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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

तृतीयपटलः । (६५) टीका-खट्टा रूखा तीक्षण लोन सरसों कडुभा बहुत भ्रमण करना प्रातःकाल स्नान शरीरमें तेल म- र्दन करना ॥ ३६ ॥ स्वर्णआदिककी चोरी हिंसा म- नुष्यसे द्वेष व अहंकार अनार्यव अर्थात् मनुष्यसे प्रेम न रखना, उपवास, झूठ, ममता, प्राणीको पीडा देना॥३७॥ स्त्रीका सङ्ग, अग्निसेवन, प्रिय, अप्रिय, बहुत बोलना, बहुत भोजन करना योगीको उचित है कि, यह सब अवश्य त्यागदे ॥ ३८॥ मूलम्-उपायं च प्रवक्ष्यामि क्षिप्रं योगस्य सिद्धये ॥ गोपनीयं साधकानां येन सि- द्धिर्भवेत्खलु ॥ ३९ ॥ टीका-अब हम बहुत शीघ्र योग सिद्ध होनेका उपा- य कहते हैं इसको गोप्य रखनेसे साधकको योग निश्च- य सिद्ध होजायगा ॥ ३९ ॥ मूलम्-घृतं क्षीरं च मिष्टान्नं ताम्बूलं चूर्णव- र्जितम्॥कर्पूरं निष्ठुरं मिष्टं सुमठं सूक्ष्मव- स्त्रकम् ॥४०॥ सिद्धान्तश्रवणं नित्यं वैरा- ग्यगृहसेवनम् ॥ नामसङ्कीर्तनं विष्णोः सु- नादश्रवणं परम् ॥४१॥ धृतिः क्षमा तपः शौचं ह्रीर्मतिर्गुरुसेवनम् ॥ सदैवतानि परं योगी नियमेन समाचरेत् ॥ ४२ ॥

( ६६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-घृत दूध मधुर पदार्थ ताम्बूल कर्पूरवासित चूर्णरहित, कठोर शब्दरहित मधुर बोलना, सुन्दर सू- क्ष्मरन्ध्रके स्थानमें रहना, सूक्ष्म वस्त्र अर्थात् महीन और थोडा वस्त्र धारण करे नित्य सिद्धांत अर्थात् वेदान्त श्रवण करे और वैराग्यसे गृहमें रहे ईश्वरका स्मरण करे अच्छा शब्द श्रवण करे धैर्य क्षमा तप शौच लज्जा गुरु- की सेवा योगी सदैव इसप्रकार नियमसंयुक्त रहे तो कल्याण होगा ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ मूलम्-अनिलेऽर्कप्रवेशे च भोक्तव्यं योगि- भिः सदा ॥ वायौ प्रविष्टे शशिनि शयनं साधकोत्तमैः ॥ ४३ ॥ टीका-जब सूर्यनाडी अर्थात् पिंगलानाडीका प्रवाह रहे तब योगी सदैव भोजन करे और जब चन्द्र अर्थात् इडानाडीसे वायुका प्रवाह रहे तब साधकके प्रति शयन करना उचित है ॥ ४३ ॥ मूलम्-सद्यो भुक्तेऽपि क्षुधिते नाभ्यासः क्रियते बुधैः ॥ अभ्यासकाले प्रथमं कुर्या- त्क्षीराज्यभोजनम् ॥ ४४ ॥ टीका-भोजन करके तुरंत उसी समय अथवा जब क्षुधित होय तब साधक कदापि अभ्यास न करे और अभ्यास कालमें प्रथम दूध घृत भोजन करे ॥ ४४ ॥

