श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
अपने शरीरपर गिराये गये उन बाण-समूहोंकी परवा न करके महाबली हनुमान्ने अकम्पनको मार डालनेका विचार किया॥ १२ ॥
फिर तो महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान् महान् अट्टहास करके पृथ्वीको कँपाते हुए-से उस राक्षसकी ओर दौड़े॥ १३ ॥
उस समय वहाँ गर्जते और तेजसे देदीप्यमान होते हुए हनुमान्जीका रूप प्रज्वलित अग्निके समान दुर्धर्ष हो गया था॥ १४ ॥
अपने हाथमें को ◌ं ऽ इ हथियार नहीं है, यह जानकर क्रोधसे भरे हुए वानरशिरोमणि हनुमान्ने बड़े वेगसे पर्वत उखाड़ लिया॥ १५ ॥
उस महान् पर्वतको एक ही हाथसे लेकर पराक्रमी पवनकुमार बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हुए उसे घुमाने लगे॥ १६ ॥
फिर उन्होंने राक्षसराज अकम्पनपर धावा किया, ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें देवेन्द्रने वज्र लेकर युद्धस्थलमें नमुचिपर आक्रमण किया था॥ १७ ॥
अकम्पनने उस उठे हुए पर्वतशिखरको देख अर्धचन्द्राकार विशाल बाणोंके द्वारा उसे दूरसे ही विदीर्ण कर दिया॥ १८ ॥
उस राक्षसके बाणसे विदीर्ण हो वह पर्वतशिखर आकाशमें ही बिखरकर गिर पड़ा। यह देख हनुमान्जीके क्रोधकी सीमा न रही॥ १९ ॥
फिर रोष और दर्पसे उन वानरवीरने महान् पर्वतके समान ऊँचे अश्वकर्ण नामक वृक्षके पास जाकर उसे शीघ्रतापूर्वक उखाड़ लिया॥ २० ॥
विशाल तनेवाले उस अश्वकर्णको हाथमें लेकर महातेजस्वी हनुमान्ने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे युद्धभूमिमें घुमाना आरम्भ किया॥ २१ ॥
प्रचण्ड क्रोधसे भरे हुए हनुमान्ने बड़े वेगसे दौड़कर कितने ही वृक्षोंको तोड़ डाला और पैरोंकी धमकसे वे पृथ्वीको भी विदीर्ण-सी करने लगे॥ २२ ॥
सवारोंसहित हाथियों, रथोंसहित रथियों तथा पैदल राक्षसोंको भी बुद्धिमान् हनुमान्जी मौतके घाट उतारने लगे॥ २३ ॥
क्रोधसे भरे हुए यमराजकी भाँति वृक्ष हाथमें लिये प्राणहारी हनुमान्को देख राक्षस भागने लगे॥ २४ ॥
राक्षसोंको भय देनेवाले हनुमान् अत्यन्त कुपित होकर शत्रुओंपर आक्रमण कर रहे थे। उस समय वीर अकम्पनने उन्हें देखा। देखते ही वह क्षोभसे भर गया और जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ २५ ॥
अकम्पनने देहको विदीर्ण कर देनेवाले चौदह पैने बाण मारकर महापराक्रमी हनुमान्को घायल कर दिया॥ २६ ॥
इस प्रकार नाराचों और तीखी शक्तियोंसे छिदे हुए वीर हनुमान् उस समय वृक्षोंसे व्याप्त पर्वतके समान दिखायी देते थे॥ २७ ॥
उनका सारा शरीर रक्तसे रँग गया था, इसलिये वे महापराक्रमी महाबली और महाकाय हनुमान् खिले हुए अशोक एवं धूमरहित अग्निके समान शोभा पा रहे थे॥
तदनन्तर महान् वेग प्रकट करके हनुमान्जीने एक दूसरा वृक्ष उखाड़ लिया और तुरंत ही उसे राक्षसराज अकम्पनके सिरपर दे मारा॥ २९ ॥
क्रोधसे भरे वानरश्रेष्ठ महात्मा हनुमान्के चलाये हुए उस वृक्षकी गहरी चोट खाकर राक्षस अकम्पन पृथ्वीपर गिरा और मर गया॥ ३० ॥
जैसे भूकम्प आनेपर सारे वृक्ष काँपने लगते हैं, उसी प्रकार राक्षसराज अकम्पनको रणभूमिमें मारा गया देख समस्त राक्षस व्यथित हो उठे॥ ३१ ॥
वानरोंके खदेड़नेपर वहाँ परास्त हुए वे सब राक्षस अपने अस्त्र-शस्त्र फेंककर डरके मारे लङ्कामें भाग गये॥ ३२ ॥
उनके केश खुले हुए थे। वे घबरा गये थे और पराजित होनेसे उनका घमंड चूर-चूर हो गया था। भयके कारण उनके अङ्गोंसे पसीने चू रहे थे और इसी अवस्थामें वे भाग रहे थे॥ ३३ ॥
भयके कारण एक-दूसरेको कुचलते हुए वे भागकर लङ्कापुरीमें घुस गये। भागते समय वे बारंबार पीछे घूम-घूमकर देखते रहते थे॥ ३४ ॥
उन राक्षसोंके लङ्कामें घुस जानेपर समस्त महाबली वानरोंने एकत्र हो वहाँ हनुमान्जीका अभिनन्दन किया॥ ३५ ॥
उन शक्तिशाली हनुमान्जीने भी उत्साहित हो यथायोग्य अनुकूल बर्ताव करते हुए उन समस्त वानरोंका समादर किया॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वानरोंने पूरा बल लगाकर उच्च स्वरसे गर्जना की और वहाँ जीवित राक्षसोंको ही पकड़-पकड़कर घसीटना आरम्भ किया॥ ३७ ॥
जैसे भगवान् विष्णुने शत्रुनाशन, महाबली, भयंकर एवं महान् असुर मधुकैटभ आदिका वध करके वीर-शोभा (विजयलक्ष्मी)-का वरण किया था, उसी प्रकार महाकपि हनुमान्ने राक्षसोंके पास पहुँचकर उन्हें मौतके घाट उतार वीरोचित शोभाको धारण किया॥ ३८ ॥
उस समय देवता, महाबली श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि वानर तथा अत्यन्त बलशाली विभीषणने भी कपिवर हनुमान्जीका यथोचित सत्कार किया॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६ ॥
सत्तावनवाँ सर्ग
सत्तावनवाँ सर्ग
प्रहस्तका रावणकी आज्ञासे विशाल सेनासहित युद्धके लिये प्रस्थान
अकम्पनके वधका समाचार पाकर राक्षसराज रावणको बड़ा क्रोध हुआ। उसके मुखपर कुछ दीनता छा गयी और वह मन्त्रियोंकी ओर देखने लगा॥ १ ॥
