श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अयोध्याकाण्ड *
५६३
सुनि अति बिकल भरत बर बानी । आरति प्रीति विनय नय सानी ॥ सोक मगन सब सभों खभारू । मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू ॥
अत्यन्त व्याकुल तथा दुःख, प्रेम, विनय और नीतिमें सनी हुई भरतजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोकमें मग्न हो गये, सारी सभामें विषाद छा गया। मानो कमलके वनपर पाला पड़ गया हो ॥ १ ॥
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी । भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी ॥ बोले उचित बचन रघुनंदू । दिनकर कुल कैरव बन चंदू ॥
तब ज्ञानी मुनि वसिष्ठजीने अनेक प्रकारकी पुरानी (ऐतिहासिक) कथाएँ कहकर भरतजीका समाधान किया। फिर सूर्यकुलरूपी कुमुदवनके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा श्रीरघुनन्दन उचित वचन बोले— ॥ २ ॥
तात जायँ जियँ करहु गलानी । ईस अधीन जीव गति जानी ॥ तीनि काल तिभुअन मत मोरें । पुन्यसिलोक तात तर तोरें ॥
हे तात! तुम अपने हृदयमें व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीवकी गतिको ईश्वरके अधीन जानो। मेरे मतमें [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों और [स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल] तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं ॥ ३ ॥
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोकु परलोकु नसाई ॥ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई । जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ॥
हृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक (यहाँके सुख, यश आदि) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है (मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती)। माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका सेवन नहीं किया है ॥ ४ ॥
दो०—मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार ।
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार ॥ २६३ ॥
हे भरत! तुम्हारा नाम-स्मरण करते ही सब पाप, प्रपञ्च (अज्ञान) और समस्त अमङ्गलोंके समूह मिट जायेंगे तथा इस लोकमें सुन्दर यश और परलोकमें सुख प्राप्त होगा ॥ २६३ ॥
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी । भरत भूमि रह राउरि राखी ॥ तात कुतरक करहु जनि जाएँ । बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ ॥
हे भरत! मैं स्वभावसे ही सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है। हे तात! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। बैर और प्रेम छिपाये नहीं छिपते ॥ १ ॥
५६४
- रामचरितमानस *
मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥ हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥
पक्षी और पशु मुनियोंके पास [बेधङ्क] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकाँको देखते ही भाग जाते हैं। मित्र और शत्रुको पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्यशरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है ॥ २ ॥
तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें । करौं काह असमंजस जीकें ॥ राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी । तनु परिहरेउ पेम पन लागी ॥
हे तात! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ! क्या करूँ? जीमें बड़ा असमञ्जस (दुविधा) है। राजाने मुझे त्यागकर सत्यको रखा और प्रेम-प्रणके लिये शरीर छोड़ दिया ॥ ३ ॥
तासु बचन मेटत मन सोचू । तेहि तें अधिक तुम्हार संकोचू ॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा । अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥
उनके वचनको मेटते मनमें सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उसपर भी गुरुजीने मुझे आज्ञा दी है। इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
दो०—मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु ।
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु ॥ २६४ ॥
तुम मनको प्रसन्न कर और संकोचको त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ। सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया ॥ २६४ ॥
सुर गन सहित सभय सुरराजू । सोचहिं चाहत होन अकाजू ॥ बनत उपाउ करत कछु नाहीं । राम सरन सब गे मन माहीं ॥
देवगणोंसहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब वे सब मन-ही-मन श्रीरामजीकी शरण गये ॥ १ ॥
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं । रघुपति भगत भगति बस अहहीं ॥ सुधि करि अंबरीष दुरबासा । भे सुर सुरपति निपट निरासा ॥
फिर वे विचार करके आपसमें कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्तकी भक्तिके वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासाकी [घटना] याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये ॥ २ ॥
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा । नरहरि किए प्रगट प्रहलादा ॥ लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा । अब सुर काज भरत के हाथा ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५६५
पहले देवताओंने बहुत समयतक दुःख सहे। तब भक्त प्रह्लादने ही नृसिंहभगवान्को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानोंसे लग-लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब (इस बार) देवताओंका काम भरतजीके हाथ है ॥ ३ ॥
आन उपाउ न देखिअ देवा । मानत रामु सुसेवक सेवा ॥ हिर्यं सपेम सुमिरहु सब भरतहि । निज गुन सील राम बस करतहि ॥
हे देवताओ! और कोई उपाय नहीं दिखायी देता। श्रीरामजी अपने श्रेष्ठ सेवकोंकी सेवाको मानते हैं (अर्थात् उनके भक्तकी कोई सेवा करता है तो उसपर बहुत प्रसन्न होते हैं)। अतएव अपने गुण और शीलसे श्रीरामजीको वशमें करनेवाले भरतजीका ही सब लोग अपने-अपने हृदयमें प्रेमसहित स्मरण करो ॥ ४ ॥
