भारतकोश
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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* उमासंहिता * ६१७

तिनका अपने स्थानसे तिलभर भी न हटा। इससे वायुदेव लज्जित हो गये। वे चुप हो इन्द्रकी सभामें लौट गये और अपनी पराजयके साथ वहाँका सारा वृत्तान्त उन्होंने सुनाया। वे बोले—‘देवेन्द्र! हम सब लोग झूठे ही अपनेमें सर्वेश्वर होनेका अभिमान रखते हैं; क्योंकि किसी छोटी-सी वस्तुका भी हम कुछ नहीं कर सकते।’ तब इन्द्रने बारी-बारीसे समस्त देवताओंको भेजा। जब वे उसे जाननेमें समर्थ न हो सके, तब इन्द्र स्वयं गये। इन्द्रको आते देख वह अत्यन्त दुस्सह तेज तत्काल अदृश्य हो गया। इससे इन्द्र बड़े विस्मित हुए और मन-ही-मन बोले—‘जिसका ऐसा चरित्र है, उसी सर्वेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ।’ सहस्र-नेत्रधारी इन्द्र बारंबार इसी भावका चिन्तन करने लगे। इसी समय निश्च्छल करुणामय शरीर धारण करनेवाली सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी शिवप्रिया उमा उन देवताओंपर दया करने और उनका गर्व हरनेके लिये चैत्रशुक्ला नवमीको दोपहरमें वहाँ प्रकट हुईं। वे उस तेजःपुंजके बीचमें विराज रही थीं, अपनी कान्तिसे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रही थीं और समस्त देवताओंको सुस्पष्टरूपसे यह जता रही थीं कि ‘मैं साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही हूँ।’ वे चार हाथोंमें क्रमशः वर, पाश, अंकुश और अभय धारण किये थीं। श्रुतियाँ साकार होकर उनकी सेवा करती थीं। वे बड़ी रमणीय दीखती थीं तथा अपने नूतन यौवनपर उन्हें गर्व था। वे लाल रंगकी साड़ी पहने हुए थीं। लाल फूलोंकी माला तथा लाल चन्दनसे उनका श्रृंगार किया गया था। वे कोटि-कोटि कन्दर्पोंके समान मनोहारिणी तथा करोड़ों चन्द्रमाओंके समान चटकीली चाँदनीसे सुशोभित थीं। सबकी अन्तर्यामिणी, समस्त भूतोंकी साक्षिणी तथा परब्रह्मस्वरूपिणी उन महामायाने इस प्रकार कहा।

उमा बोलीं—मैं ही परब्रह्म, परम ज्योति, प्रणवरूपिणी तथा युगलरूपधारिणी हूँ। मैं ही सब कुछ हूँ। मुझसे भिन्न कोई पदार्थ नहीं है। मैं निराकार होकर भी साकार हूँ, सर्वतत्त्वस्वरूपिणी हूँ। मेरे गुण अतर्क्य हैं। मैं नित्यस्वरूपा तथा कार्यकारणरूपिणी हूँ। मैं ही कभी प्राणवल्लभाका आकार धारण करती हूँ और कभी प्राणवल्लभ पुरुषका। कभी स्त्री और पुरुष दोनों रूपोंमें एक साथ प्रकट होती हूँ (यही मेरा अर्धनारीश्वररूप है)। मैं सर्वरूपिणी ईश्वरी हूँ, मैं ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हूँ। मैं ही जगत्पालक विष्णु हूँ तथा मैं ही संहारकर्ता रुद्र हूँ। सम्पूर्ण विश्वको मोहमें डालनेवाली महामाया मैं ही हूँ। काली,

६१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

लक्ष्मी और सरस्वती आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ तथा ये सकल कलाएँ मेरे अंशसे ही प्रकट हुई हैं। मेरे ही प्रभावसे तुमलोगोंने सम्पूर्ण दैत्योंपर विजय पायी है। मुझ सर्वविजयिनीको न जानकर तुमलोग व्यर्थ ही अपनेको सर्वेश्वर मान रहे हो। जैसे इन्द्रजाल करनेवाला सूत्रधार कठपुतलीको नचाता है, उसी प्रकार मैं ईश्वरी ही समस्त प्राणियोंको नचाती हूँ। मेरे भयसे हवा चलती है, मेरे भयसे ही अग्निदेव सबको जलाते हैं तथा मेरा भय मानकर ही लोकपालगण निरन्तर अपने-अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं। मैं सर्वथा स्वतन्त्र हूँ और अपनी लीलासे ही कभी देवसमुदायको विजयी बनाती हूँ तथा कभी दैत्योंको। मायासे परे जिस अविनाशी परात्पर धामका श्रुतियाँ वर्णन करती हैं, वह मेरा ही रूप है। सगुण और निर्गुण—ये मेरे दो प्रकारके रूप माने गये हैं। इनमेंसे प्रथम तो मायायुक्त है और दूसरा मायारहित। देवताओ! ऐसा जानकर गर्व छोड़ो और मुझ सनातनी प्रकृतिकी प्रेमपूर्वक आराधना करो।*

देवीका यह करुणायुक्त वचन सुन देवता भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर उन परमेश्वरीकी स्तुति करने लगे—'जगदीश्वरि! क्षमा करो। परमेश्वरि! प्रसन्न होओ। मातः! ऐसी कृपा करो, जिससे फिर कभी हमें गर्व न हो।'

तबसे सब देवता गर्व छोड़ एकाग्रचित्त हो पूर्ववत् विधिपूर्वक उमादेवीकी आराधना करने लगे। ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने तुमसे उमाके प्रादुर्भावका वर्णन किया है, जिसके श्रवणमात्रसे परमपदकी प्राप्ति होती है।

(अध्याय ४९)

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* उमोवाच—परं ब्रह्म परं ज्योतिः प्रणवद्वन्द्वरूपिणी। अहमेवास्मि सकलं मदन्यो नास्ति कश्चन॥
निराकारापि साकारा सर्वतत्त्वस्वरूपिणी। अप्रतर्क्यगुणा नित्या कार्यकारणरूपिणी॥
कदाचिद्दयिताकारा कदाचित्पुरुषाकृतिः। कदाचिदुभयाकारा सर्वाकाराहमीश्वरी॥
विरञ्चिः सृष्टिकर्ताहं जगन्माताहमच्युतः। रुद्रः संहारकर्ताहं सर्वविश्वविमोहिनी॥
कालिकाकमलावाणीमुखाः सर्वा हि शक्तयः। मदंशादेव संजातास्तथेमाः सकलाः कलाः॥
मत्प्रभावाज्जिताः सर्वे युष्माभिर्दितिनन्दनाः। तामविज्ञाय मां यूयं वृथा सर्वेशमानिनः॥
यथा दारुमयीं योषां नर्तयत्यैन्द्रजालिकः। तथैव सर्वभूतानि नर्तयाम्यहमीश्वरी॥
मद्भयाद् वाति पवनः सर्वं दहति हव्यभुक्। लोकपालाः प्रकुर्वन्ति स्वस्वकर्माण्यनारतम्॥
कदाचिद्देववर्गाणां कदाचिद्दितिजन्मनाम्। करोमि विजयं सम्यक् स्वतन्त्रा निजलीलया॥
अविनाशिपरं धाम मायातीतं परात्परम्। श्रुतयो वर्ण्यन्ते यत्तद्रूपं तु ममैव हि॥
सगुणं निर्गुणं चेति मद्रूपं द्विविधं मतम्। मायाशवलितं चैकं द्वितीयं तदनाश्रितम्॥
एवं विज्ञाय मां देवाः स्वं स्वं गर्वं विहाय च। भजत प्रणयोपेताः प्रकृतिं मां सनातनीम्॥
(शि० पु० उ० सं० ४९। २७—३८)

* उमासंहिता * ६१९

देवीके द्वारा दुर्गमासुरका वध तथा उनके दुर्गा, शताक्षी, शाकम्भरी और भ्रामरी आदि नाम पड़नेका कारण

मुनियोंने कहा—महाप्राज्ञ सूतजी! हम सब लोग प्रतिदिन दुर्गाजीका चरित्र सुनना चाहते हैं। अतः आप और किसी अद्भुत लीलातत्त्वका हमारे समक्ष वर्णन कीजिये। सर्वज्ञशिरोमणे सूत! आपके मुखारविन्दसे नाना प्रकारकी सुधासदृश मधुर कथाएँ सुनते-सुनते हमारा मन कभी तृप्त नहीं होता।

सूतजी बोले—मुनियो! दुर्गम नामसे विख्यात एक असुर था, जो रुरुका महाबलवान् पुत्र था। उसने ब्रह्माजीके वरदानसे चारों वेदोंको अपने हाथमें कर लिया था तथा देवताओंके लिये अजेय बल पाकर उसने भूतलपर बहुत-से ऐसे उत्पात किये, जिन्हें सुनकर देवलोकमें देवता भी कम्पित हो उठे। वेदोंके अदृश्य हो जानेपर सारी वैदिक क्रिया नष्ट हो चली। उस समय ब्राह्मण और देवता भी दुराचारी हो गये। न कहीं दान होता था, न अत्यन्त उग्र तप किया जाता था; न यज्ञ होता था और न होम ही किया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीपर सौ वर्षोंतकके लिये वर्षा बंद हो गयी। तीनों लोकोंमें हाहाकार मच गया। सब लोग दुःखी हो गये। सबको भूख-प्यासका महान् कष्ट सताने लगा। कुँआ, बावड़ी, सरोवर, सरिताएँ और समुद्र भी जलसे रहित हो गये। समस्त वृक्ष और लताएँ भी सूख गयीं। इससे समस्त प्रजाओंके चित्तमें बड़ी दीनता आ गयी। उनके महान् दुःखको देखकर सब देवता महेश्वरी योगमायाकी शरणमें गये।

