शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
कथा- 29
"सुन्दरी और मोहन की कथा"
सीहुली ग्राम मे महाधन नाम का वणिक् रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुन्दरी था। मोहन नाम का उपपति नित्य घर आकर उसका उपभोग करता था। एक दिन जब वह ऐसी स्थिति में भी तभी उसका पति आ गया।
वह पति को घर की ओर आते देख, उपपति को नंगे ही छींके पर आरूढ कर, बाल बिखेरे, घर से निकलकर, दूर स्थित हो पति से बोली हमारे घर में छीके पर चढा हुआ एक नग्न भूत है। मन्त्रवेत्ताओं को बुलाने जाओ। उसके इस तरह कहने पर वह बुलाने चला गया। तब उसी बीच मे हाथ में जलता हुआ लुकाठा लेकर उपपति को बाहर निकाल दिया। पति के आने पर वह बोली-लुकाठा देखकर भूत भाग गया।
कथा- 30
"मूलदेव और पिशाच की कथा"
भूतवास श्मशान पर कराल और उत्ताल नाम के दो पिशाच रहते थे। उनकी क्रमशः धूमप्रभा और मेघप्रभा पत्नियाँ थी। एक दिन दोनों पिशाचों में दोनों पत्नियों में कौन सुन्दर है- इस विषय को लेकर काफी विवाद छिड़ गया। एक समय सपत्नीक उन दोनों पिशाचों को मूलदेव दिखाई पडा। उन दोनों ने मूलदेव को कसकर पकड लिया और कहा कि- इन दोनों में कौन स्मणीय है? झूठ बोलोगे तो हम मार डालेंगे। उनकी पत्नियाँ कुरूप, भीषण पिशाचिनी थीं।
अतः उसने यथार्थ न कहकर यह कहा कि जो जिसे प्रिय है उसको वही रमणीय है, दूसरी नहीं। इस तरह धूर्तराज मूलदेव के इस प्रकार कहने पर दोनों पिशाचों ने उसे छोड़ दिया।
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कथा- 30
"शशक और पिङ्गलनाम सिंह की कथा"
मधुर नामक वन में पिङ्गल नाम का सिंह प्रतिदिन बहुत से जीवों का वध करता था। इसलिए सब पशुओ ने आपस में विचार करके प्रतिदिन एक-एक पशु भेजने की व्यवस्था की और उसे सब पशुओं का वध करने से मना कर दिया। एक दिन खरगोश की बारी आई और वह सब पशुओं के कहने पर भी नहीं गया और कहा कि आज से उसके पास कोई पशु नहीं जायेगा, इस तरह काफी समय बीत जाने के बाद एक दिन दोपहर के समय ही धीरे-धीरे वह सिंह के पास चला। उसके पहुँचते ही सिंह ने उसे धर दबोचा।
अतः शशक अपने बचाव के लिए सिंह से बोला स्वामी मैं चार खरगोशों के साथ आता हुआ, मार्ग में तुम्हारे शत्रु द्वारा पकड़ लिया गया, इसी कारण देर हो गई।
सिंह ने कहा– शत्रु कहाँ है?
तब उस धूर्त खरगोश ने एक वाटिका में ले जाकर उसी का प्रतिबिम्ब कुएँ में दिखाया। मूर्ख सिंह क्रुद्ध हो जल में प्रतिबिम्ब देखकर कुएँ में 'झम्' से कूद पड़ा और मर गया।
कथा- 32
"राजिनी की कथा"
शान्तिपुर नगर में माधव सेठ रहता था। उसकी पत्नी मोहिनी और पुत्र सोहड़ थे। सोहड़ की पत्नी राजिनी बड़ी रूपवती चतुर एवं परपुरुषगामिनी थी। एक बार सास ने उसे एक द्रम्म¹ देकर कहा–जाओ बाजार से गेहूँ ले आओ।
¹ द्रम्म—सोलह पण की विशिष्ट मुद्रा,
शुकसप्तति पृष्ठसं० 149
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जब वह बाजार गयी तो वही पर गेहूँ खरीदते समय उसने उपपति को देखा और संकेत द्वारा अपने पास बुलाया और गेहूँ की गठरी बाजार में छोड़कर उसके साथ चली गयी। मौका पाकर बनिये ने गठरी से गेहूँ निकालकर उसमें धूल भर दिया और बहुत देर से आने के कारण वह गठरी बिना देखे ही घर लेकर आयी। जब सास ने गठरी खोल कर देखा तो उसमें धूल, तब सास ने बहू से पूछा- यह क्या? तब उसने बताया कि मात' मेरे हाथ से बाजार के कुछ आगे ही द्रम्म पृथ्वी पर गिर पडे थे। इसलिए मैं धूल ही उठा लायी तब वह धूल में द्रम्म न देखकर बहुत दुःखी हुई।
कथा- 33
"मालिनी और रम्भिका की कथा"