पहले तो दो घड़ीतक वह कुछ सोचता रहा। फिर उसने मन्त्रियोंके साथ विचार किया और उसके बाद दिनके पूर्वभागमें राक्षसराज रावण स्वयं लङ्काके सब मोरचोंका निरीक्षण करनेके लिये गया॥ २ ॥
राक्षसगणोंसे सुरक्षित और बहुत-सी छावनियोंसे घिरी हुई, ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित उस नगरीको राजा रावणने अच्छी तरह देखा॥ ३ ॥
लङ्कापुरी चारों ओरसे शत्रुओंद्वारा घेर ली गयी थी। यह देखकर राक्षसराज रावणने अपने हितैषी युद्धकलाकोविद प्रहस्तसे यह समयोचित बात कही— ॥ ४ ॥
‘युद्धविशारद वीर! नगरके अत्यन्त निकट शत्रुओंकी सेना छावनी डाले पड़ी है, इसीलिये सारा नगर सहसा व्यथित हो उठा है। अब मैं दूसरे किसीके युद्ध करनेसे इसका छुटकारा होता नहीं देखता हूँ॥ ५ ॥
‘अब तो इस तरहके युद्धका भार मैं, कुम्भकर्ण, मेरे सेनापति तुम, बेटा इन्द्रजित् अथवा निकुम्भ ही उठा सकते हैं॥ ६ ॥
‘अतः तुम शीघ्र ही सेना लेकर विजयके लिये प्रस्थान करो और जहाँ ये सब वानर जुटे हुए हैं, वहाँ जाओ॥ ७ ॥
‘तुम्हारे निकलते ही सारी वानरसेना तुरंत विचलित हो उठेगी और गर्जते हुए राक्षसशिरोमणियोंका सिंहनाद सुनकर भाग खड़ी होगी॥ ८ ॥
‘वानरलोग बड़े चञ्चल, ढीठ और डरपोक होते हैं, जैसे हाथी सिंहकी गर्जना नहीं सह सकते, उसी प्रकार वे वानर तुम्हारा सिंहनाद नहीं सह सकेंगे॥ ९ ॥
‘प्रहस्त! जब वानरसेना भाग जायगी, तब कोई सहारा न रहनेके कारण लक्ष्मणसहित श्रीराम विवश होकर तुम्हारे अधीन हो जायँगे॥ १० ॥
‘युद्धमें मृत्यु संदिग्ध होती है, हो भी सकती है और न भी हो। किंतु ऐसी मृत्यु ही श्रेष्ठ है। (इसके विपरीत) जीवनको बिना संशय (जोखिम)-में डाले (बिना युद्धस्थलके) जो मृत्यु होती है, वह श्रेष्ठ नहीं होती (ऐसा मेरा विचार है)। इसके अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ तुम हमारे लिये हितकर समझते हो, उसे बताओ’॥ ११॥
रावणके ऐसा कहनेपर सेनापति प्रहस्तने उस राक्षसराजके समक्ष उसी तरह अपना विचार व्यक्त किया, जैसे शुक्राचार्य असुरराज बलिको अपनी सलाह दिया करते हैं॥ १२॥
(उसने कहा—) ‘राजन्! हमलोगोंने कुशल मन्त्रियोंके साथ पहले भी इस विषयपर विचार किया है। उन दिनों एक-दूसरेके मतकी आलोचना करके हमलोगोंमें विवाद भी खड़ा हो गया था (हमलोग सर्वसम्मतिसे किसी एक निर्णयपर नहीं पहुँच सके थे)॥ १३॥
‘मेरा पहलेसे ही यह निश्चय रहा है कि सीताजीको लौटा देनेसे ही हमलोगोंका कल्याण होगा और न लौटानेपर युद्ध अवश्य होगा। उस निश्चयके अनुसार ही हमें आज यह युद्धका संकट दिखायी दिया है॥ १४॥
‘परंतु आपने दान, मान और विविध सान्त्वनाओंके द्वारा समय-समयपर सदा ही मेरा सत्कार किया है। फिर मैं आपका हितसाधन क्यों नहीं करूँगा? (अथवा आपके हितके लिये कौन-सा कार्य नहीं कर सकूँगा)॥
‘मुझे अपने जीवन, स्त्री, पुत्र और धन आदिकी रक्षा नहीं करनी है—इनकी रक्षाके लिये मुझे कोई चिन्ता नहीं। आप देखिये कि मैं किस तरह आपके लिये युद्धकी ज्वालामें अपने जीवनकी आहुति देता हूँ’॥ १६॥
अपने स्वामी रावणसे ऐसा कहकर प्रधान सेनापति प्रहस्तने अपने सामने खड़े हुए सेनाध्यक्षोंसे इस प्रकार कहा—॥ १७॥
‘तुमलोग शीघ्र मेरे पास राक्षसोंकी विशाल सेना ले आओ। आज मांसाहारी पक्षी समराङ्गणमें मेरे बाणोंके वेगसे मारे गये वानरोंके मांस खाकर तृप्त हो जायँ’॥
प्रहस्तकी यह बात सुनकर महाबली सेनाध्यक्षोंने रावणके उस महलके पास विशाल सेनाको युद्धके लिये तैयार किया॥ १९ १/२ ॥
दो ही घड़ीमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हाथी-जैसे भयानक राक्षसवीरोंसे लङ्कापुरी भर गयी॥
कितने ही राक्षस घीकी आहुति देकर अग्निदेवको तृप्त करने लगे और ब्राह्मणोंको नमस्कार करके आशीर्वाद लेने लगे। उस समय घीकी गन्ध लेकर सुगन्धित वायु सब ओर बहने लगी॥ २१ १/२ ॥
राक्षसोंने मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित नाना प्रकारकी मालाएँ ग्रहण कीं और हर्ष एवं उत्साहसे युक्त हो युद्धोपयोगी वेश-भूषा धारण की॥ २२ १/२ ॥
धनुष और कवच धारण किये राक्षस वेगसे उछलकर आगे बढ़े और राजा रावणका दर्शन करते हुए प्रहस्तको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये॥ २३ १/२ ॥
तदनन्तर राजाकी आज्ञा ले भयंकर भेरी बजवाकर कवच आदि धारण करके युद्धके लिये उद्यत हुआ प्रहस्त अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित रथपर आरूढ़ हुआ॥ २४ १/२ ॥
प्रहस्तके उस रथमें बड़े वेगशाली घोड़े जुते हुए थे, उसका सारथि भी अपने कार्यमें कुशल था। वह रथ पूर्णतः सारथिके नियन्त्रणमें था। उसके चलनेपर महान् मेघोंकी गर्जनाके समान घर्घर-ध्वनि होती थी। वह रथ साक्षात् चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशमान था॥
