श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
कोई नहीं देख पाते थे। वे सम्पूर्ण भूतोंके लिये अदृश्य थे। वीर! उसी समय उन भगवान् नारायणने ही कुपित हो दुरात्मा मधु और कैटभके विनाश तथा समस्त राक्षसोंके संहारके लिये इस दिव्य, उत्तम एवं अमोघ बाणकी सृष्टि की थी। उस समय वे तीनों लोकोंकी सृष्टि करना चाहते थे और मधु, कैटभ तथा अन्य सब राक्षस उसमें विघ्न उपस्थित कर रहे थे। अतः भगवान्ने इसी बाणसे मधु और कैटभ दोनोंको युद्धमें मारा था। इस मुख्य बाणसे मधु और कैटभ दोनोंको मारकर भगवान्ने जीवोंके कर्मफलभोगकी सिद्धिके लिये विभिन्न लोकोंकी रचना की॥ २०—२३ ॥
‘शत्रुघ्न! पहले मैंने रावणका वध करनेके लिये भी इस बाणका प्रयोग नहीं किया था; क्योंकि इसके द्वारा बहुत-से प्राणियोंके नष्ट हो जानेकी आशङ्का थी॥ २४ ॥
‘लवणके पास जो महात्मा महादेवजीका शत्रुविनाशके लिये दिया हुआ मधुका दिव्य, उत्तम एवं महान् शूल है, उसका वह प्रतिदिन बारंबार पूजन करता है और उसे महलमें ही गुप्तरूपसे रखकर समस्त दिशाओंमें जा-जाकर अपने लिये उत्तम आहारका संग्रह करता है॥ २५-२६ ॥
‘जब कोई युद्धकी इच्छा रखकर उसे ललकारता है, तब वह राक्षस उस शूलको लेकर अपने विपक्षीको भस्म कर देता है॥ २७ ॥
‘पुरुषसिंह! जिस समय वह शूल उसके पास न हो और वह नगरमें भी न पहुँच सका हो, उसी समय पहलेसे ही नगरके द्वारपर जाकर अस्त्र-शस्त्र धारण किये उसकी प्रतीक्षामें डटे रहो॥ २८ ॥
‘महाबाहु पुरुषोत्तम! यदि उस राक्षसको महलमें घुसनेसे पहले ही तुम युद्धके लिये ललकारोगे, तब अवश्य उसका वध कर सकोगे॥ २९ ॥
‘ऐसा न करनेपर वह अवध्य हो जायगा। वीर! यदि तुमने ऐसा किया तो उस राक्षसका विनाश होकर ही रहेगा॥ ३० ॥
‘इस प्रकार मैंने तुम्हें उस शूलसे बचनेका उपाय तथा अन्य सब आवश्यक बातें बता दीं; क्योंकि श्रीमान् भगवान् नीलकण्ठके विधानको पलटना बड़ा कठिन काम है’॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥
चौंसठवाँ सर्ग
चौंसठवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार शत्रुघ्नका सेनाको आगे भेजकर एक मासके पश्चात् स्वयं भी प्रस्थान करना
शत्रुघ्नजीको इस प्रकार समझाकर और उनकी बारंबार प्रशंसा करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने पुनः यह बात कही—॥ १ ॥
‘पुरुषप्रवर! ये चार हजार घोड़े, दो हजार रथ, सौ हाथी और रास्तेमें तरह-तरहके सामानकी दूकानें लगानेवाले बनिये लोग विक्रयकी आवश्यक वस्तुओंके साथ तुम्हारे साथ जायँगे। साथ ही मनोरञ्जनके लिये नट और नर्तक भी रहेंगे॥ २-३ ॥
‘पुरुषश्रेष्ठ शत्रुघ्न! तुम दस लाख स्वर्णमुद्रा लेकर जाओ। इस तरह पर्याप्त धन और सवारियाँ अपने साथ रखो॥ ४ ॥
‘इस सेनाका भलीभाँति भरण-पोषण किया गया है। यह हर्ष तथा उत्साहसे पूर्ण, संतुष्ट और उद्दण्डतासे रहित होकर आज्ञाके अधीन रहनेवाली है। नरश्रेष्ठ! इसे मधुर भाषणसे और धन देकर प्रसन्न रखना॥ ५ ॥
‘रघुनन्दन! अत्यन्त प्रसन्न रखे गये सेवक-समूह (सैनिक) जहाँ (जिस संकटकालमें) खड़े होते या साथ देते हैं, वहाँ न तो धन टिक पाता है, न स्त्री ठहर सकती है और न भाई-बन्धु ही खड़े हो सकते हैं (अतः उन सबको सदा संतुष्ट रखना चाहिये)॥ ६ ॥
‘इसलिये हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई इस विशाल सेनाको आगे भेजकर तुम पीछेसे अकेले ही केवल धनुष हाथमें लेकर मधुवनको जाना और इस तरह यात्रा करना, जिससे मधुपुत्र लवणको यह संदेह न हो कि तुम युद्धकी इच्छासे वहाँ जा रहे हो। तुम्हारी गतिविधिका उसे पता नहीं चलना चाहिये॥ ७-८ ॥
‘पुरुषोत्तम! मैंने जो बताया है, उसके सिवा उसकी मृत्युका दूसरा कोई उपाय नहीं है; क्योंकि जो भी शूलसहित लवणासुरके दृष्टिपथमें आ जाता है, वह अवश्य उसके द्वारा मारा जाता है॥ ९ ॥
‘सौम्य! जब ग्रीष्म-ऋतु निकल जाय और वर्षाकाल आ जाय, उस समय तुम लवणासुरका वध करना; क्योंकि उस दुर्बुद्धि राक्षसके नाशका वही समय है॥ १० ॥
‘तुम्हारे सैनिक महर्षियोंको आगे करके यहाँसे यात्रा करें, जिससे ग्रीष्म-ऋतु बीतते-बीतते वे गङ्गाजीको पार कर जायँ॥ ११॥
