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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

चतुर्थपटलः । ( ९९ ) प्यहै पहिले वामांगसे अभ्यास करके फिर दक्षिण अं- गसे अभ्यास करे योगी स्थिरबुद्धिको उचित है कि, इस प्रकारसे प्राणायामको समकरे ॥२७॥२८॥२९॥३०॥ मूलम्--अनेन विधिना योगी मन्दभाग्यो- ऽपि सिध्यति॥ सर्वासामेव नाडीनां चालनं बिन्दुमारणम् ॥३१॥जीवनन्तु कपायस्य पातकानां विनाशनम् ॥ कुण्डलीतापनं वायोर्ब्रह्मरन्ध्रप्रवेशनम् ॥ ३२ ॥ सर्वरो- गोपशमनं जठराग्निविवर्धनम् ॥ वपुषा कान्तिममलांजरामृत्युविनाशनम्॥ ३३॥ वांछितार्थफलं सौख्यमिन्द्रियाणाञ्च मा- रणम्॥ एतदुक्तानि सर्वाणि योगारूढस्य योगिनः ॥ ३४ ॥ भवेदभ्यासतोऽवश्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ टीका-इस विधानसे मन्दभाग्य योगीभी सिद्ध होजा- यगा और इस महामुद्राके प्रभावसे सर्व नाडीका च- लन सिद्ध होजायगा और बिन्दु स्थिर होगा और जी- वनको आकर्षित रक्खेगा और सर्व पातकका नाश हो- जायगा और कुण्डलिनीको हठात् उठाय वायुको ब्रह्मर- न्ध्रमें प्रवेश करेगा और ज़ठराग्नि प्रज्वलित होके सर्वरो-

(१००) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । गोंका नाश करदेगा और शरीरमें सुन्दर कान्ति होगी और वृद्धावस्थासहित मृत्युका नाश होजायगा और सुखसहित वाञ्छित फल लाभ होगा और इन्द्रियोंका निग्रह रहेगा यह सब जो कहा है सो योगारूढ यो- गीको अभ्याससे वश होजाताहै इसमें संशय नहीं है निश्चय है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजि- ते ॥ यां तु प्राप्य भवाम्भोधेः पारं गच्छ- न्ति योगिनः ॥ ३५ ॥ टीका-हेसुरपूजिते देवी ! यह मुद्रा यत्न करके गो- पनीय है योगीलोग इसको लाभ करके संसाररूपी स- मुद्रके पार होजाते हैं ॥ ३५ ॥ मूलम्-मुद्रा कामदुघा ह्येषा साधकानां म- योदिता ॥ गुप्ताचारेण कर्त्तव्या न देया यस्य कस्यचित् ॥ ३६ ॥ टीका-हेदेवी ! यह मुद्रा जो हमने कही है साधकोंको कामधेनुरूप है अर्थात् वाञ्छितफलकी दाता है इसको गुप्त करके अभ्यास करना उचित है और सबको अर्थात् अनधिकारीको देना उचित नहीं है ॥ ३६ ॥ अथ महाबन्धकथनम् । मूलम्-ततः प्रसारितः पादो विन्यस्य तमूरु-

