शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
१२२ | शुक्रनीतिः
राजा का भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन—राजा योग्यतानुसार भृत्यों एवं प्रजाजनों का मनोरञ्जन निम्नरीति से करे जैसे—किसी को शाखा-प्रदान ( यत्किंचित् देने ) से, किसी को फलदान ( यत्किंचित् से कुछ अधिक देने ) से, किसी को अच्छी दृष्टि से देखने से, किसी को हँसकर बात-चीत करने से, किसी को कोमल वचनों से, किसी को सुन्दर भोजन, सुन्दर वस्त्र, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) या धन देने से, किसी को अच्छी तरह से कुशल-प्रश्न करने से, किसी को किसी विभाग का अधिकार-प्रदान करने से, किसी को वाहन ( सवारी ) या योग्य आभूषण-प्रदान करने से, किसी को छात्र ( पक्षों का बना छाता ), आतपत्र ( वस्त्र का बना छाता ), चामर या दीपक-प्रदान करने से, किसी को क्षमा-प्रदान करने से, किसी को प्रणाम करने से, किसी को संमान के साथ उसके साथ गमन करने से, किसी को सत्कार करने से, किसी को शास्त्रीय प्रसङ्ग चलाने से, किसी को आदर, शान्ति या प्रेम-प्रदर्शन करने से, किसी को समीप में रहने से, किसी को अपने अर्द्धासन पर बैठाने से, किसी को संपूर्ण आसन-प्रदान करने से और किसी को स्तुति या उपकार का वर्णन करने से प्रसन्न करे ।
यत्कार्ये विनियुक्ता ये कार्याङ्कैरङ्कयेच्च तान् ॥ ४२६ ॥
लोहजैस्ताम्रजै रीतिभवै रजतसंभवैः ।
सौवर्णै रत्नजैर्वापि यथायोग्यैः स्वलाञ्छनैः ॥ ४२७ ॥
प्रविज्ञानाय दूरात्तु वस्त्रैश्च मुकुटैरपि ।
भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश—राजा जो भृत्य जिस कार्य में नियुक्त किये गये हों, उन्हें दूर से यह अमुक कार्य में नियुक्त है, इसको फौरन जानने के लिये लोहा, तामा, पीतल, चांदी, सोना या रत्न के बने हुये, योग्यतानुसार अपने-अपने चिह्नों, वस्त्रों और मुकुटों के द्वारा कार्यों ( विभागों ) के चिह्नों से युक्त करे ।
वाद्यवाहनभेदैश्च भृत्यान्कुर्यात् पृथक्पृथक् ॥ ४२८ ॥
स्वविशिष्टं च यच्चिह्नं न दद्यात् कस्यचिन्नृपः ।
भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध—और राजा विशिष्ट अधिकारियों को बाजे और सवारियों की भिन्नता से अर्थात् इस अधिकारी के यातायात के समय ऐसे बाजे होने चाहिये । और इस अधिकारी के यातायात में ऐसी सवारी होना चाहिये—इस भांति की विशेषताओं से पृथक्-पृथक् करे और राजा अपने विशिष्ट राजचिह्न छत्र-मुकुटादि को किसी के लिये न देवे ।
दश प्रोक्ताः पुरोधाद्या ब्राह्मणाः सर्व एव ते ॥ ४२६ ॥
द्वितीयोऽध्यायः १२३
द्वितीयोऽध्यायः १२३
अभावे क्षत्रिया योज्यास्तदभावे तयोरुजाः ।
नैव शूद्रास्तु संयोज्या गुणवन्तोपि पार्थिवैः ॥ ४३० ॥
१० प्रकृति पुरोहितादियों का जाति-नियम— पुरोहित आदि जो पूर्वोक्त १० प्रकृतियां ( प्रधान ) हैं उनके पद पर रहनेवाले सभी ब्राह्मण ही नियुक्त करने चाहिये । ब्राह्मण के अभाव में क्षत्रिय, क्षत्रिय के अभाव में वैश्यों की नियुक्ति करनी चाहिये । और राजा को गुणवान ( योग्य ) शूद्रों की नियुक्ति उक्तपदों पर नहीं ही करनी चाहिये ।
भागग्राही क्षत्रियस्तु साहसाधिपतिश्च सः ।
ग्रामपो ब्राह्मणो योज्यः कायस्थो लेखकस्तथा ॥ ४३१ ॥
शुल्कग्राही तु वैश्यो हि प्रतिहारश्च पादजः ।
सेनाधिपः क्षत्रियस्तु ब्राह्मणस्तदभावतः ॥ ४३२ ॥
भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश— और कर ( मालगुजारी ) वसूल करनेवाले तथा शासन कार्य करने-वाले लोगों के पद पर क्षत्रिय, ग्रामाध्यक्ष पद पर ब्राह्मण नियुक्त करना चाहिये । और लेखक पद पर कायस्थ,, शुल्क ( चुंगी आदि ) वसूल करने के लिये वैश्य, द्वारपाल पद पर शूद्र और सेनापति पद पर क्षत्रिय उसके अभाव में ब्राह्मण नियुक्त करना चाहिये ।
न वैश्यो न च वै शूद्रः कातरश्च कदाचन ।
सेनापतिः शूर एव योज्यः सर्वासु जातिषु ॥ ४३३ ॥
सेनापति पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश— और कभी वैश्य, शूद्र या कायर पुरुष सेनापति नहीं बनाना चाहिये क्योंकि सभी जातियों में जो शूर होता है वही सेनापति पद पर नियुक्त होता है ।
ससङ्करचतुर्वर्णधर्मोऽयं नैव पावनः ।
यस्य वर्णस्य यो राजा स वर्णः सुखमेधते ॥ ४३४ ॥
संकीर्ण जातियों के सहित चारो ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ) वर्णों का यह धर्म है । किन्तु यवनों का नहीं है । अर्थात् उक्तरीति से अधिकारी गणों की नियुक्ति में जाति का विचार यवनों में नहीं है और जिस जाति का राजा है उस जाति के लोग उसके राज्य में सुखी होते हैं ।
नोपकृतं मन्यते स्म न तुष्यति सुसेवनैः ।
कथान्तरे न स्मरति शङ्कते प्रलपत्यपि ॥ ३३५ ॥
क्षुब्धस्तनोति मर्माणि तं नृपं भृत्यकस्त्यजेत् ।
भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण— जो किसी के उपकार को
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नहीं मानता है और जो अच्छी से अच्छी सेवा करने पर भी नहीं संतुष्ट होता है। एवं बात-चीत के प्रसङ्ग में भृत्य का कभी स्मरण नहीं करता है प्रत्युत उस पर शङ्का करता है एवं वृथा बात-चीत करता है और कुपित होकर मर्मवेधी वाक्य बोलता है, ऐसे राजा को भृत्य छोड़ दे (उसकी नोकरी न करे)।
लक्षणं युवराजादेः कृत्यमुक्तं समासतः ॥ ४३६ ॥ इति शुक्रनीतौ युवराजादिलक्षणं नाम द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः।
इस प्रकार से युवराजादि का लक्षण तथा कृत्य संक्षेप से कहा गया।
इति शुक्रनीति-भाषानुवाद में युवराजादि-लक्षण नामक द्वितीय अध्याय समाप्त।
तृतीयोऽध्यायः
