शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| २२० | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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मुझे इस समय कौन-सा कार्य करना होगा ? ईशान ! क्या मुझे आधे ही क्षणमें सारे समुद्रोंको सुखा देना है? या इतने ही समयमें सम्पूर्ण पर्वतोंको पीस डालना है? हर ! मैं एक ही क्षणमें ब्रह्माण्डको भस्म कर डालूँ या समस्त देवताओं और मुनीश्वरोंको जलाकर राख कर दूँ? शंकर ! ईशान ! क्या मैं समस्त लोकोंको उलट-पलट दूँ या सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश कर डालूँ ? महेश्वर ! आपकी कृपासे कहीं कोई भी ऐसा कार्य नहीं है, जिसे मैं न कर सकूँ। पराक्रमके द्वारा मेरी समानता करनेवाला वीर न पहले कभी हुआ है और न आगे होगा। शंकर ! आप किसी तिनकेको भेज दें तो वह भी बिना किसी यत्नके क्षणभरमें बड़े-से-बड़ा कार्य सिद्ध कर सकता है, इसमें संशय नहीं है। शम्भो ! यद्यपि आपकी लीलामात्रासे सारा कार्य सिद्ध हो जाता है, तथापि जो मुझे भेजा जा रहा है, यह मुझपर आपका अनुग्रह ही है। शम्भो ! मुझमें भी जो ऐसी शक्ति है, वह आपकी कृपासे ही प्राप्त हुई है। शंकर ! आपकी कृपाके बिना किसीमें भी कोई शक्ति नहीं हो सकती। वास्तवमें आपकी आज्ञाके बिना कोई तिनके आदिको भी हिलानेमें समर्थ नहीं है, यह निस्संदेह कहा जा सकता है। महादेव ! मैं आपके चरणोंमें बारंबार प्रणाम करता हूँ। हर ! आप अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये आज मुझे शीघ्र भेजिये। शम्भो ! मेरे दाहिने अंग बारंबार फड़क रहे हैं। इससे सूचित होता है कि मेरी विजय अवश्य होगी। अतः प्रभो ! मुझे भेजिये। शंकर ! आज मुझे कोई अभूतपूर्व एवं विशेष हर्ष तथा उत्साहका अनुभव हो रहा है और मेरा चित्त आपके चरणकमलमें लगा हुआ है। अतः पग-पगपर मेरे लिये शुभ परिणामका विस्तार होगा। शम्भो ! आप शुभके आधार हैं। जिसकी आपमें सुदृढ़ भक्ति है, उसीको सदा विजय प्राप्त होती है और उसीका दिनोंदिन शुभ होता है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! उसकी यह बात सुनकर सर्वमंगलाके पति भगवान् शिव बहुत संतुष्ट हुए और 'वीरभद्र ! तुम्हारी जय हो' ऐसा आशीर्वाद देकर वे फिर बोले।
महेश्वरने कहा—मेरे पार्षदोंमें श्रेष्ठ वीरभद्र ! ब्रह्माजीका पुत्र दक्ष बड़ा दुष्ट है। उस मूर्खको बड़ा घमंड हो गया है। अतः इन दिनों वह विशेषरूपसे मेरा विरोध करने लगा है। दक्ष इस समय एक यज्ञ करनेके लिये उद्यत है। तुम याग-परिवारसहित उस यज्ञको भस्म करके फिर शीघ्र मेरे स्थानपर लौट आओ। यदि देवता, गन्धर्व, यक्ष अथवा अन्य कोई तुम्हारा सामना करनेके लिये उद्यत हों तो उन्हें भी आज ही शीघ्र और सहसा भस्म कर डालना। दधीचिकी दिलायी हुई मेरी शपथका उल्लंघन करके जो देवता आदि वहाँ ठहरे हुए हैं, उन्हें तुम निश्चय ही प्रयत्नपूर्वक जलाकर भस्म कर देना। जो मेरी शपथका उल्लंघन करके गर्वयुक्त हो वहाँ ठहरे हुए हैं, वे सब-के-सब मेरे द्रोही हैं। अतः उन्हें अग्निमयी मायासे जला डालो। दक्षकी यज्ञशालामें जो अपनी पत्नियों और सारभूत उपकरणोंके साथ बैठे हों, उन सबको जलाकर भस्म कर देनेके पश्चात् फिर शीघ्र लौट आना। तुम्हारे वहाँ जानेपर विश्वदेव आदि देवगण भी यदि सामने आ तुम्हारी सादर स्तुति करें तो भी तुम उन्हें शीघ्र आगकी ज्वालासे जलाकर
* रुद्रसंहिता * २२१
ही छोड़ना। वीर! वहाँ दक्ष आदि सब लोगोंको पत्नी और बन्धु-बान्धवोंसहित जलाकर (कलशोंमें रखे हुए) जलको लीलापूर्वक पी जाना।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जो वैदिक मर्यादाके पालक, कालके भी शत्रु तथा सबके ईश्वर हैं, वे भगवान् रुद्र रोषसे लाल आँखें किये महावीर वीरभद्रसे ऐसा कहकर चुप हो गये।
(अध्याय ३२)
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प्रमथगणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रस्थान, दक्ष तथा देवताओंको अपशकुन एवं उत्पातसूचक लक्षणोंका दर्शन एवं भय होना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! महेश्वरके इस वचनको आदरपूर्वक सुनकर वीरभद्र बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने महेश्वरको प्रणाम किया। तत्पश्चात् उन देवाधिदेव शूलीकी उपर्युक्त आज्ञाको शिरोधार्य करके वीरभद्र वहाँसे शीघ्र ही दक्षके यज्ञमण्डपकी ओर चले। भगवान् शिवने केवल शोभाके लिये उनके साथ करोड़ों महावीर गणोंको भेज दिया, जो प्रलयाग्निके समान तेजस्वी थे। वे कौतूहलकारी प्रबल वीर प्रमथगण वीर-भद्रके आगे और पीछे भी चल रहे थे। कालके भी काल भगवान् रुद्रके वीरभद्र-सहित जो लाखों पार्षदगण थे, उन सबका स्वरूप रुद्रके ही समान था। उन गणोंके साथ महात्मा वीरभद्र भगवान् शिवके समान ही वेश-भूषा धारण किये रथपर बैठकर यात्रा कर रहे थे। उनके एक सहस्र भुजाएँ थीं। शरीरमें नागराज लिपटे हुए थे। वीरभद्र बड़े प्रबल और भयंकर दिखायी देते थे। उनका रथ बहुत ही विशाल था। उसमें दस हजार सिंह जोते जाते थे, जो प्रयत्नपूर्वक उस रथको खींचते थे। उसी प्रकार बहुत-से प्रबल सिंह, शार्दूल, मगर, मत्स्य और सहस्रों हाथी उस रथके पार्श्वभागकी रक्षा करते थे। काली, कात्यायनी, ईशानी, चामुण्डा, मुण्डमर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता तथा वैष्णवी—इन नव दुर्गाओंके साथ तथा समस्त भूतगणोंके साथ महाकाली दक्षका विनाश करनेके लिये चलीं। डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रमथ, गुह्यक, कूष्माण्ड, पर्पट, चटक, ब्रह्मराक्षस, भैरव तथा क्षेत्रपाल आदि—ये सभी वीर भगवान् शिवकी आज्ञाका पालन एवं दक्षके यज्ञका विनाश करनेके लिये तुरंत चल दिये। इनके सिवा चौंसठ गणोंके साथ योगिनियोंका मण्डल भी सहसा कुपित हो दक्षयज्ञका विनाश करनेके लिये वहाँसे प्रस्थित हुआ। इस प्रकार कोटि-कोटि गण एवं विभिन्न प्रकारके गणाधीश वीरभद्रके साथ चले। उस समय भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी। नाना प्रकारके शब्द करनेवाले शंख बज उठे। भिन्न-भिन्न प्रकारकी सींगें बजने लगीं। महामुने! सेनासहित वीरभद्रकी यात्राके समय वहाँ बहुत-से सुखद शकुन होने लगे।
इस प्रकार जब प्रमथगणोंसहित
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वीरभद्रने प्रस्थान किया, तब उधर दक्ष तथा देवताओंको बहुत-से अशुभ लक्षण दिखायी देने लगे। देवर्षे यज्ञ-विध्वंसकी सूचना देनेवाले त्रिविध उत्पात प्रकट होने लगे। दक्षकी बायीं आँख, बायीं भुजा और बायीं जाँघ फड़कने लगी। तात! वाम अंगोंका वह फड़कना सर्वथा अशुभसूचक था और नाना प्रकारके कष्ट मिलनेकी सूचना दे रहा था। उस समय दक्षकी यज्ञशालामें धरती डोलने लगी। दक्षको दोपहरके समय दिनमें ही अद्भुत तारे दीखने लगे। दिशाएँ मलिन हो गयीं। सूर्यमण्डल चितकबरा दीखने लगा। उसपर हजारों घेरे पड़ गये, जिससे वह भयंकर जान पड़ता था। बिजली और अग्निके समान दीप्तिमान् तारे टूट-टूटकर गिरने लगे तथा और भी बहुत-से भयानक अपशकुन होने लगे।
इसी बीचमें वहाँ आकाशवाणी प्रकट हुई जो सम्पूर्ण देवताओं और विशेषतः दक्षको अपनी बात सुनाने लगी।
आकाशवाणी बोली—ओ दक्ष! आज तेरे जन्मको धिक्कार है! तू महामूढ़ और पापात्मा है। भगवान् हरकी ओरसे आज तुझे महान् दुःख प्राप्त होगा, जो किसी तरह टल नहीं सकता। अब यहाँ तेरा हाहाकार भी नहीं सुनायी देगा। जो मूढ़ देवता आदि तेरे यज्ञमें स्थित हैं, उनको भी महान् दुःख होगा—इसमें संशय नहीं है।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! आकाशवाणीकी यह बात सुनकर और पूर्वोक्त अशुभसूचक लक्षणोंको देखकर दक्ष तथा दूसरे देवता आदिको भी अत्यन्त भय प्राप्त हुआ। उस समय दक्ष मन-ही-मन अत्यन्त व्याकुल हो काँपने लगे और अपने प्रभु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। वे भयसे अधीर हो बेसुध हो रहे थे। उन्होंने स्वजनवत्सल देवाधिदेव भगवान् विष्णुको प्रणाम किया और उनकी स्तुति करके कहा।