तृतीयपटलः । (६७) मूलम्-ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते न तादृङ्निय- मग्रहः ॥ ४५ ॥ अभ्यासिना विभोक्तव्यं स्तोकं स्तोकमनेकधा ॥ पूर्वोक्तकाले कुर्यात्तु कुम्भकान्प्रतिवासरे ॥ ४६ ॥ टीका-जब अभ्यास स्थिर होजाय तब पूर्वोक्त निय- मका कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ४५ ॥ और अभ्यासीको उचित है कि, थोडा थोडा कईबार भोजनकरे और जिस- प्रकार पहिले कहा है उसीतरह नित्य कुम्भक करे॥४६॥ मूलम्-ततो यथेष्टा शक्तिः स्याद्योगिनो वा- युधारणे ॥ यथेष्टं धारणाद्वायोः कुम्भकः सिद्ध्यति ध्रुवम् ॥ केवले कुम्भके सि- द्धे किं न स्यादिह योगिनः ॥ ४७ ॥ टीका-योगीको वायु धारण करनेकी शक्तिं इच्छा- के अनुसार होजायगी. जब इच्छानुसार धारणशक्ति होजायगी तब कुंभक निश्चय सिद्ध होगा और केवल कुम्भक सिद्ध होनेसे योगी क्या नहीं करसकता अर्थात् सब सिद्ध करसकता है ॥ ४७ ॥ मूलम्-स्वेदःसंजायते देहे योगिनः प्रथमो- द्यमे ॥ ४८ ॥ यदा संजायते स्वेदो मर्दनं

( ६८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कारयेत्सुधीः ॥ अन्यथा विग्रहे धातुर्न- ष्टो भवति योगिनः ॥ ४९ ॥ टीका-योगीके शरीरमें प्रथम स्वेद अर्थात् पसीना उत्पन्न होता है जब स्वेद उत्पन्न होय तो उसको शरी- रमें मर्दन करे अन्यथा अर्थात् मर्दन न करनेसे योगी- के शरीरका धातु नष्ट होजाता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ मूलम्-द्वितीये हि भवेत्कम्पो दार्दुरी मध्यमे मतः ॥ ततोऽधिकतराभ्यासा द्गगनेचरसाधकः ॥ ५० ॥ टीका-दूसरे भूमिकामें कंप होताहै तीसरेमें दार्दु- रीवृत्ति होती है अर्थात् आसन उठता है फिर भूमिपर आयजाता है उससे अधिक अभ्यास होनेसे योगी गगनमें स्वेच्छाचारी होजाताहै ॥ ५० ॥ मूलम्-योगी पद्मासनस्थोऽपि भुवमुत्सृज्य वर्तते॥ वायुसिद्धिस्तदा ज्ञेया संसारध्वा- न्तनाशिनी ॥ ५१ ॥ टीका-योगी पद्मासनस्थ होके पृथिवीको त्यागके आकाशमें स्थिर रहे तब जाने कि, संसारके अन्धकार नाश करनेवाली वायु सिद्ध होगई ॥ ५१ ॥ मूलम्-तावत्कालं प्रकुर्वीत योगोक्तनियम-

तृतीयपटलः । ( ६९ ) ग्रहम् ॥ अल्पनिद्रा पुरीषं च स्तोकं मूत्रं च जायते ॥ ५२ ॥ टीका-उस कालतक योगके हेतु पूर्वोक्त नियम करना उचित है जबतक वायु न सिद्ध होय और यो- गीको थोड़ी निद्रा और थोड़ा मलमूत्र होता है ॥ ५२॥ मूलम्-अरोगित्वमदीनत्वं योगिनस्तत्त्वद- र्शिनः ॥ स्वेदो लाला कृमिश्चैव सर्वथैव न जायते ॥ ५३ ॥ कफपित्तानिलाश्चैव सा- धकस्य कलेवरे ॥ तस्मिन्काले साधक- स्य भोज्येष्वनियमग्रहः ॥ ५४ ॥ टीका-तत्त्वदर्शी योगीको कायिक वा मानसिक व्यथा उत्पन्न नहीं होती और स्वेद लाला कृमिआदि उत्पन्न नहीं होते और साधकके शरीरमें कफ पित्त वातका दोषभी नहीं होता पूर्वोक्त कालतक साधक भोजन आदिका नियम करे ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ मूलम्-अत्यल्पं बहुधा भुक्त्वा योगी न व्यथते हि सः॥अथाभ्यासवशाद्योगी भू- चरीं सिद्धिमाप्नुयात् ॥ यथादर्दुरजन्तूनां गतिः स्यात्पाणिताडनात् ॥ ५५ ॥ टीका-योगीको बहुत थोड़ा या विशेष भोजन क-

