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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

वाले राम के द्वारा भरत के प्रति कहा गया यह श्लोक-लोभ नही करना चाहिए। इस आदर्श को व्यक्त करने के संदर्भ में उद्धृत किया गया है।

सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
पितृक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।¹

श्रीरामचन्द्र जी कह रहे हैं। हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्णनिर्मित लङ्का मुझे पसन्द नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन-रहित भी मुझे सुखकर है।

कालिदास का प्रभाव :

शुकसप्तति के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि कालिदास का प्रभूत प्रभाव ग्रन्थकार पर पड़ा है। यही कारण है कि नैतिक आदर्शों का कथन करने वाले कालिदास के कतिपय श्लोक शुकसप्तति में यत्र-तत्र उद्धृत किये गये हैं। मित्रता का आदर्श प्रस्तुत करने वाला कुमारसम्भव का निम्नलिखित श्लोक बिना किसी परिवर्तन के इस ग्रन्थ मे उद्धृत हुआ है।

"यतः सता सन्नतगात्रिसङ्गतं मनीषिभिः साप्तपदीनमुच्यते।।"²

कुमारसम्भव महाकाव्य में ब्रह्मचारी वेश धारण किए शिव ने पार्वती से कहा है- हे (स्तनों के भार से)! झुके शरीर वाली, मनीषियों ने कहा है कि सज्जनों के साथ सात पग चलने मात्र से अथवा सात वाक्य बोलने मात्र से मित्रता हो जाती है।

हर्षदेव का प्रभाव : '

महाराज हर्षदेव की रचनाओं का यथेष्ट प्रभाव ग्रन्थकार पर पड़ा। महाराज श्री हर्षदेव का समय छठीं शताब्दी के आस-पास माना जाता है। हर्षकृत रत्नावली के निष्कम्पक के अन्तर्गत वर्णित निम्नलिखित श्लोक को हू-ब-हू रूप में इस ग्रन्थ में


1 शुकसप्तति श्लोक सं० 314, पृष्ठ स० 263.
2 शुकसप्तति पृष्ठ सं०-265 (कुमारसंभव पञ्चम अंक)

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तृतीय अध्याय : शुकसप्तति - कथा परिचय

उद्धृत किया गया है। जिसमें कर्म की अपेक्षा भाग्यवादित की अवश्य सम्भाविता को सिद्ध किया गया है।

द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥¹

अनुकूल दैव दूसरे द्वीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात् शीघ्र लाकर मिला देता है।

भारवि का प्रभाव :

किरातार्जुनीय जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ का भी पर्याप्त प्रभाव कवि पर पड़ा। किरातार्जुनीय का अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक जो राजनीतिक आदर्श के संदर्भ में है, शुकसप्तति में प्राप्त होता है। “शठेशाठ्यं समाचरेत्” के आदर्श को उपस्थित करने वाला यह श्लोक शुकसप्तति के 21 वीं (कथा) के अन्तर्गत उद्धृत किया गया है।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः। प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषवः ॥²

जो लोग कपटीजनों के साथ कपटपूर्ण व्यवहार नहीं करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीर वालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।

इन उद्धरणों के अतिरिक्त – इस ग्रन्थ में यत्र-तत्र उपमान के रुप में कवि ने अनेक ग्रन्थों के पात्रों का वर्णन किया है। जैसे-महाभारत के पात्र -भीम, दुर्योधन का।³ द्यूत क्रीडा में युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को दाँव में लगाने का वर्णन हुआ। शिव पुराण एवं नीतिशास्त्र के प्रसङ्गों का भी यत्र-तत्र उल्लेख मिलता है।⁴


1 शुकसप्तति-श्लोक सं० 61, पृष्ठ सं० 47
2 शुक सप्तति -श्लोक सं० 123, पृष्ठ सं० 106.
3 शुकसप्ततिः-श्लोक स० 336, पृष्ठ सं० 279.
4 शुक सप्ततिः-श्लोक स० 96, 97, 135 पृष्ठ संख्या- 76, 77, 115

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इसके अतिरिक्त नारद द्वारा मदन नामक गंधर्व की पुत्री मदनमञ्जरी को शाप देने की कथा का वर्णन भी इसमें प्राप्त होता है।¹

इस प्रकार कहा जा सकता है कि शुकसप्ततिः का रचनाकार वैदिक वाङ्मय, अनेक पौराणिक ग्रन्थो एवं लौकिक काव्यों एवं नीतिशास्त्र का ज्ञाता था।



¹ अथान्यदा नारद समायातः। सोऽप्यस्या रूपमवलोक्य मूर्च्छित सकामोऽभूत्। पश्चाल्लब्धसंज्ञेन ऋषिणा सा शप्ता। शुकसप्तति, पृष्ठ स0 279-280 (चौखम्बा प्रकाशित, सम्वत् 2023)।

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तृतीय अध्याय

शुकसप्तति कथा परिचय

"शुकसप्तति "कथा-परिचय"

(1) ग्रन्थ का मूल स्वरूप :

शुकसप्तति के प्राप्त प्रधान दो संस्करणों साधारण और परिष्कृत के विवेचन के पश्चात् यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि इस ग्रन्थ का मूल स्वरूप क्या था। यह ग्रन्थ मूलतः गद्यात्मक था या पद्यात्मक या गद्य-पद्य मिश्रित था, यह भी निश्चित रूप से नहीं कह सकते। प्रसिद्ध इतिहासकार मङ्गलदेव शास्त्री का विचार है¹ कि इसका मूलरूप सम्भवतः सरल गद्य में रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्त्यात्मक पद्य और कथाओं के आदि और अन्त में उनके विषय वर्णन परक पद्य रहे होंगे।

