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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

हँसने का कारण है। इस प्रकार राजा ने सभा विसर्जित कर दी और उस रानी को महल से निकाल दिया।

कथा-10

"शृङ्गारवती की कथा"

राजपुर नामक स्थान पर देवसाख्य नामक एक गृहपति था, उसके शृङ्गारवती और सुभगा नाम की दो पत्नियाँ थी।

वे दोनों परपुरुष मे आसक्त और एक दूसरे की रक्षा के उपाय में तत्पर रहती थी।

एक दिन जब सुभगा उपपति के साथ घर के भीतर विद्यमान थी तभी कहीं बाहर से पति कटसरैया हाथ में लिए गृहद्वार पर आ गया।

तभी तुरन्त शृङ्गारवती ने उस सुभगा को नंगीकर घर से बाहर निकाल दिया। पति ने 'यह क्या है?' पूछा तो शृङ्गारवती ने अत्यन्त, आदर से कहा– देवी जी के उपवन से जो तुमने ये कटसरैया ग्रहण किये उसी के बाद से ही देवी जी से यह आविष्ट हो गयी, अतः जाकर यथा स्थान इसे रख आओ जिससे यह स्वस्थ्य हो जाय।

जब तक वह मूढ ऐसा करने बाहर गया तब तक उसने उपपति को घर से निकाल दिया।

कथा-11

(रम्भिका और ब्राह्मण की कथा)

दाभिल नामक गाँव में विलोचन नाम का मुखिया रहता था। उसकी पत्नी रम्भिका को परपुरुष बहुत प्रिय थे परन्तु उसके पति के भय से कोई उसका भोग नहीं करता था।

तब वह जल के बहाने से घड़ा लेकर बावली पर गयी। वहाँ उसने एक सुन्दर ब्राह्मणपुत्र को देखकर रतिक्रीडा के लिए नेत्र संकेत से कहा और उसने कहा– तुम मेरे पीछे लगे मेरे घर चलो तथा मेरे पति को नमस्कार करना और सब मैं कर लूँगी।

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तब उसके पति ने आकर उसे वृक्ष से धीरे-धीरे उतार कर उसके घर भेज दिया और वह धूर्ता (शोभिका) ताली बजाकर हंसने लगी।

कथा-13

‘‘वणिक् पत्नी राजिका की कथा’’

नागपुर नामक स्थान पर एक वणिक् रहता था। उसकी पत्नी राजिका बड़ी सुन्दर और दुराचारिणी थी। बनिया उसे परपुरूष में आसक्त नहीं जानता था। एक दिन उसने मार्ग में जाते हुए, संकेत किये हुए उपपति को देखा। उसे देखकर ‘घर से आज घी नहीं है? ऐसा कहकर घी के बहाने घर से निकलकर बाहर उपपति के साथ देर तक रही। पति घर में भूख से परेशान और क्रुद्ध था।

वह हाथ पैर और मुँह धूलिधूसर कर मुद्रा समेत धूलि लेकर घर आयी। क्रुद्ध रक्त नेत्र पति ने कहा- यह क्या?

दुःख की साँस छोड़ती तथा रोती हुई उसने धूल का ढेर दिखाकर कहा जिसके लिए तुम क्रुद्ध हो वह तुम्हारा द्रव्य इस धूल में गिर गया। इसे पछोर कर ले लो।

इस प्रकार कहने पर लज्जित उसने उसके अङ्गों को वास्त्राञ्चल से पोंछकर विविध लाड़-प्यार से शान्त किया।

कथा-14

‘‘धनश्री और उसके वेणीदान की कथा’’

शुक ने कहा- पद्मावती पुरी है। वहाँ धनपाल नामक वणिक् था। उसकी पत्नी धनश्री उसे प्राणों से भी प्रिय थी। (कुछ समय बीतने पर) एक दिन वह वणिक् रूपये-पैसे लेकर पत्नी से पूछकर विदेश चला गया। उसके चले जाने पर वह घर में मृत सी पड़ी रहती थी।


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इस प्रकार समय बीतता रहा। बसन्तोत्सव के अवसर पर उसके मनोभाव को समझने वाली सखी ने कहा- भामिनि! रूप और यौवन व्यर्थ मत करो।

ऐसा कहने पर धनश्री बोली-मैं विलम्ब नहीं सह सकती। जो कुछ तुमसे हो सकता है, वह शीघ्र करो। तब उसने उसे परपुरूष से मिलाया। उस पुरुष ने उसे अपने मे आसक्त जानकर उसके सिर की वेणी काट ली। तत्काल पति विदेश से आ गया अपने को बचाने के लिए उसने पति से कहा नाथ! तब तक तुम घर के द्वार पर ठहर जाओ, जब तक मैं सब ठीक तैयार कर लूँ।

