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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१९

नर्तकादियों का धनविभागविषयक निर्देश— नाचनेवालों के लिये भी वही विधि विद्वानों ने कही है। जैसे ताल का जाननेवाला अर्जित धन का आधा भाग पाता है शेष धन में गाने वाले सब लोग समान-समान भाग में बाँट लेते हैं।

परराष्ट्राद्धनं यत्स्याच्चोरैः स्वाम्याज्ञया हृतम् ॥ ३०५ ॥
राज्ञे षष्ठांशमुद्धृत्य विभजेरन् समांशकम् ।

चोरों का धनविभागविषयक निर्देश— अपने स्वामी की आज्ञा से चोर लोग दूसरे के राज्य में जाकर जो धन चुराकर लाते हैं उसमें से छठा भाग राजा को देने के बाद शेष धन को आपस में समान भाग से बाँट कर ले लेते हैं।

तेषां चेत् प्रस्रुतानां च ग्रहणं समवाप्नुयात् ॥ ३०६ ॥
तन्मोक्षार्थं च यद्दत्तं वहेयुस्ते समांशतः ।

और यदि चोरी करने के बाद वे लोग पकड़ लिये जावें तो अपने छूटने के लिये जो द्रव्य खर्च हो उसको समान भाग से बाँट कर अपने-अपने हिस्से में से दे देवें।

प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना ॥ ३०७ ॥
समन्यूनाधिकैरंशैर्लाभास्तेषां तथाविधः ।
समो न्यूनोऽधिको ह्यांशो योऽनुक्षिप्तस्तथैव सः ॥ ३०८ ॥

व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश— जो लोग मिलकर सुवर्ण, धान्य तथा रसादि द्रव्य का कोई व्यवसाय करते हैं उन में जिसका जैसा कार्य हो और धन लगा हो उसके अनुरूप बराबर, न्यून या अधिक अंश में लाभांश में से उन्हें मिलता है। अर्थात् व्यवसाय के प्रारम्भ में उन लोगों ने सम, न्यून या अधिक अंश में जो द्रव्य लगाया हो उसी के अनुसार उनका भाग होता है।

व्ययं दद्यात् कर्म कुर्याल्लाभं गृह्णीत चैव हि ।
वणिजानां कर्षकाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३०९ ॥

एवं वे तदनुसार व्यय एवं कर्म करते हैं तथा लाभ भी प्राप्त करते हैं। यह विधि बनियों और कृषकों के लिये कही हुई है।

सामान्यं याचितं न्यास आधिर्दासाश्च तद्धनम् ।
अन्वाहितं च निक्षेपः सर्वस्वं चान्वये सति ॥ ३१० ॥
आपत्स्वपि न देयानि नव वस्तूनि पण्डितैः ।

आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश— १. बटवारे में प्राप्त धन, २. पुनः लौटा देने के लिये मांगकर लाया हुआ धन, ३. धरोहर

३२० | शुक्रनीतिः

में रखा हुआ धन, ४. बन्धक रखा हुआ धन, ५. दास, ६. दास का धन, ७. दूसरे के हाथ में रखने के लिये दिया हुआ धन, ८. शिल्पी के हाथ में संस्कार करने के लिये दिया हुआ द्रव्य, ९. सन्तान के रहने पर अपना सर्वस्व ( संपूर्ण धन) ये ९ प्रकार के धन या वस्तु आपत्ति आने पर भी दूसरे के हाथ बेच डालना या दे देना आदि कुछ भी नहीं करना चाहिये ।

अदेयं यश्च गृह्णाति यश्चादेयं प्रयच्छति ॥ ३११ ॥
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ चोत्तमसाहसम् ।

**उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश—**यदि नहीं देने योग्य किसी वस्तु को जो कोई किसी से लेता है या किसी को देता है तो वे दोनों (ग्रहीता-दाता) चौर की भाँति दण्डनीय होते हैं और उत्तम साहस नामक दण्ड (जुर्माना) देने के अधिकारी होते हैं।

अस्वामिकेभ्यश्चौरेभ्यो विगृह्णाति धनं तु यः ॥ ३१२ ॥
अव्यक्तमेव क्रीणाति स दण्ड्यश्चौरवन्नृपैः ।

**अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश—**जिस वस्तु का वह स्वामी नहीं है उससे जो खरीदता है या चोरों से माल लेता है या गुप्त-छुप में किसी से माल खरीदता है वह राजा के द्वारा चोर की भाँति दण्डनीय होता है।

ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनपकारिणम् ॥ ३१३ ॥
अदुष्टञ्चर्त्विजं याज्यो विनेयौ तावुभावपि ।

**त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण—**जो पुरोहित निर्दोष एवं कोई अपकार नहीं करनेवाले अपने यजमान का एवं जो यजमान निर्दोष तथा अपक- कारी पुरोहित का त्याग करता है तो वे दोनों दंडनीय होते हैं।

द्वात्रिंशांशं षोडशांशं लाभं पण्ये नियोजयेत् ॥ ३१४ ॥
नान्यथा तद्व्ययं ज्ञात्वा देशाद्यनुरूपतः ।

**राजा को ३२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश—**बनिया (व्यवसायी) विक्री के वस्तुओं पर जैसा प्रदेश या समय हो उसके अनुरूप उस वस्तु के लाने में किये हुये व्यय को समझ कर ३२ वाँ या १६ वाँ भाग लाभ लेने की व्यवस्था करे, इससे अधिक लाभ न लेवे।

वृद्धिं हित्वा ह्यर्थधनैर्वाणिज्यं कारयेत् सदा ॥ ३१५ ॥

व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश—'मैं वृद्धि को नहीं ग्रहण करूँगा' ऐसा कहकर और 'वाणिज्य में लब्ध आधा धन दूंगा' इस प्रकार के स्वीकृत वचनों के द्वारा सदा वाणिज्य करावे। अथवा राजा वृद्धि मुनाफा छोड़कर मूल धन के आधे धन से सदा व्यापारी से व्यापार करावे।

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२१

मूलात्तु द्विगुणा वृद्धिर्गृहीता चाधमर्णिकात् ।
तदोत्तमर्णमूलं तु दापयेन्नाधिकं ततः ॥ ३१६ ॥
**मूल से दूना ब्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिलवाने का निर्देश—**यदि कर्ज देनेवाला महाजन मूल धन से द्विगुण धन सूद में ले चुका हो तो कर्जदार से महाजन के दिये हुये मूल धन को ही राजा दिलावे अधिक न दिलावे ।

धनिकाश्चक्रवृद्ध्यादिमिषतस्तु प्रजाधनम् ।
संहरन्ति ह्यतस्तेभ्यो राजा संरक्षयेत् प्रजाम् ॥ ३१७ ॥
धनी महाजन लोग चक्रवृद्धि (सूद-दरसूद) के व्याज से कर्जदार प्रजाओं का अधिकांश धन हर लेते हैं, अतः राजा उन महाजनों से प्रजा की भलीभांति रक्षा करे ।

समर्थः सन्न ददाति गृहीतं धनिकाद्धनम् ।
राजा सम्दापयेत्तस्मात् सामदण्डविकर्षणैः ॥ ३१८ ॥
यदि कोई समर्थ होकर भी धनिक से लिये हुये धन को नहीं देता है तो राजा समझा-बुझाकर या दण्ड का प्रयोग कर कर्जदार से महाजन को धन दिला दे ।

लिखितं तु यदा यस्य नष्टं तेन प्रबोधितम् ।
विज्ञाय साक्षिभिः सम्यक् पूर्ववद्दापयेत्तदा ॥ ३१९ ॥
**लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश—**जब जिस किसी के पास से किसी का लिखित ऋणपत्र (पुरनोट) नष्ट हो जाय और वह राजा को सूचित कर दे तो राजा साक्षियों के द्वारा भलीभांति समझकर पूर्व की भांति (पुरनोट में लिखित की भांति) ही उसे कर्जदार से द्रव्य दिला दे ।