चतुर्थपटलः । ( १०१ ) परि ॥ ३७ ॥ गुदयोनिं समाकुंच्य कृत्वा चापानमूर्ध्वगम् ॥ योजयित्वा समानेन कृत्वा प्राणमधोमुखम् ॥ ३८ ॥ बन्धयेदू- र्ध्वगत्यर्थं प्राणापानेन यः सुधीः ॥ कथि- तोऽयं महाबन्धः सिद्धिमार्गप्रदायकः ॥ ॥ ३९ ॥ नाडीजालाद्रसव्यूहो मूर्धानं याति योगिनः ॥ उभाभ्यां साधयेत्प- द्भ्यामेकैकं सुप्रयत्नतः ॥ ४० ॥ टीका-तदनन्तर पादको प्रसारके अर्थात् फैलाके दक्षिणचरणको वाम ऊरूपर स्थित करके और गुदा और योनिको आकुञ्चन करके अपानको ऊर्ध्व करके समानवायुके साथ सम्बन्ध करके और प्राणवायुको अधोमुख करे यह बन्ध प्राण अपानके ऊर्द्धगतिके हेतु बुद्धिमान् साधकके प्रति कहाहै और यह महाबन्ध सिद्धिमार्गका दाता है और योगीलोगोंके नाडियोंका रससमूह इस बन्धसे ऊपरको गमन करताहै यह दोनों मुद्रा और बन्ध एक एकको दोनों अंगसे यत्न करके करना उचितहै ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४० ॥ मूलम्-भवेदभ्यासतो वायुः सुषुम्नामध्य- सङ्गतः॥अनेन वपुषः पुष्टिर्दृढबन्धोऽस्थि-

३. तृतीय पटल: प्राणायाम, पवन-विजय व यौगिक सिद्धियाँ

( १०२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पञ्जरे ॥ ४१ ॥ संपूर्णहृदयो योगी भव- न्त्येतानि योगिनः॥ बन्धेनानेन योगी- न्द्रः साधयेत्सर्वमीप्सितम् ॥ ४२ ॥ टीका-अभ्याससे प्राणवायु सुषुम्णाके मध्यमें स्थित होगा और इस महाबंधके प्रभावसे शरीर पुष्ट रहेंगा और अस्थिपंजर और शरीरका सब बन्ध दृढ अर्थात् बलिष्ठ होजायगा और योगीका हृदय सन्तोषसे पूर्ण और आनन्दित रहेगा. यह सब योगीको इस महा- बन्धके प्रभावसे स्वयं लाभ होजायगा और इसी बन्धके साधनसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार सब सिद्ध करलेगा ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ अथ महावेधकथनम् । मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं कृत्वा त्रिभुवने- श्वरि॥महावेधस्थितो योगी कुक्षिमापूर्य वायुना ॥ स्फिचौ संताडयेद्धीमान्वेधो- ऽयं कीर्तितो मया ॥ ४३ ॥ टीका-हे त्रिभुवनेश्वरी ! अपान और प्राणको एक करके महावेधस्थित योगी उदरको वायुसे पूर्ण करके बुद्धिमान् दोनों स्फिच् अर्थात् पार्श्वको ताडन करे इसको हमने वेध कहा है ॥ ४३ ॥

चतुर्थपटलः । ( १०३ ) मूलम्-वेधेनानेन संविध्य वायुनायोगिपुंग- वः ॥ ग्रंथिं सुषुम्णामार्गेण ब्रह्मग्रंथिं भि- नत्त्यसौ ॥ ४४ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी इस वेधद्वारा वायुसे सर्व ग्रन्थीको वेधन करके सुषुम्नारन्ध्रद्वारा ब्रह्मग्रंथीको भेदन करताहै ॥ ४४ ॥ मूलम्-यःकरोति सदाभ्यासं महावेधं सुगो- पितम् ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य जरामरण नाशिनी ॥ ४५ ॥ टीका-जो मनुष्य इस उत्तम महावेधको गोपित करके सर्वदा अभ्यास करेगा उसकी जरामरण नाशि- नी वायुसिद्धि होजायगी ॥ ४५ ॥ मूलम्-चक्रमध्ये स्थिता देवाः कम्पन्ति वायुताडनात् ॥ कुण्डल्यपि महामाया कैलासे सा विलीयते ॥ ४६ ॥ टीका-शरीरस्थ चक्रमें जो देवता हैं वह वायुके ताडनसे कम्पायमान होते हैं और महामाया कुण्डलि- नी देवी कैलास अर्थात् ब्रह्मस्थानमें लय होती है तात्प- र्य यह है कि, चक्रस्थित देवता अर्थात् गणेशजी, ब्रह्मा, विष्णु, महादेवजी, मायाधीश ज्योतिस्वरूप ईश्वर क्रमसे