पति के ऐसा करने पर उस बीच में जाकर देवी का पूजन कर (देवी के) सामने वेणी रख दी और मैदे की विशेष प्रकार की रोटियों के सहित बाहर निकलकर पति को घर के भीतर देवी के सामने ले जाकर उसने कहा- नाथ! घर के इष्ट देवता की पूजा करो।

पूजन करते हुए उसने वेणी देखकर कहा- यह क्या है? उसने कहा- मैंने देवी से प्रार्थना की थी जब मेरा पति आयेगा तब हे स्वामिनी। मैं तुम्हारे आगे वेणी काटूँगी।

उस मुग्ध मूढ पति ने देवी को नमस्कार कर उस (धनश्री) का अत्यन्त सम्मान किया।

कथा- 15

(श्रिया देवी और सुबुद्धि की कथा)

शालिपुर नामक नगर में शालिग बनिया रहता था। उसकी पत्नी का नाम जयिका था और पुत्र का नाम गुणाकर था। उसकी पत्नी श्रिया देवी सुबुद्धि नामक दूसरे बनिये के साथ रमण करती थी। चारों तरफ बात फैल जाने पर भी उसका पति इस अफवाह पर विश्वास नहीं करता था।

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एक दिन उस परपुरुष को सोते हुए उसके ससुर ने देखा और उसके पैर से नुपुर उतार लिया और उसे पता न चला। तब उसने उपपति को भेजकर पति को वहाँ लाकर उसके साथ, सोयी और निद्रा के बीच में पति को उठाकर कहा- तुम्हारे पिता ने हमारे पैर से नूपुर उतार लिया। उसने कहा प्रातः पिता से लेकर तुम्हें दे दूँगा। पिता ने कहा- परपुरुष के साथ सोयी देखकर मैंने नूपुर ले लिया था।

उस (श्रिया देवी) ने कहा- मैं तुम्हारे पुत्र के साथ सोयी थी यदि आपको विश्वास नहीं है तो गाँव में उत्तर की ओर यक्ष है जो कोई सच्चा होता है वही उसकी जाँघों की बीच से निकल पाता है।

ऐसा करने के लिए ससुर से स्वीकार कर लेने पर वह उपपति के घर जाकर बोली-मै प्रातः यक्ष की जाँघों के बीच से निकलूँगी तुम वहाँ पागल बनकर मेरा कण्ठ पकड़ लेना।

प्रातः यक्ष पूजा के लिए आती हुई उसके कण्ठ में पागल बने उपपति ने अपनी दोनों भुजाएँ डाल दीं।

तब पुनः स्नान कर यक्ष के पास आकर सब लोगों को सुनाकर कहा-हे भगवान यक्ष! मेरे पति तथा इस पागल के अतिरिक्त यदि और किसी पुरूष ने मेरा स्पर्श किया हो तो तुम्हारी जाँघों के बीच से मेरा निष्क्रमण न हो सके। ऐसा कहकर सबके सामने जाँघों के मध्य प्रवेश कर निकल गयी और लोगों के द्वारा सती मानकर सम्मानित की गयी।

कथा-16

"मुग्धिका की कथा"

विदिशा नामक नगरी में जनवल्लभ वणिक् रहता था। उसकी पत्नी मुग्धिका अत्यन्त चञ्चल और व्यभिचारिणी थी। जब उसने पति को कलंकित कर दिया तब पति ने विरादरी के लोगों से बताया कि वह परपुरुषगामिनी है।

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जब बन्धुओं ने वाणिक् की पत्नी से पूछा तो उल्टा उसने पति को ही परस्त्रीगामिनी बताया और कहा कि यह मुझे मिथ्या कलंकित कर रहे हैं।

तब सभी ने मिलकर यह योजना बनायी कि इन दोनों में से जो भी आज से बाहर सायेगा, वही अपराधी होगा। इस तरह सहमति होने पर भी वह सोते पति को छोड़कर बाहर चली गयी। उसके जाने पर पति दरवाजा बन्द करके सो गया। जब वह रतिक्रीडा करके आयी और पति ने दरवाजा नहीं खोला तो वह कुएँ में एक भारी पत्थर फेककर दरवाजे के पास खडी रही। पति ने सोचा कि कुएँ में गिर गयी होगी ऐसा समझकर द्वार खोलकर बाहर निकला तो वह तुरन्त अन्दर जाकर दरवाजा बन्द कर ली। तब पति भी बाहर खड़ा होकर 'हा प्रिये' ऐसा कहते हुए जोर-जोर से रोने लगा। तब पत्नी भी रहस्य खुल जाने के भय से बाहर निकलकर पति को अन्दर ले गयी और दोनों ने आपस में समझौता करते हुए इकरार किया कि आज से हम दोनों एक दूसरे पर दोषारोपण नहीं करेंगे।

