शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
( ७२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । जिसको अष्टसिद्धि कहते हैं अर्थात् अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वशिता प्राप्त करता है अब इन आठों सिद्धिके लक्षण कहते हैं योगीका शरीर इच्छामात्रसे परमाणुवत् होजाय उस- को अणिमा कहते हैं और योगी इच्छापूर्वक प्रकृति- को अपनेमें करके आकाशवत् स्थूल होजाय उसको महिमा कहते हैं और अति हलके शरीरका पर्वतके समान भारी होजाना उसको गरिमा कहते हैं और बहुत भारी पर्वतके समानको रुईके सदृश होजाना इसको लघिमा कहते हैं और सर्व पदार्थ इच्छामात्रसे योगीके समीप होजाय उसको प्राप्ति कहते हैं और दृश्यादृश्य अर्थात् कभी देख पडे कभी न देखपडे इसको प्राकाम्य कहते हैं और भूत भविष्य पदार्थको जन्म मरणकी रचना करनेमें समर्थ होय उसको ईशि- ता कहते हैं और भूत भविष्य वर्तमान पदार्थको इच्छा से अपने आधीन करलेना इसको वशित्वसिद्धि कहते हैं और योगी पाप पुण्यके समुद्रको तरके अपनी इच्छा पूर्वक त्रैलोक्यमें विचरता है ॥ ६१ ॥ मूलम्--ततोऽभ्यासक्रमेणैव घटिकात्रितयं भवेत् ॥ येन स्यात्सकलासिद्धिर्योंगिनः स्वेप्सिता ध्रुवम् ॥ ६२ ॥
तृतीयपटलः । ( ७३ )
टीका-पूर्वोक्त क्रमस प्राणायाम जब तीन घडीतक स्थिर होजायगा तब योगीको उसके इच्छाके अनुसार सब सिद्ध होजायगा यह निश्चय है ॥ ६२ ॥ मूलम्-वाक्सिद्धिः कामचारित्वं दूरदृष्टि- स्तथैव च ॥ दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृष्टिः परका- यप्रवेशनम् ॥६३॥ विण्मूत्रलेपने स्वर्णम- दृश्यकरणं तथा ॥ भवन्त्येतानि सर्वा- णि खेचरत्वं च योगिनाम् ॥६४॥ टीका-वाक्यसिद्धी स्वेच्छाचारी दूरदृष्टी दूर शब्द श्रवण अतिसूक्ष्म दर्शन दूसरेके शरीरमें प्रवेश करने- की शक्ति होय और योगी अन्यधातुमें अपने मल मूत्र लेपनमात्रसे स्वर्ण करे और योगीको अदृश्य होजाने की शक्ति और आकाशमें गमन करनेकी सिद्धि यह सब योगीको कुम्भक सिद्ध होजानेसे स्वयं सिद्ध हो- जायगा इसमें संशय नहीं है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ मूलम्-यदा भवेद्घटावस्था पवनाभ्यासने परा ॥ तदा संसारचक्रेऽस्मिंस्तन्नास्ति यन्न साधयेत् ॥ ६५ ॥ टीका-जब योगींकी घटावस्था होगी अर्थात् उसमें