(७०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । रनेसे कष्ट न होगा और योगीको अभ्याससे भूचरी सिद्धि होजायगी जैसे दर्दुरजन्तु पाणि ताडन करनेसे पृथ्वीपर उड्डान करताहै उसी प्रकार योगीभी पृथ्वीपर उड्डान करता है ॥ ५५ ॥ मूलम्-सन्त्यत्र बहवो विघ्ना दारुणा दुर्नि- वारणाः ॥ तथापि साधयेद्योगी प्राणैः कंठगतैरपि ॥ ५६ ॥ टीका-इस योगसाधनमें बहुत दारुण विघ्न होते हैं जिसका निवारण बहुत कठिन है. परन्तु साधकको उचित है कि, यदि कंठगतभी प्राण होजाँय तोभी साधन न छोड़े ॥ ५६ ॥ मूलम्-ततो रहस्युपाविष्टः साधकः संयते- न्द्रियः॥प्रणवं प्रजपेद्दीर्घं विघ्नानां नाशहे- तवे ॥ ५७ ॥ टीका-साधकको उचित है कि, विघ्नोंके नाशके हेतु इन्द्रियोंके संयममें अर्थात् उनके कार्यको रोकके विधि- पूर्वक एकान्तमें बैठके दीर्घमात्रासे अर्थात् स्पष्ट अक्ष- रके उच्चारणसे प्रणवका जप करे ॥ ५७ ॥ मूलम्-पूर्वार्जितानि कर्माणि प्राणायामेन निश्चितम् ॥ नाशयेत्साधको धीमानिह लोकोद्भवानि च ॥ ५८ ॥

तृतीयपटलः । ( ७१ ) टीका-पूर्व्वार्जित कर्म और जो इस जन्ममें किया है यह दोनोंके फलको बुद्धिमान् साधक प्राणायामसे निश्चय है कि, नाश करदेता है ॥ ५८ ॥ मूलम्-पूर्व्वार्जितानि पापानि पुण्यानि विवि- धानि च ॥ नाशयेत्षोडशप्राणायामेन योगिपुंगवः ॥ ५९ ॥ टीका-श्रेष्ठयोगी पूर्व्वार्जित नानाप्रकारका पाप और पुण्य केवल सोलह प्राणायामसे नाश कर- देताहै ॥ ५९ ॥ मूलम्-पापतूलचयानाहोप्रलयेत्प्रलयाग्नि- ना ॥ ततः पापविनिर्मुक्तः पश्चात्पुण्या- नि नाशयेत् ॥ ६० ॥ टीका-साधक पाप राशिको तूलके समान प्राणा- यामरूपी अग्निसे प्रलय करदेताहै अर्थात् जलादेताहै. इसप्रकारसे मुक्तहोके पश्चात् पुण्यकोभी उसी अग्निमें नाश करदेताहै ॥ ६० ॥ मूलम्-प्राणायामेन योगीन्द्रो लब्ध्वैश्वर्या- ष्टकानि वै॥ पापपुण्योदधिं तीर्त्वा त्रैलो- क्यचरतामियात् ॥६१ ॥ ·टीका-योगी प्राणायामके प्रभावसे आठ ऐश्वर्य