दो०—सुनि सुरमत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु । सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु ॥ २६५ ॥
देवताओंका मत सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े भाग्य हैं। भरतजीके चरणोंका प्रेम जगत्में समस्त शुभ मङ्गलोंका मूल है ॥ २६५ ॥
सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सय सरिस सुहाई ॥ भरत भगति तुम्हरे मन आई । तजहु सोचु बिधि बात बनाई ॥
सीतानाथ श्रीरामजीके सेवककी सेवा सैकड़ों कामधेनुओंके समान सुन्दर है। तुम्हारे मनमें भरतजीकी भक्ति आयी है, तो अब सोच छोड़ दो। विधাতाने बात बना दी ॥ १ ॥
देखु देवपति भरत प्रभाऊ । सहज सुभार्यं बिबस रघुराऊ ॥ मन थिर करहु देव डरु नाहीं । भरतहि जानि राम परिछाहीं ॥
हे देवराज! भरतजीका प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभावसे ही उनके पूर्णरूपसे वशमें हैं। हे देवताओ! भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीकी परछाई (परछाईकी भाँति उनका अनुसरण करनेवाला) जानकर मन स्थिर करो, डरकी बात नहीं है ॥ २ ॥
सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू । अंतरजामी प्रभुहि सकोचू ॥ निज सिर भारु भरत जियँ जाना । करत कोटि बिधि उर अनुमाना ॥
देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओंकी सम्मति (आपसका विचार) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजीको संकोच हुआ। भरतजीने अपने मनमें सब बौद्धा अपने ही सिर जाना और वे हृदयमें करोड़ों (अनेकों) प्रकारके अनुमान (विचार) करने लगे ॥ ३ ॥
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका । राम रजायस आपन नीका ॥ निज पन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ॥
५६६
- रामचरितमानस *
सब तरहसे विचार करके अन्तमें उन्होंने मनमें यही निश्चय किया कि श्रीरामजीकी आज्ञामें ही अपना कल्याण है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा। यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया (अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया) ॥ ४ ॥
दो०—कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ ॥ २६६ ॥
श्रीजानकीनाथजीने सब प्रकारसे मुझपर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया। तदनन्तर भरतजी दोनों कर-कमलोंको जोड़कर प्रणाम करके बोले— ॥ २६६ ॥
कहाँ कहावों का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ॥
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कल्पित सूला ॥
हे स्वामी! हे कृपाके समुद्र! हे अन्तर््यामी! अब मैं [अधिक] क्या कहूँ और क्या कहाऊँ? गुरु महाराजको प्रसन्न और स्वामीको अनुकूल जानकर मेरे मलिन मनकी कल्पित पीड़ा मिट गयी ॥ १ ॥
अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें ॥
मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई ॥
मैं मिथ्या डरसे ही डर गया था। मेरे सोचकी जड़ ही न थी। दिशा भूल जानेपर हे देव! सूर्यका दोष नहीं है। मेरा दुर्भाग्य, माताकी कुटिलता, विधाताकी टेढ़ी चाल और कालकी कठिनता, ॥ २ ॥
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला ॥
यह नड़ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई ॥
इन सबने मिलकर पैर रोपकर (प्रण करके) मुझे नष्ट कर दिया था। परन्तु शरणागतके रक्षक आपने अपना [शरणागतकी रक्षाका] प्रण निबाहा (मुझे बचा लिया)। यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है। यह लोक और वेदोंमें प्रकट है, छिपी नहीं है ॥ ३ ॥
जगु अनभल भल एकु गोसाई। कहिअ होइ भल कासु भलाई ॥
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ ॥
सारा जगत् बुरा [करनेवाला] हो; किन्तु हे स्वामी! केवल एक आप ही भले (अनुकूल) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाईसे भला हो सकता है? हे देव! आपका स्वभाव कल्पवृक्षके समान है; वह न कभी किसीके सम्मुख (अनुकूल) है, न विमुख (प्रतिकूल) ॥ ४ ॥
दो०—जाड़ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच ॥ २६७ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५६७
उस वृक्ष (कल्पवृक्ष) को पहचानकर जो उसके पास जाय, तो उसकी छाया ही सारी चिन्ताओंका नाश करनेवाली है। राजा-रंक, भले-बुरे, जगत्में सभी उससे माँगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं ॥ २६७ ॥
लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ॥ अब करुनाकर कीजिअ सोई । जन हित प्रभु चित छोभु न होई ॥
गुरु और स्वामीका सब प्रकारसे स्नेह देखकर मेरा शोभ मिट गया, मनमें कुछ भी सन्देह नहीं रहा। हे दयाकी खान! अब वही कीजिये जिससे दासके लिये प्रभुके चितमें शोभ (किसी प्रकारका विचार) न हो ॥ १ ॥
जो सेवकु साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची ॥ सेवक हित साहिब सेवकाई । करै सकल सुख लोभ बिहाई ॥
जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे ॥ २ ॥
स्वारथु नाथ फिरें सबही का । किऐँ रजाइ कोटि बिधि नीका ॥ यह स्वारथ परमारथ सारु । सकल सुकृत फल सुगति सिंगाारु ॥
हे नाथ! आपके लौटनेमें सभीका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करनेमें करोड़ों प्रकारसे कल्याण है। यही स्वार्थ और परमार्थका सार (निचोड़) है, समस्त पुण्योंका फल और सम्पूर्ण शुभ गतियोंका श्रृङ्गार है ॥ ३ ॥
देव एक बिनती सुनि मोरी । उचित होइ तस करब बहोरी ॥ तिलक समाजु साजि सबु आना । करिअ सुफल प्रभु जौँ मनु माना ॥
हे देव! आप मेरी एक बिनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये। राजतिलककी सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, जो प्रभुका मन माने तो उसे सफल कीजिये (उसका उपयोग कीजिये) ॥ ४ ॥
दो०—सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ ।
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौँ मैं साथ ॥ २६८ ॥