( ७४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । योगकी घटना होगी तब यह संसारचक्र योगीको कुछ असाध्य न रहेगा ॥ ६५ ॥ मूलम्-प्राणापाननादबिंदुजीवात्मपरमात्म नः ॥ मिलित्वा घटते यस्मात्तस्माद्वै घट उच्यते ॥ ६६ ॥ टीका-प्राण अपान नाद विन्दु जीव आत्मा और परमात्मा इनको एकत्र घटना होनेसे इसको घटावस्था कहते हैं ॥ ६६ ॥ मूलम्-याममात्रं यदा धर्त्तुं समर्थः स्यात्त- दाद्भुतः ॥ प्रत्याहारस्तदैव स्यान्नांतरा भवति ध्रुवम् ॥ ६७ ॥ टीका-एक प्रहर मात्र जब वायु धारण करनेकी सामर्थ्य होगी तब अद्भुत प्रत्याहारकी शक्ति होगी और साधनसे न होगी निश्चय है ॥ ६७ ॥ मूलम्-यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मे- ति भावयेत् ॥ यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदि- न्द्रयजयो भवेत् ॥ ६८ ॥ टीका-योगी जो जो पदार्थ जाने सो सो पदार्थमें आत्माकाही भावना करे जो इंद्रियसे जिस पदार्थका बोध होगा उस पदार्थमें वही आत्मभावनासे वह इंद्रिय
तृतीयपटलः । ( ७५ )
जय हो जायगी अर्थात् जैसे नेत्रसे रूपका बोध होताहै तो जब रूपमें आत्मभावना होगी तब उस भावनासे चक्षु इन्द्रिय रूपमें कदापि आसक्त न होगी जब वह आसक्त न भई तब वह इन्द्रिय आपही जय होगई ॥६८॥ मूलम्-याममात्रं यदा पूर्णं भवेदभ्यासयो- गतः॥एकवारं प्रकुर्वीत तदा योगी च कु- म्भकम्॥६९॥दण्डाष्टकं यदा वायुर्निश्च- लो योगिनो भवेत् ॥ स्वसामर्थ्यात्तदांगु- ष्ठे तिष्ठेद्वातुलवत्सुधीः ॥ ७० ॥ टीका-जब एकवारमें पूर्ण एक प्रहरतक योगीका अभ्याससे कुम्भक स्थिर रहेगा अर्थात् आठ घडीतक योगीका वायु निश्चल रहे तब वह अपने सामर्थ्यसे अङ्गु- ष्ठमात्रके बलसे अचल अबोधवत् खडा रहसक्ता है अर्थात् यह सामर्थ्य भी योगीको होगी और अपने सा- मर्थ्यको गोप्य रखनेके हेतु विक्षिप्तकी चेष्टा योगी दिख लावैगा ॥ ६९ ॥ ७० ॥ मूलम्-ततःपरिचयावस्था योगिनोऽभ्यास- तो भवेत् ॥यदा वायुश्चंद्रसूर्यं त्यक्त्वा ति- ष्ठति निश्चलम् ॥ ७१ ॥ वायुः परिचितो वायुः सुषुम्ना व्योम्नि संचरेत् ॥
( ७६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-इस अन्तरमें योगीकी अभ्याससे परिचया- वस्था होगी जब वायु इडा पिङ्गलाको त्यागके निश्चल स्थिर रहेगा ॥ ७१ ॥ तब परिचित होके सुषुम्नाके र- न्ध्रसे प्राणवायु आकाशको गमन करेगा ॥ मूलम्-क्रियाशक्तिं गृहीत्वैव चक्रान्भित्त्वा सुनिश्चितम् ॥ ७२ ॥ यदा परिचयावस्था भवेदभ्यासयोगतः ॥ त्रिकूटं कर्मणां योगी तदा पश्यति निश्चितम् ॥ ७३ ॥ टीका-क्रियाशक्तिको ग्रहण करके योगी निश्चय सब चक्रको वेधेगा ॥७२॥ और जब योग अभ्याससे परिचया वस्था होगी तब त्रिकूट कर्मोंको योगी निश्चय देखेगा तात्पर्य यह है कि, जब योगीका पूर्वोक्त अभ्यास सिद्ध होजायगा तब त्रिकूट अर्थात् आध्यात्मिक आधिभौ- तिक आधिदैविक मानसिक दुःखको आध्यात्मिक कह- ते हैं और भूत पिशाचादिसे जो कष्ट होता है उसको आधिभौतिक कहते हैं और देवता आदिसे जो कर्मानु- सार कष्ट होताहै उसको आधिदैविक कहते हैं यह त्रिकूटकर्मोंका ज्ञान योगीको होजाता है ॥ ७३ ॥ मूलम्-ततश्चकर्मकूटानि प्रणवेन विनाश- येत् ॥ स योगी कर्मभोगाय कायव्यूहं समाचरेत् ॥ ७४ ॥