( १०४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञाच- क्रमें जो स्थित हैं वायुके वेगसे चक्ररन्ध्रको छोडदेते हैं तब वायुका प्रवेश होताहै इसहेतुसे यह महावेध अवश्य करना उचित है ॥ ४६ ॥ मूलम्-महामुद्रामहाबन्धौ निष्फलौ वेधव- र्जितौ ॥ तस्माद्योगी प्रयत्नेन करोति त्रितयं क्रमात् ॥ ४७ ॥ टीका-महामुद्रा और महाबन्ध विना वेधके निष्फ- ल हैं अर्थात् वेध न करनेसे मुद्रा और बन्धका कुछ फल नहोगा इसहेतुसे योगीको उचित है कि, यत्नपूर्वक क्रम- से मुद्रा, बन्ध, वेध तीनोंका अभ्यास करे ॥ ४७ ॥ मूलम्-एतत्त्रयं प्रयत्नेन चतुर्वारं करोति यः ॥ षण्मासाभ्यन्तरं मृत्युं जयत्येव न संशयः ॥ ४८ ॥ टीका-जो यह मुद्रा बन्ध वेध तीनोंका अभ्यास यत्न करके रात्रि दिवसमें चारवार करेगा सो छःमास- में निश्चय मृत्युको जीतलेगा इसमें संशय नहीं है ॥४८॥ मूलम्-एतत्रयस्य माहात्म्यं सिद्धो जाना- ति नेतरः ॥ यज्ज्ञात्वा साधकाः सर्वे सिद्धिं सम्यगलभन्ति वै ॥ ४९ ॥

चतुर्थपटलः । ( १०५ ) टीका-यह तीनोंके माहात्म्यको सिद्धलोक जानते हैं इतरलोग अर्थात् सांसारिक मनुष्य नहीं जानते इसके जानलेनेसे साधकलोगोंको सर्वसिद्धिलाभ होती है ॥४९॥ मूलम्--गोपनीया प्रयत्नेन साधकैः सिद्धि- मीप्सुभिः ॥ अन्यथा च न सिद्धिः स्यान्मुद्राणामेष निश्चयः ॥ ५० ॥ टीका-सिद्धाकांक्षी साधकको उचित है कि, यह सब मुद्राको यत्नपूर्वक गोप्य रक्खे इनको प्रकाश करनेसे कदापि सिद्धि नहोगी यह निश्चय है ॥ ५० ॥ अथ खेचरीमुद्राकथनम् । मूलम्-भ्रुवोरन्तर्गतां दृष्टिं विधाय सुदृढां सुधीः ॥ ५१ ॥ उपविश्यासने वज्रे नानो- पद्रववर्जितः ॥ लम्बिकोर्ध्वं स्थिते गर्ते रसनां विपरीतगाम् ॥ ५२ ॥ संयोजये- त्प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः ॥ मुद्रैषा खेचरी प्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः ॥५३॥ टीका-बुद्धिमान् साधक दोनों भ्रू अर्थात् भ्रुकुटी- के मध्यमें दृढ करके दृष्टिको स्थिर करके और नाना- उपद्रवरहित होके वज्रासन अर्थात् सिद्धासनसे स्थित होयके जिह्वाको विपरीत अर्थात् ऊपर सुधाकूप स्वरूप