‘शीघ्रपराक्रमी वीर! फिर सारी सेनाको वहीं गङ्गाजीके तटपर ठहराकर तुम धनुषमात्र लेकर पूरी सावधानीके साथ अकेले ही आगे जाना’॥ १२॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर शत्रुघ्नजीने अपने प्रधान सेनापतियोंको बुलाया और इस प्रकार कहा— ॥ १३॥
‘देखो, मार्गमें जहाँ-जहाँ डेरा डालना है, उन पड़ावोंका निश्चय कर लिया गया है। तुम्हें वहीं निवास करना होगा। जहाँ भी ठहरो, विरोधभावको मनसे निकाल दो, जिससे किसीको कष्ट न पहुँचे’॥ १४॥
इस प्रकार उन सेनापतियोंको आज्ञा दे अपनी विशाल सेनाको आगे भेजकर शत्रुघ्नने कौसल्या, सुमित्रा तथा कैकेयीको प्रणाम किया॥ १५॥
तत्पश्चात् श्रीरामकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। फिर हाथ जोड़कर भरत और लक्ष्मणकी भी वन्दना की॥ १६॥
तदनन्तर मनको संयममें रखकर शत्रुघ्नने पुरोहित वसिष्ठको नमस्कार किया। फिर श्रीरामकी आज्ञा ले उनकी परिक्रमा करके शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली शत्रुघ्न अयोध्यासे निकले॥ १७॥
गजराजों और श्रेष्ठ अश्वोंके समुदायसे भरी हुई विशाल सेनाको आगे भेजकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले शत्रुघ्न एक मासतक महाराज श्रीरामके पास ही रहे। उसके बाद उन्होंने वहाँसे प्रस्थान किया॥ १८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥
पैंसठवाँ सर्ग
पैंसठवाँ सर्ग
महर्षि वाल्मीकिका शत्रुघ्नको सुदासपुत्र कल्माषपादकी कथा सुनाना
अपनी सेनाको आगे भेजकर अयोध्यामें एक माह रहनेके पश्चात् शत्रुघ्न अकेले ही वहाँसे मधुवनके मार्गपर प्रस्थित हुए। वे बड़ी तेजीके साथ आगे बढ़ने लगे॥ १ ॥
रघुकुलको आनन्दित करनेवाले शूरवीर शत्रुघ्न रास्तेमें दो रात बिताकर तीसरे दिन महर्षि वाल्मीकिके पवित्र आश्रमपर जा पहुँचे। वह सबसे उत्तम वासस्थान था॥ २ ॥
वहाँ उन्होंने हाथ जोड़ मुनिश्रेष्ठ महात्मा वाल्मीकिको प्रणाम करके यह बात कही— ॥ ३ ॥
‘भगवन्! मैं अपने बड़े भाई श्रीरघुनाथजीके कार्यसे इधर आया हूँ। आज रातको यहाँ ठहरना चाहता हूँ और कल सबेरे वरुणदेवद्वारा पालित पश्चिम दिशाको चला जाऊँगा’॥ ४ ॥
शत्रुघ्नकी यह बात सुनकर मुनिवर वाल्मीकिने उन महात्माको हँसते हुए उत्तर दिया—‘महायशस्वी वीर! तुम्हारा स्वागत है॥ ५ ॥
‘सौम्य! यह आश्रम रघुवंशियोंके लिये अपना ही घर है। तुम निःशङ्क होकर मेरी ओरसे आसन, पाद्य और अर्घ्य स्वीकार करो’॥ ६ ॥
तब वह सत्कार ग्रहण करके शत्रुघ्नने फल-मूलका भोजन किया। इससे उन्हें बड़ी तृप्ति हुई॥ ७ ॥
फल-मूल खाकर वे महर्षिसे बोले—‘मुने! इस आश्रमके निकट जो यह प्राचीनकालका यज्ञ-वैभव (यूप आदि उपकरण) दिखायी देता है, किसका है— किस यजमान नरेशने यहाँ यज्ञ किया था?’॥ ८ ॥
उनका यह प्रश्न सुनकर वाल्मीकिजीने कहा— ‘शत्रुघ्न! पूर्वकालमें जिस यजमान नरेशका यह यज्ञमण्डप रहा है, उसे बताता हूँ, सुनो॥ ९ ॥
‘तुम्हारे पूर्वज राजा सुदास इस भूमण्डलके स्वामी हो गये हैं। उन भूपालके वीरसह (मित्रसह) नामक एक पुत्र हुआ, जो बड़ा पराक्रमी और अत्यन्त धर्मात्मा था॥ १० ॥
‘सुदासका वह शूरवीर पुत्र बाल्यावस्थामें ही एक दिन शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ उसने दो राक्षस देखे, जो सब ओर बारंबार विचर रहे थे॥ ११ ॥
‘वे दोनों घोर राक्षस बाघका रूप धारण करके कई हजार मृगोंको मारकर खा गये। फिर भी संतुष्ट नहीं हुए। उनके पेट नहीं भरे॥ १२ ॥
‘सौदासने उन दोनों राक्षसोंको देखा। साथ ही उनके द्वारा मृगशून्य किये गये उस वनकी अवस्थापर दृष्टिपात किया। इससे वे महान् क्रोधसे भर गये और उनमेंसे एकको विशाल बाणसे मार डाला॥ १३ ॥
‘एकको धराशायी करके वे पुरुषप्रवर सौदास निश्चिन्त हो गये। उनका अमर्ष जाता रहा और वे उस मरे हुए राक्षसको देखने लगे॥ १४ ॥
‘उस राक्षसके मरे हुए साथीको जब सौदास देख रहे थे, उस समय उनकी ओर दृष्टिपात करके उस दूसरे राक्षसने मन-ही-मन घोर संताप किया और सौदाससे इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥
“महापापी नरेश! तूने मेरे निरपराध साथीको मार डाला है, इसलिये मैं तुझसे भी इसका बदला लूँगा’ ॥ १६ ॥
‘ऐसा कहकर वह राक्षस वहीं अन्तर्धान हो गया और दीर्घकालके पश्चात् सुदासकुमार मित्रसह अयोध्याके राजा हो गये॥ १७ ॥