सर्पाकार या सर्पचिह्नित ध्वजके कारण वह दुर्धर्ष प्रतीत होता था। उस रथकी रक्षाके लिये जो कवच था, वह बहुत ही सुन्दर दिखायी देता था। उसके सारे अङ्ग सुन्दर थे और उसमें अच्छी-अच्छी सामग्रियाँ रखी गयी थीं। उस रथमें सोनेकी जाली लगी थी। वह अपनी कान्तिसे हँसता-सा प्रतीत होता था (अथवा दूसरे कान्तिमान् पदार्थोंका उपहास-सा कर रहा था)॥ २६ १/२ ॥
उस रथपर बैठकर रावणकी आज्ञा शिरोधार्य करके विशाल सेनासे घिरा हुआ प्रहस्त तुरंत लङ्कासे बाहर निकला॥ २७ १/२ ॥
उसके निकलते ही मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान धौंसा बजने लगा। अन्य रणवाद्योंका निनाद भी पृथ्वीको परिपूर्ण करता-सा प्रतीत होने लगा॥ २८ ॥
सेनापतिके प्रस्थानकालमें शङ्खोंकी ध्वनि भी सुनायी देने लगी। प्रहस्तके आगे चलनेवाले भयानक रूपधारी विशालकाय राक्षस भयंकर स्वरसे गर्जना करते हुए आगे बढ़े॥ २९ १/२ ॥
नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत—ये प्रहस्तके चार सचिव उसे चारों ओरसे घेरकर निकले॥
प्रहस्तकी वह विशाल सेना हाथियोंके समूह-सी अत्यन्त भयंकर जान पड़ती थी। उसकी व्यूह-रचना हो चुकी थी। उस व्यूहबद्ध सेनाके साथ ही प्रहस्त लङ्काके पूर्वद्वारसे निकला॥ ३१ ॥
समुद्रके समान उस अपार सेनाके साथ जब प्रहस्त बाहर निकला, उस समय वह क्रोधसे भरे हुए प्रलय-कालके संहारकारी यमराजके समान जान पड़ता था॥
उसके प्रस्थान करते समय जो भेरी आदि बाजों और गर्जते हुए राक्षसोंका गम्भीर घोष हुआ, उससे भयभीत हो लङ्काके सब प्राणी विकृत स्वरमें चीत्कार करने लगे॥ ३३ ॥
उस समय बिना बादलके आकाशमें उड़कर रक्त-मांसका भोजन करनेवाले पक्षी मण्डल बनाकर प्रहस्तके रथकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करने लगे॥ ३४ ॥
भयानक गीदड़ियाँ मुँहसे आगकी ज्वाला उगलती हुई अशुभसूचक बोली बोलने लगीं। आकाशसे उल्कापात होने लगा और प्रचण्ड वायु चलने लगी॥ ३५ ॥
ग्रह रोषपूर्वक आपसमें युद्ध करने लगे, जिससे उनका प्रकाश मन्द पड़ गया तथा मेघ उस राक्षसके रथके ऊपर गधोंकी-सी आवाजमें गर्जना करने लगे, रक्त बरसाने लगे और आगे चलनेवाले सैनिकोंको खींचने लगे। उसके ध्वजके ऊपर गीध दक्षिणकी ओर मुँह करके आ बैठा। उसने दोनों ओर अपनी अशुभ बोली बोलकर उस राक्षसकी सारी शोभा-सम्पत्ति हर ली॥ ३६-३७ १/२ ॥
संग्रामभूमिमें प्रवेश करते समय घोड़ेको काबूमें रखनेवाले उसके सारथिके हाथसे कई बार चाबुक गिर पड़ा॥ ३८ १/२ ॥
युद्धके लिये निकलते समय प्रहस्तकी जो परम दुर्लभ और प्रकाशमान शोभा थी, वह दो ही घड़ीमें नष्ट हो गयी। उसके घोड़े समतल भूमिमें भी लड़खड़ाकर गिर पड़े॥ ३९ १/२ ॥
जिसके गुण और पौरुष विख्यात थे, वह प्रहस्त ज्यों ही युद्धभूमिमें उपस्थित हुआ, त्यों ही शिला, वृक्ष आदि नाना प्रकारके प्रहार-साधनोंसे सम्पन्न वानरसेना उसका सामना करनेके लिये आ गयी॥ ४० ॥
तदनन्तर वृक्षोंको तोड़ते और भारी शिलाओंको उठाते हुए वानरोंका अत्यन्त भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर छा गया॥ ४१ ॥
एक ओर राक्षस सिंहनाद कर रहे थे तो दूसरी ओर वानर गरज रहे थे। उन सबका तुमुल नाद वहाँ फैल गया। राक्षसों और वानरोंकी वे दोनों सेनाएँ हर्ष और उल्लाससे भरी थीं॥ ४२ ॥
अत्यन्त वेगशाली, समर्थ तथा एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले योद्धा परस्पर ललकार रहे थे। उनका महान् कोलाहल सबको सुनायी देता था॥ ४३ ॥
इसी समय दुर्बुद्धि प्रहस्त विजयकी अभिलाषासे वानरराज सुग्रीवकी सेनाकी ओर बढ़ा और जैसे पतंग मरनेके लिये आगपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार वह बढ़े हुए वेगवाली उस वानरसेनामें घुसनेकी चेष्टा करने लगा॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७ ॥
अट्ठावनवाँ सर्ग
अट्ठावनवाँ सर्ग
नीलके द्वारा प्रहस्तका वध
(इसके पूर्व) प्रहस्तको युद्धकी तैयारी करके लङ्कासे बाहर निकलते देख शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे मुसकराकर कहा— ॥ १ ॥
‘महाबाहो! यह बड़े शरीर और महान् वेगवाला तथा बड़ी भारी सेनासे घिरा हुआ कौन योद्धा आ रहा है? इसका रूप, बल और पौरुष कैसा है? इस पराक्रमी निशाचरका मुझे परिचय दो’॥ २ १/२ ॥
श्रीरघुनाथजीका वचन सुनकर विभीषणने इस प्रकार उत्तर दिया— ‘प्रभो! इस राक्षसका नाम प्रहस्त है। यह राक्षसराज रावणका सेनापति है और लङ्काकी एक तिहाई सेनासे घिरा हुआ है। इसका पराक्रम भलीभाँति विख्यात है। यह नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता, बल-विक्रमसे सम्पन्न और शूरवीर है’॥ ३-४ ॥
इसी समय महाबलवान् वानरोंकी विशाल सेनाने भी भयानक पराक्रमी, भीषण रूपधारी तथा महाकाय प्रहस्तको बड़े गर्जन-तर्जनके साथ लङ्कासे बाहर निकलते देखा। वह बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ था। उसे देखते ही वानरोंके दलमें भी महान् कोलाहल होने लगा और वे प्रहस्तकी ओर देख-देखकर गर्जने लगे॥