( १०६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । तालूविवरमें यत्नसे बुद्धिमान् साधक संयोजित करे अर्थात् संबन्धकरे हेपार्वती ! भक्तोंके प्रति हमने प्रकाश करके यह खेचरीमुद्रा कही है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ मूलम्-सिद्धीनां जननी ह्येषा मम प्राणा- धिकप्रिया ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्पी- यूषं प्रत्यहं पिबेत् ॥ तेन विग्रहसिद्धिः स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ५४ ॥ टीका-यह खेचरीमुद्रा सर्वसिद्धिकी माता है और हेदेवी ! हमको प्राणसेभी अधिक प्रिय है जो निरंतर इ- सके अभ्याससे नित्य अमृतपान करताहै उस कारणसे शरीर सिद्ध होजाताहै अर्थात् नाश नहीं होता और मृत्युरूप हस्तीको यह खेचरीरूपी सिंह हन्ताहै ॥ ५४ ॥ मूलम्-अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ॥ खेचरी यस्य शुद्धा तु स शुद्धो नात्र संशयः ॥ ५५ ॥ टीका-अपवित्र होय वा पवित्र होय अथवा किसी अवस्थामें होय जिसको यह खेचरीमुद्रा सिद्ध है वह सर्वदा शुद्ध है इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥ मूलम्-क्षणार्धं कुरुते यस्तु तीर्त्वा पापम- हार्णवम् ॥ दिव्यभोगान्प्रभुक्त्वा च सत्कुले स प्रजायते ॥ ५६ ॥

चतुर्थपटलः। (१०७) टीका-जो इस खेचरीमुद्राको क्षणार्धभी करेगा वह महापापसागरके पार होके सुखपूर्वक स्वर्गका भोग भोगेगा पश्चात् उत्तमकुलमें उसका जन्म होगा ॥५६॥ मूलम्-मुद्रैषा खेचरी यस्तु स्वस्थचित्तो ह्यतन्द्रितः ॥ शतब्रह्मगतेनापि क्षणार्धं मन्यते हि सः ॥ ५७ ॥ टीका-जो मनुष्य इस खेचरीमुद्राको स्वस्थचित्त ब्रह्मपरायणहोके करेगा उसको यदि शतब्रह्माभी गत भावको प्राप्तहों क्षणार्ध प्रतीत होगा ॥ ५७ ॥ मूलम्-गुरूपदेशतो मुद्रां यो वेत्ति खेचरी- मिमाम् ॥ नानापापरतो धीमान्स याति परमां गतिम् ॥ ५८ ॥ टीका-गुरूपदेशसे जिसको यह खेचरीमुद्रा लाभ होगी वह यदि नानापापरत होगा तो भी बुद्धिमान् साधक परमगतिको प्राप्तहोगा अर्थात् मोक्ष होजा- यगा ॥ ५८ ॥ मूलम्-सा प्राणसदृशी मुद्रा यस्मिन्क- स्मिन्न दीयते ॥ प्रच्छाद्यते प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजिते ॥ ५९ ॥ टीका-हे सुरपूजिते पार्वती ! यह खेचरीमुद्रा प्राणके

( १०८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । बराबर है सामान्य मनुष्यको देना उचित नहीं है इस मुद्राको यत्न करके गोपित रखनेमें कल्याण है ॥ ५९ ॥ अथ जालन्धरबन्ध । मूलम्-बद्धागलशिराजालं हृदये चिबुकं न्यसेत् ॥ बन्धो जालन्धरः प्रोक्तो देवाना- मपि दुर्लभः ॥६०॥ नाभिस्थवह्निर्जन्तूनां सहस्रकमलच्युतम्॥पिबेत्पीयूषविस्तारं तदर्थं बन्धयेदिमम् ॥ ६१ ॥ टीका-गुरूपदेशद्वारा गलशिराजालको बांधके चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयमें स्थित करे इसको जा- लन्धरबन्ध कहते हैं यह देवतोंकोभी दुर्लभ है नाभि- स्थित जीव जठरानल सहस्रदल कमलसे जो अमृत स्रवताहै उसको पान करजाताहै इस हेतुसे यह जाल- न्धरबन्ध करना उचित है तात्पर्य यह है कि, नाभिस्थित सूर्य अमृतको पान करजाते हैं इसीकारणसे मृत्यु हो- तीहै इस जालन्धरबन्धके करनेसे चंद्रमण्डलच्युत अमृत सूर्यमण्डलमें नहीं जाता योगी आपही पान करके चिरं- जीव रहताहै ॥ ६० ॥ ६१ ॥ मूलम्-बन्धेनानेन पीयूषं स्वयं पिबति बु- द्धिमान् ॥ अमरत्वञ्च सम्प्राप्य मोदते भुवनत्रये ॥ ६२ ॥