अथ साधारणं नीतिशास्त्रं सर्वेषु चोच्यते ।
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ १ ॥
सर्वों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश— अब युवराजादि के लक्षणादि का निरूपण करने के बाद राजा-प्रजा सभी लोगों के लिये नीति शास्त्र का वर्णन करते हैं। सभी प्राणियों को किसी भी कार्य करने की जितनी प्रवृत्तियां हैं वे सभी आत्मसुख के लिये होती हैं।
सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् ।
त्रिवर्गशून्यं नारम्भं भजेत्तं चाविरोधयन् ॥ २ ॥
अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमः ।
धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश— धर्म के बिना सुख नहीं होता है अतः धर्म में तत्पर होना चाहिये। धर्म, अर्थ, काम इनके वर्ग को 'त्रिवर्ग' कहते हैं। इससे शून्य किसी कार्य को न करे। उक्त त्रिवर्ग के विरोध को बचाते हुये मध्यवर्ती होकर सभी कार्यों में प्रतिपद् पर त्रिवर्ग का अनुसरण करे अर्थात् त्रिवर्ग का पालन न छोड़े।
नीचरोमनखश्मश्रुर्निर्मलांघ्रिमलायनः ॥ ३ ॥
स्नानशीलः सुसुरभिः सुवेशोऽनुल्बणोज्ज्वलः ।
धारयेत्सततं रत्नसिद्धमन्त्रमहौषधीः ॥ ४ ॥
सर्व-साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश— रोम (बाल)-दाढ़ी-मूंछ तथा नखों को नीच (छोटे २ अर्थात् बड़े हुये नहीं) एवं पैर तथा कान, नाक, आंख, मुख आदि को स्वच्छ किये हुये, स्नान किये हुये, सुगन्धित इत्र आदि लगाये हुये, अनुद्धत तथा उज्ज्वल सुन्दर वेश बनाये हुये, रत्न, सिद्ध मन्त्र एवं महौषधियों को नित्य धारण करना चाहिये।
सातपत्रपदत्राणो विचरेद्युगमात्रदृक् ।
निशि चात्ययिके कार्ये दण्डी मौली सहायवान् ॥ ५ ॥
छाता तथा जूता धारण किये हुये, युग (बैल आदि को रथ में जोतने के समय उनके कन्धों पर रखनेवाला काष्ठ) के बराबर दूरी पर दृष्टि रख कर मार्ग चलना चाहिये। रात्रि में किसी दुर्घटनाबश यदि घर से निकलना पड़े तो हाथ में दण्ड लेकर तथा सिर पर पगड़ी बांध कर एवं साथ में किसी सहायक का लेना उचित है।
न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्न वेगानीरयेद् बलात् ।
१२६ | शुक्रनीतिः
भक्त्या कल्याणमित्राणि संवेतेतरदूरगः ॥ ६ ॥
**निषिद्धाचरणों का निर्देश—**मल-मूत्रादि का वेग रोके हुये, किसी कार्य के करने में तत्पर न हो, और उक्त वेगों को बलपूर्वक न रोके तथा इतर (दुर्जनादि) से दूर रहकर कल्याणकारी कार्य और मित्रों का भक्तिपूर्वक सेवन करे।
हिंसास्तेयान्यथाकाम—पैशुन्यं परुषानृतम् ।
सम्भिन्नालापव्यापादमभिध्यादृग्विपर्ययम् ॥ ७ ॥
पापकर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत् ।
**दशविध पापों का निर्देश—**हिंसा (किसी की हत्या या कष्ट पहुँचाना), स्तेय (चोरी), अन्यथाकाम (अवैध रीति से मैथुन), पैशुन्य (चुगलखोरी), निष्ठुर भाषण, झूठा व्यवहार, भेदयुक्त बातों से दिल को तोड़ना, अविनाश (अशिष्टता), नास्तिकता, अवैध आचरण ये १० प्रकार के पाप कर्म हैं। इन्हें शरीर, वाणी तथा मन से छोड़ देना उचित है।
धर्मकार्यं यतन् शक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानवः ॥ ८ ॥
प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र वै नास्ति संशयः ।
यदि मनुष्य यथाशक्ति प्रयत्न करने पर भी धर्मकार्य का फल (बीच में विघ्न होने से) नहीं प्राप्त करता है तो वह इस संसार में दूसरे किसी समय में अवश्य उस पुण्यकार्य के फल को प्राप्त करता है—इसमें कोई सन्देह नहीं है।
मनसा चिन्तयन् पापं कर्मणा नाभिरोचयेत् ॥ ९ ॥
तत् प्राप्नोति फलं तस्येत्येव धर्मविदो विदुः ।
'मनसे पाप-कर्म की चिन्ता करता हुआ भी मनुष्य कभी उसे कार्य रूप में परिणत करने की इच्छा न करे। क्योंकि पापकर्म करने पर उसके फल को वह अवश्य पाता है' ऐसा धर्म के जाननेवाले पण्डितजन कहते हैं।
अवृत्तिव्याधि-शोकार्त्ताननुवर्तेत शक्तितः ॥ १० ॥
आत्मवत् सततं पश्येदपि कीटपिपीलिकम् ।
**दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश—**जीविका से रहित तथा व्याधि या शोक से आत्तंलोगों की यथाशक्ति सहायता पहुँचाकर उपकार करना चाहिये एवं कीड़े तथा चींटियों तक के भी सुख-दुःखादि को अपनी ही भाँति समझना चाहिये।
उपकारप्रधानः स्यादपकारपरेऽप्यरौ ॥ ११ ॥
संपद्विपत्स्वेकमना हेतावीर्षेत् फले न तु ।
अपने साथ अपकार करने में तत्पर शत्रु के साथ भी प्रधान रूप से
तृतीयोऽध्यायः १२७
उपकार ही करना चाहिये। और संपत्ति ( अभ्युदय ) तथा विपत्ति पड़ने पर दोनों में एकसी मन की दशा रखनी चाहिये एवं किसी उन्नतिविषयक कारणों के विषय में ही करने की ईर्ष्या रखनी चाहिये। उन्नति रूप फल के विषय में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये अर्थात् यदि कोई धनी हुआ तो इसकी ईर्ष्या करनी चाहिये कि 'मैं भी वैसा क्यों न उद्योग करूं कि धनी बन जाऊं' किन्तु धन के साथ ईर्ष्या करना अनुचित है।
काले हितं मितं ब्रूयादविसंवादि पेशलम् ॥ १२ ॥
पूर्वाभिभाषी सुमुखः सुशीलः करुणामृदुः ।
समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश— अहङ्कार-शून्य होकर पहले स्वयं वार्तालाप करना चाहिये। मुख की मुद्रा अच्छी रखनी चाहिये। सुशील तथा करुणा से कोमल चित्त होना चाहिये। और योग्यकाल उपस्थित होने पर थोडे शब्दों में, सुसङ्गत ( अटपटाङ्ग नहीं ) और मधुर वचन बोलना चाहिये।
नैकः सुखी न सर्वत्र विश्रब्धो न च शङ्कितः ॥ १३ ॥
अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध— अकेले सुखों का उपभोग नहीं करना चाहिये। सर्वत्र विश्वास या शङ्का रखना उचित नहीं है अर्थात् जो उसके योग्य हों उन पर विश्वास या शंका रखना उचित है।