विजयकी इच्छावाले राक्षस वानरोंकी ओर दौड़े। उनके हाथोंमें खड्ग, शक्ति, ऋष्टि, शूल, बाण, मूसल, गदा, परिघ, प्रास, नाना प्रकारके फरसे और विचित्रविचित्र धनुष शोभा पा रहे थे॥ ७-८ ॥
तब वानरोंने भी युद्धकी इच्छासे खिले हुए वृक्ष, पर्वत तथा बड़े-बड़े पत्थर उठा लिये॥ ९ ॥
फिर दोनों पक्षोंके बहुसंख्यक वीरोंमें पत्थरों और बाणोंकी वर्षाके साथ-साथ आपसमें बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया॥ १० ॥
उस युद्धस्थलमें बहुत-से राक्षसोंने बहुतेरे वानरोंका और बहुसंख्यक वानरोंने बहुत-से राक्षसोंका संहार कर डाला॥ ११ ॥
वानरोंमेंसे कोई शूलोंसे और कोई चक्रोंसे मथ डाले गये। कितने ही परिघोंकी मारसे आहत हो गये और कितनोंके फरसोंसे टुकड़े-टुकड़े कर डाले गये॥
कितने ही योद्धा साँसरहित हो पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही बाणोंके लक्ष्य बन गये, जिससे उनके हृदय विदीर्ण हो गये॥ १३ ॥
कितने ही वानर तलवारोंकी मारसे दो टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और तड़फड़ाने लगे। कितने ही शूरवीर राक्षसोंने वानरोंकी पसलियाँ फाड़ डालीं॥ १४ ॥
इसी तरह वानरोंने भी अत्यन्त कुपित हो वृक्षों और पर्वत-शिखरोंद्वारा सब ओर भूतलपर झुंड-के-झुंड राक्षसोंको पीस डाला॥ १५ ॥
वानरोंके वज्रतुल्य कठोर थप्पड़ों और मुक्कोंसे भलीभाँति पीटे गये राक्षस मुँहसे रक्त वमन करने लगे। उनके दाँत और नेत्र छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये॥ १६ ॥
कोई आर्तनाद करते तो कोई सिंहोंके समान दहाड़ते थे। इस प्रकार वानरों और राक्षसोंका भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर गूँज उठा॥ १७ ॥
क्रोधसे भरे हुए वानर और राक्षस वीरोचित मार्गका अनुसरण करके युद्धमें पीठ नहीं दिखाते थे। वे मुँह बा-बाकर निर्भयके समान क्रूरतापूर्ण कर्म करते थे॥ १८ ॥
नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत—ये प्रहस्तके सारे सचिव वानरोंका वध करने लगे॥ १९ ॥
शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करते और वानरोंको मारते हुए प्रहस्तके सचिवोंमेंसे एकको, जिसका नाम नरान्तक था, द्विविदने एक पर्वतके शिखरसे मार डाला॥ २० ॥
फिर दुर्मुखने एक विशाल वृक्ष लिये उठकर शीघ्रता-पूर्वक हाथ चलानेवाले राक्षस समुन्नतको कुचल डाला॥ २१ ॥
तत्पश्चात् अत्यन्त कुपित हुए तेजस्वी जाम्बवान्ने एक बड़ी भारी शिला उठा ली और उसे महानादकी छातीपर दे मारा॥ २२ ॥
बाकी रहा पराक्रमी कुम्भहनु। वह तार नामक वानरसे भिड़ा और अन्तमें एक विशाल वृक्षकी चपेटमें आकर उसे भी रणभूमिमें अपने प्राणोंसे हाथ धोने पड़े॥
रथपर बैठे हुए प्रहस्तसे वानरोंका यह अद्भुत पराक्रम नहीं सहा गया। उसने हाथमें धनुष लेकर वानरोंका घोर संहार आरम्भ किया॥ २४ ॥
उस समय दोनों सेनाएँ जलके भँवरकी भाँति चक्कर काट रही थीं। विक्षुब्ध अपार महासागरकी गर्जनाके समान उनकी गर्जना सुनायी दे रही थी॥ २५ ॥
अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए रणदुर्मद राक्षस प्रहस्तने अपने बाण-समूहोंद्वारा उस महासमरमें वानरोंको पीड़ित करना आरम्भ किया॥ २६ ॥
पृथ्वीपर वानरों और राक्षसोंकी लाशोंके ढेर लग गये। उनसे आच्छादित हुई रणभूमि भयानक पर्वतोंसे ढकी हुई-सी जान पड़ती थी॥ २७ ॥
रक्तके प्रवाहसे आच्छादित हुई वह युद्धभूमि वैशाख-मासमें खिले हुए पलाश-वृक्षोंसे ढकी हुई वन्य भूमि-सी सुशोभित होती थी॥ २८ ॥
मारे गये वीरोंकी लाशें ही जिसके दोनों तट थे। रक्तका प्रवाह ही जिसकी महान् जलराशि थी। टूटे-फूटे अस्त्र-शस्त्र ही जिसके तटवर्ती विशाल वृक्षोंके समान जान पड़ते थे। जो यमलोकरूपी समुद्रसे मिली हुई थी। सैनिकोंके यकृत् और प्लीहा (हृदयके दाहिने और बायें भाग) जिसके महान् पंक थे। निकली हुई आँतें जहाँ सेवारका काम देती थीं। कटे हुए सिर और धड़ जहाँ मत्स्य-से प्रतीत होते थे। शरीरके छोटे-छोटे अवयव एवं केश जिसमें घासका भ्रम उत्पन्न करते थे। जहाँ गीध ही हंस बनकर बैठे थे। कङ्करूपी सारस जिसका सेवन करते थे। मेदे ही फेन बनकर जहाँ सब ओर फैले थे। पीड़ितोंकी कराह जिसकी कलकल ध्वनि थी और कायरोंके लिये जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था, उस युद्धभूमिरूपिणी नदीको प्रवाहित करके राक्षस और श्रेष्ठ वानर वर्षाके अन्तमें हंसों और सारसोंसे सेवित सरिताकी भाँति उस दुस्तर नदीको उसी तरह पार कर रहे थे, जैसे गजयूथपति कमलोंके परागसे आच्छादित किसी पुष्करिणीको पार करते हैं॥ २९—३३ ॥
तदनन्तर नीलने देखा, रथपर बैठा हुआ प्रहस्त बाणसमूहोंकी वर्षा करके वेगपूर्वक वानरोंका संहार कर रहा है॥ ३४ ॥
तब जैसे उठी हुई प्रचण्ड वायु आकाशमें महान् मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न करके उड़ा देती है, उसी प्रकार नील भी बलपूर्वक राक्षस-सेनाका संहार करने लगे। इससे उस युद्धस्थलमें राक्षसी-सेना भाग खड़ी हुई। सेनापति प्रहस्तने जब अपनी सेनाकी ऐसी दुरवस्था देखी, तब उसने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा नीलपर ही धावा किया॥ ३५ १/२ ॥
धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और निशाचरोंकी सेनाके नायक प्रहस्तने उस महासमरमें अपने धनुषको खींचकर नीलपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ३६ १/२ ॥
रोषसे भरे हुए सर्पोंके समान वे महान् वेगशाली बाण नीलतक पहुँचकर उन्हें विदीर्ण करके बड़ी सावधानीके साथ धरतीमें समा गये॥ ३७ १/२ ॥
प्रहस्तके पैने बाण प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ते थे। उनकी चोटसे नील बहुत घायल हो गये। इस तरह उस परम दुर्जय राक्षस प्रहस्तको अपने ऊपर आक्रमण करते देख बल-विक्रमशाली महाकपि नीलने एक वृक्ष उखाड़कर उसीके द्वारा उसपर आघात किया॥
नीलकी चोट खाकर कुपित हुआ राक्षसशिरोमणि प्रहस्त बड़े जोरसे गर्जता हुआ उन वानर-सेनापतिपर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ४० ॥
उस दुरात्मा राक्षसके बाण-समूहोंका निवारण करनेमें समर्थ न हो सकनेपर नील आँख बंद करके उन सब बाणोंको अपने अंगोंपर ही ग्रहण करने लगे। जैसे साँड़ सहसा आयी हुई शरद्-ऋतुकी वर्षाको चुपचाप अपने शरीरपर ही सह लेता है, उसी प्रकार प्रहस्तकी उस दुःसह बाणवर्षाको नील चुपचाप नेत्र बंद करके सहन करते रहे॥ ४१-४२ ॥
प्रहस्तकी बाणवर्षासे कुपित हो महाबली महाकपि नीलने एक विशाल सालवृक्षके द्वारा उसके घोड़ोंको मार डाला॥ ४३ ॥
तत्पश्चात् रोषसे भरे हुए नीलने उस दुरात्माके धनुषको भी वेगपूर्वक तोड़ दिया और बारंबार वे गर्जना करने लगे॥ ४४ ॥
नीलके द्वारा धनुषरहित किया गया सेनापति प्रहस्त एक भयानक मूसल हाथमें लेकर अपने रथसे कूद पड़ा॥ ४५ ॥
वे दोनों वीर अपनी-अपनी सेनाके प्रधान थे। दोनों ही एक-दूसरेके वैरी और वेगशाली थे। वे मदकी धारा बहानेवाले दो गजराजोंके समान खूनसे नहा उठे थे॥ ४६ ॥
दोनों ही अपनी तीखी दाढ़ोंसे काट-काटकर एक-दूसरेके अंगोंको घायल किये देते थे। वे दोनों सिंह और बाघके समान शक्तिशाली और उन्हींके समान विजयके लिये सचेष्ट थे॥ ४७ ॥
दोनों वीर पराक्रमी, विजयी और युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले थे तथा वृत्रासुर और इन्द्रके समान युद्धमें यश पानेकी अभिलाषा रखते थे॥ ४८ ॥
उस समय परम उद्योगी प्रहस्तने नीलके ललाटमें मूसलसे आघात किया। इससे उनके ललाटसे रक्तकी धारा बह चली॥ ४९ ॥
उनके सारे अंग रक्तसे भीग गये। तब क्रोधसे भरे हुए महाकपि नीलने एक विशाल वृक्ष उठाकर प्रहस्तकी छातीपर दे मारा॥ ५० ॥
उस प्रहारकी कोई परवा न करके प्रहस्त महान् मूसल हाथमें लिये बलवान् वानर नीलकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा॥ ५१ ॥
उस भयंकर वेगशाली राक्षसको रोषसे भरकर आक्रमण करते देख महान् वेगशाली महाकपि नीलने एक बड़ी भारी शिला हाथमें ले ली॥ ५२ ॥
उस शिलाको नीलने रणभूमिमें संग्रामकी इच्छावाले मूसलयोधी निशाचर प्रहस्तके मस्तकपर तत्काल दे मारा॥ ५३ ॥
कपिप्रवर नीलके द्वारा चलायी गयी उस भयंकर एवं विशाल शिलाने प्रहस्तके मस्तकको कुचलकर उसके कई टुकड़े कर डाले॥ ५४ ॥
उसके प्राण-पखेरु उड़ गये। उसकी कान्ति, उसका बल और उसकी सारी इन्द्रियाँ भी चली गयीं। वह राक्षस जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५५ ॥
उसके छिन्न-भिन्न हुए मस्तकसे और शरीरसे भी बहुत खून गिरने लगा, मानो पर्वतसे पानीका झरना झर रहा हो॥ ५६ ॥
नीलके द्वारा प्रहस्तके मारे जानेपर दुःखी हुए राक्षसोंकी वह अकम्पनीय विशाल सेना लंकाको लौट गयी॥ ५७ ॥
सेनापतिके मारे जानेपर वह सेना ठहर न सकी। जैसे बाँध टूट जानेपर नदीका पानी रुक नहीं पाता॥
सेनानायकके मारे जानेसे वे सारे राक्षस अपना युद्धविषयक उत्साह खो बैठे और राक्षसराज रावणके भवनमें जाकर चिन्ताके कारण चुपचाप खड़े हो गये। तीव्र शोक-समुद्रमें डूब जानेके कारण वे सब-के-सब अचेत-से हो गये थे॥ ५९-६० ॥
तदनन्तर विजयी सेनापति महाबली नील अपने इस महान् कर्मके कारण प्रशंसित होते हुए श्रीराम और लक्ष्मणसे आकर मिले और बड़े हर्षका अनुभव करने लगे॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८ ॥
उनसठवाँ सर्ग
उनसठवाँ सर्ग
प्रहस्तके मारे जानेसे दुःखी हुए रावणका स्वयं ही युद्धके लिये पधारना, उसके साथ आये हुए मुख्य वीरोंका परिचय, रावणकी मारसे सुग्रीवका अचेत होना, लक्ष्मणका युद्धमें आना, हनुमान् और रावणमें थप्पड़ोंकी मार, रावणद्वारा नीलका मूर्च्छित होना, लक्ष्मणका शक्तिके आघातसे मूर्च्छित एवं सचेत होना तथा श्रीरामसे परास्त होकर रावणका लङ्कामें घुस जाना
वानरश्रेष्ठ नीलके द्वारा युद्धस्थलमें उस राक्षस-सेनापति प्रहस्तके मारे जानेपर समुद्रके समान वेगशालिनी और भयानक आयुधोंसे युक्त वह राक्षसराजकी सेना भाग चली॥ १ ॥