कथा-17

"गुणाढ्य ब्राह्मण की कथा"

विशाला नगरी में यायजूक नामक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी पाहिनी सुरूप और अत्यन्त प्रिय थी। पिता ने अपने पुत्र को क्रमशः समस्त विद्यायें ग्रहण करायीं। कतिपय दिनों बाद वह माता-पिता को त्यागकर विदेश चल गया और गुणाढ्य नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने जयन्ती नगरी में बुद्धि से जीवकोपार्जन करने को सोचा और एक बैल का यव, काश आदि से पालन किया।

उस बैल को बन्धन युक्त कर वह बनजारा वेश धारण किये, मदना वेश्या की कुट्टिनी से बोला-कि माल लादे हुए हमारे बैल को जहाँ बांधने का स्थान मिलेगा वहीं मैं सो जाऊँगा।

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इस प्रकार कहने पर बैल पर स्थित धन ग्रहण करने की इच्छा से उस कुटनी ने उसे ठहरा लिया। वह भी बैल को बाँधकर विलासिनी के पास प्रेमासक्त होकर रात मे वहीं रह गया और सुबह सबसे पहले उठकर सोने की जंजीर लेकर चला गया।

उसके जाने के बाद एक दासी उठी और बैल को न देखकर कुटनी से बोली-आर्ये! यह क्या ?

तब विलासिनी के पास से गया हुआ जानकर वह मौनधारण कर ली और एक दिन जुए में हारा गुणाढ्य वेश्या द्वारा पकडा गया।

तब उसने उपाय सोचा-'शम्बली-शम्बली' (कुटनी) ऐसा कहने लगा।

तब राजभय से उसने गुणाढ्य को छोड दिया। चलती हुई उस कुटनी के पीछे लगा गुणाढ्य 'शम्बली' यह शब्द कहता चला और एकान्त में उसे ले जाकर प्रसन्न कर हाथ से सोने का आभूषण निकालकर दिया।

कथा-18

''सर्षपचौर की कथा''

शुभस्थान नगर में दरिद्र बनिया रहता था। एक दिन उसके घर में चोर घुसा जब उसे कुछ नहीं मिला तो वह सरसों लेकर निकला और सिपाहियों ने उसे घेर लिया। गले में सरसों बाँधे हुए वह राजा के पास लाया गया और पूछे जाने पर कहता है- अहो सरसों में कुछ नहीं रह गया।

तब राजा ने सभा में बुलाकार कहा- तुम्हारी बात का अभिप्राय समझ में नही आ रहा है। तब उसने कहा-

बलि के वर्ष दिन पर लोग अपनी रक्षा के लिए हाथ में सरसों के दानें बाँधते हैं, वह आज से निश्चय ही (अप्रमाण) असत्य होगा।

क्योंकि मैं गले में इतनी सरसों बाँधे भी बन्दी हूँ। यह सुनकर राजा हँसते हुए उसे छोड़ दिया।

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कथा-19

‘‘सन्तिका और स्वच्छन्दा की कथा’’

करहड नगर में गुणप्रिय नामक राजा था। वहीं पर सोढाक नाम का सेठ था। उसकी पत्नी सन्तिका अत्यन्त पतिव्रता थी। वहीं एक दूसरा बनिया भी था। उसकी भार्या स्वच्छन्दा व्यभिचारिणी थी। वह सोढाक को नित्य चाहती परन्तु वह उसकी इच्छा पूर्ति नहीं करता। एक दिन वह (सोढाक) मनोरथ नामक यक्ष को प्रणाम करने गया। तभी स्वच्छन्दा भी उसका अनुसरण करती हुई हावभावादि से उसे अनुकूल बनाकर उसके साथ रति क्रीडा की।

उन दोनों (सोढाक , स्वच्छन्दा ) को पकडने के लिए राजपुरुष ने मन्दिर घेर लिया। सन्तिका ने पति की निर्दोषता को बचाने के लिए रात को जोर-जोर से मृदङ्ग बजवाती यक्ष मन्दिर के पास गयी और पहरेदारों से कहा-मैं आज दिन-भर यक्ष परायण थी, अतः यक्ष का दर्शन एकान्त में करके ही भोजन ग्रहण करूँगी कुछ धन लेकर मुझे अन्दर जाने दिया जाय।