न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् ।
प्रकाशयेन्नापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः ॥ १४ ॥
अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध— किसी को अपना शत्रु होकर भी दूसरे को नहीं बताना चाहिये तथा अपने स्वामी का अपने ऊपर किया हुआ अपमान तथा स्नेह का अभाव यदि हो तो उसे भी किसी से प्रकाशित नहीं करना चाहिये।
जनस्याशयमालक्ष्य यो यथा परितुष्यति ।
तं तथैवानुवर्तेत पराराधनपण्डितः ॥ १५ ॥
पराराधन-पण्डितों के व्यवहार का निर्देश— दूसरे को खुश रखने में निपुण व्यक्ति को चाहिये कि वह लोगों के भावों को समझकर तदनुसार जो जैसे खुश हो उसके साथ वैसा व्यवहार करे।
न पीडयेदिन्द्रियाणि न चैतान्यतिलालयेत् ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ १६ ॥
इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश— चक्षु आदि इन्द्रियों को उनके विषयों से बलपूर्वक अलग रख कर अधिक पीडित नहीं एवं विषयों में अधिक आसक्ति रख कर लालित भी नहीं करना चाहिये अर्थात् नियमपूर्वक रहकर समभाव
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से विषय भोग करना चाहिये । और इन्द्रियां यदि अधिक प्रबल हो जावें तो वे जबरदस्ती मन को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती हैं अत एव इनका सदा दमन करते रहना उचित है ।
एणो गजः पतङ्गश्च भृङ्गो मीनस्तु पञ्चमः ।
शब्दस्पर्शरूपगन्धरसैरेते हताः खलु ॥ १७ ॥
**इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश—**हरिण, हस्ती, फतरिङ्गे (पांखी), भौंरे, मछलियां ये पांचों क्रम से शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध तथा रस इन पांचों विषयों का उपभोग करने से निश्चय मारे जाते हैं, जैसे हरिण-स्वर युक्त सुन्दर गान सुनने में फंसकर नहीं भागता हुआ व्याध से मारा जाता है । हस्ती—हस्तिनी के स्पर्श करने में आसक्त होने से नहीं भागता हुआ बहकानेवाले से पकड़ा जाता है । पतङ्ग (फतरिङ्गा)—दीपक की शिखा का सुन्दर रूप देखने से उन्मत्त होकर उसी पर गिर जाने से मर जाता है । भृङ्ग—गन्ध के लोभ से कमल के संकुचित होने पर उसी के पत्तों के अन्दर बन्द हो जाता है । मत्स्य—मांस के रस का आस्वाद लेने में फंस कर कांटा चुभ जाने से तड़फड़ा कर मर जाता है ।
एषु स्पर्शो वरस्त्रीणां स्वान्तहारी मुनेरपि ।
अतोऽप्रमत्तः सेवेत विषयांस्तु यथोचितान् ॥ १८ ॥
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नात्यन्तैकान्तिकं वसेत् ।
**स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश—**इन शब्दादि विषयों में से उत्तम सुन्दिरयों का स्पर्श सद्-असत् का विचार करनेवाले मुनियों के भी मन को हरण करनेवाला होता है । अतः असावधानी न रखते हुये यथोचित रीति से उक्त विषयों का सेवन करना चाहिये क्योंकि अधिक सेवन से विनाश होता है । और माता, बहन या लड़की के साथ भी अधिकतर एकान्त स्थान में नहीं रहना चाहिये ।
यथासम्बन्धमाहूयादाभाष्याश्वास्य वै स्त्रियम् ॥ १९ ॥
स्वीयां तु परकीयां वा सुभगे भगिनीति च ।
**स्त्रियों के प्रति सम्बोधन-प्रकार—**और अपने या दूसरे के संपर्क की स्त्री को सम्बन्धानुसार हे सुभगे ! वा हे भगिनि ! इत्यादि रूप से पुकारकर आश्वासन देते हुये बुलाना चाहिये ।
सहवासोऽन्यपुरुषैः प्रकाशमपि भाषणम् ॥ २० ॥
स्वातन्त्र्यं न क्षणमपि ह्यावासोऽन्यगृहे तथा ।
**एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध—**अन्य पुरुषों के साथ अधिक सहवास रखना या प्रकाश रूप से (सामने होकर) भी बात चीत करना,
तृतीयोऽध्यायः १२५
क्षण भर के लिये भी स्वतन्त्रता देना या दूसरे के घर में निवास करने देना, ये सब स्त्रियों के लिये दोष हैं अतः इन से दूर रखना उचित है।
भर्त्रा पिताऽथवा राज्ञा पुत्रश्वशुरबान्धवैः ॥ २१ ॥
स्त्रीणां नैव तु देयः स्याद् गृहकृत्यैर्विना क्षणः ।
पति, पिता, राजा, पुत्र, श्वशुर, बान्धव इन सबों के लिये उचित है कि वे गृहकृत्यों के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिये थोड़ा भी समय फुर्सत का स्त्रियों को नहीं ही देवें।
चण्डं षण्ढं दण्डशीलमकामं सुप्रवासिनम् ॥ २२ ॥
सुदरिद्रं रोगिणं च ह्यन्यस्त्रीनिरतं सदा ।
पतिं दृष्ट्वा विरक्ता स्यान्नारी वाऽन्यं समाश्रयेत् ॥ २३ ॥
त्यक्त्वैतान् दुर्गुणान् यत्नात्ततो रक्ष्याः स्त्रियो नरैः ।
यत्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश— चण्ड (अत्यन्त क्रोधी), षण्ढ (नपुंसक), सदा दण्ड देनेवाले, अनुराग-रहित, अधिक प्रवास में रहनेवाले (पत्नी से अलग विदेश में रहनेवाले), अत्यन्त दरिद्र, रोगी, सदा पर-स्त्री में आसक्त रहनेवाले अपने पति को देखकर स्त्री विरक्त हो जाती है अथवा अन्य पुरुष का आश्रय पकड़ लेती है अतः इन दुर्गुणों को यत्नपूर्वक छोड़कर मनुष्यों को सदा स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिये।
वस्त्रान्नभूषणं प्रेममृदुवाग्भिश्च शक्तितः ॥ २४ ॥
स्वात्यन्तसन्निकर्षेण स्त्रियं पुत्रं च रक्षयेत् ।
वस्त्र, अन्न, आभूषण, प्रेम तथा मृदु वचनों से यथाशक्ति व्यवहार करते हुये अपने अत्यन्त समीप में रखकर स्त्री तथा पुत्र की रक्षा करे।
चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुषाशुचीन् ॥ २५ ॥
नाक्रामेच्छर्करालोष्टबलिस्नानभुवोऽपि च ।
चैत्यादिकों के लंघन का निषेध— चैत्य (रास्ते के देवाधिष्ठित वृक्ष विशेष), गुरुजन, पताका, अप्रशस्त वस्तुओं की छाया, भस्म, भूसी, अपवित्र-वस्तु, बालू (कंकरीली भूमि), ढेला, बलि (पूजा द्रव्य) तथा स्नानभूमि इनका उल्लङ्घन करना उचित नहीं है।