छोटे भाई शत्रुघ्नसमेत मुझे बनमें भेज दीजिये और [अयोध्या लौटकर] सबको सनाथ कीजिये। नहीं तो किसी तरह भी (यदि आप अयोध्या जानेको तैयार न हों) हे नाथ! लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको लौटा दीजिये और मैं आपके साथ चलूँ ॥ २६८ ॥
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई । बहुरिअ सीय सहित रघुराई ॥ जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई । करुना सागर कीजिअ सोई ॥
५६८
- रामचरितमानस *
अथवा हम तीनों भाई बन चले जायें और हे श्रीरघुनाथजी! आप श्रीसीताजीसहित [अयोध्याको] लौट जाइये। हे दयासागर! जिस प्रकारसे प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिये ॥ १ ॥
देवें दीन्ह सबु मोहि अभारू । मोरें नीति न धरम बिचारू ॥ कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू । रहत न आरत कें चित् चेतू ॥
हे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी) मुझपर रख दिया। पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका। मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त (दुखी) मनुष्यके चित्तमें चेत (विवेक) नहीं रहता ॥ २ ॥
उतरु देइ सुनि स्वामि रजार्ई । सो सेवकु लखि लाज लजार्ई ॥ अस मैं अवगुन उदधि अगाधू । स्वामि सनेहैं सराहत साधू ॥
स्वामीकी आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह समुद्र हूँ [कि प्रभुको उत्तर दे रहा हूँ]। किन्तु स्वामी (आप) स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं ॥ ३ ॥
अब कृपाल मोहि सो मत भावा । सकुच स्वामि मन जाई न पावा ॥ प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ । जग मंगल हित एक उपाऊ ॥
हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामीका मन संकोच न पावे। प्रभुके चरणोंकी शपथ है, मैं सत्य भावसे कहता हूँ, जगत्के कल्याणके लिये एक यही उपाय है ॥ ४ ॥
दो०—प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब ।
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब ॥ २६९ ॥
प्रसन्न मनसे संकोच त्यागकर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर चढ़ा-चढ़ाकर [पालन] करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायँगी ॥ २६९ ॥
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥ असमंजस बस अवध नेवासी । प्रमुदित मन तापस बनबासी ॥
भरतजीके पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये। अयोध्यानिवासी असमंजसके वश हो गये [कि देखें अब श्रीरामजी क्या कहते हैं]। तपस्वी तथा वनवासी लोग [श्रीरामजीके वनमें बने रहनेकी आशासे] मनमें परम आनन्दित हुए ॥ १ ॥
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची । प्रभु गति देखि सभा सब सोची ॥ जनक दूत तेहि अवसर आए । मुनि बसिष्ठ सुनि बेगि बोलाए ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५६१
किन्तु संकोची श्रीरघुनाथजी चुप ही रह गये। प्रभुकी यह स्थिति (मौन) देख सारी सभा सोचमें पड़ गयी। उसी समय जनकजीके दूत आये, यह सुनकर मुनि वसिष्ठजीने उन्हें तुरंत बुलवा लिया ॥ २ ॥
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे । बेषु देखि भए निपट दुखारे ॥ दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता । कहहु बिदेह भूप कुसलाता ॥
उन्होंने [आकर] प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजीको देखा। उनका [मुनियोंका-सा] वेष देखकर वे बहुत ही दुखी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दूतोंसे बात पूछी कि राजा जनकका कुशल-समाचार कहो ॥ ३ ॥
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा । बोले चरबर जोरें हाथा ॥ बूझब राउर सादर साई । कुसल हेतु सो भयउ गोसाई ॥
यह (मुनिका कुशलप्रश्न) सुनकर सकुचाकर पृथ्वीपर मस्तक नवाकर वे श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर बोले—हे स्वामी! आपका आदरके साथ पूछना, यही हे गोसाई! कुशलका कारण हो गया ॥ ४ ॥
दो०—नाहिं त कोसलनाथ कें साथ कुसल गइ नाथ । मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ ॥ २७० ॥
नहीं तो हे नाथ! कुशल-क्षेम तो सब कोसलनाथ दशरथजीके साथ ही चली गयी। [उनके चले जानेसे] यों तो सारा जगत् ही अनाथ (स्वामीके बिना असहाय) हो गया, किन्तु मिथिला और अवध तो विशेषरूपसे अनाथ हो गये ॥ २७० ॥
कोसलपति गति सुनि जनकौरा । भे सब लोक सोकबस बौरा ॥ जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू । नामु सत्य अस लाग न केहू ॥
अयोध्यानाथकी गति (दशरथजीका मरण) सुनकर जनकपुरवासी सभी लोग शोकवश बावले हो गये (सुध-बुध भूल गये)। उस समय जिन्होंने विदेहको [शोकमग्न] देखा, उनमेंसे किसीको ऐसा न लगा कि उनका विदेह (देहाभिमानरहित) नाम सत्य है! [क्योंकि देहाभिमानसे शून्य पुरुषको शोक कैसा ?] ॥ १ ॥
रानि कुचालि सुनत नरपालहि । सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ॥ भरत राज रघुबर बनबासू । भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू ॥
रानीकी कुचाल सुनकर राजा जनकजीको कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणिके बिना साँपको नहीं सूझता। फिर भरतजीको राज्य और श्रीरामचन्द्रजीको वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ ॥ २ ॥
५७०
- रामचरितमानस *
नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥ समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥
राजाने विद्वानों और मन्त्रियोंके समाजसे पूछा कि विचारकर कहिये, आज (इस समय) क्या करना उचित है? अयोध्याकी दशा समझकर और दोनों प्रकारसे असमंजस जानकर 'चलिये या रहिये?' किसीने कुछ नहीं कहा॥ ३ ॥
नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥ बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥
[जब किसीने कोई सम्मति नहीं दी] तब राजाने धीरज धर हृदयमें विचारकर चार चतुर गुप्तचर (जासूस) अयोध्याको भेजे [और उनसे कह दिया कि] तुमलोग [श्रीरामजीके प्रति] भरतजीके सद्भाव (अच्छे भाव, प्रेम) या दुर्भाव (बुरा भाव, विरोध) का [यथार्थ] पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसीको तुम्हारा पता न लगने पावे॥ ४ ॥