(अध्याय ३३-३४)
### दक्षके यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे प्रार्थना, भगवान्का शिवद्रोहजनित संकटको टालनेमें अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको समझाना तथा सेनासहित वीरभद्रका आगमन
दक्ष बोले—देवदेव! हरे! विष्णो! दीनबन्धो! कृपानिधे! आपको मेरी और मेरे यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये। प्रभो! आप ही यज्ञके रक्षक हैं, यज्ञ ही आपका कर्म है और आप यज्ञस्वरूप हैं। आपको ऐसी कृपा करनी चाहिये, जिससे यज्ञका विनाश न हो।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुनीश्वर! इस तरह अनेक प्रकारसे सादर प्रार्थना करके दक्ष भगवान् श्रीहरिके चरणोंमें गिर पड़े। उनका चित्त भयसे व्याकुल हो रहा था। तब जिनके मनमें घबराहट आ गयी थी, उन प्रजापति दक्षको उठाकर और उनकी पूर्वोक्त बात सुनकर भगवान् विष्णुने देवाधिदेव शिवका स्मरण किया। अपने प्रभु एवं महान् ऐश्वर्यसे युक्त परमेश्वर शिवका स्मरण करके
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शिवतत्त्वके ज्ञाता श्रीहरि दक्षको समझाते हुए बोले।
श्रीहरिने कहा—दक्ष! मैं तुमसे तत्त्वकी बात बता रहा हूँ। तुम मेरी बात ध्यान देकर सुनो। मेरा यह वचन तुम्हारे लिये सर्वथा हितकर तथा महामन्त्रके समान सुखदायक होगा। दक्ष! तुम्हें तत्त्वका ज्ञान नहीं है। इसलिये तुमने सबके अधिपति परमात्मा शंकरकी अवहेलना की है। ईश्वरकी अवहेलनासे सारा कार्य सर्वथा निष्फल हो जाता है। केवल इतना ही नहीं, पग-पगपर विपत्ति भी आती है। जहाँ अपूज्य पुरुषोंकी पूजा होती है और पूजनीय पुरुषकी पूजा नहीं की जाती, वहाँ दरिद्रता, मृत्यु तथा भय—ये तीन संकट अवश्य प्राप्त होंगे।* इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्नसे तुम्हें भगवान् वृषभध्वजका सम्मान करना चाहिये। महेश्वरका अपमान करनेसे ही तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हुआ है। हम सब लोग प्रभु होते हुए भी आज तुम्हारी दुर्नीतिके कारण जो संकट आया है, उसे टालनेमें समर्थ नहीं हैं। यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दक्ष चिन्तामें डूब गये। उनके चेहरेका रंग उड़ गया और वे चुपचाप पृथ्वीपर खड़े रह गये। इसी समय भगवान् रुद्रके भेजे हुए गणनायक वीरभद्र अपनी सेनाके साथ यज्ञस्थलमें जा पहुँचे। वे सब-के-सब बड़े शूरवीर, निर्भय तथा रुद्रके समान ही पराक्रमी थे। भगवान् शंकरकी आज्ञासे आये हुए उन गणोंकी गणना असम्भव थी। वे वीरशिरोमणि रुद्रसैनिक जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे। उनके उस महानादसे तीनों लोक गूँज उठे। आकाश धूलसे ढक गया और दिशाएँ अन्धकारसे आवृत हो गयीं। सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी अत्यन्त भयसे व्याकुल हो पर्वत, वन और काननोंसहित काँपने लगी तथा सम्पूर्ण समुद्रोंमें ज्वार आ गया। इस प्रकार समस्त लोकोंका विनाश करनेमें समर्थ उस विशाल सेनाको देखकर समस्त देवता आदि चकित हो गये। सेनाके उद्योगको देख दक्षके मुँहसे खून निकल आया। वे अपनी स्त्रीको साथ
* ईश्वरावज्ञया सर्वं कार्यं भवति सर्वथा। विफलं केवलं नैव विपत्तिश्च पदे पदे॥
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते। त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम्॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ३५। ८-९)
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* संक्षिप्त शिवपुराण *
ले भगवान् विष्णुके चरणोंमें दण्डकी भाँति गिर पड़े और इस प्रकार बोले।
दक्षने कहा—विष्णो ! महाप्रभो ! आपके बलसे ही मैंने इस महान् यज्ञका आरम्भ किया है। सत्कर्मकी सिद्धिके लिये आप ही प्रमाण माने गये हैं। विष्णो ! आप कर्मोंके साक्षी तथा यज्ञोंके प्रतिपालक हैं। महाप्रभो ! आप वेदोक्त धर्म तथा ब्रह्माजीके रक्षक हैं। अतः प्रभो ! आपको मेरे इस यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि आप सबके प्रभु हैं।
ब्रह्माजी कहते हैं—दक्षकी अत्यन्त दीनतापूर्ण बात सुनकर भगवान् विष्णु उस समय शिवतत्त्वसे विमुख हुए दक्षको समझानेके लिये इस प्रकार बोले।
श्रीविष्णुने कहा—दक्ष! इसमें संदेह नहीं कि मुझे तुम्हारे यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि धर्म-परिपालनविषयक जो मेरी सत्य प्रतिज्ञा है, वह सर्वत्र विख्यात है। परंतु दक्ष ! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे तुम सुनो। इस समय अपनी क्रूरतापूर्ण बुद्धिको त्याग दो। देवताओंके क्षेत्र नैमिषारण्यमें जो अद्भुत घटना घटित हुई थी, उसका तुम्हें स्मरण नहीं हो रहा है। क्या तुम अपनी कुबुद्धिके कारण उसे भूल गये? यहाँ कौन भगवान् रुद्रके कोपसे तुम्हारी रक्षा करनेमें समर्थ है। दक्ष! तुम्हारी रक्षा किसको अभिमत नहीं है? परंतु जो तुम्हारी रक्षा करनेको उद्यत होता है, वह अपनी दुर्बुद्धिका ही परिचय देता है। दुर्मते! क्या कर्म है और क्या अकर्म, इसे तुम नहीं समझ पा रहे हो। केवल कर्म ही कभी कुछ करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। जिसके सहयोगसे कर्ममें कुछ करनेकी सामर्थ्य आती है, उसीको तुम स्वकर्म समझो। भगवान् शिवके बिना दूसरा कोई कर्ममें कल्याण करनेकी शक्ति देनेवाला नहीं है। जो शान्त हो ईश्वरमें मन लगाकर उनकी भक्तिपूर्वक कार्य करता है, उसीको भगवान् शिव तत्काल उस कर्मका फल देते हैं। जो मनुष्य केवल ज्ञानका सहारा ले अनीश्वरवादी हो जाते या ईश्वरको नहीं मानते हैं, वे शतकोटि कल्पोंतक नरकमें ही पड़े रहते हैं।* फिर वे कर्मपाशमें बँधे हुए जीव प्रत्येक जन्ममें नरकोंकी यातना भोगते हैं; क्योंकि वे केवल सकाम कर्मके ही स्वरूपका आश्रय लेनेवाले होते हैं।
ये शत्रुमर्दन वीरभद्र, जो यज्ञशालाके आँगनमें आ पहुँचे हैं, भगवान् रुद्रकी क्रोधाग्निसे प्रकट हुए हैं। इस समय समस्त रुद्रगणोंके नायक ये ही हैं। ये हमलोगोंके विनाशके लिये आये हैं, इसमें संशय नहीं है। कोई भी कार्य क्यों न हो; वस्तुतः इनके लिये कुछ भी अशक्य है ही नहीं। ये महान् सामर्थ्यशाली वीरभद्र सब देवताओंको अवश्य जलाकर ही शान्त होंगे—इसमें संशय नहीं जान पड़ता। मैं भ्रमसे महादेवजी-की शपथका उल्लंघन करके जो यहाँ ठहरा रहा, उसके कारण तुम्हारे साथ मुझे भी इस कष्टका सामना करना ही पड़ेगा।
भगवान् विष्णु इस प्रकार कह ही रहे थे कि वीरभद्रके साथ शिवगणोंकी सेनाका समुद्र उमड़ आया। समस्त देवता आदिने उसे देखा।
(अध्याय ३५)
* केवलं ज्ञानमाश्रित्य निरीश्वरपरा नराः। निरयं ते च गच्छन्ति कल्पकोटिशतानि च॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ३५। ३१)
- रुद्रसंहिता * २२५
देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिको रुद्रदेवकी अजेयता बताना, वीरभद्रका देवताओंको युद्धके लिये ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्रकी बातचीत तथा विष्णु आदिका अपने लोकमें जाना एवं दक्ष और यज्ञका विनाश करके वीरभद्रका कैलासको लौटना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! उस समय देवताओंके साथ शिवगणोंका घोर युद्ध आरम्भ हो गया। उसमें सारे देवता पराजित हुए और भागने लगे। वे एक-दूसरेका साथ छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये। उस समय केवल महाबली इन्द्र आदि लोकपाल ही उस दारुण संग्राममें धैर्य धारण करके उत्सुकतापूर्वक खड़े रहे। तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवता मिलकर उस समरांगणमें बृहस्पतिजीको विनीतभावसे नमस्कार करके पूछने लगे।
लोकपाल बोले—गुरुदेव बृहस्पते! तात! महाप्राज्ञ! दयानिधे! शीघ्र बताइये, हम जानना चाहते हैं कि हमारी विजय कैसे होगी?