अदत्तं यश्च गृह्णाति सुदत्तं पुनरिच्छति ।
दण्डनीयावुभावेतौ धर्मज्ञेन महीक्षिता ॥ ३२० ॥
जो किसी द्वारा नहीं दी हुई वस्तु को किसी से ले लेता है और जो भलीभांति से दूसरे को दे दी गई वस्तु को पुनः लेना चाहता है तो वे दोनों ही धर्म के जानकार द्वारा दण्डनीय होते हैं ।

कूटपण्यस्य विक्रेता स दण्ड्यश्चौरवत् सदा ।
**खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जो खोटी वस्तु या धोकेबाजी से किसी वस्तु को बेचता है तो वह सदा राजा द्वारा चोर की भांति दण्डनीय होता है ।

दृष्ट्वा कार्याणि च गुणाञ्छिल्पिनां वृत्तिमावहेत् ॥ ३२१ ॥
२१ शु०

३२२ शुक्रनीतिः

शिल्पियों की भृति का विचार—कारीगरों के कार्य तथा गुण को देखकर उनकी मजदूरी या तनखाह देवे।

पञ्चमांशं चतुर्थांशं तृतीयांशं तु कल्पयेत्।
अर्धं वा राजताद्राज्ञा नाधिकं तु दिने दिने॥ ३२२॥

स्वर्णकार की भृति का विचार—राजा प्रतिदिन चांदी की विक्री में से पांचवां, चौथा, तीसरा या आधा भाग योग्यतानुसार कर रूप में ग्रहण करे। किन्तु आधे से अधिक कर न लेवे।

विद्रुतं न तु हीनं स्यात् स्वर्णं पलशतं शुचि।
चतुःशतांशं रजतं ताम्रं न्यूनं शतांशकम्॥ ३२३॥

१०० पल (४०० भर) भर निर्दोष सोना गलाने पर तौल में कम नहीं होना चाहिये। निर्दोष चांदी (१०० पल भर) गलाने पर ४०० वां अंश तथा तामा १०० वां अंश न्यून होना चाहिये।

वङ्गं च जसद्ं सीसं हीनं स्यात् षोडशांशकम्।
अयोऽष्टांशं त्वन्यथा तु दण्ड्यः शिल्पी सदा नृपैः॥ ३२४॥

रांगा, जस्ता और सीसा (धातु विशेष) गलाने पर १६ वां भाग कम होना चाहिये। लोहा तो गलाने पर अष्टमांश हीन होना चाहिये। अन्यथा (पूर्वोक्त मान से अधिक हीन होने पर) गलानेवाला कारीगर राजा द्वारा सदा दण्डनीय होता है।

सुवर्णं द्विशतांशं तु रजतं च शतांशकम्।
हीनं सुघटिते कार्ये सुसंयोगे तु वर्धते॥ ३२५॥
षोडशांशं त्वन्यथा हि दण्ड्यः स्यात् स्वर्णकारकः।
संयोगघटनं दृष्ट्वा वृद्धिं ह्रासं प्रकल्पयेत्॥ ३२६॥

सुन्दर रीति से अलंकार आदि बनाये जाने में छीलने आदि से सोना २०० वां अंश और चांदी १०० वां अंश तौल में हीन हो जाता है। सुन्दर रीति से टांका आदि देने में १६ वां अंश तौल में बढ़ जाता है। इससे अन्यथा तौल में न्यूनाधिक्य होने पर सुनार दण्डनीय होता है। और जिस प्रकार टांका आदि देने में मिलावट की जाती है उसी के अनुसार विचारक द्वारा सोने आदि की वृद्धि तथा ह्रास की कल्पना की जानी चाहिये।

स्वर्णस्योत्तमकार्ये तु भृतिस्त्रिंशांशकी मता।
षष्ठ्यंशकी मध्यकार्ये हीनकार्ये तदर्धकी॥ ३२७॥

सोने के उत्तम बने हुये अलङ्कार की बनवाई मजदूरी ३० वां भाग के तुल्य होती है। मध्यम बने हुये की ६० वां भाग तथा हीन बने हुये की १२० वां भाग के तुल्य मजदूरी होती है।

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२३

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२३

तदर्द्धा कटके ज्ञेया विद्रुते तु तदर्द्धकी । और यदि केवल कड़ा ( हाथ में पहनने का आभूषण ) बनवाया हो तो २४० वाँ भाग एवं केवल सोना गलवाने की मजदूरी ४८० वाँ भाग के तुल्य होती है।

उत्तमे राजते त्वर्द्धा तदर्द्धा मध्यमे स्मृता ॥ ३२८ ॥ हीने तदर्द्धा कटके तदर्द्धा संप्रकीर्त्तिता । उत्तम प्रकार के चाँदी के बने आभूषणादि की मजदूरी आधा भाग ( जितना हो तौल से उसकी आधी ), मध्यम की ४ था भाग तथा हीन की ८ वाँ भाग एवं कड़ा की १६ वाँ भाग मजदूरी होती है।

पादमात्रा सृतिस्ताम्रे वङ्गे च जसदे तथा ॥ ३२६ ॥ लोहेऽर्द्धा वा समा वापि द्विगुणाऽष्टगुणाऽथवा । तामा, रांगा तथा जस्ता की बनी वस्तुओं की मजदूरी ४ थे भाग के तुल्य होती है और लोहे की बनी वस्तुओं की मजदूरी आधी, बराबर, दुगुनी अथवा अठगुनी होती है।

धातूनां कूटकारी तु द्विगुणो दण्डमर्हति ॥ ३३० ॥ धातुओं में मिलावट करने पर दूना दण्ड देने का निर्देश—धातुओं के विषय में यदि कोई मिलावट या जालसाजी किसी प्रकार की करे तो उसे मूल्य से दुगुना दण्ड ( जुर्माना ) देना पड़ता है।

लोकप्रचारैरूत्पन्नो मुनिभिर्विघृतः पुरा । व्यवहारोऽनन्तपथः स वक्तुं नैव शक्यते ॥ ३३१ ॥ लोगों के नाना प्रकार के आचरणों से उत्पन्न हुआ तथा पूर्वकाल में मुनियों द्वारा निरूपित व्यवहार के मार्ग अनन्त हैं अतः उनका यथावत् वर्णन करना असम्भव है।

उक्तं राष्ट्रप्रकरणं समासात् पञ्चमं तथा । अत्रानुक्ता गुणा दोषास्ते ज्ञेया लोकशास्त्रतः ॥ ३३२ ॥ इति शुक्रनीतौ राष्ट्रेऽन्त्यं चतुर्थेऽध्याये राजधर्मनिरूपणं नाम पञ्चमं प्रकरणम् समाप्तम् । इस प्रकार से संक्षेप में पञ्चम राष्ट्रप्रकरण मैंने कहा। इसमें जो गुण या दोष नहीं कहे जा सके उन्हें लोक तथा अन्य ग्रन्थों से जान लेना चाहिये।

इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में राष्ट्रविषयक चतुर्थाध्याय में अन्तिम राजधर्मनिरूपण-नामक पञ्चम प्रकरण समाप्त हुआ।

षष्ठं दुर्गप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः।

चतुर्थाध्यायस्य षष्ठं प्रकरणम्।

षष्ठं दुर्गप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः।
खातकण्टकपाषाणैर्दुष्पथं दुर्गमैरिणम् ॥ १ ॥

**दुर्ग-प्रकरण के आरम्भ में ऐरिण दुर्ग के लक्षण—**अब छठे दुर्ग प्रकरण को संक्षेप से कहता हूँ । खाई ( गड्ढे ), कांटों तथा पत्थरों से जिसके मार्ग दुर्गम बने हों उसे 'ऐरिण' दुर्ग कहते हैं ।

परितस्तु महाखातं पारिखं दुर्गमेव तत् ।
इष्टकोपलमृद्वित्तिप्राकारं पारिघं स्मृतम् ॥ २ ॥

**पारिख तथा पारिघ दुर्ग के लक्षण—**और जिसके चारों तरफ बहुत बड़ी खाई हो उसे 'पारिख' दुर्ग कहते हैं । जिसके चारों तरफ ईंट, पत्थर तथा मिट्टी से बनी बड़ी-बड़ी दीवारों का परकोटा बना हो उसे 'पारिघ' दुर्ग कहते हैं ।