शुकसप्तति के साधारण संस्करण के आधार पर कुछ विचारकों ने ऐसा विचार प्रकट किया है कि यह कथाग्रन्थ अपने मूलरूप में चाहे जिस भी रूप में रहा हो किन्तु बाद में अन्ततोतात्वा इसने एक पद्यात्मक रूप ग्रहण कर लिया था। इस कथा ग्रन्थ मे प्राकृत पद्यों की विद्यमानता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्भवतः यह सग्रह अपने मूलरूप में प्राकृतभाषा में रहा होगा किन्तु इस प्रश्न का कोई निश्चित समाधान प्रस्तुत नही किया जा सकता। ग्रन्थ का कलेवर मनोरञ्जक है। लोकभाषा के साहित्य पर अपने प्रभाव को छोड़कर इस ग्रन्थ का कोई विशेष आकर्षण नहीं है।

किसी ठोस सामग्री के अभाव में अनुमानतः यह कहा जा सकता है कि इसका मूलरूप गद्यात्मक रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्तियों के कथन हेतु पद्यों का प्रयोग किया गया रहा होगा। यद्यपि शुकसप्तति से पूर्व प्राप्त कथाग्रन्थ जैसे वृहत्कथा आदि जो प्राप्त नहीं हैं किन्तु उसका संस्करण विशेष रूप से कश्मीरी संस्करण पद्यात्मक है। इस प्रकार पञ्चतन्त्र भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक है हितोपदेश भी भी पद्यात्मक है। इसी क्रम में शुकसप्तति के विषय में भी ऐसी अवधारणा प्रस्तुत की जा


¹ संस्कृत साहित्य का इतिहास, मगलदेव शास्त्री

सकती है। इसी क्रम में शुकसप्तति के विषय में भी ऐसी अवधारण प्रस्तुत की जा सकती है कि शुकसप्तति भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक है। शुकसप्तति का मूलस्वरूप भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक रहा होगा किन्तु निश्चित रूप से निर्णायक रूप में कुछ नहीं कहा जा सकता है।

(2) आधार कथा :

कथा सहित्य में शुकसप्तति 70 कहानियों का एक ऐसा संग्रह है जिनमें तरह-तरह की समस्याओ के हल प्राप्त होते हैं। इस संग्रह में सम्पूर्ण कथायें उपदेशप्रद ही हैं यह सर्वथा सत्य नहीं है जैसा कि संग्रह की आधार कथा से लगता है।

चन्द्रपुर नाम के नगर में विक्रमसेन नाम का राजा रहता था। उसी नगर में हरिदत्त नाम का सेठ रहता था। उसकी पत्नी का नाम श्रृंगार सुन्दरी था उसके पुत्र का नाम मनदविनोद था और पुत्रवधू प्रभावती थी जो सोमदत्त नामक सेठ की पुत्री थी।

यथा नाम तथा गुणः के आधार पर यह मदनविनोद अपना सारा समय अपनी युवती पत्नी के प्रेमालाप में ही व्यतीत कर देता था और पिता की शिक्षा का अपमान करता था। जुआ, मृगया, वेश्या, आदि में निरन्तर आसक्त रहता था। कुमार्गगामी इस पुत्र से पिता हरिदत्त सपत्नीक दुःखी रहता था। उन्हें दुःख से पीड़ित देखकर हरिदत्त का मित्र त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण ने अपने घर से नीतिकुशल शुक एवं सारिका उपहार में भेट किया और यह कहा कि तुम्हारा प्रस्तुत दुःख इनसे दूर हो जायेगा। इन शुक सारिकाओं को ग्रहण कर हरिदत्त ने अपने पुत्र मदन विनोद को दे दिया। जिन्हें अपने शयन कक्ष में पिंजड़े में स्थापित कर उसने पालन-पोषण किया।

एकबार एकान्त में शुक ने मदन विनोद से कहा-हे मित्र! 'तुम्हारे व्यसन आसक्ति से दुःखी तुम्हारे माता-पिता के आँखों से जो अस्रु समूह निरन्तर भूमि पर

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गिरता है उस पाप से देवशर्मा की तरह तुम्हारा भी पतन सम्भाव्य है। कहीं-कहीं पर यह पक्षी रूपधारी गन्धर्व थे ऐसी चर्चा भी प्राप्त होती है¹ बुद्धिमान शुक के उपदेश से कुमार्ग-गामी वह मदन विनोद सदाचार के मार्ग का अवलम्बन कर लेता है और अत्यन्त विनयशील बन जाता है। इसके बाद वह मदनविनोद माता-पिता की आज्ञा से एवं पत्नी की राय से व्यापार की दृष्टि से देशान्तर को चला गया। इसके अनन्तर पति विरह से दुःखी मदनविनोद की पत्नी कुछ समय निर्वाह करती है और व्यभिचारिणी अपनी सखियों के द्वारा प्रेरित होकर परपुरुष के प्रति अभिलाषवती हो जाती है, एव रमण के लिए श्रृङ्गार कर ज्योंही घर से निकलना चाहती है त्यों ही सारिका पक्षी ने उसे रोका और फटकारा तब उसने (प्रभावती) गला मरोड़ कर सारिका को विनष्ट करना चाहा, तत्काल वह उड़कर दूर चली गयी। इसके अनन्तर कुछ क्षण रूककर अपने इष्ट देवता को स्मरण कर एवं ताम्बूल आदि ग्रहण कर ज्यों ही चलती है उसी समय तथा कथित वह शुक बोल पड़ा कि आपका कार्य सिद्ध हो, कहाँ जा रही है? इत्यादि वाक्य से पूछा। शुक वचन को शकुन मानकर मुस्कराते हुए उसने कहा कि, किसी परपुरूष के पास जा रही हूँ। इस बात को सुनकर शुक उसके कार्य का अनुमोदन करते हुए कहता है कि—‘तुम परपुरूष के संगति के आनन्द का अनुभव करो यह तो ठीक है किन्तु यह कार्य अत्यन्त दुष्कर है, निन्दित है एवं कुल स्त्रियों के लिए बाधित है।’ प्रतिकूल एवं सङ्कट का अवसर पड़ने पर उससे बचने के लिए तुम्हारे पास बुद्धि होनी चाहिए। तभी जाओ क्योंकि-विपत्ति पड़ जाने पर दुष्ट लोग केवल तमाशा ही देखते हैं और अपमानित करते हैं। क्योकि एक मास तक भूखी पूर्णा दूती, बनिये के लड़के के केश पकड़कर उसकी पत्नी खींचने लगी तो वह तमाशा ही देखती रह गयी।² यह सुनकर अपनी व्यभिचारिणी सखियों के साथ उस