दो०—गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति॥ २७१॥
गुप्तचर अवधको गये और भरतजीका ढंग जानकर और उनकी करनी देखकर, जैसे ही भरतजी चित्रकूटको चले, वे तिरहुत (मिथिला) को चल दिये॥ २७१ ॥
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥ सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥
[गुप्त] दूतोंने आकर राजा जनकजीकी सभामें भरतजीकी करनीका अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, कुटुम्बी, मन्त्री और राजा सभी सोच और स्नेहसे अत्यन्त व्याकुल हो गये॥ १ ॥
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥ घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥
फिर जनकजीने धीरज धरकर और भरतजीकी बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया। घर, नगर और देशमें रक्षकोंको रखकर छोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत-सी सवारियाँ सजवारीं॥ २ ॥
दुधरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला॥ भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥
वे दुधड़िया मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े। राजाने रास्तेमें कहीं विश्राम भी नहीं किया। आज ही सबेरे प्रयागराजमें स्नान करके चले हैं। जब सब लोग यमुनाजी उतरने लगे, ॥ ३ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५७१
खबरि लेन हम पठए नाथा । तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ॥ साथ किरात छ सातक दीन्हे । मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥
तब हे नाथ! हमें खबर लेनेको भेजा। उन्होंने (दूतोंने) ऐसा कहकर पृथ्वीपर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कोई छः-सात भीलोंको साथ देकर दूतोंको तुरंत बिदा कर दिया ॥ ४ ॥
दो०—सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ॥ २७२ ॥
जनकजीका आगमन सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो गया। श्रीरामजीको बड़ा संकोच हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेषरूपसे सोचके वशमें हो गये ॥ २७२ ॥
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई ॥ अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी ॥
कुटिल कैकेयी मन-ही-मन ग्लानि (पश्चात्ताप) से गली जाती है। किससे कहे और किसको दोष दे? और सब नर-नारी मनमें ऐसा विचारकर प्रसन्न हो रहे हैं कि [अच्छा हुआ, जनकजीके आनेसे] चार (कुछ) दिन और रहना हो गया ॥ १ ॥
एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ ॥ करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी ॥
इस तरह वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन प्रातःकाल सब कोई स्नान करने लगे। स्नान करके सब नर-नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्यभगवान्की पूजा करते हैं ॥ २ ॥
रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी ॥ राजा रामु जानकी रानी। आनंद अवधि अवध रजधानी ॥
फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके चरणोंकी वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनन्दकी सीमा होकर— ॥ ३ ॥
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुं जुबराजा ॥ एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू ॥
फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजीको युवराज बनावें। हे देव! इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सब किसीको जगत्में जीनेका लाभ दीजिये ॥ ४ ॥
दो०—गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ ॥ २७३ ॥
५७२
- रामचरितमानस *
गुरु, समाज और भाइयोंसमेत श्रीरामजीका राज्य अवधपुरीमें हो और श्रीरामजीके राजा रहते ही हमलोग अयोध्यामें मरें। सब कोई यही माँगते हैं ॥ २७३ ॥
सुनि सनेहमय पुरजन बानी । निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी ॥ एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन । रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन ॥
अयोध्यावासियोंकी प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्यकी निन्दा करते हैं। अवधवासी इस प्रकार नित्यकर्म करके श्रीरामजीको पुलकितशरीर हो प्रणाम करते हैं ॥ १ ॥
ऊँच नीच मध्यम नर नारी । लहहिं दरसु निज निज अनुहारी ॥ सावधान सबही सनमानहिं । सकल सराहत कृपानिधानहिं ॥
ऊँच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियोंके स्त्री-पुरुष अपने-अपने भावके अनुसार श्रीरामजीका दर्शन प्राप्त करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी सावधानीके साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी सराहना करते हैं ॥ २ ॥
लरिकाइहि तें रघुबर बानी । पालत नीति प्रीति पहिचानी ॥ सील सकोच सिंधु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥
श्रीरामजीकी लड़कपनसे ही यह बान है कि वे प्रेमको पहचानकर नीतिका पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोचके समृद्ध हैं। वे सुन्दर मुखके [या सबके अनुकूल रहनेवाले], सुन्दर नेत्रवाले [या सबको कृपा और प्रेमकी दृष्टिसे देखनेवाले] और सरलस्वभाव हैं ॥ ३ ॥
कहत राम गुन गन अनुरागे । सब निज भाग सराहन लागे ॥ हम सम पुन्य पुंज जग थोरे । जिन्हहि रामु जानत करि मोरे ॥
श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते-कहते सब लोग प्रेममें भर गये और अपने भाग्यकी सराहना करने लगे कि जगत्में हमारे समान पुण्यकी बड़ी पूँजीवाले थोड़े ही हैं; जिन्हें श्रीरामजी अपना करके जानते हैं (ये मेरे हैं ऐसा जानते हैं) ॥ ४ ॥
दो०—प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु ।
सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु ॥ २७४ ॥
उस समय सब लोग प्रेममें मग्न हैं। इतनेमें ही मिथिलापति जनकजीको आते हुए सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजी सभासहित आदरपूर्वक जल्दीसे उठ खड़े हुए ॥ २७४ ॥