देवताओंने कहा—महामाये! अपनी सारी प्रजाकी रक्षा करो, रक्षा करो। अपने क्रोधको रोको, अन्यथा सब लोग निश्चय ही नष्ट हो जायेंगे। कृपासिन्धो! दीनबन्धो! जैसे शुम्भ नामक दैत्य, महाबली निशुम्भ, धूम्राक्ष, चण्ड, मुण्ड, महान् शक्तिशाली रक्तबीज, मधु, कैटभ तथा महिषासुरका तुमने वध किया था, उसी प्रकार इस दुर्गमासुरका शीघ्र ही संहार करो। बालकोंसे पग-पगपर अपराध बनता ही रहता है। केवल माताके सिवा संसारमें दूसरा कौन है, जो उस अपराधको सहन करता हो। देवताओं और ब्राह्मणोंपर जब-जब दुःख आता है, तब-तब शीघ्र ही अवतार लेकर तुम सब लोगोंको सुखी बनाती हो।

देवताओंकी यह व्याकुल प्रार्थना

६२० * संक्षिप्त शिवपुराण *

सुनकर कृपामयी देवीने उस समय अपने अनन्त नेत्रोंसे युक्त रूपका दर्शन कराया। उनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ था और वे अपने चारों हाथोंमें क्रमशः धनुष, बाण, कमल तथा नाना प्रकारके फल-मूल लिये हुए थीं। उस समय प्रजाजनोंको कष्ट उठाते देख उनके सभी नेत्रोंमें करुणाके आँसू छलक आये। वे व्याकुल होकर लगातार नौ दिन और नौ रात रोती रहीं। उन्होंने अपने नेत्रोंसे अश्रु-जलकी सहस्रों धाराएँ प्रवाहित कीं। उन धाराओंसे सब लोग तृप्त हो गये और समस्त ओषधियाँ भी सिंच गयीं। सरिताओं और समुद्रोंमें अगाध जल भर गया। पृथ्वीपर साग और फल-मूलके अंकुर उत्पन्न होने लगे। देवी शुद्ध हृदयवाले महात्मा पुरुषोंको अपने हाथमें रखे हुए फल बाँटने लगीं। उन्होंने गौओंके लिये सुन्दर घास और दूसरे प्राणियोंके लिये यथायोग्य भोजन प्रस्तुत किये। देवता, ब्राह्मण और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण प्राणी संतुष्ट हो गये। तब देवीने देवताओंसे पूछा—'तुम्हारा और कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?' उस समय सब देवता एकत्र होकर बोले—'देवि! आपने सब लोगोंको संतुष्ट कर दिया। अब कृपा करके दुर्गमासुरके द्वारा अपहृत हुए वेद लाकर हमें दीजिये।' तब देवीने 'तथास्तु' कहकर कहा—'देवताओ! अपने घरको जाओ, जाओ। मैं शीघ्र ही सम्पूर्ण वेद लाकर तुम्हें अर्पित करूँगी।'

यह सुनकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। वे प्रफुल्ल नीलकमलके समान नेत्रोंवाली जगद्योनि जगदम्बाको भलीभाँति प्रणाम करके अपने-अपने धामको चले गये। फिर तो स्वर्ग, अन्तरिक्ष और पृथ्वीपर बड़ा भारी कोलाहल मच गया, उसे सुनकर उस भयानक दैत्यने चारों ओरसे देवपुरीको घेर लिया। तब शिवा देवताओंकी रक्षाके लिये चारों ओरसे तेजोमय मण्डलका निर्माण करके स्वयं उस घेरेसे बाहर आ गयीं। फिर तो देवी और दैत्य दोनोंमें घोर युद्ध आरम्भ हो गया। समरांगणमें दोनों ओरसे कवचको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले तीखे बाणोंकी वर्षा होने लगी। इसी बीचमें देवीके शरीरसे सुन्दर रूपवाली काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूमा, श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी और मातंगी—ये दस महाविद्याएँ अस्त्र-शस्त्र लिये निकलीं। तत्पश्चात् दिव्य मूर्तिवाली असंख्य मातृकाएँ प्रकट हुईं। उन सबने अपने मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट धारण कर रखा था और वे सब-की-सब विद्युत्‌के समान दीप्तिमती दिखायी देती थीं। इसके बाद उन मातृगणोंके साथ दैत्योंका भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ। उन सबने मिलकर उस रौरव अथवा दुर्गम दैत्यकी सौ अक्षौहिणी सेनाएँ नष्ट कर दीं। इसके बाद देवीने त्रिशूलकी धारसे उस दुर्गम दैत्यको मार डाला। वह दैत्य जड़से खोदे गये वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। इस प्रकार ईश्वरीने उस समय दुर्गमासुर नामक दैत्यको मारकर चारों वेद वापस ले देवताओंको दे दिये।

तब देवता बोले—अम्बिके! आपने हमलोगोंके लिये असंख्य नेत्रोंसे युक्त रूप धारण कर लिया था, इसलिये मुनिजन आपको 'शताक्षी' कहेंगे। अपने शरीरसे उत्पन्न हुए शाकोंद्वारा आपने समस्त लोकोंका भरण-पोषण किया है, इसलिये

* उमासंहिता * ६२१

'शाकम्भरी' के नामसे आपकी ख्याति होगी। शिवे ! आपने दुर्गम नामक महादैत्यका वध किया है, इसलिये लोग आप कल्याणमयी भगवतीको 'दुर्गा' कहेंगे। योगनिद्रे ! आपको नमस्कार है। महाबले ! आपको नमस्कार है। ज्ञानदायिनि ! आपको नमस्कार है। आप जगन्माताको बारंबार नमस्कार है। तत्त्वमसि आदि महावाक्योंद्वारा जिन परमेश्वरीका ज्ञान होता है, उन अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका संचालन करनेवाली भगवती दुर्गाको बारंबार नमस्कार है। मातः ! आपतक मन, वाणी और शरीरकी पहुँच होनी कठिन है। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि—ये तीनों आपके नेत्र हैं। हम आपके प्रभावको नहीं जानते, इसलिये आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। सुरेश्वरी माता शताक्षीको छोड़कर दूसरा कौन है, जो हम-जैसे अमरोंपर दृष्टिपात करके ऐसी दया करे। देवि ! आपको सदा ऐसा ही यत्न करना चाहिये, जिससे तीनों लोक निरन्तर विघ्न-बाधाओंसे तिरस्कृत न हों। आप हमारे शत्रुओंका नाश करती रहें।

देवीने कहा—देवताओ ! जैसे बछड़ोंको देखकर गौएँ व्यग्र हो उतावलीके साथ उनकी ओर दौड़ती हैं, उसी तरह मैं तुम सबको देखकर व्याकुल हो दौड़ी आती हूँ। तुम्हें न देखनेसे मेरा एक क्षण भी युगके समान बीतता है। मैं तुम्हें अपने बच्चोंके समान समझती हूँ और तुम्हारे लिये अपने प्राण भी दे सकती हूँ। तुमलोग मेरे प्रति भक्तिभावसे सुशोभित हो, अतः तुम्हें कोई भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं तुम्हारी सारी आपत्तियोंका निवारण करनेके लिये सदैव उद्यत हूँ। जैसे पूर्वकालमें तुम्हारी रक्षाके लिये मैंने दैत्योंको मारा है, उसी प्रकार आगे भी असुरोंका संहार करूँगी—इसमें तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये। यह मैं सत्य-सत्य कहती हूँ। भविष्यमें जब पुनः शुम्भ और निशुम्भ नामके दूसरे दैत्य होंगे, उस समय मैं यशोमयी देवी नन्दपत्नी यशोदाके गर्भसे योनिजस्वरूप धारण करके गोकुलमें उत्पन्न होऊँगी और यथासमय उन असुरोंका वध करूँगी। नन्दकी पुत्री होनेके कारण उस समय मुझे लोग 'नन्दजा' कहेंगे। जब मैं भ्रमरका रूप धारण करके अरुण नामक असुरका वध करूँगी, तब संसारके मनुष्य मुझे 'भ्रामरी' कहेंगे। फिर मैं भीम (भयंकर)-रूप धारण करके राक्षसोंको खाने लगूँगी, उस समय मेरा 'भीमादेवी' नाम प्रसिद्ध होगा। जब-जब पृथ्वीपर असुरोंकी ओरसे बाधा उत्पन्न होगी, तब-तब मैं अवतार लेकर प्रजाजनोंका कल्याण करूँगी—इसमें संशय नहीं है। जो देवी शताक्षी कही गयी हैं, वे ही शाकम्भरी मानी गयी हैं तथा उन्हींको दुर्गा कहा गया है। तीनों नामोंद्वारा एक ही व्यक्तिका प्रतिपादन होता है। इस पृथ्वीपर महेश्वरी शताक्षीके समान दूसरा कोई दयालु देवता नहीं है; क्योंकि वे देवी समस्त प्रजाओंको संतप्त देख नौ दिनोंतक रोती रह गयी थीं।

(अध्याय ५०)


६२२
* संक्षिप्त शिवपुराण *

देवीके क्रियायोगका वर्णन—देवीकी मूर्ति एवं मन्दिरके निर्माण, स्थापन और पूजनका महत्त्व, परा अम्बाकी श्रेष्ठता, विभिन्न मासों और तिथियोंमें देवीके व्रत, उत्सव और पूजन आदिके फल तथा इस संहिताके श्रवण एवं पाठकी महिमा

व्यासजी बोले—महामते, ब्रह्मपुत्र, सर्वज्ञ सनत्कुमार! मैं उमाके परम अद्भुत क्रिया-योगका वर्णन सुनना चाहता हूँ। उस क्रियायोगका लक्षण क्या है? उसका अनुष्ठान करनेपर किस फलकी प्राप्ति होती है तथा जो परा अम्बा उमाको अधिक प्रिय है, वह क्रियायोग क्या है? ये सब बातें मुझे बताइये।