शंखुपुर नगर में शकर नामक सम्पतिशाली माली था। उसकी पत्नी रम्भिका को रति अत्यन्त प्रिय थी और वह अनेक पुरुषों से सम्बन्ध रखती थी। एक दिन शंकर के घर में श्राद्ध दिवस था, उस दिन उसकी पत्नी बाजार में फूल बेचने गयी वही पर ग्राम मुख्य, वणिकपुत्र, अंकरक्षक तथा सेनाध्यक्ष चार उपपतियों को पृथक-पृथक अपने घर आने के लिए आमन्त्रित किया। वे चारों एक दूसरे के अमन्त्रण का ज्ञान नहीं रखते थे।
दूसरे दिन जब माली फुलवारी में चला गया, तभी वणिक् पुत्र उसके घर स्नान, भोजन, रमण के उद्देश्य से आया। इधर वणिक् आधा ही स्नान किया था कि दरवाजे पर ग्राममुख्य आता दिखाई पड़ा। उसको देखकर भययुक्त वणिक् उसी स्थिति में बाँस के एक झावे में बैठा दिया गया। ग्राममुख्य भी आधा ही नहा चुका था कि बाहर अंकरक्षक आ गया। उसे देखकर उसे झावे में बैठा दिया गया और कहा गया कि नीचे सर्पिणी ने बच्चे दिये हैं। अंगरक्षक भी आधा स्नान ही कर चुका था कि बलाध्यक्ष को देखकर उसे बर्तनों के समूह के बीच स्थापित कर दिया गया। माली को आता देख बलाधिप भी वहीं स्थापित किया गया। तब माली और अन्य बहुत से लोगों
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को उस श्राद्ध में यथेष्ट भोजन कराया। इसके बाद अलक्षित उन चारों को पृथक्-पृथक परम मधुर स्वादिष्ट भोजन दिया गया। भोजन करते बनिये ने फू-फू ध्वनि किया। तब ऊपर स्थित ग्राममुख्य ने सर्पिणी की शंङ्का से भय से पेशाब कर दिया। बनिये ने घृत समझकर बर्तन को ऊपर उछाला और वह बर्तन ऊपर स्थित ग्राममुख्य के मुँह में लगा।
उससे वह शंङ्कित हो 'लग्नम्-लग्नम् कहता हुआ 'झम्' से कूद कर निकल गया। दूसरे भी 'लग्नम' इस शब्द से भय विह्वल हो बाहर निकले, जिससे शंकर तथा अन्य लोग विस्मयपूर्वक बहुत हँसे। तब उसने पत्नी से पूछा यह क्या? तब पत्नी ने कहा आपने श्राद्ध-श्रद्धा से नही किया इसलिए तुम्हारे पितर भूख से पीड़ित बाहर निकल आये। तब उसने फिर से श्राद्ध किया और इधर रम्भिका के कहने से वे लोग निकल गये।
कथा- 34
"शम्भु ब्राह्मण की पारडी (साड़ी) की कथा"
प्राचीन काल में एक नगर मे शम्भु नामक एक जुआरी विप्र रहता था। एक दिन नाना देश में घूमने वाले उस विप्र ने मार्ग में जाते हुए, खेती की रखवाली करती एक सुन्दर बालिका को देखकर, ताम्बूल देते हुए कहा कि-तुम यह साड़ी ग्रहण करो और मेरे साथ सम्भोग करो।
उसने बडे सुख से वैसा किया। जब रति कार्य पूरा हो गया तब वह विप्र साडी वापस माँगने लगा।
उसके माँगने पर कुछ न बोलते हुए वह घर की ओर चल पड़ी और वह ब्राह्मण भी अनाज की चार बालियाँ लेकर उसके पीछे चल पड़ा। गाँव में पहुँचकर विप्र ने कहा गाँव वालो देखो अनाज की चार बालियों के कारण इसने मेरा वस्त्र छीन लिया है।
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तब ग्रामवासियों ने इस बात को सच मानकर उसका वस्त्र दिला दिया और वह लज्जा से कुछ न बोल सकी।
कथा- 35
"शम्बक वणिक् की कथा"
प्राचीन काल मे एक गाँव में शम्बक नामक बनिया तिल खरीदता था वह सरग्राम में बर्तन बेचने वाले बनियाँ के घर गया किन्तु वह घर पर नहीं था। इसी बीच उसकी पत्नी और शम्बक के बीच परस्पर प्रीति हो गयी। उसने उसे अंगूठी देकर उसका उपभोग किया। रतिक्रिया के बाद वह अपनी अँगूठी वापस मांग रहा था किन्तु अँगूठी न पाने पर वह बाजार में तिल विक्रेता व्यापरी के पास जाकर बोला-सौ प्रस्थ तिल मुझे दो जिसका मैं बयाना दे चुका हूँ।
यह सुनकर वह बोला कौन सा तिल? तुम कौन हो? कैसा बयाना? उसने कहा-प्रस्थ का परिमाण दूना बढ़ा देने के निमित्त तुम्हारी स्त्री बयाना में अंगूठी ले चुकी है।