1 ए०बी० कीथ–अनुवादित मङ्गलदेवशास्त्री, पृष्ठ–361
2 कौतुकान्वेषिणो नित्यं दुर्जना व्यसनागमे।
मासोपवासिनी यद्वद्वणिकपुत्रकचग्रहे।।

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प्रभावती ने शुक का बहुत समादर किया और घबराकर उपर्युक्त आख्यान सुनने के लिए प्रार्थना किया।

इसके अनन्तर वह शुक निरन्तर मनोरञ्जक कहानी सुनाता है और बीच-बीच मे वैसी-वैसी विपत्ति आने पर कैसा आचरण करना चाहिए इस प्रकार का प्रश्न करता है और समाधान में 70 कहानियाँ सुनाते हुए उसके शील की रक्षा करता है और कुछ ही दिनों में उसका पति परदेश से मदन विनोद आ जाता है और दोनों (पति-पत्नी) सुखपूर्वक अपने जीवन का समय व्यतीत करते हैं।

शुकसप्तप्ति की यह आधारभूत कथा अन्य 70 कथाओ को जन्म देती है। जो प्रभावती के चरित्र की रक्षा करने में पर्याप्त सक्षम है।

(3) शुकसप्तति की कथाओं का परिचय :

कथा- 1
"देशशर्मा की कथा"

शुकसप्तति की प्रथम कथा मदनविनोद को सद्ज्ञान देने हेतु शुक द्वारा कही गयी है-

पञ्चपुर नगर मे सत्यशर्मा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी धर्मशीला और पुत्र देवशर्मा के साथ रहता था। उस (पुत्र) ने विद्याध्ययन के बाद पिता से छिपाकर अन्य देश में गङ्गा के तट पर तप किया।

एक दिन वह तपस्वी गङ्गा के तट पर जप कर रहा था कि उसी समय एक उड़ती बगुली ने उसके शरीर पर मलत्याग कर दिया। क्रोध से रक्तनेत्र उस तपस्वी ने ज्यों ही ऊपर देखा त्यों ही अपनी क्रोधाग्नि से भस्म हुई बगुली को भूमि पर गिरी देखकर (बगुली को भस्म कर) वह नारायण नामक ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने गया। उसकी पत्नी अपने पति के सेवा में लगी थी उसके (स्त्री) विलम्ब करने से वह क्रुद्ध


शुकसप्ततिः श्लोक सं० 8 पृ० सं० १

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हुआ। उस स्त्री ने (ऐसा देखकर) निरीह पक्षी के हत्यारे उस तपस्वी को फटकारा और कहा- 'तेरे क्रोध ने उस बगुली को जला दिया, पर मेरा वह कुछ नहीं कर सकता है।'

उस स्त्री से गुप्त पातक जान लिये जाने के कारण वह डर गया और विस्मित हुआ। (गुप्त पातक जाने लेने का रहस्य पूछने पर) उस स्त्री ने उसे धर्मव्याध नामक मांसविक्रेता के पास वाराणसी नगरी में भेजा। वहाँ पहुँचने पर धर्मव्याध ने शुभागमन के विषय में पूछकर अपने घर ले जाकर, अपने माता-पिता को भक्ति के साथ भोजन देकर, तत्पश्चात् उसे भोजन दिया। उसके बाद उसने व्याध से ज्ञान का कारण पूछा- 'वह सती कैसे ज्ञानवती है और तुम कैसे ज्ञानवान हुये?' उस धर्मव्याधस ने कहा-

जो उत्तम, मध्यम, अधम सभी प्रकार के विकारों से अनासक्त रह, अपने कुलक्रममागत धर्म का पालन भलीभाँति करता है, जो सदा माता-पिता की सेवा करता है वह साधारण मनुष्य भी सच्चा गृहस्थ है, वही मुनि, साधु, योगी, और धार्मिक है।¹

मैं और वह सती इस प्रकार से ज्ञानी हुये है। तुम अपने माता-पिता का परित्याग कर घूम रहे हो, मुझे तुम ऐसे व्यक्तियों से सम्भाषण नहीं करना चाहिए किन्तु अतिथि समझकर मैने तुमसे बात की।

इस प्रकार कहने पर उस ब्राह्मण ने धर्मव्याध से अपने कर्तव्य तथा गुरूजन महिमा के सम्बन्ध में पूछा। उसने कहा-

जो अपने पूज्य जन की पूजा नहीं करते, जो अपने मान्यजन का सम्मान नहीं करते वे संसार में निन्दित होते हुए जीते हैं और मरने के बाद स्वर्ग नहीं जाते हैं।²


