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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

१४२ शुक्रनीतिः

न बालं न स्त्रियं चातिलालयेत्ताडयेन्न च ॥ ९८ ॥
विद्याभ्यासे गृहकृत्ये तावुभौ योजयेत्क्रमात् ।
नष्टवस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश— जो वस्तु नष्ट हो गई हो उसकी उपेक्षा कर दे और जो उपस्थित हुई हो उसे ग्रहण करे। तथा बालक या स्त्री का अत्यन्त लाड-प्यार करना या अधिक ताडन करना उचित नहीं है। बल्कि उन (बालक तथा स्त्री) को क्रम से विद्याभ्यास तथा गृह-संबन्धी कार्यों में नियुक्त करना उचित है।

परद्रव्यं क्षुद्रमपि नादत्तं स हरेदणु ॥ ९९ ॥
नोच्चारयेदघं कस्य स्त्रियं नैव च दूषयेत् ।
परद्रव्यहरणादि का निषेध— बिना दिये तुच्छ भी दूसरे के द्रव्य (वस्तु) को न ग्रहण करे और दूसरे के छोटे भी पाप को किसी से या पापकर्त्ताओं से न कहे। और किसी स्त्री को दूषित न करे या दोष न लगावे।

न ब्रूयादनृतं साक्ष्यं कृतं साक्ष्यं न लोपयेत् ॥ १०० ॥
प्राणात्ययेऽनृतं ब्रूयात् सुमहत्कार्यसाधने ।
प्राणनाशादि की संभावनामें झूठ बोलने का निर्देश— झूठी गवाही न दे और दी हुई गवाही से पलट न जावे। और जब बहुत बड़ा कार्य सिद्ध करना हो या प्राण-सङ्कट उपस्थित हो तभी झूठ बोले अन्यथा झूठ न बोले।

कन्यादात्रे तु ह्यधनं दस्यवे सधनं नरम् ॥ १०१ ॥
गुप्तं जिघांसवे नैव विज्ञातमपि दर्शयेत् ।
जानकर भी कभी कन्या देनेवाले को 'तुम्हारा यह जामाता (दामाद) दरिद्र है' तथा डाकू को 'यह धनी है' एवं मारनेवाले को 'यह यहां मारने के भय से छिपा हुआ है' ऐसा किसी भी व्यक्ति के बारे में न कहे।

जायापत्योश्च पित्रोश्च भ्रात्रोश्च स्वामिभृत्ययोः ॥ १०२ ॥
भगिन्योर्मित्रयोर्भेदं न कुर्याद् गुरुशिष्ययोः ।
स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध— स्त्री-पुरुष, माता-पिता, भाई-भाई, स्वामी-भृत्य, बहिन-बहिन, मित्र-मित्र, गुरु-शिष्य इन सबों के बीच परस्पर भेद न डलावे।

न मध्याद् गमनं भाषाशालिनोः स्थितयोरपि ॥ १०३ ॥
सुहृदं भ्रातरं बन्धुमुपचर्य्यात् सदात्मवत् ।
वार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध— और परस्पर बात-चीत करते हुये दो व्यक्तियों के बीच में से न निकले। और मित्र, भाई, बन्धु (स्वजन), इन सबों के साथ सदा अपने समान व्यवहार करना चाहिये।

गृहागतं क्षुद्रमपि यथार्हं पूजयेत् सदा ॥ १०४ ॥

तृतीयोऽध्यायः [१४३]

तदीयकुशलप्रश्नैः शक्त्या दानैर्जलादिभिः ।
अपने गृह में आये हुये किसी भी तुच्छ व्यक्ति का उसके साथ कुशल-प्रश्न पूँछने से तथा यथाशक्ति उसे जलादि देने से यथायोग्य आदर-संमान करना चाहिये ।

सपुत्रस्तु गृहे कन्यां सपुत्रां वासयेन्नहि ॥ १०५ ॥
सभर्तृकां च भगिनीमनाथे ते तु पालयेत् ।
सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध—
जिसके पुत्र हो वह अपने गृह में पुत्रयुक्त कन्या एवं पतियुक्त बहन को लाकर सदा के लिये न रखे क्योंकि इससे कलह होने की संभावना रहती है और यदि कन्या तथा बहन अनाथ अवस्था में हों तो अवश्य लाकर उनका पालन करना चाहिये ।

'सर्पोऽग्निर्दुर्जनो राजा जामाता भगिनीसुतः ॥ १०६ ॥
रोगः शत्रुर्नावमान्योऽप्यल्प इत्युपचारितः ।
**सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध—**सर्प, अग्नि, दुर्जन, राजा, जामाता (दामाद), भानजा, रोग, शत्रु ये सब छोटे अर्थात् बालक या हीन हैं इस ख्याल से कभी उनका तिरस्कार या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ।

क्रौर्यात्तैक्ष्ण्याद् दुःस्वभावात् स्वामित्वात् पुत्रिकामयात् ॥१०७॥
स्वपूर्वजपिण्डदत्वाद् वृद्धिभीत्या उपचारयेत् ।
ऋणशेषं रोगशेषं शत्रुशेषं न रक्षयेत् ॥ १०८ ॥
**सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादिका समूल नाश करने का निर्देश—**किन्तु क्रूर होने से सर्प से, तीक्ष्ण होने से अग्नि से, दुष्ट स्वभाव होने से दुर्जन से, स्वामी होने से राजा से, कन्या को क्लेश पहुँचाने के भय से जामाता से, अपने पूर्वजों को पिण्ड देनेवाला होने से भानजा से, बढ़ जाने से रोग से, भय होने से शत्रु से संभल कर ऐसा व्यवहार करना चाहिये जिससे ये हानि न पहुँचा सकें। और ऋण, रोग तथा शत्रु इनका शेष नहीं रखना चाहिये अर्थात् इन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिये ।

याचकाद्यैः प्रार्थितः सन्न तीक्ष्णं चोत्तरं वदेत् ।
तत्कार्यं तु समर्थश्चेत् कुर्याद्वा कारयीत च ॥ १०९ ॥
**याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार—**याचक आदि से प्रार्थना किये जाने (मांगने) पर तीक्ष्ण उत्तर नहीं देना चाहिये । और यदि सामर्थ्य हो तो स्वयं उसके कार्य को कर दे या दूसरे से करा दे ।

दातॄणां धार्मिकाणां च शूराणां कीर्तनं सदा ।
शृणुयात्तु प्रयत्नेन तच्छिद्रं नैव लक्षयेत् ॥ ११० ॥

१४४ | शुक्रनीतिः

दाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश—दाता, धार्मिक और शूर पुरुषों का गुण-कीर्त्तन ( प्रशंसा ) सदा प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये, और इन सबों के दोष की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये ।

काले हितमिताहारविहारी विघसाशनः ।
अदीनात्मा च सुस्वप्नः शुचिः स्यात्सर्वदा नरः ॥ १११ ॥

समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश—मनुष्यों को सदा समय पर हितकर तथा उचित मात्रा के साथ आहार तथा विहार, देवादि को भोग लगाकर प्रसाद-भोजन, अकातर-स्वभाव, अच्छी तरह से सोना तथा शरीर एवं मन से पवित्र रहना । इन सब विषयों को सदा करना चाहिये ।

कुर्याद्विहारमाहारं निर्हारं विजने सदा ।
व्यवसायी सदा च स्यात् सुखं व्यायाममभ्यसेत् ॥ ११२ ॥

स्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश—और सदा स्त्री-संभोग, भोजन तथा मल-मूत्रादि का त्याग एकान्त में करना चाहिये । एवं सदा उद्योग करने में निरत रहना और सुखपूर्वक व्यायाम ( कसरत ) करना चाहिये ।

अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थः स्वीकुर्यात् प्रीतिभोजनम् ।
आहारं प्रवरं विद्यात् षड्रसं मधुरोत्तरम् ॥ ११३ ॥

मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश—अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिये एवं स्वस्थ रहने पर किसी के द्वारा आमन्त्रित प्रीतिभोज में भोजन करना स्वीकार करना चाहिये । तिक्त, कटु, अम्ल, लवण, कषाय ( कसैला ), मधुर इन ६ रसों से युक्त एवं प्रधान रूप से मधुरान्न ( मिठाई ) युक्त जो भोजन होता है उसे सर्वोत्तम समझना चाहिये ।

विहारं चैव स्वस्त्रीभिर्भेश्याभिर्न कदाचन ।
नियुद्धं कुशलैः सार्धं व्यायामं नतिभिर्वरम् ॥ ११४ ॥

स्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश—और अपनी स्त्री के साथ विहार करना उचित है वेश्याओं के साथ कदापि नहीं उचित है । और निपुण ( मल्ल-विद्या में निपुण ) लोगों के साथ प्रणत होकर कुश्ती लड़ना उत्तम व्यायाम है अतः इसे करना चाहिये ।

हित्वा प्राक्पश्चिमौ यामौ निशि स्वापो वरो मतः ।
दीनान्धपङ्गुबधिरा नोपहास्याः कदाचन ॥ ११५ ॥

रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक उपहास के निषेध का निर्देश—रात्रि में प्रथम तथा चतुर्थ प्रहरों को छोड़कर मध्य के द्वितीय तथा तृतीय प्रहरों में सोना उत्तम होता है । दीन, अन्धा, पङ्गु तथा बहरा ऐसे लोगों का कभी उपहास ( हंसी ) नहीं करना चाहिये ।

तृतीयोऽध्यायः | १४५

तृतीयोऽध्यायः | १४५

नाकार्ये तु मतिं कुर्याद् द्राक्स्वकार्यं प्रसाधयेत्।
उद्योगेन बलेनैव बुद्ध्या धैर्येण साहसात् ॥ ११६ ॥
पराक्रमेणार्जवेन मानमुत्सृज्य साधकः।
**कार्य-साधक के कृत्यों का वर्णन—**करने के लिये अयोग्य कार्य के विषय में बुद्धि नहीं करनी चाहिये। और अपने कार्य को सिद्ध करनेवाले के लिये उचित है कि वह मान (गौरव) छोड़कर उद्योग, बल, बुद्धि, धैर्य, साहस, पराक्रम और सरलता के द्वारा यथासंभव शीघ्र अपने कार्य को सिद्ध करे।

यदि सिद्ध्यति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ११७ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद्यशःसुखहरः स्मृतः ।
यदि कलह करने से अपना कार्य सिद्ध हो तो वह कलह अच्छा कहलाता है अन्यथा (यदि कार्य सिद्ध न हो तो) वह कलह केवल आयु, धन, मित्र, यश तथा सुख को हरण करनेवाला कहा है।

नानिष्टं प्रवदेत् कस्मिन्न छिद्रं कस्य लक्षयेत् ॥ ११८ ॥
आज्ञाभङ्गस्तु महतां राज्ञः कार्यो न वै क्वचित्।
**दुर्वचन का एवं गुरुजनादि की आज्ञा के उल्लङ्घन का निषेध—**किसी के लिये दुर्वचन न कहे और न किसी के छिद्र (दोष) को देखे। बड़े लोगों एवं राजा की आज्ञा का कभी उल्लङ्घन न करे।

असत्कार्यनियोक्तारं गुरुं वापि प्रबोधयेत् ॥ ११९ ॥
नातिक्रामेदपि लघुं क्वचित् सत्कार्यबोधकम्।
**असत् कार्य करानेवाले गुरु को भी बोध कराने का एवं छोटे के भी समुचित बात मानने का निर्देश—**बुरे कार्य में नियुक्त करनेवाले गुरु को भी समझावे कि आपने यह अनुचित आज्ञा दी है अतः मैं नहीं करूँगा। और सत्कार्य का उपदेश करनेवाले छोटे लोगों के भी वचनों का कभी उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। अर्थात् उसे अवश्य करना चाहिये।

कृत्वा स्वतन्त्रां तरुणीं स्त्रियं गच्छेन्न वै क्वचित् ॥ १२० ॥
स्त्रियो मूलमनर्थस्य तरुण्यः किं परैः सह।
**तरुणी स्त्री को स्वतन्त्र छोड़ कर जाने का निषेध—**और अपनी तरुणी स्त्री को स्वतन्त्र करके (इच्छानुसार रहने की आज्ञा देकर) अन्यत्र कहीं नहीं जाना चाहिये। क्योंकि पर पुरुषों के साथ रहने से साधारण भी स्त्रियां अनर्थ का कारण होती हैं फिर तरुणी स्त्रियों के विषय में क्या कहना है अर्थात् वे सबसे अधिक अनर्थ का कारण हैं।

न प्रमाद्येन्मदद्रव्यैर्न विमुह्येत् कुसन्ततौ ॥ १२१ ॥
मद पैदा करनेवाले द्रव्यों से (भांग आदि अथवा ऐश्वर्य से) अधिक:
१० शु०

१४६ शुक्रनीतिः

मतवाला नहीं होना चाहिये। और नालायक सन्तान पर 'यह मेरा पुत्र है' ऐसी ममता नहीं करनी चाहिये ।

साध्वी भार्या पितृपत्नी माता बालः पिता स्नुषा । अभर्तृकाऽनपत्या या साध्वी कन्या स्वसापि च ॥ १२२ ॥ मातुलानी भ्रातृभार्या पितृमातृस्वसा तथा । मातामहोऽनपत्यश्च गुरुश्वशुरमातुलाः ॥ १२३ ॥ बालोऽपिता च दौहित्रो भ्राता च भगिनीसुतः । एतेऽवश्यं पालनीयाः प्रयत्नेन स्वशक्तितः ॥ १२४ ॥ अविभवेऽपि विभवे पितृमातृकुलं सुहृत् । पत्न्याः कुलं दासदासीभृत्यवर्गांश्च पोषयेत् ॥ १२५ ॥ बिकलाङ्गान् प्रव्रजितान् दीनानाथांश्च पालयेत् ।

**साध्वी भार्यादिका यत्नपूर्वक पालने का निर्देश—**सुशीला स्त्री, विमाता, माता, अविवाहिता कन्या, पिता, पुत्रवधू, बिना पति और पुत्र की कन्या या बहन, मामी, भाई की वधू, पिता की बहन (फूआ), मां की बहन (मौसी), निःसन्तान नाना, गुरु, श्वशुर या मामा, बिना पिता का पुत्र, लड़की का लड़का (नाती), भाई या भानजा इन सबों का धन न रहने पर भी यथाशक्ति यत्नपूर्वक अवश्य पालन करना चाहिये। और यदि धन हो तो पिता तथा माता के कुलवाले एवं मित्र, पत्नी के कुल (ससुराल) वाले, दास, दासी और भृत्य वर्गों का पालन-पोषण करना चाहिये और विकलाङ्ग (काने, लंगड़े आदि), संन्यासी, दीन और अनाथ लोगों का पालन करना चाहिये ।

कुटुम्बभरणार्थेषु यत्नवान्न भवेच्च यः ॥ १२६ ॥ तस्य सर्वगुणैः किन्तु जीवन्नेव मृतश्च सः ।

**जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश—**जो कुटुम्ब-पालन के विषय में प्रयत्नशील नहीं होता है वह सर्वगुण-संपन्न होते हुये भी जीवित रहकर मरे हुये के समान है अर्थात् उसका जीवन व्यर्थ है।

न कुटुम्बं भृतं येन नाशिताः शत्रवोपि न ॥ १२७ ॥ प्राप्तं संरक्षितं नैव तस्य किं जीवितेन वै ।

जिसने कुटुम्ब का भरण-पोषण नहीं किया और शत्रुओं को नष्ट नहीं किया एवं प्राप्त वस्तु की भलीभांति रक्षा नहीं की, उसके जीने से क्या अर्थात् उसका जीवन वृथा है।

स्त्रीनिर्जितो ऋणी नित्यं सुदरिद्रश्च याचकः ॥ १२८ ॥ गुणहीनोऽर्थहीनः सन् मृता एते सजीवकाः

