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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

तृतीय विकास : २९ आणवोपाय से ध्यानादि श्रीमालिनीविजय तन्त्र में कहा है ।-- उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ अर्थ--प्राणादि पंच द्वारा उच्चार से, खेचरी आदि मुद्रा से, ध्वन्याभ्यास से कदली सम्पुटाकार की तरह हृदयादि में धारणा से जो पूर्ण समावेश हो उसे आणवोपाय द्वारा ध्यान कहते हैं । इसका पर्यवसान शाक्तोपाय में होता है । ऐसी किसी भी युक्ति से जो गुरूपदिष्ट हो लय-भावना द्वारा ध्यान करने से माया का प्रशमन होता है ॥४॥ सम्बन्ध--आणवोपाय से ध्यान की विधि कहकर अब उसके योग (अप्राप्त को पाना) और क्षेम (प्राप्त किये की रक्षा) देने वाले प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और समाधि कहते हैं । नाडीसंहार-भूतजय-भूतकैवल्य-भूतपृथक्त्वानि ॥ ५ ॥ नाडीसंहार—प्राणापानादि का मध्यनाडी (सुषुम्ना) में संहार अर्थात् लय करना (प्राणायाम), भूतजय—पृथ्वी आदि भूतों का धारणाओं से वश करना (धारणा), भूतकैवल्य—पंचभूतों का आत्मा से अलग करना अर्थात् चित्त का भूतों से हटाना (प्रत्याहार) और भूतपृथक्त्वानि—पंचभूतों से पृथक् होकर निर्मल तथा स्वच्छन्द चिदात्मा में वास करना (समाधि) —योगी को यह भावनाएँ करनी चाहिए । व्याख्या—आत्मव्याप्ति दृढ़ करने के लिए अन्य साधन हैं । (१) नाडीसंहार के प्रकार में प्राण, अपान, समान आदि मध्यनाडी (सुषुम्ना) में लय करना है । इसके लिए सामान्य (बाह्य) दो प्राणायाम और विशेष (आभ्यन्तर) एक प्राणायाम कहे गये हैं । क—सामान्य (बाह्य) प्राणायाम दायें नासापुट को दायें हाथ के अंगूठे से बन्द करके बायें नासापुट से वायु धीरे-धीरे अन्दर लेना चाहिये । इसे पूरक कहते हैं । फिर बायें नासापुट को मध्यमा अंगुली से बन्द करके दायें नासापुट से वायु धीरे-धीरे बाहर छोड़ देना चाहिये । इसे रेचक कहते हैं। इस प्रकार तीन से पांच बार तक सामान्य रूप से करना चाहिये । इसके निरन्तर अभ्यास करने से नाडी-शोधन होता है अर्थात् मोक्षमार्ग के मध्य-धाम का विकास होता है । ख—सामान्य (बाह्य) प्राणायाम ऊपर कहे हुए के अनुसार पूरक करके ही वायु को यथाशक्ति कुछ देर अन्दर ही रोके रखना चाहिये । इसे प्राण-निरोध कहते हैं और यह कुम्भक है । इसके उपरान्त रेचक करना चाहिये ।

३० : शिवसूत्र विमर्श विशेष (आभ्यन्तर) प्राणायाम मध्य पथ के द्वारा बहिर्द्वादशान्त की ओर प्राण-वायु का रेचक करके सन्धि-स्थान पर कुम्भक करना चाहिये । फिर वायु को हृदय अर्थात् अन्तर्द्वादशान्त की तरफ लेकर सन्धि पर फिर कुम्भक करना चाहिये । यह अभ्यास जब आयास के बिना ही होने लगे तब इसे आभ्यन्तर प्राणायाम अर्थात् प्रशान्त-कुम्भक कहते हैं । यहाँ कुम्भक ही सन्धि बन जाता है अतः निःस्पन्द कुम्भक कहलाता है । दैशिक कटाक्ष से यही ब्रह्मद्वार के विकसित होने का अनुग्रहावसर है । तब 'सर्वमिदं अह च ब्रह्मैवेति' भावना दृढ़ होती है । इन प्राणायामों से प्राणवायु का संचार हल्का होने लगता है और इस प्रकार वायु- प्रशमन (निरोध) होकर ऊर्ध्व-द्वादशान्त के लिए उदान-वायु द्वारा सुषुम्नाद्वार खुल जाता है । यह सुप्रशान्त अर्थात् चतुर्थ प्राणायाम ही सर्वसिद्धिप्रद है । स्मरण रहे कि यह प्राणायाम योगी साधक ही कर सकता है । (२) भूतजय के लिए पृथिवी आदि पाँच भूतों की धारणाएँ इस प्रकार करनी होती हैं : विराट् भावना में पञ्चभूतों को विभक्त करके पृथिवी को इससे दुगुने जल में, जल को इससे दुगुने तेज में, तेज को इससे दुगुने वायु में और वायु को इससे दुगुने आकाश में लय करना चाहिए । इस धारणा से योगी को भूतों पर विजय प्राप्त होती है और वह शरीर की पीड़ाओं सिरदर्द आदि पर वश पा सकता है । शरीर में यह धारणा हृदय देश के आधार से अंगुष्ठ, नाभि, कण्ठ आदि देशों में सद्गुरुप्रोक्त रीति से की जाती है और ब्रह्मरन्ध्र में आकाश ग्रन्थि का भेदन कर साधक को द्वादशान्त में सब सिद्धियां प्राप्त होती हैं । (३) भूतकैवल्य में चित्त को भूतों से प्रत्याहरण किया जाता है। भूतों को स्वरूप- ज्ञान से भिन्न किया जाता है । चित्त मन से और विषयों से हटकर हृदय देश में ही संचार करता है । यह दशा चतुर्थ अर्थात् सुप्रशान्त प्राणायाम (जिसका वर्णन ऊपर नाड़ी संहार में किया गया है) से साधक को सिद्ध होती है । (४) भूतपृथक्त्व योगी की समाधि दशा है । इसके अभ्यास से भूतों के आवरण से निर्मल हुआ चित्त स्वच्छन्द चिदानन्द भाव को प्राप्त होता है । यह योगी की निरुद्ध अवस्था है । यह अवस्था आणवोपाय में प्रयत्न से ही साध्य है । जिस योगी को शाम्भ- वोपाय का समावेश हुआ हो उसे यह अवस्था यत्न के बिना ही स्वाभाविक होती है । जैसे प्रथम उन्मेष के बीसवें सूत्र में कहा गया है : "भूतसंधानभूतपृथक्त्वविश्वसंघट्टाः" यहाँ आणवोपाय में योगी को इन अवस्थाओं की भावना करनी आवश्यक है ॥५॥ सम्बन्ध—स्वकारण में पञ्चभूतों की एक दूसरे में लय भावना करने से तत्त्ववशी- करणरूपा सिद्धि प्राप्त होती है