इस प्रकार ऐसा सुनने पर रूष्ट होकर पत्नी के पास अपने पुत्र को भेजकर कहलवाया कि तुम्हारे इस प्रकार के व्यवहार से घर नष्ट हो जायेगा।
तब पुत्र ने अँगूठी लेकर तिल बिक्रेता के हवाले कर दिया, अर्थात वह धन जैसे आया था वैसे ही चला गया।
कथा- 36
"नायिनी की रावडी की कथा"
सरड नामक गाँव में शूरपाल ग्रामाध्यक्ष रहता था। उसकी पत्नी नायिनी अपने पति से नित्य रेशमी चोली माँगती। तब उसके पति ने कहा हम लोग तो सूती वस्त्र ही पहनते हैं रेशमी सूत की बात भी हमारे घर में कोई नहीं जानता।
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पीड़ा भी दूर करनी पडती है, हलवाहे का यह वचन सुनकर, "यह निर्दोष है" अतः लोगो का कथन मिथ्या मानकर शूरपति लज्जित हो घर गया।
कथा- 38
"प्रियंवद विप्र और खटिया के पावे की कथा"
देवि! प्राचीनकाल में प्रियंवद नामक पथिक विप्र था। एक बार मार्ग में जाते हुये, सुदर्शन गाँव मे किसी बनिये के घर पहुँचा। उसकी पत्नी पुँश्चली व्यभिचारिणी थी। रात में उस ब्राह्मण ने कामातुर हो उससे रति याञ्चा की और बनिये के बाजार जाने पर अँगूठी देकर उसके साथ रतिक्रीडा की। प्रातः उसने अँगूठी माँगी किन्तु उसने नहीं दिया।
जब माँगने पर भी उसने नहीं दिया तब वह ब्राह्मण चारपाई का एक पाया लेकर बनिये के पास गया और पाया दिखाकर रोने लगा।
उसने कहा इस पाया के टूट जाने पर तुम्हारी स्त्री ने मेरी अंगूठी ले ली। वह बनियाँ उसके कथन को सुनकर भार्या से बोला-ऐसा प्रमाद करने पर हमारे घर कोई पथिक नहीं आयेगा।
ऐसा निष्ठुर वचन सुनकर भूमि के गड्ढे से अँगूठी निकालकर पथिक के हवाले कर दिया और वह अपने अभीष्ट स्थान को चला गया।
कथा- 39
"भूधर वणिक् और उसकी तराजू की कथा"
कुण्डिन नगर में भूधर नाम का एक पथिक पुण्यनाश होने से धनहीन हो गया था। लोगों ने उसे त्याग दिया।
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जब उसके पास तुलामात्र धन रह गया, तब वह दूसरे बनियाँ के घर तुला रखकर विदेश चला गया। वहाँ धन कमाकर अपने नगर को आकर उस बनिये से तराजू माँगी। बनिये से तराजू नहीं मिली। तराजू के लोभी उस मूर्ख बनिये ने उत्तर दिया कि तुम्हारी तराजू चूहे खा गये। ऐसा सुनकर वह चुप हो गया।
एक दिन वह भूधर उसके घर भोजन के लिए गया और उसके खेलते बालक को देखकर गुप्तरिति से अपने घर ले आया। बालक का पिता कुटुम्ब समेत दुःखी होकर रोने लगा। तब किसी पडोसी ने उसे बताया कि तुम्हारे पुत्र को भूधर ले गया है।
पुत्र माँगने पर भूधर ने कहा! मित्र! तुम्हारा पुत्र मेरे साथ नदी के तट पर स्नानार्थ गया, वहाँ बाजपक्षी ने उसका अपहरण कर लिया।
यह सुनकर बनियाँ राजा के पास गया और पुत्र हरे जाने का मामला बताया। भूधर भी वहाँ गया।
तब राजा के सामने मन्त्री ने जब भूधर से पूछा तो उसने कहा देव! जहाँ लौहनिर्मित तराजू चूहे खा सकते हैं, वहाँ बाजपक्षी हाथी को हर सकता है, फिर एक बालक के हरे जाने में क्या आश्चर्य है?
यह वचन सुनकर मन्त्री ने कहा- जब यह धूर्त तुम्हारी तराजू दे तो पुत्र भी देना अन्यथा नहीं।
उसने पुत्र दे दिया। तुलाग्राही ने दण्डित हो तराजू दिया।
कथा- 40
"सुबुद्धि और कुबुद्धि की कथा"
नगर नामक नगर में सुबुद्धि और कुबुद्धि दो मित्र प्रसिद्ध थे। एक बार सुबुद्धि परदेश गया। कुबुद्धि ने मित्र की स्त्री को प्राप्त कर उससे सम्बन्ध स्थापित किया। जब सुबुद्धि धनार्जन कर विदेश से लौटा तब कुबुद्धि सुबुद्धि से कपटपूर्ण स्नेह दिखाने लगा। सुबुद्धि ने भी उसका सम्मान किया। कुबुद्धि ने उससे कहा-आपने कहीं कोई आश्चर्य देखा?