तृतीयपटलः । ( ७७ ) टीका-इस कर्मकूटको योगी प्रणवद्वारा नाश कर- देताहै और यदि पूर्वकृत कर्मफल भोगनेकी इच्छा करे तो अपने इच्छानुसार इसी जन्ममें इसी शरीरसे भोगलेगा ॥ ७४ ॥ मूलम्-अस्मिन्कालेमहायोगी पंचधा धा- रणं चरेत् ॥ येन भूरादिसिद्धिः स्यात्ततो भूतभयापहा॥७५॥आधारे घटिकाः पंच- लिंगस्थाने तथैव च ॥ तदूर्ध्वं घटिकाः पञ्च नाभिहृन्मध्यके तथा ॥७६॥ भ्रूम- ध्योर्ध्वं तथा पंच घटिका धारयेत्सुधीः ॥ तथा भूरादिना नष्टो योगीन्द्रो न भवे त्खलु ॥ ७७ ॥ टीका-जिसकालमें महायोगी पञ्चधाधारणा सिद्ध करलेगा तब यह पञ्चभूत सिद्ध होजायेंगे और इनसे कोई कष्टका भय नहोगा. अब धारणाका निर्णय करतेहैं कि, आधारचक्रमें पांचघडी वायु धारणकरे इसी क्रमसे स्वाधिष्ठान मणिपूर अनाहत विशुद्ध आज्ञाचक्रमें अर्थात् गुदा लिङ्ग नाभि हृदय कंठ भृकुटीके मध्यमें ऊपर कहेहुए प्रमाणसे वायु धारणकरेगा तो योगी पञ्च भूतसे निश्चय नाश न होगा ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ ७७ ॥
( ७८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-मेधावी सर्वभूतानां धारणांयः सम- भ्यसेत् ॥ शतब्रह्ममृतेनापि मृत्युस्त- स्य न विद्यते ॥ ७८ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी अभ्याससे पञ्चभूतकी धार- णा करेगा तो यदि एकशत ब्रह्माभी मृत्युको प्राप्त होंगे तबभी उसकी मृत्यु न होगी ॥ ७८ ॥ मूलम्-ततोऽभ्यासक्रमेणैव निष्पत्तियोगि- नो भवेत् ॥ अनादिकर्मबीजानि येन ती- र्त्वाऽमृतं पिबेत् ॥ ७९ ॥ टीका-इस अभ्यासक्रमसे योगीको ज्ञान होता है और अनादिकर्म बीजको तरके अर्थात् नाश करके योगी अमृतपान करताहै ॥ ७९ ॥ मूलम्-यदा निष्पत्तिर्भवति समाधेः स्वेन कर्मणा ॥ जीवन्मुक्तस्य शांतस्य भवेद्धी- रस्य योगिनः ॥ ८० ॥ यदा निष्पत्तिसं- पन्नः समाधिःस्वेच्छया भवेत् ॥ ८१ ॥ गृहीत्वा चेतनां वायुः क्रियाशक्तिं च वेग- वान् ॥ सर्वांश्चक्रान्विजित्वा च ज्ञान- शक्तौ विलीयते ॥ ८२ ॥
तृतीयपटलः। ( ७९ ) टीका-जब अपने अभ्यासकर्मसे योगीको समाधी- का ज्ञान होगा तब जीवन्मुक्त शान्त होके योगीको ज्ञानसम्पन्न स्वेच्छासमाधी होगी और मन वायु क्रिया- शक्तिसहित सर्व चक्रोंको वेधके ज्ञानशक्तीमें लीन हो- जायगा ॥ ८० ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ मूलम्-इदानीं क्लेशहान्यर्थं वक्तव्यं वायु- साधनम् ॥ येन संसारचक्रेस्मिन्न्रोगहा- निर्भवेद्ध्रुवम् ॥ ८३ ॥ टीका-हे देवि ! अब क्लेशहानीके अर्थ वायुसाधन कहते हैं जिससे इस संसारचक्रमें निश्चय रोगादिक नाश होजाय और साधकको कष्ट न हो ॥ ८३ ॥ मूलम्-रसनां तालुमूले यः स्थापयित्वा विचक्षणः॥ पिबेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥ ८४ ॥ . टीका-जिह्वाको तालुके मूलमें स्थितकरके बुद्धि- मान साधक यदि प्राणवायुको पान करे तो उसके सर्व रोगोंका नाश होजायगा ॥ ८४ ॥ मूलम्-काकचंच्वा पिबेद्वायुं शीतलं यो वि- चक्षणः ॥ प्राणापानविधानज्ञः स भवे- न्मुक्तिभाजनः ॥ ८५ ॥