चतुर्थपटलः । ( १०९ ) टीका-इस जालन्धरबन्धके प्रभावसे बुद्धिमान् योगी स्वयं अमृत पान करताहै और अमरत्वको पाय- के तीनोंलोकमें आनन्दपूर्वक विचरता है ॥ ६२ ॥ मूलम्-जालन्धरो बन्ध एष सिद्धानां सि- द्धिदायकः॥ अभ्यासः क्रियते नित्यं यो- गिना सिद्धिमिच्छता ॥ ६३ ॥ टीका-यह जालन्धरबन्ध सिद्धोंको सिद्धिदेनेवाला है इस कारणसे सिद्धिकांक्षी योगीको इसका नित्य अ- भ्यास करना उचित है ॥ ॥ ६३ ॥ अथ मूलबन्धः । मूलम्-पादमूलेन संपीड्य गुदमार्गेषु य- न्त्रितम् ॥६४॥ बलादपानमाकृष्य क्रमा- दूर्ध्वं सुचारयेत् ॥ कल्पितोऽयं मूलबन्धो जरामरणनाशनः ॥ ६५ ॥ टीका-पादमूल अर्थात् एडीसे गुदामार्गको आकु- ञ्चन करके पीडितकरे और बलसे अपानवायुको आक- र्षण करके ऊर्ध्वको लेजाय अर्थात् प्राणके साथ सम्बन्धकरे इसको मूलबन्ध कहतेहैं यहबन्ध जरा मरणका नाश करनेवाला ह ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं प्रकरोत्यधि-

( ११० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कल्पितम् ॥ बन्धेनानेन सुतरां योनिमुद्रा प्रसिद्ध्यति ॥ ६६ ॥ टीका-इस कल्पितबन्धसे अपान और प्राणको एक करे और इसी मूलबन्धके प्रभावसे योनिमुद्रा आपही सिद्ध होजायगी ॥ ६६ ॥ मूलम्-सिद्धायां योनिमुद्रायां किं न सिध्य- ति भूतले ॥ बन्धस्यास्य प्रसादेन गगने विजितानिलः ॥ पद्मासने स्थितो योगी भुवमुत्सृज्य वर्तते ॥ ६७ ॥ टीका-योनिमुद्राके सिद्ध होनेसे सिद्धलोगोंको इस संसारमें सब सिद्ध होसक्ताहै इस मूलबन्धके प्रसा- दसे वायुको योगी जीतके पद्मासनस्थित होके भूमिको त्याग देगा और आकाशमें गमन करेगा ॥ ६७ ॥ मूलम्-सुगुप्ते निर्जने देशे बन्धमेनं सम- भ्यसेत् ॥ संसारसागरं तर्तुं यदिच्छेद्व्यो- गिपुंगवः ॥ ६८ ॥ टीका-पवित्र योगी यदि संसारसागरसे पार होने- की इच्छा करे तो निर्जनदेश और गुप्तस्थानमें इस मूलबन्धका अभ्यास करना उचित है ॥ ६८ ॥ अथ विपरीतकरणी मुद्रा । मूलम्-भूतले स्वशिरोदत्त्वा खे नयेच्चरणद्व-

