शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
चतुर्थपटलः । ( ११९ ) टीका-वज्रोलीके भेदसे सहजोली और अमरोली मुद्राकी संज्ञा है योगीको उचित है कि सबप्रकारसे बिन्दुको धारण करे ॥ ९५ ॥ मूलम्-दैवाच्चलति चेदङ्गे मेलनं चन्द्रसूर्य- योः॥ अमरोलिरियं प्रोक्ता लिंगनालेन शोषयेत् ॥ ९६ ॥ टीका-यदि हठात् वेगवश बिन्दु चले और रजविन्दु- का सम्बन्ध होजाय तो इसको अमरोली कहते हैं परंतु लिङ्गनालद्वारा रजविन्दु दोनोंको शोषण करे ॥ ९६ ॥ मूलम्-गतं बिन्दुं स्वकं योगी बन्धयेद्योनिमु- द्रया ॥ सहजोलिरियं प्रोक्ता सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ ९७ ॥ टीका-निजविन्दु चलायमान होय तो योगी योनि- मुद्राके बन्धसे अवरोध करे इसको सहजोली कहते हैं यह सर्वतन्त्रों करके गोपनीय है ॥ ९७ ॥ मूलम्-संज्ञाभेदाद्भवेद्भेदः कार्यं तुल्यग- तिर्यदि ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साध्यते योगिभिः सदा ॥ ९८ ॥ . टीका-यदि कार्य एक समान है परन्तु संज्ञासे अमरोली और सहजोली दो भेद भया है इस हेतुसे
( १२० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । योगीको उचित है कि, यह दोनों अमरोली और सहजो- लीका यत्नपूर्वक सर्वदा साधन करे ॥ ९८ ॥ मूलम्-अयं योगो मया प्रोक्तो भक्तानां स्नेहतः प्रिये ॥ गोपनीयः प्रयत्नेन न देयो यस्य कस्यचित् ॥ ९९ ॥ टीका-हेप्रिये पार्वती ! हम भक्तोंपर प्रेम करके यह योग जो कहा है यत्नपूर्वक गोपनीय है सामान्य मनुष्य- को कदापि देना उचित नहीं है ॥ ९९ ॥ मूलम्--एतद्गुह्यतमं गुह्यं न भूतं न भविष्य ति ॥ तस्मादेतत्प्रयत्नेन गोपनीयं सदा बुधैः ॥ १०० ॥ टीका-इस वज्रोलीमुद्रासे अधिक गोपनीय न कुछ भया है न होगा. इसकारणसे बुद्धिमान साधकको यत्नपूर्वक इसको गोप्य रखना उचित है ॥ १०० ॥ मूलम्-स्वमूत्रोत्सर्गकाले यो बलादाकृ- ष्य वायुना ॥ स्तोकं स्तोकं त्यजेन्मूत्रमू- र्ध्वमाकृष्य तत्पुनः ॥१०१॥ गुरूपदिष्टमा- र्गेण प्रत्यहं यः समाचरेत् ॥ बिन्दुसिद्धि- र्भवेत्तस्य महासिद्धिप्रदायिका ॥ १०२ ॥
चतुर्थपटलः । (१२१) टीका-गुरूके उपदेशपूर्वक सर्वदा मूत्रत्यागनेके समय बलकरके वायुसे आकर्षणपूर्वक थोडा थोडा मूत्र त्यागकरे फिर ऊपरको आकर्षण करे तो उसका विन्दु सिद्ध होजायगा यह विन्दु की सिद्धी महासिद्धीकी दाता है अर्थात् परमपदको प्राप्त करती है ॥ १०१॥१०२॥ मूलम्-षण्मासमभ्यसेद्यो वै प्रत्यहं गुरु- शिक्षया ॥ शतांगनेपि भोगेपि तस्य बि- न्दुर्न नश्यति ॥ १०३ ॥ टीका-गुरूके शिक्षापूर्वक योगी यदि छः मास नि- त्य इसका अभ्यासकरे तो शत स्त्रीसे भोगकरेगा तो भी उसका विन्दुपात नहोगा ॥ १०३ ॥ मूलम्-सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिद्ध्य- ति पार्वति ॥ ईशत्वं यत्प्रसादेन ममापि दुर्लभं भवेत् ॥ १०४ ॥ टीका-हेपार्वती ! जब महायत्नसे विन्दु सिद्ध होजा- यगा तब क्या नहीं सिद्धहोगा अर्थात् सब सिद्ध हो- जायगा इसके प्रसादसे यह दुर्लभ ईशत्व हमको प्राप्त भयाहै ॥ १०४ ॥ अथ शक्तिचालनमुद्रा । मूलम्-आधारकमले सुप्तां चालयेत्कुण्ड-
( १२२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । लीं दृढाम्॥ अपानवायुमारुह्य बलादाकृ- ष्य बुद्धिमान् ॥ १०५ ॥ शक्तिचालनमु- द्रेयं सर्वशक्तिप्रदायिनी ॥ १०६ ॥ टीका-आधारकमलमें घोर निद्रित कुण्डलिनीको बुद्धिमान् अपानवायुपर आरूढहोके आकर्षणपूर्वक हठात् चलावे अर्थात् भ्रमावे यह शक्तिचालनमुद्रा सर्वशक्तिकी दाता है ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ मूलम्-शक्तिचालनमेवं हि प्रत्यहं यः स- माचरेत् ॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य रोगाणां च विनाशनम् ॥ १०७ ॥ टीका-यह शक्तिचालनमुद्रा जो प्रतिदिन करे तो उसके आयुकी वृद्धी होगी और सर्वरोगोंका इस मुद्राके प्रभावसे नाश होजायगा ॥ १०७ ॥ मूलम्-विहाय निद्रां भुजगी स्वयमूर्ध्वं भवेत्खलु ॥ तस्मादभ्यासनं कार्यं योगि- ना सिद्धिमिच्छता ॥ १०८ ॥ टीका-इस शक्तिचालनके साधनसे कुण्डलिनी नि- द्राको त्यागके आपही ऊर्ध्वगामी होजायगी यह नि- श्चय है. इस हेतुसे सिद्धिकी इच्छा करनेवाले योगीको उचित है कि, इसका अभ्यास करे ॥ १०८ ॥
चतुर्थपटलः । ( १२३) मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं शक्तिचाल- नमुत्तमम् ॥ येन विग्रहसिद्धिः स्यादाणि- मादिगुणप्रदा ॥ गुरूपदेशविधिना तस्य मृत्युभयं कुतः ॥ १०९ ॥ टीका-यदि इस उत्तमशक्तिचालनमुद्राका सदा अभ्यासकरे तो उसका शरीर सिद्ध अर्थात् अमर हो- जायगा और यह मुद्रा अणिमादिक सिद्धिकी दाता है. गुरूके उपदेशपूर्वक विधानसे जो इसका अभ्यास करे तो उसको मृत्युका भय नहीं है ॥ १०९ ॥ मूलम्-मुहूर्तद्वयपर्यन्तं विधिना शक्ति- चालनम् ॥ ११० ॥ यः करोति प्रयत्नेन त- स्य सिद्धिरदूरतः ॥ युक्तासनेन कर्तव्यं योगिभिः शक्तिचालनम् ॥ १११ ॥ टीका-जो विधानपूर्वक यत्नसे यदि दोमुहूर्तपर्यंत शक्तिचालन करे तो उसको सर्वसिद्धिकी प्राप्ति होगी. योगीको उचित है कि, गुरुके उपदेशानुसार योगासनसे युक्त होके शक्तिचालनका अभ्यास करे ॥११०॥१११॥ मूलम्-एतत्सुमुद्रादशकं न भूतं न भविष्य- ति ॥ एकैकाभ्यासने सिद्धिः सिद्धो भव- ति नान्यथा ॥ ११२ ॥