सनत्कुमारजीने कहा—महाबुद्धिमान् द्वैपायन! तुम जिस रहस्यकी बात पूछ रहे हो, वह सब मैं बताता हूँ; ध्यान देकर सुनो। ज्ञानयोग, क्रियायोग, भक्तियोग—ये श्रीमाताकी उपासनाके तीन मार्ग कहे गये हैं, जो भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। चित्तका जो आत्माके साथ संयोग होता है, उसका नाम ‘ज्ञानयोग’ है; उसका बाह्य वस्तुओंके साथ जो संयोग होता है, उसे ‘क्रियायोग’ कहते हैं। देवीके साथ आत्माकी एकताकी भावनाको भक्तियोग माना गया है। तीनों योगोंमें जो क्रियायोग है, उसका प्रतिपादन किया जाता है। कर्मसे भक्ति उत्पन्न होती है, भक्तिसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे मुक्ति होती है—ऐसा शास्त्रोंमें निश्चय किया गया है। मुनिश्रेष्ठ! मोक्षका प्रधान कारण योग है, परंतु योगके ध्येयका उत्तम साधन क्रियायोग है। प्रकृतिको माया जाने और सनातन ब्रह्मको मायावी अथवा मायाका स्वामी समझे। उन दोनोंके स्वरूपको एक-दूसरेसे अभिन्न जानकर मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।*

कालीनन्दन! जो मनुष्य देवीके लिये पत्थर, लकड़ी अथवा मिट्टीका मन्दिर बनाता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो। प्रतिदिन योगके द्वारा आराधना करनेवालेको जिस महान् फलकी प्राप्ति होती है, वह सारा फल उस पुरुषको मिल जाता है, जो देवीके लिये मन्दिर बनवाता है। श्रीमाताका मन्दिर बनवानेवाला धर्मात्मा पुरुष अपनी पहले बीती हुई तथा आगे आनेवाली हजार-हजार पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। करोड़ों जन्मोंमें किये हुए थोड़े या बहुत जो पाप शेष रहते हैं, वे श्रीमाताके मन्दिरका निर्माण आरम्भ करते ही क्षणभरमें नष्ट हो जाते हैं। जैसे नदियोंमें गंगा, सम्पूर्ण नदोंमें शोणभद्र, क्षमामें पृथ्वी, गहराईमें समुद्र और समस्त ग्रहोंमें सूर्यदेवका विशिष्ट स्थान है, उसी प्रकार समस्त देवताओंमें श्रीपरा अम्बा श्रेष्ठ मानी गयी हैं। वे समस्त देवताओंमें मुख्य हैं। जो उनके लिये मन्दिर बनवाता है, वह जन्म-जन्ममें प्रतिष्ठा पाता है। काशी, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, पुष्कर, गंगासागर-तट, नैमिषारण्य, अमरकण्टक-


* मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायावि ब्रह्म शाश्वतम्। अभिन्नं तद्वपुर्ज्ञात्वा मुच्यते भवबन्धनात्॥
(शि० पु० उ० सं० ५१। १२)

* उमासंहिता * ६२३

पर्वत, परम पुण्यमय श्रीपर्वत, ज्ञानपर्वत, गोकर्ण, मथुरा, अयोध्या और द्वारका इत्यादि पुण्य प्रदेशोंमें अथवा जिस किसी भी स्थानमें माताका मन्दिर बनवानेवाला मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। मन्दिरमें ईंटोंका जोड़ जबतक या जितने वर्ष रहता है, उतने हजार वर्षोंतक वह पुरुष मणिद्वीपमें प्रतिष्ठित होता है। जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न उमाकी प्रतिमा बनवाता है, वह निर्भय होकर अवश्य उनके परम धाममें जाता है। शुभ ऋतु, शुभ ग्रह और शुभ नक्षत्रमें देवीकी मूर्तिकी स्थापना करके योगमायाके प्रसादसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। कल्पके आरम्भसे लेकर अन्ततक कुलमें जितनी पीढ़ियाँ बीत गयी हैं और जितनी आनेवाली हैं, उन सबको मनुष्य सुन्दर देवीमूर्तिकी स्थापना करके तार देता है।

जो केवल जगद्योनि परा अम्बाकी शरण लेते हैं, उन्हें मनुष्य नहीं मानना चाहिये। वे साक्षात् देवीके गण हैं। जो चलते-फिरते, सोते-जागते अथवा खड़े होते समय 'उमा' इस दो अक्षरके नामका उच्चारण करते हैं, वे शिवाके ही गण हैं। जो नित्य-नैमित्तिक कर्ममें पुष्प, धूप और दीपोंद्वारा देवी परा शिवाका पूजन करते हैं, वे शिवाके धाममें जाते हैं। जो प्रतिदिन गोबर या मिट्टीसे देवीके मन्दिरको लीपते हैं अथवा उसमें झाडू देते हैं, वे भी उमाके धाममें जाते हैं। जिन्होंने देवीके परम उत्तम एवं रमणीय मन्दिरका निर्माण कराया है, उनके कुलके लोगोंको माता उमा सदा आशीर्वाद देती हैं। वे कहती हैं, 'ये लोग मेरे हैं। अतः मुझमें प्रेमके भागी बने रहकर सौ वर्षोंतक जीयें और इनपर कभी कोई आपत्ति न आये।' इस प्रकार श्रीमाता रात-दिन आशीर्वाद देती हैं। जिसने महादेवी उमाकी शुभ मूर्तिका निर्माण कराया है, उसके कुलके दस हजार पीढ़ियोंतकके लोग मणिद्वीपमें सम्मानपूर्वक रहते हैं। महामायाकी मूर्तिको स्थापित करके उसकी भलीभाँति पूजा करनेके पश्चात् साधक जिस-जिस मनोरथके लिये प्रार्थना करता है, उस-उसको अवश्य प्राप्त कर लेता है।

जो श्रीमाताकी स्थापित की हुई उत्तम मूर्तिको मधुमिश्रित घीसे नहलाता है, उसके पुण्यफलकी गणना कौन कर सकता है? चन्दन, अगुरु, कपूर, जटामांसी तथा नागरमोथा आदिसे युक्त जल तथा एक रंगकी गौओंके दूधसे परमेश्वरीको नहलाये। तत्पश्चात् अष्टादशांगधूपके द्वारा अग्निमें उत्तम आहुति दे तथा घृत और कर्पूरसहित बत्तियोंद्वारा देवीकी आरती उतारे। कृष्णपक्षकी अष्टमी, नवमी, अमावास्यामें अथवा शुक्लपक्षकी पंचमी और दशमी तिथियोंमें गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा जगदम्बाकी विशेष पूजा करनी चाहिये। रात्रिसूक्त, श्रीसूक्त अथवा देवीसूक्तको पढ़ते या मूलमन्त्रका जप करते हुए देवीकी आराधना करनी चाहिये। विष्णुक्रान्ता और तुलसीको छोड़कर शेष सभी पुष्प देवीके लिये प्रीतिकारक जानने चाहिये। कमलका पुष्प उनके लिये विशेष प्रीतिकारक होता है। जो देवीको सोने-चाँदीके फूल चढ़ाता है, वह करोड़ों सिद्धोंसे युक्त उनके परम धाममें जाता है। देवीके उपासकोंको पूजनके अन्तमें सदा अपने अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करनी चाहिये। 'जगत्‌को आनन्द

६२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

प्रदान करनेवाली परमेश्वरि ! प्रसन्न होओ।' इत्यादि वाक्योंद्वारा स्तुति एवं मन्त्रपाठ करता हुआ देवीके भजनमें लगा रहनेवाला उपासक उनका इस प्रकार ध्यान करे। देवी सिंहपर सवार हैं। उनके हाथोंमें अभय एवं वरकी मुद्राएँ हैं तथा वे भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली हैं। इस प्रकार महेश्वरीका ध्यान करके उन्हें नैवेद्यके रूपमें नाना प्रकारके पके हुए फल अर्पित करे। जो परात्मा शम्भुशक्तिका नैवेद्य भक्षण करता है; वह मनुष्य अपने सारे पापपंकको धोकर निर्मल हो जाता है। जो चैत्र शुक्ला तृतीयाको भवानीकी प्रसन्नताके लिये व्रत करता है, वह जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो परमपदको प्राप्त होता है। विद्वान् पुरुष इसी तृतीयाको दोलोत्सव करे। उसमें शंकर-सहित जगदम्बा उमाकी पूजा करे। फूल, कुंकुम, वस्त्र, कपूर, अगुरु, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पहार तथा अन्य गन्ध-द्रव्योंद्वारा शिवसहित सर्वकल्याणकारिणी महामाया महेश्वरी श्रीगौरीदेवीका पूजन करके उन्हें झूलेमें झुलाये। जो प्रतिवर्ष नियमपूर्वक उक्त तिथिको देवीका व्रत और दोलोत्सव करता है, उसे शिवादेवी सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थ देती हैं।

वैशाखमासके शुक्लपक्षमें जो अक्षय तृतीया तिथि आती है, उसमें आलस्यरहित हो जो जगदम्बाका व्रत करता है तथा बेला, मालती, चम्पा, जपा (अढ़उल), बन्धूक (दुपहरिया) और कमलके फूलोंसे शंकरसहित गौरीदेवीकी पूजा करता है, वह करोड़ों जन्मोंमें किये गये मानसिक, वाचिक और शारीरिक पापोंका नाश करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको अक्षयरूपमें प्राप्त करता है।

ज्येष्ठ शुक्ला तृतीयाको व्रत करके जो अत्यन्त प्रसन्नताके साथ महेश्वरीका पूजन करता है, उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं होता। आषाढ़के शुक्लपक्षकी तृतीयाको अपने वैभवके अनुसार रथोत्सव करे। यह उत्सव देवीको अत्यन्त प्रिय है। पृथ्वीको रथ समझे, चन्द्रमा और सूर्यको उसके पहिये जाने, वेदोंको घोड़े और ब्रह्माजीको सारथि माने। इस भावनासे मणिजटित रथकी कल्पना करके उसे पुष्पमालाओंसे सुशोभित करे। फिर उसके भीतर शिवादेवीको विराजमान करे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष यह भावना करे कि परा अम्बा उमादेवी सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षाके लिये उसकी देखभाल करनेके निमित्त रथके भीतर बैठी हैं। जब रथ धीरे-धीरे चले, तब जय-जयकार करते हुए प्रार्थना करे—'देवि ! दीनवत्सले ! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये। (पाहि देवि जनान्स्मान् प्रपन्नान् दीनवत्सले ।') इन वाक्योंद्वारा देवीको संतुष्ट करे और यात्राके समय नाना प्रकारके बाजे बजवाये। ग्राम या नगरकी सीमाके अन्ततक रथको ले जाकर वहाँ उस रथपर देवीकी पूजा करे और नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करके फिर उन्हें वहाँसे अपने घर ले आये। तदनन्तर सैकड़ों बार प्रणाम करके जगदम्बासे प्रार्थना करे। जो विद्वान् इस प्रकार देवीका पूजन, व्रत एवं रथोत्सव

