शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पंचमपटलः । ( १३९ ) प्रिये ॥ यज्ज्ञात्वा लभते मुक्तिं पापयुक्तो- पि साधकः ॥ ४९ ॥ टीका-हेप्रिये पार्वती ! अब मुक्तिका अनुभव तुमसे कहतेहैं जिसके ज्ञानसे पापयुक्त साधकभी मुक्तिलाभ करताहै ॥ ४९ ॥ मूलम्-समभ्यर्च्येश्वरं सम्यक्कृत्वा च योगमुत्तमम् ॥ गृह्णीयात्सुस्थितो भूत्वा गुरुं सन्तोष्य बुद्धिमान् ॥ ५० ॥ टीका-योगाकांक्षी साधक सम्यकप्रकारसे ईश्वरकी पूजा करके स्वस्थचित्तसे योगासनपर बैठके बुद्धिमान् गुरुको सर्वप्रकारसे प्रसन्न करके यह उत्तम योग ग्रह- णकरे ॥ ५० ॥ मूलम्-जीवादि सकलं वस्तु दत्त्वा योग- विदं गुरुम्॥ सन्तोष्यादिप्रयत्नेन योगोयं गृह्यते बुधैः ॥ ५१ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक जीवादि सकल पदार्थ योगविद् गुरुके अर्पण करके उनके प्रसन्नतापूर्वक यत्न करके यह योग ग्रहण करते हैं ॥ ५१ ॥ मूलम्--विप्रान्सन्तोष्य मेधावी नानामं- गलसंयुतः ॥ ममालये शुचिर्भूत्वा गृह्णी- याच्छुभमात्मनः ॥ ५२ ॥
( १४० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-योगग्रहणके समय बुद्धिमान् साधक ब्राह्म- णको सन्तोष करके अर्थात् द्रव्यादिक प्रदानपूर्वक प्रसन्न करके अनेक आशीर्वाद श्रवण करके पवित्रता से शिवमन्दिरमें बैठके आत्माके अर्थ जो यह शुभयोग है इसको ग्रहणकरे ॥ ५२ ॥ मूलम्-संन्यस्यानेन विधिना प्राक्तनं विग्रहादिकम् ॥ भूत्वा दिव्यवपुर्योगी गृह्णीयाद्वक्ष्यमाणकम् ॥ ५३ ॥ टीका-साधक इस विधानसे पूर्व शरीर गुरुकी कृ- पासे त्यागके दिव्य शरीर होके जो आगे कहेंगे वह योग ग्रहण करे. तात्पर्य यह है कि, योगग्रहणके समयसे साधकका शरीर दिव्य होजाताहै व्याधि और अज्ञान- का शरीर नहीं रहजाता इस हेतुसे योगग्रहणके समय साधक यह चिंतनकरे कि, पूर्व शरीरको हमने त्यागके दिव्यशरीर धारण किया ॥ ५३ ॥ मूलम्-पद्मासनस्थितो योगी जनसंगविव- र्जितः ॥ विज्ञाननाडीद्वितयमङ्गुलीभ्यां निरोधयेत् ॥ ५४ ॥ टीका-योगी संगरहित पद्मासनमें स्थित होके दो- नों विज्ञाननाडी अर्थात् इडा और पिंगलाको दो अंगु- लीसे निरोध करे ॥ ५४ ॥
पंचमपटलः । ( १४१ ) मूलम्-सिद्धेस्तदाविर्भवति सुखरूपी निर- ञ्जनः ॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यो येन सि- द्धो भवेत्खलु ॥ ५५ ॥ टीका-यह योग सिद्ध होनेसे साधकके हृदयमें सुखरूपी निरंजन परब्रह्म चैतन्यस्वरूपका प्रकाशहोगा इस हेतुसे यह योगमें साधकको परिश्रम कर्तव्य है, इससे निश्चय यह योग सिद्ध होजायगा ॥ ५५ ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं तस्य सिद्धि- र्न दूरतः ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमादेव न संशयः ॥ ५६ ॥ टीका-जो मनुष्य इस योगका सर्वदा अभ्यास करे- गा उसको सर्वसिद्धि प्राप्त होगी और निश्चय आपही क्रमसे वायु सिद्ध होजायगा ॥ ५६ ॥ मूलम्-सकृद्यः कुरुते योगी पापौघं नाशये- द्ध्रुवम् ॥ तस्य स्यान्मध्यमे वायोः प्रवेशो नात्र संशयः ॥ ५७ ॥ टीका-जो योगी प्रतिदिन एकवार यह अभ्यास करे तो उसके सर्व पापोंका नाश होजायगा और उसका प्राणवायु निश्चय सुषुम्णामें प्रवेश करेगा ॥ ५७ ॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलो यः स योगी देव-
४. चतुर्थ पटल: महामुद्रा, जालन्धर, मूलबन्ध व शक्ति-चालन
( १४२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पूजितः ॥ अणिमादिगुणाँल्लब्ध्वा विचरे- द्भुवनत्रये ॥ ५८ ॥ टीका-यह अभ्यासशील योगी देवतोंसे पूजित है और अणिमादिक सिद्धि लाभ करके तीनों लोकमें इच्छापूर्वक विचरेगा ॥ ५८ ॥ मूलम्-यो यथास्यानिलाभ्यासात्तद्वेत्त- स्य विग्रहः ॥ तिष्ठेदात्मनि मेधावी संयतः क्रीडते भृशम् ॥ ५९ ॥ टीका-जिस प्रकार वायुका अभ्यास करेगा उसी तरह साधकका शरीर सिद्ध हो जायगा और बुद्धिमान पुरुष आत्मामें स्थितहोके सर्वदा क्रीडा करेगा ॥ ५९ ॥ मूलम्-एतद्योगं परं गोप्यं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ यःप्रमाणैः समायुक्तस्तमेव कथ्यते ध्रुवम् ॥ ६० ॥ टीका--यह योग परमगोपनीयहै अनधिकारीको कदापि देनेके योग्य नहीं है परन्तु प्रमाणयुक्त अर्थात् पूर्वोक्त लक्षणयुक्त साधकको अवश्य देना उचितहै॥६०॥ मूलम्-योगी पद्मासने तिष्ठेत्कण्ठकूपे य- दा स्मरन्॥जिह्वां कृत्वा तालुमूले क्षुत्पि- पासा निवर्तते ॥ ६१ ॥
पंचमपटलः । (१४३) टीका-पद्मासनस्थित योगी जब कण्ठकूपका स्मरण अर्थात् उस स्थानमें मनको लय करके जिह्वा- को तालुमूलमें स्थित करेगा तब क्षुधा और पिपासा- से रहित हो जायगा ॥ ६१ ॥ मूलम्-कण्ठकूपादधः स्थाने कूर्मनाड्य- स्ति शोभना॥ तस्मिन् योगी मनो दत्त्वा चित्तस्थैर्यं लभेदृशम् ॥ ६२ ॥ टीका-कंठकूपके नीचे कूर्मनाडी शोभित है उस नाडीमें योगी मनको स्थिर करके अत्यंत चित्तकी स्थिरता पावेगा ॥ ६२ ॥ मूलम्-शिरःकपाले रुद्राक्षं विवरं चिन्तये- द्यदा ॥ तदा ज्योतिःप्रकाशः स्याद्विद्युत्पु- ञ्जसमप्रभः ॥६३॥ एतच्चिन्तनमात्रेण पा- पानां संक्षयो भवेत् ॥ दुराचारोऽपि पुरुषो लभते परमं पदम् ॥ ६४ ॥ टीका--शिर कपालमें जो रुद्राक्ष विवर है उसमें यदि चिंतना करे तो विद्युत्पुञ्जके समान आत्मज्यो- तिका प्रकाश होगा और इसके चिन्तनमात्रसे योगीका सर्व पाप् नष्ट होजायगा. यदि दुराचारमेंभी जो पुरुष आसक्त है वहभी परमगतिको प्राप्त होगा ॥६३॥ ६४॥