चतुर्थपटलः । ( १११ ) यम् ॥ विपरीतकृतिश्चैषा सर्वतन्त्रेषु गो- पिता ॥ ६९ ॥ टीका-साधक अपने शिरको भूमिपर धरे और दोनों चरणोंको ऊपर आकाशमें निरालम्ब स्थिर करे यह विपरीतकरणी मुद्रा सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है अर्थात् प्रकाश करने योग्य नहीं है ॥ ६९ ॥ मूलम्-एतद्यः कुरुते नित्यमभ्यासं याम- मात्रतः ॥ मृत्युं जयति योगीशः प्रलये नापि सीदति ॥ ७० ॥ टीका-इसप्रकारसे इस मुद्राका अभ्यास नित्य एक प्रहर करे तो योगी निश्चय मृत्युको जीतलेगा और प्रलयमेंभी उसको कुछ कष्ट न होगा ॥ ७० ॥ मूलम्-कुरुतेऽमृतपानं यः सिद्धानां सम- तामियात् ॥ स सेव्यः सर्वलोकानां बन्ध- मेनं करोति यः ॥ ७१ ॥ टीका-जो पुरुष शरीरस्थअमृतपान करता है उस- को सिद्धोंकी समता प्राप्त होती है और इस मुद्राबन्ध- को जो करताहै वह सर्वलोकमें पूजनीय है ॥ ७१ ॥ मूलम्-नाभेरूर्ध्वमधश्चापि तानं पश्चिम- माचरेत् ॥ उड्ड्यानबंध एष स्यात्सर्वदुः-

( ११२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । खौघनाशनः ॥ ७२ ॥ उदरे पश्चिमं तानं नाभेरूर्ध्वं तु कारयेत् ॥ उड्ड्यानाख्यो- ऽत्र बन्धोयं मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ७३ ॥ टीका—नाभिसे ऊपर और नीचेको आकुञ्चन करे इसको उड्ड्यानबन्ध कहते हैं यह दुःखके समूहको नाशकरनेवाला है उदरको पीछे आकर्षण करे और नाभिसे ऊपर भागमें आकुञ्चन करे यह उड्ड्यानबन्ध है और मृत्युरूपी मातङ्गका नाशकरनेवाला यह बंध- रूपी सिंह है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ मूलम्-नित्यं यः कुरुते योगी चतुर्वारं दिने दिने॥ तस्य नाभेस्तु शुद्धिः स्याद्येन सिद्धो भवेन्मरुत् ॥ ७४ ॥ टीका-जो योगी नित्य इस बंधको चारवार अ- भ्यास करेगा उसका नाभिचक्र शुद्ध होके वायु सिद्ध होजायगा ॥ ७४ ॥ मूलम्-षण्मासमभ्यसन्योगी मृत्युं जयति निश्चितम् ॥ तस्योदराग्निर्ज्वलति रसवृ- द्धिः प्रजायते ॥ ७५ ॥ टीका-योगी यदि छः मास इस बंधका अभ्यास करे तो निश्चय मृत्युको जीतलेगा और उसका जठरा-

चतुर्थपटलः । ( ११३ ) नल विशेष प्रज्वलित होगा और रसकी वृद्धि उत्पन्न होगी ॥ ७५ ॥ मूलम्-अनेन सुतरां सिद्धिर्विग्रहस्य प्रजा- यते ॥ रोगाणां संक्षयश्चापि योगिनो भव- ति ध्रुवम् ॥ ७६ ॥ टीका-इस उड्डयानबंधके प्रभावसे योगीका शरीर आपही सिद्ध हो जायगा अर्थात् अमर होजायगा और सर्व रोगोंका निश्चय क्षय होजायगा ॥ ७६ ॥ मूलम्-गुरोर्लब्ध्वा प्रयत्नेन साधयेत्तु विच- क्षणः ॥ निर्जने सुस्थिते देशे बन्धं परम- दुर्लभम् ॥ ७७ ॥ टीका-गुरुसे यत्नपूर्वक इस परमदुर्लभ बन्धको लाभ करके बुद्धिमान् साधक एकांतस्थानमें स्वस्थ- चित्त होके साधन करे ॥ ७७ ॥ अथ वज्रोलीमुद्रा । मूलम्-वज्रोलीं कथयिष्यामि संसारध्वा- न्तनाशिनीम् ॥ स्वभक्तेभ्यः समासेन गुह्याद्गुह्यतमामपि ॥ ७८ ॥ टीका-हे देवी ! संसारतमनाशिनी परमगोपनीय वज्रोली मुद्रा भक्तलोगोंके प्रति हम कहते हैं ॥ ७८ ॥