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तब उसने कहा-मनोरम नामक गाँव में सरस्वती नदी के किनारे कुएँ में बिना समय के फला हुआ, तैरता हुआ, आम का फल मैंने देखा।
सुबुद्धि ने कहा-यदि यह बात सत्य है तो हमारे घर दोनों हाथों से जो कुछ तुम ग्रहण कर सको ग्रहण करो और मिथ्या होने पर तुम्हारे घर से मैं ग्रहण करूँ।
ऐसी शर्त लग जाने पर कुबुद्धि ने रात में कुएँ से उस फल को निकाल लिया जिस कारण से सुबुद्धि हार गया और कुबुद्धि ने उसकी भार्या के ग्रहण की कामना से शर्त पूरी करने को कहने लगा।
सुबुद्धि ने उस दुष्ट के दुर्विचार को जानकर अपने घर की सकल वस्तुओं तथा अपनी पत्नी को छत पर स्थापित कर सीढ़ी हटा दी और कुबुद्धि से कहा जो तुम्हें पसंद हो वह हमारे घर से ले लो।
उसने (कुबुद्धि) उसकी पत्नी को ग्रहण करने के लिए दोनों हाथों से सीढ़ी उठाई तभी सुबुद्धि ने कहा- मैंने पहले ही कह दिया है कि दोनों हाथों से जिसे तुम ग्रहण करोगे, वही तुम्हारा है, दूसरा नहीं। अतः वह लज्जित होकर बाहर निकल गया और लोगों से निन्दित हुआ।
कथा- 41
"राजपुत्री का रोग और ब्राह्मण की मन्त्र साधना की कथा"
पञ्चपुर नगर में शत्रुमर्दन नाम का राजा था अपनी पुत्री मदनरेखा के गले की ग्रन्थि को ठीक कराने के लिए राजा ने डुग्गी पिटा दी कि जो मेरी कन्या को निरोग कर देगा उसे मैं दारिद्रय रहित कर दूँगा। किसी दूसरे गाँव से आयी ब्राह्मणी ने ऐसा सुनकर कहा कि- मेरा पति मान्त्रिक इस राजकन्या को निरोग करेगा।
अतः मन्त्रादि न जानने पर भी वह मान्त्रिक धनालोभ के कारण अनुष्ठान की सामग्री और आचार्य के बैठने का आसन आदि ठीक कर अनेक हास्यपूर्ण मन्त्रोच्चारण करने लगा और मन्त्रों के उच्चारण से राजपुत्री हँस पड़ी। अधिक हँसने से उसकी
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गले की गाँठ फूट गई। उसके फूट जाने पर राजपुत्री को आराम हो गया और राजा से धनराशि पाकर कृतार्थ होकर ब्राह्मण अपने घर चला गया।
कथा- 42
"व्याघ्रमारी और सिंह की कथा"
देउल ग्राम में राजसिंह नाम का राजपूत था। उसकी पत्नी कलहप्रिया अपने पति से झगड़ा करके अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर पिता के घर चली गयी। क्रोधवश वह अनेक नगरो तथा वनो को लाँघती हुई मलयगिरि के समीप महावन में पहुँची।
वहाँ पर बाघ को अपनी ओर आता देखकर निर्भयतापूर्वक उसने दोनों पुत्रो को तमाचा मार कर कहा- तुम दोनों एक अकेले बाघ को खाने के लिए क्यों लड़ाई कर रहे हो? इस एक ही को पहिले बाँट कर खा लो। इसके बाद जब दूसरा दिखाई पड़ेगा तब खाना।
ऐसा सुनकर सिंह ने उसे बाघ मारने वाली स्त्री समझकर भय से आकुलचित्त होकर भाग गया।
कथा- 43
"व्याघ्रमारी और जम्बुक की कथा"
वन में भयातुर उस बाघ को भगा हुआ देखकर पशुओं में धूर्त शृगाल ने कहा-कि भय से बाघ भगा हुआ है।
बाघ ने शृगाल से कहा कि तुम भी किसी गुप्त स्थान को चले जाओ, क्योंकि जिस व्याघ्रमारी को शास्त्र मे सुनते है वही मुझे मारने जा रही थी कि मैं जान बचाकर शीघ्र ही उसके आगे से भागा।
जम्बुक ने व्याघ्र से कहा स्वामिन्! वह धूर्त स्त्री जहाँ है वहाँ चला जाय, यदि वहाँ चलने पर तुम्हारे सामने भी वह देखे तो आप अपनी शर्त के अनुसार मेरा वध कर दें।
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तब उस व्याघ्रमारी (राजपुत्र की पत्नी) ने सोचा कि धूर्त शृगाल ही इसे यहाँ लाया है, अतः उसी शृगाल को फटकारती और अंगुली से भय दिखाती हुई बोली-
रे धूर्त शृगाल! पहिले तो तूने तीन बाघ दिये थे और आज एक ही बाघ विश्वस्त कर, प्रस्तुत करके क्यो जा रहा है।
ऐसा कहकर भयंकर व्याघ्रमारी वेग से दौड़ी और इधर बाघ गले मे शृगाल बांधे सहसा भाग गया।
कथा- 44
"जम्बुक की मुक्ति की कथा"
व्याघ्रमारी के भय से अन्य प्रदेश में जाने का इच्छुक बाघ, सियार को गले मे बाँधकर लटकाये लिये जा रहा है जिससे सियार की पीठ और पैर बुरी तरह रगड़ खाकर छिल उठे तथा रूधिर बहने लगा तब भी वह अपने को छुड़ाने की कामना से पीड़ित होते हुए भी बड़े जोर से हँसने लगा।
बाघ ने कहा-तू क्यों हँसा?