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा । आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा ॥ गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं । करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५७३
भाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियोंको साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे (जनकजीकी अगवानीमें) चले। जनकजीने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ कामदनाथको देखा, त्यों ही प्रणाम करके उन्होंने रथ छोड़ दिया (पैदल चलना शुरू कर दिया) ॥ १ ॥
राम दरस लालसा उछाहूँ। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहूँ ॥ मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ॥
श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण किसीको रास्तेकी थकावट और क्लेश जरा भी नहीं है। मन तो वहाँ है जहाँ श्रीराम और जानकीजी हैं। बिना मनके शरीरके सुख-दुःखकी सुध किसको हो ? ॥ २ ॥
आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती ॥ आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे ॥
जनकजी इस प्रकार चले आ रहे हैं। समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेममें मतवाली हो रही है। निकट आये देखकर सब प्रेममें भर गये और आदरपूर्वक आपसमें मिलने लगे ॥ ३ ॥
लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन ॥ भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि ॥
जनकजी [वसिष्ठ आदि अयोध्यावासी] मुनियोंके चरणोंकी वन्दना करने लगे और श्रीरामचन्द्रजीने [शतानन्द आदि जनकपुरवासी] ऋषियोंको प्रणाम किया। फिर भाइयोंसमेत श्रीरामजी राजा जनकजीसे मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रमको लिवा चले ॥ ४ ॥
दो०—आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ॥ २७५ ॥
श्रीरामजीका आश्रम शान्तरसरूपी पवित्र जलसे परिपूर्ण समुद्र है। जनकजीकी सेना (समाज) मानो करुणा (करुणरस) की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [उस आश्रमरूपी शान्तरसके समुद्रमें मिलानेके लिये] लिये जा रहे हैं ॥ २७५ ॥
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे ॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा ॥
यह करुणाकी नदी [इतनी बड़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें (आहें) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरङ्गें हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम वृक्षोंको तोड़ रही हैं ॥ १ ॥
बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा ॥ केवट बुध बिद्या बडि नावा। सकहिं न खेड़ ऐक नहिं आवा ॥
५७४
- रामचरितमानस *
भयानक विषाद (शोक) ही उस नदीकी तेज धारा है। भय और भ्रम (मोह) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं। विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं, (उस विद्याका उपयोग नहीं कर सकते हैं), किसीको उसकी अटकल ही नहीं आती है ॥ २ ॥
बनचर कोल किरात बिचारे । थके बिलोकि पथिक हियँ हारे ॥ आश्रम उदधि मिली जब जाई । मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई ॥
वनमें विचरनेवाले बेचारे कोल-किरात ही यात्री हैं, जो उस नदीको देखकर हृदयमें हारकर थक गये हैं। यह करुणा-नदी जब आश्रम-समुद्रमें जाकर मिली, तो मानो वह समुद्र अकुला उठा (खौल उठा) ॥ ३ ॥
सोक बिकल दोउ राज समाजा । रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा ॥ भूप रूप गुन सील सराही । रोवहिँ सोक सिंधु अवगाही ॥
दोनों राजसमाज शोकसे व्याकुल हो गये। किसीको न ज्ञान रहा, न धीरज और न लाज ही रही। राजा दशरथजीके रूप, गुण और शीलकी सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और शोकसमुद्रमें डुबकी लगा रहे हैं ॥ ४ ॥
छं०—अवगाहि सोक समुद्र सोचहिँ नारि नर व्याकुल महा । दै दोष सकल सरोष बोलहिँ बाम बिधि कीन्हो कहा ॥ सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की । तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की ॥
शोकसमुद्रमें डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री-पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच (चिन्ता) कर रहे हैं। वे सब विधाताको दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाताने यह क्या किया? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनिगणोंमें कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह (जनकराज) की दशा देखकर प्रेमकी नदीको पार कर सके (प्रेममें मग्न हुए बिना रह सके)।
सो०—किए अमित उपदेस जहाँ तहाँ लोगन्ह मुनिबरन्ह । धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन ॥ २७६ ॥
जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ मुनियोंने लोगोंको अपरिमित उपदेश दिये और बसिष्ठजीने विदेह (जनकजी) से कहा—हे राजन्! आप धैर्य धारण कीजिये ॥ २७६ ॥
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥ तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बड़ाई ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५७५
जिन राजा जनकका ज्ञानरूपी सूर्य भव (आवागमन) रूपी रात्रिका नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलोंको खिला देती हैं (आनन्दित करती हैं), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं? यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है! [अर्थात् राजा जनककी यह दशा श्रीसीतारामजीके अलौकिक प्रेमके कारण हुई, लौकिक मोह-ममताके कारण नहीं। जो लौकिक मोह-ममताको पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजीका प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता] ॥ १ ॥
बिषई साधक सिद्ध सयाने । त्रिबिध जीव जग वेद बखाने ॥ राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू ॥