उन लोगों ने वैसा ही किया। तब उसने स्वच्छन्दा को अपना वेष धारण कराकर बाहर निकाल दिया और स्वयं भीतर रह गयी। प्रातः सोढाक को अपनी पत्नी सहित देखकर पहरेदार अत्यन्त लज्जित हुए।

कथा-20

‘‘केलिका की कथा’’

साभ्रमती नदी के किनारे शङ्खपुर नगर में सूर नामक एक धनी किसान रहता था। उसकी पत्नी का नाम केलिका था जो अत्यन्त कुटिल तथा कुलटा थी। वह नदी के दूसरे तट पर बसे सिद्धपुर में रहने वाले ब्राह्मण के साथ भोग-विलास करती थी। जब पति को यह वृतान्त ज्ञात हुआ तो वह उसके चरित्र का पता लगाने के लिए वहाँ गया। लेकिन नदी के किनारे केलिका ने पति को देख लिया।

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अतः उसने घड़े को जिसके सहारे वह नदी पार करती थी, पानी से भरकर पडोसिनी के घर के अन्दर देवी को सजाकर जल से स्नान कराकर पहले से ही संकेत द्वारा दिखाई गई दूती को लक्ष्य कर बोली-स्वामिनी! आप ही ने तो कहा था कि तुम सिद्धेश्वरी को स्नान नहीं कराओगी तो पाँच दिन के अन्दर तुम्हारे पति की मृत्यु हो जायेगी।

यह सुनकर पति प्रसन्न हुआ और अलक्षित ही चला गया।

कथा-21

"मन्दोदरी और उसके मयूर भक्षण की कथा"

प्रतिष्ठान नगर में हेमप्रभ नामक राजा और श्रुतशील मन्त्री रहता था यशोधरा नामक सेठ की पत्नी मोहिनी और उन दोनों की पुत्री मन्दोदरी थी। मन्दोदरी कान्तिपुर से आये श्रीवत्सनामक वणिक् को दी गयी। मन्दोदरी प्रतिदिन कुटनी द्वारा मिलाये गये राजपुत्र का उपभोग करती थी तथा गर्भिणी होने पर उसने राजा के प्रिय मयूर को मरवा कर खा लिया। राजा मयूर के आने पर ही भोजन करता ऐसा नियम था। उस दिन भोजन वेला पर मयूर के न मिलने पर डुग्गी पिट जाने पर कुटनी ने बताया कि किसी गर्भवती ने दोहद के कारण उसे खा लिया है।

तब कुटनी मन्दोदरी के घर गयी और उसने सारा मयूर वृतान्त बता दिया। विश्वासघातिनी कुटनी ने सब कुछ जानकर मन्त्री को और मन्त्री ने राजा को बताया। राजा ने कहा वणिक् वधू को बिना देखे उस पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए।

तब कुटनी मन्त्री को सन्दूक में रखकर उस मन्दोदरी के घर छोड़ आयी और कुछ समय बाद उसके घर जाकर उससे बोली-मुग्धे तुमने बहुत अच्छा किया जो मयूर का भक्षण कर लिया।

उसने सारा वृतान्त वणिक् वधू से फिर से पूछा-जिससे कि पेटी में स्थित मन्त्री सभी बात को सुन सके।

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ज्यों ही कुटनी ने हाथ से सन्दूक को पीटा त्यों ही वणिक् पुत्री मन्दोदरी ने वितर्क पूर्वक कहा-मातः जब तक मैंने ऐसा किया तब तक रात बीत चुकी थी और मैं जग गयी। इसके आगे स्वप्न मे और कुछ नहीं देखा। यदि कोई इस विषय में मेरा प्रमाण हो तो बताएँ।

ऐसा सुनकर मन्त्री सन्दूक का ढक्कन खोलकर बहार निकला और मन्दोदरी का सम्मान किया और उस कुटनी को निर्वासित कर दिया।

कथा-22

"माढुक की कथा"

दम्भिला गाँव में सोढाक नाम का किसान रहता था। उसकी पत्नी का नाम माढुका था। जब वह अपने पति के लिए प्रतिदिन खेत में भात लेकर जाती थी उसी बीच मार्ग में बाहर एक सूरपाल नामक मनुष्य उसका उपभोग करता था। एक दिन जब वह भात अलग रखकर उस सूरपाल के साथ स्थित थी तभी मूलदेव नामक धूर्त ने उस भात के भीतर ऊँट की शक्ल का मदिरा पात्र रख दिया। जब पति ने ऊँट के भीतर उष्ट्रिका देखा तो पूछा यह क्या है? तब उसने अत्यन्त चतुराई से कहा स्वामी! आज रात मैने स्वप्न में देखा कि एक ऊँटनी तुम्हें खा गयी। अतः विघ्न को दूर करने के लिए यह विपरीत किया। यह सनुकर अनुरक्त उसने उष्ट्रिका भी खा लिया।