( १४४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्--अहर्निशं यदा चिन्तां तत्करोति वि- चक्षणः ॥ सिद्धानां दर्शनं तस्य भाषणञ्च भवेद्ध्रुवम् ॥ ६५ ॥ टीका--जो बुद्धिमान् साधक रात्रि दिवस यह चि- न्तवन करते हैं उनको सिद्धलोगोंका अवश्य दर्शन और उनसे भाषण होताहै ॥ ६५ ॥ मूलम्--तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् भुञ्जन् ध्या- येच्छून्यमहर्निशम् ॥ तदाकाशमयो यो- गी चिदाकाशे विलीयते ॥ ६६ ॥ टीका--जो पुरुष चलते बैठते सोते भोजन करते रा- त्रिदिवस यह ध्यान करते हैं सो आकाशस्वरूप योगी चिदाकाश अर्थात् परमात्मामें लय होजाते हैं ॥ ६६ ॥ मूलम्--एतज्ज्ञानं सदा कार्यं योगिना सि- द्धिमिच्छता ॥ निरन्तरकृताभ्यासान्मम तुल्यो भवेद्ध्रुवम् ॥ एतज्ज्ञानबलाद्योगी सर्वेषां वल्लभो भवेत् ॥ ६७ ॥ टीका--सिद्धिकांक्षी योगीको इस ध्यानका सर्वदा अभ्यास करना उचित है सर्वदा अभ्यास करनेसे हेपा- र्वती ! हमारे तुल्य होजायगा निश्चय, इस ज्ञानबलसे योगी सबको अर्थात् त्रैलोक्यको प्रिय होजाताहै ॥ ६७ ॥
पंचमपटलः । ( १४५ ) मूलम्-सर्वान् भूतान् जयं कृत्वा निराशी- रपरिग्रहः ॥ ६८ ॥ नासाग्रे दृश्यते येन पद्मासनगतेन वै ॥ मनसो मरणं तस्य खेचरत्वं प्रसिद्ध्यति ॥ ६९ ॥ टीका-योगी सर्व भूतोंको जय करके और क्षुधा और इच्छाको जीतके पद्मासनसे स्थितहोके जो ना- साग्रमें देखता है उसका मन स्थिर होजाताहै तब खे- चरत्व सिद्धहोताहै ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ मूलम्-ज्योतिः पश्यति योगीन्द्रः शुद्धं शुद्धाचलोपमम् ॥ तत्राभ्यासबलेनैव स्वयं तद्रक्षको भवेत् ॥ ७० ॥ टीका-शुद्ध अचलके समान परमज्योति योगी दे- खताहै तब अभ्यासबलसे आपही उसका रक्षक होताहै अर्थात् ज्योतिर्मय होता है ॥ ७० ॥ मूलम्-उत्तानशयने भूमौ सुप्त्वा ध्यायन्नि- रन्तरम् ॥सद्यः श्रमविनाशाय स्वयं योगी विचक्षणः ॥७१॥ शिरः पश्चात्तु भागस्य ध्याने मृत्युञ्जयो भवेत् ॥ भ्रूमध्ये दृष्टि- मात्रेण ह्यपरः परिकीर्तितः ॥ ७२ ॥
( १४६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-बुद्धिमान् योगी भूमिमें उत्तानशयन करके निरन्तर ध्यान करे तो तत्काल आपही श्रमका नाश होजायगा और शिरके पृष्ठभागका ध्यान करनेसे योगी मृत्युका जीतनेवाला होजायगा और भ्रूके मध्यमें जो दृष्टिमात्रसे फल होताहै सो हेदेवि ! हम पहले कह- चुके हैं ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ मूलम्-चतुर्विधस्य चान्नस्य रसस्त्रेधा वि- भज्यते ॥ तत्र सारतमो लिंगदेहस्य परि- पोषकः ॥ ७३ ॥ सप्तधातुमयं पिण्डमे- ति पुष्णाति मध्यगः ॥ याति विण्मूत्र- रूपेण तृतीयः सप्ततो बहिः ॥७४॥ आ- द्यभागद्वयं नाड्यः प्रोक्तास्ताः सकला अपि ॥ पोषयन्ति वपुर्वायुमापादतल- मस्तकम् ॥ ७५ ॥ टीका-चार विधि अन्नभोजन करनेसे तीनप्रकार- का रस उत्पन्नहोताहै उसमें जो प्रथम सारभूत रस है वह लिङ्गशरीरको पोषण करता है और जो दूसरा रस है वह सप्तधातुमय पिण्डको पोषण करताहै और तीसरा रस सप्तधातुके बाहर मल मूत्ररूप है पहिले जो दोभाग रस कहाहै वही सकल नाडीरूप है और