‘उन्हीं राजा मित्रसहने इस आश्रमके समीप अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया। महर्षि वसिष्ठ अपने तपोबलसे उस यज्ञकी रक्षा करते थे॥ १८ ॥
‘उनका वह महान् यज्ञ बहुत वर्षोंतक यहाँ चलता रहा। वह भारी धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न यज्ञ देवताओंके यज्ञकी समानता करता था॥ १९ ॥
‘उस यज्ञकी समाप्ति होनेपर पहलेके वैरका स्मरण करनेवाला वह राक्षस वसिष्ठजीका रूप धारण करके राजाके पास आया और इस प्रकार बोला— ॥ २० ॥
“राजन्! आज यज्ञकी समाप्तिका दिन है, अतः आज मुझे तुम शीघ्र ही मांसयुक्त भोजन दो। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ २१ ॥
‘ब्राह्मणरूपधारी राक्षसकी कही हुई बात सुनकर राजाने रसोई बनानेमें कुशल रसोइयोंसे कहा— ॥ २२ ॥
“तुमलोग आज शीघ्र ही मांसयुक्त हविष्य तैयार करो और उसे ऐसा बनाओ, जिससे स्वादिष्ट भोजन हो सके तथा मेरे गुरुदेव उससे संतुष्ट हो सकें’ ॥ २३ ॥
‘महाराजकी इस आज्ञाको सुनते ही रसोइयेके मनमें बड़ी घबराहट पैदा हो गयी (वह सोचने लगा, आज गुरुजी अभक्ष्य-भक्षणमें कैसे प्रवृत्त होंगे)। यह देख फिर उस राक्षसने ही रसोइयेका वेष बना लिया॥ २४॥
‘उसने मनुष्यका मांस लाकर राजाको दे दिया और कहा—‘यह मांसयुक्त अन्न एवं हविष्य लाया हूँ। यह बड़ा ही स्वादिष्ट है’॥ २५॥
‘नरश्रेष्ठ! अपनी पत्नी रानी मदयन्तीके साथ राजा मित्रसहने राक्षसके लाये हुए उस मांसयुक्त भोजनको वसिष्ठजीके सामने रखा॥ २६॥
‘थालीमें मानव-मांस परोसा गया है, यह जानकर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ महान् क्रोधसे भर गये और इस प्रकार बोले—॥ २७॥
‘“राजन्! तुम मुझे ऐसा भोजन देना चाहते हो, इसलिये यही तुम्हारा भोजन होगा; इसमें संशय नहीं है (अर्थात् तुम मनुष्यभक्षी राक्षस हो जाओगे)’॥ २८॥
‘यह सुनकर सौदासने भी कुपित हो हाथमें जल ले लिया और वसिष्ठ मुनिको शाप देना आरम्भ किया। तबतक उनकी पत्नीने उन्हें रोक दिया॥ २९॥
‘वे बोलीं—‘राजन्! भगवान् वसिष्ठ मुनि हम सबके स्वामी हैं; अतः आप अपने देवतुल्य पुरोहितको बदलेमें शाप नहीं दे सकते’॥ ३०॥
‘तब धर्मात्मा राजाने तेज और बलसे सम्पन्न उस क्रोधमय जलको नीचे डाल दिया। उससे अपने दोनों पैरोंको ही सींच लिया॥ ३१॥
ऐसा करनेसे राजाके दोनों पैर तत्काल चितकबरे हो गये। तभीसे महायशस्वी राजा सौदास कल्माषपाद (चितकबरे पैरवाले) हो गये और उसी नामसे उनकी ख्याति हुई॥ ३२ १/२ ॥
‘तदनन्तर पत्नीसहित राजाने बारंबार प्रणाम करके फिर वसिष्ठसे कहा—‘ब्रह्मर्षे! आपहीका रूप धारण करके किसीने मुझे ऐसा भोजन देनेके लिये प्रेरित किया था’॥ ३३॥
‘राजाधिराज मित्रसहकी वह बात सुनकर और उसे राक्षसकी करतूत जानकर वसिष्ठने पुनः उस नरश्रेष्ठ नरेशसे कहा—॥ ३४॥
‘“राजन्! मैंने रोषसे भरकर जो बात कह दी है, इसे व्यर्थ नहीं किया जा सकता; परंतु इससे छूटनेके लिये मैं तुम्हें एक वर दूँगा॥ ३५॥
‘राजेन्द्र! वह वर इस प्रकार है—यह शाप बारह वर्षोंतक रहेगा। उसके बाद इसका अन्त हो जायगा। मेरी कृपासे तुम्हें बीती हुई बातका स्मरण नहीं रहेगा’॥
‘इस प्रकार उस शत्रुसूदन राजाने बारह वर्षोंतक उस शापको भोगकर पुनः अपना राज्य पाया और प्रजाजनोंका निरन्तर पालन किया॥ ३७ ॥
‘रघुनन्दन! उन्हीं राजा कल्माषपादके यज्ञका यह सुन्दर स्थान मेरे इस आश्रमके समीप दिखायी देता है, जिसके विषयमें तुम पूछ रहे थे’॥ ३८ ॥
महाराज मित्रसहकी उस अत्यन्त दारुण कथाको सुनकर शत्रुघ्नने महर्षिको प्रणाम करके पर्णशालामें प्रवेश किया॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६॥
छाछठवाँ सर्ग
छाछठवाँ सर्ग
सीताके दो पुत्रोंका जन्म, वाल्मीकिद्वारा उनकी रक्षाकी व्यवस्था और इस समाचारसे प्रसन्न हुए शत्रुघ्नका वहाँसे प्रस्थान करके यमुनातटपर पहुँचना
जिस रातको शत्रुघ्नने पर्णशालामें प्रवेश किया था, उसी रातमें सीताजीने दो पुत्रोंको जन्म दिया॥ १ ॥
तदनन्तर आधी रातके समय कुछ मुनिकुमारोंने वाल्मीकिजीके पास आकर उन्हें सीताजीके प्रसव होनेका शुभ एवं प्रिय समाचार सुनाया—॥ २ ॥
‘भगवन्! श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नीने दो पुत्रोंको जन्म दिया है; अतः महातेजस्वी महर्षे! आप उनकी बालग्रहजनित बाधा निवृत्त करनेवाली रक्षा करें’॥ ३ ॥