वह बोला-देव! मैंने उस व्याघ्रमारी को धूर्त समझा था तुम्हारी कृपा से दूर देश पहुँचकर जीवित बच गया। किन्तु हमारे गिर रुधिर बिन्दुओं से चिन्हित् मार्ग का अनुसरण करती वह पीछे-पीछे आ रही हो तो कैसे जीवित बचेंगे।
इसके बाद उस वचन को सुनकर व्याघ्र सियार को छोड़ सहसा भाग खड़ा हुआ। सियार भी सुख से स्थित हुआ।
कथा- 45
"विष्णु ब्राह्मण और रतिप्रिया गणिका की कथा"
विलासपुर नामक नगर में अरिन्दम नाम का राजा था। उसी गाँव में विष्णु नामक एक रति लोलुप ब्राह्मण जो पत्नी विहीन रति कर्म में सब स्त्रियों से पराजित न होने वाला प्रसिद्ध था। उसी गाँव में रतिप्रिया नाम की गणिका थी। उसने सोलह द्रम्म
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लेकर उसे अपने घर बुलाया। अन्य कार्यों से निवृत्त रति कर्म में मन दिये उस ब्राह्मण ने उसे जीतने के लिए रति आरम्भ की। द्रव्य के कारण उसे हराने के लिए उस वेश्या ने दो पहर तक उस रति लोलुप ब्राह्मण को सहा, किन्तु आधीरात को नीचे उतर कर उसने कुटनी से निवेदन किया और कहा कि इसका धन इसे वापस कर दो।
कुटनी ने कहा-जब मैं पीपल पर चढकर दो सूपों से पंख के फड़फड़ाने की ध्वनि करती हुई मुर्गे की बोली बोलूँ तब 'प्रभात हो गया' यह कहकर उसे निकाल देना। गणिका ने वैसा ही किया।
जब ब्राह्मण ने कुक्कुट की ध्वनि वाले स्थान को देखा तो दो सूप सहित उसे कुटनी दिखायी दी। उसने उसे ढेलों से आहत कर भूमि पर गिरा दिया। स्त्रियों ने उस कुटनी को बहुत धिक्कारा। वह ब्राह्मण शुल्क रूप में गृहीत धन का दूना धन लेकर नगर के बीच गणिका को निन्दित करके अपने घर गया।
कथा- 46
"करगरा और करगरा नाथ की कथा"
वत्सोम नामक नगर में एक दरिद्र ब्राह्मण था। उसकी पत्नी करगरा नाम के अनुसार गुणी, सब जीवों को इतना उद्विग्न करने वाली थी कि उसके गृहद्वार के वृक्ष पर रहने वाला भूत और ब्राह्मण उसके भय से वन को चले गये। भूत ने डरे हुए ब्राह्मण से कहा कि- हे अतिथि! तुम मुझसे भयभीत न हो, हे द्विज! मदन नामक भूपति की राजधानी मृगावती जाकर मैं उसकी पुत्री मृगलोचना को पकड़ लूँगा। तुम्हारे आने पर तुम्हारे दर्शन मात्र से ही मैं उसे छोड़ दूँगा।
तब भूत के न छोड़ने पर ब्राह्मण ने कहा- मैं करगरा का स्वामी, विश्वास कर यहाँ आकर स्थित हुआ, हे धूर्त भूत! तू अपने वचन का पालन कर। देव! क्या मुझसे छल करना तुझे उचित है?
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तब भूत छोड़कर चला गया। यह भूत से मुक्त हो गयी ऐसा कह कर राजा ने ब्राह्मण को कन्या और आधा राज्य दे दिया। ब्राह्मण भी पूर्णमनोरथ होकर (अपने घर) गया।
कथा- 47
"करगरानाथ की कथा"
करगरा का पति राजकन्या के साथ राजलक्ष्मी का उपभोग करने लगा। इसी समय भूत ने 'कर्णावती' नगर पहुँचकर वहाँ के राजा की भार्या सुलोचना, जो मृगावती नगर के राजा मदन की बुआ थी, को पकड़ लिया। शत्रुघ्न राजा की भार्या सुलोचना ने अपनी पीहर के केशव मान्त्रिक को बुलाया। अनिच्छुक केशव को विनय पूर्वक लाने के लिए राजा मदन ने अपने दूतों को भेजा। तब वह करगरापति भार्या के अनुरोध पर गया। वहाँ पहुँचने पर शत्रुघ्न राजा से सम्मानित हो सुलोचना के महल गया। भूत ने कठोर वाक्यों में ब्राह्मण से कहा- मैंने अपना वचन निभाया अब तुम अपनी रक्षा करो। तुम मन्त्र-तन्त्र कुछ नहीं जानते।
ब्राह्मण ने भूत से कहा मैं करगरा पति हूँ, करगरा भी यहाँ आयी है। यह सुनकर भूत चला गया। सुलोचना के स्वस्थ होने पर ब्राह्मण मृगावती नगर को चला गया।
कथा- 48
"मन्त्री शकटाल व दो घोड़ियों की कथा"
पाटलिपुर नगर में नन्द नाम का चक्रवर्ती राजा था, शकटाल उसक मुख्य सचिव था। उसने राजा को धर्म का विनाश तथा पृथिवी को द्रव्यहीन करने से रोका जिसके कारण उस मूर्ख राजा ने उस मन्त्री को पुत्रों समेत अन्धकूप में डलवा दिया।
तब बंगाल के राजा ने, शकटाल की मृत्यु हुई या नहीं इसका पता लगाने के लिए अपने सेवकों को दो घोड़ियाँ देकर नन्द के पास भेजा और उन्हें आदेश दिया