नदीं तरेन्न बाहुभ्यां नाग्निं स्कन्नमभिव्रजेत् ॥ २६ ॥
सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद् दुष्टयानवत् ।
तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध— बाहुओं से तैर कर नदी को नहीं पार करना चाहिये। ढकी हुई अग्नि को पैर से नहीं मसलना चाहिये पाठान्तर में अग्नि की राशि की तरफ नहीं जाना चाहिये। पार ले जाने में समर्थ है या नहीं ऐसी सन्देहयुक्त नौका पर और चढ़ने पर भार
६ शु०
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संभाल सकता है या नहीं ऐसे सन्देहयुक्त वृक्ष पर एवं छुए घोड़े आदि वाहन पर नहीं चढ़ना चाहिये।
नासिकां न विकृष्णीयान्नाकस्माद्विलिखेद् भुबम् ॥ २७ ॥
न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः ।
नाक को अंगुली से नहीं कुरेदना चाहिये अर्थात् उससे नासामल नहीं निकालना चाहिये। अकस्मात् पृथ्वी पर रेखा आदि नहीं खींचना चाहिये अथवा खोदना नहीं चाहिये। और अपने सिर को दोनों हाथों से एक साथ नहीं खुजलाना चाहिये।
नाङ्गैश्चेष्टेत विगुणं नासीतोत्कटुकश्चिरम् ॥ २८
देहवाक्चेतसां चेष्टाः प्राक् श्रमाद् विनिवर्त्तयेत् ।
अङ्गों को टेढ़ा-मेढ़ा करके चेष्टा नहीं करे, कठिन आसन पर देर तक एक आसन से नहीं बैठना चाहिये। देह, वाणी तथा मन के व्यापार को श्रम होने के पहले ही बन्द कर देना चाहिये अर्थात् थकावट जब तक न हो तभी तक कार्य करना चाहिये।
नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेन्नक्तं सेवेत न द्रुमम् ॥ २९ ॥
तथा चत्वरचैत्यं न चतुष्पथसुरालयान्।
शून्याटवीशून्यगृहश्मशानानि दिवापि न ॥ ३० ॥
**देरतक उकरू बैठने, रात्रि में वृक्ष पर चढ़ने आदि का निषेध—**ऊपर जानु करके (उकरू) देर तक नहीं बैठना चाहिये। रात्रि में पेड़ के तले नहीं रहना चाहिये एवं किसी देवता के चबूतरे या वृक्ष, चौराहा तथा देवमन्दिर में रात्रिनिवास नहीं करना चाहिये और शून्य जङ्गल या गृह और श्मशान में दिन में भी नहीं रहना चाहिये, रात्रि में तो नहीं ही रहना चाहिये।
सर्वथैक्षेत नादित्यं न भारं शिरसा वहेत् ।
नेक्षेत सततं सूक्ष्मं दीप्तामेध्याप्रियाणि च ॥ ३१ ॥
**सूर्य को निरन्तर देखने का निषेध—**किसी भी प्रकार से देर तक सूर्य की तरफ नहीं देखना चाहिये और सिर से बोझा नहीं उठाना चाहिये। निरन्तर सूक्ष्म, अत्यन्त चमक से युक्त, अपवित्र या अप्रिय वस्तुओं को देर तक नहीं देखना चाहिये।
सन्ध्यास्वभ्यवहारस्त्रीस्वप्नाध्ययनचिन्तनम् ।
मद्यविक्रयसन्धानदानादानानि नाचरेत् ॥ ३२ ॥
**सन्ध्या समय में भोजनादि का निषेध—**सन्ध्या समय में भोजन, स्त्री प्रसङ्ग, सोना, पढ़ना या किसी विषय की चिन्ता करना, मद्य का बेचना, चुआना, देना या लेना ये सब कार्य नहीं करना चाहिये।
तृतीयोऽध्यायः १३१
आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः । अनुकुर्यात् तमेवातो लौकिकार्थे परीक्षकः ॥ ३३ ॥
व्यवहार में लोक की आचार्य्यता का कथन— बुद्धिमान जनका प्रत्येक व्यवहार के लिये लोक (जनसमाज) ही आचार्य (उपदेष्टा) है। अतः विवेचना पूर्ण कार्य करनेवालों के लिये यही उचित है कि वह लौकिक कार्यों में लोक का ही अनुसरण करे।
राजदेशकुलज्ञातिसद्धर्मान् नैव दूषयेत् । शक्तोऽपि लौकिकाचारं मनसापि न लङ्घयेत् ॥ ३४ ॥
राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध— राजा, देश, कुल, ज्ञाति और सज्जन इनके जो भी धर्म हों उनको दोष न लगावे अर्थात् उसकी निन्दा न करे। सामर्थ्य रहते हुये भी लौकिक आचारों का मन से भी उल्लङ्घन न करे।
अयुक्तं यत् कृतं चोक्तं न बलाद्धेतुनोद्धरेत् । दुर्गुणस्य च वक्तारः प्रत्यक्षं विरला जनाः ॥ ३५ ॥
आग्रहपूर्वक भाषण का निषेध— किसी से जो अनुचित रूप से किया या कहा गया हो उसे जबरदस्ती या मिथ्या कारण दिखाकर उचित नहीं सिद्ध करना चाहिये। संसार में किसी के सामने उसके दुर्गुणों को कहनेवाले विरले ही लोग होते हैं।
लोकतः शास्त्रतो ज्ञात्वा ह्यतस्त्याज्यांस्त्यजेत् सुधीः । अनयं नयसंकाशं मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ३६ ॥
इसलिये लोक तथा शास्त्र से त्याज्य विषयों को जानकर बुद्धिमान व्यक्ति को उन्हें छोड़ देना चाहिये। 'अनीति नीति के समान है' इसकी मनसे भी कल्पना नहीं करनी चाहिये।
अयं सहस्रापराधी किमेकेन भवेन्मम । मत्वा नाघं स्मरेदीषद्विन्दुना पूर्यते घटः ॥ ३७ ॥
किंचित् भी पाप का स्मरण करने का निषेध— 'यह दूसरा व्यक्ति तो हजारों अपराधों से भरा हुआ है फिर यदि मेरे में एक दोष है तो उससे क्या बिगड़ सकता है' ऐसा समझ कर थोड़े से भी पाप का चिन्तन नहीं करना चाहिये क्योंकि जैसे बिन्दु-बिन्दु से घड़ा भर जाता है वैसे थोड़ा २ पापचिन्तन से वह व्यक्ति भी पाप से भर जाता है।
नक्तं दिनानि मे यान्ति कथम्भूतस्य सम्प्रति । दुःखभाग् न भवेदेवं नित्यं सन्निहितस्मृतिः ॥ ३८ ॥
अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के त्याग का निर्देश— इस समय प्रतिदिन किस
१३२ | शुक्रनीतिः
ढंग से मेरे दिन या रात्रि व्यतीत हो रहे हैं—इस तरह से जो नित्य अपने भले-या बुरे कर्मों का स्मरण (ख्याल) रखता है वह बुरा का त्याग एवं अच्छे का ग्रहण करने से कभी दुःखी नहीं होता है ।
समास-व्यूहहेत्वादि-कृतेच्छार्थं विहाय च ।
स्तुत्यर्थवादान् संत्यज्य सारं संगृह्य यत्नतः ॥ ३९ ॥
धर्मतत्त्वं हि गहनमतः सत्सेवितं नरः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणानां कर्म कुर्याद्विचक्षणः ॥ ४० ॥
**सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश—**विद्वान् मनुष्य श्रुति-स्मृति तथा पुराणों के वचनों में समास (तत्पुरुष-बहुव्रीहि आदि से पद की एकता) करने से किंवा विशिष्ट तर्क करने से या हेतु आदि दिखलाने से इच्छानुरूप अर्थ तथा प्रशंसापरक अर्थवाद को छोड़कर और यत्नपूर्वक उनके सारभाग को ग्रहण कर सज्जनों से सेवित गहन धर्म-तत्त्व समझ कर तदनुकूल कर्म को करे ।
न गोपयेद्वासयेच्च राजा मित्रं सुतं गुरुम् ।
अधर्मनिरतं स्तेनमाततायिनमप्युत ॥ ४१ ॥
**अधर्म में रत-मित्र-पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश—**राजा अधर्म में निरत मित्र, पुत्र या गुरु की, एवं चोर या आततायी की रक्षा न करे और न उन्हें अपने राज्य में रहने दे ।
अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रोन्मत्तो धनापहः ।
क्षेत्रदारहरश्चैतान् षड् विद्यादाततायिनः ॥ ४२ ॥
**आतताइयों के लक्षण—**अग्नि लगानेवाला, विष देनेवाला, शस्त्र से उन्मत्त होकर मारने के लिये उद्यत, धन लूटनेवाला, खेत तथा स्त्री को छीनने-वाला इन ६ व्यक्तियों को 'आततायी' समझना चाहिये ।
नोपेक्षेत स्त्रियं बालं रोगं दासं पशुं धनम् ।
विद्याभ्यासं क्षणमपि सत्सेवां बुद्धिमान्नरः ॥ ४३ ॥
**एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश—**स्त्री, बालक, रोग, दास, पशु, धन, विद्याभ्यास, सज्जन (साधु) पुरुषों-की सेवा इन सबों के विषय में क्षणभर भी उपेक्षा नहीं रखनी चाहिये । सदा इनका ध्यान रखना चाहिये ।
विरुद्धो यत्र नृपतिर्धनिकः श्रोत्रियो भिषक् ।
आचारश्च तथा देशो न तत्र दिवसं वसेत् ॥ ४४ ॥
**विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध—**जिस
तृतीयोऽध्यायः १३३
देश में राजा, धनी, वेद का ज्ञाता ब्राह्मण, वैद्य, आचार और देश अपने से विरुद्ध प्रतीत हों वहां पर एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिये ।
नपुंसकश्च स्त्री बालश्चण्डो मूर्खश्च साहसी ।
यत्राधिकारिणश्चैते न तत्र दिवसं वसेत् ॥ ४५ ॥
जिस राज्य में नपुंसक ( मेहरा ), स्त्री, बालक, अत्यन्त क्रोधी, मूर्ख या साहसी ( सहसा बिना विचारे कार्य करनेवाला ) इनमें से कोई भी अधिकारी वर्ग का हो, वहां पर एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिये ।
अविवेकी यत्र राजा सभ्या यत्र तु पाक्षिकाः ।
सन्मार्गोझितविद्वांसः साक्षिणोऽनृतवादिनः ॥ ४६ ॥
दुरात्मनां च प्राबल्यं स्त्रीणां नीचजनस्य च ।
यत्र नेच्छेद्धनं मानं वसतिं तत्र जीवितम् ॥ ४७ ॥
**अविवेकी राजादिक से धनादि की इच्छा करने का निषेध—**जहां पर राजा विवेक करनेवाला न हो और राजसभा के सभासद्-गण पक्षपात रखनेवाले हों, सदाचार से हीन पण्डित लोग हों, साक्षीगण ( गवाही देनेवाले लोग ) झूठ बोलनेवाले हों और जहां दुष्टों, स्त्रियों एवं नीचजनों की प्रबलता हो वहां पर रहने से 'धन, इज्जत, रहने के लिये स्थान और जीवन इनकी रक्षा होगी' इसकी इच्छा भी न करे अर्थात् कल्याण नहीं है अतः वहां रहना अनुचित है ।
माता न पालयेद्बाल्ये पिता साधु न शिक्षयेत् ।
राजा यदि हरेद्वित्तं का तत्र परिदेवना ॥ ४८ ॥
**मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश—**यदि बाल्यकाल में माता पालन एवं पिता अच्छी प्रकार से शिक्षा न दिलावे और राजा होकर यदि प्रजा का धन हरण करे तो इसमें खेद करना वृथा है । अर्थात् ऐसी स्थिति में बालक या प्रजा का अपना कोई दोष नहीं है अतः खेद व्यर्थ ही होता है ।
सुसेविताः प्रकुप्यन्ति मित्रस्वजनपार्थिवाः ।
गृहमग्न्यशनिहतं का तत्र परिदेवना ॥ ४९ ॥
मित्र, स्वजन तथा राजा इनकी भलीभांति सेवा करने पर भी यदि ये कुपित हों और गृह अग्नि से या बिजुली गिरने से नष्ट हो जाय तो अपना कोई वश न होने से खेद करना वृथा है ।
आप्तवाक्यमनादृत्य दर्पेणाचरितं यदि ।
फलितं विपरीतं तत् का तत्र परिदेवना ॥ ५० ॥
| १३४ | शुक्रनीतिः |
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और यदि किसी ने विश्वस्त या हितैषी योग्य व्यक्ति के बात को अहंकार-वश टालकर कोई कार्य करता है और उसका विपरीत ( बुरा ) फल पाता है तो उस पर उसका खेद करना वृथा है ।
सावधानमना नित्यं राजानं देवतां गुरुम् ।
अग्निं तपस्विनं धर्मज्ञानवृद्धं सुसेवयेत् ॥ ५१ ॥
**सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश—**सावधान-चित्त होकर राजा, देवता, गुरु, अग्नि, तपस्वी एवं धर्म वा ज्ञान में वृद्ध ( बड़े ) लोगों की नित्य अच्छी तरह से सेवा करनी चाहिये ।
मातृपितृगुरुस्वामि-भ्रातृपुत्रसखिष्वपि ।
न विरुध्येन्नापकुर्यान्मनसाऽपि क्षणं कचित् ॥ ५२ ॥
**माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध—**माता, पिता, गुरु, स्वामी, भाई, पुत्र तथा मित्र इन सबों का क्षण भर के लिये मन से भी कभी विरोध या अपकार नहीं करना चाहिये ।
स्वजनैर्न विरुद्धयेत न स्पर्धेत बलीयसा ।
न कुर्यात् स्त्रीबालवृद्धमूर्खेषु च विवादनम् ॥ ५३ ॥
**स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध—**स्वजनों के साथ विरोध, बलवान के साथ स्पर्धा ( बराबरी का दावा ) एवं स्त्री, बालक, वृद्ध या मूर्ख के साथ विवाद कभी नहीं करना चाहिये ।
एकः स्वादु न भुञ्जीत एकोऽर्थान्न विचिन्तयेत् ।
एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात् ॥ ५४ ॥
**अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध—**अकेले स्वादिष्ट भोजन नहीं करना चाहिये, अकेले किसी कार्य के विषय में विचार नहीं करना चाहिये, अकेले मार्ग नहीं चलना चाहिये, और सोये हुये लोगों के बीच में अकेले नहीं जागना चाहिये ।
नान्यधर्मं हि सेवेत न द्रुह्याद्वै कदाचन ।