महाकण्टकवृक्षौघैर्व्याप्तं तद्वनदुर्गमम् ।
जलाभावस्तु परितो धन्वदुर्गं प्रकीर्तितम् ॥ ३ ॥

**वनदुर्ग तथा धन्व दुर्ग के लक्षण—**जो बहुत बड़े-बड़े कांटेदार वृक्षों के समूह से चारों तरफ घिरा हुआ हो, उसे 'वनदुर्गम' (वनदुर्ग) कहते हैं । जिसके चारों तरफ बहुत बहुत दूर तक मरुभूमि फैली हो उसे 'धन्वदुर्ग' कहते हैं ।

जलदुर्गं स्मृतं तज्ज्ञैरासमन्तान्महाजलम् ।
सुवारिपृष्ठोच्चघरं विविक्ते गिरिदुर्गमम् ॥ ४ ॥

**जलदुर्ग तथा गिरिदुर्ग के लक्षण—**जिसके चारों तरफ बहुत दूर तक फैली हुई जलराशि हो, उसे उस विषय के ज्ञाता लोग 'जलदुर्ग' कहते हैं । जो एकान्त में किसी पहाड़ी के ऊपर बना हो एवं उसके ऊपर जलाश्रय का भी प्रबन्ध हो तो उसे 'गिरिदुर्ग' कहते हैं ।

अभेद्यं व्यूहविद्वीरव्याप्तं तत्सैन्यदुर्गमम् ।
सहायदुर्गं तज्ज्ञेयं शूरानुकूलबान्धवम् ॥ ५ ॥

**सैन्यदुर्ग तथा सहायदुर्ग के लक्षण—**व्यूह-रचना में चतुर वीरों से व्याप्त होने से जो अभेद्य (आक्रमण द्वारा अजेय) हो उसे 'सैन्यदुर्ग' कहते हैं । जिसमें शूर एवं सदा अनुकूल रहनेवाले बान्धव लोग रहते हों उसे 'सहायदुर्ग' कहते हैं ।

पारिखादैरिणं श्रेष्ठं पारिघं तु ततो वनम् ।
ततो धन्वजलं तस्माद् गिरिदुर्गं ततः स्मृतम् ॥ ६ ॥

ऐरिणादि दुर्ग का तारतम्य-निर्देश—'पारिख'दुर्ग से श्रेष्ठ 'ऐरिण' दुर्ग

चतुर्थाध्याये दुर्गनिरूपणप्रकरणम् ३२५

उससे श्रेष्ठ 'पारिघदुर्ग' और उससे भी श्रेष्ठ 'वनदुर्ग' उससे भी श्रेष्ठ 'धन्वदुर्ग' उससे श्रेष्ठ 'जलदुर्ग' उससे भी श्रेष्ठ 'गिरिदुर्ग' माना गया है ।

सहायसैन्यदुर्गे तु सर्वदुर्गप्रसाधिके ।
ताभ्यां विनाऽन्यदुर्गाणि निष्फलानि महीभुजाम् ॥ ७ ॥
श्रेष्ठं तु सर्वदुर्गेभ्यः सेनादुर्गं स्मृतं बुधैः ।
तत्साधकानि चान्यानि तद्रक्षेन्नृपतिः सदा ॥ ८ ॥
सेनादुर्गं तु यस्य स्यात्तस्य वश्या तु भूरियम् ।

**सहाय तथा सैन्य दुर्गों की सब दुर्गों की साधनता का निर्देश—**वस्तुतः सब दुर्गों से श्रेष्ठ सेना (सैन्य) दुर्ग को विद्वानों ने माना है । और अन्य सारे दुर्ग तो इसके केवल साधनमात्र हैं । अतः राजा सदा { इस (सैन्य) दुर्ग की रक्षा करे जिसके पास सेना (सैन्य) दुर्ग है उस (राजा) के लिये यह सारी पृथ्वी अधीन हुई मानी जाती है ।

बिना तु सैन्यदुर्गेण दुर्गमन्यत्तु बन्धनम् ॥ ९ ॥
आपत्कालेऽन्यदुर्गाणामाश्रयश्चोत्तमो मतः ।

**आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय की उत्तमता का निर्देश—**सैन्यदुर्ग को छोड़कर अन्य दुर्ग केवल बन्धनमात्र हैं । वास्तव में आपत्ति पड़ने पर ही अन्य दुर्गों का आश्रय लेना उत्तम माना गया है ।

एकः शतं योधयति दुर्गस्थोऽस्त्रधरो यदि ॥ १० ॥
शतं दशसहस्राणि तस्माद् दुर्गं समाश्रयेत् ।

अस्त्र धारण किया हुआ एक सैनिक अकेला ही यदि दुर्ग में स्थित होकर लड़े तो बाहर के १०० सैनिकों से लड़ सकता है । और यदि १०० सैनिक हों तो १०००० सैनिकों से लड़ सकते हैं । इससे दुर्ग का आश्रय लेना उचित होता है ।

शूरस्य सैन्यदुर्गस्य सर्वं दुर्गमिव स्थलम् ॥ ११ ॥
युद्धसम्भारपुष्टानि राजा दुर्गाणि धारयेत् ।
धान्यवीरास्त्रपुष्टानि कोशपुष्टानि वै तथा ॥ १२ ॥

**अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्ग के लक्षण—**शूर-वीर सैन्य दुर्ग (सेना) के लिये तो सभी स्थल दुर्ग की भांति दुर्भेद्य हो जाते हैं । और राजा युद्ध की सामग्रियों से परिपूर्ण अर्थात् भोजन के लिये अन्न, शूर-वीर सैनिक, अस्त्र-शस्त्र एवं कोष (खजाने) से परिपूर्ण दुर्गों को सुसज्जित रक्खे । और ऐसे ही दुर्गों में रहे ।

सहायपुष्टं यद् दुर्गं तच्च श्रेष्ठतरं मतम् ।
सहायपुष्टदुर्गेण विजयो निश्चयात्मकः ॥ १३ ॥

३२६ | शुक्रनीतिः

युद्ध-सहायक सामग्रियों से परिपूर्ण दुर्ग से निश्चित विजय होने का निर्देश—
इसलिये युद्ध-सहायक उक्त सामग्रियों से परिपूर्ण जो दुर्ग होता है वही सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। अथवा सहायक शूर-वीर एवं अनुकूल बान्धवों से परिपूर्ण दुर्ग सर्वश्रेष्ठ होते हैं। उक्त रीति से सहायकों से परिपूर्ण दुर्ग रहने से राजा का विजय निश्चित रूप से होता है।

यद्यत्सहायपुष्टं तु तत्सर्वं सफलं भवेत् ।
परस्परानुकूल्यं तु दुर्गाणां विजयप्रदम् ॥ १४ ॥

इति शुक्रनीतौ चतुर्थेऽध्याये दुर्गनिरूपणं नाम षष्ठं प्रकरणम् ।

जो २ दुर्ग सहायकों से परिपूर्ण होते हैं वे सभी राजा के लिये फलप्रद होते हैं। दुर्गों का परस्पर एक दूसरे का सहायक होना विजय देनेवाला होता है।

इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में चतुर्थाध्याय में दुर्ग-निरूपणं-नामक षष्ठ प्रकरण समाप्त हुआ।


चतुर्थाऽध्याये सप्तमं प्रकरणम् ।

दुर्गं संक्षेपतः प्रोक्तं सैन्यं सप्तममुच्यते ।
सेना शस्त्रास्त्रसंयुक्त-मनुष्यादिगणात्मिका ॥ १ ॥

सेना-निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण— इस प्रकार से संक्षेप में दुर्गनिरूपण प्रकरण का निरूपण किया गया। अब सप्तम 'सेनानिरूपण' नामक प्रकरण कहता हूँ। शस्त्र (तलवार आदि), अस्त्र (धनुष आदि) से संयुक्त मनुष्य आदि (पैदल सेना, हाथी, घोड़ा) के समूह को 'सेना' कहते हैं।