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कि इन दोनो मे कौन माता है और कौन पुत्री। इसका पता नन्द के यहाँ से कराके आओ। जब कोई भी नन्द के राज्य में घोडियों के विषय मे निर्णय न कर सका तब राजा ने नौकर से कहा-शकटाल के वंश का कुएँ के अन्दर कोई बचा है या नहीं।
उसने कहा- कोई तो अवश्य बचा है क्योकि कुएँ के अन्दर का कोई मनुष्य पूर्वोदिष्ट भात ग्रहण करता है।
तब उसे कुएँ से निकलवाकर राजा ने शकटाल से कहा इन दोनों में माता और पुत्री कौन है इस सन्देह को दूर करो।
तब मन्त्री ने दोनों घोडियों पर काठी रखवाकर विस्तृत मैदान में खूब दौड़ा कर, उनके थक जाने पर काठी उतरवा कर उन्हें छोड़ दिया। उसके बाद माता पुत्री को जीभ से चाटने लगी और पुत्री उसके प्रति अतिवत्सला-स्नेह युक्त हो गयी। तब मन्त्री ने माता और पुत्री का भेद (कौन माता है, कौन पुत्री) राजा के सामने बता दिया जिसके कारण मन्त्री को बहुत सा धन और प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
कथा- 49
"मन्त्री शकटाल और छड़ी की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- जिस प्रकार शकटाल ने दुबारा चातुर्यपूर्ण काम किय था, वैसे ही संकट में चातुर्यपूर्ण उत्तर देना जानती हो तो जाओ। शुक ने यह कथा सुनाते हुए कहा-
बङ्गाल के राजा ने सुवर्ण हीरकों से जड़ी अत्यन्त गोल आकार वाली छड़ी अपने सेवकों को देकर कहा कि-नन्द के राज्य में जाकर इस छड़ी का आदि और अन्त भाग जानकर आओ। इस आदेश से नन्द के पास आकर छड़ी उसके आगे रखकर उसका आदि और अन्त उन लोगों से पूछा। उनका प्रश्न सनुकर मुख्य-मुख्य कलावैत्ता, बनियों ने उसे तौला, अन्य पण्डितों ने उसे देखा, किन्तु कोई उसका आदि और अन्त भाग नहीं बता सका।
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तब राजा ने शकटाल को आदेश दिया कि तुम इसका आदि और अन्त भाग बताओ। उस बुद्धिमान मन्त्री ने छडी को जल मे डाल दिया और अन्तभाग जान लिया क्योकि जो मूल-भाग था वह थोडा सा जल मे डूब गया। उत्तर सुनकर उन सेवकों ने जाकर अपने राजा से बताया।
कथा- 50
"धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि की कथा"
जाङ्गल नामक गाँव में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दो मित्र थे जो धन की आशा से परदेश गये। वहाँ से प्रचुर धन अर्जन कर जब वे लौटे तो कुछ धन पीपल के पेड़ के नीचे गाडकर शेष धन लेकर अपने-अपने घर चले गये। उस दुष्टबुद्धि ने खोदकर उस धन को लेकर अपने घर ला रखा। कुछ समय बाद दोनों मिले और पीपल के नीचे स्थित द्रव्य को लेने गये। जब देखा तो वहाँ धन नही था। धर्मबुद्धि ने यह सारा वृतान्त मन्त्री से बताया। मन्त्री द्वारा बलपूर्वक पूछे जाने पर उसने (कुबुद्धि) सिर्फ इतना बताया कि मैंने सहस्र पण छोड़ दिया था, इसके लिए शपथ दिलाऊँगा।
धर्मबुद्धि ने भी इस बात को स्वीकार कर लिया तो मन्त्री ने दोनों की जमानत लेकर छोड़ दिया और वे अपने-अपने घर चले गये। तब दुष्टबुद्धि ने यह सारा वृतान्त अपने पिता को बताकर उस वृक्ष के कोटर में बिठा दिया। प्रातः दोनों वादी, मन्त्री और कौतूकाकृष्ट लोग उस पीपल के पास गये। स्नान किये दुष्टबुद्धि ने हाथ जोड़कर सत्य-शपथ कर कहा हे वृक्षोत्तम्! सच-सच कहना-यदि मैंने धन चुराया हो तो हाँ बोलना, यदि नहीं चुराया हो तो नहीं बोलना। ऐसा सुनकर सबके सामने उसके पिता ने कहा-इसने नहीं चुराया। तब धर्मबुद्धि ने उसके पिता का शब्द जानकर कोटर में आग लगा दी। चिल्लाते, अधजले उसके पिता को कोटर से गिरा देखकर मन्त्री ने दुष्टबुद्धि को दण्डित कर धर्मबुद्धि को सुखी किया।
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कथा- 51
"ब्राह्मण गाङ्ग्लि की सेना की कथा"