उनकी यह बात सुनकर बृहस्पतिने प्रयत्नपूर्वक भगवान् शम्भुका स्मरण किया और ज्ञानदुर्बल महेन्द्रसे कहा।
बृहस्पति बोले—इन्द्र! भगवान् विष्णुने पहले जो कुछ कहा था, वह सब इस समय घटित हो गया। मैं उसीको स्पष्ट कर रहा हूँ। सावधान होकर सुनो। समस्त कर्मोंका फल देनेवाला जो कोई ईश्वर है, वह कर्ताका ही आश्रय लेता है—कर्म करनेवालेको ही उस कर्मका फल देता है। जो कर्म करता ही नहीं, उसको फल देनेमें वह भी समर्थ नहीं है (अतः जो ईश्वरको जानकर उसका आश्रय लेकर सत्कर्म करता है, उसीको उस कर्मका फल मिलता है, ईश्वरद्रोहीको नहीं)। न मन्त्र, न ओषधियाँ, न समस्त आभिचारिक कर्म, न लौकिक पुरुष, न कर्म, न वेद, न पूर्व और उत्तरमीमांसा तथा न नाना वेदोंसे युक्त अन्यान्य शास्त्र ही ईश्वरको जाननेमें समर्थ होते हैं—ऐसा प्राचीन विद्वानोंका कथन है। अनन्यशरण भक्तोंको छोड़कर दूसरे लोग सम्पूर्ण वेदोंका दस हजार बार स्वाध्याय करके भी महेश्वरको भलीभाँति नहीं जान सकते—यह महाश्रुतिका कथन है। अवश्य भगवान् शिवके अनुग्रहसे ही सर्वथा शान्त, निर्विकार एवं उत्तम दृष्टिसे सदाशिवके तत्त्वका साक्षात्कार (ज्ञान) हो सकता है। सुरेश्वर! क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य, इसका विवेचन करना अभीष्ट होनेपर मैं जो इसमें सिद्धिका उत्तम अंश है, उसीका प्रतिपादन करूँगा। तुम अपने हितके लिये उसे ध्यान देकर सुनो। इन्द्र! तुम लोकपालोंके साथ आज नादान बनकर दक्ष-यज्ञमें आ गये। बताओ तो, यहाँ क्या पराक्रम करोगे? भगवान् रुद्र जिनके सहायक हैं, ऐसे ये परम क्रोधी रुद्रगण इस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हैं और अपना काम पूरा करेंगे—इसमें संशय नहीं है। मैं सत्य-सत्य कहता हूँ कि इस यज्ञके विघ्नका निवारण करनेके लिये वस्तुतः तुममेंसे किसीके पास भी सर्वथा कोई उपाय नहीं है।
बृहस्पतिकी यह बात सुनकर वे इन्द्र-
789 संक्षिप्त शिवपुराण—8 A
२२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सहित समस्त लोकपाल बड़ी चिन्तामें पड़ गये। तब महावीर रुद्रगणोंसे घिरे हुए वीरभद्रने मन-ही-मन भगवान् शंकरका स्मरण करके इन्द्र आदि लोकपालोंको डाँटा और इसके पश्चात् रुद्रगणोंके नायक वीरभद्रने रोषसे भरकर तुरंत ही सम्पूर्ण देवताओंको तीखे बाणोंसे घायल कर दिया। उन बाणोंकी चोट खाकर इन्द्र आदि समस्त सुरेश्वर भागते हुए दसों दिशाओंमें चले गये। जब लोकपाल चले गये और देवता भाग खड़े हुए तब वीरभद्र अपने गणोंके साथ यज्ञशालाके समीप गये। उस समय वहाँ विद्यमान समस्त ऋषि अत्यन्त भयभीत हो परमेश्वर श्रीहरिसे रक्षाकी प्रार्थना करनेके लिये सहसा नतमस्तक हो शीघ्र बोले—'देवदेव! रमानाथ! सर्वेश्वर! महाप्रभो! आप दक्षके यज्ञकी रक्षा कीजिये। आप ही यज्ञ हैं, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ आपका कर्म, रूप और अंग है। आप यज्ञके रक्षक हैं। अतः दक्ष-यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपके सिवा दूसरा कोई इसका रक्षक नहीं है।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऋषियोंका यह वचन सुनकर मेरे सहित भगवान् विष्णु वीरभद्रके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे चले। श्रीहरिको युद्धके लिये उद्यत देख शत्रुमर्दन वीरभद्र, जो वीर प्रमथगणोंसे घिरे हुए थे, कड़े शब्दोंमें भगवान् विष्णुको डाँटने लगे।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! वीरभद्रकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् देवेश्वर विष्णु वहाँ प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए बोले।
श्रीविष्णुने कहा—वीरभद्र! आज तुम्हारे सामने मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो—मैं भगवान् शंकरका सेवक हूँ, तुम मुझे रुद्रदेवसे विमुख न कहो। दक्ष अज्ञानी है। कर्मकाण्डमें ही इसकी निष्ठा है। इसने मूढ़तावश पहले मुझसे बारंबार अपने यज्ञमें चलनेके लिये प्रार्थना की थी। मैं भक्तके अधीन ठहरा, इसलिये चला आया। भगवान् महेश्वर भी भक्तके अधीन रहते हैं। तात! दक्ष मेरा भक्त है। इसीलिये मुझे यहाँ आना पड़ा है। रुद्रके क्रोधसे उत्पन्न हुए वीर! तुम रुद्र-तेजःस्वरूप हो, उत्तम प्रतापके आश्रय हो, मेरी प्रतिज्ञा सुनो। मैं तुम्हें आगे बढ़नेसे रोकता हूँ और तुम मुझे रोको। परिणाम वही होगा, जो होनेवाला होगा। मैं पराक्रम करूँगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर महाबाहु वीरभद्र हँसकर बोला—'आप मेरे प्रभुके प्रिय भक्त हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है।' इतना कहकर गणनायक वीरभद्र हँस पड़ा और विनयसे नतमस्तक हो बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीविष्णुदेवसे कहने लगा।
वीरभद्रने कहा—महाप्रभो! मैंने आपके भावकी परीक्षाके लिये कड़ी बातें कही थीं। इस समय यथार्थ बात कहता हूँ, सावधान होकर सुनो। हरे! जैसे शिव हैं, वैसे आप हैं। जैसे आप हैं, वैसे शिव हैं। ऐसा वेद कहते हैं और वेदोंका यह कथन शिवकी आज्ञाके अनुसार ही है।* रमानाथ! भगवान् शिवकी आज्ञासे हम
* यथा शिवस्तथा त्वं हि यथा त्वं च तथा शिवः। इति वेदा वर्णयन्ति शिवशासनतो हरे॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ३६। ६६)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—8 B
* रुद्रसंहिता * २२७
सब लोग उनके सेवक ही हैं; तथापि मैंने जो बात कही है, वह इस वाद-विवादके अवसरके अनुरूप ही है। आप मेरी हर बातको आपके प्रति आदरके भावसे ही कही गयी समझिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—वीरभद्रका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीहरि हँस पड़े और उसके लिये हितकर वचन बोले।
श्रीविष्णुने कहा—महावीर! तुम मेरे साथ निःशंक होकर युद्ध करो। तुम्हारे अस्त्रोंसे शरीरके भर जानेपर ही मैं अपने आश्रमको जाऊँगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—ऐसा कहकर भगवान् विष्णु चुप हो गये और युद्धके लिये कमर कसकर डट गये। महाबली वीरभद्र भी अपने गणोंके साथ युद्धके लिये तैयार हो गये।
नारद! तदनन्तर भगवान् विष्णु और वीरभद्रमें घोर युद्ध हुआ। अन्तमें वीरभद्रने भगवान् विष्णुके चक्रको स्तम्भित कर दिया तथा शार्ङ्गधनुषके तीन टुकड़े कर डाले। तब मेरे द्वारा एवं सरस्वतीद्वारा बोधित हुए श्रीविष्णुने उस महान् गणनायक वीरभद्रको असह्य तेजसे सम्पन्न जानकर वहाँसे अन्तर्धान होनेका विचार किया। दूसरे देवता भी यह जान गये कि सतीके प्रति जो अन्याय हुआ है, उसीका यह सब भावी परिणाम है। दूसरोंके लिये इस संकटका सामना करना अत्यन्त कठिन है। यह जानकर वे सब देवता अपने सेवकोंके साथ स्वतन्त्र सर्वेश्वर शिवका स्मरण करके अपने-अपने लोकको चले गये। मैं भी पुत्रके दुःखसे पीड़ित हो सत्यलोकमें चला आया और अत्यन्त दुःखसे आतुर हो सोचने लगा कि अब मुझे क्या करना चाहिये। मेरे तथा श्रीविष्णुके चले जानेपर मुनियोंसहित समस्त यज्ञके आधार रहनेवाले देवता शिवगणोंद्वारा पराजित हो भाग गये। उस उपद्रवको देखकर और उस महामखका विध्वंस निकट जानकर वह यज्ञ भी अत्यन्त भयभीत हो मृगका रूप धारण करके वहाँसे भागा। मृगके रूपमें आकाशकी ओर भागते देख वीरभद्रने उसे पकड़ लिया और उसका मस्तक काट डाला। फिर उन्होंने मुनियों तथा देवताओंके अंग-भंग कर दिये और बहुतोंको मार डाला।