विषयी, साधक और ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष—जगत्में ये तीन प्रकारके जीव वेदोंने बताये हैं। इन तीनोंमें जिसका चित्त श्रीरामजीके स्नेहसे सरस (सराबोर) रहता है, साधुओंकी सभामें उसीका बड़ा आदर होता है ॥ २ ॥
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू । करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥ मुनि बहुबिधि बिदेहे समुझाए । राम घाट सब लोग नहाए ॥
श्रीरामजीके प्रेमके बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधारके बिना जहाज। वसिष्ठजीने विदेहराज (जनकजी) को बहुत प्रकारसे समझाया। तदनन्तर सब लोगोंने श्रीरामजीके घाटपर स्नान किया ॥ ३ ॥
सकल सोक संकुल नर नारी । सो बासरु बीतेउ बिनु बारी ॥ पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारु । प्रिय परिजन कर कौन बिचारु ॥
स्त्री-पुरुष सब शोकसे पूर्ण थे। वह दिन बिना ही जलके बीत गया (भोजनकी बात तो दूर रही, किसीने जलतक नहीं पिया)। पशु, पक्षी और हिरनोंतकने कुछ आहार नहीं किया। तब प्रियजनों एवं कुटुम्बियोंका तो विचार ही क्या किया जाय ? ॥ ४ ॥
दो०—दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात । बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कूस गात ॥ २७७ ॥
निमिराज जनकजी और रघुराज रामचन्द्रजी तथा दोनों ओरके समाजने दूसरे दिन सबेरे स्नान किया और सब बड़के वृक्षके नीचे जा बैठे। सबके मन उदास और शरीर दुबले हैं ॥ २७७ ॥
जे महिसुर दसरथ पुर बासी । जे मिथिलापति नगर निवासी ॥ हंस बंस गुर जनक पुरोधा । जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा ॥
५७६
- रामचरितमानस *
जो दशरथजीकी नगरी अयोध्याके रहनेवाले और जो मिथिलापति जनकजीके नगर जनकपुरके रहनेवाले ब्राह्मण थे, तथा सूर्यवंशके गुरु वसिष्ठजी तथा जनकजीके पुरोहित शतानन्दजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदयका मार्ग तथा परमार्थका मार्ग छान डाला था, ॥ १ ॥
लगे कहन उपदेस अनेका । सहित धरम नय बिरति बिबेका ॥ कौसिक कहि कहि कथा पुरानी । समुझाई सब सभा सुबानी ॥
वे सब धर्म, नीति, वैराग्य तथा विवेकयुक्त अनेकों उपदेश देने लगे। विश्वामित्रजीने पुरानी कथाएँ (इतिहास) कह-कहकर सारी सभाको सुन्दर वाणीसे समझाया ॥ २ ॥
तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ । नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ ॥ मुनि कह उचित कहत रघुराई । गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई ॥
तब श्रीरघुनाथजीने विश्वामित्रजीसे कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिये ही रह गये थे [अब कुछ आहार करना चाहिये]। विश्वामित्रजीने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित ही कह रहे हैं। ढाई पहर दिन [आज भी] बीत गया ॥ ३ ॥
रिषि रुख लिखि कह तेरहुतिराजू । इहाँ उचित नहीं असन अनाजू ॥ कहा भूप भल सबहि सोहाना । पाड़ रजायसु चले नहाना ॥
विश्वामित्रजीका रुख देखकर तिरहुतराज जनकजीने कहा—यहाँ अन्न खाना उचित नहीं है। राजाका सुन्दर कथन सबके मनको अच्छा लगा। सब आज्ञा पाकर नहाने चले ॥ ४ ॥
दो०—तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।
लड़ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार ॥ २७८ ॥
उसी समय अनेकों प्रकारके बहुत-से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहँगियों और बोझोंमें भर-भरकर वनवासी (कोल-किरात) लोग ले आये ॥ २७८ ॥
कामद भे गिरि राम प्रसादा । अवलोकत अपहरत बिषादा ॥ सर सरिता बन भूमि बिभागा । जनु उमगत आनंद अनुरागा ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे सब पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले हो गये। वे देखनेमात्रसे ही दुःखोंको सर्वथा हर लेते थे। वहाँके तालाबों, नदियों, वन और पृथ्वीके सभी भागोंमें मानो आनन्द और प्रेम उमड़ रहा है ॥ १ ॥
बेलि बिटप सब सफल सफूला । बोलत खग मृग अलि अनुकूला ॥ तेहि अवसर बन अधिक उछाहू । त्रिबिध समीर सुखद सब काहू ॥
बेलें और वृक्ष सभी फल और फूलोंसे युक्त हो गये। पक्षी, पशु और भैंरे अनुकूल बोलने लगे। उस अवसरपर वनमें बहुत उत्साह (आनन्द) था, सब किसीको सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चल रही थी ॥ २ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५७७
जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥ तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥ देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥ दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥
वनकी मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजीकी पहुनाई कर रही है। तब जनकपुरवासी सब लोग नहा-नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनिकी आज्ञा पाकर, सुन्दर वृक्षोंको देख-देखकर प्रेममें भरकर जहाँ-तहाँ उतरने लगे। पवित्र, सुन्दर और अमृतके समान [स्वादिष्ट] अनेकों प्रकारके पत्ते, फल, मूल और कन्द—॥ ३-४॥
दो०— सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार॥ २७९॥
श्रीरामजीके गुरु वसिष्ठजीने सबके पास बोझे भर-भरकर आदरपूर्वक भेजे। तब वे पितर-देवता, अतिथि और गुरुकी पूजा करके फलाहार करने लगे॥ २७९॥
एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी॥ दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥
इस प्रकार चार दिन बीत गये। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं। दोनों समाजोंके मनमें ऐसी इच्छा है कि श्रीसीतारामजीके बिना लौटना अच्छा नहीं है॥ १॥
सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥ परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥
श्रीसीतारामजीके साथ वनमें रहना करोड़ों देवलोकोंके [निवासके] समान सुखदायक है। श्रीलक्ष्मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजीको छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे, विधाता उसके विपरीत हैं॥ २॥
दाहिन दड़उ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही॥ मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला॥