* उमासंहिता * ६२५

करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें देवीके धामको जाता है।

श्रावण और भाद्रपदमासकी शुक्ला तृतीयाको जो विधिपूर्वक अम्बाका व्रत और पूजन करता है, वह इस लोकमें पुत्र, पौत्र एवं धन आदिसे सम्पन्न होकर सुख भोगता है तथा अन्तमें सब लोकोंसे ऊपर विराजमान उमालोकमें जाता है।

आश्विनमासके शुक्लपक्षमें नवरात्रव्रत करना चाहिये। उसके करनेपर सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो ही जाती हैं, इसमें संशय नहीं है। इस नवरात्र-व्रतके प्रभावका वर्णन करनेमें चतुरानन ब्रह्मा, पंचानन महादेव तथा षडानन कार्तिकेय भी समर्थ नहीं हैं; फिर दूसरा कौन समर्थ हो सकता है। मुनि-श्रेष्ठ! नवरात्र-व्रतका अनुष्ठान करके विरथके पुत्र राजा सुरथने अपने खोये हुए राज्यको प्राप्त कर लिया। अयोध्याके बुद्धिमान् नरेश ध्रुवसंधिकुमार सुदर्शनने इस नवरात्रके प्रभावसे ही राज्य प्राप्त किया, जो पहले उनके हाथसे छिन गया था। इस व्रतराजका अनुष्ठान और महेश्वरीकी आराधना करके समाधि वैश्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो मोक्षके भागी हुए थे। जो मनुष्य आश्विनमासके शुक्लपक्षमें विधिपूर्वक व्रत करके तृतीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशी तिथियोंको देवीका पूजन करता है, देवी शिवा निरन्तर उसके सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथकी पूर्ति करती रहती हैं। जो कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुनमासके शुक्लपक्षमें तृतीयाको व्रत करता तथा लाल कनेर आदिके फूलों एवं सुगन्धित धूपोंसे मंगलमयी देवीकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मंगलको प्राप्त कर लेता है। स्त्रियोंको अपने सौभाग्यकी प्राप्ति एवं रक्षाके लिये सदा इस महान् व्रतका आचरण करना चाहिये तथा पुरुषोंको भी विद्या, धन एवं पुत्रकी प्राप्तिके लिये इसका अनुष्ठान करना चाहिये। इनके सिवा अन्य भी जो देवीको प्रिय लगनेवाले उमा-महेश्वर आदिके व्रत हैं, मुमुक्षु पुरुषोंको उनका भक्तिभावसे आचरण करना चाहिये।

यह उमासंहिता परम पुण्यमयी तथा शिवभक्तिको बढ़ानेवाली है। इसमें नाना प्रकारके उपाख्यान हैं। यह कल्याणमयी संहिता भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली है। जो इसे भक्तिभावसे सुनता या एकाग्रचित्त होकर सुनाता अथवा पढ़ता या पढ़ाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। जिसके घरमें सुन्दर अक्षरोंमें लिखी गयी यह संहिता विधिवत् पूजित होती है, वह सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लेता है। उसे भूत, प्रेत और पिशाचादि दुष्टोंसे कभी भय नहीं होता। वह पुत्र-पौत्र आदि सम्पत्तिको अवश्य पाता है, इसमें संशय नहीं है। अतः शिवाकी भक्ति चाहनेवाले पुरुषोंको सदा इस परम पुण्यमयी रमणीय उमासंहिताका श्रवण एवं पाठ करना चाहिये।

(अध्याय ५१)

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॥ उमासंहिता सम्पूर्ण ॥
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कैलाससंहिता

कैलाससंहिता

ऋषियोंका सूतजीसे तथा वामदेवजीका स्कन्दसे प्रश्न—प्रणवार्थ-निरूपणके लिये अनुरोध

नमः शिवाय साम्बाय सगणाय ससूनवे।
प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तहेतवे॥

जो प्रधान (प्रकृति) और पुरुषके नियन्ता तथा सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं, उन पार्वतीसहित शिवको उनके पार्षदों और पुत्रोंके साथ प्रणाम है।

ऋषि बोले—सूतजी! हमने अनेक आख्यानोंसे युक्त परम मनोहर उमासंहिता सुनी। अब आप शिवतत्त्वका ज्ञान बढ़ानेवाली कैलाससंहिताका वर्णन कीजिये।

व्यासजीने कहा—पुत्रो! शिवतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली दिव्य कैलास-संहिताका वर्णन करता हूँ, तुम प्रेमपूर्वक सुनो। तुम्हारे प्रति स्नेह होनेके कारण ही मैं तुम्हें यह प्रसंग सुना रहा हूँ।

इतना कहकर व्यासजीने काशीमें मुनियोंके तथा सूतजीके संवाद, व्यास-मुनि-संवाद, शिव-पार्वती-संवाद, शिवजीके द्वारा पार्वतीके प्रति संन्यास-पद्धति, संन्यासाचार, संन्यास-मण्डल, संन्यास-पद्धतिन्यास, वर्णपूजन, प्रणवार्थ-पद्धति आदि प्रसंगोंका वर्णन करके पुनः ऋषिगण तथा सूतजीके मिलन एवं संवादकी अवतारणा करते हुए सूतजीके प्रति ऋषियोंके प्रश्नका यों वर्णन किया।

ऋषि बोले—महाभाग सूतजी! आप हमारे श्रेष्ठ गुरु हैं। अतः यदि आपका हमपर अनुग्रह हो तो हम आपसे एक प्रश्न पूछते हैं। श्रद्धालु शिष्योंपर आप-जैसे गुरुजन सदा स्नेह रखते हैं, इस बातको आपने इस समय हमें प्रत्यक्ष दिखा दिया। मुने! विरजाहोमके समय पहले आपने जो वामदेवका मत सूचित किया था, उसे हमने विस्तारपूर्वक नहीं सुना। अब हम बड़े आदर और श्रद्धाके साथ उसे सुनना चाहते हैं। कृपासिन्धो! आप प्रसन्नतापूर्वक उसका वर्णन करें।

ऋषियोंकी यह बात सुनकर सूतके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने गुरुके भी परम उत्कृष्ट गुरु महादेवजीको, त्रिभुवन-जननी महादेवी उमाको तथा गुरु व्यासको भी भक्तिपूर्वक नमस्कार करके मुनियोंको आह्लादित करते हुए गम्भीर वाणीमें इस प्रकार कहा।

सूतजी बोले—मुनियो! तुम्हारा कल्याण हो, तुम सब लोग सदा सुखी रहो। महाभाग महात्माओ! तुम भगवान् शिवके

* कैलाससंहिता * ६२७

भक्त तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करने- वाले हो, यह निश्चितरूपसे जानकर ही मैं तुम लोगोंके समक्ष इस विषयका प्रसन्नता- पूर्वक वर्णन करता हूँ। ध्यान देकर सुनो। पूर्वकालके रथन्तर कल्पमें महामुनि वामदेव माताके गर्भसे बाहर निकलते ही शिवतत्त्वके ज्ञाताओंमें सर्वश्रेष्ठ माने जाने लगे। वे वेदों, आगमों, पुराणों तथा अन्य सब शास्त्रोंके भी तात्त्विक अर्थको जाननेवाले थे। देवता, असुर तथा मनुष्य आदि जीवोंके जन्म- कर्मोंका उन्हें भलीभाँति ज्ञान था। उनका सम्पूर्ण अंग भस्म लगानेसे उज्ज्वल दिखायी देता था। उनके मस्तकपर जटाओंका समूह शोभा देता था। वे किसीके आश्रित नहीं थे। उनके मनमें किसी वस्तुकी इच्छा नहीं थी। वे शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे परे तथा अहंकारशून्य थे। वे दिगम्बर महाज्ञानी महात्मा दूसरे महेश्वरके समान जान पड़ते थे। उन्हींके-जैसे स्वभाववाले बड़े-बड़े मुनि शिष्य होकर उन्हें घेरे रहते थे। वे अपने चरणोंके स्पर्शजनित पुण्यसे इस पृथ्वीको पवित्र करते हुए सब ओर विचरते और अपने चित्तको निरन्तर परमधामस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें लगाये रहते थे। इस तरह घूमते हुए वामदेवजीने मेरुके दक्षिण शिखर— कुमारशृंगमें प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया, जहाँ मयूरवाहन शिवकुमार, ज्ञानमय शक्ति धारण करनेवाले, समस्त असुरोंके नाशक और सर्वदेव-वन्दित भगवान् स्कन्द रहते थे। उनके साथ उनकी शक्तिभूता 'गजावल्ली' भी थीं। वहीं स्कन्दसरके नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर था, जो समुद्रके समान अगाध एवं विशाल दिखायी देता था। उसका जल ठंडा और स्वादिष्टथा। वह सरोवर स्वच्छ, अगाध एवं बहुत जलराशिसे पूर्ण था। उसमें सम्पूर्ण आश्चर्यजनक गुण विद्यमान थे। वह जलाशय स्कन्दस्वामीके समीप ही था। महामुनि वामदेवने शिष्योंके साथ उसमें स्नान करके शिखरपर बैठे हुए मुनिवृन्द- सेवित कुमारका दर्शन किया। वे उगते हुए सूर्यके समान तेजस्वी थे। मोर उनका श्रेष्ठ वाहन था। उनके चार भुजाएँ थीं। सभी अंगोंसे उदारता सूचित होती थी। मुकुट आदि उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। रत्नभूत दो शक्तियाँ उनकी उपासना करती थीं। उन्होंने अपने चार हाथोंमें क्रमशः शक्ति, कुक्कुट, वर और अभय धारण कर रखे थे। स्कन्दका दर्शन और पूजन करके उन मुनीश्वरने बड़ी भक्तिसे उनका स्तवन आरम्भ किया।