( ११४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-स्वेच्छया वर्तमानोपि योगोक्तनिय- मैर्विना॥ मुक्तो भवति गार्हस्थ्यो वज्रोल्य- भ्यासयोगतः ॥ ७९ ॥ टीका-गृहस्थ अपनी इच्छापूर्वक गृहमें भोग करे- गा और योगमें जो नियम कहा है उसके विना इस व- ज्रोलीमुद्राके योग अभ्याससे मुक्त होजायगा ॥ ७९ ॥ मूलम्-वज्रोल्यभ्यासयोगोऽयं भोगयुक्ते- ऽपि मुक्तिदः ॥ तस्मादतिप्रयत्नेन कर्त- व्यो योगिभिः सदा ॥ ८० ॥ टीका-यह वज्रोलीका योगअभ्यास भोगयुक्त म- नुष्योंके प्रति मुक्तिका दाता है इसकारणसे अतियत्न करके सर्वदा योगीको अभ्यास करना उचित है ॥ ८० ॥ मूलम्-आदौ रजः स्त्रियो योन्या यत्नेन वि- धिवत्सुधीः ॥ आकुंच्य लिंगनालेन स्व- शरीरे प्रवेशयेत् ॥ ८१ ॥ स्वकं बिंदुञ्च सं- र्बन्ध्य लिंगचालनमाचरेत् ॥ दैवाच्चल- ति चेदूर्ध्वं निबद्धो योनिमुद्रया ॥ ८२ ॥ वाममार्गेऽपि तद्विन्दुं नीत्वा लिङ्गं निवार- येत् ॥ क्षणमात्रं योनितो यः पुमांश्चालन-

चतुर्थपटलः । (११५) माचरेत् ॥ ८३ ॥ गुरूपदेशतो योगी हुंहु- ङ्कारेण योनितः ॥ अपानवायुमाकुंच्य बलादाकृष्य तद्रजः ॥ ८४ ॥ टीका-प्रथम बुद्धिमान् साधक यत्न करके विधान पूर्वक स्त्रीके योनिसे रजको लिङ्गनालमें आकर्षण क- रके अपने शरीरमें प्रवेश करे और अपने बिन्दुको नि- रोध करके लिङ्ग चालनकरे यदि दैवात् बिन्दु अपने स्थानसे चले तो योनिमुद्रासे निरोध करके ऊपरको आकर्षण करे और उस बिन्दुको वामभागमें स्थित क- रके क्षणमात्र लिङ्गचालन निवारण करे फिर गुरूपदे- शद्वारा योगी हुंहुंकार शब्द उच्चारणपूर्वक योनिमें लिङ्ग चालन करे और बलसे अपानवायुको आकुञ्चन करके स्त्रीके रजको आकर्षण करे इसको वज्रोली मुद्रा कहते हैं ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ मूलम्-अनेन विधिना योगी क्षिप्रं योगस्य सिद्धये ॥ गव्यभुक्कुरुते योगी गुरुपा- दाब्जपूर्वकः ॥ ८५ ॥ टीका-इस विधानसे योगीको शीघ्र योग सिद्ध हो- गा और गुरुपादपद्मपूजक योगी शरीरस्थ अमृतपान करेगा ॥ ८५ ॥