( १२४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हे पार्वती! यह दशमुद्रा जो हमने कहा है इसके समान न कुछ भया है न होगा इसके एक एकके अ- भ्यास सिद्ध होनेसे साधक सिद्ध होजायगा ॥ ११२ ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे मुद्राकथनं नाम चतुर्थपटलः समाप्तः ॥ ४ ॥ अथ पञ्चमः पटलः । मूलम्-श्रीदेव्युवाच ॥ ब्रूहि मे वाक्यमी- शान परमार्थधियं प्रति॥ ये विघ्नाः सन्ति लोकानां वद मे प्रिय शङ्कर ॥ १ ॥ टीका-श्रीपार्वतीजी कहती है कि, हेईश्वर ! हे प्रिय शङ्कर ! योगाभ्यासी लोगोंके प्रति जो विघ्न संसारमें हैं सो भक्तोंपर कृपा करके हमको कहो ॥ १ ॥ मूलम्-ईश्वर उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्या- मि यथा विघ्नाः स्थिताः सदा ॥ मुक्तिं प्र- ति नराणाञ्च भोगः परमबन्धनः ॥ २ ॥ टीका-श्रीईश्वर कहते हैं कि, हे देवी ! योगसाधनमें जो विघ्न हैं सो हम कहते हैं सुनो मनुष्योंके मुक्तिके प्रति भोग परमबन्धन है ॥ २ ॥ अथ भोगरूपयोगविघ्नविद्याकथनम् ॥ मूलम्-नारी शय्याऽसनं वस्त्रं धनमस्य विड-
पंचमपटलः। ( १२५) म्बनम्॥ ताम्बूलभक्ष्यानानि राज्यैश्वर्य- विभूतयः ॥३॥ हेमं रौप्यं तथा ताम्रं रत्न- श्चागुरुधेनवः॥पाण्डित्यं वेदशास्त्राणि नृ- त्यं गीतं विभूषणम् ॥४॥ वंशी वीणा मृद- ङ्गाश्च गजेंद्रश्चाश्ववाहनम् ॥ दारापत्यानि विषया विघ्ना एते प्रकीर्तिताः॥ भोगरूपा इमे विघ्ना धर्मरूपानिमाञ्छृणु ॥ ५॥ टीका-नारीसंसर्ग शय्या उत्तमआसन वस्त्र धन यह सब मोक्षके प्रति विडम्बना हैं ताम्बूलसेवन रथ शिविका आदि सवारी राजऐश्वर्य भोग स्वर्ण रजत ताम्र अनेकप्रकारके रत्न गोधन आदिका संग्रह पा- ण्डित्य करना वेदशास्त्रमें तर्क करना नृत्य गीत भूषण वंशी वीणा मृदङ्गादिक वाद्य बजाना गज अश्व आदि वाहन स्त्री पुत्र केवल गुरूकी सेवा छोडके हे पार्वती यह जो कहा है सो भोगरूप विघ्न है अब धर्मरूप विघ्न कहतेहैं श्रवण करो ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ अथ धर्मरूपयोगविघ्नकथनम् । मूलम्-स्नानं पूजाविधिर्होमं तथा मोक्ष- मयी स्थितिः ॥ व्रतोपवासनियममौ-
( १२६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । नमिन्द्रियनिग्रहः॥६॥ध्येयो ध्यानं तथा मन्त्रो दानं ख्यातिर्दिशासु च ॥ वापीकूप- तडागादिप्रासादारामकल्पना ॥७॥ यज्ञं चान्द्रायणं कृच्छ्रं तीर्थानि विविधानि च॥ दृश्यन्ते च इमे विघ्ना धर्मरूपेण सं- स्थिताः ॥ ८ ॥ टीका-स्नानविधि पूजा होम और सुखपूर्वक स्थिति व्रत उपवास नियम मौन इन्द्रियनिग्रह ध्येय किसीका ध्यान करना मन्त्र जप दान सर्वत्र प्रसिद्धहोना वावडी कूप तालाब मंदिर बगीचाआदिक बनवाना यज्ञ करना पापक्षयके हेतु चांद्रायण कृच्छ्र व्रत करना तीर्थों में भ्रमण करना यह सब धर्मरूप विघ्न हैं ॥ ६॥७॥८॥ अथ ज्ञानरूपविघ्नकथनम् । मूलम्-यत्तु विघ्नंभवेज्ज्ञानं कथयामि वरा- नने ॥ ९॥ गोमुखं स्वासनं कृत्वा धौति- प्रक्षालनं च तत् ॥ नाडीसञ्चारविज्ञानं प्रत्याहारनिरोधनम्॥१०॥ कुक्षिसंचालनं क्षिप्रं प्रवेश इन्द्रियाध्वना ॥ नाडीकर्मा- णि कल्याणि भोजनं श्रूयता॑मम ॥११॥ टीका-हे देवी ! हे वरानने ! अब ज्ञानरूप विघ्न कहते हैं
पंचमपटलः । ( १२७ ) सुनो-अन्तःशुद्धिके अर्थ गोमुखके सदृश वस्त्र भक्षण करके तब धौति प्रक्षालन करना अर्थात् धौतियोग करना नाडीचालनका ज्ञान वायुका प्रत्याहार निरोध करना कुण्डलिनीके बोधार्थ उदरको भ्रमावना इन्द्रिय- द्वारा शीघ्र प्रवेश नाडीकर्म अर्थात् नाडीशुद्धिके हेतु आहारीय विचार यह सब ज्ञानरूप विघ्न हैं हेदेवी क- ल्याणी ! नाडीशुद्धिके अर्थ जो भोजनविधि है सो हम कहतेंहैं सुनो ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥ मूलम्-नवधातुरसं छिन्धि शुण्ठिकास्ता- डयेत्पुनः ॥ एककालं समाधिः स्याल्लिं- गभूतमिदं शृणु ॥ १२ ॥ टीका-नवीन रससहित भोजन वस्तु और शुण्ठी- चूर्ण भोजनकरे इससे शीघ्र समाधि होजायगी. हे देवी ! अब उसका चिह्न कहतेंहैं सुनो ॥ १२ ॥ मूलम्-सङ्गमं गच्छ साधूनां सङ्कोचं भज दुर्जनात् ॥ प्रवेशनिर्गमे वायौर्गुरुलक्षं विलोकयेत् ॥ १३ ॥ टीका-साधुके सङ्गकी अभिलाषा और दुर्जनसे अ- लग रहनेका विचार रखना और वायुके प्रवेश निर्गममें और वायुके निरोध समय मात्रासे गुरुलघुके विचा- रार्थ संख्या करना ॥ १३ ॥
( १२८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-पिण्डस्थं रूपसंस्थञ्च रूपस्थं रूप- वर्जितम् ॥ ब्रह्मैतस्मिन्मतावस्था हृदयञ्च प्रशाम्यति ॥ इत्येते कथिता विघ्ना ज्ञान- रूपे व्यवस्थिताः ॥ १४ ॥ टीका-शरीरस्थरूपका विचार रखना और रूप कु- रूपका निर्णय करना और यह जगत् ब्रह्म है ऐसे वि- चारसे हृदयमें स्थिरता रखना. हेपार्वती ! यह जो कहा है सो सब ज्ञानरूप विघ्न हैं ॥ १४ ॥ अथ चतुर्विधयोगकथनम् । मूलम्-मन्त्रयोगोहठश्चैव लययोगस्तृतीय- कः ॥ चतुर्थो राजयोगः स्यात्स द्विधा भाववर्जितः ॥ १५ ॥ टीका-योग चार प्रकारका है-मन्त्रयोग, हठयोग, और तीसरा लययोग और चौथा राजयोग है. यह राज- योग द्वैतभावसे रहित है अर्थात् राजयोग सिद्धहो जानेसे जीव ईश्वरमें लयहोजाता है और कुछ बोध नहीं होता ॥ १५ ॥ मूलम्-चतुर्धा साधको ज्ञेयो मृदुमध्याधि- मात्रकाः ॥ अधिमात्रतमः श्रेष्ठो भवा- ब्धौ लंघनक्षमः ॥ १६ ॥