हीनकर्मगुणैः स्त्रीभिर्नासीतैकासने क्वचित् ॥ ५५ ॥
**अन्य धर्म के सेवन का निषेध—**और कभी भी दूसरे धर्म को स्वीकार या उसका द्रोह नहीं करना चाहिये । और कभी हीन कर्म या गुण वाले दुर्जनों एवं स्त्रियों के साथ एक आसन पर नहीं बैठना चाहिये ।
षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ५६ ॥
प्रभवन्ति विघाताय कार्यस्यैते न संशयः ।
**त्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश—**इस संसार में १. निद्रा ( दिन में वा
तृतीयोऽध्यायः [१५५]
अधिक सोना ), २. तन्द्रा ( अर्द्धनिद्रित अवस्था ), ३. भय, ४. क्रोध, ५. आलस्य, ६. दीर्घ सूत्रता ( थोड़े समय में पूर्ण होने योग्य कार्य को देरी लगाकर करना ) इन ६ दोषों को ऐश्वर्य चाहनेवाले व्यक्ति त्याग कर दें। क्योंकि ये सब दोष कार्य नष्ट करने के लिये समर्थ होते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
उपायज्ञश्च योगज्ञस्तत्त्वज्ञः प्रतिभानवान् ॥ ५७ ॥
स्वधर्मनिरतो नित्यं परस्त्रीषु पराङ्मुखः ।
वक्तोहवांश्चित्रकथः स्यादकुण्ठितवाक् सदा ॥ ५८ ॥
मनुष्य को कौन सा कार्य करना और कौन सा छोड़ना चाहिये इसका निर्देश— प्रत्येक कार्य करने का उपाय और कौशल का जाननेवाला, तत्त्व विषय का ज्ञाता, प्रतिभाशाली, नित्य अपने धर्म में रत एवं परस्त्री से दूर रहनेवाला, वक्ता (बोलने में चतुर), तर्क करनेवाला, नाना प्रकार की मधुर बातें करनेवाला एवं बोलने में कुण्ठित नहीं होनेवाला सदा होना चाहिये।
चिरं संशृणुयान्नित्यं जानीयात्क्षिप्रमेव च ।
विज्ञाय प्रभजेदर्थान्न कामं प्रभजेत् क्वचित् ॥ ५९ ॥
नित्य देर तक बातें सुननी चाहिये अर्थात् पूरी बातें सुननी चाहिये एवं शीघ्र कहनेवालों की बातें समझनी चाहिये। समझकर किसी कार्य को करना चाहिये और कभी मनमानी नहीं करनी चाहिये।
क्रयविक्रयातिलिप्सां स्वदैन्यं दर्शयेन्नहि ।
कार्यं विनाऽन्यगेहे न नाज्ञातः प्रविशेदपि ॥ ६० ॥
किसी वस्तु के खरीदने या बेचने में अत्यन्त आग्रह एवं हर किसी के सामने अपनी दीनता नहीं प्रकट करनी चाहिये क्योंकि इनसे क्रम से लाभ में हानि तथा लघुता होती है। बिना प्रयोजन एवं बिना जान पहचान के स्वयं किसी दूसरे के गृह के अन्दर नहीं घुसना चाहिये।
अपृष्टो नैव कथयेद् गृहकृत्यं तुं कं प्रति ।
बह्वर्थाल्पाक्षरं कुर्यात् संल्लापं कार्यसाधकम् ॥ ६१ ॥
बिना पूछे किसी से कुछ कहने का निषेध— बिना पूछे किसी से अपने घर के कार्य या बातों को नहीं बताना चाहिये। बहुत अर्थों से भरा हुआ एवं थोड़े अक्षरों (शब्दों) से युक्त, कार्य को सिद्ध करनेवाला (मतलब की) सुन्दर वार्तालाप करना चाहिये।
न दर्शयेत् स्वाभिमतमनुभूताद्विना सदा ।
ज्ञात्वा परमतं सम्यक् तेनाज्ञातोत्तरं वदेत् ॥ ६२ ॥
बिना अनुभव के स्वाभिप्राय प्रकट करने का निषेध— बिना अनुभव किये
१३६ शुक्रनीतिः
हुये किसी विषय में अपना विचार सदा प्रकट नहीं करना चाहिये। और दूसरे के अभिप्राय को भलीभांति समझकर उससे अज्ञात उत्तर देना चाहिये।
दम्पत्योः कलहे साक्ष्यं न कुर्यात् पितृपुत्रयोः । सुगुप्तः कृत्यमन्त्रः स्यान्न त्यजेच्छरणागतम् ॥ ६३ ॥
**दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश—**स्त्री-पुरुष या पिता-पुत्र की आपसी झगड़े में किसी के तरफ से साक्षी (गवाही) नहीं देनी चाहिये। अपने कार्य तथा विचार को गुप्त रखना चाहिये अर्थात् बिना कार्य पूर्ण हुये प्रकाशित नहीं करना चाहिये। शरण में आये हुये विपत्ति-ग्रस्त का त्याग नहीं करना चाहिये।
यथाशक्ति चिकीर्षेत्तु कुर्यान्मुह्येच्च नापदि । कस्यचिन्न स्पृशेन्मर्म मिथ्यावादं न कस्यचित् ॥ ६४ ॥
**आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी बातें करने का निषेध—**यथा-शक्ति प्रत्येक कार्य करने की इच्छा करनी चाहिये। और कार्य करते हुये आपत्ति पड़ने पर विचलित नहीं होना चाहिये। किसी से मर्मवेधी (हृदय में चुभनेवाली) बातें नहीं करनी चाहिये एवं किसी के संबन्ध में या किसी से झूठी बातें नहीं करनी चाहिये।
नाश्लीलं कीर्तयेत् कञ्चित् प्रलापं न च कारयेत् ।
**अश्लील बातें आदि करने का निषेध—**अश्लील (घृणा-लज्जाविधोधक) बातें नहीं करनी चाहिये एवं कोई अनर्थक वचन नहीं बोलना चाहिये।
अस्वर्ग्यं स्याद्धर्म्यमपि लोकविद्वेषितं तु यत् ॥ ६५ ॥ स्वहेतुभिर्न हन्येत कस्य वाक्यं कदाचन । प्रविचार्य्योत्तरं देयं सहसा न वदेत् क्वचित् ॥ ६६ ॥
**लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध—**जो कार्य लोक में निन्दित होता है वह यदि धर्मयुक्त भी हो तो नरक में ले जानेवाला होता है अतः उसे नहीं करना चाहिये। अपने कारण से किसी की बात को न काटे। खूब विचार करके उत्तर देना चाहिये और सहसा कभी नहीं बोलना चाहिये।
शत्रोरपि गुणा ग्राह्या गुरोस्त्याज्यास्तु दुर्गुणाः ।
**शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश—**शत्रुओं के भी गुणों को ग्रहण करना चाहिये या उनका अभिनन्दन करना चाहिये। और गुरुजनों के भी दुर्गुणों को छोड़ देना चाहिये।
उत्कर्षो नैव नित्यः स्यान्नापकर्षस्तथैव च ॥ ६७ ॥ प्राक्कर्मवशतो नित्यं सधनो निर्धनो भवेत् । तस्मात् सर्वेषु भूतेषु मैत्रीं नैव च हापयेत् ॥ ६८ ॥
तृतीयोऽध्यायः १३७
तृतीयोऽध्यायः १३७