तृतीयोऽध्यायः [१४७]

जो स्त्रियों के वशीभूत रहनेवाला, नित्य ऋण लेनेवाला, अत्यन्त दरिद्र, मांगनेवाला, गुण से हीन और धन से रहित है, ऐसे लोग जीवित रहकर मरे हुये के तुल्य हैं।

आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम् ॥ १२९॥ दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत् ।

**गुप्त रखने योग्य बातों का निर्देश—**आयु, धन, गृह के दोष, मन्त्र, मैथुन, औषध, दान, मान, अपमान इन ९ विषयों को अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये (किसी से नहीं कहना चाहिये)।

देशाटनं राजसभावेशनं शास्त्रचिन्तनम् ॥ १३०॥ वेश्यादिदर्शनं विद्वन्मैत्रीं कुर्यादतन्द्रितः ।

**देशाटनादि की कर्त्तव्यता—**आलस्यरहित होकर देशभ्रमण, राजसभा में प्रवेश, शास्त्रों का चिन्तन, वेश्या आदि का दर्शन, विद्वानों के साथ मैत्री करनी चाहिये।

अनेकाश्च तथा धर्माः पदार्थाः पशवो नराः ॥ १३१॥ देशाटनात् स्वानुभूताः प्रभवन्ति च पर्व्वताः ।

**देशाटन के लाभ—**इनमें से देशाटन करने से मनुष्यों को अनेक प्रकार के धर्म, पदार्थ, पशु, मनुष्य और पर्व्वतों का अनुभव साक्षात् प्राप्त होता है।

कीदृशा राजपुरुषा न्यायान्यायं च कीदृशम् ॥ १३२॥ मिथ्याविवादिनः के च के वै सत्यविवादिनः । कीदृशी व्यवहारस्य प्रवृत्तिः शास्त्रलोकतः ॥ १३३॥ सभागमनशीलस्य तद्विज्ञानं प्रजायते ।

**सभा में बैठने से लाभ का वर्णन—**सभा में प्रवेश करने से मनुष्यों को राजपुरुष किस प्रकार के होते हैं ? न्याय-अन्याय कैसा होता है ? झूठा विवाद और सच्चा विवाद उपस्थित करनेवाले कैसे होते हैं ? शास्त्र और लोक के अनुसार ऋण देने आदि रूप विवाद-विषय का कैसा निर्णय होता है ? इत्यादि विषयों का विशिष्ट ज्ञान होता है।

नाहङ्कारो च धर्मान्धः शास्त्राणां तत्त्वचिन्तनैः ॥ १३४॥ एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्य्यनिर्णयम् । स्याद्बह्वागमसंदर्शी व्यवहारो महानतः ॥ १३५॥ बुद्धिमानभ्यसेन्नित्यं बहुशास्त्राण्यतन्द्रितः ।

**बहुत से शास्त्रों के अध्ययन के फल—**बहुत से शास्त्रों के तत्त्वों का चिन्तन करने से अहङ्कार तथा धर्मान्धता से युक्त नहीं होना चाहिये। और एक शास्त्र का केवल अध्ययन करके किसी कार्य (तत्त्व) का निर्णय नहीं करना

१४८ | शुक्रनीतिः

चाहिये। क्योंकि बहुत शास्त्रों को जिसने अच्छी तरह से देखा है वही महान् लौकिक व्यवहार का ज्ञाता हो सकता है अतः बुद्धिमान् मनुष्य आलस्य-रहित होकर बहुत से शास्त्रों का नित्य अभ्यास करे।

तदर्थं तु गृहीत्वापि तदधीना न जायते ॥ १३६ ॥
वेश्या तथाविधा वापि वशीकर्तुं नरं क्षमा ।
नेयात् कस्य वशं तद्वत् स्वाधीनं कारयेज्जगत् ॥ १३७ ॥

**वेश्यादर्शन के फल—**जैसे वेश्या किसी मनुष्य के धन को ग्रहण करके भी उसके अधीन नहीं हो जाती है और स्वयं अधीन न होते हुये भी उस मनुष्य को अपने वश में करने के लिये समर्थ होती है किन्तु स्वयं किसी के वश में नहीं होती है, वैसे ही जगत् के लोगों को अपने अधीन बनाये किन्तु स्वयं किसी के अधीन न हो। इसे वेश्या-दर्शन का फल समझना चाहिये।

श्रुतिस्मृतिपुराणानामर्थविज्ञानमेव च ।
सहवासात्पण्डितानां बुद्धिः पण्ढा प्रजायते ॥ १३८ ॥

**पण्डितों के साथ मैत्री के फल—**पण्डितों के साथ संगति करने से श्रुति, स्मृति तथा पुराणों के अर्थों का विशेष ज्ञान तथा सत्-असत् का विचार करनेवाली पण्ढा बुद्धि होती है। यह विद्वन्मैत्री का फल है।

देवपित्रतिथिभ्योऽन्नमदत्त्वा नाश्नीयात् क्वचित् ।
आत्मार्थं यः पचेन्मोहान्नरकार्थं स जीवति ॥ १३९ ॥

**अपने लिये केवल भोजन बनाकर खाने का निषेध—**देवता, पितृगण तथा अतिथियों को बिना दिये कभी भोजन नहीं करना चाहिये, क्योंकि जो मोहवश केवल अपने लिये भोजन बनाता है और देवादि को बिना दिये भोजन करता है उसका जीवन नरक के लिये होता है।

मार्गं गुरुभ्यो बलिने व्याधिताय शवाय च ।
राज्ञे श्रेष्ठाय व्रतिने यानगाय समुत्सृजेत् ॥ १४० ॥

**गुरुजनादि के लिये मार्ग देने का निर्देश—**गुरुजन, बलवान्, रोगी, शव (मुर्दा ले जाने के लिये), राजा, माननीय व्यक्ति, व्रतधारी, वाहन (सवारी) पर चढ़े हुए, ऐसे लोगों को जाने के लिये स्वयं हटकर मार्ग दे देना चाहिये।

शकटात्पञ्चहस्तं तु दशहस्तं तु वाजिनः ।
दूरतः शतहस्तं च तिष्ठेन्नागाद् वृषाद्दश ॥ १४१ ॥

**शकटादिकों से दूर रहकर चलने का निर्देश—**बैलगाड़ी आदि से ५ हाथ, घोड़े से १० हाथ, हाथी से १०० हाथ, बैल से १० हाथ की दूरी पर रहना चाहिये।

तृतीयोऽध्यायः १४६

तृतीयोऽध्यायः १४६

शृङ्गिणां नखिनां चैव दंष्ट्रिणां दुर्जनस्य च । नदीनां बसतौ स्त्रीणां विश्वासं नैव कारयेत् ॥ १४२ ॥ श्रृङ्गी आदि का विश्वास करने का निषेध— सींगवाले पशु-बैल आदि, नख से प्रहार करनेवाले भालू आदि, दाढ़ीवाले व्याघ्रादि, दुर्जन, नदी और स्त्री इनके समीप में रहने पर विश्वास नहीं करना चाहिये ।

खादन्न गच्छेदध्वानं न च हास्येन भाषणम् । शोकं न कुर्यान्नष्टस्य स्वकृतेरपि जल्पनम् ॥ १४३ ॥ गमनादि के निषेध के विषय— भोजन करते हुये रास्ता चलना, हंसते हुये बात करना, नष्ट हुई वस्तु या बीती हुई बात या मरे हुये व्यक्ति के विषय में शोक करना, अपने किये हुये कार्य की स्वयं प्रशंसा रूप में वर्णन इन सबों को नहीं करना चाहिये ।

स्वशङ्कितानां सामीप्यं त्यजेद्वै नीचसेवनम् । सँल्लापं नैव शृणुयाद् गुप्तः कस्यापि सर्वदा ॥ १४४ ॥ अपने ऊपर शंका रखनेवालों तथा दुर्जनों के समीप में रहना एवं नीचों की सेवा त्याग देनी चाहिये । और सर्वदा छिपकर किसी की बातें नहीं सुननी चाहिये ।