प्रतापी मणिभद्रने भृगुको उठाकर पटक दिया और उनकी छातीको पैरसे दबाकर तत्काल उनकी दाढ़ी-मूँछ नोच ली। चण्डने बड़े वेगसे पूषाके दाँत उखाड़ लिये; क्योंकि पूर्वकालमें जिस समय महादेवजीको दक्षके द्वारा गालियाँ दी जा रही थीं, उस समय वे दाँत दिखा-दिखाकर हँसे थे। नन्दीने भगको रोषपूर्वक पृथ्वीपर दे मारा और उनकी दोनों आँखें निकाल लीं; क्योंकि जब दक्ष शिवजीको शाप दे रहे थे, उस समय वे आँखोंके संकेतसे अपना अनुमोदन सूचित कर रहे थे। वहाँ रुद्रगणनायकोंने स्वधा, स्वाहा और दक्षिणा देवियोंकी बड़ी विडम्बना (दुर्दशा) की। वहाँ जो मन्त्र-तन्त्र तथा दूसरे लोग थे, उनका भी बहुत तिरस्कार किया। ब्रह्मपुत्र दक्ष भयके मारे अन्तर्वेदीके भीतर छिप गये। वीरभद्र उनका पता लगाकर उन्हें बलपूर्वक पकड़ लाये। फिर उनके दोनों गाल पकड़कर उन्होंने उनके मस्तकपर तलवारसे आघात किया। परंतु योगके प्रभावसे दक्षका सिर अभेद्य हो गया था, इसलिये कट नहीं सका। जब वीरभद्रको
789 संक्षिप्त शिवपुराण—8 C
२२८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ज्ञात हुआ कि सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंसे इनके मस्तकका भेदन नहीं हो सकता, तब उन्होंने दक्षकी छातीपर पैर रखकर दबाया और दोनों हाथोंसे गर्दन मरोड़कर तोड़ डाली। फिर शिवद्रोही दुष्ट दक्षके उस सिरको गणनायक वीरभद्रने अग्निकुण्डमें डाल दिया। तदनन्तर जैसे सूर्य घोर अन्धकारराशिका नाश करके उदयाचलपर आरूढ़ होते हैं, उसी प्रकार वीरभद्र दक्ष और उनके यज्ञका विध्वंस करके कृतकार्य हो तुरंत ही वहाँसे उत्तम कैलास पर्वतको चले गये। वीरभद्रको काम पूरा करके आया देख परमेश्वर शिव मन-ही-मन बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उन्हें वीर प्रमथ-गणोंका अध्यक्ष बना दिया।
(अध्याय ३६-३७)
श्रीविष्णुकी पराजयमें दधीचि मुनिके शापको कारण बताते हुए दधीचि और क्षुवके विवादका इतिहास, मृत्युंजय-मन्त्रके अनुष्ठानसे दधीचिकी अवध्यता तथा श्रीहरिका क्षुवको दधीचिकी पराजयके लिये यत्न करनेका आश्वासन
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! अमित बुद्धिमान् ब्रह्माजीकी कही हुई यह कथा सुनकर द्विजश्रेष्ठ नारद विस्मयमें पड़ गये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक प्रश्न किया।
नारदजीने पूछा—पिताजी! भगवान् विष्णु शिवजीको छोड़कर अन्य देवताओंके साथ दक्षके यज्ञमें क्यों चले गये, जिसके कारण वहाँ उनका तिरस्कार हुआ? क्या वे प्रलयकारी पराक्रमवाले भगवान् शंकरको नहीं जानते थे? फिर उन्होंने अज्ञानी पुरुषकी भाँति रुद्रगणोंके साथ युद्ध क्यों किया? करुणानिधे! मेरे मनमें यह बहुत बड़ा संदेह है। आप कृपा करके मेरे इस संशयको नष्ट कर दीजिये और प्रभो! मनमें उत्साह पैदा करनेवाले शिवचरितको कहिये।
ब्रह्माजीने कहा—नारद! पूर्वकालमें राजा क्षुवकी सहायता करनेवाले श्रीहरिको दधीचि मुनिने शाप दे दिया था, जिससे उस समय वे इस बातको भूल गये और वे दूसरे देवताओंको साथ ले दक्षके यज्ञमें चले गये। दधीचिने क्यों शाप दिया, यह सुनो। प्राचीनकालमें क्षुव नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी राजा हो गये हैं। वे महाप्रभावशाली मुनीश्वर दधीचिके मित्र थे। दीर्घकालकी तपस्याके प्रसंगसे क्षुव और दधीचिमें विवाद आरम्भ हो गया, जो तीनों लोकोंमें महान् अनर्थकारीके रूपमें विख्यात हुआ। उस विवादमें वेदके विद्वान् शिवभक्त दधीचि कहते थे कि शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय—इन तीनों वर्णोंसे ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है, इसमें संशय नहीं है। महामुनि दधीचिकी वह बात सुनकर धन-वैभवके मदसे मोहित हुए राजा क्षुवने उसका इस प्रकार प्रतिवाद किया।
क्षुव बोले—राजा इन्द्र आदि आठ लोकपालोंके स्वरूपको धारण करता है। वह समस्त वर्णों और आश्रमोंका पालक
789 संक्षिप्त शिवपुराण—8 D
- रुद्रसंहिता * २२९
एवं प्रभु है। इसलिये राजा ही सबसे श्रेष्ठ है। राजाकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी कहती है कि राजा सर्वदेवमय है। मुने! इस श्रुतिके कथनानुसार जो सबसे बड़ा देवता है, वह मैं ही हूँ। इस विवेचनसे ब्राह्मणकी अपेक्षा राजा ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है। च्यवननन्दन! आप इस विषयमें विचार करें और मेरा अनादर न करें; क्योंकि मैं सर्वथा आपके लिये पूजनीय हूँ।
राजा क्षुवका यह मत श्रुतियों और स्मृतियोंके विरुद्ध था। इसे सुनकर भृगुकुलभूषण मुनिश्रेष्ठ दधीचिको बड़ा क्रोध हुआ। मुने! अपने गौरवका विचार करके कुपित हुए महातेजस्वी दधीचिने क्षुवके मस्तकपर बायें मुक्केसे प्रहार किया। उनके मुक्केकी मार खाकर ब्रह्माण्डके अधिपति कुत्सित बुद्धिवाले क्षुव अत्यन्त कुपित हो गरज उठे और उन्होंने वज्रसे दधीचिको काट डाला। उस वज्रसे आहत हो भृगुवंशी दधीचि पृथ्वीपर गिर पड़े। भार्गववंशधर दधीचिने गिरते समय शुक्राचार्यका स्मरण किया। योगी शुक्राचार्यने आकर दधीचिके शरीरको, जिसे क्षुवने काट डाला था, तुरंत जोड़ दिया। दधीचिके अंगोंको पूर्ववत् जोड़कर शिवभक्तशिरोमणि तथा मृत्युंजय-विद्याके प्रवर्तक शुक्राचार्यने उनसे कहा।
शुक्र बोले—तात दधीचि! मैं सर्वेश्वर भगवान् शिवका पूजन करके तुम्हें श्रुतिप्रतिपादित महामृत्युंजय नामक श्रेष्ठ मन्त्रका उपदेश देता हूँ।
‘त्र्यम्बकं यजामहे’—हम भगवान् त्र्यम्बकका यजन (आराधन) करते हैं। त्र्यम्बकका अर्थ है—तीनों लोकोंके पिता प्रभावशाली शिव। वे भगवान् सूर्य, सोम और अग्नि—तीनों मण्डलोंके पिता हैं। सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंके महेश्वर हैं। आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व—इन तीन तत्त्वोंके; आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—इन तीनों अग्नियोंके; सर्वत्र उपलब्ध होनेवाले पृथ्वी, जल एवं तेज—इन तीन मूर्त भूतोंके (अथवा सात्त्विक आदि भेदसे त्रिविध भूतोंके), त्रिदिव (स्वर्ग)-के, त्रिभुजके, त्रिधाभूत सबके ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवताओंके महान् ईश्वर महादेवजी ही हैं। (यहाँतक मन्त्रके प्रथम चरणकी व्याख्या हुई।) मन्त्रका द्वितीय चरण है—'सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्'—जैसे फूलोंमें उत्तम गन्ध होती है, उसी प्रकार वे भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंमें, तीनों गुणोंमें, समस्त कृत्योंमें, इन्द्रियोंमें, अन्यान्य देवोंमें और गणोंमें उनके प्रकाशक सारभूत आत्माके रूपमें व्याप्त हैं, अतएव सुगन्धयुक्त एवं सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर हैं। (यहाँतक 'सुगन्धिम्' पदकी व्याख्या हुई। अब 'पुष्टिवर्धनम्' की व्याख्या करते हैं—) उत्तम व्रतका पालन करनेवाले द्विजश्रेष्ठ! महामुने नारद! उन अन्तर्यामी पुरुष शिवसे प्रकृतिका पोषण होता है—महत्तत्त्वसे लेकर विशेष-पर्यन्त सम्पूर्ण विकल्पोंकी पुष्टि होती है तथा मुझ ब्रह्माका, विष्णुका, मुनियोंका और इन्द्रियोंसहित देवताओंका भी पोषण होता है, इसलिये वे ही 'पुष्टिवर्धन' हैं। (अब मन्त्रके तीसरे और चौथे चरणकी व्याख्या करते हैं।) उन दोनों चरणोंका स्वरूप यों है—उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो-र्मुक्षीयमामृतात्—अर्थात् 'प्रभो! जैसे खरबूजा पक जानेपर लताबन्धनसे छूट जाता है, उसी तरह मैं मृत्युरूप बन्धनसे मुक्त हो