उन कुमारोंकी वह बात सुनकर महर्षि उस स्थानपर गये। सीताके वे दोनों पुत्र बालचन्द्रमाके समान सुन्दर तथा देवकुमारोंके समान महातेजस्वी थे॥ ४ ॥
वाल्मीकिजीने प्रसन्नचित्त होकर सूतिकागारमें प्रवेश किया और उन दोनों कुमारोंको देखा तथा उनके लिये भूतों और राक्षसोंका विनाश करनेवाली रक्षाकी व्यवस्था की॥ ५ ॥
ब्रह्मर्षि वाल्मीकिने एक कुशाओंका मुट्ठा और उनके लव लेकर उनके द्वारा दोनों बालकोंकी भूत-बाधाका निवारण करनेके लिये रक्षा-विधिका उपदेश दिया—॥ ६ ॥
‘वृद्धा स्त्रियोंको चाहिये कि इन दोनों बालकोंमें जो पहले उत्पन्न हुआ है, उसका मन्त्रोंद्वारा संस्कार किये हुए इन कुशोंसे मार्जन करें। ऐसा करनेपर उस बालकका नाम ‘कुश’ होगा और उनमें जो छोटा है, उसका लवसे मार्जन करें। इससे उसका नाम ‘लव’ होगा॥ ७-८ ॥
‘इस प्रकार जुड़वे उत्पन्न हुए ये दोनों बालक क्रमशः कुश और लव नाम धारण करेंगे और मेरे द्वारा निश्चित किये गये इन्हीं नामोंसे भूमण्डलमें विख्यात होंगे’॥ ९ ॥
यह सुनकर निष्पाप वृद्धा स्त्रियोंने एकाग्रचित्त हो मुनिके हाथके रक्षाके साधनभूत उन कुशोंको ले लिया और उनके द्वारा उन दोनों बालकोंका मार्जन एवं संरक्षण किया॥ १० ॥
जब वृद्धा स्त्रियाँ इस प्रकार रक्षा करने लगीं, उस समय आधी रातको श्रीराम और सीताके नाम, गोत्रके उच्चारणकी ध्वनि शत्रुघ्नजीके कानोंमें पड़ी। साथ ही उन्हें सीताके दो सुन्दर पुत्र
होनेका संवाद प्राप्त हुआ। तब वे सीताजीकी पर्णशालामें गये और बोले- 'माताजी! यह बड़े सौभाग्यकी बात है'॥ ११-१२ ॥
महात्मा शत्रुघ्न उस समय इतने प्रसन्न थे कि उनकी वह वर्षाकालिक सावनकी रात बात-की-बातमें बीत गयी॥ १३ ॥
सबेरा होनेपर पूर्वाह्नकालका कार्य संध्या-वन्दन आदि करके महापराक्रमी शत्रुघ्न हाथ जोड़ मुनिसे विदा ले पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये॥ १४ ॥
मार्गमें सात रात बिताकर वे यमुना-तटपर जा पहुँचे और वहाँ पुण्यकीर्ति महर्षियोंके आश्रममें रहने लगे॥ १५ ॥
महायशस्वी राजा शत्रुघ्नने वहाँ च्यवन आदि मुनियोंके साथ सुन्दर कथा-वार्ताद्वारा कालक्षेप करते हुए निवास किया॥ १६ ॥
इस प्रकार रघुकुलके प्रमुख वीर महात्मा राजकुमार शत्रुघ्न वहाँ एकत्र हुए च्यवन आदि मुनियोंके साथ नाना प्रकारकी कथाएँ सुनते हुए उन दिनों यमुना तटपर रात बिताने लगे॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५॥
सरसठवाँ सर्ग
सरसठवाँ सर्ग
च्यवन मुनिका शत्रुघ्नको लवणासुरके शूलकी शक्तिका परिचय देते हुए राजा मान्धाताके वधका प्रसंग सुनाना
एक दिन रातके समय शत्रुघ्नने भृगुनन्दन ब्रह्मर्षि च्यवनसे पूछा—‘ब्रह्मन्! लवणासुरमें कितना बल है? उसके शूलमें कितनी शक्ति है? उस उत्तम शूलके द्वारा उसने द्वन्द्व-युद्धमें आये हुए किन-किन योद्धाओंका वध किया है?’॥ १-२ ॥
महात्मा शत्रुघ्नजीका यह वचन सुनकर महातेजस्वी च्यवनने उन रघुकुलनन्दन राजकुमारसे कहा— ॥ ३ ॥
‘रघुनन्दन! इस लवणासुरके कर्म असंख्य हैं। उनमेंसे एक ऐसे कर्मका वर्णन किया जाता है, जो इक्ष्वाकुवंशी राजा मान्धाताके ऊपर घटित हुआ था। तुम उसे मेरे मुँहसे सुनो॥ ४ ॥
‘पूर्वकालकी बात है अयोध्यापुरीमें युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता राज्य करते थे। वे बड़े बलवान्, पराक्रमी तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे॥ ५ ॥
‘उन पृथिवीपति नरेशने सारी पृथिवीको अपने अधिकारमें करके यहाँसे देवलोकपर विजय पानेका उद्योग आरम्भ किया॥ ६ ॥
‘राजा मान्धाताने जब देवलोकपर विजय पानेकी इच्छासे उद्योग आरम्भ किया, तब इन्द्र तथा महामनस्वी देवताओंको बड़ा भय हुआ॥ ७ ॥
‘“मैं इन्द्रका आधा सिंहासन और उनका आधा राज्य लेकर भूमण्डलका राजा हो देवताओंसे वन्दित होकर रहूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करके वे स्वर्गलोकपर जा चढ़े॥ ८ ॥
‘उनके खोटे अभिप्रायको जानकर पाकशासन इन्द्र उन युवनाश्व पुत्र मान्धाताके पास गये और उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥
‘“पुरुषप्रवर! अभी तुम सारे मर्त्यलोकके भी राजा नहीं हो। समूची पृथिवीको वशमें किये बिना ही देवताओंका राज्य कैसे लेना चाहते हो॥ १० ॥
‘“वीर! यदि सारी पृथ्वी तुम्हारे वशमें हो जाय तो तुम सेवकों, सेनाओं और सवारियोंसहित यहाँ देवलोकका राज्य करना’॥ ११ ॥
‘ऐसी बातें कहते हुए इन्द्रसे मान्धाताने पूछा— ‘देवराज! बताइये तो सही, इस पृथ्वीपर कहाँ मेरे आदेशकी अवहेलना होती है’?॥ १२ ॥
‘तब इन्द्रने कहा— ‘निष्पाप नरेश! मधुवनमें मधुका पुत्र लवणासुर रहता है। वह तुम्हारी आज्ञा नहीं मानता’॥
‘इन्द्रकी कही हुई यह घोर अप्रिय बात सुनकर राजा मान्धाताका मुख लज्जासे झुक गया। वे कुछ बोल न सके॥ १४ ॥
‘वे नरेश इन्द्रसे विदा ले मुँह लटकाये वहाँसे चल दिये और पुनः इस मर्त्यलोकमें ही आ पहुँचे॥ १५ ॥
‘उन्होंने अपने हृदयमें अमर्ष भर लिया। फिर वे शत्रुदमन मान्धाता मधुके पुत्रको वशमें करनेके लिये सेवक, सेना और सवारियोंसहित उसकी राजधानीके समीप आये॥ १६ ॥
‘उन पुरुषप्रवर नरेशने युद्धकी इच्छासे लवणके पास अपना दूत भेजा॥ १७ ॥
‘दूतने वहाँ जाकर मधुके पुत्रको बहुत-से कटुवचन सुनाये। इस तरह कठोर बातें कहते हुए उस दूतको वह राक्षस तुरंत खा गया॥ १८ ॥
‘जब दूतके लौटनेमें विलम्ब हुआ, तब राजा बड़े क्रुद्ध हुए और बाणोंकी वर्षा करके उस राक्षसको सब ओरसे पीड़ित करने लगे॥ १९ ॥
‘तब लवणासुरने हँसकर हाथसे वह शूल उठाया और सेवकोंसहित राजा मान्धाताका वध करनेके लिये उस उत्तम अस्त्रको उनके ऊपर छोड़ दिया॥ २० ॥
‘वह चमचमाता हुआ शूल सेवक, सेना और सवारियोंसहित राजा मान्धाताको भस्म करके फिर लवणासुरके हाथमें आ गया॥ २१ ॥
‘इस प्रकार सारी सेना और सवारियोंके साथ महाराज मान्धाता मारे गये। सौम्य! उस शूलकी शक्ति असीम और सबसे बढ़ी-चढ़ी है॥ २२ ॥
‘राजन्! कल सबेरे जबतक वह राक्षस उस अस्त्रको न ले, तबतक ही शीघ्रता करनेपर तुम निःसंदेह उसका वध कर सकोगे और इस प्रकार निश्चय ही तुम्हारी विजय होगी॥ २३ ॥
‘तुम्हारे द्वारा यह कार्य सम्पन्न होनेपर समस्त लोकोंका कल्याण होगा। नरश्रेष्ठ! इस तरह मैंने तुम्हें दुरात्मा लवणका सारा बल बता दिया और उसके शूलकी भी घोर एवं असीम
शक्तिका परिचय दे दिया। पृथ्वीनाथ! इन्द्रके प्रयत्नसे उसी शूलके द्वारा राजा मान्धाताका विनाश हुआ था॥ २४-२५ ॥
‘महात्मन्! कल सबेरे जब वह शूल लिये बिना ही मांसका संग्रह करनेके लिये निकलेगा, तभी तुम उसका वध कर डालोगे, इसमें संशय नहीं है। नरेन्द्र! अवश्य तुम्हारी विजय होगी’॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७॥
अड़सठवाँ सर्ग
अड़सठवाँ सर्ग
लवणासुरका आहारके लिये निकलना, शत्रुघ्नका मधुपुरीके द्वारपर डट जाना और लौटे हुए लवणासुरके साथ उनकी रोषभरी बातचीत
इस प्रकार कथा कहते और शुभ विजयकी आकांक्षा रखते हुए उन मुनियोंकी बातें सुनते-सुनते महात्मा शत्रुघ्नकी वह रात बात-की-बातमें बीत गयी॥ १ ॥
तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल होनेपर भक्ष्य पदार्थ एवं भोजनके संग्रहकी इच्छासे प्रेरित हो वह वीर राक्षस अपने नगरसे बाहर निकला॥ २ ॥
इसी बीचमें वीर शत्रुघ्न यमुना नदीको पार करके हाथमें धनुष लिये मधुपुरीके द्वारपर खड़े हो गये॥ ३ ॥
तत्पश्चात् मध्याह्न होनेपर वह क्रूरकर्मा राक्षस हजारों प्राणियोंका बोझा लिये वहाँ आया॥ ४ ॥
उस समय उसने शत्रुघ्नको अस्त्र-शस्त्र लिये द्वारपर खड़ा देखा। देखकर वह राक्षस उनसे बोला— 'नराधम! इस हथियारसे तू मेरा क्या कर लेगा। तेरे-जैसे हजारों अस्त्र-शस्त्रधारी मनुष्योंको मैं रोषपूर्वक खा चुका हूँ। जान पड़ता है काल तेरे सिरपर नाच रहा है॥ ५-६ ॥
'पुरुषाधम! आजका यह मेरा आहार भी पूरा नहीं है। दुर्मते! तू स्वयं ही मेरे मुँहमें कैसे आ पड़ा?'॥ ७ ॥
वह राक्षस इस प्रकारकी बातें कहता हुआ बारंबार हँस रहा था। यह देख पराक्रमी शत्रुघ्नके नेत्रोंसे रोषके कारण अश्रुपात होने लगा॥ ८ ॥
रोषके वशीभूत हुए महामनस्वी शत्रुघ्नके सभी अङ्गोंसे तेजोमयी किरणें छिटकने लगीं॥ ९ ॥
उस समय अत्यन्त कुपित हुए शत्रुघ्न उस निशाचरसे बोले— 'दुर्बुद्धे! मैं तेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध करना चाहता हूँ॥ १० ॥