वामदेव बोले—जो प्रणवके वाच्यार्थ, प्रणवार्थके प्रतिपादक, प्रणवाक्षररूप बीजसे युक्त तथा प्रणवरूप हैं, उन आप स्वामी कार्तिकेयको बारंबार नमस्कार है। वेदान्तके अर्थभूत ब्रह्म ही जिनका स्वरूप है, जो वेदान्तका अर्थ करते हैं, वेदान्तके अर्थको जानते हैं और नित्य विदित हैं, उन स्कन्दस्वामीको बारंबार नमस्कार है। समस्त प्राणियोंकी हृदयगुफामें प्रतिष्ठित गुहको नमस्कार है। जो स्वयं गुह्य हैं, जिनका रूप गुह्य है तथा जो गुह्य शास्त्रोंके ज्ञाता हैं, उन स्वामी कार्तिकेयको नमस्कार है। प्रभो! आप अणुसे भी अत्यन्त अणु और महान्‌से भी परम महान् हैं, कारण और कार्य अथवा भूत और भविष्यके भी ज्ञाता हैं। आप परमात्मस्वरूपको नमस्कार है। आप स्कन्द (माताके गर्भसे च्युत) हैं। स्कन्दन (गर्भसे

६२८
* संक्षिप्त शिवपुराण *

स्खलन) ही आपका रूप है। आप सूर्य और अरुणके समान तेजस्वी हैं। पारिजातकी मालासे सुशोभित, मुकुट आदि धारण करनेवाले आप स्कन्दस्वामीको सदा नमस्कार है। आप शिवके शिष्य और पुत्र हैं, शिव (कल्याण) देनेवाले हैं, शिवको प्रिय हैं तथा शिवा और शिवके लिये आनन्दकी निधि हैं। आपको नमस्कार है। आप गंगाजीके बालक, कृत्तिकाओंके कुमार, भगवती उमाके पुत्र तथा सरकंडोंके वनमें शयन करनेवाले हैं। आप महाबुद्धिमान् देवताको नमस्कार है। षडक्षरमन्त्र आपका शरीर है। आप छह प्रकारके अर्थका विधान करनेवाले हैं। आपका रूप छह मार्गोंसे परे है। आप षडाननको बारंबार नमस्कार है। द्वादशात्मन्! आपके बारह विशाल नेत्र और बारह उठी हुई भुजाएँ हैं। उन भुजाओंमें आप बारह आयुध धारण करते हैं। आपको नमस्कार है। आप चतुर्भुजरूपधारी, शान्त तथा चारों भुजाओंमें क्रमशः शक्ति, कुक्कुट, वर और अभय धारण करते हैं। आप असुरविदारण देवको नमस्कार है। आपका वक्षःस्थल गजावल्लीके कुचोंमें लगे हुए कुंकुमसे अंकित है। अपने छोटे भाई गणेशजीकी आनन्दमयी महिमा सुनकर आप मन-ही-मन आनन्दित होते हैं। आपको नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवता, मुनि और किंनरगणोंसे गायी जानेवाली गाथाविशेषके द्वारा जिनके पवित्र कीर्तिधामका चिन्तन किया जाता है, उन आप स्कन्दको नमस्कार है। देवताओंके निर्मल किरीटको विभूषित करनेवाली पुष्प-मालाओंसे आपके मनोहर चरणारविन्दोंकी पूजा की जाती है। आपको नमस्कार है। जो वामदेवद्वारा वर्णित इस दिव्य स्कन्दस्तोत्रका पाठ या श्रवण करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। यह स्तोत्र बुद्धिको बढ़ानेवाला, शिवभक्तिकी वृद्धि करनेवाला, आयु, आरोग्य तथा धनकी प्राप्ति करानेवाला और सदा सम्पूर्ण अभीष्टको देनेवाला है।*

वामदेवने इस प्रकार देवसेनापति भगवान् स्कन्दकी स्तुति करके तीन बार


* वामदेव उवाच—
ॐ नमः प्रणवार्थाय प्रणवार्थविधायिने। प्रणवाक्षरबीजाय प्रणवाय नमो नमः॥
वेदान्तार्थस्वरूपाय वेदान्तार्थविधायिने। वेदान्तार्थविदे नित्यं विदिताय नमो नमः॥
नमो गुहाय भूतानां गुहासु निहिताय च। गुह्याय गुह्यरूपाय गुह्यागमविदे नमः॥
अणोरणीयसे तुभ्यं महतोऽपि महीयसे। नमः परावरज्ञाय परमात्मस्वरूपिणे॥
स्कन्दाय स्कन्दरूपाय मिहिरारुणतेजसे। नमो मन्दारमालोद्यन्मुकुटादिभृते सदा॥
शिवशिष्याय पुत्राय शिवस्य शिवदायिने। शिवप्रियाय शिवयोरानन्दनिधये नमः॥
गाङ्गेयाय नमस्तुभ्यं कार्तिकेयाय धीमते। उमापुत्राय महते शरकाननशायिने॥
षडक्षरशरीराय षड्विधार्थविधायिने। षडध्वातीतरूपाय षण्मुखाय नमो नमः॥
द्वादशायतनेत्राय द्वादशोद्यतबाहवे। द्वादशायुधधराय द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥
चतुर्भुजाय शान्ताय शक्तिकुक्कुटधारिणे। वरदाभयहस्ताय नमोऽसुरविदारिणे॥
गजावल्लीकुचालिप्तकुङ्कुमाङ्कितवक्षसे। नमो गजाननानन्दमहिमानन्दितात्मने॥

* कैलाससंहिता *
६२९

उनकी परिक्रमा की और पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर नतमस्तक हो बारंबार साष्टांग प्रणाम और परिक्रमा करनेके अनन्तर वे विनीतभावसे उनके पास खड़े हो गये। वामदेवजीके द्वारा किये गये इस परमार्थपूर्ण स्तोत्रको सुनकर महेश्वरपुत्र भगवान् स्कन्द बड़े प्रसन्न हुए। उस समय वे महासेन वामदेवजीसे बोले—'मुने! मैं तुम्हारी की हुई पूजा, स्तुति और भक्तिसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। आज मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ? तुम योगियोंमें प्रधान, सर्वथा परिपूर्ण और निःस्पृह हो। इस जगत्में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसके लिये तुम-जैसे वीतराग महर्षि याचना करें; तथापि धर्मकी रक्षा और सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये तुम-जैसे साधु-संत भूतलपर विचरते रहते हैं। ब्रह्मन्! यदि इस समय मुझसे कुछ सुनना हो तो कहो; मैं लोकपर अनुग्रह करनेके लिये उस विषयका वर्णन करूँगा।'

स्कन्दकी वह बात सुनकर महामुनि वामदेवने विनयावनत हो मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा।

वामदेव बोले—भगवन्! आप परमेश्वर हैं। अलौकिक और लौकिक—सब प्रकारकी विभूतियोंके दाता हैं। सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सम्पूर्ण शक्तियोंको धारण करनेवाले और सबके स्वामी हैं। हम साधारण जीव हैं। आप परमेश्वरके समीप बोलनेकी शक्ति या बात करनेकी योग्यता हममें नहीं है; तथापि यह आपका अनुग्रह है कि आप मुझसे बात करते हैं। महाप्राज्ञ! मैं कृतार्थ हूँ। कणमात्र विज्ञानसे प्रेरित हो आपके समक्ष अपना प्रश्न रख रहा हूँ। मेरे इस अपराधको आप क्षमा करेंगे! प्रणव सबसे उत्तम मन्त्र है। वह साक्षात् परमेश्वरका वाचक है। पशुओं (जीवों)-के पाश (बन्धन)-को छुड़ानेवाले भगवान् पशुपति ही उसके वाच्यार्थ हैं। 'ओमितीदं सर्वम्' (तै० उ० १।८।१)—ओंकार ही यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला समस्त जगत् है, यह सनातन श्रुतिका कथन है। 'ओमिति ब्रह्म' (तै० उ० १।८।१) अर्थात् 'ॐ यह ब्रह्म है' तथा 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म' (माण्डू० २)—'यह सब-का-सब ब्रह्म ही है।' इत्यादि बातें भी श्रुतियोंद्वारा कही गयी हैं। इस प्रकार मैंने समष्टि तथा व्यष्टिभावसे प्रणवार्थका श्रवण किया है। तात्पर्य यह है कि समष्टि और व्यष्टि—सभी पदार्थ प्रणवके ही अर्थ हैं, प्रणवके द्वारा सबका प्रतिपादन होता है—यह बात मैंने सुन रखी है। महासेन! मुझे कभी आप-जैसा गुरु नहीं मिला है, अतः कृपा करके आप प्रणवके अर्थका प्रतिपादन कीजिये। उपदेशकी विधिसे तथा सदाचारपरम्पराको ध्यानमें रखकर आप हमें प्रणवार्थका उपदेश दें।

मुनिके इस प्रकार पूछनेपर स्कन्दने प्रणवस्वरूप, अड़तीस श्रेष्ठ कलाओंद्वारा


ब्रह्मादिदेवमुनिकिन्नरगीयमानगाथाविशेषशुचिचिन्तितकीर्तिधाम्ने। वृन्दारकामलकिरीटविभूषणस्रक्पूज्याभिरामपदपङ्कज ते नमोऽस्तु॥
इति स्कन्दस्तवं दिव्यं वामदेवेन भाषितम्। यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिम्॥
महाप्रज्ञाकरं ह्येतच्छिवभक्तिविवर्धनम्। आयुरारोग्यधनकृत्सर्वकामप्रदं सदा॥
(शि० पु० कै० सं० ११। २२–३५)