स्वगमाऽन्यगमा चेति द्विधा सैव पृथक त्रिधा ।
दैव्यासुरि मानवी च पूर्वं पूर्वं बलाधिका ॥ २ ॥

सेना के भेदों का वर्णन— वह (सेना) १. स्वगमा और २. अन्यगमा भेद से दो प्रकार की होती है। पुनः इन दोनों के भी १. दैवी, २. आसुरी और ३ मानवी भेद से ३ भेद होते हैं। इनमें पूर्व-पूर्व (मानवी से आसुरी, आसुरी से दैवी) सेना अधिक बलशालिनी होती है।

स्वगमा या स्वयं गन्त्री यानगाऽन्यगमा स्मृता ।
पादातं स्वगमं चान्यद् रथाश्वगजगं त्रिधा ॥ ३ ॥

स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण— जो स्वयं गमन करनेवाली सेना होती है वह 'स्वगमा' और जो अन्य द्वारा गमन करनेवाली होती है, वह 'अन्यगमा' कहलाती है। उसमें पैदल सेना 'स्वगमा' एक ही प्रकार की होती है किन्तु दूसरी (अन्यगमा) सेना अन्य-अर्थात् रथ, घोड़ा और हाथी के द्वारा गमन करने से ३ प्रकार की होती है।

सैन्याद्विना नैव राज्यं न धनं न पराक्रमः ।
बलिनो वशगाः सर्वे दुर्बलस्य च शत्रवः ॥ ४ ॥
भवन्त्यल्पजनस्यापि नृपस्य तु न किं पुनः ।

सैन्य के प्रभाव का निर्देश— सैन्य के बिना राज्य, धन और पराक्रम इनमें से कोई भी स्थिर नहीं रह सकता है। और जब कि सभी लोग बलवान् पुरुष के ही वशीभूत होते हैं और दुर्बल पुरुष के शत्रु हो जाते हैं तब फिर थोड़ी सेना रखनेवाले राजा के लोग शत्रु नहीं होते हैं अर्थात् अवश्य होते हैं।

शारीरं हि बलं शौर्यबलं सैन्यबलं तथा ॥ ५ ॥
चतुर्थंमास्त्रिकबलं पञ्चमं धीबलं स्मृतम् ।
षष्ठमायुर्बलं ह्येतैरुपैतो विष्णुरेव सः ॥ ६ ॥

३२८ | शुक्रनीतिः

६ प्रकार के बलों का निर्देश—१. शरीर का बल, २. शूरता का बल, ३ सेना का बल, ४. अस्त्र का बल, ५. बुद्धि का बल, ६. आयु का बल, ये ६ प्रकार के बल कहे हुये हैं जो इनसे युक्त होता है वह विष्णु ही माना जाता है ।

न बलेन विनाप्यल्पं रिपुं जेतुं क्षमः सदा ।
देवासुरनरास्त्वन्योपायैर्नित्यं भवन्ति हि ॥ ७ ॥

बल के बिना लोग क्षुद्र (साधारण) शत्रु को भी सदा जीतने के लिये नहीं समर्थ हो सकते हैं क्योंकि देवता, असुर और मनुष्य भी बल न रहने पर अन्य (सेना आदि) उपायों से शत्रु जीतने के लिये नित्य उद्योग करते हैं ।

बलमेव रिपोर्नित्यं पराजयकरं परम् ।
तस्माद्बलमभेद्यं तु धारयेद्यत्नतो नृपः ॥ ८ ॥

एकमात्र मनुष्य का बल ही शत्रु को पराजित करने में नित्य नितान्त समर्थ होता है। इसलिये राजा शत्रुओं के लिये दुर्धर्ष बल को यत्नपूर्वक धारण करे ।

सेनाबलन्तु द्विविधं स्वीयं मैत्रं च तद् द्विधा ।
मौलसाद्यस्कभेदाभ्यां सारासारं पुनर्द्विधा ॥ ९ ॥

२ प्रकार के सेनाबलों का निर्देश—सेना का बल दो प्रकार का होता है जिसमें पहला—अपनी सेना का (स्वीय), दूसरा—मित्र की सेना का (मैत्र) बल है । इनमें से प्रत्येक मौल (क्रमागत) और साद्यस्क (आधुनिक) भेद से दो प्रकार के होते हैं। पुनः सार और असार भेद से भी दो प्रकार के होते हैं ।

अशिक्षितं शिक्षितं च गुल्मीभूतमगुल्मकम् ।
दत्तास्त्रादि स्वशस्त्रास्त्रं स्ववाहि दत्तवाहनम् ॥ १० ॥

इसमें शिक्षित-अशिक्षित, गुल्मीभूत-अगुल्मक, दत्तास्त्रादि-स्वशस्त्रास्त्र, स्ववाहि-दत्तवाहन इन भेदों से प्रत्येक दो २ प्रकार के होते हैं ।

सौजन्यात् साधकं मैत्रं स्वीयं भृत्या प्रपालितम् ।
मौलं बह्वब्दानुबन्धि साद्यस्कं यत्तदन्यथा ॥ ११ ॥

मैत्र, स्वीय, मौल तथा साद्यस्क सेनाओं के लक्षण—मित्रतावश युद्ध के कार्य का निर्वाह करनेवाले सैन्य को 'मैत्र' एवं वेतन देकर रखे हुये को 'स्वीय' कहते हैं। बहुत वर्षों से पास में रहनेवाली को 'मौल' और इसके विपरीत अर्थात् तत्काल भर्ती की हुई सेना को 'साद्यस्क' कहते हैं ।

सुयुद्धकामुकं सारमसारं विपरीतकम् ।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३२५

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३२५

शिक्षितं व्यूहकुशलं विपरीतमशिक्षितम् ॥ १२ ॥ **सार-असार तथा शिक्षित-अशिक्षित सेनाओं के लक्षण—**भली भांति युद्ध करने के लिये उत्सुक रहनेवाळी सेना को 'सार' और इसके विपरीत रहनेवाळी को 'असार' कहते हैं । व्यूह-रचना में कुशल सेना को 'शिक्षित' और इससे विपरीत को 'अशिक्षित' कहते हैं ।

गुल्मीभूतं साधिकारि स्वस्वामिकमगुल्मकम् । दत्तास्त्रादि स्वामिना यत् स्वशस्त्रास्त्रमतोऽन्यथा ॥ १३ ॥ **गुल्मीभूत, अगुल्मक, दत्तास्त्रादि तथा स्वशस्त्रास्त्र सेनाओं के लक्षण—**सेनापति के साथ रहनेवाळी सेना को 'गुल्मीभूत' और बिना सेनापति के स्वतन्त्र रहकर लड़नेवाली को 'अगुल्मक' कहते हैं । स्वामी जिसको अस्त्रादि दिये हों उस सेना को 'दत्तास्त्रादि' और इसके विपरीत जिसके पास अपना निजी शस्त्रास्त्र हों उसे 'स्वशस्त्रास्त्र' कहते हैं ।

कृतगुल्मं स्वयंगुल्मं तद्वच्च दत्तवाहनम् । आरण्यकं किरातादि यत् स्वाधीनं स्वतेजसा ॥ १४ ॥ **कृतगुल्म, स्वयंगुल्म, दत्तवाहन और आरण्यक सेनाओं के लक्षण—**तथा कृतगुल्म (स्वामी ने सेनापति से युक्त सेना में जिसकी गणना की है), स्वयंगुल्म (अपनी इच्छा से गुल्म का अधिपति बना हुआ सैन्य) तथा दत्तवाहन सेना भी होती है । अपने तेज से स्वाधीन रहनेवाळी कोळ भिल्लादिकों की सेना को 'आरण्यक' कहते हैं ।