कथा-23

"धूर्तमाया कुट्टिनी की कथा"

पद्मावती नगरी में सुदर्शन नाम का राजा था। उसकी पत्नी का नाम शृङ्गारसुन्दरी था। उसके साथ उस राजा के क्रीडा करते-करते ग्रीष्मकाल आ गया ऐसे ग्रीष्मकाल में चन्द्रनामक वणिक् अपनी पत्नी सहित घर की छत पर आरूढ़ हुआ। इस प्रकार सन्ध्याकाल में वह वणिक् उस प्रभावती के साथ क्रीडा किया करता था।

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इसके पुत्र का नाम राम था। पिता ने उसे सम्पूर्ण विद्यायें सिखवायीं उसकी माता ने एक दिन चन्द्र से कहा एक ही पुत्र होने के कारण मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। चन्द्र ने कहा- तुम्हारा एक ही पुत्र प्रशंसनीय है।

ऐसा कहकर धूर्तमाया कुटनी को बुलाकर कहा कि मैं तुझे सुवर्ण की सहस्र मुद्राएँ दूँगाँ। मेरे पुत्र को स्त्री माया के वञ्चन में निपुण बना दो और कहा कि यदि मेरा पुत्र कहीं भी वेश्या के कपट से पराजित हुआ तो मैं दूनी सुवर्ण मुद्राएँ लूँगा। उसने एवमस्तु कहते हुए उसे वेश्याओं में उत्पन्न होने वाले भावों का अध्ययन कराया।

इस प्रकार समस्त वेश्या चरित सीख लेने के बाद उस कुटनी ने उस पुत्र को बनिये को सौंप दिया। पिता के कहने पर वह व्यापार के लिए सुवर्ण द्वीप गया और वहाँ कलावती वेश्या के साथ एक वर्ष रहा किन्तु वह वेश्या अत्यन्त चतुराई करने पर भी उससे धन न ले सकी तो उसने सारा हाल अपनी माता से बताया। माता बोली कि- प्रपञ्च से ही उसका धन लिया जा सकता है। अतः जब वह अपने देश को जाने लगे तो तुम उससे कहना मैं भी चलूँगी और यदि न ले जाए तो कुएँ में झम् से कूद जाना ऐसा करने से वह तुम्हें सब धन दे देगा। उसने कुटनी के कथनानुसार ही किया और करोड़ों की सम्पत्तित लेकर उसे निकाल दिया।

इस प्रकार धन तथा मान के विषय में पराभव के प्राप्त होने पर अपने देश में आकर पिता को पूरा वृतान्त बताया। तब पिता ने धूर्तमाया को बुलाकर कहा कि तुम्हारे द्वारा शिक्षा देने पर भी अपना सर्वस्व गँवाकर आया हैं उसने कहा तुम फिर से नौका भराकर पुत्र समेत मुझे वहाँ भेजो। वहाँ पहुँचकर अत्यन्त चालाकी से उस कुटनी ने वेश्या से अपना और उसका सारा धन लेकर राम के साथ नौका पर सवार होकर अपने घर पहुँचकर महोत्सव कराया।

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कथा- 24

"सज्जनी और देवक की कथा"

चन्द्रपुर नगर में सूरपाल नामक धनी बढ़ई रहता था। उसकी पत्नी सज्जनी परपुरूष में आसक्ति रखती थी। अपने घर में ही स्थित वह देवक नाम पुरूष से रति करती थी ऐसा लोगो से सुनकर बढ़ई कपट से प्रातः ही घर से निकलकर शाम को गुप्त रूप से आकर पलंग के नीचे बैठ गया। जब उसकी पत्नी उपपति के साथ पलंग पर आरूढ हुई तो पति ने उसके बाल पकड़ लिए।

अतः अपनी ने अपने को बचाने के लिए उस उपपति का मुँह देखकर कहा-मेरे पति इस समय घर पर नहीं है। यद्यपि पति ने तुम्हारा धन लिया है तथापि क्षमा कीजिए। बढ़ई के आ जाने पर तुम दोनों को मिलाऊँगी।

कथा- 25

"श्वेताम्बर की कथा"