'मैं महाराज दशरथका पुत्र और परम बुद्धिमान् राजा श्रीरामका भाई हूँ। मेरा नाम शत्रुघ्न है और मैं कामसे भी शत्रुघ्न (शत्रुओंका संहार करनेवाला) ही हूँ। इस समय तेरा वध करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ ११ ॥
‘मैं युद्ध करना चाहता हूँ। इसलिये तू मुझे द्वन्द्वयुद्धका अवसर दे। तू सम्पूर्ण प्राणियोंका शत्रु है; इसलिये अब मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकेगा’॥ १२ ॥
उनके ऐसा कहनेपर वह राक्षस उन नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नसे हँसता हुआ-सा बोला—‘दुर्मते! सौभाग्यकी बात है कि आज तू स्वयं ही मुझे मिल गया॥ १३ ॥
‘खोटी बुद्धिवाले नराधम! रावण नामक राक्षस मेरी मौसी शूर्पणखाका भाँइ था, जिसे तेरे भाँइ रामने एक स्त्रीके लिये मार डाला॥ १४ ॥
‘इतना ही नहीं, उन्होंने रावणके कुलका संहार कर दिया, तथापि मैंने वह सब कुछ सह लिया। तुमलोगोंके द्वारा की गयी अवहेलनाको सामने रखकर— प्रत्यक्ष देखकर भी तुम सबके प्रति मैंने विशेषरूपसे क्षमाभावका परिचय दिया॥ १५ ॥
‘जो नराधम भूतकालमें मेरा सामना करनेके लिये आये थे, उन सबको मैंने तिनकोंके समान तुच्छ समझकर तिरस्कृत किया और मार डाला। जो भविष्यमें आयेंगे, उनकी भी यही दशा होगी और वर्तमानकालमें आनेवाले तुझ-जैसे नराधम भी मेरे हाथसे मरे हुए ही हैं॥ १६ ॥
‘दुर्मते! तुझे युद्धकी इच्छा है न? मैं अभी तुझे युद्धका अवसर दूँगा। तू दो घड़ी ठहर जा। तबतक मैं भी अपना अस्त्र ले आता हूँ॥ १७ ॥
‘तेरे वधके लिये जैसे अस्त्रका होना मुझे अभीष्ट है, वैसे अस्त्रको पहले सुसज्जित कर लूँ; फिर युद्धका अवसर दूँगा।’ यह सुनकर शत्रुघ्न तुरंत बोल उठे— ‘अब तू मेरे हाथसे जीवित बचकर कहाँ जायगा?॥ १८ ॥
‘किसी भी बुद्धिमान् पुरुषको अपने सामने आये हुए शत्रुको छोड़ना नहीं चाहिये। जो अपनी घबरायी हुँइ बुद्धिके कारण शत्रुको निकल जानेका अवसर दे देता है, वह मन्दबुद्धि पुरुष कायरके समान मारा जाता है॥ १९ ॥
‘अतः राक्षस! अब तू इस जीव-जगत्को अच्छी तरह देख ले। मैं नाना प्रकारके तीखे बाणोंद्वारा तुझ पापीको अभी यमराजके घरकी ओर भेजता हूँ; क्योंकि तू तीनों लोकोंका तथा श्रीरघुनाथजीका भी शत्रु है’॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६८॥
उनहत्तरवाँ सर्ग
उनहत्तरवाँ सर्ग
शत्रुघ्न और लवणासुरका युद्ध तथा लवणका वध
महामना शत्रुघ्नका वह भाषण सुनकर लवणासुरको बड़ा क्रोध हुआ और बोला— ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’॥ १ ॥
वह हाथ-पर-हाथ रगड़ता और दाँत कटकटाता हुआ रघुकुलके सिंह शत्रुघ्नको बारंबार ललकारने लगा॥ २ ॥
भयंकर दिखायी देनेवाले लवणको इस प्रकार बोलते देख देवशत्रुओंका नाश करनेवाले शत्रुघ्नने यह बात कही—॥ ३ ॥
‘राक्षस! जब तूने दूसरे वीरोंको पराजित किया था, उस समय शत्रुघ्नका जन्म नहीं हुआ था। अतः आज मेरे इन बाणोंकी चोट खाकर तू सीधे यमलोककी राह ले॥ ४ ॥
‘पापात्मन्! जैसे देवताओंने रावणको धराशायी हुआ देखा था, उसी तरह विद्वान् ब्राह्मण और ऋषि आज रणभूमिमें मेरे द्वारा मारे गये तुझ दुराचारी राक्षसको भी देखें॥ ५ ॥
‘निशाचर! आज मेरे बाणोंसे दग्ध होकर जब तू धरतीपर गिर जायगा, उस समय इस नगर और जनपदमें भी सबका कल्याण ही होगा॥ ६ ॥
‘आज मेरी भुजाओंसे छूटा हुआ वज्रके समान मुखवाला बाण उसी तरह तेरी छातीमें धँस जायगा, जैसे सूर्यकी किरण कमलकोशमें प्रविष्ट हो जाती है’॥ ७ ॥
शत्रुघ्नके ऐसा कहनेपर लवण क्रोधसे मूर्च्छित-सा हो गया और एक महान् वृक्ष लेकर उसने शत्रुघ्नकी छातीपर दे मारा; परंतु शत्रुघ्नने उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये॥ ८ ॥
वह वार खाली गया देख उस बलवान् राक्षसने पुनः बहुत-से वृक्ष ले-लेकर शत्रुघ्नपर चलाये॥ ९ ॥
परंतु शत्रुघ्न भी बड़े तेजस्वी थे। उन्होंने अपने ऊपर आते हुए उन बहुसंख्यक वृक्षोंमेंसे प्रत्येकको झुकी हुई गाँठवाले तीन-तीन या चार-चार बाण मारकर काट डाला॥ १० ॥
फिर पराक्रमी शत्रुघ्नने उस राक्षसपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, किंतु वह निशाचर इससे व्यथित या विचलित नहीं हुआ॥ ११ ॥