उत्सृष्टं रिपुणा वापि भृत्यवर्गे निवेशितम् । भेदाधीनं कृतं शत्रोः सैन्यं शत्रुबलं स्मृतम् ॥ १५ ॥ उभयं दुर्बलं प्रोक्तं केवलं साधकं न तत् । **शत्रुबल के तथा दुर्बल सेना के लक्षण—**१—जिसमें शत्रु के द्वारा निकाले हुये सैनिक वेतन देकर रख लिये गये हों अथवा २—जो शत्रु की सेना भेद-नीति से अपने अधीन कर ली गई हो, उसे 'शत्रुबल' कहते हैं । ये दोनों प्रकार की सेनायें दुर्बल कही हुई हैं क्योंकि इनपर विश्वास नहीं किया जा सकता है । ये केवल नाममात्र को होती हैं इनसे युद्ध-कार्य वस्तुतः नहीं चलाया जा सकता है ।

समैनियुद्धकुशलैर्व्यायामैर्नतिमितस्तथा ॥ १६ ॥ वर्धयेद्बाहुयुद्धार्थं भोज्यैः शारीरकं बलम् । **सेना के शारीरिक बल बढ़ाने के उपाय—**बाहुयुद्ध में कुशल अपने बराबर वालों के साथ कुश्ती लड़ा कर तथा व्यायाम कराकर एवं गुरुजनों को प्रणाम

३३०शुक्रनीतिः

करना सिखाकर तथा पौष्टिक भोजन खिलाकर बाहुयुद्ध के लिये सैनिकों के शारीरिक बल को बढ़ाना चाहिये ।

मृगयाभिस्तु व्याघ्राणां शस्त्रास्त्राभ्यासतः सदा ॥ १७॥
वर्धयेच्छूरसंयोगात् सम्यक् शौर्यबलं नृपः ।

शौर्यबल बढ़ाने के उपाय— और सदा व्याघ्रों का शिकार, शस्त्र तथा अस्त्रों को चलाने का अभ्यास एवं शूरवीरों की सङ्गति कराकर सैनिकों के 'शौर्यबल' को राजा बढ़ावे ।

सेनाबलं सुभृत्या तु तपोभ्यासैस्तथाऽस्त्रिकम् ॥ १८॥
वर्धयेच्छास्त्रचतुर-संयोगाद् धीबलं सदा ।

सेनाबल, आस्त्रिकबल व बुद्धिबल बढ़ाने के उपाय— सुन्दर वेतन देकर 'सेनाबल' तथा तपस्या और अभ्यास कराकर अर्थात् दिव्यास्त्रों का प्रयोग तपस्या द्वारा बाण चलाने के अभ्यास के द्वारा कराकर 'आस्त्रिकबल' एवं धर्म शास्त्र तथा राजनीति जानने में चतुर लोगों की सङ्गति कराकर 'बुद्धिबल' को सदा बढ़ाना चाहिये ।

सत्क्रियाभिश्चिरस्थायि नित्यं राज्यं भवेद् यथा ॥ १९॥
स्वगोत्रे तु तथा कुर्यात्तदायुर्बलमुच्यते ।
यावद्गोत्रे राज्यमस्ति तावदेव स जीवति ॥ २०॥

आयुर्बल के लक्षण— नित्य सत्कर्म करने के द्वारा जिस भांति से अपने वंश में राज्य चिरस्थायी हो उस भांति से राजा को करना चाहिये इसी को 'आयुर्बल' कहते हैं । क्योंकि जब तक उसके वंश में राज्य बना रहता है तब तक ही वह जीवित रहता है ।

चतुर्गुणं हि पादातमश्वतो धारयेत् सदा ।
पञ्चमांशॉस्तु वृषभानष्टांशांश्च क्रमेलकान् ॥ २१॥
चतुर्थांशान् गजानुष्ट्रान् गजाद्धांश्च रथान् सदा ।
रथात्तु द्विगुणं राजा बृहन्नालीकमेव च ॥ २२ ॥

सेना में पदाति आदियों की संख्या का नियम— घुड़सवार सैनिकों से चौगुनी पैदल सेना एवं घुड़सवार सेना के पञ्चमांश के बराबर बैल, अष्टमांश ऊंट और ऊंट का चतुर्थांश हाथी, हाथी का अर्द्धांश रथ, और रथ का द्विगुण बृहन्नालीक (तोप) इन सबों को राजा अपनी सेना के अन्तर्गत सदा रक्खे ।

पदातिबहुलं सैन्यं मध्याश्वं तु गजाल्यकम् ।
तथा वृषोष्ट्रसामान्यं रत्नेभागाधिकं नहि ॥ २३ ॥

राजा सेना में पैदल सिपाहियों को अधिक संख्या में, घोड़ों को मध्यसंख्या में और हाथियों को थोड़ी संख्या में रक्खे । तथा बैल एवं ऊंटों की संख्या साधारण रक्खे किन्तु हाथियों की संख्या अधिक न रक्खे ।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३१

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३१

सवयःसारवेषोञ्चशस्त्रास्त्रं तु पृथक् शतम् ।
लघुनालिकयुक्तानां पदातीनां शतत्रयम् ॥ २४ ॥
अशीत्यश्वांन् रथं चैकं बृहन्नालद्वयं तथा ।
उष्ट्रान् दश गजौ द्वौ तु शकटौ षोडषर्षभान् ॥ २५ ॥
तथा लेखकषट्कं हि मन्त्रित्रितयमेव च ।
धारयेन्नृपतिः सम्यग् वत्सरे लक्षकर्षभाक् ॥ २६ ॥

एक वर्ष में एक लक्ष १०००००) मुद्रा की आयवाला राजा एक सी अवस्था के युवावस्थावाले दृढ तथा उत्तम वेष ( वर्दी-कवच ) वाले, ऊंचे कद के, अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित ऐसे १०० पैदल सिपाहियों की एक पृथक् टुकड़ी और बन्दूकों से युक्त ३०० पैदल सिपाहियों की एक पृथक् टुकड़ी तथा ८० घोड़े, १ रथ, २ तोपें, १० ऊंट, २ हाथी, २ बैलगाड़ी, १६ बैल, ६ लेखक, ३ मन्त्री, इन सबों को एक सेना के अन्दर अच्छी तरह से रक्खे ।

सम्भारदानभोगार्थं धनं सार्धसहस्रकम् ।
लेखकार्थे शतं मासि मन्त्र्यर्थे तु शतत्रयम् ॥ २७ ॥
त्रिशतं दारपुत्रार्थे विद्वदर्थे शतद्वयम् ।
साद्यश्वपदगार्थे हि राजा चतुःसहस्रकम् ॥ २८ ॥
गजोष्ट्रवृषनालार्थं व्ययीकुर्याच्चतुःशतम् ।
शेषं कोशे धनं स्थाप्यं राज्ञा सार्धसहस्रकम् ॥ २९ ॥
प्रतिवर्षं स्ववेशार्थं सैनिकेभ्यो धनं हरेत् ।

प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण—और १ लाख मुद्रा का सालभर में निम्न रीति से व्यय करे जैसे—सामग्री, दान तथा स्वयं भोग करने के लिये प्रति मास १५००) डेढ़ हजार, लेखकों के लिये १००) एक सौ, मन्त्रियों के लिये ३००) तीन सौ, स्त्री-पुत्र के लिये ३००) तीन सौ विद्वानों के समान के लिये २००) दो सौ घुड़सवार, तथा पैदल सिपाहियों के लिये ४०००) चार हजार, ऊंट, बैल तथा बन्दूक चलानेवाले सिपाही—इनके लिये ४००) चार सौ रुपये प्रतिमास व्यय करे । और १५००) प्रतिवर्ष अपनी २ वर्दी बनवाने के लिये सैनिकों को दे । शेष धन को कोश में राजा सुरक्षित रक्खे ।

लोहसारमयश्चक्रसुगमो मञ्चकासनः ॥ ३० ॥
स्वान्दोलायितरूढस्तु मध्यमासनसारथिः ।
शस्त्रास्त्रसन्धायुदर इष्टच्छायो मनोरमः ॥ ३१ ॥
एवंविधो रथो राज्ञा रच्यो नित्यं सदश्वकः ।

राजा के रथ का वर्णन—कान्तिसार उत्तम लौह का बना हुआ, अत्यन्त सुगमता से फिरने वाले चक्रों से युक्त, शय्या के समान सुखपूर्वक बैठने के लिये

