।) साधारणतया शतपथ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य की रचना समझी जाती है, पर ऐसा लगता है कि शाण्डिल्य भी उसका मुख्य सहयोगी था : काण्ड ७, ८ और १० तो शायद उसी की रचना हैं—इन काण्डों में याज्ञवल्क्य का नाम तक नहीं आया।
( ११ ) श्री उपाध्यायजी ने शतपथ ग्रन्थ का अनुवाद-मात्र किया है, न कि उसका भाष्य । शतपथ- ब्राह्मण के समय से पूर्व कर्म (कर्मप्रेरक यज्ञ) का युग समाप्त हो गया था, और उसका स्थान कर्मकाण्ड ने ले लिया था—स्वामी दयानन्द “कर्मकाण्ड के पोषक नहीं” वे “कर्म” के पोषक थे । कात्यायन श्रौतसूत्र तो निम्नतम कर्मकाण्ड का पोषक बना, अतः महीधर के समान विद्वान् आचार्यों ने इससे प्रेरणा ली । ऋषि दयानन्द ने अपने यजुर्वेद-भाष्य में शतपथ के कर्मकाण्ड को कोई महत्त्व नहीं दिया । स्पष्ट है कि ये ब्राह्मणग्रन्थ हमारी दार्शनिक आस्थाओं और मान्यताओं के ग्रन्थ नहीं हैं । सभी विद्वान् पाठक अपनी रुचियों और मान्यताओं के आधार पर उपाध्यायजी के इस अनुवाद से लाभ उठा पायेंगे । यह अनुवाद किसी आस्था के परिप्रेक्ष्य में नहीं किया गया है, यही इसकी विशेषता है । निश्चय है कि यह ग्रन्थ हमारे उस युग का ग्रन्थ है, जब समाज का विकास शिथिल हो गया था, और उस अधोगति के समय कर्मकाण्ड को प्रश्रय प्रचुरता से मिलने लगा था । हमें प्रसन्नता है कि उपाध्यायजी का यह शतपथ-अनुवाद डॉ० वेबेर के स्वरांकित शतपथ-संस्करण के साथ प्रकाशित किया जा रहा है। इस हिन्दी-टीका का नाम “रत्नकुमारी- दीपिका” रहा है। डॉ० रत्नकुमारीजी उपाध्यायजी की ज्येष्ठ पुत्रवधू थीं। “डॉ० रत्नकुमारी प्रकाशन योजना” के अन्तर्गत शतपथ ब्राह्मण के इस अनुवाद का प्रथम संस्करण १९६७-७० में दिल्ली से निकला था । यह दूसरा संस्करण दिल्ली के यशस्वी प्रकाशक गोविन्दराम हासानन्द के सौजन्य से प्रकाशित किया जा रहा है। आयोजन के लिए हम इस प्रकाशन-संस्थान के वर्तमान अध्यक्ष श्री विजयकुमार जी और उनके परिवार के अनुगृहीत हैं । शतपथ ब्राह्मण और उसके अनुवाद के सम्बन्ध में कतिपय भ्रान्तियाँ हैं। बहुत-से स्थल ब्राह्मणग्रन्थ में ऐसे हैं, जिनमें पशुबलि की गन्ध मिलती है, अथवा जिनमें मांस खाने का भ्रम होता है। कर्मकाण्ड के ग्रन्थों में यथार्थता का निश्चय करना सरल नहीं है। जिस प्रकार हत्या या बलि के दृश्य नाटक की स्टेज पर नहीं दिखाये जाते, केवल संकेत मात्र से काम निकाल लिया जाता है, ऐसा ही इन यज्ञों में भी सम्भवतया होता था । पशु-यज्ञ बहुधा सृष्टि-रचना की नाटिका थे । सूर्य और बादल के युद्ध थे । इस नाटिका में प्रतीक से काम चला लिया जाता था; यह चित्रण भी ब्राह्मण-ग्रन्थों में मिलेगा । बहुत-से स्थल प्रक्षिप्त भी हो सकते हैं । भारत के इतिहास में एक समय ऐसा भी रहा जब वेदों के नाम पर पशु-बलि निःसन्देह होने लगी थी । महात्मा बुद्ध को इसीलिए वैदिक साहित्य से ग्लानि हुई । ऐसे पतनकाल के समय में हमारा समस्त आर्ष साहित्य प्रक्षेपों से विकृत कर दिया गया । प्रस्तुत शतपथ ब्राह्मण प्राचीन ग्रन्थ का अनुवाद-मात्र हैं। पाठकों से आग्रह हैं कि किस बात को सिद्धान्त के अनुकूल मानें, और किसको प्रतिकूल, इसका स्वयं निर्णय करें । हिन्दी अनु- वादक का कर्त्तव्य केवल इतना है कि मूलग्रन्थ का सच्चा-सच्चा अनुवाद प्रस्तुत कर दे । अनुवादक अपना अनुवाद अपनी आस्था के आधार पर नहीं करता । निस्सन्देह वेद, दयानन्द और आर्य- समाज में एवं आर्ष साहित्य में निष्ठा रखनेवाला व्यक्ति न तो पशु-बलि को मानता है, न मांस- भोजन को और न किसी अनैतिकता को । श्री उपाध्यायजी के इस अनुवाद को इसी भावना से देखना चाहिए । नई दिल्ली —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती ६ अप्रैल १९८८
Preface
THIS edition of the Brâhmanas of the white Yajurveda is destined only to com- prehend the text. An introductory essay, a glossary, a partial translation and deeper researches into all the materials, treasured up here and in the sûtras of Kâtyâyana, shall follow in a separate work on the Yajur-Vedic ceremonies. Therefore I shall here content myself with enumerating the critical apparatus, exstant in Europe, and giving a short explanation of the accents. — A. I Manuscripts of the text of the Çatapatha Brâhmaṇa: a. in the Mâ- dhyandina-Çâkhâ: — There is exstant a very great number of old as well as recent copies of it: Those, which chiefly (with the exception only of the first book and part of the thirteenth) furnished the text for this edition, exist in the Chambers-Collection and I take this opportunity to congratulate the Royal Library of Berlin upon this splendid donation made to it by the present King of Prussia through the care of the Chevalier Bunsen. Next to these manuscripts in value stands the copy (= M) of the Rev. Dr. Mill, now added to the Bodleian library, the greater part of which, viz. the books I-V and VII-XIII is written Samvat 1705-7 in çrîvṛid- dhanagara by Dâmodara son of Purushottama and accented forty years after by Vidyâdhara. I shall now proceed to notice the single books with their re- spective manuscripts. () — I. Haviryaɟna: begins व्रतमुपैष्यन्नन्तरेणाहवनीयम् (7 prapâthaka, 9 adhyâ- ya, 37 brâhmaṇa, 837 kaṇḍikâ). M foll 117. — Bodlei. Wils. 363 (= B.). Samvat 1709. foll. 152 (ten leaves are wanting from 8, 2, 10 - 9, 1, 12 incl.). nr. 368 (= C.) S. 1654. foll. 123. nr. 67. nr. 71. — E. I. H. 2143 (= I.). — Paris Bibl. Nationale D 161. — () All the copies are accented with the exception of Bodlei. Wils. 67 (1-3). 63 (4-8). 62 (9-14). 71 (1-3. 7. 13 twice). 70 (6. 14. 4. 11. 9. 12. 8. 5). .E. I. H. 2143 (1-7). 309 (8-14). 1277 (2. 3). and partly of Chamb. No. 39 (10 twice. 2-5. 7-9. written in Benares S. 1851. Çâke 1716 krodhananâma- samvatsare). These copies are recently written and very incorrect.