( ७२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । जिसको अष्टसिद्धि कहते हैं अर्थात् अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वशिता प्राप्त करता है अब इन आठों सिद्धिके लक्षण कहते हैं योगीका शरीर इच्छामात्रसे परमाणुवत् होजाय उस- को अणिमा कहते हैं और योगी इच्छापूर्वक प्रकृति- को अपनेमें करके आकाशवत् स्थूल होजाय उसको महिमा कहते हैं और अति हलके शरीरका पर्वतके समान भारी होजाना उसको गरिमा कहते हैं और बहुत भारी पर्वतके समानको रुईके सदृश होजाना इसको लघिमा कहते हैं और सर्व पदार्थ इच्छामात्रसे योगीके समीप होजाय उसको प्राप्ति कहते हैं और दृश्यादृश्य अर्थात् कभी देख पडे कभी न देखपडे इसको प्राकाम्य कहते हैं और भूत भविष्य पदार्थको जन्म मरणकी रचना करनेमें समर्थ होय उसको ईशि- ता कहते हैं और भूत भविष्य वर्तमान पदार्थको इच्छा से अपने आधीन करलेना इसको वशित्वसिद्धि कहते हैं और योगी पाप पुण्यके समुद्रको तरके अपनी इच्छा पूर्वक त्रैलोक्यमें विचरता है ॥ ६१ ॥ मूलम्--ततोऽभ्यासक्रमेणैव घटिकात्रितयं भवेत् ॥ येन स्यात्सकलासिद्धिर्योंगिनः स्वेप्सिता ध्रुवम् ॥ ६२ ॥

तृतीयपटलः । ( ७३ )

टीका-पूर्वोक्त क्रमस प्राणायाम जब तीन घडीतक स्थिर होजायगा तब योगीको उसके इच्छाके अनुसार सब सिद्ध होजायगा यह निश्चय है ॥ ६२ ॥ मूलम्-वाक्सिद्धिः कामचारित्वं दूरदृष्टि- स्तथैव च ॥ दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृष्टिः परका- यप्रवेशनम् ॥६३॥ विण्मूत्रलेपने स्वर्णम- दृश्यकरणं तथा ॥ भवन्त्येतानि सर्वा- णि खेचरत्वं च योगिनाम् ॥६४॥ टीका-वाक्यसिद्धी स्वेच्छाचारी दूरदृष्टी दूर शब्द श्रवण अतिसूक्ष्म दर्शन दूसरेके शरीरमें प्रवेश करने- की शक्ति होय और योगी अन्यधातुमें अपने मल मूत्र लेपनमात्रसे स्वर्ण करे और योगीको अदृश्य होजाने की शक्ति और आकाशमें गमन करनेकी सिद्धि यह सब योगीको कुम्भक सिद्ध होजानेसे स्वयं सिद्ध हो- जायगा इसमें संशय नहीं है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ मूलम्-यदा भवेद्घटावस्था पवनाभ्यासने परा ॥ तदा संसारचक्रेऽस्मिंस्तन्नास्ति यन्न साधयेत् ॥ ६५ ॥ टीका-जब योगींकी घटावस्था होगी अर्थात् उसमें

( ७४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । योगकी घटना होगी तब यह संसारचक्र योगीको कुछ असाध्य न रहेगा ॥ ६५ ॥ मूलम्-प्राणापाननादबिंदुजीवात्मपरमात्म नः ॥ मिलित्वा घटते यस्मात्तस्माद्वै घट उच्यते ॥ ६६ ॥ टीका-प्राण अपान नाद विन्दु जीव आत्मा और परमात्मा इनको एकत्र घटना होनेसे इसको घटावस्था कहते हैं ॥ ६६ ॥ मूलम्-याममात्रं यदा धर्त्तुं समर्थः स्यात्त- दाद्भुतः ॥ प्रत्याहारस्तदैव स्यान्नांतरा भवति ध्रुवम् ॥ ६७ ॥ टीका-एक प्रहर मात्र जब वायु धारण करनेकी सामर्थ्य होगी तब अद्भुत प्रत्याहारकी शक्ति होगी और साधनसे न होगी निश्चय है ॥ ६७ ॥ मूलम्-यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मे- ति भावयेत् ॥ यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदि- न्द्रयजयो भवेत् ॥ ६८ ॥ टीका-योगी जो जो पदार्थ जाने सो सो पदार्थमें आत्माकाही भावना करे जो इंद्रियसे जिस पदार्थका बोध होगा उस पदार्थमें वही आत्मभावनासे वह इंद्रिय