चन्द्रपुरी नगरी मे सिद्धसेन नामक बौद्ध संन्यासी लोगों द्वारा बहुत सम्मानित था किन्तु उसी नगर में एक दूसरा जैन साधु भी जो बहुत गुणवान था, आ गया उस गुणी ने सभी नगरवासियों यहाँ तक की बौद्ध भिक्षुओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर दिया था। इसलिए वह बौद्ध लोगों द्वारा उस जैन सन्यासी को सम्मान किये जाने को न सहता हुआ स्वयं उसके निवास स्थान पर वेश्या भेजकर, यह वेश्या में आसक्त सुचरित्रवान नहीं है- इस प्रकार उसकी लोकनिन्दा की। उसे देखने के लिए लोगों को बुलाया और बोला-बौद्ध भिक्षु ही ब्रह्मचारी है, जैनसाधु का अच्छा आचरण नहीं है। लेकिन जैनसाधु भी चालाक था वह दीपक से वासगृह को जलाकर रात बीत जाने पर नंगा हो, वेश्या का हाथ पकड़े हुए बाहर निकला। तभी सर्वत्र यह लोकापवाद फैल गया कि यह तो बौद्ध भिक्षु है, जैन साधु नहीं।

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उसने वैसा ही किया। इसी बीच मोहिनी ने जार को छोडकर भीतर बँधे कुत्ते के पट्टे की जिह्वा को पकडकर उसी प्रकार सो गयी। हाथ में छडी और दीप लेकर आये पति ने पूछा-क्या यह कुत्ते की जिह्वा? यहॉ कैसे?

पत्नी ने कहा-वह भूखा है। इससे मुक्त की गयी चाटने से यह दुर्बल है।

इस प्रकार कथन प्रतिकथन से वह मोहिनी से पराजित हो गया और लज्जित होकर सो गया।

कथा- 28

"देविका और प्रभाकर ब्राह्मण की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि -कुहाड ग्राम मे जरसाख्य नाम का महामूर्ख गृहस्थ रहता था। उसकी पत्नी का नाम देविका पुँश्चली था। उसके साथ प्रभाकर नाम का विप्र गुप्त स्थान में रमण करता था। इस बात को लोगों के द्वारा सुनने के बाद वह स्वयं देखने के लिए गया। वृक्ष पर चढ़कर उसने वैसा ही देखा। देखकर पेड़ पर स्थित ही उसने कहा-धूर्ति के! बहुत दिनों के बाद आज पकड़ मिली हो।

तब उस गृहस्थ की पत्नी ने चतुराई से उस जार को भेज दिया और जब पति पेड से उतरा तो उसने उलाहना देते हुए कहा-स्वामी यह वृक्ष ही ऐसा है कि इस पर चढ़े व्यक्ति को मिथुन जोड़ा दिखाई पड़ता है।

तब पति ने कहा-तुम चढ़कर देखो।

उसने वैसा ही किया और वृक्ष पर चढ़कर कहा बहुत दिनों बाद अन्य नारी के साथ गमन करते हुए दिखाई पड़ रहे हो।

उस मूर्ख ने इस बात को सत्य समझा और उसे शान्त कर घर ले गया।

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कथा- 29

"सुन्दरी और मोहन की कथा"

सीहुली ग्राम मे महाधन नाम का वणिक् रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुन्दरी था। मोहन नाम का उपपति नित्य घर आकर उसका उपभोग करता था। एक दिन जब वह ऐसी स्थिति में भी तभी उसका पति आ गया।

वह पति को घर की ओर आते देख, उपपति को नंगे ही छींके पर आरूढ कर, बाल बिखेरे, घर से निकलकर, दूर स्थित हो पति से बोली हमारे घर में छीके पर चढा हुआ एक नग्न भूत है। मन्त्रवेत्ताओं को बुलाने जाओ। उसके इस तरह कहने पर वह बुलाने चला गया। तब उसी बीच मे हाथ में जलता हुआ लुकाठा लेकर उपपति को बाहर निकाल दिया। पति के आने पर वह बोली-लुकाठा देखकर भूत भाग गया।

कथा- 30

"मूलदेव और पिशाच की कथा"

भूतवास श्मशान पर कराल और उत्ताल नाम के दो पिशाच रहते थे। उनकी क्रमशः धूमप्रभा और मेघप्रभा पत्नियाँ थी। एक दिन दोनों पिशाचों में दोनों पत्नियों में कौन सुन्दर है- इस विषय को लेकर काफी विवाद छिड़ गया। एक समय सपत्नीक उन दोनों पिशाचों को मूलदेव दिखाई पडा। उन दोनों ने मूलदेव को कसकर पकड लिया और कहा कि- इन दोनों में कौन स्मणीय है? झूठ बोलोगे तो हम मार डालेंगे। उनकी पत्नियाँ कुरूप, भीषण पिशाचिनी थीं।