PREFACE. १३ II. Ekapádiká begins स यद्वाऽइतश्चेतश्च (5 prap. 6 adhy. 24 bráhm. 549 kaṇḍ.) Chamb. 3 written S. 1681 in Kâcî by Gangârâmamicra. foll. 116. nr. 39. — M. foll. 84. — Bodl. Wils. 366 foll. 62. nr. 67. nr. 71. — E. I. H. 2143. nr. 1277 nr. 58J. foll. 27. — Paris D 147. — III. Adhvara begins देवयजनं जोषयन्ते (7 prap. 9 adhy. 37 bráhm. 859 kaṇḍ.) Chamb 1. foll. 181 written by the same scribe as nr. 3. - nr. 39. — M. foll. 125. — Bodl. Wils. 359 S. 1585 foll. 116. nr. 383. S. 1688. foll. 333. nr. 67. nr. 71. — E. I. H. 1277. 2143. — IV. Graha begins प्राणो ह वाऽअस्योपांशुः (5 prap. 6 adhy. 39 br. 649 k.) Chamb. 5. foll. 240. S. 1689. Çâke 1554. angirânâmasamvatsare written in Benares âbhirajnâtiyarânâranganâthasutanâmâjikena. nr. 39. — M. foll. 90 accen- ted S. 1745 by Someçvara. — Bodl. W. 365. nr. 63. nr. 70. — E. I. H. 2143. — Paris D 162. — V. Sava begins देवाश्च वाऽअसुराश्च (4 pr. 5 adhy. 25 br. 471 k.) Chamb. 6. foll. 109. S. 1683. written by the same scribe as nr. 1 and 3. nr. 16. foll. 89. S. 1648. nr. 21. foll. 59. S. 1572. nr. 39 (till to ३. १. ९.). — M foll. 68. accented S. 1713 by Laghunâtha. — Bodl. W. 452. foll. 113. S. 1610. nr. 63. nr. 70. — E. I. H. 2143. — Paris D. 144. — VI. Ùshasambháraṇa begins असद्वाऽइदमग्रऽआसीत् (5 pr. 8 adhy. 27 br 540 k.) Chamb. 7. foll. 170. nr. 17. foll. 108. S. 1545. Câke 1461 written çrî- mat hansapurapattane revâçrinarmadâyâ daxine tate on the order of Modhajnâtîya Bhattakeçava. nr. 19. foll. 60. — M foll. 139 written S. 1628 and accented by Mahâdeva. — Bodl. W. 454. foll. 165. S. 1610. nr. 457. S. 1688. foll. 211. nr. 63. nr. 70. — E. I. H. 2143. — Paris D. 148. 173. — VII. Hastishat náma káṇḍam () begins गार्हपत्यं चेष्यन् (4 pr. 5 adhy. 12 br. 398 k.) Chamb. 9. foll. 115. nr. 39. — M. foll. 60. — Bodl. W. 462. foll. 114. S. 1571. nr. 63. nr. 71. — E. I. H. 268. 2143. — Paris D. 196. — VIII. Citi begins प्राणभृत उपदधाति (4 pr. 7 adhy. 27 br. 437 k.) Chamb. nr. 20. foll. 86. S. 1739. nr. 39. — M. foll. 72. — Bodl. W. 363. foll. 96. nr. 63. nr. 70. — E. I. H. 268. 309. — Paris D. 195. — IX. Samciti begins अथातः शतरुद्रियम् (4 pr. 5 adhy. 15 br. 401 k.) Chamb () The name of this kâṇḍa is rather questionable: the one above mentioned is taken from M. as the best authority. The other manuscripts in the Mâdhyandina as well as the Kânva Câkhâ call it Hasti- ghata. Is hastin = one? hastishat = seven? See A. W. v. Schlegel Réflexions sur l'étude des langues asiatiques p. 197-199.
१४ PREFACE 14. foll. 103. S. 1586. nr. 18. foil. 61. S. 1671. nr. 39. — M. foll. 66. — Bodl. W. 363, 3. foll. 75. S. 1692. nr. 389. nr. 62. nr. 70. — E. I. H. 309. — X. Agnirahasya begins अग्निर्वाऽएष पुरस्ताच्चीयते (4 pr. 6 adhy. 31 br. 369 k.) Chamb. 11. foll. 60. S. 1485 (A. D. 1428). nr. 39. twice. — M. foll. 58. accented S. 1715. by Krishnaputra Prabhûjika (?). — Bodl. W. 461. foll. 99. S. 1655. nr. 62. — E. I. H. 309. — XI. Ashṭâdhyâyî begins सवत्सरो वै यज्ञः (4 pr. 8 adhy. 42 br. 437 k.) Chamb. 12. foll. 116. — M. foll. 59. — Bodl. W. 369, 1. S. 1645. foll. 86. nr. 62. nr. 70. — E. I. H. 309. — Paris D. 146. — XII. Madhyama begins अयं वै यज्ञो योऽयं पवते (4 pr. 9 adhy. 29 br. 459 k.) Chamb. 13. foll. 69. — M. foll. 62. — Bodl. W. 62. nr. 70. — E. I. H. 309. — Paris D. 159. — XIII. Açvamedha begins ब्रह्मौदनं पचति (4 pr. 8 adhy. 43 br. 430 k.) Chamb. 22. foll. 7. a fragment beginning from 8, 1, 1. — M. foll. 60. — Bodl. W. 365 (= B.). foll. 78. S. 1691. nr. 453 (= C.). foll. 81. S. 1808. nr. 62. nr. 71. — E. I. H. 268. 309. — Paris D. 160. — XIV. Âraṇyakam begins देवा ह वै सत्रं निषेदुः (7 pr. 9 adhy. 50 br. 796 k.) Chamb. 15. foll. 173. S. 1583. — M. foll. 167. written by Pîtâmbara in Benares. — E. I. H. 309. — Detached from this kâṇḍa is the Vṛihad-Âraṇyakam, beginning with the thirth prapâthaka: द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च. Bodl. W. 365. foll. 75. un- accented. nr. 62. nr. 70. — E. I. H. 309. 1471. — Paris D. 163. 59g. — b. in the Kâṇva-Çâkhâ. — Not having yet discovered a complete and correct copy of this Çâkhâ — three books are still wanting and some of the ma- nuscripts of the other 14 books are rather incorrect — I could not venture to give in my edition also the text of this Çâkhâ, especially as its differences from the Mâdhyandina-Çâkhâ are so very numerous and important, you may look at »the readings of almost every passage«, as well at the single words and their or- thography or even accentuation as at the whole kaṇḍikâs and their number or distribution. The best copy extant in Europe is in the collection of the Rev. Dr. Mill, now deposited in the Bodleian library: it contains eleven kâṇḍas written and accented by three different scribes (I. withont any date by the one: IV. V. XIV. foll. 1-23a. Samvat 1651 by an other: II. VI. VII. X. XII. XIV. from foll 23, b-48. XV. XVII. Samvat 1875 by the thirth). Other copies are extant only (with the exception of the kâṇḍas I. and XVII.) in Paris: Bibl. Nat. D. 167.