तृतीयपटलः । ( ७५ )

जय हो जायगी अर्थात् जैसे नेत्रसे रूपका बोध होताहै तो जब रूपमें आत्मभावना होगी तब उस भावनासे चक्षु इन्द्रिय रूपमें कदापि आसक्त न होगी जब वह आसक्त न भई तब वह इन्द्रिय आपही जय होगई ॥६८॥ मूलम्-याममात्रं यदा पूर्णं भवेदभ्यासयो- गतः॥एकवारं प्रकुर्वीत तदा योगी च कु- म्भकम्॥६९॥दण्डाष्टकं यदा वायुर्निश्च- लो योगिनो भवेत् ॥ स्वसामर्थ्यात्तदांगु- ष्ठे तिष्ठेद्वातुलवत्सुधीः ॥ ७० ॥ टीका-जब एकवारमें पूर्ण एक प्रहरतक योगीका अभ्याससे कुम्भक स्थिर रहेगा अर्थात् आठ घडीतक योगीका वायु निश्चल रहे तब वह अपने सामर्थ्यसे अङ्गु- ष्ठमात्रके बलसे अचल अबोधवत् खडा रहसक्ता है अर्थात् यह सामर्थ्य भी योगीको होगी और अपने सा- मर्थ्यको गोप्य रखनेके हेतु विक्षिप्तकी चेष्टा योगी दिख लावैगा ॥ ६९ ॥ ७० ॥ मूलम्-ततःपरिचयावस्था योगिनोऽभ्यास- तो भवेत् ॥यदा वायुश्चंद्रसूर्यं त्यक्त्वा ति- ष्ठति निश्चलम् ॥ ७१ ॥ वायुः परिचितो वायुः सुषुम्ना व्योम्नि संचरेत् ॥

( ७६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-इस अन्तरमें योगीकी अभ्याससे परिचया- वस्था होगी जब वायु इडा पिङ्गलाको त्यागके निश्चल स्थिर रहेगा ॥ ७१ ॥ तब परिचित होके सुषुम्नाके र- न्ध्रसे प्राणवायु आकाशको गमन करेगा ॥ मूलम्-क्रियाशक्तिं गृहीत्वैव चक्रान्भित्त्वा सुनिश्चितम् ॥ ७२ ॥ यदा परिचयावस्था भवेदभ्यासयोगतः ॥ त्रिकूटं कर्मणां योगी तदा पश्यति निश्चितम् ॥ ७३ ॥ टीका-क्रियाशक्तिको ग्रहण करके योगी निश्चय सब चक्रको वेधेगा ॥७२॥ और जब योग अभ्याससे परिचया वस्था होगी तब त्रिकूट कर्मोंको योगी निश्चय देखेगा तात्पर्य यह है कि, जब योगीका पूर्वोक्त अभ्यास सिद्ध होजायगा तब त्रिकूट अर्थात् आध्यात्मिक आधिभौ- तिक आधिदैविक मानसिक दुःखको आध्यात्मिक कह- ते हैं और भूत पिशाचादिसे जो कष्ट होता है उसको आधिभौतिक कहते हैं और देवता आदिसे जो कर्मानु- सार कष्ट होताहै उसको आधिदैविक कहते हैं यह त्रिकूटकर्मोंका ज्ञान योगीको होजाता है ॥ ७३ ॥ मूलम्-ततश्चकर्मकूटानि प्रणवेन विनाश- येत् ॥ स योगी कर्मभोगाय कायव्यूहं समाचरेत् ॥ ७४ ॥