राक्षसोंने निशाचरराज रावणके पास जाकर अग्निपुत्र नीलके हाथसे प्रहस्तके मारे जानेका समाचार सुनाया। उनकी वह बात सुनकर राक्षसराज रावणको बड़ा क्रोध हुआ॥ २ ॥
‘युद्धस्थलमें प्रहस्त मारा गया’ यह सुनते ही वह क्रोधसे तमतमा उठा; किंतु थोड़ी ही देरमें उसका चित्त उसके लिये शोकसे व्याकुल हो गया। अतः वह मुख्य-मुख्य देवताओंसे बातचीत करनेवाले इन्द्रकी भाँति राक्षससेनाके मुख्य अधिकारियोंसे बोला—॥ ३ ॥
‘शत्रुओंको नगण्य समझकर उनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। मैं जिन्हें बहुत छोटा समझता था, उन्हीं शत्रुओंने मेरे उस सेनापतिको सेवकों और हाथियोंसहित मार गिराया, जो इन्द्रकी सेनाका भी संहार करनेमें समर्थ था॥ ४ ॥
‘अब मैं शत्रुओंके संहार और अपनी विजयके लिये बिना कोऽइ विचार किये स्वयं ही उस अद्भुत युद्धके मुहानेपर जाऊँगा॥ ५ ॥
‘जैसे प्रज्वलित आग वनको जला देती है, उसी तरह आज अपने बाणसमूहोंसे वानरोंकी सेना तथा लक्ष्मणसहित श्रीरामको मैं भस्म कर डालूँगा। आज वानरोंके रक्तसे मैं इस पृथ्वीको तृप्त करूँगा’॥ ६ ॥
ऐसा कहकर वह देवराजका शत्रु रावण अग्निके समान प्रकाशमान रथपर सवार हुआ। उसके रथमें उत्तम घोड़ोंके समूह जुते हुए थे। वह अपने शरीरसे भी प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रहा था॥ ७ ॥
उसके प्रस्थान करते समय शङ्ख, भेरी और पणव आदि बाजे बजने लगे। योद्धालोग ताल ठोकने, गर्जने और सिंहनाद करने लगे। वन्दीजन पवित्र स्तुतियोंद्वारा राक्षसराज शिरोमणि रावणकी भलीभाँति समाराधना करने लगे। इस प्रकार उसने यात्रा की॥ ८ ॥
पर्वत और मेघोंके समान काले एवं विशाल रूपवाले मांसाहारी राक्षसोंसे, जिनके नेत्र प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे, घिरा हुआ राक्षस-राजाधिराज रावण भूतगणोंसे घिरे हुए देवेश्वर रुद्रके समान शोभा पाता था॥ ९ ॥
महातेजस्वी रावणने लङ्कापुरीसे सहसा निकलकर महासागर और मेघोंके समान गर्जना करनेवाली उस भयंकर वानर-सेनाको देखा, जो हाथोंमें पर्वत-शिखर एवं वृक्ष लिये युद्धके लिये तैयार थी॥ १० ॥
उस अत्यन्त प्रचण्ड राक्षससेनाको देखकर नागराज शेषके समान भुजावाले, वानर-सेनासे घिरे हुए तथा पुष्ट शोभा-सम्पत्तिसे युक्त श्रीरामचन्द्रजीने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विभीषणसे पूछा—॥ ११ ॥
‘जो नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाओं और छत्रोंसे सुशोभित, प्रास, खड्ग और शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न, अजेय, निडर योद्धाओंसे सेवित और महेन्द्रपर्वत-जैसे विशालकाय हाथियोंसे भरी हुई है, ऐसी यह सेना किसकी है?’॥ १२ ॥
इन्द्रके समान बलशाली विभीषण श्रीरामकी उपर्युक्त बात सुनकर महामना राक्षसशिरोमणियोंके बल एवं सैनिकशक्तिका परिचय देते हुए उनसे बोले—॥ १३ ॥
‘राजन्! यह जो महामनस्वी वीर हाथीकी पीठपर बैठा है, जिसका मुख नवोदित सूर्यके समान लाल रंगका है तथा जो अपने भारसे हाथीके मस्तकमें कम्पन उत्पन्न करता हुआ इधर आ रहा है, इसे आप अकम्पन* समझें॥ १४ ॥
‘वह जो रथपर चढ़ा हुआ है, जिसकी ध्वजापर सिंहका चिह्न है, जिसके दाँत हाथीके समान उग्र और बाहर निकले हुए हैं तथा जो इन्द्रधनुषके समान कान्तिमान् धनुष हिलाता हुआ आ रहा है, उसका नाम इन्द्रजित् है। वह वरदानके प्रभावसे बड़ा प्रबल हो गया है॥ १५ ॥
‘यह जो विन्ध्याचल, अस्ताचल और महेन्द्रगिरिके समान विशालकाय, अतिरथी एवं अतिशय वीर धनुष लिये रथपर बैठा है तथा अपने अनुपम धनुषको बारंबार खींच रहा है, इसका नाम अतिकाय है। इसकी काया बहुत बड़ी है॥ १६ ॥
‘जिसके नेत्र प्रातःकाल उदित हुए सूर्यके समान लाल हैं तथा जिसकी आवाज घण्टाकी ध्वनिसे भी उत्कृष्ट है, ऐसे क्रूर स्वभाववाले गजराजपर आरूढ़ होकर जो जोर-जोरसे गर्जना कर रहा है, वह महामनस्वी वीर महोदर नामसे प्रसिद्ध है॥ १७ ॥
‘जो सायंकालीन मेघसे युक्त पर्वतकी-सी आभावाले और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित घोड़ेपर चढ़कर चमकीले प्रास (भाले)-को हाथमें लिये इधर आ रहा है, इसका नाम पिशाच है। यह वज्रके समान वेगशाली योद्धा है॥ १८ ॥
‘जिसने वज्रके वेगको भी अपना दास बना लिया है और जिससे बिजलीकी-सी प्रभा छिटकती रहती है, ऐसे तीखे त्रिशूलको हाथमें लिये जो यह चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिवाले साँड़पर चढ़कर युद्धभूमिमें आ रहा है, यह यशस्वी वीर त्रिशिरा¹ है॥ १९ ॥
‘जिसका रूप मेघके समान काला है, जिसकी छाती उभरी हुई, चौड़ी और सुन्दर है, जिसकी ध्वजापर नागराज वासुकि का चिह्न बना हुआ है तथा जो एकाग्रचित्त हो अपने धनुषको हिलाता और खींचता आ रहा है, वह कुम्भ नामक योद्धा है॥ २० ॥