PREFACE. १५ 172. 180-187 (= P.), which I am sorry to say I could not for want of time suf- ficiently examine. From a list written on the reverse of the first leaf of the fourth book and of the 48ᵗʰ leaf of the fourteenth in M. I take the names and the num- ber of verses of the different kâṇḍas. — I. Ekapâdikâ begins स वै सम्भारात्सम्भरति (6 adhy. 22 brâhm. 367 kaṇ- ḍikâs). M. foll. 100. — E. I. H. 1560. see Colebrooke miscell. ess. I, 60 not. — P. 180. — II. Haviryaǰna begins सं वै व्रतमुपैष्यन् (8 adhy. 32 br. 572 k.) M. foll. 59. — P. 181. — III. Uddhâri (124 k.) is wanting. — IV. Adhvara begins तद्दि देवयजनमीक्षेत (628 k.) M. foll. 49. contains only the prathana aṅga in 4 adhy. 16 br. 272 k. — P. 184 b. — V. Graha begins प्राणो ह वाऽअस्योपांशुः (8 adhy. 38 br. 475 k.) M. foll. 82. — P. 183. — VI. Vâǰapeya begins देवाश्च ह वाऽअसुराश्चोभये (2 adhy. 6 br. 100 k.) M. foll. 12. — P. 185 a. — VII. Râjasûya begins स वै पूर्णाहुतिं जुहोति (5 adhy. 19 br. 288 k.) M. foll. 28. — P. 185 b. — VIII. Ushasambhâraṇa begins असदद्वाऽइदमग्रऽआसीत् (8 adhy. 27 br. 525 k. [509 in the list]) P. 167. the first 82 leaves are written by the same scribe as P. 168 and 169., foll. 83-85 are dated S. 1806. — IX. Hastiaghaṭa (see Wilson Sanskrit dictionary: घट an elephants frontal sinus) begins अथातो नैऋतीर्हरति (5 adhy. 16 br. 261 k. [257 the list]) P. 168. S. 1649. foll. 51 (= A.). nr. 172 (= B.) most likely a copy of the preceding, written S. 1852. Çâke 1717. foll. 46. — X. Citi begins प्राणभृत उपदधाति (5 adhy. 20 br. 241 k) M. foll. 25. — P. 186 a. — XI. Samciti begins नाकसद उपदधाति (7 adhy. 20 br. 441 k.) P. 169. S. 1651. nr. 171 a copy thereof. — XII. Agnirahasya begins अग्निरेष पुरस्ताच्चीयते (6 adhy. 28 br. 286 k.) M. foll. 39. — P. 186 b. — XIII. Ashṭâdhyâyî (252 k.) is wanting. — XIV. Madhyama begins अयं वै यज्ञो योऽयं पवते (8 adhy. 29 br. 382 k.) M. foll. 48. — P. 187 a. —
१६ PREFACE. XV. Açvamedha begins ब्रह्मोदनं पचति (7 adhy. 40 br. 308 k.) M. foll. 29. — P. 187b. — XVI. Pravargya begins (?) अथास्मै श्मशानं कुर्वन्ति (180 k.) is wanting. — XVII. Upanishad begins उषा वाऽश्वस्य मेध्यस्य (6 adhy. 47 br. 446 k.) M. foll. 53. — Bodl. W. 369. foll. 73. a recent copy. nr. 485 a. a fragment. — P. 182. — Chamb. 122 twice. 1., foll. 99. S. 1840. 2., foll. 85. nr. 395 frag- ments. — Edited by Poley 1844 Bonn. — II. Manuscripts of the commentaries on the Çatapatha-Brâhmaņa. —
- Sâyaṇâcârya's Mâdhavîya Vedârthaprakâça: when quoted in the commentaries on the Kâtyâyanasûtra — and this happens very rarely —, this commentary is quoted by इति माधवः. The copies thereof, extant in the E. I. H. and in the Wilson-Collection of the Bodleian library, are very modern, in- correct and defective: and as all of them, with the only exception of E. I. H. 613, partake of the same blunders and interruptions, they have most likely been copied from the same manuscript: they contain the explanation of only eight books, viz: kâṇḍa I as far as the end of the third brâhmaṇa in the seventh adhyâ- ya. E. I. H. 657 (A.) foll. 67. nr. 1509 (B.) foll. 123. Bodl. Wils. 2 (C.) foll.
- — kâṇḍa II E. I. H. 657. foll. 64. — kâṇḍa III ibid. (A.) foll. 69. Bodl. W. 3 (B.) foll. 129. — kâṇḍa V E. I. H. 657 (A.) foll. 66. Bodl. W. 3 (B.) foll.