अतः उसने यथार्थ न कहकर यह कहा कि जो जिसे प्रिय है उसको वही रमणीय है, दूसरी नहीं। इस तरह धूर्तराज मूलदेव के इस प्रकार कहने पर दोनों पिशाचों ने उसे छोड़ दिया।

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कथा- 30

"शशक और पिङ्गलनाम सिंह की कथा"

मधुर नामक वन में पिङ्गल नाम का सिंह प्रतिदिन बहुत से जीवों का वध करता था। इसलिए सब पशुओ ने आपस में विचार करके प्रतिदिन एक-एक पशु भेजने की व्यवस्था की और उसे सब पशुओं का वध करने से मना कर दिया। एक दिन खरगोश की बारी आई और वह सब पशुओं के कहने पर भी नहीं गया और कहा कि आज से उसके पास कोई पशु नहीं जायेगा, इस तरह काफी समय बीत जाने के बाद एक दिन दोपहर के समय ही धीरे-धीरे वह सिंह के पास चला। उसके पहुँचते ही सिंह ने उसे धर दबोचा।

अतः शशक अपने बचाव के लिए सिंह से बोला स्वामी मैं चार खरगोशों के साथ आता हुआ, मार्ग में तुम्हारे शत्रु द्वारा पकड़ लिया गया, इसी कारण देर हो गई।

सिंह ने कहा– शत्रु कहाँ है?

तब उस धूर्त खरगोश ने एक वाटिका में ले जाकर उसी का प्रतिबिम्ब कुएँ में दिखाया। मूर्ख सिंह क्रुद्ध हो जल में प्रतिबिम्ब देखकर कुएँ में 'झम्' से कूद पड़ा और मर गया।

कथा- 32

"राजिनी की कथा"

शान्तिपुर नगर में माधव सेठ रहता था। उसकी पत्नी मोहिनी और पुत्र सोहड़ थे। सोहड़ की पत्नी राजिनी बड़ी रूपवती चतुर एवं परपुरुषगामिनी थी। एक बार सास ने उसे एक द्रम्म¹ देकर कहा–जाओ बाजार से गेहूँ ले आओ।


¹ द्रम्म—सोलह पण की विशिष्ट मुद्रा,
शुकसप्तति पृष्ठसं० 149

[ 81 ]

जब वह बाजार गयी तो वही पर गेहूँ खरीदते समय उसने उपपति को देखा और संकेत द्वारा अपने पास बुलाया और गेहूँ की गठरी बाजार में छोड़कर उसके साथ चली गयी। मौका पाकर बनिये ने गठरी से गेहूँ निकालकर उसमें धूल भर दिया और बहुत देर से आने के कारण वह गठरी बिना देखे ही घर लेकर आयी। जब सास ने गठरी खोल कर देखा तो उसमें धूल, तब सास ने बहू से पूछा- यह क्या? तब उसने बताया कि मात' मेरे हाथ से बाजार के कुछ आगे ही द्रम्म पृथ्वी पर गिर पडे थे। इसलिए मैं धूल ही उठा लायी तब वह धूल में द्रम्म न देखकर बहुत दुःखी हुई।

कथा- 33

"मालिनी और रम्भिका की कथा"

शंखुपुर नगर में शकर नामक सम्पतिशाली माली था। उसकी पत्नी रम्भिका को रति अत्यन्त प्रिय थी और वह अनेक पुरुषों से सम्बन्ध रखती थी। एक दिन शंकर के घर में श्राद्ध दिवस था, उस दिन उसकी पत्नी बाजार में फूल बेचने गयी वही पर ग्राम मुख्य, वणिकपुत्र, अंकरक्षक तथा सेनाध्यक्ष चार उपपतियों को पृथक-पृथक अपने घर आने के लिए आमन्त्रित किया। वे चारों एक दूसरे के अमन्त्रण का ज्ञान नहीं रखते थे।

दूसरे दिन जब माली फुलवारी में चला गया, तभी वणिक् पुत्र उसके घर स्नान, भोजन, रमण के उद्देश्य से आया। इधर वणिक् आधा ही स्नान किया था कि दरवाजे पर ग्राममुख्य आता दिखाई पड़ा। उसको देखकर भययुक्त वणिक् उसी स्थिति में बाँस के एक झावे में बैठा दिया गया। ग्राममुख्य भी आधा ही नहा चुका था कि बाहर अंकरक्षक आ गया। उसे देखकर उसे झावे में बैठा दिया गया और कहा गया कि नीचे सर्पिणी ने बच्चे दिये हैं। अंगरक्षक भी आधा स्नान ही कर चुका था कि बलाध्यक्ष को देखकर उसे बर्तनों के समूह के बीच स्थापित कर दिया गया। माली को आता देख बलाधिप भी वहीं स्थापित किया गया। तब माली और अन्य बहुत से लोगों