६३०* संक्षिप्त शिवपुराण *

लक्षित तथा सदा पार्श्वभागमें उमाको साथ रखनेवाले और मुनिवरोंसे घिरे हुए भगवान् सदाशिवको प्रणाम करके उस श्रेयका वर्णन आरम्भ किया, जिसे श्रुतियोंने भी छिपा रखा है।
(अध्याय १–११)


प्रणवके वाच्यार्थरूप सदाशिवके स्वरूपका ध्यान, वर्णाश्रम-धर्मके पालनका महत्त्व, ज्ञानमयी पूजा, संन्यासके पूर्वांगभूत नान्दीश्राद्ध एवं ब्रह्मयज्ञ आदिका वर्णन

श्रीस्कन्दने कहा—महाभाग मुनीश्वर वामदेव! तुम्हें साधुवाद है; क्योंकि तुम भगवान् शिवके अत्यन्त भक्त हो और शिवतत्त्वके ज्ञाताओंमें सबसे श्रेष्ठ हो। तीनों लोकोंमें कहीं कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो। तथापि तुम लोकपर अनुग्रह करनेवाले हो, इसलिये तुम्हारे समक्ष इस विषयका वर्णन करूँगा। इस लोकमें जितने जीव हैं, वे सब नाना प्रकारके शास्त्रोंसे मोहित हैं। परमेश्वरकी अति विचित्र मायाने उन्हें परमार्थसे वंचित कर दिया है। अतः प्रणवके वाच्यार्थभूत साक्षात् महेश्वरको वे नहीं जानते। वे महेश्वर ही सगुण-निर्गुण तथा त्रिदेवोंके जनक परब्रह्म परमात्मा हैं। मैं अपना दाहिना हाथ उठाकर तुमसे शपथपूर्वक कहता हूँ कि यह सत्य है, सत्य है, सत्य है। मैं बारंबार इस सत्यको दोहराता हूँ कि प्रणवके अर्थ साक्षात् शिव ही हैं। श्रुतियों, स्मृति-शास्त्रों, पुराणों तथा आगमोंमें प्रधानतया उन्हींको प्रणवका वाच्यार्थ बताया गया है। जहाँसे मनसहित वाणी उस परमेश्वरको न पाकर लौट आती है, जिसके आनन्दका अनुभव करनेवाला पुरुष किसीसे डरता नहीं, ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रसहित यह सम्पूर्ण जगत् भूतों और इन्द्रियसमुदायके साथ सर्वप्रथम जिससे प्रकट होता है, जो परमात्मा स्वयं किसीसे और कभी भी उत्पन्न नहीं होता, जिसके निकट विद्युत्, सूर्य और चन्द्रमाका प्रकाश काम नहीं देता तथा जिसके प्रकाशसे ही यह सम्पूर्ण जगत् सब ओरसे प्रकाशित होता है, वह परब्रह्म परमात्मा सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके कारण स्वयं ही सर्वेश्वर ‘शिव’ नाम धारण करता है।* हृदयाकाशके भीतर विराजमान जो भगवान् शम्भु मुमुक्षु पुरुषोंके ध्येय हैं, जो सर्वव्यापी प्रकाशात्मा, भासस्वरूप एवं चिन्मय हैं, जिन परम पुरुषकी पराशक्ति शिवा भक्तिभावसे सुलभ मनोहरा, निर्गुण, अपने गुणोंसे ही निगूढ़ और निष्कल हैं, उन परमेश्वरके तीन रूप


* यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं यस्य वै विद्वान्न बिभेति कुतश्चन॥
यस्माज्जगदिदं सर्वं विधिविष्ण्विन्द्रपूर्वकम्। सह भूतेन्द्रियग्रामैः प्रथमं सम्प्रसूयते॥
न सम्प्रसूयते यो वै कुतश्चन कदाचन। यस्मिन्न भासते विद्युन्न च सूर्यो न चन्द्रमाः॥
यस्य भासो विभातीदं जगत् सर्वं समन्ततः। सर्वैश्वर्येण सम्पन्नो नाम्ना सर्वेश्वरः स्वयम्॥
(शि० पु० कै० सं० १२। ७–१०)

* कैलाससंहिता * ६३१

हैं—स्थूल, सूक्ष्म और इन दोनोंसे परे। मुने! मुमुक्षु योगियोंको नित्य क्रमशः उनके इन स्वरूपोंका ध्यान करना चाहिये। वे शम्भु निष्कल, सम्पूर्ण देवताओंके सनातन आदिदेव, ज्ञान-क्रिया-स्वभाव एवं परमात्मा कहे जाते हैं, उन देवाधिदेवकी साक्षात् मूर्ति सदाशिव हैं। ईशानादि पाँच मन्त्र उनके शरीर हैं। वे महादेवजी पंचकला रूप हैं। उनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल है। वे सदा प्रसन्न रहनेवाले तथा शीतल आभासे युक्त हैं। उन प्रभुके पाँच मुख, दस भुजाएँ और पंद्रह नेत्र हैं। ‘ईशान’ मन्त्र उनका मुकुतमण्डित मस्तक है! ‘तत्पुरुष’ मन्त्र उन पुरातन प्रभुका मुख है। ‘अघोर’ मन्त्र हृदय है। ‘वामदेव’ मन्त्र गुह्य प्रदेश है तथा ‘सद्योजात’ मन्त्र उनके पैर हैं। इस प्रकार वे पंचमन्त्र रूप हैं। वे ही साक्षात् साकार और निराकार परमात्मा हैं। सर्वज्ञता आदि छः शक्तियाँ उनके शरीरके छः अंग हैं। वे शब्दादि शक्तियोंसे स्फुरित हृदय-कमलके द्वारा सुशोभित हैं। वामभागमें मनोन्मनी नामक अपनी शक्तिसे विभूषित हैं।

अब मैं मन्त्र आदि छः प्रकारके अर्थोंको प्रकट करनेके लिये जो अर्थोपन्यासकी पद्धति है, उसके द्वारा प्रणवके समष्टि और व्यष्टिसम्बन्धी भावार्थका वर्णन करूँगा; परंतु पहले उपदेशका क्रम बताना उचित है, इसलिये उसीको सुनो। मुने! इस मानवलोकमें चार वर्ण प्रसिद्ध हैं। उनमेंसे जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन वर्ण हैं; उन्हींका वैदिक आचारसे सम्बन्ध है। त्रैवर्णिकोंकी सेवा ही जिनके लिये सारभूत धर्म है, उन शूद्रोंका वेदाध्ययनमें अधिकार नहीं है। यदि सब त्रैवर्णिक अपने-अपने आश्रम-धर्मके पालनमें हार्दिक अनुरागके साथ लगे हों तो उनका ही श्रुतियों और स्मृतियोंमें प्रतिपादित धर्मके अनुष्ठानमें अधिकार है, दूसरेका कदापि नहीं। श्रुति और स्मृतिमें प्रतिपादित कर्मका अनुष्ठान करनेवाला पुरुष अवश्य सिद्धिको प्राप्त होगा, यह बात वेदोक्तमार्गको दिखानेवाले परमेश्वरने स्वयं कही है। वर्णधर्म और आश्रम-धर्मके पालनजनित पुण्यसे परमेश्वरका पूजन करके बहुत-से श्रेष्ठ मुनि उनके सायुज्यको प्राप्त हो गये हैं। ब्रह्मचर्यके पालनसे ऋषियोंकी, यज्ञकर्मोंके अनुष्ठानसे देवताओंकी तथा संतानोत्पादनसे पितरोंकी तृप्ति होती है—ऐसा श्रुतिने कहा है। इस प्रकार ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा पितृ-ऋण—इन तीनोंसे मुक्त हो वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट होकर मनुष्य शीत, उष्ण तथा सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंको सहन करते हुए जितेन्द्रिय, तपस्वी और मिताहारी हो यम-नियम आदि योगका अभ्यास करे, जिससे बुद्धि निश्चल तथा अत्यन्त दृढ़ हो जाय। इस प्रकार क्रमशः अभ्यास करके शुद्धचित्त हुआ पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका संन्यास कर दे। समस्त कर्मोंका संन्यास करनेके पश्चात् ज्ञानके समादरमें तत्पर रहे। ज्ञानके समादरको ही ज्ञानमयी पूजा कहते हैं। वह पूजा जीवकी साक्षात् शिवके साथ एकताका बोध कराकर जीवन्मुक्तिरूप फल देनेवाली है। यतियोंके लिये इस पूजाको सर्वोत्तम तथा निर्दोष समझना चाहिये। महाप्राज्ञ! तुमपर स्नेह होनेके कारण लोकानुग्रहकी कामनासे मैं उस पूजाकी विधि बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो।