तृतीय विकास : ३१ से ही होती है तत्त्वज्ञान से नहीं । इस बात को आगे शिव-व्याप्ति के प्रकरण में स्पष्ट करते हैं। शिवव्याप्तिलाभ होने पर योगी को समाधि और व्युत्थान दोनों दशाओं में स्वस्वरूप की उपलब्धि रहती है। जिसे जगदानन्द कहते हैं ।] मोहावरणात् सिद्धिः ॥६॥ मोहावरणात्—(आत्मव्याप्ति में) मोह का आवरण बना रहने से सिद्धिः—(उस तत्त्व के भोग की) सिद्धि होती है (किन्तु परतत्त्व के प्रकाश से वञ्चित ही रहता है) व्याख्या—सूत्र पाँच में कहे हुए प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और समाधि के साधन में लगे हुए साधक को परतत्त्व के प्रकाश होने से पूर्व मितसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। उसे साधन काल में ही आत्मतत्त्व में व्याप्ति होती है। मितसिद्धियों में लगे रहने से उसे परतत्त्व के प्रकाश में विघ्न आ जाते हैं। साधक को आत्मव्याप्ति में भी, सिद्धियों से मोहित होने के कारण, माया का आवरण रहता है । अतः वह विद्वान् नहीं अपितु मूर्ख ही है । पातञ्जलयोगदर्शन में कहा है : "ते समाधावुपसर्गाः व्युत्थाने सिद्धयः" ॥३-३७॥ अर्थ—वे (सिद्धियाँ) परतत्त्व के ज्ञान (समाधि) प्राप्त करने में विघ्न हैं और व्यु- त्थान में सिद्धियाँ है । जब आत्मव्याप्ति तक मोह पर विजय प्राप्त होती है तो योगी को समाधि में चिदानन्द लाभ होता है ॥६॥ सम्बन्ध—परन्तु सात्त्विक विद्या प्राप्ति के लिए जगदानन्द लाभ करना आवश्यक है । इस अवस्था में योगी को समाधि और व्युत्थान में परमानन्दानुभूति रहती है । इसे शिवव्याप्ति कहते हैं । मोहावरण के नष्ट होने पर धारणादि षडङ्गयोग से भी परतत्त्व का समावेश होता है । इसका निरूपण मृत्युजिद्भू‌ट्टारक कथित नेत्रतन्त्र में इस प्रकार मिलता है-- मध्यमं प्राणमाश्रित्य प्राणापानपथान्तरम् । आलम्ब्य ज्ञानशक्तिं च तत्स्थं चैवासनं लभेत् ॥ प्राणादिस्थूलभावं तु त्यक्त्वा सूक्ष्ममथान्तरम् । सूक्ष्मातीतं तु परमं स्पन्दनं लभ्यते यतः ॥ प्राणायामः स निर्दिष्टो यस्मान्न च्यवते पुनः । शब्दादिगुणवृत्तिर्या चेतसा ह्यनुभूयते ॥ त्वक्त्वा तां परमं धाम प्रविशेत्तत्स्वचेतसा । प्रत्याहार इति प्रोक्तो भवपाशनिकृन्तनः ॥ धीगुणान्समतिक्रम्य निर्ध्येयं परमं विभुम् । ध्यात्वा ध्येयं स्वसंवेद्यं ध्यानं तच्च विदुर्बुधाः ॥

धारणा परमात्मत्वं धार्यते येन सर्वदा ।

३२ : शिवसूत्र विमर्श धारणा परमात्मत्वं धार्यते येन सर्वदा । धारणा सा विनिर्दिष्टा भवपाशनिवारिणी ॥ स्वपरस्थेषु भूतेषु जगत्यस्मिन्समानधीः । शिवोऽहमद्वितीयोऽहं समाधिः स परः स्मृतः ॥ —(अ० ८, श्लो० ११-१८) अर्थ—प्राण और अपान की गति के बीच में मध्यम प्राण अर्थात् उदान के संविद्रूप प्राणीय मध्यमभाग में निमज्जन करके ज्ञानशक्ति अर्थात् चिद्व्याप्ति में निमज्जित होकर ठहरने को आसन कहते हैं। चिद्रूपता के सदोदित होने के कारण यहाँ बुद्धि का अभाव रहता है क्योंकि अभेद चिन्मय अवस्था में ही शुद्धबोध होता है। स्थूल प्राणायाम रेचकपूरकादि स्वभाव वाला होता है। इसको छोड़कर आन्तर मध्यपथ से रेचनपूरणादि रूप प्राणायाम सूक्ष्म होता है। इस सूक्ष्म प्राणायाम से अतीत स्पन्दन का प्रादुर्भाव होता है। इसे परम-स्पन्द कहते हैं। यहाँ प्राणादि चित्स्फुरण का अभाव रहता है। यही उत्कृष्ट प्राणायाम कहा गया है। इसका आसाधन स्थिर होने पर योगी चित्प्रमातृमयता को कभी नहीं छोड़ता, परप्रमातृभाव में सदा आनन्दमय रहता है जिससे फिर संसार-सरणि में नहीं आने पाता है। शब्द, स्पर्श आदि में सात्त्विक या तामसिक जो कोई वृत्ति अस्पष्ट रूप से अनुभव की जाती है उसका अनादर करके योगी प्रमाताचित्त से अविकल्प संवित्परामर्श के द्वारा पर-चित् धाम में प्रवेश करता है। इसी को संसार पाश को काट डालने वाला प्रत्याहार कहते हैं। अविकल्प संवित्परामर्श के द्वारा बुद्धि के सत्त्वादि गुणों का शमन करने से नियत आकारादि ध्येय वस्तु का तथा धारणा देशों का उल्लङ्घन किया जाता है। ऐसा होने पर योगी का ध्येय स्वसंवेद्य स्वप्रकाशता ही होती है जो व्यापक, अव्यय और नित्य है। इसी दशा को बुद्धिमान् जन ध्यान कहते हैं। जो योगी सर्वदा आत्मसमावेश द्वारा चैतन्यरूप परमात्मभाव का आलम्बन लेता है उसकी उस चैतन्य विमर्शनात्मा वृत्ति को धारणा कहते हैं। यह धारणा भव-पाश को हटाती है। जगत् में ग्राह्य-ग्राहक रूप से ठहरे हुए भावों में जब 'यह सब कुछ मैं ही हूँ' यह निश्चय हो और 'अहंता' व 'इदंता' की समानाधिकरणरूप शुद्धविद्या टिक जाय तो पर- समाधि सिद्ध होती है। अतः शिवव्याप्ति से परतत्त्व में ही समावेश होता है। आत्मव्याप्ति में सम्भव मित-सिद्धियां नहीं। यह अगले सूत्र में कहते हैं।

तृतीय विकास : ३३ मोहजयादनन्ताभोगात्सहजविद्याजयः ॥७॥ मोहजयात्—(समाधि में आत्मव्याप्ति तक) मोह के विजय होने पर अनन्त—अनन्तता अर्थात् शिवव्याप्ति आभोगात्—के विस्तार से सहजविद्या—सात्त्विक विद्या (समाधि और व्युत्थान दोनों में चिद्रूप आनन्द) जयः—की प्राप्ति होती है । व्याख्या—अख्याति (अज्ञान) रूप पाश को मोह-माया कहते हैं । इसका प्रभाव समना अवस्था तक होता है । योगी को तुर्य अर्थात् शक्ति-व्यापिनी समना तक माया- जाल का रंग रहता है । स्वच्छन्द तन्त्र में शिव पार्वती से कहते हैं : “समनान्तं वरारोहे पाशजालमनन्तकम् ।” अर्थ—हे पार्वती ! (योगी को) समना अवस्था तक भी माया-पाश का अन्त नहीं होता है । इस माया के मोह पर विजय पाने से योगी के सब संस्कारों का शमन होता है और यही अनन्तता का विस्तार है । इसे उन्मना अवस्था अथवा शिव-व्याप्ति कहते हैं जो चैतन्य स्वरूप में स्थिरता पाने का हेतु बनती है, क्योंकि आणवोपाय में ध्यानादि- साधन का शुद्ध चिन्तनादि में ही पर्यवसान होता है । श्री स्वच्छन्द-तन्त्र में आगे कहा है : पाशावलोकनं त्यक्त्वा स्वरूपालोकनं हि यत् । आत्मव्याप्तिर्भवेत्येषा चैतन्ये हेतुरूपिणी ॥ सार्वज्ञादिगुणा येऽथा व्यापकान्भावयेद्यदा । शिवव्याप्तिर्भवेदेषा चैतन्ये सेतुरूपिणी ॥ अर्थ—माया पाश को छोड़कर जो स्वरूप का अवलोकन (अनुभव) समाधि में होता है उसे आत्मव्याप्ति कहते हैं । शिवव्याप्ति इससे कुछ और ही है । जब योगी सर्वज्ञता आदि गुणों के भावों को अहं-व्यापकता की भावना में लाता है तो यह शिवव्याप्ति है जो योगी को चैतन्यस्वरूपता में प्रेरित करती है । इस प्रकार आत्मव्याप्ति के अन्त तक मोह पर विजय पाने से उन्मना अर्थात् शिव- व्याप्ति रूप सात्त्विक विद्या योगी को प्राप्त होती है । यही वह सहजावस्था है जहाँ योगी को अनायास ही स्वाभाविक रूप से समाधि अथवा व्युत्थान दशा में संकोच रहित परमशिवरूपता ही रहती है । यह शिव-व्याप्ति की पहली किरण है जिस में सहज-विद्या प्राप्ति होती है । यह स्वानुभूति प्रकाशरूप है जिस में अहंता पूर्णविमर्शरूप होती है ॥७॥ सम्बन्ध—अब शक्तिरूपता का वर्णन करते हैं । ३