( ८० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जो बुद्धिमान साधक प्राण अपानके विधा- नका ज्ञाता काकचञ्चू अर्थात् अधरको काकके चोंचके समान लम्बा करके शीतल वायु पान करता है सो योगी मुक्तिभाजन है अर्थात् मुक्तिपात्र है ॥ ८५ ॥ मूलम्--सरसं यः पिबेद्वायुं प्रत्यहं विधिना सुधीः ॥ नश्यंति योगिनस्तस्य श्रमदाह- जरामयाः ॥ ८६ ॥ टीका-जो साधक नित्य विधानपूर्वक रससहित वायुपान करता है उसके सर्व रोग और श्रम दाह जरा अर्थात् वृद्धावस्थादि नाश होजाते हैं अर्थात् यह सब उसके समीप नहीं आते ॥ ८६ ॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगांकृत्वा यश्चन्द्रे सलिलं पिबेत् ॥ मासमात्रेण योगीन्द्रो मृत्युं ज- यति निश्चितम् ॥ ८७ ॥ टीका-जो योगी जिह्वाको ऊपर करके चंद्रमासे विगलित सुधारसको पान करताहै सो योगी एक मासमें निश्चय मृत्युको जीत लेता है इस जगह जिह्वा ऊपर करनेसे तात्पर्य खेचरी मुद्रासे है सो खेचरीमुद्रा गुरु मुखसे जानना उचितहै ॥ ८७ ॥ मूलम्--राजदंतबिलं गाढं संपीड्य विधिना
तृतीयपटलः । (८१) पिबेत् ॥ ध्यात्वा कुण्डलिनीं देवीं षण्मा- सेन कविर्भवेत् ॥ ८८ ॥ टीका-जो साधक राजदन्तको नीचेके दांतसे द- बायके उसके रन्ध्रद्वारा विधिसे वायुपान करे और उस कालमें कुण्डलिनी देवीका ध्यान करेगा तो निश्चय छः मासमें कवि होगा ॥ ८८ ॥ मूलम्-काकचंच्वा पिबेद्वायुं सन्ध्ययोरुभ- योरपि ॥ कुण्डलिन्या मुखे ध्यात्वा क्षयरोगस्य शान्तये ॥ ८९ ॥ टीका-पूर्वोक्त काकचञ्चूसे विधिसे दोनों सन्ध्यामें जो कुण्डलिनीकी मुखका ध्यान करके वायुपान करे- गा उसका क्षयरोग नाश होजायगा ॥ ८९ ॥ मूलम्-अहर्निशं पिबेद्योगी काकचंच्वा वि- चक्षणः ॥ पिबेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥ दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिस्तथा स्याद्दर्शनं खलु ॥ ९० ॥ टीका-जो योगी बुद्धिमान् रात्रि दिवस काकच- ञ्चूसे प्राणवायु पान करतेहैं उनके रोगोंका नाश हो- जाताहै और दूरका शब्द श्रवण होताहै और दूरकी व- स्तु देख पडती है तथा निश्चय सूक्ष्म दर्शन होताहै॥९०॥