२३० * संक्षिप्त शिवपुराण *
जाऊँ, अमृतपद (मोक्ष)-से पृथक् न होऊँ।' वे रुद्रदेव अमृतस्वरूप हैं; जो पुण्यकर्मसे, तपस्यासे, स्वाध्यायसे, योगसे अथवा ध्यानसे उनकी आराधना करता है, उसे नूतन जीवन प्राप्त होता है। इस सत्यके प्रभावसे भगवान् शिव स्वयं ही अपने भक्तको मृत्युके सूक्ष्म बन्धनसे मुक्त कर देते हैं; क्योंकि वे भगवान् ही बन्धन और मोक्ष देनेवाले हैं—ठीक उसी तरह, जैसे 'उर्वारुक अर्थात् ककड़ीका पौधा अपने फलको स्वयं ही लताके बन्धनमें बाँधे रखता है और पक जानेपर स्वयं ही उसे बन्धनसे मुक्त कर देता है।'
यह मृतसंजीवनी मन्त्र है, जो मेरे मतसे सर्वोत्तम है। तुम प्रेमपूर्वक नियमसे भगवान् शिवका स्मरण करते हुए इस मन्त्रका जप करो। जप और हवनके पश्चात् इसीसे अभिमन्त्रित किये हुए जलको दिन और रातमें पीओ तथा शिव-विग्रहके समीप बैठकर उन्हींका ध्यान करते रहो। इससे कहीं भी मृत्युका भय नहीं रहता। न्यास आदि सब कार्य करके विधिवत् भगवान् शिवकी पूजा करो। यह सब करके शान्तभावसे बैठकर भक्तवत्सल शंकरका ध्यान करना चाहिये। मैं भगवान् शिवका ध्यान बता रहा हूँ, जिसके अनुसार उनका चिन्तन करके मन्त्र-जप करना चाहिये। इस तरह निरन्तर जप करनेसे बुद्धिमान् पुरुष भगवान् शिवके प्रभावसे उस मन्त्रको सिद्ध कर लेता है।
मृत्युंजयका ध्यान
हस्ताम्भोजयुगस्थकुम्भयुगलादुद्धृत्य तोयं शिरः
सिञ्चन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वाङ्के सकुम्भौ करौ।
अक्षस्रङ्मृगहस्तमम्बुजगतं मूर्धस्थचन्द्रस्रवत्
पीयूषार्द्रतनुं भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युञ्जयम्॥
जो अपने दो करकमलोंमें रखे हुए दो कलशोंसे जल निकालकर उनसे ऊपरवाले दो हाथोंद्वारा अपने मस्तकको सींचते हैं। अन्य दो हाथोंमें दो घड़े लिये उन्हें अपनी गोदमें रखे हुए हैं तथा शेष दो हाथोंमें रुद्राक्ष एवं मृगमुद्रा धारण करते हैं, कमलके आसनपर बैठे हैं, सिरपर स्थित चन्द्रमासे निरन्तर झरते हुए अमृतसे जिनका सारा शरीर भींगा हुआ है तथा जो तीन नेत्र धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् मृत्युंजयका, जिनके साथ गिरिराजनन्दिनी उमा भी विराजमान हैं, मैं भजन (चिन्तन) करता हूँ।
ब्रह्माजी कहते हैं—तात! मुनिश्रेष्ठ दधीचिको इस प्रकार उपदेश देकर शुक्राचार्य भगवान् शंकरका स्मरण करते हुए अपने स्थानको लौट गये। उनकी वह बात सुनकर महामुनि दधीचि बड़े प्रेमसे शिवजीका स्मरण करते हुए तपस्याके लिये वनमें गये। वहाँ जाकर उन्होंने विधि-पूर्वक महामृत्युंजय-मन्त्रका जप और प्रेम-पूर्वक भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए तपस्या प्रारम्भ की। दीर्घकालतक उस मन्त्रका जप और तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करके दधीचिने महामृत्युंजय शिवको संतुष्ट किया। महामुने! उस जपसे प्रसन्नचित्त हुए भक्तवत्सल भगवान् शिव दधीचिके प्रेमवश उनके सामने प्रकट हो गये। अपने प्रभु शम्भुका साक्षात् दर्शन करके मुनीश्वर दधीचिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने विधिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे शंकरका स्तवन किया। तात! मुने! तदनन्तर मुनिके प्रेमसे प्रसन्न हुए शिवने च्यवनकुमार दधीचिसे कहा—"तुम
* रुद्रसंहिता * २३१
वर माँगो।' भगवान् शिवका यह वचन सुनकर भक्तशिरोमणि दधीचि दोनों हाथ जोड़ नतमस्तक हो भक्तवत्सल शंकरसे बोले।
दधीचिने कहा—देवदेव महादेव! मुझे तीन वर दीजिये। मेरी हड्डी वज्र हो जाय। कोई भी मेरा वध न कर सके और मैं सर्वत्र अदीन रहूँ—कभी मुझमें दीनता न आये।
दधीचिका यह वचन सुनकर प्रसन्न हुए परमेश्वर शिवने 'तथास्तु' कहकर उन्हें वे तीनों वर दे दिये। शिवजीसे तीन वर पाकर वेदमार्गमें प्रतिष्ठित महामुनि दधीचि आनन्दमग्न हो गये और शीघ्र ही राजा क्षुवके स्थानमें गये। महादेवजीसे अवध्यता, वज्रमय अस्थि और अदीनता पाकर दधीचिने राजेन्द्र क्षुवके मस्तकपर लात मारी। फिर तो राजा क्षुवने भी क्रोध करके दधीचिपर वज्रसे प्रहार किया। वे भगवान् विष्णुके गौरवसे अधिक गर्वमें भरे हुए थे। परंतु क्षुवका चलाया हुआ वह वज्र परमेश्वर शिवके प्रभावसे महात्मा दधीचिका नाश न कर सका। इससे ब्रह्मकुमार क्षुवको बड़ा विस्मय हुआ। मुनीश्वर दधीचिकी अवध्यता, अदीनता तथा वज्रसे भी बढ़-चढ़कर प्रभाव देखकर ब्रह्मकुमार क्षुवके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने शीघ्र ही वनमें जाकर इन्द्रके छोटे भाई मुकुन्द-की आराधना आरम्भ की। वे शरणागतपालक नरेश मृत्युंजयसेवक दधीचिसे पराजित हो गये थे। क्षुवकी पूजासे गरुड़ध्वज भगवान् मधुसूदन बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने राजाको दिव्य दृष्टि प्रदान की। उस दिव्य दृष्टिसे ही जनार्दनदेवका दर्शन करके उन गरुडध्वजको क्षुवने प्रणाम किया और प्रिय वचनोंद्वारा उनकी स्तुति की। इस प्रकार देवेश्वर आदिसे प्रशंसित उन अजेय ईश्वर श्रीनारायणदेवका पूजन और स्तवन करके राजाने भक्तिभावसे उनकी ओर देखा तथा उन जनार्दनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करनेके पश्चात् उन्हें अपना अभिप्राय सूचित किया।
राजा बोले—भगवन्! दधीचि नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण हैं, जो धर्मके ज्ञाता हैं। उनके हृदयमें विनयका भाव है। वे पहले मेरे मित्र थे। इन दिनों रोग-शोकसे रहित मृत्युंजय महादेवजीकी आराधना करके वे उन्हीं कल्याणकारी शिवके प्रभावसे समस्त अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा सदाके लिये अवध्य हो गये हैं। एक दिन उन महातपस्वी दधीचने भरी सभामें आकर अपने बायें पैरसे मेरे मस्तकपर बड़े वेगसे अवहेलनापूर्वक प्रहार किया और बड़े गर्वसे कहा—'मैं किसीसे नहीं डरता।' हरे! वे मृत्युंजयसे उत्तम वर पाकर अनुपम गर्वसे भर गये हैं।
२३२ | * संक्षिप्त शिवपुराण *
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! महात्मा दधीचिकी अवध्यताका समाचार जानकर श्रीहरिने महादेवजीके अतुलित प्रभावका स्मरण किया। फिर वे ब्रह्मपुत्र राजा क्षुवसे बोले—'राजेन्द्र! ब्राह्मणोंको कहीं थोड़ा-सा भी भय नहीं है। भूपते! विशेषतः रुद्रभक्तोंके लिये तो भय नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। यदि मैं तुम्हारी ओरसे कुछ करूँ तो ब्राह्मण दधीचिको दुःख होगा और वह मुझ-जैसे देवताके लिये भी शापका कारण बन जायगा। राजेन्द्र! दधीचिके शापसे दक्षके यज्ञमें सुरेश्वर शिवसे मेरी पराजय होगी और फिर मेरा उत्थान भी होगा। महाराज! इसलिये मैं तुम्हारे साथ रहकर कुछ करना नहीं चाहता, मैं अकेला ही तुम्हारे लिये दधीचिको जीतनेका प्रयत्न करूँगा।'
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर क्षुव बोले—'बहुत अच्छा, ऐसा ही हो।' ऐसा कहकर वे उस कार्यके लिये मन-ही-मन उत्सुक हो प्रसन्नतापूर्वक वहीं ठहर गये।
(अध्याय ३८)
श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दधीचिका उनके लिये शाप और क्षुवपर अनुग्रह