1 निजान्वयप्रणीत यः सभ्यग्धर्मं निषेवते।
उत्तममाधममध्येषु विकारेषु पराङ्मुखः।।
स गृही स मुनिः साधुः स च योगी स धार्मिकः
पितृशुश्रूषको नित्यं जन्तुः साधारणश्च यः।।
— शुकसप्ततिः, श्लोक सं०, 3, 4,, पेज सं० 5

2 न पूजयन्ति ये पूज्यान्मान्यान्न मानयन्ति ये।
जीवन्ति निन्द्यमानास्ते मृताः स्वर्गं न यान्ति च।।
— शुकसप्ततिः श्लोक स० 5, पेज पृष्ठ 6

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इस प्रकार उस व्याध से समझाया गया वह अपने घर गया और माता-पिता की सेवा कर ससार में कीर्तिमान हुआ और मृत्यूपश्चात भी अपने यशः शरीर से अमर हो गया।¹

इसलिए "तुम अपने कुल क्रमागत वणिग्धर्म का स्मरण करो तदनुसार कर्म करो और माता-पिता के प्रति विनयशील बनो।"²

इस प्रकार उपदिष्ट हुआ वह मदनविनोद माता-पिता को नमस्कार कर उनकी आज्ञा लेकर, पत्नी से पूछकर एवं विदा होकर नौका द्वारा विदेश चला गया।

तत्पश्चात् व्यभिचार मार्ग पर जाने के लिए उद्यत प्रभावती से शुक कहता है—तुम कुमार्ग पर मत जाओ अन्यथा पराभव का पात्र होगी। क्योंकि—

विपत्ति आ पडने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं (कोई सहायता नहीं करता) जैसे भास भर की भूखी पूर्णा दूती, बनिये के लडके के केश पकड़ कर उसकी पत्नी खींचने लगी तो वह तमाश ही देखती रही।

तब उस प्रभावती ने शुक का समादर करते हुए घबडा कर "यह आख्यान कैसे है"—पूछा। तो शुक ने कहा—

चन्द्रावती पुरी में भीम नामक राजा था। उस पुरी में मोहन नामक सेठ का सुधन नामक पुत्र था। वह उस नगर के निवासी हरिदत्त की पत्नी लक्ष्मी के साथ रति-क्रीडा करना चाहता था किन्तु लक्ष्मी सहमत नहीं थी। तब उस सुधन ने मास भर की भूखी पूर्णा नाम की स्त्री के पास जाकर उसे खूब धन देकर, जब हरिदत्त नगर से बाहर गया तब दूती बनाकर भेजा। उसने भी प्रिय बचनों से लक्ष्मी को प्रसन्न


1 व्याधेन बोधितस्तेन स ययौ गृहमात्मनः।
अभवत्कीर्त्तिमाँल्लोके परतः कीर्त्तिभाजनम्।।
शुकसप्ततिः श्लोक स० 6, पेज पृष्ठ 6,
2 तस्माद्वणिग्धर्मं स्वकुलोद्भवं स्मर पित्रोश्च विनयपरो भव।
शुकसप्ततिः पृष्ठ सं० 8,

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कर लिया। उसने (लक्ष्मी) कहा 'जो तुम कहो वह करूँ। पूर्णा ने कहा- जिससे कहूँ उस पुरुष के साथ रमण करो।'

इसके बाद लक्ष्मी को तैयार कर आनन्दप्रद सुरत के लिए सायंकाल के समय अपने घर ले गयी। किन्तु वह सुन्दर सुधन नामक वणिक् पुत्र किसी काम में फँस जाने के कारण निर्दिष्ट समय पर नहीं आ सका। तब कामातुरा लक्ष्मी ने कहा-'किसी भी पुरुष को ले आओ।'

तब मूढ़ पूर्णा इती उसके पति को ही ले आयी अपने पति के आने पर उसका बचाव कैसे हो? यह तुम या तुम्हारी सखियाँ बतायें।

उन सबने कहा- 'हम नहीं जानती हैं। तुम्हीं कहो।'

शुक ने कहा- 'अपना पति ही आ रहा है'- यह जानकर उसने उसके केश पकड़कर कहा- हे शठ! सर्वदा तू मेरे सामने कहा करता है कि तुम्हारे अतिरिक्त मेरी और कोई दूसरी प्रिया नहीं है। आज मैंने तेरी परीक्षा कर ली और जान गयी।' इस प्रकार उसने कोप किया।

वह हरिदत्त उसको बड़ी कठिनाई से अत्यन्त कोमल वचनों द्वारा सान्तवना देकर अपने घर ले आया।

इस प्रकार व्यभिचारिणी सखियों समेत मदन विनोद की पत्नी प्रभावती भय एवं विस्मय उत्पन्न करने वाली शुक द्वारा कथित कथा सुनकर रात में सो गयी और परपुरुष के पास नहीं गयी।

कथा- 2

"यशोदेवी की कथा"

दूसरे दिन व्यभिचार करने के लिए उद्धत प्रभावती को शुक रोकता हुआ उसे दूसरी कहानी सुनाता है-

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नन्दन नामक नगर में नन्दन नाम का एक राजा था। उसके पुत्र का नाम राजशेखर और पुत्रवधू का नाम शशिप्रभा था। उसको वीर नामक धनसेन का पुत्र देखकर कामवासना से युक्त कावमज्वर से पीड़ित हो गया। भोजन आदि नहीं करता था। अपनी माता यशोदेवी से पूछे जाने पर उसने गद्गद् वाणी से कारण बताया। उस राजकन्या का मिलना कठिन है। वह कैसे जिये' यह प्रश्न है। प्रभावती ने कहा- 'तुम्हीं बताओ'। शुक ने कहा- प्रभावती। यदि आज तुम परपुरूष के पास न जाओ तो बताऊँ। प्रभावती ने कहा ठीक है कहो।