(८२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत। मूलम्-दन्तैर्दन्तान्समापीड्य पिबेद्वायुं शनैः शनैः ॥ ऊर्ध्वजिह्वः सुमेधावी मृत्युं जयति सोचिरात् ॥ ९१ ॥ टीका-जो बुद्धिमान् दांतसे दांतको पीडित करके धीरे धीरे वायुपान करेगा और जिह्वा ऊपर करके अ- मृतपान करेगा सो शीघ्र मृत्युको जीतलेगा ॥ ९१ ॥ मूलम्-षण्मासमात्रमभ्यासं यः करोति दि- नेदिने ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो रोगान्नाश- यते हि सः॥ ९२ ॥ संवत्सरकृताभ्या- सान्मृत्युं जयति निश्चितम्॥ तस्मादति- प्रयत्नेन साधयेद्योगसाधकः ॥९३॥ वर्ष- त्रयकृताऽभ्यासाद्भैरवो भवति ध्रुवम् ॥ अणिमादिगुणान्लब्ध्वा जितभूतगणः स्वयम् ॥ ९४ ॥ टीका-जो पहिले कहेहुए अभ्यासको नित्य छः मास करे तो सब रोगोंका नाश होजायगा और सब पापसे मुक्त होजाय और उसी अभ्यासको एकवर्ष करे तो मृत्युको निश्चय जीतले इस हेतुसे साधक इस क्रि- याका यत्न करके अवश्य साधन करे और यदि इसका अभ्यास तीनवर्ष करे तो निश्चय भैरव होजाय और
तृतीयपटलः । ( ८३ ) अष्टसिद्धिका लाभ होय और सर्व भूतगण आपही वश में होजाय ॥ ९२ ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति ॥ क्षणेन मुच्यते योगी व्याधिमृ- त्युजरादिभिः ॥ ९५ ॥ टीका-योगीकी जिह्वा यदि क्षणमात्र उपर स्थिर होजाय तो उसी क्षणसे सर्वव्याधि और वृद्धावस्था और मृत्युका नाश होजाय. तात्पर्य यह है कि, खेचरीमुद्रासे किंचित्मात्र भी अमृतपान करलेगा तो उसकी मृत्यु न होगी ॥ ९५ ॥ मूलम्--रसनां प्राणसंयुक्तां पीड्यमानां वि- चिंतयेत् ॥ न तस्य जायते मृत्युः सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ९६ ॥ टीका-जिह्वाको प्राणसहित पीडित करके जो पुरुष ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यानसंयुक्त स्थिर करेगा. हेदेवी ! हम वारं- वार कहतेहैं कि, निश्चय उसकी मृत्यु न होगी ॥ ९६ ॥ मूलम्-एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्विती- यकः ॥ न क्षुधा न तृषा निद्रा नैव मूर्च्छा प्रजायते ॥ ९७ ॥ टीका-इस योगअभ्याससे जो पहिले कहाहै वह
( ८४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पुरुष दूसरा कामदेव होजायगा अर्थात् कामदेवके समान शोभितहोगा और उसको क्षुधा तृषा निद्रा मूर्च्छा कभी न उत्पन्न होगी ॥ ९७ ॥ मूलम्-अनेनैव विधानेन योगीन्द्रोऽवनिम- ण्डले ॥ भवेत्स्वच्छन्दचारी च सर्वाप- त्परिवर्जितः ॥ ९८ ॥ न तस्य पुनरावृत्ति- र्मोदते ससुरैरपि ॥ पुण्यपापैर्न लिप्येत एतदाचरणेन सः ॥ ९९ ॥ टीका-इस विधानसे योगी संसारमें सर्व दुःखसे रहित होके स्वेच्छाचारी होजायगा और इस आचर- णसे योगी पुण्यपापमें लिप्त नहीं होगा न फिर संसा- रमें उसका जन्म होगा और देवतोंके साथ आनन्दपूर्वक विचरेगा ॥ ९८ ॥ ९९ ॥ मूलम्-चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानावि- धानि च ॥ १०० ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय मयोक्तानि ब्रवीम्यहम् ॥ सिद्धासनं ततः पद्मासनञ्चोग्रं च स्वस्तिकम् ॥ १०१ ॥ टीका-बहुत प्रकारके चौरासी आसनहैं उनमें उत्तम जो चार आसन हैं, उनको हम कहतेहैं, सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन,स्वस्तिकासन.तात्पर्य यह है कि, और