पंचमपटलः । ( १४७ ) पादसे लेकर मस्तकपर्य्यन्त शरीरके वायुका पोषणक- रते हैं ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ मूलम्-नाडीभिराभिः सर्वाभिर्वायुः सञ्चर- ते यदा ॥ तदैवान्नरसो देहे साम्येनेह प्रव- र्त्तते ॥ ७६ ॥ टीका-जब सब नाडीके साथ वायु चलताहै तब अन्नका रस शरीरमें समभावसे प्रवृत्त होता है ॥ ७६ ॥ मूलम्-चतुर्दशानां तत्रेह व्यापारे मुख्य- भागतः ॥ ता अनुग्रत्वहीनाश्च प्राणस- ञ्चारनाडिकाः ॥ ७७ ॥ टीका-सर्व नाडियोंमें पूर्वोक्त चौदह नाडी शरीर- के मुख्य व्यापारको करतीहैं यह प्राण सञ्चार करने- वाली चौदह नाडीमें परस्पर कोई किसीसे न्यून अधिक नहीं है ॥ ७७ ॥ मूलम्-गुदाद्द्व्यंगुलतश्चोर्ध्वं मेढ्रैकांगुलत- स्त्वधः ॥ एवञ्चास्ति समं कन्दं समता चतुरंगुलम् ॥ ७८ ॥ टीका-गुदासे दो अङ्गुल ऊपर और मेढ्र अर्थात् लिङ्गमूलसे एक अंगुल नीचे चार अंगुल विस्तारक- न्दका प्रमाण है॥ ७८ ॥
( १४८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-पश्चिमाभिमुखी योनिर्गुदमेढ्रान्त- रालगा ॥ तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति कुण्डली सदा ॥ ७९ ॥ संवेष्ट्य सकला नाडीः सार्द्धत्रिकुटिलाकृतिः॥ मुखे निवे- श्य सा पुच्छं सुषुम्णाविवरे स्थिता॥८०॥ टीका-गुदा और मेढ्रके मध्यमें जो योनि है वह पश्चिमाभिमुखी अर्थात् पीछेको मुख है उसी स्थानमें कन्दहै और उसी स्थानमें सर्वदा कुण्डलिनीकी स्थिति है यह कुण्डलिनी सकल नाडीको घेरके साढे तीन फेरा कुटिल आकृतिसे अपने मुखमें पुच्छको लेके सुषुम्णा विवरमें स्थित है ॥ ७९ ॥ ८० ॥ मूलम्-सुप्ता नागोपमा ह्येषा स्फुरन्ती प्रभया स्वया ॥ अहिवत्सन्धिसंस्थाना वाग्देवी बीजसंज्ञिका ॥ ८१ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी सर्पके समान निद्रिता अपनी प्रभासे प्रकाशमान है और सर्पके सदृश संधि- में स्थित है और वाग्देवी है अर्थात् कुण्डलिनीहीसे वाक्य उच्चारण होताहै और बीज संज्ञक है अर्थात् सं- सारकी बीज है ॥ ८१ ॥ मूलम्-ज्ञेया शक्तिरियं विष्णोर्निर्मला स्वर्ण