पंचमपटलः । ( १२९ ) टीका-यह योगचतुष्टयके साधकभी चार प्रकारके होते हैं अर्थात् मृदु मध्यम अधिमात्र और अधिमात्र- तम यह अधिमात्रतम साधक सबमें श्रेष्ठ है यही सा- धक संसाररूपी समुद्रके पार होनेमें समर्थ होताहै॥१६॥ अथ मृदुसाधकलक्षणम् । मूलम्--मन्दोत्साही सुसंमूढो व्याधिस्थो गु- रुदूषकः ॥ लोभी पापमतिश्चैव बह्वाशी वनिताश्रयः ॥ १७ ॥ चपलः कातरो रोगी पराधीनोऽतिनिष्ठुरः ॥ मन्दाचारो मन्द- वीर्यो ज्ञातव्यो मृदुमानवः ॥ १८ ॥ द्वाद- शाब्दे भवेत्सिद्धिरेतस्य यत्नतः परम् ॥ मन्त्रयोगाधिकारी स ज्ञातव्यो गुरुणा ध्रुवम् ॥ १९ ॥ टीका-अब मृदुसाधकलक्षण कहते हैं मन्द उत्सा- ही मूढचित्त व्याधिग्रसित गुरुनिन्दक लोभी जिसकी सर्वदा पापबुद्धि रहै बहुत भोजन करनेवाला स्त्रीके वशमें हो चञ्चल हो कातर हो रोगी हो पराधीन हो कठोर बोलनेवाला हो जिसके मन्द कर्म हों मंदवीर्यवाला हो ऐसे पुरुषको मृदु. मानव कहते हैं यह मन्त्रयोगका अधिकारी है यत्नकरनेसे और गुरुकी कृपासे इसकोभी
( १३०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । बारह वर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ मूलम्-समबुद्धिः क्षमायुक्तः पुण्यकांक्षी प्रियंवदः॥ मध्यस्थः सर्वकार्येषु सामा- न्यः स्यान्न संशयः ॥ २० ॥ एतज्ज्ञात्वैव गुरुभिर्दीयते मुक्तितो लयः ॥ २१ ॥ टीका-अब मध्यसाधकलक्षण कहतेहैं-सामान्य बुद्धि हो क्षमावानहो पुण्यकर्म करनेमें इच्छा रखताहो प्रिय बोलताहो सर्वकार्यमें मध्यस्थ रहताहो अर्थात् न हर्ष न विषाद इसको मध्यसाधक कहतेहैं यह निश्च- य है गुरु इसको विचारके मुक्तिमार्ग जो लययोग है उसका उपदेश करे ॥ २० ॥२१ ॥ अथ अधिमात्रसाधकलक्षणम् । मूलम्-स्थिरबुद्धिर्लये युक्तः स्वाधीनो वी- र्यवानपि ॥ महाशयो दयायुक्तः क्षमावा- न् सत्यवानपि ॥२२॥ शूरो वयःस्थः श्र- द्धावान् गुरुपादाब्जपूजकः ॥ योगाभ्या- सरतश्चैव ज्ञातव्यश्चाधिमात्रकः ॥ २३ ॥ एतस्य सिद्धिः षड्वर्षेर्भवेदभ्यासयोग- तः ॥ एतस्मै दीयते धीरो हठयोगश्च साङ्गतः ॥ २४ ॥ टीका-अब अधिमात्र साधक लक्षण कहतेहैं स्थिर
पञ्चमपटलः । ( १३१ ) बुद्धि हो लययोगमें समर्थहो स्वतन्त्र हो अर्थात् किसीके आधीन न हो वीर्य्यवान् हो महाशय हो दयावान् हो क्षमा- वान् हो सत्यवादी हो शूर हो समाधियोगमें श्रद्धा हो गुरुपादपद्मपूजक हो योगाभ्यासरत हो ऐसे गुणवाले पुरुषको अधिमात्र कहतेहैं योगाभ्याससे ऐसे पुरुष- को छः वर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी. गुरुको उचित है कि, ऐसे धीर पुरुषको अङ्गसहित हठयोगका उपदेश करे ॥ २२ ॥ २३ ॥ २४ ॥ अथ अधिमात्रतमसाधकलक्षणम् । मूलम्-महावीर्य्यान्वितोत्साही मनोज्ञः शौ- र्य्यवानपि॥ शास्त्रज्ञोऽभ्यासशीलश्च निर्मो- हश्च निराकुलः ॥ २५॥ नवयौवनसम्पन्नो मिताहारी जितेंद्रियः ॥ निर्भयश्च शुचि- र्दक्षो दाता सर्वजनाश्रयः ॥२६॥ अधि- कारी स्थिरो धीमान् यथेच्छावस्थितः क्षमी॥ सुशीलो धर्मचारी च गुप्तचेष्टः प्रि- यंवदः ॥ २७ ॥ शास्त्रविश्वाससम्पन्नो देवतागुरुपूजकः ॥ जनसंगविरक्तश्च म- हाव्याधिविवर्जितः ॥ २८ ॥ अधिमात्र- तमो ज्ञेयः सर्वयोगस्य साधकः ॥ त्रिभिः
( १३२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । संवत्सरैः सिद्धिरेतस्य नात्र संशयः ॥ सर्वयोगाधिकारी स नात्र कार्या विचा- रणा ॥ २९ ॥ टीका-महावीर्यवान् उत्साहयुक्त स्वरूपवान् शूर- तासम्पन्न शास्त्रज्ञ अभ्यासशील अर्थात् श्रुतिधर मो- हसे हीन आकुलतारहित अर्थात् सावधान नवीन यौवनसम्पन्न अर्थात् तरुण प्रमाणभोजी जितेन्द्रिय निर्भय पवित्राचार सर्वकर्ममें निपुण दानशील शरणागतपालक स्थिरचित्त बुद्धिमान् सन्तोषयुक्त क्षमावान् शीलवान् धार्मिक कर्मोंको गोप्य रखनेवाला प्रियसत्यवादी शास्त्रमें विश्वास देवता और गुरुपूजक जनसङ्गरहित महाव्याधिरहित ऐसे गुण जिसमें हो वह अधिमात्रतम है और सर्व योगका साधक है इसको तीनवर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है. यह सर्वयोगका अधिकारी है ऐसे पुरुषको गुरु समस्त योगका उपदेश करदें इसमें विचारका कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ अथ प्रतीकोपासनम् । मूलम्-प्रतीकोपासना कार्या दृष्टादृष्टफल- प्रदा ॥ पुनाति दर्शनादत्र नात्र कार्या विचारणा ॥ ३० ॥
पंचमपटलः। ( १०३ ) टीका-अब प्रतीकउपासना कहतेहैं प्रतीकउपास- नासे दृष्टादृष्टफल लाभ होताहै और उसके दर्शनसे मनुष्य पवित्र होताहै इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥ मूलम्-गाढातपे स्वप्रतिबिम्बितेश्वरं निरी- क्ष्य विस्फारितलोचनद्वयम् ॥ यदा नभः पश्यति स्वप्रतीकं नभोऽङ्गणे तत्क्षणमेव पश्यति ॥ ३१ ॥ टीका-गाढआतपमें अर्थात् गहरेधूपमें स्वईश्वरका प्रतिबिम्ब नेत्रास्थिरकरके देखे जब अपने छायाका प्रतिबिम्ब शून्यमें देखपडे तब ऊपर आकाशमें अपना प्रतिबिम्ब अवश्य देखेगा ॥ ३१ ॥ मूलम्-प्रत्यहं पश्यते यो वै स्वप्रतीकं नभो- ऽङ्गणे॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य न मृत्युः स्या- त्कदाचन ॥ ३२ ॥ टीका-जो नित्य आकाशमें स्वप्रतीक अर्थात् अपना प्रतिबिम्ब देखेगा उसके आयुकी वृद्धि होगी और उसकी मृत्यु कभी न होगी अर्थात् चिरंजीवी हो जायगा ॥ ३२ ॥ मूलम्-यदापश्यतिसम्पूर्णंस्वप्रतीकंनभो-