उत्तमैरननुज्ञातं कार्यं नेच्छेद्रुच तैः सह । देवैः सार्कं सुधापानाद्राहोश्छिन्नं शिरो यतः ॥ १४५ ॥ बड़ों की आज्ञा के बिना उनके साथ कार्य करने का निषेध— यदि श्रेष्ठ लोगों की अपने साथ कार्य करने की अनुमति न हो तो उनके साथ उस कार्य की करने की इच्छा न करे, क्योंकि देवताओं के साथ बिना अनुमति के अमृत-पान करने से राहु का शिर काटा गया ।

महतोऽसत्कृतमपि भवेत्तद् भूषणाय वै । विषपानं शिवस्यैव त्वन्येषां मृत्युकारकम् ॥ १४६ ॥ तेजस्वी क्षमते सर्वं भोक्तुं बह्निरिवानघः । निन्दित भी कार्यों का बड़ों के लिये भूषण होने का निर्देश— सर्व साधारण के लिये प्रसिद्ध नहीं करने योग्य कार्य भी बड़े लोगों के लिये भूषण होता है । जैसे विषपान शिवजी के लिये ही भूषण हुआ किन्तु अन्यों के लिये वही मृत्यु का कारण होता है, क्योंकि निष्पाप तेजस्वी व्यक्ति अग्नि के समान सब कुछ भोजन करने के लिये समर्थ होता है ।

न साम्मुख्ये गुरोः स्थेयं राज्ञः श्रेष्ठस्य कस्यचित् ॥ १४७ ॥ राजा मित्रमिति ज्ञात्वा न कार्यं मानसेप्सितम् । बिना अनुमति के श्रेष्ठ के संमुख बैठने का निषेध— गुरुजन, राजा या किसी

१५० | शुक्रनीतिः

श्रेष्ठ व्यक्ति के संमुख बिना अनुमति के नहीं बैठना चाहिये। और 'राजा हमारा मित्र है' यह समझ कर मनमाना कार्य नहीं करना चाहिये।

नेच्छेन्मूर्खस्य स्वामित्वं दास्यमिच्छेन्महात्मनाम् ॥ १४८ ॥
विरोधं न ज्ञानलवदुर्विदग्धस्य रञ्जनम् ।

मूर्ख का स्वामी बनने की इच्छा का निषेध— मूर्ख जनका स्वामी बनने की इच्छा न करे किन्तु महान् आत्मा (उच्च विचार) वालों का दास भी बनने की इच्छा करे अथवा मूर्खों का स्वामी या दास कुछ भी बनने की इच्छा न करे और महात्माओं के साथ विरोध करने की इच्छा न करे। एवं थोड़े से ज्ञान से ही अपने को बहुत बड़ा चतुर माननेवाले व्यक्ति को खुश करने की इच्छा न करे अथवा उन्हें विरुद्ध या खुश करने की इच्छा न करे।

अत्यावश्यमनावश्यं क्रमात् कार्यं समाचरेत् ॥ १४९ ॥
प्राक्पश्चाद्वाऽत्विलम्बेन प्राप्तं कार्यं तु बुद्धिमान् ।

आवश्यक कार्य को सर्वप्रथम करने का निर्देश— बुद्धिमान मनुष्यों को बहुत से कार्य हाथ में आ जाने पर उनमें से अत्यावश्यक और अनावश्यक कार्यों को छाटकर क्रम से अत्यावश्यक कार्य को प्रथम एवं शीघ्रता से करना चाहिये और अनावश्यक को पीछे तथा विलम्ब से करना चाहिये।

पित्राज्ञप्तेनापि मातृवधरूपे सुपुजिता ॥ १५० ॥
धृता गोतमपुत्रेण ह्यकार्ये चिरकारिता ।

बुरे कार्य में देरी करने का निर्देश— और न करने योग्य बुरे कार्य के करने में देरी करना अत्यन्त उचित होता है जैसे इन्द्र के साथ व्यभिचार कराने के दोष से कुपित हुये गोतम के द्वारा अपनी स्त्री अहल्या का वध करने की आज्ञा पाने पर भी उनके पुत्र शतानन्द का मातृवध में देरी करना उचित हुआ।

प्रेम्णा समीपवासेन स्तुत्या नत्या च सेवया ॥ १५१ ॥
कौशल्येन कलामिश्च कथाभिर्ज्ञानतोऽपि च ।
आदरेणार्जवेनैव शौर्याद्वानेन विद्यया ॥ १५२ ॥
प्रत्युत्थानाभिगमनैरानन्दस्मितभाषणैः ।
उपकारैः स्वाशयेन वशीकुर्याज्जगत् सदा ॥ १५३ ॥

जगत् को वश में करने के उपाय— सदा प्रेम, समीप में रहना, स्तुति, नमस्कार, सेवा, चतुरता, कलाओं (गाना-बजाना आदि ६४ प्रकार की), कथा कहना, ज्ञानोपदेश, आदर, सरलता, शूरता, दान, विद्या, सामने आने पर अपने आसन से उठना या आगे जाकर लिवालाना, आनन्द तथा मुस्कुराहट

तृतीयोऽध्यायः १५१

तृतीयोऽध्यायः १५१

के साथ वार्तालाप, उपकार, सुन्दर आशय-प्रदर्शन, इन सबों के करने से जगत् को अपने वशीभूत करना चाहिये।

एते वश्यकरोपाया दुर्जने निष्फलाः स्मृताः ।
तत्सन्निधिं त्यजेत्प्राज्ञः शक्तस्तं दण्डतो जयेत् ॥ १५४ ॥
छद्मभूतैस्तु तद्रूपैरुपायैरेभिरेव वा ।

**वश करने के उपायों की दुर्जनों के विषय में विफलता का निर्देश—**किन्तु उपर्युक्त ये सभी वश करने के उपाय दुर्जनों के विषय में प्रयोग करने पर निष्फल सिद्ध होते हैं, अतः बुद्धिमानों को उनकी ( दुर्जनों की ) संगति छोड़ देनी चाहिये बल्कि यदि सामर्थ्य हो तो उन्हें दण्ड देकर अथवा बनावटी उक्त प्रेमादि रूप इन्हीं उपायों से वशीभूत करना चाहिये ।

श्रुतिस्मृतिपुराणानामभ्यासः सर्वदा हितः ॥ १५५ ॥
साङ्गानां सोपवेदानां सकलानां नरस्य हि ।

**वेदादि के अभ्यास की हितकारिता का निर्देश—**मनुष्यों के लिये संपूर्ण शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष इन ६ अङ्गों के सहित, ऋक्, यजुः, साम, अथर्व इन ४ वेदों एवं धनुर्वेदादि ४ उपवेदों, १८ मन्वादि स्मृतियों तथा १८ पुराणों का सर्वदा अभ्यास करना हितकर है ।

मृगयाक्षाः स्त्रियः पानं व्यसनानि नृणां सदा ॥ १५६ ॥
चत्वार्येतानि सन्त्यज्य युक्त्या संयोजयेत् क्वचित् ।

**मनुष्यों के ४ व्यसनों का निर्देश—**सदा मृगया (शिकार) और अक्ष (जूआ) खेलना, स्त्री-संभोग करना, मद्यादि पीना, ये ४ मनुष्यों के लिये व्यसन कहे हुये हैं, इन्हें सदा करना त्याग कर कभी थोड़ा सा समय आने पर कर लेना उचित होता है अन्यथा नहीं।

कूटेन व्यवहारं तु वृत्तिलोपं न कस्य चित् ॥ १५७ ॥
न कुर्याच्चिन्तयेत्कस्य मनसाप्यहितं क्वचित् ।

**कूट व्यवहार का निषेध—**किसी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार या आजीविका की हानि नहीं करनी चाहिये, एवं कभी किसी का अहित भी मन से नहीं सोचना चाहिये (करना तो दूर रहा)।