- — kâṇḍa VII E. I. H. 149 (A.) foll. 66. Bodl. W. 4 (B.) foll. 65. — kâṇḍa IX in the same numbers A. foll. 44. B. foll. 58. — kâṇḍa X E. I. H. 149 (A.). most defective fragments. foll. 39. nr. 613 (B.). S. 1610. foll. 185. — kâṇḍa XI E. I. H. 1071 (A.) foll. 67. Bodl. W. 4 (B.). foll. 104. —
- Âcârya-Harisvâminaḥ kṛitau Çatapathabhâshyam: quoted throughout the commentaries on Kâtyâyana by: इति हरिस्वामिनः. The copies of this com- mentary are even more defective and incorrect then those of the Mâdhavîyabhâ- shya: they are bound together with these and written by the same scribes (): they contain the explanation of only three kâṇḍas, viz: of kâṇḍa II. Bodl. W. () There are four scribes of the three copies 149. 657. 1071 of the E. I. H. kâṇḍa I and k. II as far as fol. 16 have been written by the one, kâṇḍa II from fol. 17 and the kâṇḍas III. VII. IX. XI by another, the kâṇḍas V. VIII. X. XIII as far as fol. 19 by a third, and kâṇḍa XIII foll. 20-24. by a fourth. — Three scribes are to be discerned in the three copies 2-4 of the Bodl. Wils. Coll. The kâṇḍas I. VII. IX have been copied by the one, the kâṇḍas II. V by another, the kâṇḍas III. XI by a third. —
PREFACE. १७ 2. foll. 54. — kâṇḍa VIII E. I. H. 657. foll. 36. — kâṇḍa XIII E. I. H. 149. foll. 24; and partly of a fourth, viz: of the first kâṇḍa from the fourth brâh- maṇa of the seventh adhyâya (where the common copy of the Mâdhavîyabhâ- shya failed) as far as the end (in B. only as far as VIII, 3, 14), occupying 12 leaves in A. nine in B. and sixteen in C, — 3. Dvivedaçrînârâyaṇasûnu Dviveda Gaṅga's commentary of the Mâdhyan- dina Âraṇyaka: a very excellent copy (= M.) in the collection of the Rev. Dr. Mill, since added to the Bodleian library: foll. 322. — There are extant in Europe several copies of commentaries on the Vṛihad- Araṇyaka in the Kâṇvaçâkhâ, but as they have been already published by Dr. Roer in the Bibliotheca Indica nro. 6. Calcutta 1848, I do not think it necessary to notice them here. III. Ṛishitarpaṇam. Cham 506 b. 735. foll. 11. a sort of anukramaṇî of the Mâdhyandina Çatapatha Brâhmaṇa, enumerating a. the beginning words (pratîkâni) 1) of each adhyâya. 2) of each hundred of (the 7624) kaṇḍikâs (2800 · 5400 are enumerated twice differently). 3) of each prapâṭhaka. 4) of the last kaṇḍikâ of each kâṇḍa: b. the closing words of each kâṇḍa. — B. The accentuation in the manuscripts of the Çatapatha Brâhmaṇa is rather strange, as there only one sign is made use of, an horizontal stroke be- neath the line, for denoting the udâtta as well as the svarita. The udâtta has the stroke beneath itself: नृष॒दम्, the svarita beneath the preceding syllable: वी॒र्यम्. To avoid this ambiguity I have denoted the svarita in this edition by two hori- zontal strokes beneath the preceding syllable: वी॒॒र्यम्. — Before a following ac- cented syllable the preceding udâtta loses its denotation: 1) before an udâtta: केत॒पूः के॒तम् instead of ॰पूः॒ के॒तम्, म॒हो ये धन॒म् i. of म॒हो ये॒ धन॒म्, प॒र्णा न वे॒रनु i. of प॒र्णा न॒ वे॒रनु, अ॒ग्निर्हि वे धू॒र्य i. of अ॒ग्निर्हि॒ वे॒ धू॒र्य (१. १. २. १.), but र॒थवाही सा हि॒ न स्त्री न पुमा॒न् i. of ॰ही सा हि॒ न स्त्री न पुमा॒न् (५. ५. ४. ३५.), as there would be wanting too many signs. A seeming exception only is यं-य॒मसुराणाम् १. ६. ३. २८, as the second यम् is not accented: see पाणिनिसू० ८. १. ३. 2) before a svarita: नेष्टृ॒॒ङ्नम् १. ७. २. १., मानुषं नेष्टृ॒॒ङ्नम्, यज्ञो वै॒॒ स्वः, दे- वा वै॒॒ स्वः — The preceding svarita on the contrary retains its denotation be-