तब बल-विक्रमशाली लवणने हँसकर एक वृक्ष उठाया और उसे शूरवीर शत्रुघ्नके सिरपर दे मारा। उसकी चोट खाकर शत्रुघ्नके सारे अङ्ग शिथिल हो गये और उन्हें मूर्च्छा आ गयी॥ १२ ॥
वीर शत्रुघ्नके गिरते ही ऋषियों, देवसमूहों, गन्धर्वों और अप्सराओंमें महान् हाहाकार मच गया॥ १३ ॥
शत्रुघ्नजीको भूमिपर गिरा देख लवणने समझा ये मर गये, इसलिये अवसर मिलनेपर भी वह राक्षस अपने घरमें नहीं गया और न शूल ही ले आया। उन्हें धराशायी हुआ देख सर्वथा मरा हुआ समझकर ही वह अपनी उस भोजनसामग्रीको एकत्र करने लगा॥ १४-१५ ॥
दो ही घड़ीमें शत्रुघ्नको होश आ गया। वे अस्त्र-शस्त्र लेकर उठे और फिर नगरद्वारपर खड़े हो गये। उस समय ऋषियोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ १६ ॥
तदनन्तर शत्रुघ्नने उस दिव्य, अमोघ और उत्तम बाणको हाथमें लिया, जो अपने घोर तेजसे प्रज्वलित हो दसों दिशाओंमें व्याप्त-सा हो रहा था॥ १७ ॥
उसका मुख और वेग वज्रके समान था। वह मेरु और मन्दराचलके समान भारी था। उसकी गाँठें झुकी हुईं थीं तथा वह किसी भी युद्धमें पराजित होनेवाला नहीं था॥ १८ ॥
उसका सारा अङ्ग रक्तरूपी चन्दनसे चर्चित था। पंख बड़े सुन्दर थे। वह बाण दानवराजरूपी पर्वतराजों एवं असुरोंके लिये बड़ा भयंकर था॥ १९ ॥
वह प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रज्वलित हुई कालाग्निके समान उद्दीप्त हो रहा था। उसे देखकर समस्त प्राणी त्रस्त हो गये॥ २० ॥
देवता, असुर, गन्धर्व, मुनि और अप्सराओंके साथ सारा जगत् अस्वस्थ हो ब्रह्माजीके पास पहुँचा॥ २१ ॥
जगत्के उन सभी प्राणियोंने वर देनेवाले देवदेवेश्वर प्रपितामह ब्रह्माजीसे कहा— 'भगवन्! समस्त लोकोंके संहारकी सम्भावनासे देवताओंपर भी भय और मोह छा गया है॥ २२ ॥
‘देव! कहीं लोकोंका संहार तो नहीं होगा अथवा प्रलयकाल तो नहीं आ पहुँचा है? प्रपितामह! संसारकी ऐसी अवस्था न तो पहले कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी’॥ २३ ॥
उनकी यह बात सुनकर देवताओंका भय दूर करनेवाले लोकपितामह ब्रह्माने प्रस्तुत भयका कारण बताते हुए कहा॥ २४ ॥
वे मधुर वाणीमें बोले—‘सम्पूर्ण देवताओ! मेरी बात सुनो। आज शत्रुघ्नने युद्धस्थलमें लवणासुरका वध करनेके लिये जो बाण हाथमें लिया है, उसीके तेजसे हम सब लोग मोहित हो रहे हैं। ये श्रेष्ठ देवता भी उसीसे घबराये हुए हैं॥ २५ १/२ ॥
‘पुत्रो! यह तेजोमय सनातन बाण आदिपुरुष लोककर्ता भगवान् विष्णुका है। जिससे तुम्हें भय प्राप्त हुआ है॥ २६ १/२ ॥
‘परमात्मा श्रीहरिने मधु और कैटभ—इन दोनों दैत्योंका वध करनेके लिये इस महान् बाणकी सृष्टि की थी॥ २७ १/२ ॥
‘एकमात्र भगवान् विष्णु ही इस तेजोमय बाणको जानते हैं; क्योंकि यह बाण साक्षात् परमात्मा विष्णुकी ही प्राचीन मूर्ति है॥ २८ १/२ ॥
‘अब तुमलोग यहाँसे जाओ और श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई महामनस्वी वीर शत्रुघ्नके हाथसे राक्षसप्रवर लवणासुरका वध होता देखो’॥ २९ १/२ ॥
देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर देवतालोग उस स्थानपर आये, जहाँ शत्रुघ्नजी और लवणासुर दोनोंका युद्ध हो रहा था॥ ३० १/२ ॥
शत्रुघ्नजीके द्वारा हाथमें लिये गये उस दिव्य बाणको सभी प्राणियोंने देखा। वह प्रलयकालके अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था॥ ३१ १/२ ॥
आकाशको देवताओंसे भरा हुआ देख रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नने बड़े जोरसे सिंहनाद करके लवणासुरकी ओर देखा॥ ३२ १/२ ॥
महात्मा शत्रुघ्नके पुनः ललकारनेपर लवणासुर क्रोधसे भर गया और फिर युद्धके लिये उनके सामने आया॥ ३३ १/२ ॥
तब धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ शत्रुघ्नजीने अपने धनुषको कानतक खींचकर उस महाबाणको लवणासुरके विशाल वक्षःस्थलपर चलाया॥ ३४ १/२ ॥
वह देवपूजित दिव्य बाण तुरंत ही उस राक्षसके हृदयको विदीर्ण करके रसातलमें घुस गया तथा रसातलमें जाकर वह फिर तत्काल ही इक्ष्वाकुकुलनन्दन शत्रुघ्नजीके पास आ गया॥
३५-३६ ॥
शत्रुघ्नजीके बाणसे विदीर्ण होकर निशाचर लवण वज्रके मारे हुए पर्वतके समान सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३७ ॥