तृतीयपटलः । ( ७७ ) टीका-इस कर्मकूटको योगी प्रणवद्वारा नाश कर- देताहै और यदि पूर्वकृत कर्मफल भोगनेकी इच्छा करे तो अपने इच्छानुसार इसी जन्ममें इसी शरीरसे भोगलेगा ॥ ७४ ॥ मूलम्-अस्मिन्कालेमहायोगी पंचधा धा- रणं चरेत् ॥ येन भूरादिसिद्धिः स्यात्ततो भूतभयापहा॥७५॥आधारे घटिकाः पंच- लिंगस्थाने तथैव च ॥ तदूर्ध्वं घटिकाः पञ्च नाभिहृन्मध्यके तथा ॥७६॥ भ्रूम- ध्योर्ध्वं तथा पंच घटिका धारयेत्सुधीः ॥ तथा भूरादिना नष्टो योगीन्द्रो न भवे त्खलु ॥ ७७ ॥ टीका-जिसकालमें महायोगी पञ्चधाधारणा सिद्ध करलेगा तब यह पञ्चभूत सिद्ध होजायेंगे और इनसे कोई कष्टका भय नहोगा. अब धारणाका निर्णय करतेहैं कि, आधारचक्रमें पांचघडी वायु धारणकरे इसी क्रमसे स्वाधिष्ठान मणिपूर अनाहत विशुद्ध आज्ञाचक्रमें अर्थात् गुदा लिङ्ग नाभि हृदय कंठ भृकुटीके मध्यमें ऊपर कहेहुए प्रमाणसे वायु धारणकरेगा तो योगी पञ्च भूतसे निश्चय नाश न होगा ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ ७७ ॥

( ७८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-मेधावी सर्वभूतानां धारणांयः सम- भ्यसेत् ॥ शतब्रह्ममृतेनापि मृत्युस्त- स्य न विद्यते ॥ ७८ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी अभ्याससे पञ्चभूतकी धार- णा करेगा तो यदि एकशत ब्रह्माभी मृत्युको प्राप्त होंगे तबभी उसकी मृत्यु न होगी ॥ ७८ ॥ मूलम्-ततोऽभ्यासक्रमेणैव निष्पत्तियोगि- नो भवेत् ॥ अनादिकर्मबीजानि येन ती- र्त्वाऽमृतं पिबेत् ॥ ७९ ॥ टीका-इस अभ्यासक्रमसे योगीको ज्ञान होता है और अनादिकर्म बीजको तरके अर्थात् नाश करके योगी अमृतपान करताहै ॥ ७९ ॥ मूलम्-यदा निष्पत्तिर्भवति समाधेः स्वेन कर्मणा ॥ जीवन्मुक्तस्य शांतस्य भवेद्धी- रस्य योगिनः ॥ ८० ॥ यदा निष्पत्तिसं- पन्नः समाधिःस्वेच्छया भवेत् ॥ ८१ ॥ गृहीत्वा चेतनां वायुः क्रियाशक्तिं च वेग- वान् ॥ सर्वांश्चक्रान्विजित्वा च ज्ञान- शक्तौ विलीयते ॥ ८२ ॥

तृतीयपटलः। ( ७९ ) टीका-जब अपने अभ्यासकर्मसे योगीको समाधी- का ज्ञान होगा तब जीवन्मुक्त शान्त होके योगीको ज्ञानसम्पन्न स्वेच्छासमाधी होगी और मन वायु क्रिया- शक्तिसहित सर्व चक्रोंको वेधके ज्ञानशक्तीमें लीन हो- जायगा ॥ ८० ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ मूलम्-इदानीं क्लेशहान्यर्थं वक्तव्यं वायु- साधनम् ॥ येन संसारचक्रेस्मिन्न्रोगहा- निर्भवेद्ध्रुवम् ॥ ८३ ॥ टीका-हे देवि ! अब क्लेशहानीके अर्थ वायुसाधन कहते हैं जिससे इस संसारचक्रमें निश्चय रोगादिक नाश होजाय और साधकको कष्ट न हो ॥ ८३ ॥ मूलम्-रसनां तालुमूले यः स्थापयित्वा विचक्षणः॥ पिबेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥ ८४ ॥ . टीका-जिह्वाको तालुके मूलमें स्थितकरके बुद्धि- मान साधक यदि प्राणवायुको पान करे तो उसके सर्व रोगोंका नाश होजायगा ॥ ८४ ॥ मूलम्-काकचंच्वा पिबेद्वायुं शीतलं यो वि- चक्षणः ॥ प्राणापानविधानज्ञः स भवे- न्मुक्तिभाजनः ॥ ८५ ॥