‘जो सुवर्ण और वज्रसे जटित होनेके कारण दीप्तिमान् तथा इन्द्रनीलमणिसे मण्डित होनेके कारण धूमयुक्त अग्नि-सा प्रकाशित होता है, ऐसे परिघको हाथमें लेकर जो राक्षससेनाकी ध्वजाके समान आ रहा है, उसका नाम निकुम्भ है। उसका पराक्रम घोर एवं अद्भुत है॥ २१ ॥
‘यह जो धनुष, खड्ग और बाणसमूहसे भरे हुए, ध्वजा-पताकासे अलंकृत तथा प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान रथपर आरूढ़ हो अतिशय शोभा पा रहा है, वह ऊँचे कदका योद्धा नरान्तक² है। वह पहाड़ोंकी चोटियोंसे युद्ध करता है॥ २२ ॥
‘यह जो व्याघ्र, ऊँट, हाथी, हिरन और घोड़ेके-से मुँहवाले, चढ़ी हुई आँखवाले तथा अनेक प्रकारके भयंकर रूपवाले भूतोंसे घिरा हुआ है, जो देवताओंका भी दर्प दलन करनेवाला है तथा जिसके ऊपर पूर्ण चन्द्रमाके समान श्वेत एवं पतली कमानीवाला सुन्दर छत्र शोभा पाता है, वही यह राक्षसराज महामना रावण है, जो भूतोंसे घिरे हुए रुद्रदेवके समान सुशोभित होता है॥ २३-२४ ॥
‘यह सिरपर मुकुट धारण किये है। इसका मुख कानोंमें हिलते हुए कुण्डलोंसे अलंकृत है। इसका शरीर गिरिराज हिमालय और विन्ध्याचलके समान विशाल एवं भयंकर है तथा यह इन्द्र और यमराजके भी घमंडको चूर करनेवाला है। देखिये, यह राक्षसराज साक्षात् सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है’॥ २५ ॥
तब शत्रुदमन श्रीरामने विभीषणको इस प्रकार उत्तर दिया—‘अहो! राक्षसराज रावणका तेज तो बहुत ही बढ़ा-चढ़ा और देदीप्यमान है॥ २६ ॥
‘रावण अपनी प्रभासे सूर्यकी ही भाँति ऐसी शोभा पा रहा है कि इसकी ओर देखना कठिन हो रहा है। तेजोमण्डलसे व्याप्त होनेके कारण इसका रूप मुझे स्पष्ट नहीं दिखायी देता॥ २७ ॥
‘इस राक्षसराजका शरीर जैसा सुशोभित हो रहा है, ऐसा तो देवता और दानव वीरोंका भी नहीं होगा॥
‘इस महाकाय राक्षसके सभी योद्धा पर्वतोंके समान विशाल हैं। सभी पर्वतोंसे युद्ध करनेवाले हैं और सब-के-सब चमकीले अस्त्र-शस्त्र लिये हुए हैं॥ २९ ॥
‘जो दीप्तिमान्, भयंकर दिखायी देनेवाले और तीखे स्वभाववाले हैं, उन राक्षसोंसे घिरा हुआ यह राक्षसराज रावण देहधारी भूतोंसे घिरे हुए यमराजके समान जान पड़ता है॥ ३० ॥
‘सौभाग्यकी बात है कि यह पापात्मा मेरी आँखोंके सामने आ गया। सीताहरणके कारण मेरे मनमें जो क्रोध संचित हुआ है, उसे आज इसके ऊपर छोड़ूँगा’॥ ३१ ॥
ऐसा कहकर बल-विक्रमशाली श्रीराम धनुष लेकर उत्तम बाण निकालकर युद्धके लिये डट गये। इस कार्यमें लक्ष्मणने भी उनका साथ दिया॥ ३२ ॥
तदनन्तर महामना राक्षसराज रावणने अपने साथ आये हुए उन महाबली राक्षसोंसे कहा—‘तुमलोग निर्भय और सुप्रसन्न होकर नगरके द्वारों तथा राजमार्गके मकानोंकी ड्योढ़ियोंपर खड़े हो जाओ॥ ३३ ॥
‘क्योंकि वानरलोग मेरे साथ तुम सबको यहाँ आया देख इसे अपने लिये अच्छा मौका समझकर सहसा एकत्र हो मेरी सूनी नगरीमें, जिसके भीतर प्रवेश होना दूसरोंके लिये बहुत कठिन है, घुस जायँगे और इसे मथकर चौपट कर डालेंगे’॥ ३४ ॥
इस प्रकार जब अपने मन्त्रियोंको विदा कर दिया और वे राक्षस उसकी आज्ञाके अनुसार उन-उन स्थानोंपर चले गये, तब रावण जैसे महामत्स्य (तिमिङ्गिल) पूरे महासागरको विक्षुब्ध कर देता है, उसी प्रकार समुद्र-जैसी वानरसेनाको विदीर्ण करने लगा॥ ३५ ॥
चमकीले धनुष-बाण लिये राक्षसराज रावणको युद्धस्थलमें सहसा आया देख वानरराज सुग्रीवने एक बड़ा भारी पर्वत-शिखर उखाड़ लिया और उसे लेकर उस निशाचरराजपर आक्रमण किया॥ ३६ ॥
अनेक वृक्षों और शिखरोंसे युक्त उस महान् शैल-शिखरको सुग्रीवने रावणपर दे मारा। उस शिखरको अपने ऊपर आता देख रावणने सहसा सुवर्णमय पंखवाले बहुत-से बाण मारकर
उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥
उत्तम वृक्ष और शिखरवाला वह महान् शैलशृङ्ग जब विदीर्ण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब राक्षसलोकके स्वामी रावणने महान् सर्प और यमराजके समान एक भयंकर बाणका संधान किया॥ ३८ ॥
उस बाणका वेग वायुके समान था। उससे चिनगारियाँ छूटती थीं और प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाश फैलता था। इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर वेगवाले उस बाणको रावणने रुष्ट होकर सुग्रीवके वधके लिये चलाया॥ ३९ ॥
रावणके हाथोंसे छूटे हुए उस सायकने इन्द्रके वज्रकी भाँति कान्तिमान् शरीरवाले सुग्रीवके पास पहुँचकर उसी तरह वेगपूर्वक उन्हें घायल कर दिया, जैसे स्वामी कार्तिकेयकी चलायी हुई भयानक शक्तिने क्रौञ्चपर्वतको विदीर्ण कर डाला था॥ ४० ॥
उस बाणकी चोटसे वीर सुग्रीव अचेत हो गये और आर्तनाद करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े। सुग्रीवको बेहोश हो घूमकर गिरा देख उस युद्धस्थलमें आये हुए सब राक्षस बड़े हर्षके साथ सिंहनाद करने लगे॥ ४१ ॥
तब गवाक्ष, गवय, सुषेन, ऋषभ, ज्योतिर्मुख और नल—ये विशालकाय वानर पर्वतशिखरोंको उखाड़कर राक्षसराज रावणपर टूट पड़े॥ ४२ ॥