३४ : शिवसूत्र विमर्श जाग्रद् द्वितीयकरः ॥८॥ द्वितीयकरः—(शिवव्याप्ति की) दूसरी किरण जाग्रत्—(वेद्यवर्ग को आभासन कराने वाली) जागरूकता है। व्याख्या—सात्त्विक अर्थात् शुद्ध विद्या को प्राप्त करके उसके साथ एकाग्र वा साम- रस्य होने को जागरूकता कहते हैं। पूर्ण विमर्शरूप अहंता का लाभ होने के बाद इदन्ता का भी उसी भाव से विमर्श करना आवश्यक है। वही स्वरूप-परिपूर्णता है। अतः वेद्य- वर्ग के आभासन में आने वाला जगत् इसकी दूसरी किरण है। विज्ञानभैरव में कहा है : यत्र यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते विभोः । तस्य तन्मात्रधर्मित्वाच्चिल्लयाद्भूरितात्मता ॥ श्लोक ११७॥ अर्थ—जहाँ जहाँ परभैरवरूप चित्प्रकाश चक्षु आदि मार्ग से नील सुख आदि में स्फुरित होता है वहाँ वहाँ चैतन्य के बिना कुछ और न होने के कारण वह नीलादि चित्त में ही लीन होते हैं। यही साधक की परभैरवरूपता है। सर्वमङ्गला-तन्त्र में कहा है : शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥ अर्थ—चित्स्वरूप की परिपूर्णता में शक्ति और शक्तिमान् (शिव) केवल दो पदार्थ हैं। सारा जगत् तो उसकी शक्तियाँ हैं और शक्तिमान् स्वयं महेश्वर है ॥८॥ सम्बन्ध—इस प्रकार दोनों किरणों द्वारा स्वरूपविमर्शन से आविष्ट योगी के आत्मा के बारे में कहते हैं। नर्तक आत्मा ॥९॥ नर्तकः—विश्वनाटक का नट आत्मा—(उसका) अपना आप है। व्याख्या—अपने अन्तर में छिपाये हुए अपने शुद्ध स्वरूप की पकड़ के अनुसार नाना अवस्थाओं का प्रपंच, अपने ही परिस्पन्द अर्थात् स्वातन्त्र्य शक्ति की क्रीड़ा से अपनी ही भित्ति पर जो प्रकट करता है वह नट अपना आप है। भगवान् उत्पल की प्रत्यभिज्ञा की टीका (जो अनुपलब्ध है) में यह बात स्पष्ट है : “संसारनाट्यप्रवर्तयिता सुप्ते जगति जागरूक एक एव परमेश्वरः” अर्थ—संसार नाटक को प्रवर्तन में लाने वाला एक परमेश्वर ही इस सोये हुए जगत् में सजग है ॥९॥ सम्बन्ध—अब इस जगत्-नाटक में नर्तक (योगी) का नाट्य-स्थान बतलाते हैं।

तृतीय विकास : ३५ रङ्गोऽन्तरात्मा ॥१०॥ रङ्गः—(योगी के प्रपंच की नाना अवस्थाओं में) खेल का स्थान अन्तरात्मा—(प्राण-प्रधान) पुर्यष्टक से नियन्त्रित जीव है । व्याख्या—स्वरूप के संकोच का अवभासन कराने वाला तत्त्व शून्य-प्रधान अथवा प्राण-प्रधान पुर्यष्टक है । यही अन्तर जीव है । इसी के द्वारा योगी जगत् का भास देने वाली क्रीड़ा करता है। सूक्ष्म शरीर में ठहरा हुआ ही वह अपनी इन्द्रियों के स्पन्दन-क्रम से जगत् के नाटक का अवभासन करता है। शिवव्याप्ति को प्राप्त योगी अहंता और इदंता, अन्तर और बाह्य में चिद्विमर्श की समरसता का अनुभव करता है। साधारणरूप में पुर्यष्टक-प्रमातृता स्वप्न अवस्था में ही प्रकट होती है ॥१०॥ सम्बन्ध—इस प्रकार पुर्यष्टक रूप आत्मा द्वारा रङ्गमञ्च पर नर्तन करने वाले योगी के दर्शक कौन हैं, इस प्रकार कहते हैं । प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि ॥११॥ इन्द्रियाणि—योगी की चक्षुरादि इन्द्रियाँ (संसार नाटक को प्रकट करने के आनन्द में) प्रेक्षकाणि—दर्शक (स्वस्वरूप को अन्तर्मुख भाव से साक्षात् कराने वाली) हैं। व्याख्या—जैसे रंगमंच पर खेलने वाले नट के नाटक का आस्वादन करने वाले रंगशाला में बैठे दर्शक होते हैं वैसे स्वस्वरूप में ठहरा हुआ योगी नट है जो अन्तरात्मा अर्थात् पुर्यष्टक रूप रंगमंच पर अहंता और इदन्ता में चिद्विमर्श की समरसता से संसार- नाटक इन्द्रिय-स्पन्दन के क्रम से अवभासित (प्रदर्शन) करता है । अतः चक्षुरादि इन्द्रियाँ इस नाटक के दर्शक हैं। तात्पर्य यह है कि उसकी चक्षुरादि इन्द्रियाँ संसार नाटक को प्रकट करने के आनन्द में मग्न होकर ही स्वस्वरूप का अन्तर्मुखभाव से साक्षात्कार करतीं हैं । इस प्रकार इन्द्रियाँ चमत्कार-रस के सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त करती हैं। श्रुति कहती है : ‘कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षद् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमश्नन्’ ॥—कठ० उप० । २-१-१॥ अर्थ—कोई धैर्यवान् (योगी) ही चक्षुरादि इन्द्रियों को अन्तर्मुख करके स्वस्वरूप का साक्षात्कार कर अमृत-पद को प्राप्त करता है । और भी : ‘यत्र यत्र मिलिता मरीचयः तत्र तत्र प्रभुरेव जृम्भति’