( ८० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जो बुद्धिमान साधक प्राण अपानके विधा- नका ज्ञाता काकचञ्चू अर्थात् अधरको काकके चोंचके समान लम्बा करके शीतल वायु पान करता है सो योगी मुक्तिभाजन है अर्थात् मुक्तिपात्र है ॥ ८५ ॥ मूलम्--सरसं यः पिबेद्वायुं प्रत्यहं विधिना सुधीः ॥ नश्यंति योगिनस्तस्य श्रमदाह- जरामयाः ॥ ८६ ॥ टीका-जो साधक नित्य विधानपूर्वक रससहित वायुपान करता है उसके सर्व रोग और श्रम दाह जरा अर्थात् वृद्धावस्थादि नाश होजाते हैं अर्थात् यह सब उसके समीप नहीं आते ॥ ८६ ॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगांकृत्वा यश्चन्द्रे सलिलं पिबेत् ॥ मासमात्रेण योगीन्द्रो मृत्युं ज- यति निश्चितम् ॥ ८७ ॥ टीका-जो योगी जिह्वाको ऊपर करके चंद्रमासे विगलित सुधारसको पान करताहै सो योगी एक मासमें निश्चय मृत्युको जीत लेता है इस जगह जिह्वा ऊपर करनेसे तात्पर्य खेचरी मुद्रासे है सो खेचरीमुद्रा गुरु मुखसे जानना उचितहै ॥ ८७ ॥ मूलम्--राजदंतबिलं गाढं संपीड्य विधिना

तृतीयपटलः । (८१) पिबेत् ॥ ध्यात्वा कुण्डलिनीं देवीं षण्मा- सेन कविर्भवेत् ॥ ८८ ॥ टीका-जो साधक राजदन्तको नीचेके दांतसे द- बायके उसके रन्ध्रद्वारा विधिसे वायुपान करे और उस कालमें कुण्डलिनी देवीका ध्यान करेगा तो निश्चय छः मासमें कवि होगा ॥ ८८ ॥ मूलम्-काकचंच्वा पिबेद्वायुं सन्ध्ययोरुभ- योरपि ॥ कुण्डलिन्या मुखे ध्यात्वा क्षयरोगस्य शान्तये ॥ ८९ ॥ टीका-पूर्वोक्त काकचञ्चूसे विधिसे दोनों सन्ध्यामें जो कुण्डलिनीकी मुखका ध्यान करके वायुपान करे- गा उसका क्षयरोग नाश होजायगा ॥ ८९ ॥ मूलम्-अहर्निशं पिबेद्योगी काकचंच्वा वि- चक्षणः ॥ पिबेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥ दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिस्तथा स्याद्दर्शनं खलु ॥ ९० ॥ टीका-जो योगी बुद्धिमान् रात्रि दिवस काकच- ञ्चूसे प्राणवायु पान करतेहैं उनके रोगोंका नाश हो- जाताहै और दूरका शब्द श्रवण होताहै और दूरकी व- स्तु देख पडती है तथा निश्चय सूक्ष्म दर्शन होताहै॥९०॥