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भक्तवत्सल भगवान् विष्णु राजा क्षुवका हित-साधन करनेके लिये ब्राह्मणका रूप धारणकर दधीचिके आश्रमपर गये। वहाँ उन जगद्गुरु श्रीहरिने शिवभक्तशिरोमणि ब्रह्मर्षि दधीचिको प्रणाम करके क्षुवके कार्यकी सिद्धिके लिये उद्यत हो उनसे यह बात कही।
श्रीविष्णु बोले—भगवान् शिवकी आराधनामें तत्पर रहनेवाले अविनाशी ब्रह्मर्षि दधीचि! मैं तुमसे एक वर माँगता हूँ। उसे तुम मुझे दे दो।
क्षुवके कार्यकी सिद्धि चाहनेवाले देवाधिदेव श्रीहरिके इस प्रकार याचना करनेपर शैवशिरोमणि दधीचिने शीघ्र ही भगवान् विष्णुसे इस प्रकार कहा।
दधीचि बोले—ब्रह्मन्! आप क्या चाहते हैं, यह मुझे ज्ञात हो गया। आप क्षुवका काम बनानेके लिये साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही ब्राह्मणका रूप धारण करके यहाँ आये हैं। इसमें संदेह नहीं कि आप पूरे मायावी हैं। किंतु देवेश! जनार्दन! मुझे भगवान् रुद्रकी कृपासे भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंका ज्ञान सदा ही बना रहता है। सुव्रत! मैं आपको जानता हूँ। आप पापहारी श्रीहरि एवं विष्णु हैं। यह ब्राह्मणका वेश छोड़िये। दुष्टबुद्धिवाले राजा क्षुवने आपकी आराधना की है। (इसीलिये आप पधारे हैं) भगवन्! हरे! आपकी भक्तवत्सलताको भी मैं जानता हूँ। यह छल छोड़िये। अपने रूपको ग्रहण कीजिये और भगवान् शंकरके स्मरणमें मन लगाइये। मैं भगवान् शंकरकी आराधनामें लगा रहता हूँ। ऐसी दशामें भी यदि मुझसे किसीको भय हो तो आप उसे यत्नपूर्वक सत्यकी शपथके साथ कहिये। मेरा मन शिवके स्मरणमें ही लगा रहता है। मैं कभी झूठ नहीं बोलता। इस
* रुद्रसंहिता * २३३
संसारमें किसी देवता या दैत्यसे भी मुझे भय नहीं होता।
श्रीविष्णु बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दधीचि! तुम्हारा भय सर्वथा नष्ट ही है; क्योंकि तुम शिवकी आराधनामें तत्पर रहते हो। इसीलिये सर्वज्ञ हो। परंतु मेरे कहनेसे तुम एक बार अपने प्रतिद्वन्द्वी राजा क्षुवसे जाकर कह दो कि 'राजेन्द्र! मैं तुमसे डरता हूँ।'
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर भी शैवशिरोमणि महामुनि दधीचि निर्भय ही रहे और हँसकर बोले।
दधीचिने कहा—मैं देवाधिदेव पिनाकपाणि भगवान् शम्भुके प्रसादसे कहीं, कभी किसीसे और किंचिन्मात्र भी नहीं डरता—सदा ही निर्भय रहता हूँ।
इसपर श्रीहरिने मुनिको दबानेकी चेष्टा की। देवताओंने भी उनका साथ दिया; किंतु सबके सभी अस्त्र कुण्ठित हो गये। तदनन्तर भगवान् श्रीविष्णुने अगणित गणोंकी सृष्टि की। परंतु महर्षिने उनको भी भस्म कर दिया। तब भगवान्ने अपनी अनन्त विष्णुमूर्ति प्रकट की। यह सब देखकर च्यवनकुमारने वहाँ जगदीश्वर भगवान् विष्णुसे कहा।
दधीचि बोले—महाबाहो! मायाको त्याग दीजिये। विचार करनेसे यह प्रतिभासमात्र प्रतीत होती है। माधव! मैंने सहस्रों दुर्विज्ञेय वस्तुओंको जान लिया है। आप मुझमें अपने सहित सम्पूर्ण जगत्को देखिये। निरालस्य होकर मुझमें ब्रह्मा एवं रुद्रका भी दर्शन कीजिये। मैं आपको दिव्य दृष्टि देता हूँ।
ऐसा कहकर भगवान् शिवके तेजसे पूर्ण शरीरवाले च्यवनकुमार दधीचि मुनिने अपनी देहमें समस्त ब्रह्माण्डका दर्शन कराया। तब भगवान् विष्णुने उनपर पुनः कोप करना चाहा। इतनेमें ही मेरे साथ राजा क्षुव वहाँ आ पहुँचे। मैंने निश्चेष्ट खड़े हुए भगवान् पद्मनाभको तथा देवताओंको क्रोध करनेसे रोका। मेरी बात सुनकर इन लोगोंने ब्राह्मण दधीचिको परास्त नहीं किया। श्रीहरि उनके पास गये और उन्होंने मुनिको प्रणाम किया। तदनन्तर क्षुव अत्यन्त दीन हो उन मुनीश्वर दधीचिके निकट गये और उन्हें प्रणाम करके प्रार्थना करने लगे।
क्षुव बोले—मुनिश्रेष्ठ! शिवभक्त-शिरोमणे! मुझपर प्रसन्न होइये। परमेश्वर! आप दुर्जनोंकी दृष्टिसे दूर रहनेवाले हैं। मुझपर कृपा कीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! राजा क्षुवकी यह बात सुनकर तपस्याकी निधि ब्राह्मण दधीचिने उनपर अनुग्रह किया। तत्पश्चात् श्रीविष्णु आदिको देखकर वे मुनि क्रोधसे व्याकुल हो गये और मन-ही-मन शिवका स्मरण करके विष्णु तथा देवताओंको शाप देने लगे।
दधीचिने कहा—देवराज इन्द्रसहित देवताओ और मुनीश्वरो! तुमलोग रुद्रकी क्रोधाग्निसे श्रीविष्णु तथा अपने गणोंसहित पराजित और ध्वस्त हो जाओ।
देवताओंको इस तरह शाप दे क्षुवकी ओर देखकर देवताओं और राजाओंके पूजनीय द्विजश्रेष्ठ दधीचिने कहा—'राजेन्द्र! ब्राह्मण ही बली और प्रभावशाली होते हैं।' ऐसा स्पष्टरूपसे कहकर ब्राह्मण दधीचि अपने आश्रममें प्रविष्ट हो गये। फिर दधीचिको नमस्कारमात्र करके क्षुव अपने
२३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
घर चले गये। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु देवताओंके साथ जैसे आये थे, उसी तरह अपने वैकुण्ठलोकको लौट गये। इस प्रकार वह स्थान स्थानेश्वर नामक तीर्थके रूपमें प्रसिद्ध हो गया। स्थानेश्वरकी यात्रा करके मनुष्य शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। तात! मैंने तुम्हें संक्षेपसे क्षुव और दधीचिके विवादकी कथा सुनायी और भगवान् शंकरको छोड़कर केवल ब्रह्मा और विष्णुको ही जो शाप प्राप्त हुआ, उसका भी वर्णन किया। जो क्षुव और दधीचिके विवादसम्बन्धी इस प्रसंगका नित्य पाठ करता है, वह अपमृत्युको जीतकर देहत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जाता है। जो इसका पाठ करके रणभूमिमें प्रवेश करता है, उसे कभी मृत्युका भय नहीं होता तथा वह निश्चय ही विजयी होता है।
(अध्याय ३९)
#### देवताओंसहित ब्रह्माका विष्णुलोकमें जाकर अपना दुःख निवेदन करना, श्रीविष्णुका उन्हें शिवसे क्षमा माँगनेकी अनुमति दे उनको साथ ले कैलासपर जाना तथा भगवान् शिवसे मिलना
नारदजीने कहा—विधातः! महाप्राज्ञ! आप शिवतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले हैं। आपने यह बड़ी अद्भुत एवं रमणीय शिवलीला सुनायी है। तात! वीर वीरभद्र जब दक्षके यज्ञका विनाश करके कैलास पर्वतपर चले गये, तब क्या हुआ? यह हमें बताइये।
ब्रह्माजी बोले—नारद! रुद्रदेवके सैनिकोंने जिनके अंग-भंग कर दिये थे, वे समस्त पराजित देवता और मुनि उस समय मेरे लोकमें आये। वहाँ मुझ स्वयम्भूको नमस्कार करके सबने बारंबार मेरा स्तवन किया। फिर अपने विशेष क्लेशको पूर्णरूपसे सुनाया। उसे सुनकर मैं पुत्रशोकसे पीड़ित हो गया और अत्यन्त व्यग्र हो व्यथित चित्तसे बड़ी चिन्ता करने लगा। फिर मैंने भक्तिभावसे भगवान् विष्णुका स्मरण किया। इससे मुझे समयोचित ज्ञान प्राप्त हुआ। तदनन्तर देवताओं और मुनियोंके साथ मैं विष्णुलोकमें गया और वहाँ भगवान् विष्णुको नमस्कार एवं नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके उनसे अपना दुःख निवेदन किया। मैंने कहा—'देव! जिस तरह भी यज्ञ पूर्ण हो, यजमान जीवित हो और समस्त देवता तथा मुनि सुखी हो जायँ, वैसा उपाय कीजिये। देवदेव! रमानाथ! देवसुखदायक विष्णो! हम देवता और मुनि निश्चय ही आपकी शरणमें आये हैं।'
मुझ ब्रह्माकी यह बात सुनकर भगवान् लक्ष्मीपति विष्णु, जिनका मन सदा शिवमें लगा रहता है और जिनके हृदयमें कभी दीनता नहीं आती, शिवका स्मरण करके इस प्रकार बोले।
श्रीविष्णुने कहा—देवताओ! परम समर्थ तेजस्वी पुरुषसे कोई अपराध बन जाय तो भी उसके बदलेमें अपराध करनेवाले मनुष्योंके लिये वह अपराध मंगलकारी नहीं हो सकता। विधातः! समस्त देवता परमेश्वर शिवके अपराधी हैं;