तत्कार्यं तु सुखं यस्माद्भवेत्त्रैकालिकं दृढम् ॥ १५८ ॥
मृते स्वर्गं जीवति च विन्द्यात्कीर्तिं दृढां शुभाम् ।

**विहित कार्य करने का निर्देश—**जिस कार्य के करने से इह लोक और पर लोक दोनों में स्थिर सुख मिले अर्थात् मरने पर स्वर्ग और जीवित रहने पर स्थिर तथा सुन्दर कीर्ति का लाभ हो उसी (कार्य) को करना चाहिये ।

जागर्ति च सचिन्तो य आधिव्याधिनिपीडितः ॥ १५९ ॥

१५२ | शुक्रनीतिः

जारश्चोरो बलिद्विष्टो विषयी धनलोलुपः ।
कुसहायी कुनृपतिर्भिन्नामात्य-सुहृत्प्रजः ॥ १६० ॥
कुर्यात्तथा समीक्ष्यैतत् सुखं स्वप्याच्चिरं नरः ।

रात्रि में सुखपूर्वक न सो सकनेवालों का निर्देश— जो चिन्ता से परेशान, आधि (मानसिक पीड़ा) तथा व्याधि से पीड़ित, जार (व्यभिचारी), चोर, बलवान शत्रुवाला, विषय-लोलुप, धन-लोलुप होता है और जो बुरे साथियों-वाला, विरक्त मन्त्री, मित्र तथा प्रजा गणों से युक्त कुत्सित विचार का राजा है। ये सब रात्रि में भी सदा जागते रहते हैं। अतः मनुष्यों को उचित है कि विचार कर ऐसा कार्य करे जिससे बहुत दिनों तक सुखपूर्वक रात्रि में सो सके।

राज्ञो नानुकृतिं कुर्यान्न च श्रेष्ठस्य कस्यचित् ॥ १६१ ॥
नैको गच्छेद्व्याळव्याघ्रचोरेषु च प्रबाधितुम् ।

योग्यता न रहने पर बड़ों के अनुकरण करने एवं सर्पादि पकड़ने के लिये एकाकी गमन का निषेध— राजा या किसी श्रेष्ठ पुरुष के व्यवहार की योग्यता न रहने पर अनुकरण नहीं करना चाहिये। और व्याळ (सर्पादि), व्याघ्र तथा चौर को मारने या पकड़ने के लिये अकेले नहीं जाना चाहिये।

जिघांसन्तं जिघांसीयाद् गुरुमप्याततायिनम् ॥ १६२ ॥
कलहे न सहायः स्यात् संरक्षेद् बहुनायकम् ।

मारनेवाले गुरु को भी मारने का एवं कलह में सहायता न करने का निर्देश— अपने को मारने की इच्छा रखनेवाले एवं आततायी गुरुजन को भी मारने की इच्छा रखनी चाहिये। झगड़ा होने पर किसी पक्ष का साथी नहीं बनना चाहिये। और जो बहुत लोगों का स्वामी हो उसकी रक्षा करनी चाहिये।

गुरुणां पुरतो राज्ञो न चासीत महासने ॥ १६३ ॥
प्रौढपादो न तद्वाक्यं हेतुभिर्विकृतिं नयेत् ।

गुरुजनों के आगे प्रौढपाद बैठने का निषेध— गुरुजनों के तथा राजा के आगे उनसे ऊँचे आसन पर या पैर के ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिये। और उनके वाक्यों का तर्क द्वारा खण्डन नहीं करना चाहिये।

यत्कर्तव्यं न जानाति कृतं जानाति चेतरः ॥ १६४ ॥
नैव वक्ति च कर्तव्यं कृतं यश्चोत्तमो नरः ।

उत्तम पुरुष के लक्षण— जो नीच मनुष्य होता है वह जो कर्तव्य (करने योग्य है) उसको नहीं जानता है किन्तु केवल कृत (किये हुये) को ही

तृतीयोऽध्यायः [१५३]

जानता है। और जो उत्तम मनुष्य होता है वह कर्तव्य और कृत दोनों को नहीं कहता है।

न प्रियाकथितं सम्यङ्मन्येतानुभवं बिना ॥ १६५ ॥
अपराधं मातृस्नुषा भ्रातृपत्नीसपत्निजम् ।

स्त्री के कथनमात्र से बिना स्वयं अनुभव किये समझने का निषेध— अपनी प्रिया स्त्री के कहने मात्र से ही माता, पुत्रवधू, भाई की पत्नी या सौत के अपराध को बिना स्वयं अनुभव किये सत्य नहीं समझना चाहिये।

अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता ॥ १६६ :
अशौचं निर्दया दर्पः स्त्रीणामष्टौ स्वदुर्गुणाः ।

स्त्रियों के ८ दुर्गुणों का निर्देश— क्योंकि १ झूठ बोलना, २ साहस, ( सहसा कोई कार्य कर बैठना ), ३ माया ( ढोंग रचना ), ४ मूर्खता, ५ अत्यन्त लोभ, ६ अपवित्रता, ७ निर्दयता, ८ दर्प ( अहङ्कार ) ये ८ स्वाभाविक दुर्गुण स्त्रियों के होते हैं।

षोडशाब्दात्परं पुत्रं द्वादशाब्दात्परं स्त्रियम् ॥ १६७ ॥
न ताडयेद् दुष्टवाक्यैः पीडयेन्न स्नुषादिकम् ।

१६ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले पुत्रादि के ताड़नादि का निषेध— १६ वर्ष की अवस्था के बाद पुत्र और १२ वर्ष की अवस्था के बाद कन्या को नहीं मारना चाहिये। और पुत्रवधू आदि को कटु वचनों से क्लेश नहीं पहुँचाना चाहिये।

पुत्राधिकाश्च दौहित्रा भागिनेयाश्च भ्रातरः ॥ १६८ ॥
कन्याधिका पालनीया भ्रातृभार्या स्नुषा स्वसा ।

दौहित्र आदि का पुत्रादिकों से बढ़कर पालन करने का निर्देश— पुत्र से बढ़कर दौहित्र ( नाती ), भानजा, भाई इन सबों का एवं कन्या से बढ़कर भाई की स्त्री, पुत्रवधू और बहिन इनका पालन करना चाहिये।

आगमार्थं हि यतते रक्षणार्थं हि सर्वदा ॥ १६९ ॥
कुटुम्बपोषणे स्वामी तदन्ये तस्करा इव ।

स्वामी के लक्षण— जो कुटुम्ब-पालन के निमित्त धन की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिये सदा प्रयत्न करता है वही स्वामी है इससे अन्य स्वामी चोर के समान है क्योंकि वे कुटुम्ब-पालन न कर स्वयं उस धन का उपभोग करते हैं।

अनृतं साहसं मौर्ख्यं कामाधिक्यं स्त्रियां यतः ॥ १७० ॥
कामाद्विनैकशयने नैव सुप्यात्स्त्रिया सह ।

एक शय्या पर सदा स्त्री के साथ सोने का निषेध— क्योंकि स्त्रियों में

१५४शुक्रनीतिः

झूठ, साहस (बिना विचारे कार्य करना), मूर्खता और काम की अधिकता होती है अतः बिना काम की अधिकता के स्त्री के साथ एक शय्या पर नहीं शयन करना चाहिये ।

दृष्ट्वा धनं कुलं शीलं रूपं विद्यां बलं वयः ॥ १७१ ॥
कन्यां दद्यादुत्तमं चेन्मैत्रीं कुर्याद्यात्मनः ।

वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश— धन, कुल, शील, रूप, विद्या, बल और अवस्था (उम्र) इन सबों को देखकर जिस वर में ये सब उत्तम रीति से हों उसी को कन्या देनी चाहिये, क्योंकि यदि ये सब उत्तम होते हैं तो कन्या भी उस वर से अपनी मैत्री जोड़ती है अथवा यदि कुलादि उत्तम हो तभी उससे अपनी मैत्री या संबन्ध करना उचित होता है।

भार्यार्थिनं वयोविद्यारूपिणं निर्धनं त्वपि ॥ १७२ ॥
न केवलेन रूपेण वयसा न धनेन च ।