परंतु निशाचरोंके राजा रावणने सैकड़ों तीखे बाण छोड़कर उन सबके प्रहारोंको व्यर्थ कर दिया और उन वानरेश्वरोंको भी सोनेके विचित्र पंखवाले बाण-समूहोंद्वारा क्षत-विक्षत कर दिया। देवद्रोही रावणके बाणोंसे घायल हो वे भीमकाय वानरेन्द्रगण धरतीपर गिर पड़े॥ ४३ १/२ ॥
फिर तो रावणने अपने बाण-समूहोंद्वारा उस भयंकर वानरसेनाको आच्छादित कर दिया। रावणके बाणोंसे पीड़ित और डरे हुए वीर वानर उसकी मार खा-खाकर जोर-जोरसे चीत्कार करते हुए धराशायी होने लगे॥
रावणके सायकोंसे पीड़ित हो बहुत-से वानर शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामकी शरणमें गये। तब धनुर्धर महात्मा श्रीराम सहसा धनुष लेकर आगे बढ़े। उसी समय लक्ष्मणजीने उनके सामने आकर हाथ जोड़ उनसे ये यथार्थ वचन कहे— ॥ ४५-४६ ॥
‘आर्य! इस दुरात्माका वध करनेके लिये तो मैं ही पर्याप्त हूँ। प्रभो! आप मुझे आज्ञा दीजिये। मैं इसका नाश करूँगा’॥ ४७ ॥
उनकी बात सुनकर महातेजस्वी सत्यपराक्रमी श्रीरामने कहा— 'अच्छा लक्ष्मण! जाओ। किंतु संग्राममें विजय पानेके लिये पूर्ण प्रयत्नशील रहना'॥ ४८॥
'क्योंकि रावण महान् बल-विक्रमसे सम्पन्न है। यह युद्धमें अद्भुत पराक्रम दिखाता है। रावण यदि अधिक कुपित होकर युद्ध करने लगे तो तीनों लोकोंके लिये इसके वेगको सहन करना कठिन हो जायगा'॥ ४९॥
'तुम युद्धमें रावणके छिद्र देखना। उसकी कमजोरियोंसे लाभ उठाना और अपने छिद्रोंपर भी दृष्टि रखना (कहीं शत्रु उनसे लाभ न उठाने पाये)। एकाग्रचित्त हो पूरी सावधानीके साथ अपनी दृष्टि और धनुषसे भी आत्मरक्षा करना'॥ ५०॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण उनके हृदयसे लग गये और श्रीरामका पूजन एवं अभिवादन करके वे युद्धके लिये चल दिये॥ ५१॥
उन्होंने देखा, रावणकी भुजाएँ हाथीके शुण्ड-दण्डके समान हैं। उसने बड़ा भयंकर एवं दीप्तिमान् धनुष उठा रखा है और बाण-समूहोंकी वर्षा करके वानरोंको ढकता तथा उनके शरीरोंको छिन्न-भिन्न किये डालता है॥ ५२॥
रावणको इस प्रकार पराक्रम करते देख महातेजस्वी पवनपुत्र हनुमान्जी उसके बाण-समूहोंका निवारण करते हुए उसकी ओर दौड़े॥ ५३॥
उसके रथके पास पहुँचकर अपना दायाँ हाथ उठा बुद्धिमान् हनुमान्ने रावणको भयभीत करते हुए कहा—॥
'निशाचर! तुमने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसोंसे न मारे जानेका वर प्राप्त कर लिया है; परंतु वानरोंसे तो तुम्हें भय है ही॥ ५५॥
'देखो, पाँच अँगुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ उठा हुआ है। तुम्हारे शरीरमें चिरकालसे जो जीवात्मा निवास करता है, उसे आज यह इस देहसे अलग कर देगा'॥ ५६॥
हनुमान्जीका यह वचन सुनकर भयानक पराक्रमी रावणके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे और उसने रोषपूर्वक कहा—॥ ५७॥
'वानर! तुम निःशङ्क होकर शीघ्र मेरे ऊपर प्रहार करो और सुस्थिर यश प्राप्त कर लो। तुममें कितना पराक्रम है, यह जान लेनेपर ही मैं तुम्हारा नाश करूँगा'॥
रावणकी बात सुनकर पवनपुत्र हनुमान्जी बोले—‘मैंने तो पहले ही तुम्हारे पुत्र अक्षको मार डाला है। इस बातको याद तो करो’॥ ५९ ॥
उनके इतना कहते ही बल-विक्रमसम्पन्न महातेजस्वी राक्षसराज रावणने उन पवनकुमारकी छातीमें एक तमाचा जड़ दिया॥ ६० ॥
उस थप्पड़की चोटसे हनुमान्जी बारंबार इधर-उधर चक्कर काटने लगे; परंतु वे बड़े बुद्धिमान् और तेजस्वी थे, अतः दो ही घड़ीमें अपनेको सुस्थिर करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने भी अत्यन्त कुपित होकर उस देवद्रोहीको थप्पड़से ही मारा॥ ६१ १/२ ॥
उन महात्मा वानरके थप्पड़की मार खाकर दशमुख रावण उसी तरह काँप उठा, जैसे भूकम्प आनेपर पर्वत हिलने लगता है॥ ६२ १/२ ॥
संग्रामभूमिमें रावणको थप्पड़ खाते देख ऋषि, वानर, सिद्ध, देवता और असुर सभी हर्षध्वनि करने लगे॥ ६३ १/२ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी रावणने सँभलकर कहा— ‘शाबाश वानर! शाबाश, तुम पराक्रमकी दृष्टिसे मेरे प्रशंसनीय प्रतिद्वन्द्वी हो’॥ ६४ १/२ ॥
रावणके ऐसा कहनेपर पवनकुमार हनुमान्ने कहा—‘रावण! तू अब भी जीवित है, इसलिये मेरे पराक्रमको धिक्कार है!॥ ६५ १/२ ॥
‘दुर्बुद्धे! अब तुम एक बार और मुझपर प्रहार करो। बढ़-बढ़कर बातें क्यों बना रहे हो। तुम्हारे प्रहारके पश्चात् जब मेरा मुक्का पड़ेगा, तब वह तुम्हें तत्काल यमलोक पहुँचा देगा’॥ ६६ १/२ ॥
हनुमान्जीकी इस बातसे रावणका क्रोध प्रज्वलित हो उठा। उसकी आँखें लाल हो गयीं। उस पराक्रमी राक्षसने बड़े यत्नसे दाहिना मुक्का तानकर हनुमान्जीकी छातीमें वेगपूर्वक प्रहार किया॥ ६७-६८ ॥
छातीमें चोट लगनेपर हनुमान्जी पुनः विचलित हो उठे। महाबली हनुमान्जीको उस समय विह्वल देख अतिरथी रावण रथके द्वारा शीघ्र ही नीलपर जा चढ़ा॥
राक्षसोंके राजा प्रतापी दशग्रीवने शत्रुओंके मर्मको विदीर्ण करनेवाले सर्पतुल्य भयंकर बाणोंद्वारा वानर-सेनापति नीलको संताप देना आरम्भ किया॥ ७०-७१ ॥