तब शुक ने कहा- उस यशोदेवी ने एक कुतिया को भोजन खिला-पिला कर हिला-मिला लिया और आभूषण पहिनकर अपने साथ उसे लेकर शशिप्रभा के पास जाकर उससे एकान्त मे गद्गद् स्वर में कहा- मैं, तुम और यह, तीनों पूर्वजन्म में बहिन थीं। मैंने निःशङ्क और तूने सशङ्क, परपुरूष की संभोगेच्छा को पूरा किया। इसने नहीं किया। इसी कारण से इसे पातिव्रत रूप सदाचार के प्रभाव से केवल पूर्वजन्म की ही स्मृति है, भोग नहीं, और इस जन्म में कुतिया हुई। परपुरूष के सम्भोगविषयक विघ्न के कारण मुझे पूर्वजन्म का स्मरण भी नहीं है और मुझे निर्विघ्न भोग के कारण निर्विघ्न जन्म का स्मरण है। इसलिए इस कुतिया और तुझको देखकर अनुकम्पा-वश तुझसे यही कहने आई हूँ। अतः तुम्हें याचको को काङ्क्षित वस्तु देनी ही चाहिये।¹ क्योकि कहा गया है-

भिक्षुक घर-घर भीख नहीं माँग रहे हैं, अपितु मानो यह कह रहे हैं कि याचकों को सदा दान दिया करो, अन्यथा दान न देने वाले को ऐसा ही फल मिलेगा जैसे हमें मिल रहा है- हमारी ही तरह वह भी घर-घर भीख माँगता फिरेगा।²


1 'अतस्त्वयार्थिना काङ्क्षितं दातव्यमेव।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ सं० 16
2 कथयन्ति न याचन्ते भिक्षाहारा गृहे गृहे।
अर्थिभ्यो दीयतां नित्यमदातुः फलमीदृशम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 17, पृष्ठ सं० 16

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तब शशिप्रभा ने उसके गले से लिपट कर रोकर कहा- 'कल्याणि! मुझे भी पर पुरूष से मिलाओ।'

तब यशोदेवी ने उसे सान्त्वना देकर पति की जानकारी में उसे अपने घर ले जाकर अपने पुत्र से मिलाया पति ने भी उसे सखी समझकर जाने से नहीं रोका।

हे कामिनि! यशोदेवी ने इस प्रकार राजशेखर और उसकी पत्नी को धोखा देकर अपनी महती बुद्धि से अपना कार्य पूरा कर लिया। अतैव यदि तुम्हारे पास ऐसी बुद्धि हो तो परपुरूष के पास जाओ अन्यथा नहीं।

कथा-3

"राजा सुदर्शन की कथा";

विशाला नगरी में सुदर्शन नाम का राजा था। वहीं पर विमल नाम का एक बनिया था उसकी दो पत्नियों को सुन्दर रूप सम्पन्न देखकर कुटिल नामक धूर्त ने उन्हें प्राप्त करने के लिए अम्बिका देवी की आराधना कर विमल का रूप माँगा। उसका आकार प्रकार पाकर 'विमल' के बाहर जाने पर उसके घर जाकर वह धूर्त अपना आधिपत्य जमा लिया। उसने पुरस्कार रूप में धन प्रदान कर समस्त भृत्य वर्ग को अपने अधीन कर लिया। वह विमल की दोनों पत्नियों को अत्यन्त सम्मान दान आदि से संतुष्ट कर उनका सम्भोग करता रहा।

कुछ समय पश्चात् वास्तविक विमल भी द्वार पर आया तो कुटिल की आज्ञा से द्वारपाल ने उसे भीतर प्रविष्ट होने से रोक दिया, तब वह जोर से चिल्लाने लगा कि 'महान धूर्त ने हमें धोखा दिया।' इस प्रकार चिल्लाते हुए उसे देखकर कौतुक वश उसके कुल गोत्र वालों एवं बनियों का समुदाय एकत्र हो, नगरपालों एवं मुख्यमन्त्री के सामने चिल्लाने लगा- राजन्! 'महान धूर्त ने हमें धोखा दिया'।

तब राजा ने उस धूर्त को देखने के लिए अपने आदमी भेजे, उस धूर्त ने उन्हें भी धन देकर अपने अनुकूल कर लिया। धन प्राप्त कर राजा के आदमी कहने लगे, स्वामी! विमल तो घर में है, यह द्वार पर स्थित व्यक्ति ही महान धूर्त है।

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तब राजा को उपाय सूझा। उसने विमल की दोनों पत्नियों को पृथक-पृथक कर पूछा। तुम दोनों को विवाह के समय पति ने कौन आभूषण और धन दिया था। विवाह के पश्चात् क्या बातचीत हुई थी? प्रथम सहवास के समय पति के साथ तुम्हारी क्या बातचीत हुई थी? तुम दोनो की माता-पिता कौन है? क्या कुल और जाति है? इस प्रकार पूछने पर दोनों ने जो पाया था, जो-जो बातें हुई थी, जिस प्रकार प्रथम सहवास के समय शयन किया था सबकुछ बता दिया। इसके बाद राजा ने वही बाते परस्पर विवाद करते उन दोनों पुरुषों से पूछा तो रूक्मणी एवं सुन्दरी नाम्नी दोनों भार्याओ का संवाद जो कहता है वही सच है। दूसरा धूर्त है, राजा ने उसे निकाल दिया। सच्चा विमल पत्नी समेत राजा से सत्कृत हुआ और अपने घर गया। यह कथा सुनकर प्रभावती सो गयी।