वर के लक्षण— भार्यार्थी (विवाह करने के लिये इच्छुक) यदि अवस्था (विवाह योग्य उम्र), विद्या तथा रूप से युक्त हो किन्तु धन उत्तम न हो तो भी उसे बुलाकर कन्या दे देनी चाहिये किन्तु केवल रूप, अवस्था या धन देखकर कन्या नहीं देनी चाहिये ।

आदौ कुलं परीक्षेत ततो विद्यां ततो वयः ॥ १७३ ॥
शीलं धनं ततो रूपं देशं पश्चाद्विवाहयेत् ।

सर्वप्रथम वर के कुल, उसके बाद विद्या, उसके बाद अवस्था, उसके बाद शील, धन, रूप तथा देश की क्रमशः परीक्षा करने के पश्चात् उसके साथ कन्या का विवाह करना चाहिये ।

कन्या वरयते रूपं माता वित्तं पिता श्रुतम् ॥ १७४ ॥
बान्धवाः कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरे जनाः ।

विवाहार्थ कन्या वर के रूप की सुन्दरता, माता उत्तम धन, पिता उत्तम विद्या, बान्धव गण उत्तम कुल पसन्द करते हैं किन्तु इनसे अन्य बराती लोग केवल मिष्ट (मधुर) अन्न खाने की इच्छा रखते हैं क्योंकि उन्हें वरादि के कुलादि से कोई प्रयोजन नहीं है।

भार्यार्थं वरयेत्कन्यामसमानर्षिगोत्रजाम् ॥ १७५ ॥
भ्रातृमतीं सुकुलां च योनिदोषविवर्जिताम् ।

कन्या के लक्षण— भार्या बनाने के लिये अपने से भिन्न ऋषि और गोत्र वाली, भाई से संयुक्त, अच्छे कुल में उत्पन्न हुई, योनि रोग से रहित अथवा निर्दोष मांसे पैदा हुई कन्या का वरण करना वर के लिये उचित है।

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ॥ १७६ ॥

तृतीयोऽध्यायः '१५५

न त्याज्यौ तु क्षणकणौ नित्यं विद्याधनार्थिना ।

विद्या और धन का संचय करने का निर्देश — विद्या तथा धन चाहनेवाले को नित्य क्रम से क्षण तथा कण का त्याग ( 'थोड़ा है इससे क्या लाभ होगा' इस बुद्धि से उपेक्षा ) नहीं करनी चाहिये किन्तु क्षण २ भर प्रतिदिन अभ्यास करके विद्या का एवं कण २ भर का संग्रह कर धन का अर्जन करना चाहिये ।

सुभार्यापुत्रमित्रार्थं हितं नित्यं धनार्जनम् ॥ १७७ ॥
दानार्थं च विना त्वेतैः किं धनैश्च जनैश्च किम् ।

धनार्जन के उपयोगों का निर्देश — उत्तम भार्या, पुत्र या मित्र के लिये एवं दान के लिये तो नित्य धनार्जन करना हितकर है, अतः बिना इन सब भार्यादियों के धन और भृत्यादिजनों से क्या प्रयोजन है अर्थात् धनादि व्यर्थ है ।

भाबिसंरक्षणक्षमं धनं यत्नेन रक्षयेत् ॥ १७८ ॥
जीवामि शतवर्षं तु नन्दामि च धनेन च ।
इति बुद्ध्या सञ्चिनुयाद्धनं विद्यादिकं सदा ॥ १७९ ॥
पञ्चविंशत्यब्दपूरं तदर्थं वा तदर्द्धकम् ।

भविष्यकाल में रक्षा करने में समर्थ धन की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । और १०० वर्ष तक मैं तो जीऊँगा एवं इस धन से आनन्द करूँगा — इस बुद्धि से धन और विद्या आदि का २५ वर्ष पर्यन्त या उसका आधा १२॥ वर्ष या उसका आधा ६। वर्ष पर्यन्त सदा संग्रह करना चाहिये ।

विद्याधनं श्रेष्ठतरं तन्मूलमितरद्धनम् ॥ १८० ॥
दानेन वर्धते नित्यं न भाराय न नीयते ।

धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश — विद्यारूपी धन अत्यन्त श्रेष्ठ है, इससे अन्य धन विद्यामूलक है अर्थात् विद्या से ही अन्य धन का उपार्जन होता है क्योंकि यह विद्याधन देने से नित्य बढ़ता है, अन्य धन घटता है । और इसमें भार नहीं होता है, अन्य धन में भार होता है । एवं इसे कोई उठा कर नहीं ले जा सकता है, अन्य धन को उठा कर ले जा सकता है ।

अस्ति यावत्तु सधनस्तावत्सर्वैस्तु सेव्यते ॥ १८१ ॥
निर्धनस्त्यज्यते भार्यापुत्राद्यैः सगुणोप्यतः ।
संसृतौ व्यवहाराय सारभूतं धनं स्मृतम् ॥ १८२ ॥
अतो यतेत तत्प्राप्त्यै नरः सूपायसाहसैः ।

अवश्य धनार्जन करने का निर्देश — जब तक मनुष्य धनयुक्त रहता है तब तक सब लोग उसकी सेवा करते हैं और जब वही धन से रहित हो जाता

१५६ | शुक्रनीतिः

है तो भले ही गुणवान हो किन्तु उसे स्त्री-पुत्रादिक भी छोड़ देते हैं, अतः संसार में व्यवहार चलाने के लिये धन ही सारभूत कहा हुआ है। और इसीसे धन-प्राप्ति के लिये मनुष्य प्राणों को संशय में डालनेवाले कठिन भी कार्यों के द्वारा प्रयत्नशील रहे।

सुविद्यया सुसेवाभिः शौर्येण कृषिभिस्तथा ॥ १८३ ॥
कौसीदवृद्ध्या पण्येन कलाभिश्च प्रतिग्रहैः ।
यया कया चापि वृत्त्या धनवान्स्यात्तथा चरेत् ॥ १८४ ॥
तिष्ठन्ति सधनद्वारे गुणिनः किङ्करा इव ।

और सुन्दर विद्या उपार्जन या सुन्दर सेवा, शूरता, कृषि (खेती) करके या ब्याज पर रुपया ऋण देकर, दूकानदारी या संगीत आदि कला के द्वारा, दान लेकर और अधिक क्या कहें, चाहे जिस किसी वृत्ति का आश्रय लेकर मनुष्य धनवान बन सके उसीके अनुकूल कार्य करे। क्योंकि धनियों के द्वार पर गुणी लोग नौकर के तरह पड़े रहते हैं।

दोषा अपि गुणायन्ते दोषायन्ते गुणा अपि ॥ १८५ ॥
धनवतो ऽनिर्धनस्य निन्द्यते निर्धनोऽखिलैः ।

**धन के प्रभाव का निर्देश—**धनवान पुरुषों के दोष भी गुण के समान हो जाते हैं, और निर्धनों के गुण भी दोष-तुल्य हो जाते हैं। इससे निर्धन की सभी लोग निन्दा ही किया करते हैं।

सुनिर्धनत्वं प्राप्यैके मरणं भेजिरे जनाः ॥ १८६ ॥
प्राप्तायैकेऽचलायैके नाशायैके प्रवव्रजुः ।

कितने एक मनुष्य अत्यन्त दरिद्रता भोगकर मर गये, कितने एक देशान्तर में चले गये, कितने एक पहाड़ों में जा बसे, कितने एक आत्म-हत्या करने के लिये घर से निकल गये।

उन्मादमेके पुष्यन्ति यान्त्यन्ये द्विषतां वशम् ॥ १८७ ॥
दास्यमेके च गच्छन्ति परेषामर्थहेतुना ।

धन के फेर में पड़ कर कितने एक चिन्ता करते २ पागल हो जाते हैं, कितने एक शत्रुओं की अधीनता स्वीकार कर लेते हैं और कितने एक दूसरों की या शत्रुओं की नौकरी भी कर लेते हैं।