( ११६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-बिन्दुंविधुमयो ज्ञेयो रजः सूर्यमय- स्तथा ॥ उभयोर्मेलनं कार्यं स्वशरीरे प्र- वेशयेत् ॥ ८६ ॥ टीका-बिन्दुरूपी चन्द्र और रजरूपी सूर्य यह जानकर दोनोंका सम्बन्ध करके अपने शरीरमें प्रवेश करना उचित है ॥ ८६ ॥ मूलम्-अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा ॥ योगिनां साधनावस्था भवेद्दिव्यं वपुस्तदा ॥ ८७ ॥ टीका-यदि शिवरूपी बिन्दु और रजरूपी शक्ति यह दोनोंका सम्बन्ध होगा तब योगीका साधनसे दिव्य शरीर अर्थात् देवतोंके समान शरीर होगा तात्पर्य यह है कि शिवशक्ति अर्थात् माया ईश्वरके सम्बन्ध वा मायाको ईश्वरमें लय करनेसे जिसको अध्यारोप अप- वाद कहते हैं योगी मोक्ष होता है अभिप्राय यह है कि, रजविन्दुका सम्बन्ध जिस साधकको सिद्ध होजाताहै वह मुक्त है ॥ ८७ ॥ मूलम्-मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधा- रणे ॥ तस्मादतिप्रयत्नेन कुरुते बिन्दुधा- रणम् ॥ ८८ ॥

चतुर्थपटलः । ( ११७ )

टीका-बिन्दुपात होनेसे मृत्यु होती है और बिन्दु- के धारणसे प्राणी जीवताहै इस कारणसे यत्नसे बिन्दु- को धारण रखना उचित है ॥ ८८ ॥

मूलम्-जायते म्रियते लोके बिन्दुना नात्र संशयः ॥ एतज्ज्ञात्वा सदा योगी बिन्दु- धारणमाचरेत् ॥ ८९ ॥

टीका-प्राणीका जन्म मरण बिन्दुसे होताहै इसमें संशय नहीं है. इस हेतुसे इसको विचारके योगीको उ- चित है कि, विन्दुको सर्वदा धारण रक्खे ॥ ८९ ॥

मूलम्-सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिध्य- ति भूतले ॥ यस्य प्रसादान्महिमा ममा- प्येतादृशो भवेत् ॥ ९० ॥

टीका--हे पार्वती ! यत्नपूर्वक बिन्दुके सिद्ध होनेसे संसारमें क्या नहीं सिद्ध होसक्ता अर्थात् सब सिद्ध हो सक्ताहै इसीके प्रसादसे हमारी ऐसी महिमा है ॥ ९० ॥

मूलम्-बिन्दुः करोति सर्वेषां सुखं दुःखञ्च संस्थितः ॥ संसारिणां विमूढानां जरामर- णशालिनाम् ॥ ९१ ॥ अयंच शांकरो योगो योगिनामुत्तमोत्तमः ॥ ९२ ॥

टीका-बिन्दु संसारी मनुष्योंके सुख और दुःखका

( ११८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कारण है और मूढलोगोंके मूढताका और जरामरण शील लोगोंका अर्थात् सबका यही विन्दु हेतु है योगी लोगोंके प्रति यह हमारा उत्तम योग है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ मूलम्-अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति भोगयु- क्तोऽपि मानवः ॥ सकलः साधितार्थोपि सिद्धो भवति भूतले ॥ ९३ ॥ टीका-भोगयुक्त मनुष्योंकोभी अभ्याससे सिद्धि प्राप्त होतीहै और सकल वाञ्छितफल संसारमें सिद्ध होजाते हैं ॥ ९३ ॥ मूलम्-भुक्त्वा भोगानशेषान् वै योगेनानेन निश्चितम् ॥ अनेन सकला सिद्धिर्योगिनां भवति ध्रुवम् ॥ सुखभोगेन महता तस्मा- देनं समभ्यसेत् ॥ ९४ ॥ टीका-इस योगअभ्यासद्वारा निश्चय अशेषभोग भोगनेसे सुखी होगा और योगीलोगोंको इस वज्रो- लीमुद्रासे सकल सिद्धी अवश्य प्राप्तहोती हैं और महानसुख भोगते हुए यह साधना सिद्ध होगी इसलि- ये इसका अभ्यास करना उचित है ॥ ९४ ॥ मूलम्-सहजोल्यमरोली च वज्रोल्या भेद- तो भवेत् ॥ येन केन प्रकारेण बिन्दुं योगी प्रधारयेत् ॥ ९५ ॥