तृतीयपटलः। (८५) आसन करनेसे नाडी शुद्ध होतीहै परन्तु यह चार आ- सनसे वायु धारण करके बैठनेमें कष्ट नहीं होता और प्रधान नाडी शीघ्र वश होजाती है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ मूलम्–योनिं संपीड्य यत्नेन पादमूलेन सा- धकः ॥ मेढ्रोपरि पादमूलं विन्यसेद्योग- वित्सदा ॥ १०२ ॥ ऊर्ध्वं निरीक्ष्य भ्रूम- ध्यं निश्चलः संयतेन्द्रियः ॥ विशेषोऽवक्र कायश्च रहस्युद्वेगवर्जितः ॥ एतत्सिद्धा- सनं ज्ञेयं सिद्धानां सिद्धिदायकम् ॥१०३॥ टीका–योगवेत्ता साधक पादमूल अर्थात् एडीसे योनिस्थानको पीडित करे और दूसरे पादके एडीको मेढ्र अर्थात् लिंगके मूलस्थानपर रक्खे और ऊपर भ्रूके मध्यमें निश्चल दृष्टि रक्खे जितेन्द्रियपुरुष विशेष सीधा शरीर करके विधानपूर्वक वेगवर्जित सावधान होके बैठे इसको सिद्धासन कहते हैं यह आसन सिद्धों- को सिद्धि देनेवालाहै ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ मूलम्–येनाभ्यासवशाच्छीघ्रं योगनिष्पत्ति माप्नुयात् ॥ सिद्धासनं सदा सेव्यं पवना- भ्यासिना परम् ॥ १०४ ॥ .टीका–इस अभ्याससे जो पहिले कहाहै शीघ्र योग-
( ८६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमता । का ज्ञान होताहै इस हेतुसे यह सिद्धासन पवनाभ्या- सीको सदा सेवनेके योग्यहै ॥ १०४ ॥ मूलम्-येन संसारमुत्सृज्य लभते परमां गतिम् ॥१०५॥ नातः परतरं गुह्यमासनं विद्यते भुवि ॥ येनानुध्यानमात्रेण योगी पापाद्विमुच्यते ॥ १०६ ॥ टीका-इस सिद्धासनके प्रभावसे साधक संसारको छोडके परमगतिको पाताहै और इससे उत्तम वा गोप्य संसारमें दूसरा आसन नहीं है जिसके ध्यानमात्रसे यो- गी सर्व पापसे मुक्त होजाताहै ॥ १०५॥१०६॥ मूलम्-उत्तानौ चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रयत्नतः ॥ ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा तु तादृशौ ॥ १०७ ॥ नासाग्रे वि- न्यसेद्दृष्टिं दन्तमूलञ्च जिह्वया ॥ उत्तोल्य चिबुकं वक्ष उत्थाप्य पवनं शनैः ॥१०८॥ यथाशक्त्या समाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः॥ यथा शक्त्यैव पश्चात्तु रेचयेदविरोधतः ॥ १०९ ॥ इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधि- विनाशनम् ॥ दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्यते परम् ॥ ११० ॥