३६ : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—जहाँ जहाँ चिन्मरीचियों का साक्षात्कार होता है वहाँ वहाँ प्रभु ही प्रकट होते हैं ॥११॥ सम्बन्ध—नाटक में सात्त्विक अभिनय की सिद्धि बुद्धि की कुशलता से ही मिलती है। इसी प्रकार योगी को जगदानन्द की प्राप्ति विशेष सात्त्विक बुद्धि से होती है। धीवशात् सत्त्वसिद्धिः ॥१२॥ धीवशात्—(ऋतम्भरा प्रज्ञा) शुद्ध-सत्त्व-बुद्धि से सत्त्वसिद्धिः—आन्तर संवित्-स्पन्दन की अभिव्यक्ति होती है। व्याख्या—तात्त्विक स्वरूप का विमर्श करने में चतुर बुद्धि को धी अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। जैसे नाटक में अभिनय की सफलता कुशल बुद्धि पर ही निर्भर होती है वैसे ही शुद्ध-सत्त्व में ठहरी हुई युक्ति-कुशल बुद्धि के द्वारा ही योगी को आन्तर संवित्-स्पन्द की अभिव्यक्ति सफलता-पूर्वक होती है ॥१२॥ सम्बन्ध—इस सात्त्विक अभिनय में कुशलता के प्राप्त होने पर इस योगी को स्वतन्त्रता की सिद्धि होती है। सिद्धः स्वतन्त्रभावः ॥१३॥ स्वतन्त्रभाव : -- (जाग्रत् और स्वप्न में इस योगी को) सारे विश्व को वश करने की स्वतन्त्रता सिद्ध : -- सम्पन्न ही है। व्याख्या—युक्ति-कुशल बुद्धि अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा का उदय होने पर शिव-व्याप्ति प्राप्त योगी को स्वाभाविक ज्ञानरूपता अथवा सहजभावरूप स्वातन्त्र्य सम्पन्न होता है। सर्व-कर्तृत्वादि-रूप स्वातन्त्र्य उपलब्ध होता है। सारा विश्व उसके वश में होता है। इसका तात्पर्य इस प्रकार है— (क) परदशा में जाग्रत् से स्वप्न अवस्था तक जब चाहे समाधि में बैठ सकता है। स्वप्न में भी स्वरूप-स्थित होकर स्वेच्छा से जागता है। (ख) परापर स्वातन्त्र्य दशा में जिस किसी अवस्था में जो कोई इच्छा करता है वह उसे पूर्ण होती है। जाग्रत् अवस्था में यदि किसी को शाप दे या वरदान दे तो वह तत्क्षण सफल होता है। स्वप्न अवस्था में यदि चाहे कि 'मैं इस प्रकार स्वप्न देखूं" तो उसकी इच्छापूर्ति तुरन्त होती है। यही उसका जाग्रत-स्वप्न अवस्थाओं में स्वातन्त्र्य है। ऐसे योगी को सुषुप्ति अवस्था नहीं होती है वह तो तुर्यावस्था में बदल जाती है। श्री स्वच्छन्द तन्त्र में कहा है : सर्वतत्त्वानि भूतानि मन्त्रवर्णाश्च ये स्मृताः । नित्यं तस्य वशास्ते वै शिवभावनया सदा ॥ —(प० ७ श्लोक २४२)

तृतीय विकास : ३७ अर्थ-सब वेद्य-उल्लास को शिव से अभिन्न स्वात्मा के ऐक्य-परामर्श से उस (योगी) को जल, अग्नि आदि तत्त्व, हिंसा करने वाले जीव और शरीर में ठहरे शब्दराशियों के वर्ण सदा वश में रहते हैं ॥१३॥ सम्बन्ध—ऐसे योगी का स्वातन्त्र्य इस प्रकार है। यथा तत्र तथान्यत्र ॥१४॥ यथा—जैसे तत्र—तुर्य अवस्था में (योगी को सहजभाव अर्थात् समाहित भाव प्राप्त होता है) तथा—वैसे ही अन्यत्र—स्वरूप बाह्य जाग्रत् आदि सब अवस्थाओं में भी (वह सदा समा- हित रहता है)। व्याख्या—शिवव्याप्ति-सम्पन्न योगी को जैसे स्वरूप में अभिव्यक्ति होती है वैसे ही उसे जाग्रत् तथा स्वप्न अवस्थाओं में भी स्वरूप-प्रथन होता है, क्योंकि सदा समाहित रहने में वह युक्ति-कुशल होता है। वह दूसरे के शरीर में भी संक्रमण कर सकता है। तात्पर्य यह है कि जिस किसी अवस्था में योगी हो उसमें स्वरूपस्थित रहने की स्वतन्त्रता प्राप्त होती है ॥१४॥ सम्बन्ध—परन्तु ऐसे उत्कृष्ट योगी को भी उदासीन भाव से नहीं रहना चाहिए, अपितु— बीजावधानम् ॥१५॥ बीज--विश्वसंवित् में अवधानम्--पुनः पुनः चित्त (कर्त्तव्यम्)—लगाना चाहिए। व्याख्या—उसे विश्वकारण अर्थात् स्फुरण-स्वरूप परशक्ति में पुनः पुनः चित्त को निमज्जित करना चाहिए। जैसे विज्ञानभैरव के १३७ वें श्लोक में कहा है : ज्ञानप्रकाशकं सर्वं सर्वेणात्मा प्रकाशकः । एकमेकस्वभावत्वात् ज्ञानं ज्ञेयं विभाज्यते ॥ अर्थ—सर्व शब्द वाच्य ज्ञेयजात ज्ञान से पृथक् नहीं है और प्रकाशक ज्ञान आत्मा से भिन्न नहीं है। इस प्रकार ऐक्य का भावना करनी चाहिए। यहाँ योगी को स्वरूपस्थिति में सदा सावधान रहने का संकेत है जिससे वह मित- सिद्धियों में कभी उलझ न जाये ॥१५॥ सम्बन्ध—ऐसा होने पर यह योगी शाक्तबल का लाभ करके शाम्भव पद में विश्रान्ति पाने लगता है। अतः कहा है—

३८ : शिवसूत्र विमर्श आसनस्थः सुखं ह्रदे निमज्जति ॥१६॥ आसनस्थः- (योगो) आत्मा के साथ एकरूप होकर सुखं-स्वभाव से अर्थात् आयासरहित सुख से ह्रदे-चित्स्वरूप के परमामृत समुद्र में निमज्जति - डूब जाता है। व्याख्या-जिस दशा में योगी आत्मा के साथ सदा एकरूप होकर स्थिर रहता है उसे आसन कहते हैं । जैसे नेत्रतन्त्र में : मध्यं प्राणमाश्रित्य प्राणापानपथान्तरम् आलम्ब्य ज्ञानशक्तिं च तत्स्थं चैवासनं लभेत् ॥ अर्थ-प्राण तथा अपान के रास्ते में मध्यम प्राण (अर्थात् कुम्भक भाव) का आश्रय लेकर ज्ञानशक्ति के सहारे उसमें ठहरने का आसन धारण करे । 'न तु ऋजुत्वं शुष्कवृक्षवत् इति' । यही उसका परम शाक्त बल अथवा चिद्बल है। इस दशा में उसे पर अथवा अपर (निराकार अथवा साकार) ध्यान, धारणा आदि क्रियाओं (अभ्यास) में प्रयास (अथवा प्रयत्न) नहीं करना पड़ता है । वह नित्य अन्तर्मुख भाव में आत्मा के साथ एकता के परामर्श में ही आकर्षित रहता है । इसी को निराभास पद कहते हैं । इस निराभास पद का वर्णन श्री नेत्रतन्त्र में अवलोकनीय है । पूर्वावस्था में दृढ़ तथा निरन्तर अभ्यास करने से योगी को आत्मा के साथ यह लगन स्वाभाविक बन चुकी होती है । अतः अब इस सूत्र में उसे ध्यानादि प्रयास नहीं करने पड़ते । इस प्रकार वह सुखस्वरूप होकर, विश्व के प्रवाह तथा प्रसर (निर्म- लता तथा उत्पत्ति) के हेतु परमामृत समुद्र में, देहादि में आत्माभिमान रूप संकोच और उसके सम्बन्ध में सब संस्कारों से निवृत्त होकर, तन्मय हो जाता है । जैसे अष्टावक्रगीता में कहा है : निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ अर्थ-वासना रहित पुरुष-सिंह को देखकर विषय रूपी हाथी असमर्थ होकर चुप- चाप भाग जाते हैं और उसकी ओर आकर्षित होकर स्वयं सेवा में रहते हैं। इस प्रकार संशय रहित और निश्चलमन वाला ज्ञानी यम-नियमादि योग क्रिया को आग्रह से नहीं करता है किन्तु लोकदृष्टि से देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ भी आत्मसुख में ही निमग्न रहता है ।