यथा न जानन्ति धनं संचितं कति कुत्र वै ॥ १८८ ॥
आत्मस्त्रीपुत्रमित्राणि सलेखं धारयेत्तथा ।

और अपने स्त्री पुत्र या मित्र तक भी जिस प्रकार से यह न जान सकें कि 'इसने कितना और कहां पर धन संचित करके रखा है' इस प्रकार प्रयत्न करे और इसीलिये उस धन को बढ़ने के लिये लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर

तृतीयोग्ध्यायः १५७

तृतीयोग्ध्यायः १५७

वे देवे किन्तु घर में न रखे, क्योंकि पुत्रादि को ज्ञात होने पर उस धन की रक्षा असंभव हो जाती है।

नैवास्तिल्लिखितादन्यत् स्मारकं व्यवहारिणाम् ॥ १८९ ॥ न लेख्येन विना कुर्याद् व्यवहारं सदा बुधः ।

**व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश—**व्यवहार (व्यवसाय) करनेवालों के लिये लेख से बढ़ कर दूसरा कोई स्मरणसूचक चिह्न नहीं है, इसलिये बुद्धिमान को सदा बिना लेख के व्यवहार (रुपया देना) नहीं करना चाहिये।

निर्लोभे धनिके राज्ञि विश्वस्ते क्षमिणां वरे ॥ १९० ॥ सुसञ्चितं धनं धार्यं गृहीतलेखितं तु वा।

लोभ से रहित धनी पुरुष या विश्वासपात्र या क्षमाशील किंवा श्रेष्ठ पुरुष अथवा राजा इनमें किसी एक के पास में अच्छी तरह से संचित धन को रखना चाहिये अथवा रखने के लिये लिये हुये धन को लिख लेने के बाद चाहे जिसके पास रखना चाहिये ।

मैत्र्यर्थे याचितं दद्यादकुसीदं धनं सदा ॥ १९१ ॥ तस्मिन् स्थितं चेन्न बहु हानिकृच्च तथाविधम् ।

**मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश—**मित्रता के नाते मांगने पर मित्र के लिये बिना सूद पर धन सदा देना चाहिये और यदि उस मित्र के ऊपर वैसा बिना सूद पर लिया हुआ धन बहुत सा बाकी भी पड़ा हो तो भी पुनः देना हानिकर नहीं है। अर्थात् मित्र के लिये सभी सत्य है।

दृष्ट्वाऽधमर्णं वृद्ध्यापि व्यवहारक्षमं सदा ॥ १९२ ॥ सबन्धं सप्रतिभुवं धनं दद्याच्च साक्षिमत् । गृहीतलेखितं योग्यमानं प्रत्यागमे सुखम् ॥ १९३ ॥ न दद्याद् वृद्धिलोभेन नष्टं मूलधनं भवेत् ।

**लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश—**ऋण लेनेवाले को सूद देने में समर्थ देख कर सदा बन्धक या किसी के जमानत पर और किसी के गवाही के साथ लिखा-पढ़ी करके उचित मात्रा में, सुखपूर्वक लौटाने लायक धन देना चाहिये। और ब्याज के लोभ से उपर्युक्त रीति से भिन्न अवस्था में धन नहीं देना चाहिये नहीं तो मूल धन नष्ट हो जाने की संभावना रहती है।

आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ॥ १९४ ॥ धनं मैत्रीकरं दाने चादाने शत्रुकारकम् ।

**आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश—**इस प्रकार से आहार-व्यवहार में

१५८शुक्रनीतिः

जो लज्जा का त्याग करनेवाला होता है वह सुखी होता है। देने के समय धन मैत्री कराता है और लेने के समय वही धन शत्रुता करा देता है।

कृत्वा स्वान्ते तथौदार्यं कार्पण्यं बहिरैव च ॥ १९५ ॥
उचितं तु व्ययं काले नरः कुर्यान्न चान्यथा ।

**उचित व्यय करने का निर्देश—**हृदय के अन्दर उदारता रखकर और ऊपर से कृपणता (कंजूसी) रख कर समय आने पर उचित व्यय मनुष्य को करना चाहिये । इससे अन्यथा नहीं करना चाहिये ।

सुभार्यापुत्रमित्राणि शक्त्या संरक्षयेद्धनैः ॥ १९६ ॥
नात्मा पुनरतो त्मानं सर्वैः सर्वं पुनर्भवैत् ।
पश्यति स्म स जीवश्चेन्नरो भद्रशतानि च ॥ १९७ ॥

**भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश—**भार्या, पुत्र और मित्र ये सब यदि उत्तम हों तो इनकी रक्षा धन से करनी चाहिये । और इन सबों से आत्मा (शरीर) की रक्षा करनी चाहिये क्योंकि शरीर दुबारा नहीं मिल सकता है और भार्या-पुत्रादि तो दुबारा भी मिल सकते हैं। और यदि मनुष्य जीवित रहता है तो सैकड़ों कल्याण देखता है।

सदारप्रौढपुत्रान् द्राक् श्रेयोऽर्थी विभजेत् पिता ।
सदारभ्रातरः प्रौढा विभजेयुः परस्परम् ॥ १९८ ॥

**सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश—**अपना कल्याण का चाहनेवाला पिता स्त्री-युक्त एवं कार्य करने में समर्थ हुये पुत्रों को शीघ्र आपस में विभक्त कर दे (जिसमें आपस में भविष्य में कलह न कर सकें) और इसी प्रकार से सहोदर भाई लोग भी विवाह हो जाने एवं प्रौढ (कार्य करने में समर्थ) हो जाने पर आपस में विभाग कर लें अन्यथा परस्पर लड़कर निश्चय मिट जाते हैं।

एकोदरा अपि प्रायो विनाशायान्यथा खलु ।
नैकत्र संवसेच्चापि स्त्रीद्वयं मनुजस्य तु ॥ १९९ ॥

**२ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध—**यदि किसी पुरुष के पास अथवा स्वतन्त्र दो स्त्रियां हों तो उन दोनों को एवं किसी स्त्री जाति पशु के पास अथवा स्वतन्त्र दो पुरुष जाति के पशुओं को एकत्र नहीं रखना चाहिये । क्योंकि मनुष्य जाति में और पशु जाति में पुरुष एक से अधिक एक जगह कैसे रह सकते हैं ? अर्थात् कभी नहीं रह सकते हैं।

कथं वसेत्तद्बहुत्वं पशूनां तु नरद्वयम् ।
विभजेयुर्न तत्पुत्रा यद्धनं वृद्धिकारणम् ॥ २०० ॥

तृतीयोऽध्यायः १५६

अधमर्णस्थितं चापि यद् देयं चौत्तमर्णिकम्।

**ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध—**गृहपति के पुत्र लोग पिता के उस धन का परस्पर विभाग न करें जो कि सूद पर दिया हुआ अधमर्ण ( ऋण लेनेवाले ) के पास हो अथवा उत्तमर्ण ( सूद पर द्रव्य देनेवाला महाजन ) को देने के लिये जो धन हो।

यस्येच्छेदुत्तमां मैत्रीं कुर्यान्नाभिलाषकम् ॥ २०१ ॥
परोक्षे तद्गृहद्वारं तत्स्त्रीसम्भाषणं तथा ।
तन्न्यूनदर्शनं नैव तत्प्रतीपविवादनम् ॥ २०२ ॥
असाहाय्यं च तत्कार्ये ह्यनिष्टोपेक्षणं न च ।

**शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश—**जिसके साथ उत्तम मैत्री रखना चाहे उससे धन का अभिलाषा न रखे अर्थात् ऋणादि न ले। और परोक्ष में उसके अन्तःपुर में न जाय और न उसकी स्त्री से बातचीत करे। एवं उसकी त्रुटि को न देखे अर्थात् दोष के तरफ ध्यान न दे। और उसके प्रतिकूल विवाद न करे। तथा उसके कार्य में असहायता और अनिष्ट देखकर उसकी उपेक्षा न करे।