तृतीयपटलः । (८७) टीका-दोनों चरणोंको उत्तान करके यत्नसे ऊरू अर्थात् जंघापर रक्खे उसीप्रकार दोनों हाथको सीधा करके ऊरुके मध्यमें रक्खे और नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि और दांतके मूलमें जिह्वा स्थितकरे और वक्ष अर्था- त् हृदयस्थानपर चिबुक अर्थात् ठोडी स्थापन करे और अपानवायुको उठाके प्राणको शनैःशनैः यथाशक्ति पूरक करके धारणाकरे पश्चात् धीरे धीरे रेचक अर्थात् वायुको त्यागदे इसको पद्मासन कहतेहैं यह सर्व व्याधिका ना- शक है यह आसन बहुत दुर्लभहै परंतु कोई बुद्धिमान् साधकको प्राप्त होताहै ॥१०७॥१०८॥१०९॥११०॥ मूलम्-अनुष्ठाने कृते प्राणः समश्चलति त- त्क्षणात् ॥ भवेदभ्यासने सम्यक्साध- कस्य न संशयः ॥ १११ ॥ टीका-पूर्वोक्त अनुष्ठान करनेसे उसी समय प्राण सम होके सुषुम्णामें प्रवेश करेगा अभ्याससे साधक- का वायु सम होजायगा इसमें संशय नहीं ॥ १११ ॥ मूलम्-पद्मासने स्थितो योगी प्राणापान विधानतः ॥ पूरयेत्स विमुक्तः स्यात्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ११२ ॥ टीका-ईश्वर श्रीपार्वतीजीसे कहते हैं कि पद्मासन-
( ८८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । स्थित योगी प्राण अपानके विधानसे वायु पूरण करेगा सो संसारबन्धसे मुक्तहोजायगा इसमें संशय नहीं है हम सत्य कहते हैं ॥ ११२ ॥ मूलम् -प्रसार्य चरणद्वन्द्वं परस्परमसंयुतं। स्वपाणिभ्यां दृढं धृत्वा जानूपरि शिरो न्यसेत् ॥ ११३ ॥ आसनोग्रमिदं प्रोक्तं भवेदनिलदीपनम् ॥ देहावसानहरणं प- श्चिमोत्तानसंज्ञकम् ॥११४॥ यएतदासनं श्रेष्ठं प्रत्यहं साधयेत्सुधीः ॥ वायुः पश्चि- ममार्गेण तस्य सञ्चरति ध्रुवम् ॥ ११५ ॥ टीका-दोनों चरणोंको संग परस्पर लम्बाकरके दोनों हाथोंसे बलसे धरे और जानु पर शिरको स्थितकरे उसको उग्रासन कहतेहैं, और पश्चिमतान भी संज्ञा है इससे वायुदीपन होताहै और मृत्युका नाशकरता है यह सब आसनोंमें श्रेष्ठ है और बुद्धिमान् इसको नित्य साधन करे तो उसका वायु पश्चिम मार्गसे अवश्य सञ्चार करेगा ॥ ११३ ॥ ११४ ॥ ११५ ॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलानां सर्वसिद्धिः प्र- जायते ॥ तस्माद्योगी प्रयत्नेन साधये- त्सिद्धमात्मनः ॥ ११६ ॥
तृतीयपटलः । ( ८९ ) टीका-ऐसे पूर्वोक्त अभ्यासमें जो लोग तत्परहैं उन- को सर्व सिद्धि उत्पन्न होती है. इस हेतुसे यत्न करके योगी आत्माके सिद्धहोनेकी साधना करे ॥ ११६ ॥ मूलम्-गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्यकस्य चित् ॥ येन शीघ्रं मरुत्सिद्धिर्भवेद्दुःखौ- घनाशिनी ॥ ११७ ॥ टीका-यह आसन जो पहिले कहा है यत्नसे गोप- नीयहै सबको देना उचित नहीं है परंतु अधिकारीको देना योग्यहै इससे बहुत शीघ्र वायु सिद्ध होजाताहै और यह सिद्धि दुःखके समूहको नाश करने- वाली है ॥ ११७ ॥ मूलम्-जानूर्वोरन्तरे सम्यग्धृत्वा पादतले उभे ॥ समकायः सुखासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥ ११८ ॥ अनेन विधिना यो- गी मारुतं साधयेत्सुधीः ॥ देहे न क्रमते व्याधिस्तस्य वायुश्च सिध्यति ॥ ११९ ॥ सुखासनमिदं प्रोक्तं सर्वदुःखप्रणाशनम् ॥ स्वस्तिकं योगिभिर्गोप्यं स्वस्तीकरण- मुत्तमम् ॥ १२० ॥ टीका-जानु और ऊरुके मध्यमें बराबर पादको
(९०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ऊपर नीचे धरे और समकाय अर्थात् बराबर शरीर करके सुखपूर्वक बैठे उसको स्वस्तिकासन कहते हैं. इस विधानसे बुद्धिमान् योगी वायुका साधनकरे तो उसके शरीरमें व्याधी प्रवेश नहीं करती और उसको वायु सिद्धहोजातीहै इसको सुखासन कहते हैं यह सर्वदुःखका नाशक है यह स्वस्तिकासन योगी लोगोंको गोप्य रख- ना उचितहै इसकारणसे की उत्तम कल्याणका का- रकहै ॥ ११८ ॥ ११९ ॥ १२० ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगाभ्यासतत्त्व- कथनं नाम तृतीयः पटलः समाप्तः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थपटलः । मूलम्-आदौ पूरकयोगेन स्वाधारे पूरये- न्मनः॥ गुदमेढ्रान्तरे योनिस्तामाकुंच्य प्रवर्तते ॥ १ ॥ टीका-पहिले पूरक योगविधानसे आधारपद्ममें वायुको मन सहित पूरक करके स्थित करे और गुदामे- ढके मध्यमें जो योनिस्थान है उसको यत्नसे आकुञ्चन करनेमें प्रवृत्तहोय ॥ १ ॥ मूलम्-ब्रह्मयोनिगतं ध्यात्वा कामं कन्दुक- सन्निभम्॥सूर्यकोटिप्रतीकाशंचन्द्रकोटि-
चतुर्थपटलः । ( ९१ ) सुशीतलम् ॥ २ ॥ तस्योर्ध्वं तु शिखासूक्ष्मा चिद्रूपा परमाकला ॥ तया सहितमात्मा- नमेकीभूतं विचिन्तयेत् ॥ ३ ॥ टीका-ब्रह्मयोतिके मध्यमें कामपुष्प अर्थात् काम- बाणके समान कोटिसूर्यके सदृश प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल कामदेवका ध्यान करे और उसके ऊर्ध्व भागमें सूक्ष्म ज्योति शिखा चैतन्यस्वरू- पा परमाशक्तिसहित एक परमात्माका चिन्तन करै ॥ २ ॥ ३ ॥ मूलम्-गच्छतिब्रह्ममार्गेण लिंगत्रयक्रमेण वै॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशी- तलम्॥४॥अमृतं तद्धि स्वर्गस्थं परमान- न्दलक्षणम्॥ श्वेतरक्तं तेजसाढ्यं सुधाधा- राप्रवर्षिणम् ॥ ५ ॥ पीत्वा कुलामृतं दि- व्यं पुनरेव विशेत्कुलम् ॥ टीका-उसी ब्रह्मयोनिसे जीव सुषुम्णा रन्ध्रद्वारा क्रमसे तीन लिङ्ग अर्थात् स्थूल सूक्ष्म कारणस्वरूपसे प्रस्थान करताहै और स्वर्गस्थ अमृत परम आनन्द- का लक्षण श्वेत रक्त-वर्ण कोटि सूर्यके सदृश तेज प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल सुधाधारा-