**प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश—**उत्कर्ष (सुख की अवस्था) या अपकर्ष (दुःखावस्थ।) नित्य नहीं बना रहता है। प्राक्तन कर्मवश मनुष्य धनवान या निर्धन सदा होता है। अतः एक सी अवस्था सदा न रहने से सभी प्राणियों में मैत्रीभाव (सुख-से सुखी-दुःख से दुःखी होना) रखना न छोड़े ऐसा करने से सभी लोग सन्तुष्ट रहकर दुःख नहीं पहुँचायेंगे।
दीर्घदर्शी सदा च स्यात् प्रत्युत्पन्नमतिः क्वचित् ।
साहसी सालसो चैव चिरकारी भवेन्न हि ॥ ६९ ॥
**दीर्घदर्शी के लक्षण—**सदा दूर तक सोचनेवाला तथा क्वचित् समयानुसार तत्काल कर्त्तव्य स्थिर करनेवाला होना चाहिये, और सहसा कार्य करनेवाला, आलसी तथा देरी से धीरे-धीरे कार्य समाप्त करनेवाला नहीं होना चाहिये।
यः सुदुर्निष्फलं कर्म ज्ञात्वा कर्तुं व्यवस्यति ।
द्रागादौ दीर्घदर्शी स्यात् स चिरं सुखमश्नुते ॥ ७० ॥
जो व्यक्ति किसी कार्य के अच्छे-बुरे फल या निष्फलता को विचार कर तदनुसार कार्य करने की चेष्टा करता है और जो कार्य करने के प्रथम शीघ्र ही दूर तक उसके परिणाम (फल) को जाननेवाला होता है वह चिरकाल तक सुख भोगता है। अतः दीर्घदर्शी होना उचित है।
प्रत्युत्पन्नमतिः प्राप्तां क्रियां कर्तुं व्यवस्यति ।
सिद्धिः सांशायिकी तत्र चापल्यात् कार्यगौरवात् ॥ ७१ ॥
**प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण—**जो प्रत्युत्पन्नमति (समयानुसार सूझवाला) व्यक्ति तत्काल में उपस्थित कार्य करने की चेष्टा करता है उसके कार्य में जल्द-बाजी तथा कार्य की गुरुता से सिद्धि के विषय में सन्देह बना रहता है अर्थात् वह कार्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है।
यतते नैव कालेऽपि क्रियां कर्तुं च सालसः ।
न सिद्धिस्तस्य कुत्रापि स नश्यति च सान्वयः ॥ ७२ ॥
**आलसी मनुष्य के लक्षण—**जो आलसी होता है वह समय उपस्थित होने पर भी करने योग्य कार्य के करने में प्रयत्नशील नहीं होता है, उसके कार्य की सिद्धि कभी भी नहीं होती है और वह वंश-सहित या साथी-सहित नष्ट हो जाता है।
क्रियाफलमविज्ञाय यतते साहसी च सः ।
दुःखभागी भवत्येव क्रियया तत्फलेन वा ॥ ७३ ॥
**साहसी के लक्षण व दोष—**जो साहसी व्यक्ति क्रिया के फल का बिना विचार किये हुये सहसा (एकाएक) कार्य करने का प्रयत्न करता है वह क्रिया या उसके फल के कारण से केवल दुःखभागी ही होता है।
१३८ शुक्रनीतिः
महत्कालेनाल्पकर्म चिरकारी करोति च ।
स शोचत्यल्पफलतो दीर्घदर्शी भवेदतः ॥ ७४ ॥
**चिरकारी मनुष्य के लक्षण—**जो चिरकारी (देरी तक कार्य करनेवाला) होता है वह थोड़े से कार्य को बहुत देर में धीरे २ करता हुआ समाप्त करता है वह थोड़ा फल होने से अनुताप करता है अतः दीर्घदर्शी (दूर तक परिणाम पर करनेवाली) होना चाहिये।
सुफलं तु भवेत्कर्म कदाचित् सहसाकृतम् ।
निष्फलं वापि प्रभवेत् कदाचित् सुविचारितम् ॥ ७५ ॥
तथापि नैव कुर्वीत सहसानर्थकारि तत् ।
कदाचिदपि सञ्जातमकार्यादिष्टसाधनम् ॥ ७६ ॥
यदनिष्टं तु सत्कार्यान्नाकार्यप्रेरकं हि तत् ।
**सहसा कार्य करने का निषेध—**सहसा किया हुआ भी कर्म कभी २ सुन्दर फल देनेवाला हो जाता है कभी २ भलीभांति विचार कर भी किया हुआ कर्म निष्फल हो जाता है। तथापि (कदाचित् कार्य सफलता होने पर भी) सहसा (बिना विचारे एकाएक) कार्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि वह अनर्थ पैदा करनेवाला होता है। और कदाचित् अकार्य (नहीं करने योग्य कार्य) से भी जो इष्टसिद्धि होती है और सत् (अच्छे) कार्य से जो अनिष्ट फल होता है, इससे वह अकार्य को करने के लिये प्रेरणा करनेवाला नहीं हो सकता है।
भृत्यो भ्राताऽपि वा पुत्रः पत्नी कुर्यान्न चैव यत् ॥ ७७ ॥
विधास्यन्ति च मित्राणि तत्कार्यमविशङ्कितम् ।
**मित्र की विशेषता—**भृत्य, भाई, पुत्र और पत्नी भी जिस कार्य को पूर्ण नहीं कर सकते, उसीको उसके मित्र-गण निःसन्देह पूर्ण कर देते हैं।
यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः ॥ ७८ ॥
मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ।
**बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध—**जो मन्दबुद्धि यथार्थ रूप से मित्र के भीतरी (अच्छे-बुरे) भाव को बिना समझे मित्रता के लिये उसे नियुक्त करता है उसका वह मैत्रीरूप अर्थ नष्ट हो जाता है।
न हि मानसिको धर्मः कस्यचिज्ज्ञायतेऽञ्जसा ॥ ७९ ॥
अतो यतेत तत्प्राप्त्यै मित्रलब्धिर्वरा नृणाम् ।
**मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश—**किसी के मानसिक भाव को वस्तुतः नहीं जाना जा सकता है। इससे उसकी (अच्छे मित्र की) प्राप्ति
तृतीयोऽध्यायः १३६
तृतीयोऽध्यायः १३६
के लिये प्रयत्न करना चाहिये। क्योंकि मनुष्यों के लिये मित्र का पाना उत्तम बात है।
नात्यन्तं विश्वसेत् कञ्चिद् विश्वस्तमपि सर्वदा ॥ ८० ॥ पुत्रं वा भ्रातरं भार्यामामात्यमधिकारिणम् । धनस्त्रीराज्यलोभो हि सर्वेषामधिको यतः ॥ ८१ ॥
विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध—सर्वदा विश्वासपात्र किसी भी व्यक्ति का यहां तक पुत्र, भाई, स्त्री, अमात्य या अधिकारी पुरुष का भी अत्यन्त विश्वास नहीं करना चाहिये। क्योंकि सभी लोगों को धन, स्त्री तथा राज्य का लोभ अधिक रूप से होता है।
प्रामाणिकं चानुभूतमाप्तं सर्वत्र विश्वसेत् । प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश—अतः विश्वस्त रूप से प्रामाणिक, सुपरिचित एवं हितैषी लोगों का सर्वत्र विश्वास करना चाहिये।
विश्वसित्वात्मवद्गूढस्तत्कार्यं विमृशेत् स्वयम् ॥ ८२ ॥ तद्वाक्यं तर्कतोऽनर्थं विपरीतं न चिन्तयेत् । परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश—अपने समान विश्वास करके भी छिपकर उसे (विश्वासपात्र) के कार्यों की परीक्षा करे। और परीक्षा करने के बाद वस्तुतः विश्वासपात्र निकलने पर उसके वाक्यों में तर्क से अनर्थ होने से विरुद्ध जैसा विचार न करे अर्थात् उसके वचनों को निःसन्देह सर्वतोभावेन मान ले।