(८२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत। मूलम्-दन्तैर्दन्तान्समापीड्य पिबेद्वायुं शनैः शनैः ॥ ऊर्ध्वजिह्वः सुमेधावी मृत्युं जयति सोचिरात् ॥ ९१ ॥ टीका-जो बुद्धिमान् दांतसे दांतको पीडित करके धीरे धीरे वायुपान करेगा और जिह्वा ऊपर करके अ- मृतपान करेगा सो शीघ्र मृत्युको जीतलेगा ॥ ९१ ॥ मूलम्-षण्मासमात्रमभ्यासं यः करोति दि- नेदिने ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो रोगान्नाश- यते हि सः॥ ९२ ॥ संवत्सरकृताभ्या- सान्मृत्युं जयति निश्चितम्॥ तस्मादति- प्रयत्नेन साधयेद्योगसाधकः ॥९३॥ वर्ष- त्रयकृताऽभ्यासाद्भैरवो भवति ध्रुवम् ॥ अणिमादिगुणान्‌लब्ध्वा जितभूतगणः स्वयम् ॥ ९४ ॥ टीका-जो पहिले कहेहुए अभ्यासको नित्य छः मास करे तो सब रोगोंका नाश होजायगा और सब पापसे मुक्त होजाय और उसी अभ्यासको एकवर्ष करे तो मृत्युको निश्चय जीतले इस हेतुसे साधक इस क्रि- याका यत्न करके अवश्य साधन करे और यदि इसका अभ्यास तीनवर्ष करे तो निश्चय भैरव होजाय और

तृतीयपटलः । ( ८३ ) अष्टसिद्धिका लाभ होय और सर्व भूतगण आपही वश में होजाय ॥ ९२ ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति ॥ क्षणेन मुच्यते योगी व्याधिमृ- त्युजरादिभिः ॥ ९५ ॥ टीका-योगीकी जिह्वा यदि क्षणमात्र उपर स्थिर होजाय तो उसी क्षणसे सर्वव्याधि और वृद्धावस्था और मृत्युका नाश होजाय. तात्पर्य यह है कि, खेचरीमुद्रासे किंचित्मात्र भी अमृतपान करलेगा तो उसकी मृत्यु न होगी ॥ ९५ ॥ मूलम्--रसनां प्राणसंयुक्तां पीड्यमानां वि- चिंतयेत् ॥ न तस्य जायते मृत्युः सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ९६ ॥ टीका-जिह्वाको प्राणसहित पीडित करके जो पुरुष ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यानसंयुक्त स्थिर करेगा. हेदेवी ! हम वारं- वार कहतेहैं कि, निश्चय उसकी मृत्यु न होगी ॥ ९६ ॥ मूलम्-एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्विती- यकः ॥ न क्षुधा न तृषा निद्रा नैव मूर्च्छा प्रजायते ॥ ९७ ॥ टीका-इस योगअभ्याससे जो पहिले कहाहै वह

( ८४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पुरुष दूसरा कामदेव होजायगा अर्थात् कामदेवके समान शोभितहोगा और उसको क्षुधा तृषा निद्रा मूर्च्छा कभी न उत्पन्न होगी ॥ ९७ ॥ मूलम्-अनेनैव विधानेन योगीन्द्रोऽवनिम- ण्डले ॥ भवेत्स्वच्छन्दचारी च सर्वाप- त्परिवर्जितः ॥ ९८ ॥ न तस्य पुनरावृत्ति- र्मोदते ससुरैरपि ॥ पुण्यपापैर्न लिप्येत एतदाचरणेन सः ॥ ९९ ॥ टीका-इस विधानसे योगी संसारमें सर्व दुःखसे रहित होके स्वेच्छाचारी होजायगा और इस आचर- णसे योगी पुण्यपापमें लिप्त नहीं होगा न फिर संसा- रमें उसका जन्म होगा और देवतोंके साथ आनन्दपूर्वक विचरेगा ॥ ९८ ॥ ९९ ॥ मूलम्-चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानावि- धानि च ॥ १०० ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय मयोक्तानि ब्रवीम्यहम् ॥ सिद्धासनं ततः पद्मासनञ्चोग्रं च स्वस्तिकम् ॥ १०१ ॥ टीका-बहुत प्रकारके चौरासी आसनहैं उनमें उत्तम जो चार आसन हैं, उनको हम कहतेहैं, सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन,स्वस्तिकासन.तात्पर्य यह है कि, और