६३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

साधकको चाहिये कि वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वार्थके ज्ञाता, वेदान्तज्ञानके पारंगत तथा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ आचार्यकी शरणमें जाय। उत्तम बुद्धिसे युक्त एवं चतुर साधक आचार्यके समीप जाकर विधिपूर्वक दण्ड-प्रणाम आदिके द्वारा उन्हें यत्नपूर्वक संतुष्ट करे। फिर गुरुकी आज्ञा ले वह बारह दिनोंतक केवल दूध पीकर रहे। तदनन्तर शुक्लपक्षकी चतुर्थी या दशमीको प्रातःकाल विधिवत् स्नानकर शुद्धचित्त हुआ विद्वान् साधक नित्य-कर्म करके गुरुको बुलाकर शास्त्रोक्त विधिसे नान्दीश्राद्ध करे। नान्दीश्राद्धमें विश्वेदेवोंकी संज्ञा सत्य और वसु बतायी गयी है। प्रथम देवश्राद्धमें नान्दीमुख-देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे गये हैं। दूसरे ऋषिश्राद्धमें उन्हें ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा राजर्षि कहा गया है। तीसरे दिव्य श्राद्धमें उनकी वसु, रुद्र और आदित्य संज्ञा बतायी गयी है। चौथे मनुष्यश्राद्धमें सनक$^१$ आदि चार मुनीश्वर ही नान्दीमुख-देवता हैं। पाँचवें भूत-श्राद्धमें पाँच महाभूत, नेत्र आदि ग्यारह इन्द्रियसमूह तथा जरायुज आदि चतुर्विध प्राणिसमुदाय नान्दीमुख माने गये हैं। छठे पितृश्राद्धमें पिता, पितामह और प्रपितामह—ये तीन नान्दीमुख-देवता हैं। सातवें मातृश्राद्धमें माता, पितामही और प्रपितामही—इन तीनोंको नान्दीमुख-देवता बताया गया है तथा आठवें आत्मश्राद्धमें आत्मा, पिता, पितामह और प्रपितामह—ये चार नान्दीमुखदेवता कहे गये हैं$^२$। मातामहात्मक श्राद्धमें मातामह, प्रमातामह और वृद्ध-प्रमातामह—ये तीन नान्दीमुख देवता सपत्नीक बताये गये हैं। प्रत्येक श्राद्धमें दो-दो ब्राह्मण करके जितने ब्राह्मण आवश्यक हों, उनको आमन्त्रित करे और स्वयं यत्नपूर्वक आचमन करके पवित्र हो उन ब्राह्मणोंके पैर धोये। उस समय इस प्रकार कहे—‘जो समस्त सम्पत्तिकी प्राप्तिमें कारण, आयी हुई आपत्तिके समूहको नष्ट करनेके लिये धूमकेतु (अग्नि)-रूप तथा अपार संसारसागरसे पार लगानेके लिये सेतुके समान हैं, वे ब्राह्मणोंकी चरणधूलियाँ मुझे पवित्र करें। जो आपत्तिरूपी घने अन्धकारको दूर करनेके लिये सूर्य, अभीष्ट अर्थको देनेके लिये कामधेनु तथा समस्त तीर्थोंके जलसे पवित्र मूर्तियाँ हैं, वे ब्राह्मणोंकी चरणधूलियाँ मेरी रक्षा करें।’$^३$

ऐसा कह पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर साष्टांग प्रणाम करे। तत्पश्चात् पूर्वाभिमुख बैठकर भगवान् शंकरके युगल चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए दृढ़तापूर्वक आसन ग्रहण करे। हाथमें पवित्री ले शुद्ध हो नूतन यज्ञोपवीत धारण कर तीन बार प्राणायाम करे। तदनन्तर तिथि आदिका स्मरण करके इस तरह संकल्प करे—‘मेरे संन्यासका अंगभूत जो पहले विश्वेदेवका पूजन, फिर देवादि अष्टविधि श्राद्ध तथा अन्तमें


१-सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार।
२-धर्मसिन्धुकार आदिने आत्मश्राद्धमें भी तीन ही नान्दीमुख कहे हैं—आत्मा, पिता और पितामह।
३-समस्तसंपत्समवाप्तिहेतवः समुत्थितापत्कुलधूमकेतवः। अपारसंसारसमुद्रसेतवः पुनन्तु मां ब्राह्मणपादरेणवः ॥
आपद्धनध्वान्तसहस्रभानवः समीहितार्थार्पणकामधेनवः। समस्ततीर्थाम्बुपवित्रमूर्तयो रक्षन्तु मां ब्राह्मणपादपांसवः ॥
(शि० पु० कै० सं० १२। ४४-४५)

* कैलाससंहिता * ६३३

मातामहश्राद्ध है, उसे आपलोगोंकी आज्ञा लेकर मैं पार्वणकी विधिसे सम्पन्न करूँगा।' ऐसा संकल्प करके आसनके लिये दक्षिण-दिशासे आरम्भ करके उत्तरोत्तर कुशोंका त्याग करे। तत्पश्चात् आचमन करके खड़ा हो वर्णक्रमका आरम्भ करे। अपने हाथमें पवित्री धारण करके दो ब्राह्मणोंके हाथोंका स्पर्श करते हुए इस प्रकार कहे—
'विश्वेदेवार्थं भवन्तौ वृणे।
भवद्भ्यां नान्दीश्राद्धे क्षणः प्रसादनीयः।'

अर्थात् 'हम विश्वेदेव श्राद्धके लिये आप दोनोंका वरण करते हैं। आप दोनों नान्दीश्राद्धमें अपना समय देनेकी कृपा करें।' इतना सभी श्राद्धोंके ब्राह्मणोंके लिये कहे। सर्वत्र ब्राह्मणवरणकी विधिका यही क्रम है।

इस प्रकार वरणका कार्य पूरा करके दस मण्डलोंका निर्माण करे। उत्तरसे आरम्भ करके दसों मण्डलोंका अक्षतसे पूजन करके उनमें क्रमशः ब्राह्मणोंको स्थापित करे। फिर उनके चरणोंपर भी अक्षत आदि चढ़ाये। तदनन्तर सम्बोधनपूर्वक विश्वेदेव आदि नामोंका उच्चारण करे और कुश, पुष्प, अक्षत एवं जलसे 'इदं वः पाद्यम्' कहकर पाद्य निवेदन करे*।

इस प्रकार पाद्य देकर स्वयं भी अपना पैर धो ले और उत्तराभिमुख हो आचमन करके एक-एक श्राद्धके लिये जो दो-दो ब्राह्मण कल्पित हुए हैं, उन सबको आसनोंपर बिठाये तथा यह कहे— 'विश्वेदेवस्वरूपस्य ब्राह्मणस्य इदमासनम्।'—विश्वेदेवस्वरूप ब्राह्मणके लिये यह आसन समर्पित है, यह कह कुशासन दे स्वयं भी हाथमें कुश लेकर आसनपर स्थित हो जाय। इसके बाद कहे—'अस्मिन्नान्दीमुखश्राद्धे विश्वेदेवार्थे भवद्भ्यां क्षणः क्रियताम्—इस नान्दीमुख श्राद्धमें विश्वेदेवके लिये आप दोनों क्षण (समय प्रदान) करें।' तदनन्तर 'प्राप्नुतां भवन्तौ—आप दोनों ग्रहण करें।' ऐसा कहे। फिर वे दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण इस प्रकार उत्तर दें 'प्राप्नुयाव—हम दोनों ग्रहण करेंगे।' इसके बाद यजमान उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे प्रार्थना करे—'मेरे मनोरथकी पूर्ति हो, संकल्पकी सिद्धि हो—इसके लिये आप अनुग्रह करें।'

तत्पश्चात् (पद्धतिके अनुसार अर्घ्य दे, पूजन कर) शुद्ध केलेके पत्ते आदि धोये हुए पात्रोंमें परिपक्व अन्न आदि भोज्य पदार्थोंको परोसकर पृथक्-पृथक् कुश बिछाकर और स्वयं वहाँ जल छिड़ककर प्रत्येक पात्रपर आदरपूर्वक दोनों हाथ लगा 'पृथिवी ते


* प्रथम मण्डलमें दो विश्वेदेवोंके लिये, फिर आठ मण्डलोंमें क्रमशः देवादि आठ श्राद्धोंके अधिकारियोंके लिये तथा दसवें मण्डलमें सपत्नीक मातामह आदिके लिये पाद्य अर्पण करने चाहिये। अर्पणवाक्यका प्रयोग इस प्रकार है—
ॐ सत्यवसुसंज्ञकाः विश्वेदेवाः नान्दीमुखाः भूर्भुवः स्वः इदं वः पाद्यं पादावनेजनं पादप्रक्षालनं वृद्धिः॥ १ ॥
ॐ ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः नान्दीमुखाः भूर्भुवः स्वः इदं वः पाद्यं पादावनेजनं पादप्रक्षालनं वृद्धिः॥ २ ॥
ॐ देवर्षिब्रह्मर्षिक्षत्रर्षयो नान्दीमुखाः भूर्भुवः स्वः इदं वः पाद्यं पादावनेजनं पादप्रक्षालनं वृद्धिः॥ ३ ॥
इसी प्रकार अन्य श्राद्धोंके लिये वाक्यकी ऊहा कर लेनी चाहिये।

६३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पात्रम्'१ इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। वहाँ स्थित हुए देवता आदिका चतुर्थ्यन्त उच्चारण करके अक्षतसहित जल ले 'स्वाहा' बोलकर उनके लिये अन्न अर्पित करे और अन्तमें 'न मम' इस वाक्यका उच्चारण करे।२ सर्वत्र—माता आदिके लिये भी अन्न-अर्पणकी यही विधि है।

अन्तमें इस प्रकार प्रार्थना करे—
यत्पादपद्मस्मरणाद् यस्य नामजपादपि।
न्यूनं कर्म भवेत् पूर्णं तं वन्दे साम्बमीश्वरम्॥
'जिनके चरणारविन्दोंके चिन्तन एवं नाम-जपसे न्यूनतापूर्ण अथवा अधूरा कर्म भी पूरा हो जाता है, उन साम्ब सदाशिव (उमामहेश्वर)-की मैं वन्दना करता हूँ।'

इसका पाठ करके कहे—'ब्राह्मणो ! मेरे द्वारा किया हुआ यह नान्दीमुख श्राद्ध यथोक्तरूपसे परिपूर्ण हो, यह आप कहें।' ऐसी प्रार्थनाके साथ उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद ले और अपने हाथमें लिया हुआ जल छोड़ दे। फिर पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर प्रणाम करे और उठकर ब्राह्मणोंसे कहे—'यह अन्न अमृतरूप हो।' फिर उदारचेता साधक हाथ जोड़ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रार्थना करे। श्रीरुद्रसूक्तका चमकाध्यायसहित पाठ करे। पुरुषसूक्तकी भी विधिवत् आवृत्ति करे। मनमें भगवान् सदाशिवका ध्यान करते हुए 'ईशानः सर्वविद्यानाम्' इत्यादि पाँच मन्त्रोंका जप करे। जब ब्राह्मणलोग भोजन कर चुकें, तब रुद्रसूक्तका पाठ समाप्तकर क्षमा-प्रार्थनापूर्वक उन ब्राह्मणोंको पुनः 'अमृतापिधानमसि स्वाहा' यह मन्त्र पढ़कर उत्तरापोशनके लिये जल दे।