३३२ | शुक्रनीतिः

स्थान वाला, एवं जिसमें शरीर स्वयम् हिंडोले पर बैठने के समान आन्दोलित हो जाय (अर्थात् सुन्दर कमानीदार), और जिसके आगे की तरफ मध्य भाग में सारथी के बैठने का स्थान हो तथा जिसके अन्दर शस्त्र तथा अस्त्र भरे पड़े हों एवं मनोनुकूल छाया हुआ—इस प्रकार का बना हुआ मनोरम रथ सदा रक्खे, जिसमें अच्छे २ घोड़े जुते हों, राजा सदा सैन्य में रक्खे ।

नीलतालुर्नीलजिह्वो वक्रदन्तो ह्यदन्तकः ॥ ३२ ॥
दीर्घद्वेषी क्रूरमदस्तथा पृष्ठविधूनकः ।
दशाष्टोननखो मन्दो भुविशोधनपुच्छकः ॥ ३३ ॥
एवंविधोऽनिष्टगजो विपरीतः शुभावहः ।

**अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण—**नील तालु और जीभवाला, टेढ़े दाँतोंवाला या बिना दाँत का, दीर्घ काल तक द्वेष रखनेवाला, विश्रृङ्खल भाव से मद बहानेवाला, पीठ हिलानेवाला, १८ से कम नखवाला, मन्दगामी और पृथ्वी तक लटकनेवाली पूंछ से युक्त ऐसा हाथी अनिष्ट फल देनेवाला होता है एवं इससे विपरीत लक्षणों से युक्त शुभ फल देनेवाला होता है ।

भद्रो मन्द्रो मृगो मिश्रो गजो जात्या चतुर्विधः ॥ ३४ ॥

**हाथी के ४ प्रकार—**१. भद्र, २. मन्द्र, ३. मृग और ४. मिश्र भेद से गज की ४ जातियां होती हैं ।

मध्वाभदन्तः सबलः समाङ्गो वर्तुलाकृतिः ।
सुमुखोऽवयवश्रेष्ठो ज्ञेयो भद्रगजः सदा ॥ ३५ ॥

**भद्रगज के लक्षण—**मधु (शहद) के समान आभा से युक्त दाँतोंवाला, बलवान, अनुरूप अङ्गोंवाला, गोल आकारवाला, सुन्दर मुख एवं श्रेष्ठ अङ्गों-पाङ्गोंवाला गज 'भद्र' संज्ञक सदा जानना चाहिये ।

स्थूलकुक्षिः सिंहदृक् च बृहत्त्वग्गलशुण्डकः ।
मध्यमावयवो दीर्घकायो मन्द्रगजः स्मृतः ॥ ३६ ॥

**मन्द्रगज के लक्षण—**जिसके पेट स्थूल, आँखें सिंह के समान, चमड़ा मोटा एवं गला और शूंढ लम्बी, अवयव मध्यम आकार का एवं शरीर दीर्घ हो उसे 'मन्द्र' संज्ञक गज समझना चाहिये ।

तनुकण्ठदन्तकर्णशुण्डः स्थूलाक्ष एव हि ।
सुह्रस्वाधरमेढ्रस्तु वामनो मृगसंज्ञकः ॥ ३७ ॥

**मृगगज के लक्षण—**जिसके कण्ठ, दांत, कान एवं शूंढ पतले हों और आँखें स्थूल, ओष्ठ और लिङ्ग अत्यन्त छोटे तथा शरीर का आकार छोटा हो, उसे 'मृग' संज्ञक गज जानना चाहिये ।

एषां लक्षणैर्विमिश्रितो गजो मिश्र इति स्मृतः ।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् १३३

भिन्नं भिन्नं प्रमाणं तु त्रयाणामपि कीर्तितम् ॥ ३८ ॥
मिश्रगज के लक्षण— इन सबों के कुछ २ लक्षण जिसमें मिलते हों उसे 'मिश्र' संज्ञक गज समझना चाहिये । उक्त तीनों गजों के प्रमाण भी भिन्न २ कहे हुये हैं ।

गजमाने ह्यङ्गुलं स्यादाष्टभिस्तु यवोदरैः ।
चतुर्विंशत्यङ्गुलैस्तैः करः प्रोक्तो मनीषिभिः ॥ ३९ ॥
गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण— गजों को नापने के लिये जौ के उदर भाग की चौड़ाई के समान चौड़ाई १ अंगुल की होती है । ऐसे २४ अंगुलों का १ हाथ विद्वान लोग कहते हैं ।

सप्तहस्तोन्नतिर्भद्रे ह्यष्टहस्तप्रदीर्घता ।
परिणाहो दशकर उदरस्य भवेत् सदा ॥ ४० ॥
भद्रगज के शरीर का मान— 'भद्रगज' की ऊंचाई ७ हाथ की, लम्बाई ८ हाथ की तथा पेट का विस्तार १० हाथ का सदा होता है ।

प्रमाणं मन्दमृगयोर्हस्तहीनं क्रमाद्गतः ।
कथितं दैर्घ्यसाम्यं तु मुनिभिर्भद्रमन्द्रयोः ॥ ४१ ॥
मन्द्र तथा मृग गज का मान— मन्द्र और मृग की ऊंचाई का प्रमाण भद्रगज से क्रम से १-१ हाथ छोटा होता है अर्थात् मन्द्र की ऊंचाई ६ हाथ की एवं मृग की ५ हाथ की होती है किन्तु मुनियों ने भद्र और मन्द्र की लम्बाई समान ही बताई है ।

बृहद्भ्रूगण्डफालस्तु धृतशीर्षगतिः सदा ।
गजः श्रेष्ठस्तु सर्वेषां शुभलक्षणसंयुतः ॥ ४२ ॥
सर्वश्रेष्ठ जिसके भौंह, गण्डस्थल तथा मस्तक बृहदाकार के हों एवं चाल सदा शीघ्रता से युक्त हो, ऐसा शुभ लक्षणों से युक्त हाथी सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है ।

पञ्चयवाङ्गुलेनैव वाजिमानं पृथक् स्मृतम् ।
चत्वारिंशाङ्गुलमुखो वाजी यश्चोत्तमोत्तमः ॥ ४३ ॥
उत्तमोत्तम अश्व के लक्षण— घोडों का मान हाथियों के मान से भिन्न होता है । इसमें ५ जौ का १ अंगुल माना जाता है । जिसका मुख ४० अंगुल का होता है, वह घोड़ा 'उत्तमोत्तम' माना जाता है ।

षट्त्रिंशदङ्गुलमुखो ह्युत्तमः परिकीर्तितः ।
द्वात्रिंशदङ्गुलमुखो मध्यमः स उदाहृतः ॥ ४४ ॥
उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण— ३६ अंगुल का मुख जिसका होता है वह 'उत्तम' तथा ३२ अंगुल का मुख हो तो 'मध्यम' समझा जाता है ।

३३४शुक्रनीतिः

अष्टाविंशत्यङ्गुलो यो मुखे नीचः प्रकीर्तितः।
वाजिनां मुखमानेन सर्वावयवकल्पना ॥ ४५ ॥

**नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान-कल्पना—**और जिसका मुख २८ अंगुल का होता है वह 'नीच' घोड़ा समझा जाता है। और घोड़ों के मुख के मान के द्वारा सम्पूर्ण अवयवों के मान की भी कल्पना की जाती है।

औच्चं तु मुखमानेन त्रिगुणं परिकीर्तितम् ।
शिरोमणि समारभ्य पुच्छमूलान्तमेव हि ॥ ४६ ॥
तृतीयांशाधिकं दैर्घ्यं मुखमानाच्चतुर्गुणम् ।
परिणाहस्तूदरस्य त्रिगुणस्त्र्यङ्गुलाधिकः ॥ ४७ ॥

**अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण—**उक्त मुखमान से तिगुनी ऊंचाई कही हुई है। घोड़े की शिरोमणि भाग से लेकर पूंछ के मूल भाग तक की लम्बाई मुखमान से तृतीयांश अधिक चौगुनी होती है। और उदर का विस्तार ३ अंगुल अधिक तिगुना होता है।