* रुद्रसंहिता * २३५
क्योंकि इन्होंने भगवान् शम्भुको यज्ञका भाग नहीं दिया। अब तुम सब लोग शुद्ध हृदयसे शीघ्र ही प्रसन्न होनेवाले उन भगवान् शिवके पैर पकड़कर उन्हें प्रसन्न करो। उनसे क्षमा माँगो। जिन भगवान्के कुपित होनेपर यह सारा जगत् नष्ट हो जाता है तथा जिनके शासनसे लोकपालोंसहित यज्ञका जीवन शीघ्र ही समाप्त हो जाता है, वे भगवान् महादेव इस समय अपनी प्राणवल्लभा सतीसे बिछुड़ गये हैं तथा अत्यन्त दुरात्मा दक्षने अपने दुर्वचनरूपी बाणोंसे उनके हृदयको पहलेसे ही घायल कर दिया है; अतः तुमलोग शीघ्र ही जाकर उनसे अपने अपराधोंके लिये क्षमा माँगो। विधे! उन्हें शान्त करनेका केवल यही सबसे बड़ा उपाय है। मैं समझता हूँ ऐसा करनेसे भगवान् शंकरको संतोष होगा। यह मैंने सच्ची बात कही है। ब्रह्मन्! मैं भी तुम सब लोगोंके साथ शिवके निवासस्थानपर चलूँगा और उनसे क्षमा माँगूँगा।
देवता आदि सहित मुझ ब्रह्माको इस प्रकार आदेश देकर श्रीहरिने देवगणोंके साथ कैलास पर्वतपर जानेका विचार किया। तदनन्तर देवता, मुनि और प्रजापति आदि जिनके स्वरूप ही हैं, वे श्रीहरि उन सबको साथ ले अपने वैकुण्ठधामसे भगवान् शिवके शुभ निवास गिरिश्रेष्ठ कैलासको गये। कैलास भगवान् शिवको सदा ही अत्यन्त प्रिय है। मनुष्योंसे भिन्न किंनर, अप्सराएँ और योगसिद्ध महात्मा पुरुष उसका भलीभाँति सेवन करते हैं तथा वह पर्वत बहुत ही ऊँचा है। उसके निकट रुद्रदेवके मित्र कुबेरकी अलका नामक महादिव्य एवं रमणीय पुरी है, जिसे सब देवताओंने देखा। उस पुरीके पास ही सौगन्धिक वन भी देवताओंकी दृष्टिमें आया, जो सब प्रकारके वृक्षोंसे हरा-भरा एवं दिव्य था। उसके भीतर सर्वत्र सुगन्ध फैलानेवाले सौगन्धिक नामक कमल खिले हुए थे। उसके बाहरी भागमें नन्दा और अलकनन्दा—ये दो अत्यन्त पावन दिव्य सरिताएँ बहती हैं, जो दर्शनमात्रसे प्राणियोंके पाप हर लेती हैं। यक्षराज कुबेरकी अलकापुरी और सौगन्धिक वनको पीछे छोड़कर आगे बढ़ते हुए देवताओंने थोड़ी ही दूरपर शंकरजीके वटवृक्षको देखा। उसने चारों ओर अपनी अविचल छाया फैला रखी थी। वह वृक्ष सौ योजन ऊँचा था और उसकी शाखाएँ पचहत्तर योजनतक फैली हुई थीं। उसपर कोई घोंसला नहीं था और ग्रीष्मका ताप तो उससे सदा दूर ही रहता था। बड़े पुण्यात्मा पुरुषोंको ही उसका दर्शन हो सकता है। वह परम रमणीय और अत्यन्त पावन है। वह दिव्य वृक्ष भगवान् शम्भुका योगस्थल है। योगियोंके द्वारा सेव्य और परम उत्तम है। मुमुक्षुओंके आश्रयभूत उस महायोगमय वटवृक्षके नीचे विष्णु आदि सब देवताओंने भगवान् शंकरको विराजमान देखा। मेरे पुत्र महासिद्ध सनकादि, जो सदा शिव-भक्तिमें तत्पर रहनेवाले और शान्त हैं, बड़ी प्रसन्नताके साथ उनकी सेवामें बैठे थे। भगवान् शिवका श्रीविग्रह परम शान्त दिखायी देता था। उनके सखा कुबेर, जो गुह्यकों और राक्षसोंके स्वामी हैं, अपने सेवकगणों तथा कुटुम्बीजनोंके साथ सदा विशेषरूपसे उनकी सेवा किया करते हैं। वे परमेश्वर शिव उस समय तपस्वीजनोंको परमप्रिय लगनेवाला सुन्दररूप धारण किये बैठे थे।
२३६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
भस्म आदिसे उनके अंगोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। भगवान् शिव अपने वत्सल स्वभावके कारण सारे संसारके सुहृद् हैं। नारद! उस दिन वे एक कुशासनपर बैठे थे और सब संतोंके सुनते हुए तुम्हारे प्रश्न करनेपर तुम्हें उत्तम ज्ञानका उपदेश दे रहे थे। वे बायाँ चरण अपनी दायीं जाँघपर और बायाँ हाथ बायें घुटनेपर रखे, कलाईमें रुद्राक्षकी माला डाले सुन्दर तर्कमुद्रा*-से विराजमान थे।
इस रूपमें भगवान् शिवका दर्शन करके उस समय विष्णु आदि सब देवताओंने दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर तुरंत उनके चरणोंमें प्रणाम किया। मेरे साथ भगवान् विष्णुको आया देख सत्पुरुषोंके आश्रयदाता भगवान् रुद्र उठकर खड़े हो गये और उन्होंने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम भी किया। फिर विष्णु आदि सब देवताओंने जब भगवान् शिवको प्रणाम कर लिया, तब उन्होंने मुझे नमस्कार किया—ठीक उसी तरह, जैसे लोकोंको उत्तम गति प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु प्रजापति कश्यपको प्रणाम करते हैं। तत्पश्चात् देवताओं, सिद्धों, गणाधीशों और महर्षियोंसे नमस्कृत तथा स्वयं भी (श्रीविष्णुको एवं मुझको) नमस्कार करनेवाले भगवान् शिवसे श्रीहरिने आदरपूर्वक वार्तालाप आरम्भ किया।
(अध्याय ४०)
देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवान् शिवका देवता आदिके अंगोंके ठीक होने और दक्षके जीवित होनेका वरदान देना, श्रीहरि आदिके साथ यज्ञमण्डपमें पधारकर शिवका दक्षको जीवित करना तथा दक्ष और विष्णु आदिके द्वारा उनकी स्तुति
देवताओंने भगवान् शिवजीकी अत्यन्त विनयके साथ स्तुति करते हुए अन्तमें कहा— आप पर (उत्कृष्ट), परमेश्वर, परात्पर तथा परात्परतर हैं। आप सर्वव्यापी विश्वमूर्ति महेश्वरको नमस्कार है। आप विष्णुकलत्र, विष्णुक्षेत्र, भानु, भैरव, शरणागतवत्सल, त्र्यम्बक तथा विहरणशील हैं। आप मृत्युंजय हैं। शोक भी आपका ही रूप है, आप त्रिगुण एवं गुणात्मा हैं। चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि आपके नेत्र हैं। आप सबके कारण तथा धर्ममर्यादास्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आपने अपने ही तेजसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है। आप निर्विकार, प्रकाशपूर्ण, चिदानन्दस्वरूप, परब्रह्म परमात्मा हैं। महेश्वर ! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और चन्द्र आदि समस्त देवता तथा मुनि आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। चूँकि आप अपने शरीरको आठ भागोंमें विभक्त करके समस्त संसारका पोषण करते हैं, इसलिये अष्टमूर्ति कहलाते हैं। आप ही सबके आदिकारण
* तर्जनीको अँगूठेसे जोड़कर और अन्य अँगुलियोंको आपसमें मिलाकर फैला देनेसे जो बन्ध सिद्ध होता है, उसे 'तर्कमुद्रा' कहते हैं। इसीका नाम ज्ञानमुद्रा भी है।
* रुद्रसंहिता * २३७
करुणामय ईश्वर हैं। आपके भयसे यह वायु चलती है। आपके भयसे अग्नि जलानेका काम करती है, आपके भयसे सूर्य तपता है और आपके ही भयसे मृत्यु सब ओर दौड़ती फिरती है। दयासिन्धो! महेशान! परमेश्वर! प्रसन्न होइये। हम नष्ट और अचेत हो रहे हैं। अतः सदा ही हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। नाथ! करुणानिधे! शम्भो! आपने अबतक नाना प्रकारकी आपत्तियोंसे जिस तरह हमें सदा सुरक्षित रखा है, उसी तरह आज भी आप हमारी रक्षा कीजिये। नाथ! दुर्गेश! आप शीघ्र कृपा करके इस अपूर्ण यज्ञका और प्रजापति दक्षका भी उद्धार कीजिये। भगको अपनी आँखें मिल जायें, यजमान दक्ष जीवित हो जायें, पूषाके दाँत जम जायँ और भृगुकी दाढ़ी-मूँछ पहले-जैसी हो जाय। शंकर! आयुधों और पत्थरोंकी वर्षासे जिनके अंग भंग हो गये हैं, उन देवता आदिपर आप सर्वथा अनुग्रह करें, जिससे उन्हें पूर्णतः आरोग्य लाभ हो। नाथ! यज्ञकर्म पूर्ण होनेपर जो कुछ शेष रहे, वह सब आपका पूरा-पूरा भाग हो (उसमें और कोई हस्तक्षेप न करे)। रुद्रदेव! आपके भागसे ही यज्ञ पूर्ण हो, अन्यथा नहीं।