१८ PREFACE. fore a following accented syllable: 1) before an udâtta: य॒ज्ञो वै स्व॒र्गः, दे॒वा वै स्व॒र्गन्म॒, ए॒वैतत्॒, 2) before a svarita: वोदा॒नीता॑न् ॥ ५॥ सो॑ऽभ्युक्षति (*) ५. १. ४. ६., इ॒ति सै॑षि॒तम् १. ४. १. २६., दे॒वाः सै॑षि॒तम् — The udâtta changes into the svarita (and the original svarita remains unaltered: अनु॒वा॒क्ये॑यम् १. ७. २. ११.) in all cases of crasis with a following unaccented vowel, see my Vâjasaneyasanhi- tae specimen II p. 7 follow. (Berlin 1847 Asher) and Roth in his edition of Yâska's Nirukta I p. LX. (Göttingen 1848 Dieterich). The only continual exception is made by the praepositions आ and प्र, which remain udâtta: ए॒हि ५. २. १. १०. प्रा॒- ह, प्रा॒धन्वन् १. ५. १. २०., प्रा॑रोचत १. ६. २. ८.: besides the udâtta is occasionally retained (against पाणि० ८. ३. ४.) in the declension, but alternating even in the same words with the svarita: दशम्यै॒ and द॒शम्या॑ Instr. of द॒शमी. – The udâtta is regular in all cases of crasis with a following accented vowel: ए॒वाङ्ग॑तिम्, ए॒वे- ति instead of ए॒व आ॑ इति १. ४. १. ५., आ॒द्येऽध्यू॑हति i. of आ॒द्ये अ॒ध्यू॑हति १. ५. ३. २०., सु॒श्वेति i. of सु॒श्वा इति १. ७. १. १६., या॒ड्याथ i. of या॒ड्या अथ १. ७. २. ७. — (*) The denotation and the reciprocal influence of the accents does in general not undergo any alteration from the divisions of the pratîkas, the kandikâs or the brâhmaṇas, with the only ex- ception that the underlineal stroke is changed into three dots in the manuscripts: तत्॒ ॥५॥ स॒, and in this edition respectively also into six of them, if the following svarita is denoted: तत्॒॥५॥ सोऽभि॑ Berlin March 1849. Albrecht Weber
विषय-सूची
शतपथब्राह्मण विषय-सूची पृष्ठ प्रथम काण्ड—अथ हविर्यज्ञं नाम प्रथमं काण्डम् ३ दर्शपूर्णमास निरूपणम् अध्याय १ ३ अध्याय २ २१ अध्याय ३ ४५ अध्याय ४ ६७ अध्याय ५ ८६ अध्याय ६ १०७ अध्याय ७ १२६ अध्याय ८ १५१ अध्याय ९ १७३ द्वितीय काण्ड—अथ एकपादिकानाम द्वितीयं काण्डम् १९३ अध्याय १ १९३ अग्न्याधानम् अध्याय २ २०६ अग्न्याधानम्, पुनराधेयम्, अग्निहोत्रम् अध्याय ३ २२६ अग्निहोत्रम् अध्याय ४ २५७ पिण्डपितृयज्ञः, आग्रयणेष्टिः, दाक्षायण यज्ञः, चातुर्मास्य निरूपणम् अध्याय ५ २७५ चातुर्मास्यनिरूपणम्, वरुणप्रघासपर्वम्, साकमेधपर्वम् अध्याय ६ ३०३ चातुर्मास्यनिरूपणम् तृतीय काण्ड—अथाध्वरं नाम तृतीयं काण्डम् ३२७ अध्याय १ ३२७ सोमयागनिरूपणम् अध्याय २ ३४५ सोमयागनिरूपणम्
(२०) पृष्ठ अध्याय ३ ३७३ सौमयागनिरूपणम् अध्याय ४ ३९३ अवान्तर दीक्षा [३।४।३], उपसदिष्टः [३।४।४] अध्याय ५ ४१५ महावेदिनामम् [३।५।१]; अग्नि—प्रणयनादि [३।५।२]; सदो हविर्धान निर्माणादि [३।५।३]; उपरवनिर्माणम् [३।५।४] अध्याय ६ ४३७ सदस्यौडुम्बरी निखननम् [३।६।१]; धिष्ण्यनिवापादि [३।६।२]; वैसर्जनं होमः [३।६।३]; अग्निषोमीय पशु प्रयोगः; तत्र यूपच्छेदनम् [३।७।२] अध्याय ७ ४५६ यूपोच्छ्रयणादि [३।७।१]; यूपैकादशिनी [३।७।२]; पशूपकरणादि [३।७।३]; पशुंनियोजन प्रोक्षणादि [३।७।४] अध्याय ८ ४७५ पशुसंज्ञपनम्; तत्रोपवेशनादि विधिः [३।८।१]; अग्निषोमीय वपायागः [३।८।२]; पशुपुरोडाशयागः [३।८।३]; उपयड्डोमः [३।८।४] अध्याय ९ ४९६ पश्वैकादशिनि [३।९।१]; वसतीवर ग्रहणविधिः [३।९।२]; सवनीय पशुप्रयोगः [३।९।३]; सोमाभिषवः [३।९।४] चतुर्थ काण्ड --अथ ग्रह नामकं चतुर्थं काण्डम् ५२७ अध्याय १ ५२७ उपांशु ग्रहः क्षुल्लकाभिषवश्च, अन्तर्यामग्रहः, ऐन्द्रवायव ग्रहः, मैत्रावरुण ग्रहः, आश्विन ग्रहः अध्याय २ ५४६ शुक्रामन्थि ग्रही, आग्रायणग्रहः, विप्रड्ढोमः अध्याय ३ ५७७ ऋतु ग्रहैन्द्राग्न वैश्वदेव ग्रहाः, शस्त्रप्रतिगरा, माध्यन्दिन सवनम्— मरुत्वतीय ग्रहादि, दाक्षिण होमो दक्षिणादानञ्च, आदित्यग्रहः अध्याय ४ ६०५ सावित्रग्रहः, सौम्यश्चरु; पत्नीवतग्रहश्च, हरियोजनग्रहः; समिष्ट- यजुर्होम, अवभृथः अध्याय ५ ६२७ उदयनीयेष्टिः, आनुबन्ध्ययागः, षोडशिग्रहः, अतिग्राह्या ग्रहाः, ग्रहावेक्षणम्, सोमप्रायश्चित्तानि, सहस्रदक्षिणा व्यूढद्वादशाह धर्म, सोमापहरणादि अध्याय ६ ६५७ अंशु ग्रहः, अतिग्राह्य ग्रह ग्रहणम्, पश्वयनस्तोमायने, महाव्रतीय, ग्रहस्तुतिः, सौमिकं ब्रह्मत्वम्, ब्रह्मत्वसदोहविधानं विधिशेषः, सत्रायणम्, सत्रधर्मा
प्रथम भाग
शतपथब्राह्मण प्रथम भाग
०१-प्रथम काण्ड-०१
ओम् । व्रतमु॒पैष्यन्॑ । अ॒न्तरे॒णाह॑वनी॒यं च॑ गा॒र्हप॑त्यं च॒ प्रा- ङ्तिष्ठ॑न्नप॒ उप॑स्पृशति॒ तद्यदप॒ उप॑स्पृश॒त्यमे॑ध्यो॒ वै पूरु॑षो॒ यदनृ॑तं व॒दति॒ तेन॑ पूति॒- रन्तर॑तो मे॒ध्या वाऽआपो॑ मे॒ध्यो भू॒त्वा व्र॒तमु॒पाया॒नीति॑ प॒वित्रं॒ वाऽआपः॑ प॒वित्र॑पू- तो व्र॒तमु॒पाया॒नीति॒ तस्मा॑द्वा॒ऽअप॒ उप॑स्पृशति ॥ १॥ सोऽग्नि॒मिवा॒भीक्ष॑माणो व्र॒त- मुपै॑ति । अग्ने॒ व्रतपते व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑ राध्यतामित्य॒ग्निर्वै दे॒वानां॑ व्र॒तप॑ति॒स्तस्मा॑ ऽए॒वैतत्प्रा॒ह व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑ राध्यता॒मिति॒ नात्र॑ ति॒- रोहि॑तमिवास्ति ॥ २॥ अथ॒ सꣳस्थि॑ते विसृ॒जते । अग्ने॒ व्रतपते व्र॒तम॑चारिषं॒ तद॑शकं॒ तन्मे॑ ऽराधीत्यश॒कꣳह्ये॑त॒द्यो य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थामग॒न्नरा॑धि॒ ह्य॑स्मै॒ यो य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थामग॒न्नेति॒ न्वे॑व भूयि॑ष्ठा-इव व्रतमु॒पयन्त्यने॑न॒ त्वे॒वोपे॑यात् ॥ ३॥ द्वयं॒ वाऽइ॒दं न तृ॒तीय॑मस्ति । स॒त्यं चै॒वानृ॑तं च स॒त्यमे॒व दे॒वा अनृ॑तं मनु॒ष्या इ॒दम॒हमनृ॑तात्स॒- त्यमु॒पैमीति॒ तन्मनु॑ष्येभ्यो दे॒वानुपै॑ति ॥ ४॥ स वै॑ स॒त्यमे॒व व॑देत् । ए॒तद्वै दे॒वा व्र॒तं च॑रन्ति॒ यत्स॒त्यं तस्मा॑त्ति॒ यशो॒ यशो॑ ह भवति॒ य ए॒वं वि॒द्वांस॒त्यं व॑दति ॥ ५॥ अथ॒ सꣳस्थि॑ते विसृ॒जते । इ॒दम॒हं य ए॒वास्मि॒ सोऽस्मी॒त्यमानुष॒-इव॒ वाऽए॒तद्- र्भव॑ति॒ यद्व्र॒तमुपै॑ति न हि॒ तद॑वकल्पते॒ यद्ब्रू॑यादि॒दम॒हꣳ स॒त्यद॑नृ॒तमु॒पैमीति॒ तद् खलु॒ पुनर्म्मानु॑षो भवति॒ तस्मा॑दि॒दम॒हं य ए॒वास्मि॒ सोऽस्मीत्ये॒वं व्र॒तं विसृ॑जेत ॥ ६॥ अथातोऽशनानशनस्यैव । तदु॑ह्याषा॒ढः सा॑वय॒सोऽन॒शनमे॒व व्र॒तं मे॑ने म॒नो ह॒ वै दे॒वा मनु॑ष्यस्या॒जान॑न्ति त॒ऽएन॑मे॒तद्व्र॒तमु॑पय॒न्तं वि॒दुः प्रात॒र्नो य॑क्ष्यत
अध्याय १-ब्राह्मण १ (दर्शपूर्णमास इष्टि करने का) व्रत करनेवाला मनुष्य आहवनीय और गार्हपत्य अग्नियों के बीच पूर्वाभिमुख खड़ा होकर जल का स्पर्श करता है। जल क्यों छूता है ? इसलिये कि मनुष्य अपवित्र है, वह झूठ बोलता है। जल के स्पर्श से उसकी शुद्धि हो जाती है। जल वस्तुतः पवित्र है। प्रयोजन यह है कि 'पवित्र होकर व्रत करूँ'। जल वस्तुतः पवित्र है। 'पवित्र के द्वारा पवित्र होकर मैं व्रत करूँ' ऐसा सोचता है। इसीलिये जल का स्पर्श करता है ॥१॥ आहवनीय अग्नि की ओर देखकर वह व्रत करता है इस मंत्र से (यजु० १।५) - "हे व्रत के पालक अग्नि, मैं व्रत करना चाहता हूँ। मैं व्रत का पालन कर सकूँ। मैं इस योग्य हो जाऊँ।" अग्नि देवों का व्रतपति है। इसीलिये अग्नि को सम्बोधन करके कहता है कि "मैं व्रत करना चाहता हूँ। मैं व्रत का पालन कर सकूँ। मैं इस योग्य हो जाऊँ"। शेष स्पष्ट है ॥२॥ इष्टि के समाप्त होने पर व्रत को समाप्त करता है (यजु० २।२८ से) - "हे व्रतपते अग्नि ! मैंने व्रत किया। मैं उसको कर सका। मैं इस योग्य हो सका।" वस्तुतः जिसने यज्ञ को समाप्त किया वह व्रत को पाल सका। वह व्रत-पालन के योग्य हो सका। प्रायः यज्ञ करनेवाले इसी प्रकार व्रत करते हैं। इस प्रकार भी व्रत करे ॥३॥ दो ही बातें होती हैं, तीसरी नहीं- एक सत्य और दूसरी अनृत - देव सत्य हैं, मनुष्य अनृत। यह जो मंत्र में कहा कि 'झूठ से सत्य को प्राप्त होऊँ' उसका तात्पर्य यह है कि 'मनुष्यों में से एक था, देवों में से एक हो जाऊँ' (मनुष्यत्व छूटकर देवत्व आ जावे) ॥४॥ उसे सत्य ही बोलना चाहिये । देव सत्यरूपी व्रत का पालन करते हैं। इसी से उनको यश मिलता है। जो इस रहस्य को समझकर सत्य बोलता है उसको यश मिलता है ॥५॥ यज्ञ की समाप्ति पर वह व्रत को समाप्त करता है इस मंत्र से (यजु० २।२८) 'मैं जो था वही हो गया'। जब उसने व्रत किया था तो वह अमानुष अर्थात् देव हो गया था। ऐसा कहना तो उसको उचित नहीं था कि 'मैं सत्य से अनृत को प्राप्त हो जाऊँ'। इसलिये यज्ञ करते हुए देव की कोटि में होकर यज्ञ की समाप्ति पर जब वह मनुष्य की कोटि में आता है तो केवल इतना कहता है, "मैं जो पहले था नहीं, अब हूँ" इस प्रकार व्रत को समाप्त करता है ॥६॥ अब प्रश्न है कि व्रत के मध्य में खावे या न खावे ? आषाढ सावयस मुनि का मत था कि व्रत में खाना नहीं चाहिये । देव मनुष्य के मन को जानते हैं। वे जानते हैं कि जब उसने आज व्रत किया है तो कल वह यज्ञ करेगा। वे सब देव उसके घर आते हैं। वे उसके घर में उपवास
४ | शतपथ ब्राह्मण
ऽइ॒ति ते॒ऽस्य॒ विश्वे॑ दे॒वा गृ॒हाना॒गच्छ॑न्ति ते॒ऽस्य गृ॒हेषू॑पवसन्ति स उपवस॒थः ॥७॥ तन्त्वे॒वानव॑कॢप्तम् । यो म॒नु॒ष्ये॑घ्न॒न्नत्सु पूर्वो॑ऽश्नीया॒दथ॒ किमु॒ यो दे॒वेष्व॑न॒श्नत्सु पूर्वो॑ऽश्नीया॒त्तस्मा॑दु नैवाश्नीयात् ॥८॥ तदु॑ होवाच याज्ञव॒ल्क्यः । यदि॒ नाश्ना॑ति पि॒तृ॒दे॒व॒त्यो भ॑वति॒ यद्यु॑ऽअ॒श्नाति॑ दे॒वानत्य॑श्नातीति॒ स यद॑शितमनशितं॒ तद॑- श्नीया॒दिति॒ यस्य॒ वै ह॒विर्न गृह्ण॑न्ति॒ तद॑शितमनशितꣳ स यद॑श्नाति॒ तेना॑पितृदेव- त्यो भ॑वति॒ यद्यु॒ तद॑श्नाति॒ यस्य॑ ह॒विर्न गृह्ण॑न्ति॒ तेनो॑ दे॒वान्नात्य॑श्नाति ॥९॥ स वाऽआ॑र॒ण्यमे॒वाश्नी॑यात् । या वा॑र॒ण्या ओष॑धयो॒ यद्वा॑ वृ॒क्ष्यं तदु॑ ह स्माह्यापि ब॒र्कु- र्वाष्णो॑ मा॒षान्मे॑ पचत॒ न वा॒ऽए॒तेषाꣳ॑ ह॒विर्गृह्ण॒न्तीति॒ तदु॒ तथा॒ न कु॑र्याद्ब्री॒हि- य॒वयो॒र्वाऽए॒तद्रू॒पं यन्मी॑धान्यं॒ तद्ब्री॒हिय॒वावे॒वैते॑न भूयाꣳसौ क॒रोति॒ तस्मा॑दा- र॒ण्यमे॒वाश्नी॑यात् ॥१०॥ स आ॑हवनीयागा॒रे वैताꣳ॑ रा॒त्रिꣳ श॑यीत । गा॒र्हप॑त्यागा॒रे वा दे॒वान्वा॒ऽए॒ष उ॑पाव॒र्तते॒ यो व्र॒तमुपै॑ति॒ स याने॒वोपा॒वर्त॑ते॒ तेषा॑मे॒वैतन्म॑ध्ये शेते॒ऽधः श॑यीताध॒स्तादि॑व॒ हि श्रेय॑स उपचा॒रः ॥११॥ स वै प्रा॒तर॒प ए॑व । प्र॒थ- मे॑न॒ कर्म॑णाभि॒पद्य॑ते॒ऽपः प्र॑णयति य॒ज्ञो वा॒ऽआपो॑ य॒ज्ञमे॒वैतत्प्र॑थ॒मेन॒ कर्म॑णाभि- पद्य॑ते॒ ताः प्र॑णयति य॒ज्ञमे॒वैतद्वि॑तनोति ॥१२॥ स प्र॑णयति । क॒स्त्वा यु॑नक्ति॒ स त्वा यु॑नक्ति॒ कस्मै॑ त्वा यु॑नक्ति॒ तस्मै॑ त्वा युनक्तीत्ये॒ताभि॑रनिरु॒क्ताभि॑र्व्या॒हृति॑भिरनि- रु॒क्तो वै प्र॒जाप॑तिः प्रजाप॑तिर्य॒ज्ञस्तत्प्र॒जाप॑तिमे॒वैतद्य॒ज्ञं यु॑नक्ति ॥१३॥ यद्वे॑वा॒पः प्र॑णय॑ति । अ॒द्भिर्वा॒ऽइदꣳ॑ सर्व॑मा॒प्तं तत्प्र॑थ॒मेनै॒वैतत्कर्म॑णा॒ सर्व॑माप्नोति ॥१४॥ य- द्वे॑वा॒स्त्यात्र॑ । होता॑ वाध्व॒र्युर्वा॒ ब्रह्मा॑ वा॒ग्नीध्रो॑ वा स्व॒यं वा यज॑मानो॒ नाभ्या॒पद्य॑ति तद्देवा॒स्यैते॑न॒ सर्व॑मा॒प्तं भ॑वति ॥१५॥ यद्वे॑वा॒पः प्र॑णय॑ति । दे॒वान्ह॒ वै य॒ज्ञेन॒ यज॑- मानां॒स्तानसु॑ररक्ष॒सानि॑ ररक्षु॒र्न यक्ष्य॑ध॒ इति॒ तद्यदुर॑क्षं॒स्तस्मा॒द्रक्षां॑सि ॥१६॥ ततो॑ दे॒वा ए॒तं वज्रं॑ ददृशुः । यदपो॑ व॒ज्रो वा॒ऽआपो॑ व॒ज्रो हि वा॒ऽआप॒स्तस्मा॒द्येने॑- ता य॑न्ति॒ निघ्नं॑ कु॒र्वन्ति॒ यत्रो॑पति॒ष्ठन्ते॒ निर्द॑हन्ति॒ तत॑ ए॒तं वज्र॑मुद्यच्छं॒स्तस्या॑भये
कां० १, अ० १, ब्रा० १, कं० ७-१७ शतपथब्राह्मण / ५ करते हैं (उप+वास, किसी के घर में आकर बैठना)। इसीलिये इस दिन का नाम है 'उपवसथ' (उपवास का दिन) ॥७॥ यह तो सर्वथा अनुचित है कि आगन्तुक मनुष्यों को खिलाने से पहले घरवाला स्वयं खा ले। और यह तो और भी अनुचित है कि देवों को खिलाने से पहले खा लेवे। इसलिए नहीं खाना चाहिए ॥८॥ इस विषय में याज्ञवल्क्य का कहना है कि—यदि नहीं खाता है तो पितृदेवत्य होता है; और यदि खाता है तो देवों से पहले खाने का दोषी होता है। इसलिये इतना खावे कि न खाने में उसकी गणना हो सके ॥६॥ जो हवि में नहीं डाला जाता उसका खाना न खाने के बराबर है। यदि उसको खा लेगा तो उसे पितृदेवत्य का दोष न लगेगा। जिस चीज की हवि नहीं दी जाती उसके खा लेने से देवों से पहले खा लेने का दोष भी नहीं लगता। उसे वन में उपजी हुई चीज खानी चाहिये—ओषधि या वनस्पति। बर्कु वार्ष्ण ने कहा— 'मुझे माष (उड़द) पकाकर दे दो क्योंकि माष की हवि नहीं दी जाती।' परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिये। जौ या चावल के साथ उड़द खाये जाते हैं। उड़द जौ या चावल की वृद्धि करते हैं। इसलिये वन की उपजी हुई चीज ही खावे ॥१०॥ उस रात को वह आहवनीय अग्नि के घर में सोवे या गार्हपत्य अग्नि के। जो व्रत करता करता है वह देवों के निकट होता है। अतः वह वहीं सोता है जिनके निकट होना चाहता है। नीचे (धरती पर) सोना चाहिये, क्योंकि जो सेवा करता है वह नीचे से ही करता है ॥११॥ दूसरे दिन प्रातःकाल अध्वर्यु पहला काम यह करता है कि वह जल के पास जाता है। जल को लाता है। जल यज्ञ है। अतः इस प्रकार वह यज्ञ के पास जाता है। जल को आगे लाने का अर्थ यह है कि वह यज्ञ को आगे लाता है ॥१२॥ वह यह मंत्र पढ़कर जल का प्रणयन करता है— (यजु० १।६) 'कौन'१ तुझको जोड़ता है ? या प्रजापति तुझको जोड़ता है। वह तुझको जोड़ता है। किसके लिए तुझको जोड़ता है ? या प्रजापति के लिए तुझको जोड़ता है। उसके लिए तुझको जोड़ता है। इन अनिरुक्त (रहस्यमय) वचनों को बोलता है। प्रजापति रहस्यमय है। प्रजापति यज्ञ है। इस प्रकार प्रजापति अर्थात् यज्ञ की योजना करता है ॥१३॥ जलों के प्रणयन का हेतु यह है कि जल से ही यह सब सृष्टि व्याप्त है। इस प्रकार इस पहले कर्म से ही वह जगत् की प्राप्ति करता है ॥१४॥ इसका यह भी तात्पर्य है कि होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, अग्नीध्र या स्वयं यजमान भी जिसकी प्राप्ति नहीं कर सकता उसकी इस प्रकार प्राप्ति हो जाती है ॥१५॥ जल के प्रणयन का एक हेतु यह भी है। जब देव यज्ञ करने लगे तो असुरों, राक्षसों ने उनको रोका—'यज्ञ मत करो।' उन्होंने रोका (ररक्षुः) इसलिये उनका नाम 'राक्षस' २ हुआ ॥१६॥ तब देवों ने इस वज्र को खोज निकाला, जो जल है। जल वज्र है। निस्सन्देह जल वज्र है। जल जहाँ जाता है गड्ढा कर देता है। जिस चीज पर आक्रमण करता है उसका नाश १. 'क' व्यंजनों में पहला अक्षर है। प्रजापति भी पहला व्यक्त करनेवाला है। २. 'रक्ष' धातु का अर्थ है 'रोकना'। उन्होंने देवों को शुभ काम से रोका, इसलिये उनका नाम राक्षस हुआ।
अध्याय-१, ब्राह्मण-२