साधारणमिदं मानमुच्यते विस्तरादथ ।
अष्टाविंशाङ्गुलमुखं पुरस्कृत्य यथा तथा ॥ ४८ ॥
शफोच्चं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं मणिबन्धोऽङ्गुलाधिकः ।

यह साधारण रूप से मान कहा गया, अब विस्तारपूर्वक कहा जा रहा है। यदि २८ अंगुल प्रमाण मुखवाला नीच संज्ञक अश्व हो तो उसके खुर की ऊंचाई तीन ३ अंगुल प्रमाण की होती है और मणिबन्ध अर्थात् खुर का ऊपरी भाग १ अंगुल अधिक अर्थात् ४ अंगुल प्रमाण का होता है।

चतुर्हस्ताङ्गुला जङ्घा त्र्यङ्गुलं जानु कीर्तितम् ॥ ४९ ॥
चतुर्दशाङ्गुलावूरू कूर्परान्तं स्मृतो बुधैः ।
अष्टत्रिंशाङ्गुलं ज्ञेयं स्कन्धान्तं कूर्परादितः ॥ ५० ॥

और जंघा ४ हस्त के अंगुल प्रमाण की, जानु ३ अंगुल प्रमाण का कहा कहा हुआ है। और कूर्पर के दूनी पर्यन्त दोनों ऊरु १४ अंगुल प्रमाण का पण्डितों ने कहा है। कूर्पर से लेकर स्कन्ध पर्यन्त ऊंचाई ३८ अंगुल की होती है।

प्रत्यगूरू मुखसमौ जङ्घोना पादमानतः ।
प्रोक्तोच्चता चाथ दैर्घ्यमुच्यते शास्त्रसङ्गतम् ॥ ५१ ॥

और पीछे के दोनों ऊरु मुख के समान अर्थात् २८ अंगुल प्रमाण के होते हैं। और पीछे की जंघा चौथाई मान से कम होती है। इस प्रकार से घोड़ों की ऊंचाई का वर्णन किया गया अब शास्त्र-संगत लम्बाई का वर्णन किया जा रहा है।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३५

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३५

षष्ठांशेनाधिका ग्रीवा द्विगुणा सुप्रसारिता ।
मुखतश्चोच्छ्रिता सार्धपादहीना तु पूर्वतः ॥ ५२ ॥
स्कन्धादि मुष्कमूलान्तं ग्रीवातुल्यं तु तत्र हि ।
द्व्यंशषष्ठं त्रिकं यावत् शेषमंसं प्रकल्पयेत् ॥ ५३ ॥
मुखार्धं पुच्छदण्डं च शिश्न आण्डौ तदर्धकौ ।
कर्णः षडङ्गुलो दीर्घश्चतुःपञ्चाङ्गुलः क्वचित् ॥ ५४ ॥

सुविस्तृत ग्रीवा लम्बाई में मुख की अपेक्षा षष्ठांश अधिक दुगुनी होती है तथा मुख से साढ़े चौथाई हीन उन्नत होती है । उसमें घोड़ों में स्कन्ध से लेकर अण्डकोष के मूल पर्यन्त लम्बाई ग्रीवा के तुल्य होती है । पृष्ठवंश (रीढ़) के (अधोभाग तक शेष भाग स्कन्ध की लम्बाई ग्रीवा के ) दो अंश और षष्ठ भाग तुल्य होती है । पुच्छदण्ड और शिश्न की लम्बाई मुख की आधी होती है, दोनों अण्डकोषों की लम्बाई शिश्न की आधी होती है । कर्ण की लम्बाई ६ अंगुल की होती है और कहीं २ चार या पांच अंगुल की भी होती है ।

परिणाहः शफस्योक्तो मुखार्धेनाङ्गुलाधिकः ।
तदर्धो मणिबन्धस्य जङ्घायाः परिधिः स्मृतः ॥ ५५ ॥
दशैकाङ्गुलपरिधी रम्योरूः कीर्त्तिता बुधैः ।
पृष्ठोरुपरिधिर्मूले त्रिः षष्ठांशो मुखेषु च ॥ ५६ ॥
बहिरन्तर्धनुःखण्डसदृशा शरभोन्मजा ।
मणिबन्धमणेर्ज्ञेयः परिधिश्च नवाङ्गुलः ॥ ५७ ॥
अन्त्यजङ्घादिपरिधिर्विज्ञेयः पूर्ववद् बुधैः ।

खुर का विस्तार एक अंगुल अधिक मुख के परिमाण का आधे भाग का होता है । और मणिबन्ध और जंघा की परिधि उसकी आधी होती है । रमणीय ऊरु की परिधि ११ अंगुल परिमित पण्डितों ने कही है । पीछे की ऊरु की परिधि मूल भाग में ३ अंगुल परिमित और अग्रभाग में षष्ठ अंश परिमित होती है । मणिबन्ध की चिह्न विशेष मणि की परिधि नव अंगुल की होती है और अन्तिम जंघा आदि की परिधि पूर्ववत् पण्डितों को जानना चाहिये ।

अक्ष्णोरन्तरे चिह्नमङ्गुलं पक्ष्ममूलयोः ॥ ५८ ॥
सार्धाङ्गुलं सटास्थानं ग्रीवोपरि सुविस्तृतम् ।
शिरोमणिं समारभ्य दीर्घं स्कन्धान्तमुत्तमम् ॥ ५९ ॥
अधोगमा सटा कार्या हस्तमात्रायता शुभा ।
सार्धहस्ता द्विहस्ता वा पुच्छबालाः सुशोभनाः ॥ ६० ॥

३३६ शुक्रनीतिः

और दोनों ऊरुओं के मध्य में पार्श्वमूलों का चिह्न अंगुल परिमित होता है। ग्रीवा के ऊपर सुविस्तृत शिरोमणि से लेकर स्कन्ध पर्यन्त प्रधान सटा (अयाल) का स्थान डेढ़ अंगुल लम्बा है। और (मूर्ति में) नीचे की ओर लटकती हुई हाथभर की लम्बी शुभ सटा (अयाल) करनी चाहिये। और पूंछ के बाल डेढ़ हाथ या दो हाथ लम्बे शोभन करने चाहिये।

सप्ताष्टनवदशभिरङ्गुलैः कर्णदीर्घता।
तथा तद्विस्तृतिर्ज्ञेया त्र्यङ्गुला चतुरङ्गुला ॥ ६१ ॥
न स्थूला नापि चिपिटा ग्रीवा मयूरसन्निभा।
ग्रीवाप्रपरिधिस्तुल्यो मुखेनाधिकमुष्टिकः ॥ ६२ ॥
ग्रीवामूलस्य परिधिर्द्विगुणो विदशाङ्गुलः।
तृतीयांशविहीनं तु सत्क्रोडं वक्ष ईरितम् ॥ ६३ ॥

और कर्ण की लम्बाई ७, ८, ९ या १० अंगुल परिमित की होनी चाहिये और उसकी चौड़ाई ३ या ४ अंगुल की होनी चाहिये। और न मोटी, न चिपटी, मयूर के समान ग्रीवा होनी चाहिये। ग्रीवा के अग्रभाग की परिधि मुख के परिमाण से एक मुष्टि अधिक होनी चाहिये। ग्रीवामूल की परिधि मुख के परिमाण से १० अंगुल कम दुगुना होना चाहिये। और उत्तम उत्संगवाला वक्षःस्थल का मान मुख के मान से तृतीयांश कम कहा हुआ है।

नेत्रोपरि परीणाहो मुखेनाष्टाङ्गुलाधिकः।
नासिकोपरि नेत्राधो मुखस्य परिधिस्तु यः ॥ ६४ ॥
तृतीयांशविहीनेन मुखेन सदृशो भवेत्।
द्व्यङ्गुलं नेत्रविस्तृतिस्त्र्यङ्गुला तस्य दीर्घता ॥ ६५ ॥
अर्धाङ्गुलाधिका वापि विस्तृतिर्दीर्घताङ्गुला।
मुखतृतीयांशमेतदूर्वोर्मध्येऽन्तरं स्मृतम् ॥ ६६ ॥
नेत्राग्रयोरन्तरं तु पञ्चमांशं मुखस्य हि।
कर्णयोरन्तरं तद्वत् कर्णनेत्रान्तरं तथा ॥ ६७ ॥