ऐसा कहकर मुझ ब्रह्माके साथ सभी देवता अपराध क्षमा करानेके लिये उद्यत हो हाथ जोड़ भूमिपर दण्डके समान पड़ गये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मुझ ब्रह्मा, लोकपाल, प्रजापति तथा मुनियोंसहित श्रीपति विष्णुके अनुनय-विनय करनेपर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये। देवताओंको आश्वासन दे हँसकर उनपर परम अनुग्रह करते हुए करुणानिधान परमेश्वर शिवने कहा।
श्रीमहादेवजी बोले—सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा और विष्णुदेव! आप दोनों सावधान होकर मेरी बात सुनें, मैं सच्ची बात कहता हूँ। तात! आप दोनोंकी सभी बातोंको मैंने सदा माना है। दक्षके यज्ञका यह विध्वंस मैंने नहीं किया है। दक्ष स्वयं ही दूसरोंसे द्वेष करते हैं। दूसरोंके प्रति जैसा बर्ताव किया जायगा, वह अपने लिये ही फलित होगा। अतः ऐसा कर्म कभी नहीं करना चाहिये, जो दूसरोंको कष्ट देनेवाला हो।* दक्षका मस्तक जल गया है, इसलिये इनके सिरके स्थानमें बकरेका सिर जोड़ दिया जाय; भग देवता मित्रकी आँखसे अपने यज्ञभागको देखें। तात! पूषा नामक देवता, जिनके दाँत टूट गये हैं, यजमानके दाँतोंसे भलीभाँति पिसे गये यज्ञान्नका भक्षण करें। यह मैंने सच्ची बात बतायी है। मेरा विरोध करनेवाले भृगुकी दाढ़ीके स्थानमें बकरेकी दाढ़ी लगा दी जाय। शेष सभी देवताओंके, जिन्होंने मुझे यज्ञभागके रूपमें यज्ञकी अवशिष्ट वस्तुएँ दी हैं, सारे अंग पहलेकी भाँति ठीक हो जायँ। अध्वर्यु आदि याज्ञिकोंमेंसे, जिनकी भुजाएँ टूट गयी हैं, वे अश्विनीकुमारोंकी भुजाओंसे और जिनके हाथ नष्ट हो गये हैं, वे पूषाके हाथोंसे अपने काम चलायें। यह मैंने आपलोगोंके प्रेमवश कहा है।
* परं द्वेष्टि परेषां यदात्मनस्तद्भविष्यति ॥ परेषां क्लेदनं कर्म न कार्यं तत्कदाचन।
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ४२। ५-६)
२३८
* संक्षिप्त शिवपुराण *
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! ऐसा कहकर वेदका अनुसरण करनेवाले सुरसम्राट् चराचरपति दयालु परमेश्वर महादेवजी चुप हो गये। भगवान् शंकरका वह भाषण सुनकर श्रीविष्णु और ब्रह्मासहित सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो उन्हें तत्काल साधुवाद देने लगे। तदनन्तर भगवान् शम्भुको आमन्त्रित करके मुझ ब्रह्मा और देवर्षियोंके साथ श्रीविष्णु अत्यन्त हर्षपूर्वक पुनः दक्षकी यज्ञशालाकी ओर चले। इस प्रकार उनकी प्रार्थनासे भगवान् शम्भु विष्णु आदि देवताओंके साथ कनखलमें स्थित प्रजापति दक्षकी यज्ञशालामें पधारे। उस समय रुद्रदेवने वहाँ यज्ञका और विशेषतः देवताओं तथा ऋषियोंका जो वीरभद्रके द्वारा विध्वंस किया गया था, उसे देखा। स्वाहा, स्वधा, पूषा, तुष्टि, धृति, सरस्वती, अन्य समस्त ऋषि, पितर, अग्नि तथा अन्यान्य बहुत-से यक्ष, गन्धर्व और राक्षस वहाँ पड़े थे। उनमेंसे कुछ लोगोंके अंग तोड़ डाले गये थे, कुछ लोगोंके बाल नोच लिये गये थे और कितने ही उस समरांगणमें अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे थे। उस यज्ञकी वैसी दुरवस्था देखकर भगवान् शंकरने अपने गणनायक महापराक्रमी वीरभद्रको बुलाकर हँसते हुए कहा—'महाबाहु वीरभद्र! यह तुमने कैसा काम किया? तात! तुमने थोड़ी ही देरमें देवता तथा ऋषि आदिको बड़ा भारी दण्ड दे दिया। वत्स! जिसने ऐसा द्रोहपूर्ण कार्य किया, इस विलक्षण यज्ञका आयोजन किया और जिसे ऐसा फल मिला, उस दक्षको तुम शीघ्र यहाँ ले आओ।'
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर वीरभद्रने बड़ी उतावलीके साथ दक्षका धड़ लाकर उनके सामने डाल दिया। दक्षके उस शवको सिरसे रहित देख लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने आगे खड़े हुए वीरभद्रसे हँसकर पूछा—'दक्षका सिर कहाँ है?' तब प्रभावशाली वीरभद्रने कहा—'प्रभो शंकर ! मैंने तो उसी समय दक्षके सिरको आगमें होम दिया था।' वीरभद्रकी यह बात सुनकर भगवान् शंकरने देवताओंको प्रसन्नतापूर्वक वैसी ही आज्ञा दी, जो पहले दे रखी थी। भगवान् भवने उस समय जो कुछ कहा, उसकी मेरे द्वारा पूर्ति कराकर श्रीहरि आदि सब देवताओंने भृगु आदि सबको शीघ्र ही ठीक कर दिया। तदनन्तर शम्भुके आदेशसे प्रजापतिके धड़के साथ यज्ञपशु बकरेका सिर जोड़ दिया गया। उस सिरके जोड़े जाते
* रुद्रसंहिता * २३९
ही शम्भुकी शुभ दृष्टि पड़नेसे प्रजापतिके शरीरमें प्राण आ गये और वे तत्काल सोकर जगे हुए पुरुषकी भाँति उठकर खड़े हो गये। उठते ही उन्होंने अपने सामने करुणानिधि भगवान् शंकरको देखा। देखते ही दक्षके हृदयमें प्रेम उमड़ आया। उस प्रेमने उनके अन्तःकरणको निर्मल एवं प्रसन्न कर दिया। पहले महादेवजीसे द्वेष करनेके कारण उनका अन्तःकरण मलिन हो गया था। परंतु उस समय शिवके दर्शनसे वे तत्काल शरद्ऋतुके चन्द्रमाकी भाँति निर्मल हो गये। उनके मनमें भगवान् शिवकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ। परंतु वे अनुरागाधिक्यके कारण तथा अपनी मरी हुई पुत्रीका स्मरण करके व्याकुल हो जानेके कारण तत्काल उनका स्तवन न कर सके। थोड़ी देर बाद मन स्थिर होनेपर दक्षने लज्जित हो लोकशंकर शिवशंकरको प्रणाम किया और उनकी स्तुति आरम्भ की। उन्होंने भगवान् शंकरकी महिमा गाते हुए बारंबार उन्हें प्रणाम किया। फिर अन्तमें कहा—
‘परमेश्वर ! आपने ब्रह्मा होकर सबसे पहले आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अपने मुखसे विद्या, तप और व्रत धारण करनेवाले ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था। जैसे ग्वाला लाठी लेकर गौओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार मर्यादाका पालन करनेवाले आप परमेश्वर दण्ड धारण किये उन साधु ब्राह्मणोंकी सभी विपत्तियोंसे रक्षा करते हैं। मैंने दुर्वचनरूपी बाणोंसे आप परमेश्वरको बींध डाला था। फिर भी आप मुझपर अनुग्रह करनेके लिये यहाँ आ गये। अब मेरी ही तरह अत्यन्त दैन्यपूर्ण आशावाले इन देवताओंपर भी कृपा कीजिये। भक्तवत्सल ! दीनबन्धो ! शम्भो ! मुझमें आपको प्रसन्न करनेके लिये कोई गुण नहीं है। आप षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न परात्पर परमात्मा हैं। अतः अपने ही बहुमूल्य उदारतापूर्ण बर्तावसे मुझपर संतुष्ट हों।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! इस प्रकार लोककल्याणकारी महाप्रभु महेश्वर शंकरकी स्तुति करके विनीतचित्त प्रजापति दक्ष चुप हो गये। तदनन्तर श्रीविष्णुने हाथ जोड़ भगवान् वृषभध्वजको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्ण हृदय और बाष्पगद्गद वाणीद्वारा उनकी स्तुति प्रारम्भ की।
तदनन्तर मैंने कहा—देवदेव ! महादेव ! करुणासागर ! प्रभो ! आप स्वतन्त्र परमात्मा हैं, अद्वितीय एवं अविनाशी परमेश्वर हैं। देव ! ईश्वर ! आपने मेरे पुत्रपर अनुग्रह किया। अपने अपमानकी ओर कुछ भी ध्यान न देकर दक्षके यज्ञका उद्धार कीजिये। देवेश्वर ! आप प्रसन्न होइये और समस्त शापोंको दूर कर दीजिये। आप सज्ञान हैं। अतः आप ही मुझे कर्तव्यकी ओर प्रेरित करनेवाले हैं और आप ही अकर्तव्यसे रोकनेवाले हैं।
महामुने ! इस प्रकार परम महेश्वरकी स्तुति करके मैं दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर खड़ा हो गया। तब सुन्दर विचार रखनेवाले इन्द्र आदि देवता और लोकपाल शंकरदेवकी स्तुति करने लगे। उस समय भगवान् शिवका मुखारविन्द प्रसन्नतासे