कथा-4

"विषकन्या-विवाह की कथा"

सोमप्रभ नामक ब्राह्मणों की एक बस्ती थी, वहाँ सोमशर्मा नामक एक विद्वान, धार्मिक ब्राह्मण था। उसकी पुत्री विषकन्या अत्यन्त रूपवती थी, किन्तु भय के कारण उससे कोई विवाह नहीं करता था। तब सोमशर्मा वर की तलाश में पृथ्वी पर घूमते हुए जनस्थान नामक ब्राह्मणों की बस्ती में पहुँचा। वहाँ गोविन्द नामक मूर्ख एवं निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसे उसने कन्या दे दी। उसने रोकते हुए सुहृज्जनों की भी अवज्ञाकर रूपलावण्यवती मोहिनी विषकन्या से विवाह कर लिया। वह काम-कला प्रवीण थी एवं गोविन्द मूर्ख एवं अल्पवयस्क था। तब वह अपने रूप लावण्य एवं यौवन पर शोक करने लगी। कहा गया है कि-कामकलानिपुण पत्नी का मूर्ख पति, प्रौढ़ स्त्री का मूर्ख नायक, दानशील गुणीजन का अल्पधन- ये तीनों दुःखदायी होते हैं।$^1$


1 अविदग्धः पतिः स्त्रीणां, प्रौढाना नायकोऽगुणी
गुणिनां त्यागिना स्तोको विभवश्चेति दुःखकृत्
शुक्सप्ततिः श्लोक सं० 23, पृष्ठ सं०- 24

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वह विषकन्या एक दिन अपने पति गोविन्द से बोली मैं तुम्हारे साथ अपने पिता के घर चलूँगी तब गोविन्द बैलगाड़ी पर भार्या समेत चल पड़ा। जाते समय मार्ग मे एक युवक, वक्ता, रूपवान और शूर विष्णु नामक ब्राह्मण मिला। ब्राह्मण और विषकन्या मे परस्पर अनुराग हो गया। कहा गया है कि अन्य धनुर्धारियों को अपने सामने न ठहरने देने वाला वीर कामदेव सर्वोत्कृष्ट है जिसके पुष्पशरों के लगने से, प्रथम प्रिय के दर्शन आदि से अनुराग उत्पन्न होता है, तदन्तर क्रमशः प्रिय से मिलने का मनोऽभिलाष, निद्राभङ्ग, शारीरिक दौर्बल्य, अपने-अपने व्यापरे में इन्द्रियों का आलस्य, प्रिय के अतिरिक्त अन्य विषयों में मन की विरक्ति, लज्जा का छूट जाना, उन्माद, मूर्छा और मरण इन दस दशाओ को सारा जगत प्राप्त होता है।¹

वह पथिक पति पत्नी को खूब सुपारी पान देता, इस प्रकार उस मूर्ख ब्राह्मण ने उस विष्णु पर विश्वास कर लिया और मेरे विषय में कहीं इसका पत्नी में अत्यन्त अनुराग है ऐसा न सोचने लगे। इस भय से स्वयं उतरकर उस ब्राह्मण को गाड़ी का चालक बना दिया। पति के वृक्षों के आड़ में आ जाने पर विष्णु ने मोहिनी का भोग किया और अपने अधीन बना लिया। पति गोविन्द के आ जाने पर 'तुम चोर हो' यह कहकर विष्णु ने उसे गाडी पर चढ़ने से रोक दिया और मोहनी को ग्रहण कर गोविन्द पर आक्रमण कर दिया। विषकन्या के प्रभाव से गोविन्द विष्णु से पराजित हुआ। तब मार्ग के समीपवर्ती गाँव में जाकर गुहार लगाने लगा कि चोर ने मेरी पत्नी को ग्रहण कर लिया है।


1 प्रीतिः स्याद्दर्शनाद्यौ. प्रथममथ मनःसङ्गसङ्कल्प भावो,
निद्राच्छेदस्तनुत्वं वपुषि कलुषता चेन्द्रियाणां निवृत्तिः ।
हीनाशोन्मादमूर्छामरणमिति जगद्यात्यवस्था दशैताः
लग्नैर्यत्पुष्पबाणै स जयति मदनः सन्निरस्तान्यधन्वी।
शुकसप्ततिः, श्लोक स०-28, पृष्ठ स०- 225-26

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तब ग्राम के मुखिया ने मोहिनी समेत विष्णु को पकड लिया। पूछने पर विष्णु ने उत्तर दिया कि मैने इसे विवाहा है। मेरी भार्या को मार्ग मे देखकर यह पथिक इसे ग्रहण करना चाहता है। गोविन्द ने भी पूछने पर यही उत्तर दिया। मन्त्री ने दोनों का एक ही उत्तर सुनकर जाति आदि पूछा, तीनों एक ही उत्तर देते हैं। पुनः मन्त्री ने पूछा कि तुम लोगों का यात्रा में कितने दिनों से साथ हुआ। उन लोगों ने कहा प्रातः भोजन के पश्चात साथ हुआ। तब मन्त्री ने पृथक-पृथक दोनों ब्राह्मणों से पूछा-मोहिनी ने भोजन के समय क्या भोजन किया। मोहिनी के भोजन के विषय में गोविन्द ही जानता था। दूसरा नही। तब वह दूसरा मन्त्री से निरादृत हुआ। तब मन्त्री ने गोविन्द को शिक्षा दी की इस ब्राह्मणी को धिक्कार है। इस लोक एवं परलोक में दुखदायिनी इस स्त्री का तुम परित्याग कर दो।¹