तदनन्तर हाथ-पैर धो आचमन करके पिण्डदानके स्थानपर जाय। वहाँ पूर्वाभिमुख बैठकर मौनभावसे तीन बार प्राणायाम करे। इसके बाद 'मैं 'नान्दीमुख' श्राद्धका अंगभूत पिण्डदान करूँगा' ऐसा संकल्प करके दक्षिणसे लेकर उत्तरकी ओर नौ रेखाएँ खींचे और उन रेखाओंपर क्रमशः बारह-बारह पूर्वाग्र कुश बिछाये। फिर दक्षिणकी ओरसे देवता आदिके पाँच३ स्थानोंपर चुपचाप अक्षत और जल छोड़े। पितृवर्गके तीनों४ स्थानोंपर क्रमशः अक्षत, जल छोड़कर नवें मातामहादिके स्थानपर भी मार्जन करे५। तत्पश्चात् 'अत्र पितरो मादयध्वम्' कहकर देवादिके पाँचों स्थानोंपर क्रमशः अक्षत, जल छोड़े। इस प्रकार अवनेजन दे पाँचों स्थानोंपर प्रत्येकके लिये तीन-तीन पिण्ड दे६। (इसी


१-पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखेऽमृतेऽमृतं जुहोमि स्वाहा' यह पूरा मन्त्र है।
२-वाक्यका प्रयोग इस प्रकार है—'ॐ सत्यवसुसंज्ञकेभ्यो विश्वेभ्यो देवेभ्यो नान्दीमुखेभ्यः स्वाहा न मम' इत्यादि।
३-देव, ऋषि, दिव्य मनुष्य और भूत—इनके पाँच स्थान समझने चाहिये।
४-पिता आदि, माता आदि तथा आत्मा आदि—ये तीन स्थान हैं।
५-उस समय इस प्रकार कहे—'शुन्धन्तां ब्रह्माणो नान्दीमुखाः शुन्धन्तां विष्णवो नान्दीमुखाः शुन्धन्तां महेश्वरा नान्दीमुखाः।' यह प्रथम रेखापर मार्जन करते समय कहे। इस प्रकार अन्य रेखाओंपर भी कहता चले।
६-पिण्डदान-वाक्य इस प्रकार है—'ब्रह्मणे नान्दीमुखाय स्वाहा', 'विष्णवे नान्दीमुखाय स्वाहा।' इत्यादि।

* कैलाससंहिता * ६३५

तरह शेष स्थानोंपर भी करे।)। अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार सभी पिण्ड पृथक्-पृथक् देने चाहिये। फिर पितरोंके साद्गुण्यके लिये जल-अक्षत अर्पित करे। तत्पश्चात् अपने हृदयकमलमें सदा शिवदेवका ध्यान करे और पूर्वोक्त 'यत्पादपद्मस्मरणात्…………' इत्यादि श्लोकका पुनः पाठ करके ब्राह्मणोंको नमस्कारपूर्वक यथाशक्ति दक्षिणा दे। फिर त्रुटियोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करके देवता-पितरोंका विसर्जन करे। पिण्डोंका उत्सर्ग करके उन्हें गौओंको खानेके लिये दे दे अथवा जलमें डाल दे। तत्पश्चात् पुण्याह-वाचन करके स्वजनोंके साथ भोजन करे।

दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर शुद्ध बुद्धिवाला साधक उपवासपूर्वक व्रत रखे। काँख और उपस्थके बालोंको छोड़कर शेष सभी बाल मुँड़वा दे, परंतु शिखाके सात-आठ बाल अवश्य बचा ले। फिर स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहनकर शुद्ध हो दो बार आचमन करके मौन हो विधिवत् भस्म धारण करे। पुण्याहवाचन करके उससे अपने-आपका प्रोक्षण कर बाहर-भीतरसे शुद्ध हो होम, द्रव्य और आचार्यकी दक्षिणाके द्रव्यको छोड़कर शेष सभी द्रव्य महेश्वरार्पणबुद्धिसे ब्राह्मणों और विशेषतः शिवभक्तोंको बाँट दे। तदनन्तर गुरुरूपधारी शिवके लिये वस्त्र आदिकी दक्षिणा दे, पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करके डोरा, कौपीन, वस्त्र तथा दण्ड आदि जो धोकर पवित्र किये गये हों, धारण करे। तदनन्तर होमद्रव्य और समिधा आदि लेकर समुद्र या नदीके तटपर, पर्वतपर, शिवालयमें, वनमें अथवा गोशालामें किसी उत्तम स्थानका विचार करके वहाँ बैठ जाय और आचमन करके पहले मानसिक जप करे। फिर 'ॐ नमो ब्रह्मणे' इस मन्त्रका तीन बार जप करके 'अग्निमीळे पुरोहितम्' इस मन्त्रका पाठ करे। इसके बाद 'अथ महाव्रतम्', 'अग्निर्वै देवानाम़्', 'एतस्य समाम्नायम्', 'ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थ', 'अग्न आयाहि वीतये' तथा 'शं नो देवी रभीष्टये' इत्यादिका पाठ करे। तत्पश्चात् 'म य र स त ज भ न ल ग' 'पञ्चसंवत्सरमयम्', 'समाम्नायः समाम्नातः', 'अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि', 'वृद्धिरादैच्', 'अथातो धर्मजिज्ञासा,' 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा'—इन सबका पाठ करे। तदनन्तर यथासम्भव वेद, पुराण आदिका स्वाध्याय करे। इसके बाद ॐ ब्रह्मणे नमः', 'ॐ इन्द्राय नमः', 'ॐ सूर्याय नमः', 'ॐ सोमाय नमः', 'ॐ प्रजापतये नमः', 'ॐ आत्मने नमः', 'ॐ अन्तरात्मने नमः', 'ॐ ज्ञानात्मने नमः', 'ॐ परमात्मने नमः' इत्यादि रूपसे ब्रह्मा आदि शब्दोंके आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'नमः' लगाकर उनके चतुर्थ्यन्त रूपका जप करे। इसके बाद तीन मुट्ठी सत्तू लेकर प्रणवके उच्चारणपूर्वक तीन बार खाय और प्रणवसे ही दो बार आचमन करके नाभिका स्पर्श करे। उस समय आगे बताये जानेवाले शब्दोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'नमः स्वाहा' जोड़कर उनका उच्चारण करे। यथा—'ॐ आत्मने नमः स्वाहा',


धर्मसिन्धुकारने प्रत्येक देवताके लिये दो-दो पिण्डका विधान किया है, अतः नौ स्थानोंके २७ देवताओंके लिये ५४ पिण्ड होंगे।

६३६* संक्षिप्त शिवपुराण *

'ॐ अन्तरात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ ज्ञानात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ परमात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ प्रजापतये नमः स्वाहा' इति। तदनन्तर पृथक्-पृथक् प्रणवमन्त्रसे$^१$ ही दूध-दही मिले हुए घीको (अथवा केवल जलको) तीन बार चाटकर पुनः दो बार आचमन करे। इसके बाद मनको स्थिर करके सुस्थिर आसनपर पूर्वाभिमुख बैठकर शास्त्रोक्त विधिसे तीन बार प्राणायाम करे।
(अध्याय १२)


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संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि—गणपति-पूजन, होम, तत्त्व-शुद्धि, सावित्री-प्रवेश, सर्वसंन्यास और दण्ड-धारण आदिका प्रकार

स्कन्द कहते हैं—वामदेव! तदनन्तर मध्याह्नकालमें स्नान करके साधक अपने मनको वशमें रखते हुए गन्ध, पुष्प और अक्षत आदि पूजा-द्रव्योंको ले आये और नैर्ऋत्यकोणमें देवपूजित विघ्नराज गणेशकी पूजा करे। 'गणानां त्वा' इत्यादि मन्त्रसे विधिपूर्वक गणेशजीका आवाहन करे। आवाहनके पश्चात् उनके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये। उनकी अंगकान्ति लाल है, शरीर विशाल है। सब प्रकारके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने करकमलोंमें क्रमशः पाश, अंकुश, अक्षमाला तथा वर नामक मुद्राएँ धारण कर रखी हैं। इस प्रकार आवाहन और ध्यान करनेके पश्चात् शम्भुपुत्र गजाननकी पूजा करके खीर, पूआ, नारियल और गुड़ आदिका उत्तम नैवेद्य निवेदन करे। तत्पश्चात् ताम्बूल आदि दे उन्हें संतुष्ट करके नमस्कार करे और अपने अभीष्ट कार्यकी निर्विघ्न पूर्तिके लिये प्रार्थना करे।

तदनन्तर अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार औपासनाग्निमें आज्यभागान्त$^२$ हवन करके अग्निदेवतासम्बन्धी यज्ञविषयक स्थालीपाक होम करना चाहिये। इसके बाद 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे पूर्णाहुति होम करके हवनका कार्य समाप्त करे। तत्पश्चात् आलस्यरहित हो अपराह्नकालतक गायत्री-मन्त्रका जप करता रहे। तदनन्तर स्नान करके सायंकालकी संध्योपासना तथा सायंकालिक उपासनासम्बन्धी नित्य-होम आदि करके मौन हो गुरुकी आज्ञा ले चरु पकाये। फिर अग्निमें समिधा, चरु और घीकी रुद्रसूक्तसे और सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंसे पृथक्-पृथक् आहुति दे। अग्निमें उमासहित महेश्वरकी भावना करे और गौरीदेवीका चिन्तन करते हुए


$^१$-धर्मसिन्धुकारने इसके लिये तीन मन्त्र लिखे हैं। प्रथम बार चाटकर कहे 'त्रिवृदसि', द्वितीय बार 'प्रवृदसि' और तृतीय बार 'विवृदसि'।
$^२$-कुशकण्डिकाके अनन्तर अग्निमें जो चार आहुतियाँ दी जाती हैं, उनमें प्रथम दो को 'आघार' और अन्तिम दोको 'आज्यभाग' कहते हैं। प्रजापति और इन्द्रके उद्देश्यसे 'आघार' तथा अग्नि और सोमके उद्देश्यसे 'आज्यभाग' दिया जाता है।