जब दैव सबके अनुकूल हो, तभी श्रीरामजीके पास वनमें निवास हो सकता है। मंदाकिनीजीका तीनों समय स्नान और आनन्द तथा मङ्गलोंकी माला (समूह) रूप श्रीरामका दर्शन,॥ ३॥
अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥ सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥
५७८
- रामचरितमानस *
श्रीरामजीके पर्वत (कामदनाथ), वन और तपस्वियोंके स्थानोंमें घूमना और अमृतके समान कन्द, मूल, फलोंका भोजन। चौदह वर्ष सुखके साथ पलके समान हो जायेंगे (बीत जायेंगे), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे॥४॥
दो०—एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥ २८०॥
सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुखके योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहाँ? दोनों समाजोंका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सहज स्वभावसे ही प्रेम है॥ २८०॥
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥ सीय मातु तेहि समय पठाई। दासीं देखि सुअवसरु आई॥
इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही [सुननेवालोंके] मनोंको हर लेते हैं। उसी समय सीताजीकी माता श्रीसुनयनाजीकी भेजी हुई दासियाँ [कौसल्याजी आदिके मिलनेका] सुन्दर अवसर देखकर आयीं॥ १॥
सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू॥ कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी॥
उनसे यह सुनकर कि सीताकी सब सासुएँ इस समय फुरसतमें हैं, जनकराजका रनिवास उनसे मिलने आया। कौसल्याजीने आदरपूर्वक उनका सम्मान किया और समयोचित आसन लाकर दिये॥ २॥
सीलु सनेहु सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥ पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥
दोनों ओर सबके शील और प्रेमको देखकर और सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाते हैं। शरीर पुलकित और शिथिल हैं और नेत्रोंमें [शोक और प्रेमके] आँसू हैं। सब अपने [पैरोंके] नखोंसे जमीन कुरेदने और सोचने लगीं॥ ३॥
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरति। जनु करुना बहु बेष बिस्ूरति॥ सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी॥
सभी श्रीसीतारामजीके प्रेमकी मूर्ति-सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत-से वेष (रूप) धारण करके विस्ूर रही हो (दुःख कर रही हो)। सीताजीकी माता सुनयनाजीने कहा—विधाताकी बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूधके फेन-जैसी कोमल वस्तुको वज्रकी टाँकीसे फोड़ रहा है (अर्थात् जो अत्यन्त कोमल और निर्दोष हैं उनपर विपत्ति-पर-विपत्ति ढहा रहा है)॥ ४॥
- अयोध्याकाण्ड *
५७९
दो०— सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल ।
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ॥ २८१ ॥
अमृत केवल सुननेमें आता है और विष जहाँ-तहाँ प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। विधाताकी सभी करतूतें भयङ्कर हैं। जहाँ-तहाँ कौए, उल्लू और बगुले ही [दिखायी देते] हैं; हंस तो एक मानसरोवरमें ही है ॥ २८१ ॥
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा । बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा ॥
जो सृजि पालइ हरइ बहोरी । बालकेलि सम बिधि मति भोरी ॥
यह सुनकर देवी सुमित्राजी शोकके साथ कहने लगीं—विधाताकी चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टिको उत्पन्न करके पालता है और फिर नष्ट कर डालता है। विधाताकी बुद्धि बालकोंके खेलके समान भोली (विवेकशून्य) है ॥ १ ॥
कौसल्या कह दोसु न काहू । करम बिबस दुख सुख छति लाहू ॥
कठिन करम गति जान बिधाता । जो सुभ असुभ सकल फल दाता ॥
कौसल्याजीने कहा—किसीका दोष नहीं है; दुःख-सुख, हानि-लाभ सब कर्मके अधीन हैं। कर्मकी गति कठिन (दुर्विज्ञेय) है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलोंका देनेवाला है ॥ २ ॥
ईस रजाइ सीस सबही कें । उत्पति स्थिति लय बिषहु अमी कें ॥
देबि मोह बस सोचिअ बादी । बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी ॥
ईश्वरकी आज्ञा सभीके सिरपर है। उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लय (संहार) तथा अमृत और विषके भी सिरपर है (ये सब भी उसीके अधीन हैं)। हे देवि! मोहवश सोच करना व्यर्थ है। विधाताका प्रपञ्च ऐसा ही अचल और अनादि है ॥ ३ ॥
भूपति जिअब मरब उर आनी । सोचिअ सखि लिखि निज हित हानी ॥
सीय मातु कह सत्य सुबानी । सुकृती अवधि अवधपति रानी ॥
महाराजके मरने और जीनेकी बातको हृदयमें याद करके जो चिन्ता करती हैं, वह तो हे सखी! हम अपने ही हितकी हानि देखकर (स्वार्थवश) करती हैं। सीताजीकी माताने कहा—आपका कथन उत्तम और सत्य है। आप पुण्यात्माओंके सीमारूप अवधपति (महाराज दशरथजी) की ही तो रानी हैं। [फिर, भला ऐसा क्यों न कहेंगी] ॥ ४ ॥
दो०—लखनु रामु सिय जाहूँ बन भल परिनाम न पोचु ।
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु ॥ २८२ ॥
५८०
- रामचरितमानस *
कौसल्याजीने दुःखभरे हृदयसे कहा—श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनमें जायँ, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरतकी चिन्ता है ॥ २८२ ॥
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी । सुत सुतबधू देवसरि बारी ॥ राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ । सो करि कहउँ सखी सति भाऊ ॥
ईश्वरके अनुग्रह और आपके आशीर्वादसे मेरे [चारों] पुत्र और [चारों] बहुएँ गङ्गाजीके जलके समान पवित्र हैं। हे सखी! मैंने कभी श्रीरामकी सौगन्ध नहीं की, सो आज श्रीरामकी शपथ करके सत्य भावसे कहती हूँ— ॥ १ ॥
भरत सील गुन बिनय बड़ाई । भायप भगति भरोस भलाई ॥ कहत सारदहु कर मति हीचे । सागर सीप कि जाहिं उलीचे ॥
भरतके शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपनका वर्णन करनेमें सरस्वतीजीकी बुद्धि भी हिचकती है। सीपसे कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं? ॥ २ ॥