पंचमपटलः । ( १४९ ) भास्वरा॥सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयप्र- सूतिका ॥ ८२ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी देवी ईश्वरकी शक्तिमें तप्त स्वर्णके समान निर्मल तेजप्रभा है और सत्व, रज, तम, यह तीनों गुणकी माता है ॥ ८२ ॥ मूलम्-तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकी- र्तितम् ॥ कलहेमसमं योगे प्रयुक्ताक्षररू- पिणम् ॥ ८३ ॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी है उसी स्थानमें बन्धूकपुष्पके समान रक्तवर्ण कामबीजकी स्थिति कहीगई है वह कामबीज तप्तस्वर्णके समान स्वरूप- योगयुक्तद्वारा चिंतनीय है ॥ ८३ ॥ मूलम्--सुषुम्णापि च संश्लिष्टा बीजं तत्र वरं स्थितम्॥शरच्चंद्रनिभं तेजस्स्वयमेतत्स्फु- रत्स्थितम्॥८४ ॥सूर्यकोटिप्रतीकाशं च- न्द्रकोटिसुशीतलम् ॥ एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ॥बीजसंज्ञं परं तेजस्तदे- व परिकीर्तितम् ॥ ८५ ॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्णा उसी स्थानमें कामबीजके साथ स्थित है और वह बीज
(१५०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । शारच्चन्द्रके समान प्रकाशमान तेज है और वह आप- ही कोटि सूर्यके समान प्रकाश और कोटिचन्द्रके समान शीतल है यह तीनों मिलके अर्थात् कुण्डलिनी सुषुम्णा, बीजकुण्डलिनीका नाम त्रिपुरभैरवी देवी है यह कुण्ड- लिनी परमतेजमानहै और उसकी बीजसंज्ञाहै॥८४॥८५॥ मूलम्--क्रियाविज्ञानशक्तिभ्यां युतं यत्प- रितो भ्रतत्॥८६॥ उत्तिष्ठद्दिशतस्त्वम्भः सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्॥योनिस्यं तत्परं तेजः स्वयंभूलिंगसंज्ञितम् ॥ ८७ ॥ टीका--वह बीज क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्तिसे युक्त होके शरीरमें भ्रमण करताहै और कभी ऊर्ध्वगामी हो- ताहै और कभी जलमें प्रवेश करताहै और सूक्ष्म प्रज्व- लित अग्निके समान शिखायुत परमतेजवीर्यकी स्थिति योनिस्यानमें है और स्वयम्भू लिङ्गसंज्ञा है॥८६॥८७॥ मूलम्--आधारपद्ममेतद्धि योनिर्यस्यास्ति कन्दतः ॥ परिस्फुरद्वादिसान्तचतुर्वर्ण चतुर्दलम् ॥ ८८ ॥ टीका--यह जो कहाहै इसको आधारपद्म कहते हैं और इस पद्मके मूलमें योनिकी स्थितिहै यह पद्म परम प्रकाशमान-व-से स-तक अर्थात् व-श-ष-स चारवर्ण और चारदल करके शोभित है ॥ ८८ ॥
पंचमपटलः । ( १५१ ) मूलम्-कुलाभिधं सुवर्णाभं स्वयम्भूलि- ङ्गसंगतम् ॥ द्विरण्डो यत्र सिद्धोऽस्ति डाकिनी यत्र देवता ॥८९॥ तत्पद्ममध्य- गा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता ॥ त- स्याऊर्ध्वे स्फुरत्तेजः कामबीजं भ्रमन्मत- म् ॥ ९०॥ यः करोति सदा ध्यानं मूला- धारे विचक्षणः ॥ तस्य स्याद्दार्दुरी सिद्धि- र्भूमित्यागक्रमेण वै ॥ ९१ ॥ टीका-यह कमल कुलाभिध है अर्थात् कुलनाम है और स्वर्णके समान कांतिहै और स्वयंभूलिङ्गसे युक्त है और उस पद्ममें द्विरण्डनामक सिद्ध और डाकिनी देवता अधिष्ठात्री है और गणेश देवता है और उस पद्मके मध्यमें योनि है उस योनिमें कुण्डलिनीकी स्थि- तिहै और उस कुण्डलिनीके ऊपर दीप्तिमान् तेजस्व- रूप कामबीज भ्रमण करताहै जो बुद्धिमान् पुरुष इस मूलाधार पद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको दार्दुरी वृत्ति सिद्ध होती है और क्रमसे भूमिको त्यागके आ- काशगमन करते हैं ॥ ८९ ॥ ९० ॥ ९१ ॥ मूलम्-वपुषः कान्तिरुत्कृष्टा जठराग्निविव-
( १५२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । र्धनम् ॥ आरोग्यञ्च पटुत्वञ्च सर्वज्ञत्वञ्च जायते ॥ ९२ ॥ टीका-यह ध्यान करनेसे शरीरमें उत्तम कांति होती है और जठराग्नि वर्धित होताहै और शरीर आरोग्य रहताहै और पटुता और सर्वज्ञता अर्थात् सर्व वस्तुका ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ९२ ॥ मूलम्-भूतं भव्यं भविष्यञ्च वेत्ति सर्वं सका- रणम् ॥ अश्रुतान्यपि शास्त्राणि सरहस्यं वदेद्ध्रुवम् ॥ ९३ ॥ टीका-फिर भूत, भविष्य, वर्तमान तीनोंकाल और सर्व वस्तुके कारणका ज्ञान होताहै और जो शास्त्र कभी श्रवण नहीं कियाहै उसको रहस्यसहित व्या- ख्या करनेकी शक्ति निश्चय उत्पन्न होती है ॥ ९३ ॥ मूलम्-वक्त्रे सरस्वती देवी सदा नृत्यति नि- र्भरम् ॥ मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य जपादेव न संशयः ॥ ९४ ॥ टीका-योगीके मुखमें सर्वदा निरंतर सरस्वती दे- वी नृत्य करती है और योगीकी जपमात्रसे मन्त्रादिकी सिद्धि होती है इसमें संशय नहीं है ॥ ९४ ॥ मूलम्-जरामरणदुःखौघान्नाशयति गुरोर्व-
पंचमपटलः । ( १५३ ) चः॥इदं ध्यानं सदा कार्यं पवनाभ्यासि- ना परम् ॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मु- च्यते सर्वकिल्बिषात् ॥ ९५ ॥ टीका-गुरुका वचन जग मृत्यु आदि जो दुःखका समूह है उसको नाश करदेताहै पवनाभ्यासी साधकको यह परमध्यान सर्वदा करनेके योग्य है ध्यानमात्रसे योगीन्द्र सर्वपापसे मुक्त होजाताहै ॥ ९५ ॥ मूलम्-मूलपद्मं यदा ध्यायेद्योगी स्वायं- म्भुलिङ्गकम् ॥ तदा तत्क्षणमात्रेण पापौ- घं नाशयेद्ध्रुवम् ॥ ९६ ॥ टीका-योगी जब मूलाधार पद्म स्वयम्भूलिङ्गसंयु- क्तका ध्यानकरे तो उसीक्षण निश्चय पापके समूहका नाश करदेगा ॥ ९६ ॥ मूलम्-यं यं कामयते चित्ते तं तं फलमवा- प्नुयात् ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्तं पश्यति विमुक्तिदम् ॥९७॥ बहिरभ्यन्तरे श्रेष्ठं पू- जनीयं प्रयत्नतः ॥ ततः श्रेष्ठतमं ह्येतन्ना- न्यदस्ति मतं मम ॥ ९८ ॥ टीका--जो साधक मूलाधार पद्मका ध्यान करते हैं वह अपने चित्तमें जोजो वस्तुकी इच्छा करते हैं सो सो