तृतीय विकास : ३९ श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे ही योगी के लिए संकेत है— ‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च’ अर्थ—अतः विषय-इन्द्रिय संयोग के सब व्यवहारों में मेरा (मुझ परमात्मा का) स्मरण कर और मलों से ऊपर उठने का अभ्यास-रूप युद्ध भी कर ॥१६॥ सम्बन्ध—आणवोपाय क्रम से नाडीसंहारादि (उ० ३, सू० ५) द्वारा मोह पर विजय पाकर शुद्धविद्यारूप (उ० १, सू० २१) शाक्तबल के प्रकर्ष से योगी शाम्भवपद- रूप परामृत समुद्र में तन्मय हो जाता है। इस स्वतन्त्र पद पर अधिरूढ़ होकर योगी वेद्य तथा वेदक के अवभासरूप जगत् का अपनी इच्छा से निर्माण करता है। अब यह बतलाते हैं। स्वमात्रानिर्माणमापादयति ॥१७॥ स्वमात्रा—(तब योगी) अपनी इच्छा के अनुसार निर्माणं—जगत् के जाग्रत् तथा स्वप्न में सब सिद्धियों का आपादयति—सम्पदावान् बन जाता है। व्याख्या—क्रम पूर्वक शाम्भवोपाय द्वारा प्राप्त स्वतन्त्र पद पर ठहरा योगी अपनी विश्व-व्यापिनी इच्छा के द्वारा वेद्यवेदक के अवभासन रूप जगत् की सृष्टि भी करता है और विनाश भी। यह सम्पत्ति उसको जाग्रदादि अवस्थाओं में सिद्ध होती है ॥१७॥ सम्बन्ध—इस स्वातन्त्र्य से योगी को पुनर्जन्म का अभाव होना कहा है। विद्याऽविनाशे जन्मविनाश : ॥१८॥ विद्या—शुद्ध विद्या के अविनाशे—लगातार रहने पर जन्मविनाश :—(ऐसे योगी को) जन्मादि बन्धन नहीं रहता। व्याख्या—शुद्धविद्या के बल से शाम्भव पद पर ठहरा योगी जब आत्मा के साथ एकता का अनुभव लगातार करता है तो उसकी वह अवस्था स्वाभाविक होने के कारण सहजावस्था कहलाती है। स्थूल और सूक्ष्म देह और इन्द्रियों का समूह सदा दुःख से भरे होते हैं क्योंकि वे ही कर्म (बन्ध) के हेतु और अज्ञान (माया-मोह) के साथी हैं। अतः इन के द्वारा जन्म- मरण आदि बन्धन में जीव सदा यातना-ग्रस्त रहता है। परन्तु जब योगी को सहजावस्था प्राप्त होती है तो जन्मादि सब यातनाओं का सर्वथा नाश हो ही गया होता है ॥१८॥ सम्बन्ध—परन्तु संवित्-तत्त्व को पाकर भी योगी कभी प्रमाद के वश से मोह में फिर पड़ जाता है। जब उसका शुद्धविद्यास्वरूप किञ्चित् आवृत होने लगता है, तब :

४० : शिवसूत्र विमर्श कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः ॥१९॥ माहेश्वर्याद्या : —पीठेश्वरियाँ अर्थात् घोरतरी शक्तियाँ कवर्गादिषु—अ से क्ष पर्यन्त मातृका-चक्र में अर्थात् बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् में पशुमातरः—पशुप्रमाता रूप अधिष्ठातृशक्तियाँ बनकर योगी को द्वैत परम्परा में नीचे और नीचे गिराती रहती हैं। व्याख्या—यदि कभी इस योगी को चिद्रूपता के निरन्तर अभ्यास में प्रमादवश कमी आने लगे तो परावाक् प्रसर में आती हुई इच्छा-ज्ञान-क्रिया का आश्रय लेती है। इस प्रकार शिव-शक्ति-माहेश्वरी आदि वाचक रूपता मे प्रकट होते हुए अ से क्ष रूप मातृका का आश्रय लेकर बहिर्मुखता को प्राप्त होती हैं। इन्हीं को घोरतरी शक्तियाँ कहते हैं। यह योगी को द्वैत-प्रथा की ओर खींचती हैं और स्मय, हर्ष, भय, राग, द्वेषादि प्रपञ्च को फैलाती हैं। असंकुचित चिद्घन स्वरूप पर संकुचित परतन्त्र देहादि भाव को प्राप्त कराती हैं। पर-प्रमाता भिन्न-भिन्न प्रमाताओं में बंट जाता है जिससे अविकल्प अर्थात् सुषुप्ति और सविकल्प अर्थात् स्वप्न-जाग्रत् में संवित् संकुचित रूप धारण करती है। इस विषय में पहले भी कहा गया है : ज्ञानाधिष्ठानंमातृका (१-४) जिस में तीन मलों द्वारा बन्धकभाव सामान्य रूप में कहा गया है। द्वैतज्ञान का आधार (मलत्रय के कारण) बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् है जिसे अज्ञाता माता कहते हैं। परन्तु यहाँ प्राप्त-तत्त्व योगी को भी प्रमादवश पीठेश्वरियों १ (घोरतरी शक्तियों) द्वारा पशुप्रमाताओं के अधिष्ठान से शब्दानुवेद्य मोह में डाला जाता है ॥१९॥ सम्बन्ध—अतः ऊपर कही हुई युक्तियों से शुद्ध-तत्त्व को प्राप्त करके योगी को जाग्रदादि सब (चारों) दशाओं में सावधान रहना चाहिये जिससे उसे चित्स्वरूपता सदा बनी रहे। इस के लिए— त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम् ॥२०॥ त्रिषु—जाग्रदादि अवस्थाओं में चतुर्थं—शुद्धविद्याप्रकाश रूप तुर्य अवस्था तैलवत्—तेल की तरह अधिक और अधिक आसेच्यम्—फैलानी चाहिए। १ पीठ शरीर को कहते हैं। उसकी अधिष्ठातृ देवियाँ (आधार शक्तियाँ) बहिर्मुख बहिष्करण तथा बहिर्मुख अन्तष्करण हैं। इन्हें पीठेश्वरियाँ कहा है।

प्रकाश वाला तुर्यानन्द रूप तेज है, तेल की तरह अधिक फैलाना चाहिए। तीनों

तृतीय विकास : ४१ व्याख्या—जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में चौथी अवस्था, जो शुद्धतत्त्व के प्रकाश वाला तुर्यानन्द रूप तेज है, तेल की तरह अधिक फैलाना चाहिए। तीनों अवस्थाओं की उन्मेष तथा उपशान्ति दशाओं में भी आदि और अन्त कोटि की मध्यदशा को ग्रहण कर चिद्घनता को व्याप्त करना चाहिये, जिससे चिद्घनरूप परमामृत समुद्र में तन्मयीभाव प्राप्त हो । पहले विकास में 'जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु तुर्यभोगसंभवः' (१.७) इस सूत्र से सूचित किया गया है कि विश्व संवित् की व्याप्ति का अनुभव करने में उद्यम ही उपाय है—'उद्यमो भैरवः' (२.५) । तब योगी शक्तिचक्र के अनुसन्धान से जाग्रदादि अवस्थाओं के अन्तर्गत खाते हुए, जाते हुए, सोते हुए आदि व्यवहारों में भी आत्मस्फुरण के अनुभव का चमत्कार प्राप्त करता है। यही तुर्यावस्था है। आगे एक और सूत्र—'त्रितयभोक्ता वीरेशः' (१-११)—में शाम्भवोपाय के उपयुक्त हठपाक युक्ति से जाग्रदादि का संहार दिखाया गया है। इस प्रकार के अनुभव वाला योगी केवल चिन्मात्र ही रहता है। वह अपने संवित्सांम्राज्य के वैभव में भेदजगत् को ग्रास करने वाले वीरों में उत्तम वीर है क्योंकि वह प्रवणशील अन्तःकरण तथा बहिष्करण का अधीश्वर होता है। परन्तु तृतीय विकास के इस सूत्र में आणवोपाय के उपयुक्त धारणा की युक्ति से जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं को तुर्यरूप रस से सिंचित करने के अभ्यास की ओर ही संकेत है ॥२०॥ सम्बन्ध—अब इन तीनों अवस्थाओं में तुर्यरस के सेचन का उपाय कहते हैं। मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत् ॥२१॥ स्वचित्तेन—असंकुचित चिति द्वारा तादात्म्यता के ज्ञान से मग्नः—(शरीर प्राण आदि में अहंरूपता का शमन करते हुए) अविकल्प रूप में प्रविशेत्—अन्तर्मुख होना चाहिए। व्याख्या—तुर्य दशा में प्रवेश करने का प्रकार नेत्रतन्त्र में यूं कहा है : प्राणादिस्थूलभावं तु त्यक्त्वा सूक्ष्ममथान्तरम् । सूक्ष्मातीतं तु परमं स्पन्दनं लभ्यते यतः ॥ अर्थ-अभ्यास काल के आरम्भ में प्राणादि स्थूल भाव (प्राणायाम, ध्यान, धारणादि) का परिपाक होने से उनको योगी त्याग देता है। फिर सूक्ष्म भाव में प्रवेश करके मध्यपथ से वह सूक्ष्मातीत दशा का अनुभव करता है जो प्राण के आलम्बन से परे होती है क्योंकि उस दशा में चित्स्फाररूप रस का परस्पन्द ही रहता है।