( १३४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ङ्गणे ॥ तदा जयं सभायाञ्च युद्धे निर्जित्य सञ्चरेत् ॥ ३३ ॥ टीका-जब सम्पूर्ण अपना प्रतिबिम्ब आकाशमें देखे तब सभामें उसकी जय होय और युद्धमें शत्रुको जीतलेगा ॥ ३३ ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं चात्मानं वन्दते परम् ॥ पूर्णानन्दैकपुरुषं स्वप्रती- कप्रसादतः ॥ ३४ ॥ टीका-जो सर्वदा स्वप्रतीक उपासनाका अभ्यास करे तो उसको आत्माकी प्राप्ति होगी और उसी स्वप्र- तीकके प्रसादसे पूर्णानन्द स्वरूप अर्थात् आत्माका दर्शन होगा. तात्पर्य यह है कि जब हृदयाकाशमें अपने स्वरूपका अनुभव होगा तब आत्माकी परम ज्योतिका प्रकाश होगा ॥ ३४ ॥ मूलम्-यात्राकाले विवाहे च शुभे कर्मणि सङ्कटे ॥ पापक्षये पुण्यवृद्धौ प्रतीकोपा- सनञ्चरेत् ॥ ३५ ॥ टीका-यात्राकालमें और विवाहके समयमें और शुभकर्ममें और पापक्षयमें और पुण्यवृद्धिके अर्थ स्वप्र- तीक अर्थात् अपने प्रतिबिम्बका दर्शन करे तो सर्वदा कल्याण होगा ॥ ३५ ॥
पंचमपटलः । ( ३३५ ) मूलम्--निरन्तरकृताभ्यासादन्तरे पश्यति ध्रुवम् ॥ तदा मुक्तिमवाप्नोति योगी नि- यतमानसः ॥ ३६ ॥ टीका-सर्वदा प्रतीकोपासनाके अभ्यास करनेसे निश्चय हृदयाकाशमें अपना प्रतिबिंब भान होगा तब निश्चयआत्मा योगीको मुक्ति प्राप्त होगी ॥ ३६ ॥ मूलम्--अंगुष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां द्विलोचने ॥ नासारन्ध्रे च मध्याभ्याम- नामाभ्यां मुखं दृढम् ॥ ३७ ॥ निरुध्य मारुतं योगी यदैव कुरुते भृशम् ॥ तदा तत्क्षणमात्मानं ज्योतीरूपं स पश्यति ३८ टीका-दोनों अंगुष्ठसे दोनों कर्ण बंद करे और दो- नों तर्जनीसे दोनों नेत्रोंको बंद करे और दोनों मध्य- मा अंगुलीसे दोनों नासारंध्रको बंद करे और दोनों अनामिका अंगुली और कनिष्ठासे मुखको बंद करे यदि इसप्रकार योगी वायुको निरोध करके इसका वारंवार अभ्यास करे तो आत्मा ज्योतिस्वरूपका हृदयाकाशमें भान होगा ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ मूलम्--तत्तेजो दृश्यते येन क्षणमात्रं निरा- कुलम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ ३९ ॥