लेकिन वह नहीं माना और उस मोहिनी को लेकर चला और मार्ग में उसी के लिए मार डाला गया।

इसलिए हे देवी! वृद्धों के सिखाने पर भी जो इस प्रकार उनके वचनों का तिरस्कार करता है वह गोविन्द ब्राह्मण की भाँति नष्ट हो जाता है।

कथा- 5

"बालपण्डिता की कथा"

उज्जायिनी नाम की नगरी का राजा विक्रमादित्य था जिसकी रानी का नाम कामलीला था। एक दिन भोजन के समय राजा ने रानी को कुछ मछलियाँ खाने को दिया जिसे रानी ने खाने क्या छूने से भी इन्कार कर दिया। तब वे मछलियाँ हँसने


¹ धिग्मा ब्राह्मणी परत्रेह च दुःखदा मुञ्च शीघ्रम्।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ स० 28

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लगीं। जिसकी आवाज महल के बाहर के लोग भी सुन लिए। अब राजा अपने दरबार में उपस्थित सारे विद्वानों (मन्त्रवेत्ता, दैवज्ञ एवं शकुनवेत्ता-जनों) से पूछा लेकिन कोई इस हँसी का कारण न बता सका तब राजा ने अपने मुख्य पुरोहित से इसी हँसी का कारण पूछा और न बताने की स्थिति में देश निकालने की धमकी दी। तब पुरोहित विषादग्रस्त हो पाँच दिन का समय मॉगकर अपने घर चला गया। जहाँ उसकी पुत्री बालपण्डिता ने उसके विषाद का कारण पूछा। उसने कहा विद्वानों को विषाद में भी प्रसन्नचित रहना चाहिए। कहा गया है- जिसे समृद्धि में हर्ष, विपत्ति में विषाद, रण मे कापुरूषता न हो, ऐसे त्रिभुवन श्रेष्ठ विरलेपुत्र को माता पैदा करती है।$^1$ तब ब्राह्मण ने सभी हाल कह सुनाया और कहा कि अगर जीना चाहता हूँ तो ब्राह्मणों के साथ मुझे परदेश चले जाना चाहिए। तब बालिका ने कहा कि तात! तुमने ठीक कहा लेकिन राजा के बिना मनुष्य की कही पूजा नहीं होती।$^2$ क्योंकि कहा गया है कि- राजा की सेवा से साधारण व्यक्ति भी असाधारण एवं मुख्य हो जाता है तथा न करने पर असाधरण भी साधरण एवं नगण्य हो जाता है।$^3$ इस तरह विभिन्न सूक्तियों के माध्यम से बालपण्डिता ने अपने पिता को समझाते हुए कहा कि- हे तात्! तुम राजा के मान्य एवं प्रसन्नता के पात्र हो, तुम स्थिर हो जाओ! मत्स्यों के हँसने का कारण राजा के आगे मै कहूँगी, तुम स्नान तथा भोजन करो।

तब ब्राह्मण के निवेदन पर राजा ने उस बालपण्डिता को बुलाकार उस मत्स्य हास्य का कारण जानना चाहा इस पर बालिका ने कहा- हे राजन्! आप अपना तिरस्कार खुद मत करो क्योंकि-राजा कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता, वह अलौकिक रूपधारी होता है। राजा का शरीर इन्द्र से ऐश्वर्य, अग्नि से तेज, यम से क्रोध, कुबेर से


1 सम्पदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरूत्वम्।
त त्रिभुवनत्रयतिलकं जननी, जनयति सुतं विरलम्।। शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 31, पृष्ठ सं० 32
2 परं स्वामिरहितानां न क्वापि पूजा।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ सं०- 34
3 अप्रधान प्रधान स्याद्यदि सेवेत पार्थिवम्।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं०- 38, पृष्ठ -34-35

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अब वह वणिक् मंदिर से प्रतिदिन पाँच मण्डक लाता और उसी से उसका भरण पोषण होता। एक दिन वणिक् भार्या (पद्मिनी) की सखी मन्दोदरी ने उससे उन मण्डको का रहस्य पूछा जिस पर पद्मिनी ने अपनी अनभिज्ञता दर्शायी तो उस सखी ने कहा कि जो इसे तुमने नहीं जाना तो तुम्हारा यौवन, रूप एव जीवन सब व्यर्थ है। तब वह अपने पति से यह रहस्य जानना चाही तो पति ने इसे दैवकृपा कहा तथा पति ने उसे समझाया कि मनुष्य की समृद्धि एवं विपत्ति, जीवन एवं मरण का कारण दैव है।

पति से अस्पष्ट जबाव पाकर उसने अनशन कर दिया। अतः पति ने उसे बहुत समझाया कि इसे कह देने पर बडी हानि एवं पश्चाताप होगा लेकिन उसने नहीं माना। कहा गया है– जिसे देव दुःख देना चाहते हैं उसकी बुद्धि हर लेते हैं जिससे वह अपने कल्याण की बात नही समझ पाता। तब उस बुद्धि रहित ने उसे रहस्य बता दिया। तब उसने अपनी सखी से यह सारा रहस्य बताया। अब अगले दिन जब दोनों के पति गणेश जी के पास गए तो उन्होंने पद्मिनी के पति को दंडित किया तथा उसकी सखी के पति को पाँच मण्डक दे दिया। फलतः पद्मिनी को घोर पश्चाताप हुआ।

कथा- 7

"स्थगिका और ब्राह्मण कथा"

दूसरे दिन पुनः राजा ने बालिका से मत्स्य हास्य का कारण जानना चाहा तो बालिका ने कहा राजन् आप कारण न पूछें वर्ना आपको पश्चाताप होगा।