४२ : शिवसूत्र विमर्श इसे मत्स्योदरी दशा कहते हैं। इस दशा में योगी के सारे शरीर में स्पन्दतत्त्व का उदय होता है अर्थात् किञ्चित् स्फुरण होता है, प्राण का चलन नहीं होता। आगे कहा है— 'प्रविशेत्तत्स्वचेतसा' अर्थात् उस दशा में योगी तादात्म्यभाव से ही शुद्धात्मा में स्थिति पाकर बोधमात्र शिव से संयोग पाता है। यही बात इस सूत्र में भी कही गई है कि योगी को तुर्यदशा का प्रादुर्भाव तभी होता है जब प्रमेयादि सब उपायों को त्याग कर प्रमातृचित्त से स्वरूप में मग्न होता है। रेचक, पूरक आदि स्वभाव वाले प्राणा- याम, धारणा, ध्यान आदि स्थूल उपाय हैं। इस दशा में योगी ने इन स्थूल उपायों का उल्लंघन किया होता है। शुद्ध अन्तःकरण से वह सूक्ष्मतर मध्य-पथ के द्वारा पर प्रमाता के अन्तर्विमर्श चमत्कार का आस्वादन करता है। इस अविकल्प दशा में शरीर, प्राण आदि प्रमातृता (अहंरूपता या अभिमानरूपता) गल जाती है। विज्ञानभैरव तन्त्र में महादेव भगवती पार्वती को इस तुर्यदशा की प्राप्ति के विषय में इस प्रकार कहते हैं : मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टयम् । यदा प्रिये परिक्षीणं तदा तद्भैरवं वपुः ॥ अर्थ—हे प्रिय पार्वती ! जिस अवस्था में (योगी के) मन, बुद्धि, प्राणापान शक्ति और जीवात्मभाव (परिमित प्रमाता) नष्ट होते हैं अर्थात् चित्त की चमत्कार दशा को प्राप्त होते हैं उसी दशा में (उस योगी का) भैरवस्वरूप अर्थात् शिव-सायुज्य होता है। श्रुति में भी : यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टते तमाहुः परमां गतिम् ॥ अर्थ—जब (योगी की) ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन आत्मा में विश्रान्ति पाते हैं और बुद्धि किसी प्रकार से विचलित नहीं होती है, उस (तुर्य) अवस्था को परमगति कहते हैं। इस तुर्य अवस्था का वर्णन ज्ञानगर्भ स्तोत्र में बड़ी सुन्दरता से किया गया है : विहाय सकलाः क्रिया जननि ! मानसीः सर्वतो विमुक्तकरणक्रियानुसृतिपारतन्त्र्योज्वलम् । स्थितैस्त्वदनुभावतः सपदि वेद्यते सा परा दशा नृभिरतन्द्रितासमसुखामृतस्यन्दिनी ॥ अर्थ—हे माता (संविद्देवी) ! विकल्प, स्मृति आदि सब प्रकार की क्रिया को सब ओर से त्याग कर और परतन्त्र साधनों (ऊर्ध्वरेचक आदि मुद्राबन्धनों) द्वारा विकास से मुक्त हो, योगी-जन शाम्भवोपाय के समावेश से सदा सावधान (अतन्द्रित) अनुपम सुखरूप अमृत-प्रवाह वाली वह अनुत्तर (परा) दशा आप के ही अनुग्रह-वाञ्छा से, तत्क्षण अनुभव करते हैं ॥२१॥

तृतीय विकास : ४३ सम्बन्ध—इस प्रकार परमपद में प्रवेश किये हुए योगी के, अवस्थाओं में, अभ्यास का वर्णन किया । यह उसकी विश्वोत्तीर्ण अवस्था का अनुभव है । अब योगी की विश्व- मय अवस्था का अनुभव बताने के लिए व्युत्थान दशा में उसकी इन अवस्थाओं का निर्णय करते हैं अर्थात् प्रवेशदशा का वर्णन करके अब प्रसरदशा का वर्णन करते हैं । इन दोनों दशाओं में वह स्वरूपलाभनिष्ठ ही रहता है । प्राणसमाचारे समदर्शनम् ॥२२॥ प्राणसमाचारे—(प्राण + सम + आ + चारे) प्राण—प्राण के सम—बराबर (समरूप से) आ—धीरे-धीरे चारे—बहिः प्रसर करते हुए समदर्शनम्—चिदानन्दघनरूपता से एकता का अनुभव होता है । व्याख्या—तुर्यरस से योगी का प्राण परमेश्वर के शक्तिस्फार की सुगन्धि से युक्त होता है । उसकी सब वासना-ग्रन्थियों का भेदन हुआ होता है । इस कुम्भक-भाव से जब प्राण धीरे-धीरे और समता में बहिःप्रसर करने लगता है तो उस समय भी वह उस सुगन्धि से आनन्द का अनुभव करता है । इस प्रकार वह व्यवहार करते हुए भी सभी अवस्थाओं में चिदानन्दघनरूप होता है । व्यवहार में भी उसे अभेद दृष्टि का आनन्द रहता है । इसी को निर्व्युत्थान समाधि का साक्षात्कार कहते हैं क्योंकि तुर्य दशा से निकलकर उसे निमेष में प्राण-रोध (समाधि) और उन्मेष में प्राण-प्रवाह (व्युत्थान) रहता है । इसे तुर्यातीत-पद कहते हैं ॥२२॥ सम्बन्ध—परन्तु जब योगी मन्दप्राय होने के कारण इस तुर्यातीतपद में प्रवेश नहीं कर सकता तब वह तुर्य चमत्कार से जाग्रत् में और फिर जाग्रत् से तुर्यचमत्कार के अनुभव में ही सन्तुष्ट रहता है । अब आगे के सूत्र में यह कहते हैं । मध्येऽवरप्रसवः ॥२३॥ मध्ये—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की मध्य अवस्थाओं में अवरः—कुत्सित (अश्रेष्ठ-भेदप्रथामय) प्रसवः—प्रसर-रूप प्रवेश (या स्वरूपलाभ) होता है । व्याख्या—मन्द प्राय योगी जो केवल अन्तर्मुख भाव में तुर्य का आस्वाद ले सकता है और तुर्य दशा से निकल कर निमेष के प्राण-रोध और उन्मेष के प्राण-प्रवाह में चिदानन्द की एकरूपता का अनुभव नहीं कर सकता है वह जाग्रत् स्वप्न या सुषुप्ति की मध्य अवस्था में भेदप्रथायुक्त प्रवेश का ही अनुभव करता है । अर्थात् ऐसे योगी को