( १५४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । सर्व वस्तु उनको प्राप्त होती हैं और सर्वदा यत्नपूर्वक यह अभ्यास करनेसे बाहर भीतर श्रेष्ठ पूजनीय मुक्ति- दायी परमात्माको देखते हैं हे पार्वति ! इससे श्रेष्ठतम दूसरा योग नहीं है यह हमारा मतहै ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ मूलम्-आत्मसंस्थं शिवं त्यक्ता बहिःस्थं यः समर्चयेत् ॥ हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य भ्रमते जीविताशया ॥ ९९ ॥ टीका-मनुष्य शरीरस्थ शिवको त्यागके बाहरके देवताको पूजते हैं जैसे हाथके पिंडको त्यागके जीवके रक्षार्थ अन्य पिंडके हेतु लोग भ्रमण करतेहैं ॥ ९९ ॥ मूलम्-आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दि- ने दिने ॥ तस्य स्यात्सकलासिद्धिर्नात्र कार्या विचारणा ॥ १००॥ निरन्तरकृता- भ्यासात्षण्मासैः सिद्धिमाप्नुयात् ॥ तस्य वायुप्रवेशोपि सुषुम्णायाम्भवेद्ध्रुवम् ॥ ॥ १०१ ॥ मनोजयञ्च लभते वायुबिन्दु- विधारणात् ॥ ऐहिकामुष्मिकीसिद्धिर्भ- वेन्नैवात्र संशयः ॥ १०२ ॥ टीका-जो आलस्यको त्यागके शरीरस्थ परमा- त्माका नित्य पूजन करेगा उसको सकलसिद्धि प्राप्त-
पंचमपटलः। ( १५५ ) होगी इसमें संशय नहीं है यदि इसका अभ्यास निर- न्तर करे तो छःमासमें सिद्धि प्राप्तहोगी और उसके सुषुम्णानाडीमें निश्चय वायु प्रवेश करेगा और मनको जीतलेगा और वायु बिन्दु का धारण सिद्धहोगा और इसलोक और परलोककी सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ अथ स्वाधिष्ठानचक्रविवरणम् । मूलम्-द्वितीयन्तु सरोजञ्च लिंगमूले व्य- वस्थितम्॥वादिलान्तं च षड्वर्णं परिभा- स्वरषड्दलम् ॥ १०३ ॥ स्वाधिष्ठानाभिधं तत्तु पंकजं शोणरूपकम्॥ बाणाख्योय- त्रासिद्धोऽस्ति देवी यत्रास्ति राकिणी १०४ टीका-दूसरा पद्म जो लिङ्गमूलमें स्थितहै वह- व से लतक- अर्थात-व-भ-म-य-र-ल-यह-छःवर्णोंकरके युक्त है और छः दलसे शोभितहै.यह रक्तवर्णपद्मका नाम स्वा- धिष्ठानहै और इस स्थानमें बाणनामक सिद्ध और राकि- णी देवी अधिष्ठात्रीहै और ब्रह्मा देवता हैं॥१०३॥१०४॥ मूलम्-यो ध्यायति सदा दिव्यं स्वाधिष्ठा- नारविन्दकम् ॥ तस्य कामाङ्गनाः सर्वा भजन्ते काममोहिताः॥ १०५ ॥
( १५६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जो पुरुष यह दिव्य स्वाधिष्ठानपद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको कामरूपिणी स्त्री कामसे मोहित होके भजतीहैं अर्थात् सेवा करती हैं ॥ १०५ ॥ मूलम्-विविधञ्चाश्रुतं शास्त्रं निःशङ्को वै व- देद्ध्रुवम् ॥ सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥ १०६ ॥ टीका-विविधशास्त्र जो कभी श्रवण नहीं किय हो उसकोभी इस पद्मके ध्यानके प्रभावसे निःशंक कहेगा और सर्वरोगसे मुक्तहोके आनन्दपूर्वक संसारमें विचरेगा ॥ १०६ ॥ मूलम्-मरणं खाद्यते तेन स केनापि न खा- द्यते ॥ तस्य स्यात्परमा सिद्धिरणिमादि- गुणप्रदा ॥१०७॥ वायुः सञ्चरते देहे रस- वृद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ॥ आकाशपङ्कजगलत्पीय़ू- षमपि वर्द्धते ॥ १०८ ॥ टीका-यह साधक मृत्युको नाश करदेताहै और वह किसीसे नष्ट नहीं होता और उस साधकको गुण देनेवाली अणिमादि सिद्धि प्राप्त होती हैं और उसके शरीरमें वायु संचार करताहै अर्थात् सुषुम्णामें प्रवेश करताहै और निश्चय रसकी वृद्धि होतीहै और सह-
पंचमपटलः । ( १५७ ) षद्दलकमलसे जो अमृत स्रवताहै उसकी वृद्धि होती है ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ अथ मणिपूरचक्रविवरणम् । मूलम्-तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञ- कम्॥दशारंडादिफान्तार्ण शोभितं हेमवर्ण कम् ॥ १०९॥ रुद्राख्यो यत्र सिद्धोऽस्ति सर्वमङ्गलदायकः ॥ तत्रस्था लाकिनी- नाम्नी देवी परमधार्मिका ॥ ११० ॥ टीका-मणिपूरनामक तीसरा पद्म जो नाभिस्थलमें है वह हेमवर्ण दशदलकरके शोभितहै और-ड-से फ-तक अर्थात् ड-ढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ-यह दश- वर्णसे युक्त है और उस स्थानमें सर्वमंगलदाता रु- द्रनामक सिद्ध और लाकिनी देवी अधिष्ठात्री और विष्णुदेवता हैं ॥ १०९ ॥ ११० ॥ मूलम्-तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके ॥ तस्य पातालसिद्धिः स्यान्नि- रन्तरसुखावहा ॥१११॥ ईप्सितञ्च भवे- ल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥ कालस्य व- ञ्चनञ्चापि परदेहप्रवेशनम् ॥ ११२ ॥ टीका-जो साधक इस मणिपूरचक्रको सर्वदा ध्या-
( १५८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । न करतेहैं सो सर्वसिद्धिदात्री जो पातालसिद्धि है उसको लाभ करते हैं और उनका दुःख रोगविनाश होके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और कालको नि- रादर कर देतेहैं और परदेहमें प्रवेश करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है ॥ १११ ॥ ११२ ॥ मूलम्-जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत् ॥ ओषधीदर्शनञ्चापि निधीनां द- र्शनं भवेत् ॥ ११३ ॥ टीका-यह साधकको सुवर्णआदि रचना करनेकी शक्ति होतीहै और देवतोंका दर्शन और निधि और ओषधीका दर्शन होताहै ॥ ११३ ॥ मूलम्-हृदयेऽनाहतंनाम चतुर्थं पङ्कजं भ- वेत् ॥११४॥ कादिठान्तार्णसंस्थानं द्वाद- शारसमन्वितम् ॥ अतिशोणं वायुबीजं प्रसादस्थानमीरितम् ॥ ११५ ॥ टीका-हृदयस्थानमें जो अनाहतनामक चतुर्थ पद्म है वह-क-से-ठ-तक अर्थात् क-ख-ग-घ-ङ-च-छ- ज-झ-ञ-ट-ठ-यह बारह वर्ण और बारहदलसे युक्त है और अति उज्ज्वल रक्तवर्णसे शोभायमान है और