सकुसीदमकुसीदं धनं यच्चौत्तमर्णिकम् ॥ २०३ ॥
दद्यादगृहीतमिव नोभयोः क्लेशकृद्यथा ।
नासाक्षिकमचालित्खितमृणपत्रस्य पृष्ठतः ॥ २०४ ॥

**बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश—**और सूद पर या बिना सूद का जो महाजनी ( ऋण देनेवाला ) का धन हो वह जिस प्रकार से दोनों मित्रों को परस्पर क्लेश न पहुंचे तथा बिना साक्षी बिना ऋणपत्र पर लिखाये न दे।

आत्मपितृमातृगुणैः प्रख्यातश्चोत्तमोत्तमः ।
गुणैरात्मभवैः ख्यातः पैतृकैर्मातृकैः पृथक् ॥ २०५ ॥
उत्तमो मध्यमो नीचोऽधमो भ्रातृगुणैर्नरः ।
कन्यास्त्रीभगिनीभाग्यो नरोऽधमतमो मतः ॥ २०६ ॥

**उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण—**जो मनुष्य अपने, पिता तथा माता इन तीनों के गुणों से प्रख्यात होता है वह उत्तमोत्तम कहलाता है, जो केवल अपने ही गुणों से प्रख्यात होता है वह उत्तम, पिता के गुणों से मध्यम एवं माता के गुणों से प्रख्यात नीच कहलाता है। और भाई के गुणों से प्रख्यात पुरुष अधम कहलाता है। तथा जो कन्या, स्त्री या बहन के भाग्य से उन्हीं के सहारे गलग्रह होकर जीवन व्यतीत करता है वह अधमतम कहलाता है।

भूत्वा महाधनः सम्यक् पोष्यवर्गं तु पोषयेत् ।

१६० | शुक्रनीतिः

अदत्त्वा यत्किञ्चिदपि न नयेद्दिवसं बुधः ॥ २०७ ॥

बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश— विपुल धन से सम्पन्न होते हुए भी जो पालन करने के योग्य हैं उन्हीं का पालन करना चाहिये। बुद्धिमान को बिना कुछ दिये हुये कोई भी दिन व्यतीत नहीं करना चाहिये।

स्थितो मृत्युमुखे चाहं क्षणमायुर्ममास्ति न ।
इति मत्वा दानधर्मौ यथेष्टौ तु समाचरेत् ॥ २०८ ॥
न तौ बिना मे परत्र सहायाः सन्ति चेतरे ।
दानशीलाश्रयाल्लोको वर्तते न शठाश्रयात् ॥ २०९ ॥

यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश— 'मैं मृत्यु के मुख में स्थित हूँ, मेरी क्षणभर की भी आयु नहीं है। और दान और धर्म इन दोनों को छोड़कर परलोक में अन्य कोई मेरा सहायक नहीं है। तथा दानशील व्यक्तियों के आश्रय से यह जगत् ठहरा हुआ है। शठों के आश्रय से नहीं।' ऐसा समझकर यथेष्ट दान तथा धर्म करना चाहिये।

भवन्ति मित्रा दानेन द्विषन्तोपि च किं पुनः।

दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश— जब शत्रु लोग भी दान से मित्र बन जाते हैं तब औरों के लिये क्या कहना है अर्थात् अन्य तो मित्र बन ही जाते हैं।

देवतार्थं च यज्ञार्थं ब्राह्मणार्थं गवार्थकम् ॥ २१० ॥
यद्दत्तं तत्पारलौक्यं संविदत्तं तदुच्यते ।

परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण— देवता, यज्ञ, ब्राह्मण, गौ, इनके लिये जो दिया जाता है वह परलोक-सुख-साधन के लिये होता है और उसी को 'संविद्' दान अर्थात् 'अवश्य देना चाहिये' इस बुद्धि से दिया हुआ कहते हैं।

बन्दिमागधमल्लादिनटनार्थं च दीयते ॥ २११ ॥
पारितोष्यं यशोर्थं तु श्रिया दत्तं तदुच्यते ।

पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण— बन्दी, मागध तथा मल्ल आदि लोगों को अपना २ कार्य दिखाने के लिये जो पुरस्कार रूप में दिया जाता है उसे 'पारितोष्य' कहते हैं। और जो यश के लिये दिया जाता है उसे 'श्रियादत्त' (लक्ष्मी से दिया हुआ) कहते हैं अथवा उसे यशोऽर्थक और श्रियादत्त कहते हैं।

उपायनीकृतं यत्तु सुहृत्संबन्धिबन्धुषु ॥ २१२ ॥
विवाहादिषु चाचारदत्तं ह्रीदत्तमेव तत् ।

तृतीयोऽध्यायः | १६१

तृतीयोऽध्यायः | १६१

**आचारदत्त या ह्रीदत्त दान के लक्षण—**विवाहादि कार्यों में मित्र, संबन्धी तथा बन्धुजनों को जो उपहार-स्वरूप में दिया आता है उसे ‘आचारदत्त’ व्यवहार से दिया हुआ कहते हैं और उसी को ‘ह्रीदत्त’ लज्जा से दिया हुआ भी कहते हैं ।

राज्ञे च बलिने दत्तं कार्यार्थं कार्यघातिने ॥ २१३ ॥
पापभीत्याऽथवा यच्च तत्तु भीदत्तमुच्यते ।

**भीदत्त दान के लक्षण—**राजा, बलवान और कार्य को नष्ट करनेवाला इन लोगों को जो कार्य के लिये दिया जाता है अथवा ‘न देने में पाप है’ इस भय से जो दिया जाता है उसे ‘भीदत्त’ भय से दिया हुआ कहते हैं ।

यदत्तं हिंस्रवृद्ध्यर्थं नष्टं द्यूतविनाशितम् ॥ २१४ ॥
चौरैर्हृतं पापदत्तं परस्त्रीसङ्गमायकम् ।

**नष्टदान के लक्षण—**जो धन हिंसकों की वृद्धि के लिये दिया जाता है या जो द्यूत से नष्ट कर दिया गया या जिसे चोरों ने हर लिया, जो पापियों को अथवा परस्त्री-संगमार्थ दिया गया उसे ‘नष्ट’ कहते हैं ।

आराधयति यं देवं तमुत्कृष्टतरं वदेत् ॥ २१५ ॥
तन्न्यूनतां नैव कुर्याज्तोषयेत्तस्य सेवनम् ।

**आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट मानने का निर्देश—**जिस देवता या प्रभु की आराधना करे उसे सबसे अधिक उत्कृष्ट कहे और उसकी न्यूनता को न करे एवं उसकी सेवा हर्ष से करे ।

विना दानार्जवाभ्यां न भुव्यस्ति च वशीकरम् ॥ २१६ ॥
दानक्षीणो विवर्धिष्णुः शशी वक्रोऽप्यतः शुभः ।

**वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता की महत्ता—**दान तथा सरलता को छोड़ कर संसार में अन्य कोई वशीभूत करने का उपाय नहीं है । अतः एवं अमृत दान करने से क्षीण हुआ किन्तु पुनः बढ़ने की इच्छा रखनेवाला शुक्लपक्ष की द्वितीया का चन्द्र वक्र (सरलता से रहित) होता हुआ भी शुभ होता है, अर्थात् उससे पुनः अमृत-दान मिलने की संभावना रहती है ।

विचार्य स्नेहं द्वेषं वा कुर्यात् कृत्वा न चान्यथा ॥ २१७ ॥
नापकुर्यान्नोपकुर्याद् भवतोऽनर्थकारिणौ ।

**विचार कर स्नेह या द्वेष करने का निर्देश—**विचार करके किसी के साथ स्नेह या द्वेष करना चाहिये और करके पुनः उससे अन्यथा नहीं करना चाहिये । अतः स्नेही के साथ अपकार एवं द्वेषी के साथ उपकार नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये दोनों अनर्थ पैदा करते हैं । अर्थात् स्नेही के साथ सदा स्नेह (उपकार) एवं द्वेषी के साथ द्वेष (अपकार) ही करना उचित है ।

११ शु०