[ 82 ]

को उस श्राद्ध में यथेष्ट भोजन कराया। इसके बाद अलक्षित उन चारों को पृथक्-पृथक परम मधुर स्वादिष्ट भोजन दिया गया। भोजन करते बनिये ने फू-फू ध्वनि किया। तब ऊपर स्थित ग्राममुख्य ने सर्पिणी की शंङ्का से भय से पेशाब कर दिया। बनिये ने घृत समझकर बर्तन को ऊपर उछाला और वह बर्तन ऊपर स्थित ग्राममुख्य के मुँह में लगा।

उससे वह शंङ्कित हो 'लग्नम्-लग्नम् कहता हुआ 'झम्' से कूद कर निकल गया। दूसरे भी 'लग्नम' इस शब्द से भय विह्वल हो बाहर निकले, जिससे शंकर तथा अन्य लोग विस्मयपूर्वक बहुत हँसे। तब उसने पत्नी से पूछा यह क्या? तब पत्नी ने कहा आपने श्राद्ध-श्रद्धा से नही किया इसलिए तुम्हारे पितर भूख से पीड़ित बाहर निकल आये। तब उसने फिर से श्राद्ध किया और इधर रम्भिका के कहने से वे लोग निकल गये।

कथा- 34

"शम्भु ब्राह्मण की पारडी (साड़ी) की कथा"

प्राचीन काल में एक नगर मे शम्भु नामक एक जुआरी विप्र रहता था। एक दिन नाना देश में घूमने वाले उस विप्र ने मार्ग में जाते हुए, खेती की रखवाली करती एक सुन्दर बालिका को देखकर, ताम्बूल देते हुए कहा कि-तुम यह साड़ी ग्रहण करो और मेरे साथ सम्भोग करो।

उसने बडे सुख से वैसा किया। जब रति कार्य पूरा हो गया तब वह विप्र साडी वापस माँगने लगा।

उसके माँगने पर कुछ न बोलते हुए वह घर की ओर चल पड़ी और वह ब्राह्मण भी अनाज की चार बालियाँ लेकर उसके पीछे चल पड़ा। गाँव में पहुँचकर विप्र ने कहा गाँव वालो देखो अनाज की चार बालियों के कारण इसने मेरा वस्त्र छीन लिया है।

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तब ग्रामवासियों ने इस बात को सच मानकर उसका वस्त्र दिला दिया और वह लज्जा से कुछ न बोल सकी।

कथा- 35

"शम्बक वणिक् की कथा"

प्राचीन काल मे एक गाँव में शम्बक नामक बनिया तिल खरीदता था वह सरग्राम में बर्तन बेचने वाले बनियाँ के घर गया किन्तु वह घर पर नहीं था। इसी बीच उसकी पत्नी और शम्बक के बीच परस्पर प्रीति हो गयी। उसने उसे अंगूठी देकर उसका उपभोग किया। रतिक्रिया के बाद वह अपनी अँगूठी वापस मांग रहा था किन्तु अँगूठी न पाने पर वह बाजार में तिल विक्रेता व्यापरी के पास जाकर बोला-सौ प्रस्थ तिल मुझे दो जिसका मैं बयाना दे चुका हूँ।

यह सुनकर वह बोला कौन सा तिल? तुम कौन हो? कैसा बयाना? उसने कहा-प्रस्थ का परिमाण दूना बढ़ा देने के निमित्त तुम्हारी स्त्री बयाना में अंगूठी ले चुकी है।

इस प्रकार ऐसा सुनने पर रूष्ट होकर पत्नी के पास अपने पुत्र को भेजकर कहलवाया कि तुम्हारे इस प्रकार के व्यवहार से घर नष्ट हो जायेगा।

तब पुत्र ने अँगूठी लेकर तिल बिक्रेता के हवाले कर दिया, अर्थात वह धन जैसे आया था वैसे ही चला गया।

कथा- 36

"नायिनी की रावडी की कथा"

सरड नामक गाँव में शूरपाल ग्रामाध्यक्ष रहता था। उसकी पत्नी नायिनी अपने पति से नित्य रेशमी चोली माँगती। तब उसके पति ने कहा हम लोग तो सूती वस्त्र ही पहनते हैं रेशमी सूत की बात भी हमारे घर में कोई नहीं जानता।

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