४४ : शिवसूत्र विमर्श जाग्रत् और सुषुप्ति, जाग्रत् और स्वप्न तथा स्वप्न और सुषुप्ति की सन्धियों में ही (आदि और अन्त कोटियों पर) स्वरूपलाभ होता है। केवल जाग्रत्, केवल स्वप्न अथवा केवल सुषुप्ति में उसे स्वरूपलाभ का अनुभव नहीं रहता है। उसे अनित्य दिव्य भोगों का प्रलोभन विघ्नों में डाल सकता है। परन्तु वह सदा मोह में नहीं रहता। उसे तुर्यावस्था के अनुभव में रुकावट नहीं होती अर्थात् वह सदैव मोह में नहीं पड़ता है क्योंकि उसे तुर्य-चमत्कार की सुगन्ध साथ रहती है। श्री मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में कहा है : वासनामात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ।। तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया । अर्थ—तुर्य चमत्कार का सुगन्धि-लाभ होने पर भी योगी प्रमाद में पड़ता है। उसे विघ्न-कृत विनायक (सिद्ध) अनित्य भोगों का प्रलोभन देते हैं। अतः सर्वोत्तम पद (तुर्यातीत-पद) की इच्छा वाले योगी को उनमें आसक्त नहीं होना चाहिये । अतः ऐसे योगी को इन प्रलोभनों में नहीं फंसना चाहिये ।।२३।। सम्बन्ध—इसी प्रसंग में कहते हैं कि यदि योगी तुर्यरस (के आश्रय) से व्युत्थान- दशा में भी मध्यपद को सिंचन कर सके, तब मात्रास्वप्रत्ययसन्धाने नष्टस्य पुनरुत्थानम् ॥२४॥ मात्रा—दृष्ट घटपटादि पदार्थरूप प्रमेय संसार में (साथ ही) स्वप्रत्ययसन्धाने—स्वचित्तभाव (स्वात्मानुसन्धान) के अभ्यास पर नष्टस्य—(योगी का) अवर प्रसर नष्ट होने से पुनः—फिर से उसे उत्थानम्—स्वरूप का उदय होता है । व्याख्या--विश्व पदार्थ जब पाँच प्रकार के विषयों में परिमित होते हैं तब इन्हें मात्रा कहते हैं। यह रूपादि विषय हैं जिस प्रकार घटपटादि पदार्थ । यह सब प्रमेय संसार है । जिस योगी के विषय में ऊपर २३वें सूत्र में वर्णन है ऐसा योगी जब जाग्रत्, स्वप्न या सुषुप्ति की मध्य अवस्था के अवर प्रसर अर्थात् भेदप्रथायुक्त प्रवेश से निकल कर साथ ही आत्मानुसन्धान में लगा रहता है उसे प्रलोभन नहीं सताते । अभ्यास में लगे रहने के कारण उसका पूर्व अवर प्रसर नष्ट होने लगता है । उसे तुर्यचमत्कार की सुगन्धि साथ रहती है। अतः वह कुत्सित संसार में सुख से नहीं ठहर सकता है । वह विश्व पदार्थों में 'इदमहम्-यह मैं हूँ' का अनुभव करता है। उसकी भावना 'सर्वमिदमहं च ब्रह्मैव' इस श्रुति उक्ति के अनुसार दृढ़ होने लगती है। इस तरह

तृतीय विकास : ४५ उसे स्वरूप का उदय फिर होता है और वह आत्मा की चिद्घनरूपता का अनुसन्धान करता है । इस विषय में प्रातः स्मरणीय श्री लक्ष्मण जी महाराज से भगवान् उत्पल के विषय में एक आख्यायिका सुनने को मिली है, वह यहाँ प्रस्तुत है : ''उत्पलदेव अपनी आयु के उत्तरार्ध में स्वचित्तभाव के अभ्यास में निरन्तर लगे रहते थे । वे प्रायः चित्स्वरूपता के अनुभव में निमग्न रहते थे । एक बार वे इसी अवस्था में किसी एक स्थान पर बैठे थे जहाँ बादाम के शगूफे खिले थे और शगूफों की पंखुड़ियां पृथ्वी पर इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं । किसी कारण इनकी समाधि खुल गई । इस व्युत्थान दशा में जब आँखें खुलीं तो सामने शगूफों की पंखुड़ियां बिखरी हुई देखीं । इन्हें देखते ही वे सहसा बोल उठे—'आह ! भक्तजनों ने भगवान पर पुष्प चढ़ाये हैं, केवल मैं ही पीछे रह गया हूँ'—इस पर भावविभोर होकर वे फिर समाधि में लीन हो गए ।'' इस प्रकार भगवान् उत्पल इस प्रसंग में चिद्घनरूपता के अनुसन्धान में गए । यही 'इदमहम्' भाव की स्थिति है जो भगवान् उत्पल को प्राप्त थी । ऐसी दशा में अवर प्रसर होना सम्भव नहीं, न ही मितसिद्धियों की ओर झुकने की सम्भा- वना है । इस दशा में प्रमेय संसार में आते ही योगी को साथ ही स्वरूप का उदय फिर होता है । उस का मन तुर्य चमत्कार की सुगन्धि से सुवासित होकर सदैव स्वरूप में ही समाहित रहता है । सदा योगनिष्ठ रहने के कारण वह कभी प्रमाद के वश नहीं होता । श्री स्वच्छन्द शास्त्र में कहा है : यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ अर्थ—जिस योगी को परतत्त्वभाव में सब प्रकार से और पूर्णरूप से स्थिरता प्राप्त होती है उसका मन सब अवस्थाओं (समाधि और व्युत्थान) में चलायमान नहीं होता । इसके लिए वहीं युक्ति भी कही है : यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् । चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ अर्थ—ऐसे महायोगी का मन ही परतत्त्व की ऐक्य-भावना से वासित रहता है । अतः जिस ओर भी उसका मन जाता है वहाँ वह अपने ज्ञेय अर्थात् तुर्यातीत पद का ही सब ओर से चिन्तन करता है (क्योंकि उसका यह निश्चय दृढ़ हुआ होता है कि सब कुछ शिवमय ही है ।) योगी की इस युक्ति को और भी स्पष्ट करने के अर्थ से कहा है : विषयेषु च सर्वेषु इन्द्रियार्थेषु च स्थितः । यत्र तत्र निरूप्येत नाशिवं विद्यते क्वचित् ॥ अर्थ—साधारण विषयों में भी, जहाँ पदार्थ इन्द्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते

४६ : शिवसूत्र विमर्श हैं, ठहरा हुआ (तुर्य चमत्कार को सुगन्धियुक्त) उत्तम योगी जहाँ कहीं इनमें विचार अर्थात् खोज करता है, तो किसी सूरत में भी उसका अकल्याण नहीं होता है। वह पर-प्रकाश की आनन्दघनता में शिव के साथ एकता को प्राप्त हुआ होता है ॥२४॥ सम्बन्ध—तुर्य चमत्कार की सुगन्धि से भली-भाँति युक्त योगी की दशा का वर्णन करते हैं— शिवतुल्यो जायते ॥२५॥ शिवतुल्यः—(ऐसा योगी) शिव के साथ एकता को जायते—प्राप्त होता है। व्याख्या—अभ्यास-घनता के कारण जब तुर्य-चमत्कार की सुगन्ध अधिकाधिक आने लगती है तो योगी तुर्यातीत-पद में स्थिर होने लगता है। वह परिपूर्ण स्वच्छन्द चिदा- नन्दघन भगवान् शिव के तुल्य होता है। जब तक उसकी देह-कला किञ्चित्-मात्र भी रहती है तब तक वह शिव के समान होता है। इसे सारूप्य मुक्ति कहते हैं। देह-कला (अर्थात् देहवासना) के भी गल जाने पर योगी शिव के साथ ऐक्य को प्राप्त करता है अर्थात् वह साक्षात् शिव ही होता है। इसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं। इस बात को श्रीकालिकाक्रम में स्पष्ट किया गया है : तस्मान्नित्यमसंदिग्धं बुद्ध्वा योगं गुरोर्मुखात्। अविकल्पेन भावेन भावयेत्तन्मयत्वतः॥ यावत्तत्समतां याति, भगवान्भैरवोऽब्रवीत्। अर्थ—अतः श्रीगुरुमुख से इस अलौकिक योग का श्रवण कर उस पर मनन और निदिध्यासन करने से शंकारहित होकर योगी को अविकल्प विमर्श का आश्रय लेकर शिव- मय भावना से तुर्यातीत पद का तब तक अभ्यास करना चाहिए जब तक शिव के साथ समता न हो जाए। यह बात स्वयं भगवान् भैरव ने कही है अर्थात् यह अटल निश्चय है ॥२५॥ सम्बन्ध—परन्तु इस योगी की देह में तो स्थिति होती ही है। यह त्यागने योग्य नहीं है क्योंकि जिन कर्मों से यह जाति, आयु और भोगरूप शरीर बना है उन का भोग द्वारा पूरा करने से ही प्रारब्ध की शुद्धि होती है, जैसे श्रुति कहती है : ‘प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः’ अर्थ—शरीर तो प्रारब्ध कर्मों के अनुरूप ही बना होता है। अतः इन कर्मों का क्षय (समाप्ति) शरीर द्वारा इनके भोगने से ही होता है। अतः देहनिर्वाहपर्यन्त—जब तक जाति, आयु और भोगरूप प्रारब्ध कर्मों की परि- समाप्ति न हो इस संसिद्ध योगी की देह में स्थिति कैसे होती है यह बताते हैं :