नेत्र के ऊपर का विस्तार मुख के मान के तुल्य होता है किन्तु ८ अंगुल अधिक होता है। नासिका के ऊपर और नेत्र के नीचे जो मुख की परिधि है वह तृतीयांशहीन मुख के मान के तुल्य होती है। नेत्र के विस्तार का मान २ अंगुल एवं नेत्र की लम्बाई का मान ३ अंगुल का होता है अथवा नेत्र का विस्तार आधा अंगुल अधिक अर्थात् ढाई अंगुल मान का और लम्बाई एक अंगुल अधिक अर्थात् तीन अंगुल की होनी चाहिये। ऊरुओं के मध्य में यह अन्तर मुख का तृतीयांश तुल्य होना चाहिये तथा नेत्र के दोनों अग्रभागों का

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३७

अन्तर मुख के पञ्चमांशतुल्य होना चाहिये । दोनों कर्णों का अन्तर भी सदृश तथा कर्ण और नेत्र का अन्तर भी उसी प्रकार से होता है ।

भूस्थयोः शफयोः प्रोक्तं तदेतत् कर्णसंमितम् ।
मणिनेत्रप्रान्तरं च भ्रुवोरन्तरमेव हि ॥ ६८ ॥
सक्थ्यङ्गुलं तृतीयांशं नासानेत्रान्तरं तथा ।
त्रिभागपूरणं प्रोथः सोष्ठश्च परिकीर्तितः ॥ ६९ ॥
नासारन्ध्रान्तरं चैव तद्-दैर्घ्येनवमांशकम् ।
कायो नरार्धविस्तारस्त्रिके हृदयसंमितः ॥ ७० ॥
चतुर्थांशं तु हृदयं बाहुमूलादधः स्मृतम् ।
षष्ठांशमन्तरं बाह्वोर्हृत्समीपे प्रकीत्तितम् ॥ ७१ ॥

और भूमिस्थित दोनों खुरों का जो यह अन्तर है वह कर्ण के मान के तुल्य कहा हुआ है । मणि और नेत्र का अन्तर, दोनों भौंहों का अन्तर तथा नासिका और नेत्र का अन्तर सक्थि (ऊरु) के अंगुलों का तृतीयांश तुल्य मान समझना चाहिये । और ओष्ठ के सहित मुख का अग्रभाग मुख के मान के तृतीयांशतुल्य कहा हुआ है । तथा दोनों नासिकाओं के छिद्रों का अन्तर उन दोनों की लम्बाई के मान के तृतीयांश तुल्य मानवाला होता है । शरीर मनुष्य के विस्तार से आधा विस्तारवाला, पृष्ठवंश (रीढ़) के नीचे भाग में हृदय (वक्षस्थल) के समान विस्तार होता है तथा हृदय बाहुमूल के नीचे चतुर्थांश तुल्य कहा हुआ है । हृदय के समीप में दोनों बाहुओं का अन्तर षष्ठांश तुल्य होता है ।

अधरोष्ठोऽनुचिबुकं सार्धाङ्गुलमथोन्नतम् ।
शोभते चोन्नतग्रीवो नतपृष्ठः सदा हयः ॥ ७२ ॥
यद्रूपं कर्तुमुद्युक्तस्तद्विम्बं वीक्ष्य सर्वतः ।
अदृष्ट्वा कस्य यद्रूपं न कर्तुं क्षमते हि तत् ॥ ७३ ॥
शिल्प्यग्रे वाजिनं ध्यात्वा कुर्यादवयवानतः ।
दिशाऽनया च विभूतेः सर्वमानानि वाजिनाम् ॥ ७४ ॥

अधरोष्ठ चिबुक तक डेढ़ अंगुल उन्नत होता है । और घोड़ा सदा उन्नत ग्रीवा तथा नत पृष्ठवाला शोभायमान होता है । जिसकी आकृति बनाने के लिये जो उद्यत हो वह सब तरफ से देखकर उसके बिम्ब (प्रतिकृति) को करे । किसी का जो रूप हो उसको बिना देखकर उसकी प्रतिकृति बनाने के लिये कोई समर्थ नहीं हो सकता है । अतः शिल्पी (मूर्तिकार) प्रथम घोड़े का ध्यान कर पश्चात् उसके अङ्गों को बनावे । इसी रीति से घोड़ों के अवयवों के सभी मानों की कल्पना करे ।

२२ शु०

३३८शुक्रनीतिः

श्मश्रुहीनमुखः कान्तः प्रगल्भोत्तुङ्गनासिकः ।
दीर्घोद्धतग्रीवमुखो ह्रस्वकुक्षिखुरश्रुतिः ॥ ७५ ॥
तुरप्रचण्डवेगश्च हंसमेघसमस्वनः ।
नातिक्रूरो नातिमृदुर्देवसत्त्वो मनोरमः ॥ ७६ ॥

उत्तम अश्व के अन्य लक्षण— जिस घोड़े के मुख पर बाल न हों एवं सुन्दर मुख तथा शब्द हो और नासिका ऊंची हो, तथा गर्दन और मुख लम्बे एवं कुछ उठे हुये हों, पेट, खुर एवं कान छोटे हों, अत्यन्त शीघ्र और प्रचण्ड वेग हो, हंस तथा मेघ के समान शब्द हो और स्वभाव न अत्यन्त क्रूर तथा न अत्यन्त मृदु ही हो, देवताओं के घोड़ों के समान उत्तम पराक्रम हो—ऐसा घोड़ा मन को मोहित करनेवाला अतएव उत्तम होता है ।

सुकान्तिगन्धवर्णश्च सद्गुणभ्रमरान्वितः ।
घोड़ों की कान्ति, गन्ध और वर्ण सुन्दर एवं अच्छे गुणवाले भौंरी ( भ्रमर ) होनी चाहिये ।

भ्रमरस्तु द्विधावर्त्तो वाम-दक्षिणभेदतः ॥ ७७ ॥
पूर्णोऽपूर्णः पुनर्द्वेधा दीर्घो ह्रस्वस्तथैव च ।

अश्व के भौंरी के दो भेद— और भौंरी का घुमाव वाम तथा दक्षिण भेद से दो प्रकार का होता है पुनः प्रत्येक के पूर्ण तथा अपूर्ण एवं दीर्घ और ह्रस्व भेद से दो २ प्रकार होते हैं ।

स्त्रीपुंदेहे वामदक्षौ यथोक्तफलदौ क्रमात् ॥ ७८ ॥

घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल— उक्त भौंरियां तभी यथोक्त उत्तम फल देनेवाली होती हैं जब कि वे क्रम से घोड़ी के बाएँ तथा घोड़े के दाहिनी ओर हों ।

न तथा विपरीतो तु शुभाशुभफलप्रदौ ।

अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश— यदि उक्त प्रकार से विपरीत हों अर्थात् उक्त स्थान ( दायें-बायें ) से अन्यत्र कहीं पर हों तो शुभ या अशुभ कोई फल नहीं देनेवाली होती है ।

नीचोर्ध्वतिर्यङ्मुखतः फलभेदो भवेत्तयोः ॥ ७९ ॥

भौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद— यदि भौंरियों का मुख नीचा, ऊंचा या तिरछा हो तो तदनुसार फल में भी भेद हो जाता है ।

शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-वेदि-स्वस्तिकसन्निभः ।
प्रासादतोरणधनुःसुपूर्णकलशाकृतिः ॥ ८० ॥
स्वस्तिकस्रङ्मीनखड्गश्रीवत्साभः शुभ्रो भ्रमः ।

शुभ भौंरी के लक्षण— भौंरी शंख, चक्र, गदा, पद्म, वेदी या स्वस्तिक