चमत्कार पुर नामक नगर में चारों वेद को जानने वाले, चारों वर्ण वाले, चारों आश्रम वाले, लोग रहते थे। एक बार वहाँ के ब्राह्मण बल्लभनाथ का दर्शन करने के लिए गाड़ियों, घोड़ो आदि पर सवार हो, भोजन सामग्री लेकर और अच्छे मूल्यवान वस्त्र पहिनकर पुत्रकलत्र समेत चल दिये गये। रास्ते में चोर लूटमार करने लगे। जिससे वे सभी भयभीत होकर भाग गये लेकिन गाङ्ग्लि नामक लंगड़ा ब्राह्मण उन सभी के साथ भाग नहीं सका। चोरों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। गाङ्ग्लि ने डरे हुए अपने भाई से साहसी मनुष्यों की भाँति कहा भ्रातः! कितने हाथी और घोडे हैं? शीघ्र ही बताओ और धनुष दो जिससे इन्हें दिव्य अस्त्र से एक साथ मारूँ। यह सुनकर सभी चोर भाग गये। अतः जो धर्म-अर्थ-काम के विषय में बोलना जानता है उसे पुरूषो में कौन ऐसा है जो बल से जीत सकता है अर्थात् कोई नहीं।
कथा- 52
"जयश्री की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- भूतल पर प्रतिष्ठान नामक नगर में सत्त्वशील नाम का राजा था। उसके पुत्र का नाम दुर्दमन था। वह पैतृक सम्पत्ति को त्याग कर सम स्वभाव वाले मित्रों ब्राह्मण, बढ़ई तथा वणिक् पुत्र के साथ परदेश को चला गया और चारों ने मिलकर विचार किया कि हमें रत्न भूमि समुद्र की सेवा करनी चाहिए। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर समुद्र ने उन चारों को चिन्तामणि के समान गुण वाले चार रत्न दिये घर लौटते समय विश्वास कर सबने चारों रत्नों को बनिये को सौंप दिया।
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तब उस दुष्ट ने चारों रत्नो को जांघ के भीतर डालकर सी लिया और मार्ग मे चिल्लाने लगा कि मैं तो मूस लिया गया (ठगा गया)।
उसके ऐसा करने पर उन सबने यह समझ लिया कि यह कपट कर रहा है और विवाद करते-करते वे सब ऐरावती पुरी में नीतिसार राजा के यहाँ गये और अपनी समस्या को बताया। जब यह सब बात राजा के मन्त्री को पता चली तो उसने अपनी पुत्री से बताया। पुत्री ने उन सबको स्नान, भोजन कराके शृङ्गार, करके क्रम से प्रत्येक से अपना उपभोग करने के लिए कहा और सौ स्वर्ण मुद्राएँ मांगा। क्षत्रिय, ब्राह्मण एवं बढई ने धनाभाव दर्शाया किन्तु जब वह बनिये के पास गयी तो उसने कहा स्वामिनि! चार रत्न लेकर मेरा उपभोग करो।
इस प्रकार मन्त्री की पुत्री अपने शील की रक्षा करती हुई चारों रत्नों को अपने पिता को सौंप दिया। मंत्री ने उन्हें बुलाकर प्रत्येक को दे दिया। वे भी अपना-अपना धन पाकर कृतकृत्य हो अपने-अपने घर गये।
कथा- 53
"चर्मकार की पत्नी की कथा"
शुक ने कहा चर्मण्वती के किनारे चर्मकूट नामक गाँव है। वहाँ दोहड नाम का चमार था उसकी पत्नी देविका परपुरुषों मे आसक्त रहती थी। एक बार चमार चमड़ा खरीदने बाहर गया तो वह उपपति को अपने घर लाई। जब दोनों सुरत कर चुके तभी उसका पति घर के बाहर आ गया। जब उसने पति को आया हुआ जाना तो निरर्थक वाक्य बड़-बड़ाती हुई बाहर आयी। उसका वाक्य सुनकर मूर्ख डर गया और मन्त्रवेत्ता को बुलाने चला गया तब तक उसने उस उपपति को भाग दिया।
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कथा- 54
"विप्र विष्णु के दूतकर्म की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि– शक्रावती नामक नगर में धर्मादिगुणों से युक्त धर्मदत्त नामक राजा था। उसका मन्त्री सुशील था। उस मन्त्री का पुत्र विष्णु परराष्ट्र मन्त्री था। जब उस पद से उसे हटा दिया गया तो वह धनहीन होकर भी मैं राज–कुल का अमात्य हूँ ऐसा अहंकार युक्त और कठोर हो गया। मन्त्री ने राजा से कहा कि विष्णु के ऊपर आपकी कोई कृपा नहीं है वह आपका भक्त, अनुरक्त और दूतकर्म में प्रवीण है, तो देव? कहीं भेजकर इसकी परीक्षा लें। तब राजा ने भस्म रूप भेट सामग्री पर अपनी मुहर लगाकर उसे विदिशा नगर में शत्रुदमन नामक राजा के पास भेजा। राजा ने जब उस अमङ्गलकारी भस्म को देखा तो कुपित हो गया। विष्णु ने राजा को क्रोधित देखकर कहा कि– अश्वमेघ यज्ञ कुण्ड का भस्म है जो त्रेता की अग्नि से उत्पन्न पवित्र पापनाशक तथा कल्याणकारक है। ऐसा कहकर सहसा उठकर हाथ पर भस्म रख, राजा को समर्पित कर दिया। राजा ने उसके वचन से प्रसन्न हो भस्म का वन्दन किया। उस तुष्ट राजा ने उसके बदले मूल्यवान उपायन भेजा और विष्णु को सम्मानित कर विदा किया।