तृतीय विकास : ४७ शरीरवृत्तिर्व्रतम् ॥२६॥ शरीरवृत्तिः--(शिवोऽहं-मैं शिव हूँ, इस भावना में ठहरे इस योगी की) शरीर में स्थिति व्रतम्--जीवन के साधारण नियम के अनुसार ही होती है। व्याख्या—अब इस संसिद्धयोगी का आत्मसंयम प्रारब्ध के अनुसार साधारण जीवन के प्रवाह के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है। शिवोऽहं भावना में अभ्यास-घनता के कारण स्थिर होने से इस योगी को देह-वासना का सम्बन्ध छूटा होता है। केवल प्रारब्ध की परिसमाप्ति तक उसे देह में ठहरना पड़ता है। देह, प्राण आदि में ठहरते हुए भी उसे शिव-समावेश बना रहता है। इस का प्रमाण श्री स्वच्छन्द शास्त्र में मिलता है : सुप्रदीप्ते यथा वह्नौ शिखा दृश्येत चाम्बरे । देहप्राणस्थितोऽप्यात्मा तद्वल्लीयेत तत्पदे ॥ अर्थ—जिस प्रकार (काष्ठादि ढेर में लगी) अग्नि की शिखा आकाश में लीन होती देखी जाती है, उसी प्रकार देह, प्राणादि में ठहरी हुई संसिद्धयोगी की आत्मा तत्पद अर्थात् शिवस्वरूप में लीन होती है। अरणिमन्थन की युक्ति से अग्नि के प्रज्वलित होने पर जैसे उसकी ज्वाला-दाह्य- वस्तु को जलाकर आकाश में दिखाई देती है और वहाँ लीन होकर तदात्मभाव को प्राप्त होती है वैसे ही दिव्यकरण और मन्त्ररूप अरणि के उत्तेजित होने से योगी के देह में प्राण प्रदीप्त होकर मध्यनाडी में ऊर्ध्ववाही होकर उदान-वह्नि में प्रज्वलित होता है। इस योगी की आत्मा जो देह में ठहरी हुई है, केवल शुद्धविज्ञानरूप अग्नि के समान समना के अन्त तक देहरूप लकड़ी को जलाकर तुर्यातीत पद में लीन होती है अर्थात् उपाधिरहित परमशिव के साथ एक होती है। अतः योगी के देह में स्थिति प्रारब्ध कर्मानुसार ही रहती है। उसके लिए साधा- रण कर्म करने के अतिरिक्त और कोई व्रत नहीं होता है। वह केवल अविकारी होकर विकारी सा प्रतीत होता है। विवेक-चूड़ामणि में भगवान् आद्य शङ्कराचार्य कहते हैं : उपाधिसम्बन्धवशात्परात्मा ह्यु पाधिधर्माननुभाति तद्गुणः अयोविकारानविकारि वह्निव- त्सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥१९३॥ अर्थ—वह परात्मा स्वरूप से सदा एक रूप ही है तथापि उपाधि के सम्बन्ध से उसके गुणों से युक्त-सा होकर उसो के धर्मों को प्रकाशित करता है जिस प्रकार कि लोहे के विकारों में व्याप्त हुई अविकारी अग्नि विकारी सी प्रतीत होती है।

४८ : शिवसूत्र विमर्श यही बात श्रीत्रिकसार में इस प्रकार वर्णित है : देहोत्थिताभिर्मुद्राभिर्यः सदा मुद्रितो बुधः । स तु मुद्राधरः प्रोक्तः शेषा वै अस्थिधारकाः ॥ अर्थ—शरीर-कला की साधारण क्रियाओं में वह बुद्धिकौशलयुक्त योगी सदा 'अन्त- र्लक्ष्यबहिर्दृष्टि' इस प्रकार शाम्भवी मुद्रा से मुद्रित होता है। उसी को मुद्राधर अर्थात् शिव कहा है। शेष तो सब प्राणी हड्डियों के पिञ्जर को ही धारणं करते हैं। इस संसिद्धयोगी के आत्मज्ञान का फल आचार्य शङ्कर विवेकचूडामणि में इस प्रकार कहते हैं : संसिद्धस्य फलं त्वेतज्जीवन्मुक्तस्य योगिनः । बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥४१९॥ अर्थ—आत्मज्ञान में सम्यक् सिद्धि प्राप्त किए हुए जीवन्मुक्त योगी को यही फल मिलता है कि अपने आत्मा के नित्यानन्दरस का बाहर-भीतर निरन्तर आस्वादन किया करें। इस प्रकार बाहर-भीतर नित्यानन्दरस का निरन्तर आस्वादन करना ही परा- भक्ति है अर्थात् शिव-भक्ति के अमृत से पूर्ण शरीर में जो भी योगी की स्थिति होती है वही उसका व्रत है। इस स्थिति की पुष्टि के लिए भगवान् उत्पलदेव शिस्तोत्रावली में भगवान् शिव से यह अलौकिक प्रार्थना करते हैं : अन्तरुल्लसदच्छाच्छभक्तिपीयूषपोषितम् । भवत्पूजोपयोगाय शरीरमिदमस्तु मे ॥१७-२६॥ अर्थ—हे शङ्कर ! भीतर संवित् पद में मग्न हुए अत्यन्त निर्मल भक्तिपीयूष अर्थात् समावेश-अमृत से पाला-पोसा गया यह मेरा शरीर आप की पूजा के काम आ जाये अर्थात् आप चिदानन्दघन में ही विलीन हो जाय। स्वरूप-विमर्श रूप ज्ञान और परा-भक्ति पर्यायवाची हैं क्योंकि ये एक दूसरे पर आश्रित हैं। पराभक्ति स्वरूप भगवान् उत्पलदेव अलौकिक भक्तिरसपूर्ण शिवस्तोत्रावली में कहते हैं : यद्यथास्थितपदार्थदर्शनं युष्मदर्चनमहोत्सवश्च यः । युग्ममेतदितरेतराश्रयं भक्तिशालिषु सदा विजृम्भते ॥१३-७॥ अर्थ—(ज्ञान काल में) सभी सांसारिक वस्तुओं को आप चिद्रूप से अभिन्न देखना और (ध्यान, दर्शन और स्पर्शन-भक्तिकाल में) आप की पूजा का उत्सव, यह दोनों बातें एक दूसरे पर आश्रित रहती हैं। आप के अनन्य भक्तों में इन दोनों बातों का (क्रम- मुद्रा से) सदा विकास रहता है।