जानउँ सदा भरत कुलदीपा । बार बार मोहि कहेउ महीपा ॥ कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ । पुरुष परिखिअहिं समर्यँ सुभाएँ ॥
मैं भरतको सदा कुलका दीपक जानती हूँ। महाराजने भी बार-बार मुझे यही कहा था। सोना कसौटीपर कैसे जानेपर और रत्न पारखी (जौहरी) के मिलनेपर ही पहचाना जाता है। वैसे ही पुरुषकी परीक्षा समय पड़नेपर उसके स्वभावसे ही (उसका चरित्र देखकर) हो जाती है ॥ ३ ॥
अनुचित आजु कहब अस मोरा । सोक सनेहँ सयानप थोरा ॥ सुनि सुरसरि सम पावनि बानी । भई सनेह बिकल सब रानी ॥
किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है। शोक और स्नेहमें सयानापन (विवेक) कम हो जाता है (लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरतकी बड़ाई कर रही हूँ)। कौसल्याजीकी गङ्गाजीके समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेहके मारे विकल हो उठीं ॥ ४ ॥
दो०—कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देवि मिथिलेसि । को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकड़ उपदेसि ॥ २८३ ॥
कौसल्याजीने फिर धीरज धरकर कहा—हे देवि मिथिलेश्वरी! सुनिये, ज्ञानके भण्डार श्रीजनकजीकी प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है? ॥ २८३ ॥
रानि राय सन अवसरु पाई । अपनी भाँति कहब समुझाई ॥ रखिअहिं लखनु भरतु गवनिहिं बन । जौँ यह मत मानै महीप मन ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५८१
हे रानी! मौका पाकर आप राजाको अपनी ओरसे जहाँतक हो सके समझाकर कहियेगा कि लक्ष्मणको घर रख लिया जाय और भरत वनको जायँ। यदि यह राय राजाके मनमें [ठीक] जँच जाय, ॥ १ ॥
तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी ॥ गूढ़ सनेह भरत मन माहीं। रहें नीक मोहि लागत नाहीं ॥
तो भलीभाँति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें। मुझे भरतका अत्यधिक सोच है। भरतके मनमें गूढ़ प्रेम है। उनके घर रहनेमें मुझे भलाई नहीं जान पड़ती (यह डर लगता है कि उनके प्राणोंको कोई भय न हो जाय) ॥ २ ॥
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भड़ मगन करुन रस रानी ॥ नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहें सिद्ध जोगी मुनि ॥
कौसल्याजीका स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणीको सुनकर सब रानियाँ करुणरसमें निमग्न हो गयीं। आकाशसे पुष्पवर्षाकी झड़ी लग गयी और धन्य-धन्यकी ध्वनि होने लगी। सिद्ध, योगी और मुनि स्नेहसे शिथिल हो गये ॥ ३ ॥
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ ॥ देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती ॥
सारा रनिवास देखकर थकित रह गया (निस्तब्ध हो गया), तब सुमित्राजीने धीरज धरके कहा कि हे देवि! दो घड़ी रात बीत गयी है। यह सुनकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं ॥ ४ ॥
दो०— बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहें सतिभाय।
हमरें तौ अब ईस गति कै मिथिलेस सहाय ॥ २८४ ॥
और प्रेमसहित सद्भावसे बोलीं—अब आप शीघ्र डेरको पधारिये। हमारे तो अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर जनकजी सहायक हैं ॥ २८४ ॥
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता ॥ देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरनि राम महतारी ॥
कौसल्याजीके प्रेमको देखकर और उनके विनम्र वचनोंको सुनकर जनकजीकी प्रिय पत्नीने उनके पवित्र चरण पकड़ लिये और कहा—हे देवि! आप राजा दशरथजीकी रानी और श्रीरामजीकी माता हैं। आपकी ऐसी नम्रता उचित ही है ॥ १ ॥
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं ॥ सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी ॥
५८२
- रामचरितमानस *
प्रभु अपने नीच जनोंका भी आदर करते हैं। अग्नि धुएँको और पर्वत तृण (घास) को अपने सिरपर धारण करते हैं। हमारे राजा तो कर्म, मन और वाणीसे आपके सेवक हैं और सदा सहायक तो श्रीमहादेव-पार्वतीजी हैं ॥ २ ॥
रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै॥ रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू॥
आपका सहायक होने योग्य जगत्में कौन है? दीपक सूर्यकी सहायता करने जाकर कहीं शोभा पा सकता है? श्रीरामचन्द्रजी वनमें जाकर देवताओंका कार्य करके अवधपुरीमें अचल राज्य करेंगे ॥ ३ ॥
अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनं अपनं थल॥ यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा॥
देवता, नाग और मनुष्य सब श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंके बलपर अपने-अपने स्थानों (लोकों) में सुखपूर्वक बसेंगे। यह सब याज्ञवल्क्य मुनिने पहलेहीसे कह रखा है। हे देवि! मुनिका कथन व्यर्थ (झूठा) नहीं हो सकता ॥ ४ ॥
दो०—अस कहि पग परि प्रेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ॥ २८५ ॥
ऐसा कहकर बड़े प्रेमसे पैरों पड़कर सीताजी [को साथ भेजने] के लिये विनती करके और सुन्दर आज्ञा पाकर तब सीताजीसमेत सीताजीकी माता डेरको चलीं ॥ २८५ ॥
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥ तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी॥
जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बियोंसे—जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं। जानकीजीको तपस्विनीके वेषमें देखकर सभी शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥ १ ॥
जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई॥ लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुनि पावन प्रेम प्रान की॥
जनकजी श्रीरामजीके गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर डेरको चले और आकर उन्होंने सीताजीको देखा। जनकजीने अपने पवित्र प्रेम और प्राणोंकी पाहुनी जानकीजीको हृदयसे लगा लिया ॥ २ ॥
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥ सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम प्रेम सिसु सोहा॥