लवणासुरके मारे जाते ही वह दिव्य एवं महान् शूल सब देवताओंके देखते-देखते भगवान् रुद्रके पास आ गया॥ ३८ ॥
इस प्रकार उत्तम धनुष-बाण धारण करनेवाले रघुकुलके प्रमुख वीर शत्रुघ्न एक ही बाणके प्रहारसे तीनों लोकोंके भयको नष्ट करके उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे त्रिभुवनका अन्धकार दूर करके सहस्र किरणधारी सूर्यदेव प्रकाशित हो उठते हैं॥ ३९ ॥
‘सौभाग्यकी बात है कि दशरथनन्दन शत्रुघ्नने भय छोड़कर विजय प्राप्त की और सर्पके समान लवणासुर मर गया’ ऐसा कहकर देवता, ऋषि, नाग और समस्त अप्सराएँ उस समय शत्रुघ्नजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९॥
सत्तरवाँ सर्ग
सत्तरवाँ सर्ग
देवताओंसे वरदान पा शत्रुघ्नका मधुरापुरीको बसाकर बारहवें वर्षमें वहाँसे श्रीरामके पास जानेका विचार करना
लवणासुरके मारे जानेपर इन्द्र और अग्नि आदि देवता आकर शत्रुओंको संताप देनेवाले शत्रुघ्नसे अत्यन्त मधुर वाणीमें बोले—॥ १ ॥
‘वत्स! सौभाग्यकी बात है कि तुम्हें विजय प्राप्त हुई और लवणासुर मारा गया। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुषसिंह! तुम वर माँगो॥ २ ॥
‘महाबाहो! हम सब लोग तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आये हैं। हम तुम्हारी विजय चाहते थे। हमारा दर्शन अमोघ है (अतएव तुम कोई वर माँगो)’॥ ३ ॥
देवताओंका यह वचन सुनकर मनको वशमें रखनेवाले शूरवीर महाबाहु शत्रुघ्न मस्तकपर अञ्जलि बाँध इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥
‘देवताओ! यह देवनिर्मित रमणीय मधुपुरी शीघ्र ही मनोहर राजधानीके रूपमें बस जाय। यही मेरे लिये श्रेष्ठ वर है’॥ ५ ॥
तब देवताओंने उन रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नसे प्रसन्न होकर कहा—‘बहुत अच्छा ऐसा ही हो। यह रमणीय पुरी निःसंदेह शूर-वीरोंकी सेनासे सम्पन्न हो जायगी’॥ ६ ॥
ऐसा कहकर महामनस्वी देवता उस समय स्वर्गको चले गये। महातेजस्वी शत्रुघ्नने भी गङ्गातटसे अपनी उस सेनाको बुलवाया॥ ७ ॥
शत्रुघ्नजीका आदेश पाकर वह सेना शीघ्र चली आयी। शत्रुघ्नने श्रावणमाससे उस पुरीको बसाना आरम्भ किया॥ ८ ॥
तबसे बारहवें वर्षतक वह पुरी तथा वह शूरसेन जनपद पूर्णरूपसे बस गया। वहाँ कहीं किसीसे भय नहीं था। वह देश दिव्य सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न था॥ ९ ॥
वहाँके खेत खेतीसे हरे-भरे हो गये। इन्द्र वहाँ समयपर वर्षा करने लगे। शत्रुघ्नजीके बाहुबलसे सुरक्षित मधुपुरी नीरोग तथा वीर पुरुषोंसे भरी थी॥ १० ॥
वह पुरी यमुनाके तटपर अर्धचन्द्राकार बसी थी और अनेकानेक सुन्दर गृहों, चौराहों, बाजारों तथा गलियोंसे सुशोभित होती थी। उसमें चारों वर्णोंके लोग निवास करते थे तथा नाना
प्रकारके वाणिज्य-व्यवसाय उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ११ ॥
पूर्वकालमें लवणासुरने जिन विशाल गृहोंका निर्माण कराया था, उनमें सफेदी कराकर उन्हें नाना प्रकारके चित्रोंसे सुसज्जित करके शत्रुघ्नजी उनकी शोभा बढ़ाने लगे॥ १२ ॥
अनेकानेक उद्यान और विहारस्थल सब ओरसे उस पुरीको सुशोभित करते थे। देवताओं और मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य शोभनीय पदार्थ भी उस नगरीकी शोभावृद्धि करते थे॥ १३ ॥
नाना प्रकारकी क्रय-विक्रय-योग्य वस्तुओंसे सुशोभित वह दिव्य पुरी अनेकानेक देशोंसे आये हुए वणिग्जनोंसे शोभा पा रही थी॥ १४ ॥
उसे पूर्णतः समृद्धिशालिनी देख सफलमनोरथ हुए भरतानुज शत्रुघ्न अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े हर्षका अनुभव करने लगे॥ १५ ॥
मधुरापुरीको बसाकर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि अयोध्यासे आये बारहवाँ वर्ष हो गया, अब मुझे वहाँ चलकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दोंका दर्शन करना चाहिये॥ १६ ॥
इस प्रकार नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरी हुई उस देवपुरीके समान मनोहर मधुरापुरीको बसाकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले राजा शत्रुघ्नने श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शनका विचार किया॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
७०॥