६ शतपथ ब्राह्मण ऽना॒ष्ट्रे॒ निवा॒ते य॒ज्ञम॑तन्वत तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तं वज्र॑मुद्यच्छति तस्या॑भये ऽना॒ष्ट्रे॒ नि- वा॒ते य॒ज्ञं त॑नुते॒ तस्मा॑दपः प्रणयति ॥ १७॥ ता उत्सिच्योत्तरेण गार्हपत्यग्ं साद- यति । योषा वा॒ऽआपो॑ वृ॒षाग्नि॑र्गृ॒हा वै गार्हप॒त्यस्तद्गृ॒हेष्वे॒वैतन्मिथु॒नं प्र॒जन॑नं क्रियते वज्रं वा॒ऽए॒ष उद्यच्छ॑ति यो ऽपः प्रणयति यो वा॒ऽअप्रति॑ष्ठितो वज्रमुद्य- च्छति नैनग्ं शक्नोत्युद्यन्तुग्ं सग्ं हैनग्ं शृणाति ॥ १८॥ स यद्गार्हपत्ये सादयति । गृहा वै गार्हपत्यो गृहा वै प्रतिष्ठा तद्गृ॒हेष्वे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां प्रतितिष्ठति तथो॒ है- नमेष वज्रो न हिनस्ति तस्माद्गार्हपत्ये सादयति ॥ १९॥ ता उत्तरेणाहवनीयं प्र- णयति । योषा वा॒ऽआपो॑ वृ॒षाग्नि॑र्मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियतऽए॒वमिव हि मि- थुनं ल्नाम्युत्तरतो हि स्त्री पुमांसमुपशेते ॥ २०॥ ता नान्तरेण संचरेयुः । नेन्मि- थुनं चर्य॑माणमन्तरेण संचरानिति ता नाति॑कृत्य सादयेन्नो॒ऽअन्नाप्ताः॑ सादयेत्स यद्- तिकृत्य सादयेदस्ति वा॒ऽअग्ने॒श्चापां॑ च विभ्रातृव्यमिव स यथैव ह तदग्नेर्भवति य- त्रास्याप उपस्पृशन्त्यग्नौ ह्यधि भ्रातृव्यं वर्धयेद्यदतिकृत्य सादयेद्यद्यन्वन्नाप्ताः सा- दयेन्नो ह्वामिस्तं काममभ्यापयेद्यस्मै कामाय प्रणीयन्ते तस्मादु सम्प्रत्येवोत्तरेणा- हवनीयं प्रणयति ॥ २१॥ अथ तृणैः परिस्तृणाति । द्वन्द्वं पात्राण्युदाहरति शूर्पं चाग्निहोत्रहवणीं च स्फ्यं च कपालानिच शम्यां च कृष्णाजिनं चोलूखलमुसले दृषदुपल॒ तद्दश॑ दशा॒क्षरा॑ वै वि॒राड्वि॒राडु॑ य॒ज्ञस्तद्वि॒राज॑मे॒वैतद्य॒ज्ञम॑भिसम्पादयत्यथ यद्द्व॒न्द्वं द्व॒न्द्वं वै वी॒र्यं य॒दा वै द्वौ सग्ंर॑भेते॒ऽथ तद्वी॒र्यं भ॑वति द्व॒न्द्वं वै मिथु॒नं प्र- जन॑नं मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥ १॥ अथ शूर्पं चाग्निहोत्रहवणीं चादत्ते । कर्म॑णे वां वे॒षाय॑ वा॒मिति॑ य॒ज्ञो वै कर्म॑ य॒ज्ञाय॑ हि॒ तस्मा॑दाह॒ कर्म॑णे वा॒मिति॑ वे॒षाय॑ वा॒मिति॑ वेवेष्टीव हि य॒ज्ञम् ॥ १॥ अथ वाचं यच्छति । वाग्वै य॒ज्ञोऽवि॑च्छुब्धो य॒ज्ञं तनवा॒ऽइत्यथ प्रत॑पति प्रत्युष्टग्ं रक्षः॑ प्रत्यु॑ष्टा अरा॒तयो॒ निष्ट॑प्तग्ं॒ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता अरा॒तय॒ इति॑ वा ॥ २॥ दे॒वा ह॒ वै
कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० १-२ शतपथब्राह्मण / ७ कर देता है। उन्होंने इस वज्र को लिया और उसीकी छत्र-छाया में यज्ञ को ताना। वह भी जल का प्रणयन करके इसी वज्र को लाता है और इसी की छत्र-छाया में यज्ञ को तानता है ॥१७॥ पात्र में थोड़ा-सा जल लेकर गार्हपत्य के उत्तर की ओर रख देता है। आपः (जल) स्त्रीलिङ्ग है और अग्नि पुँल्लिङ्ग। गार्हपत्य घर है। स्त्री-पुरुष मिलकर घर में ही सन्तानोत्पत्ति करते हैं। जो जल का प्रणयन करता है वह वज्र को लाता है। जो भूमि में सुदृढ़ता से खड़ा नहीं होता वह वज्र को नहीं ले सकता, क्योंकि वज्र उसी को हानि पहुँचा देगा ॥१८॥ गार्हपत्य में रखने का यही प्रयोजन है। गार्हपत्य घर है। घर ही प्रतिष्ठा है (खड़े होने की जगह—, प्रति + स्था)। घर में इसकी प्रतिष्ठा करता है। इस प्रकार वज्र उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसीलिये वह जल की गार्हपत्य में स्थापना करता है ॥१९॥ आहवनीय के उत्तर में क्यों ले जाता है ? आपः (जल) स्त्रीलिङ्ग हैं। अग्नि पुँल्लिङ्ग है। स्त्री-पुरुष के मिलने से ही सन्तान होती है। स्त्री, पुरुष के बाईं ओर सोती है ('उत्तर' का अर्थ 'बायां' भी है) ॥२०॥ जल और अग्नि के बीच में होकर न निकले, क्योंकि स्त्री-पुरुष के जोड़े के बीच में नहीं पड़ना चाहिये (उनके सहवास में विघ्न नहीं डालना चाहिये (जल को ठीक उत्तर की ओर रखना चाहिये) न तो सीमा से आगे बढ़ाकर और न सीमा को प्राप्त करने के पहले (न पूर्व की ओर, न पश्चिम की ओर)। यदि सीमा से आगे बढ़ाकर रखेगा तो जल और अग्नि में जो परस्पर-विरोध है उसको बढ़ा देगा और जब जल का स्पर्श होगा तो अग्नि का विरोध बढ़ जायगा। यदि सीमा को प्राप्त किये बिना ही रख देगा तो कामना की पूर्ति नहीं होगी। इसलिये जल का प्रणयन ठीक उत्तर को ही करना चाहिये ॥२१॥ अब तृणों को बिछाता है (अग्नियों को) चारों ओर। पात्रों को दो-दो करके ले जाता है, अर्थात् सूप और अग्निहोत्र-हवणी, स्फ्या और कपाल, शमी और कृष्णमृगचर्म, ऊखल और मूसली, और छोटे-बड़े पत्थर; ये दस हो गये। विराट् छन्द दस अक्षर का होता है। यज्ञ भी विराट् है। इस प्रकार यज्ञ को विराट् रूप दे देता है। दो-दो करके क्यों ले जाते हैं ? इसलिये कि दो में शक्ति होती है। जब दो मिलकर काम करते हैं तो वह काम सुदृढ़ होता है। दो से सन्तान होती है। इस प्रकार यज्ञ को प्रजनन-शील कर देता है ॥२२॥ अध्याय १—ब्राह्मण २ अब सूप और अग्निहोत्र-हवणी को लेता है इस मंत्र से (यजु० १।६)—"कर्म के लिए तुम दोनों को, व्यापकत्व के लिए तुम दोनों को।" यज्ञ कर्म है। कर्म के लिए अर्थात् यज्ञ के लिए। 'व्यापकत्व के लिए तुम दोनों को' क्योंकि यजमान यज्ञ में व्यापक होता है ॥१॥ अब वाणी रोकता है। वाणी यज्ञ है। इस प्रकार यज्ञ को निर्विघ्न पूरा करूँ, यह तात्पर्य है। अब इन दोनों (सूप और हवणी) को आग पर तपाता है यह मंत्र बोलकर (यजु० १।७)— "झुलस गया राक्षस, झुलस गये शत्रु । जल गया राक्षस, जल गये शत्रु" ॥२॥