कथा- 55
"श्रीधर ब्राह्मण की कथा"
चर्मकूट नामक गाँव में श्रीधर ब्राह्मण था। वहीं पर चन्दन चमार भी रहता था। श्रीधर ने उस चमार से एक जोड़ी जूता बनवाया और पैसे नहीं दिया। वह चमार रोज पैसे मांगता लेकिन श्रीधर यही कहता कि मैं तुम्हें प्रसन्नचित कर दूँगा। बहुत दिन बाद चमार ने ब्राह्मण को पकड़ लिया। उसी समय ग्रामपाल के घर पुत्र हुआ था। तब ब्राह्मण ने छलपूर्वक चमार से कहा मैंने तुम्हें प्रसन्नचित करने को कहा था इस पुत्र के पैदा होने पर तुम प्रसन्न हो या नहीं। चमार यदि नहीं कहता है तो राजा
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का दण्ड पात्र बने अन्यथा धन जाता है। उसने कहा मैं प्रसन्न हूँ। अतः छलपूर्वक मुक्त होकर ब्राह्मण अपने घर गया।
कथा- 56
"सन्तक्त वणिक् की कथा"
त्रिपथ गाँव में सान्तक नाम बनिया बड़ा धनी किन्तु कृपण दुःस्वभाव था और उसे अपना गाँव नही अन्य-अन्य गाँव प्रिय थे। एक दिन वह अन्य गाँव से वसूली करके आ रहा था तो उसे चारों ओर से चोरों ने घेर लिया। चोरों से घिरा जानकर उसने गलग्रह नामक यक्ष के आगे द्रव्य रखकर हाथ में खरिया मिट्टी लेकर कहा-देव! मैने तुम्हारी सबसे वसूली की, यह धन जो कुछ वृद्धि (व्याज) समेत मुझे मिला है इसे लीजिए।
यह देखकर कि 'यह तो यक्ष का धन है' उसे प्रणाम कर चोर चले गये और वह भी धन लेकर कुशल पूर्वक घर गया।
कथा- 57
"शुभङ्कर की कथा"
अवन्तीपुरी में विक्रमार्क राजा था। उसकी पत्नी का नाम चन्द्रलेखा था। मदनातुरा उसने शुभङ्कर नामक राजपण्डित को चाह लिया और अपने स्थान पर अपनी दासी को अपना परिधान पहनाकर स्वयं दासी का वेष बनाकर कामुक के घर जाकर रतिक्रीडा नित्य इच्छा भर करती। एक दिन राजा ने रानी की चोरी पकड़ ली।
अगले दिन राजा ने प्रातः क्रियाओं को समाप्त कर पण्डित शुभङ्कर और रानी को बुलाया। पण्डित को सिंहासन पर बिठाकर बात-चीत के सिलसिले में राजा ने हँसते हुए कहा- 'कृतकं मन्ये भयं योषिताम्' यह वचन सुनकर उसका हृदय अपने दोष से विस्मत हो गया और पण्डित ने कहा-
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हे मदनावतार!, तुम्हारी कीर्ति समुद्र के भयंङ्कर ग्राहों से व्याप्त जल को लाँघ जाती है, निराधार आकाश में स्थित होती है, दुर्गम पर्वतों के शिखर पर चढ़ जाती है, विषैले सर्पों से व्याप्त पाताल लोक को अकेले चली जाती है, अतः मैं समझता हूँ कि स्त्रियो का भय कृत्रिम होता है।
ऐसा सुनकर राजा ने रानी को उस पण्डित के हाथ पकड कर सौप दिया। अब पण्डित राजा की कृपा से उसके साथ सुख भोगने लगा।
कथा- 58
“दुःशीला पति और गणपति की कथा“
लोहपुरी नामक नगर मे राजड नाम का एक नीची जाति का व्यक्ति था। उसकी पत्नी दुःशीला पर पुरुषों में अत्यन्त आसक्ति रखती थी। वह पद्मावती पुरी सूत बेचने जाया करती थी। एक दिन उन सभी ने गणेश जी को मनौती मानी। उसने चुम्बन की मनौती मानी। गणेश जी ने सभी का लाभ कराया। तब सभी ने अपनी-अपनी मनौती गणेश जी को दिया। जब दुःशीला की बारी आयी तो विनोद प्रिय गणेश जी ने उसका अधर धर लिया। यह सारा कथा सखियों ने उसके पति को जाकर सुनाया। यह सुनकर उसने गणेश जी के सामने एक गधा के साथ रमण करना प्रारम्भ कर दिया। तब गणेश जी को हँसी आ गयी। उनके हँसने से दोनों होंठ शिथिल हो गये। इस प्रकार वह छूटकर गणेश जी को प्रणाम कर अपने पति के घर चली गयी।
इस प्रकार जो समयोचित कार्य करता है उसका यही फल होता है कि वह समय की परख रखने वाला व्यक्ति कदापि नष्ट नहीं होता।¹
1 समयोचितमारम्भं कुरुते यस्तु कृत्यवित्।
सर्वदा तु फलं तस्य समयज्ञो हि शिष्यते।
शुकसप्तति' श्लोक सं० 278, पृ०सं० 237
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