चतुःषष्टितमांशं तन्नाशितं क्षमयेदथ ॥ ८३ ॥ स्वधर्मनीतिबलवांस्तेन मैत्रीं प्रधारयेत् । और यदि उक्त विश्वासपात्र व्यक्ति के द्वारा कार्य का ६४ वां भाग (यत्किञ्चित् भाग) नष्ट हो जाय तो भी उसे क्षमा कर दे (उसका विचार न करे) और वह अपने धर्म तथा नीति में बलवान् है अतः उसके साथ मैत्री रखे।
दानैर्मानैश्च सत्कारैः सुपूज्यान् पूजयेत् सदा ॥ ८४ ॥ दान, मान और सेवा से अत्यन्त पूज्यों की सदा पूजा करे।
कदापि नोग्रदण्डः स्यात् कटुभाषणतत्परः । भार्या पुत्रोऽप्युद्विजते कटुवाक्यादुग्रदण्डतः ॥ ८५ ॥ उग्र दण्ड और कटु वचन का निषेध—कभी भी उग्र दण्ड देनेवाला एवं कटु-भाषण करने में तत्पर नहीं होना चाहिये, क्योंकि स्त्री तथा पुत्र भी कटु-भाषण करने एवं उग्र दण्ड करने से उद्विग्न हो उठते हैं।
पशवोऽपि वशं यान्ति दानैश्च मृदुभाषणैः ।
: शुक्रनीतिः
१४०
और पशु भी चारा देने एवं पुचकार कर बुलाने से वश में हो जाते हैं। फिर मनुष्यों के विषय में क्या कहना है ?।
न विद्यया न शौर्येण धनेनाभिजनेन च ॥ ८६ ॥
न बलेन प्रमत्तः स्यान्नातिमानी कदाचन ।
विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध— विद्या, शूरता, धन, कुल और बल के मद से मतवाला एवं अत्यन्त मानी कभी नहीं होना चाहिये ।
नाप्तोपदेशं संवेत्ति विद्यामत्तः स्वहेतुभिः ॥ ८७ ॥
अनर्थमप्यभिप्रेतं मन्यते परमार्थवत् ।
महाजनैर्धृतः पन्था येन संत्यज्यते बलात् ॥ ८८ ॥
विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल— विद्या के मद से उन्मत्त पुरुष अपने तर्कों से आप्त (परमहितैषी) जनों के उपदेश-वचनों को कुछ भी नहीं समझता है और अनर्थकारी भी अपने अभीष्ट विचार को परमार्थ-युक्त (उचित कर्तव्य) समझता है। और जिससे वह अच्छे पुरुषों से स्वीकृत मार्ग का भी हठात् परित्याग कर देता है।
शौर्यमत्तस्तु सहसा युद्धं कृत्वा जहात्यसून् ।
व्यूहादियुद्धकौशल्यं तिरस्कृत्य च शात्रवान् ॥ ८९ ॥
शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल— और जो व्यक्ति शूरता से मत्त होता है वह सहसा (बिना विचारे) शस्त्रों को धारण किये हुये व्यूह-रचना आदि युद्धसंबन्धी कौशल का भी तिरस्कार करके युद्ध करता हुआ अपने प्राणों का परित्याग कर देता है।
श्रीमत्तः पुरुषो वेत्ति न दुष्कीर्तिमजो यथा ।
स्वमूत्रगन्धं मूत्रेण मुखमासिञ्चते स्वकम् ॥ ९० ॥
धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन— जैसे बकरा अपने मूत्र के गन्ध को नहीं जानता है बल्कि उसी मूत्र से अपने मुख को सींचता रहता है उसी भांति धन के मद से मत्त पुरुष अपने मुख को दुष्कीर्ति से नीचे करवाता है तो भी दुष्कीर्ति का नहीं ख्याल करता है।
तथाभिजनमत्तस्तु सर्वान्नैवावमन्यते ।
श्रेष्ठानपीतरान्सम्यगकार्ये कुरुते मतिम् ॥ ९१ ॥
कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन— तथा कुलीनता के मद से मत्त पुरुष श्रेष्ठ तथा नीच सभी लोगों का तिरस्कार करता रहता है। और नहीं करने योग्य बुरे कार्यों में अपनी बुद्धि अच्छी तरह से करता है अर्थात् बुरे कार्य करने का विचार रखता है और सदा करता भी है।
बलमत्तस्तु सहसा युद्धे विदधते मनः ।
तृतीयोऽध्यायः १४९
तृतीयोऽध्यायः १४९
बलेन बाधते सर्वानश्वादीनपि हान्यथा ॥ ६२ ॥ बलमत्त की स्थिति का वर्णन— बल के मद से मत्त पुरुष एकाएक बिना समझे-बूझे युद्ध करने में मन लगाता है, और मनके विरुद्ध चलने पर अपने बल से सबों को कष्ट पहुँचाता है यहां तक अश्वादियों को भी पीडित करता है।
मानमत्तो मन्यतेस्म तृणवच्चाखिलं जगत् ।
अनर्होपि च सर्वेभ्यस्त्वत्यर्थासनमिच्छति ॥ ६३ ॥
मानमत्त की स्थिति का वर्णन— अभिमान से मतवाला पुरुष सम्पूर्ण जगत् के लोगों को तृण के समान तुच्छ समझता है और स्वयं अयोग्य होकर भी सबों से अधिक श्रेष्ठ आसन पाने की इच्छा करता है।
मदा एतेऽवलिप्तानां सतामेते दमाः स्मृताः ।
विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश— गर्वयुक्त लोगों के लिये ही पूर्वोक्त विद्या, शौर्य आदि ये सब मद (उन्मत्त बनानेवाले) होते हैं किन्तु सज्जनों के लिये ये ही दम (विनय लानेवाले) होते हैं।
विद्यायाश्च फलं ज्ञानं विनयश्च फलं श्रियः ॥ ६४ ॥
यज्ञदाने बलफलं सद्रक्षणमुदाहृतम् ।
विद्यादिकों के फल— जैसे विद्या का फल ज्ञान और विनय है। लक्ष्मी (धन) का फल यज्ञ तथा दान करना है। बल का फल सज्जनों की रक्षा करना कहा है।
नामिताः शत्रवः शौर्यफलं च करदीकृताः ॥ ६५ ॥
शमो दमश्चार्जवं चाभिजनस्य फलं त्विदम् ।
मानस्य तु फलं चैतत्सर्वे स्वसदृशा इति ॥ ६६ ॥
शूरतादि के फलों का निर्देश— शूरता का फल शत्रुओं को सिर झुकाना तथा उनको कर देनेवाली प्रजा बनाना है। और अभिजन (कुलीनता) का फल यह है कि मनको शान्त रखना, इन्द्रियों का दमन करना एवं सरलता रखना। मान का फल तो यह है कि—सब को अपने सदृश संमान-योग्य समझना।
सुविद्यामन्त्रभैषज्यस्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ।
गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन मानमुत्सृज्य साधकः ॥ ६७ ॥
सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश— अपने कार्य को सिद्ध करनेवाला पुरुष अपने गौरव को त्यागकर अत्यन्त प्रयत्न के साथ सुन्दर विद्या, मन्त्र, औषध तथा स्त्रीरत्न (उत्तम गुणयुक्त सुन्दर स्त्री) यदि नीच-कुलवाले के पास हो तो भी उसे ग्रहण करे।
उपेक्षेत प्रनष्टं यत्प्राप्तं यत्तदुपाहरेत् ।