( १३६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-आत्माका यह परमतेज जो पुरुष स्थिर- चित्त होके क्षणमात्रभी देखेगा वह सर्वपापसे मुक्त होके परमगतिको प्राप्तहोगा ॥ ३९ ॥ मूलम्-निरन्तरकृताभ्यासाद्योगीविगतक- ल्मषः ॥ सर्वदेहादि विस्मृत्य तदभिन्नः स्वयं गतः ॥ ४० ॥ टीका-निरंतर जो योगी शुद्धचित्त होके यह प्र- तीकोपासनाका अभ्यास करेगा वह सर्व देहादिक- मेंसे रहित होके आत्मासे अभिन्न होजायगा अर्थात् आत्मास्वरूप होजायगा ॥ ४० ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं गुप्ताचारेण मानवः॥ स वै ब्रह्मविलीनः स्यात्पापकर्म- रतो यदि ॥ ४१ ॥ टीका-जो मनुष्य गुप्ताचारसे इसका सर्वदा अभ्या- स करताहै सो यदि पापकर्मरतभी हो तथापि उसका मोक्ष होगा ॥ ४१ ॥ मूलम्-गोपनीयः प्रयत्नेन सद्यः प्रत्यय- कारकः ॥ निर्वाणदायको लोके योगोयं मम वल्लभः ॥ नादः संजायते तस्य क्रमे- णाभ्यासतःश्च यः॥ ४२ ॥
पंचमपटलः । (१३७) टीका-जो इसका अभ्यास करेगा उसको क्रमसे नाद उत्पन्न होगा. हेदेवि ! यह प्रतीकोपासना निर्वाण योगका दाता है इसहेतुसे हमको अतिप्रिय है यह शीघ्र फलदाता है इसको यत्नसे गोप्य रखना उचि- त है ॥ ४२ ॥ मूलम्--मत्तभृङ्गवेणुवीणासदृशः प्रथमोध्व- निः ॥ ४३ ॥ एवमभ्यासतः पश्चात् संसा- रध्वान्तनाशनम् ॥ घण्टानादसमः पश्चात् ध्वनिर्मेघरवोपमः ॥ ४४ ॥ ध्वनौ तस्मि- न्मनो दत्त्वा यदा तिष्ठति निर्भरः ॥ तदा संजायते तस्य लयस्य मम वल्लभे ॥ ४५॥ टीका-योगअभ्यासद्वारा प्रथम मत्त भ्रमरकी नाई शब्द और वेणु और वीणाके समान शब्द उत्पन्न होगा इसी तरह संसारतम नाशक योगअभ्याससे फिर घंटानाद समान शब्द होगा. फिर मेघ गर्जनके समान ध्वनि होगी. हे प्रिये पार्वती ! उस ध्वनिमें यदि मन निश्चल स्थित हो जाय तब मोक्षका दाता लय उत्पन्न होगा ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ मूलम्--तत्र नादे यदा चित्तं रमते योगिनो भृशम् ॥ विस्मृत्य सकलं बाह्यं नादेन सह शाम्यति ॥ ४६ ॥
( १३८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जब योगीका चित्त उस नादमें निरंतर रम- णकरेगा तब सकल विषयसे स्मरणरहित होके चित्त समाधिमें लय होजायगा ॥ ४६ ॥ मूलम्-एतदभ्यासयोगेन जित्वा सम्य- ग्गुणान्बहून् ॥सर्वारम्भपरित्यागी चिदा- काशे विलीयते ॥ ४७ ॥ टीका-इसीप्रकार योगअभ्यासद्वारा सर्व गुणोंको जीतके और सब कार्योंके आरंभको त्यागके योगी आनंदपूर्वक चैतन्यस्वरूप हृदयाकाशमें लय होजायगा ॥ ४७ ॥ मूलम्-नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भसदृशं बलम् ॥ न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृ- शो लयः ॥ ४८ ॥ टीका-हेदेवी ! सिद्धासनके समान कोई और आस- न नहीं है और न कुम्भकके समान कोई बल है और न खेचरीके समान कोई मुद्रा है और न नादके समान कोई दूसरा लय है ॥ ४८ ॥ अथ मूलाधारपद्मविवरणम् । मूलम्-इदानीं कथयिष्यामि मुक्तस्यानुभवं