जिस प्रकार स्थगिका नाम की नायिका में आसक्त ब्राह्मण को हुआ था। वैसे ही आपको भी पश्चाताप होगा।

वत्सोन नामक नगर में वीर नामक राजा तथा केशव नामक ब्राह्मण था। वह पृथिवी पर धन के लिए देवतीर्थों, शमशानों तथा नगरों में घूमता हुआ एक निर्जन प्रदेश में पहुँचा जहाँ उसने कपिल वर्ण के कच्छप पर वीरासन से स्थित तापस को देखा तो उस विप्र ने उसके सामने हाथ जोड़कर धन की याचना की। तब उस तापस ने उसे

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सिन्दूर दिया और कहा जब तुम इसे स्पर्श करोगे तो यह तुम्हें पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ देगा। लेकिन तुम इसको व्यक्त मत करना अन्यथा यह लौटकर मेरे पास चला आएगा।

अब वह ब्राह्मण रत्नावती पुरी को गया जहाँ वह स्थगिका नाम की वेश्या के साथ नित्य रमण करता था। उसके नित्य के धनागम का रहस्य न जान पाने पर उस वेश्या ने अपनी भक्ति, कला एवं सेवा से उसे इतना प्रसन्न किया कि उस ब्राह्मण ने सारा राज बता दिया। जब वह ब्राह्मण रात में सो गया तो उस वेश्या ने उसका सिन्दूर लेकर धनहीन अवस्था में उसको (ब्राह्मण को) घर से निकाल दिया।

वह विप्र अपना सिदूर न पाकर 'मेरा धन हर लिया गया' चिल्लाता हुआ राजा के पास गया जहाँ कुटनी ने पूछे जाने पर कहा कि यह धूर्त मेरी पुत्री पर लुब्ध है और उसके साथ रमण करना चाहता है इसी कारण यह चोरी लगा रहा है। लेकिन राजा किसी प्रकार सिन्दूर का रहस्य जान गया। किन्तु लोगों के द्वारा वह ब्राह्मण निर्वासित कर दिया गया और सिन्दूर योगीन्द्र के पास पहुँच गया। उस विप्र की न स्थगिका ही रह गयी और न सिन्दूर ही रह गया।

इसी प्रकार राजन्! तुम्हें भी रति और प्रीति नहीं होगी।

कथा- 8

"वणिक पुत्री सुभगा की कथा"

दूसरे दिन बाल पण्डिता ने राजा के आग्रह करने पर कहा कि- राजा का शरीर बहुत महत्वपूर्ण है अतः आपको किसी भी शुभ अथवा अशुभ कार्य के विषय में आग्रह नहीं करना चाहिए। राजन्! मत्स्य हास्य का कारण कह देने पर आपकी भी हालत उस वणिक् पुत्री के समान होगी जिसका न घर ही रहा और न बाहर।

त्रिपुर नामक स्थान का राजा त्रिविक्रम था। जहाँ सुन्दर नामक वणिक् था जिसकी पत्नी अत्यन्त व्यभिचारिणी थी। वणिक् उसे नियंत्रित नहीं कर पाता था। एक बार उसके पति द्वारा घर से बाहर निकलने पर रोक लगाने पर वह अपने सखी की मदद से अपने घर में आग लगवा कर अपने उपपति से मिलने यक्ष मन्दिर में चली

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गई। वह पुरूष घर जलता देखकर मन्दिर छोड़कर आग देखने चला गया जिससे वह उपभोग नहीं कर सकी। अतः उसका न घर रहा न बाहर का आनन्द ही।

कथा-9

"पुष्पहास और रानी की कथा"

शुक ने कहा देवि। बालपण्डिता ने राजा से कहा यदि मेरा कहा हुआ आप नहीं समझ है तो सुनिये– सब मन्त्रियों में श्रेष्ठ पुष्पहास मंत्री बिना अपराध बन्दी है। वह क्यो बन्दी बनाया गया है?

राजा बोला– यह पुष्पहास जैसा नाम से है वैसा गुण से भी है। जब यह मेरी सभा में हँसता है तो इसके मुख में पुष्पों की झडी लग जाती है। यह बात अन्य राज्य मण्डलों में फैल गयी। तब उन राजाओं ने अपने आदमी इस कुतूहल की सत्यता का पता लगाने के लिए भेजे। उनके आने पर वह नहीं हँसा और पुष्पों का ढेर भी नहीं लगा। इस कारण उसे कारागार में बन्द कर दिया गया है।

तब बालपण्डिता ने कहा– वह मन्त्री ही अपने हँसने और मत्स्यों के हँसने का कारण कहेगा तब राजा ने पुष्पहास मंत्री को वस्त्रादि देकर मन्त्रिपद पर स्थापित कर मत्स्यहास का कारण पूछा।

मन्त्री बोला राजन्! मेरी पत्नी अन्य पुरूष में रत् हो गयी ऐसा जान लेने के कारण में नहीं मैं नहीं हँसा था।

राजा ने ऐसा सुनकर फूलों के गुच्छों से रानी को प्रताडित कर उसके मुख की ओर देखा। उस प्रहार से उसने मिथ्या मूर्छा का अभिनय किया। पुष्पहास उस रानी को देखकर हँसने लगा और पुष्पों का ढेर लग गया। राजा ने मन्त्री से कहा– हमारे दुःख मे क्यों हँस रहे हो? मन्त्री ने कहा–राजन्! तुम्हारी रानी रात में सेवक जनों द्वारा छड़ी से आहत होकर भी मूर्छित नहीं होती, इस समय मूर्छित हो गयी– यही

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