भारतकोश
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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

भुवनकोशः ७९ इदानीं दिग्व्यवस्थितिमाह— लङ्कापुरेऽर्कस्य यदोदयः स्यात्तदा दिनार्धं यमकोटिपुर्याम् । अधस्तदा सिद्धपुरेऽस्तकालः स्याद्रोमके रात्रिदलं तदैव ॥४४॥ यत्रोदितोऽर्कः किल तत्र पूर्वा तत्रापरा यत्र गतः प्रतिष्ठाम् । तन्मत्स्यतोऽन्ये च ततोऽखिलानामुदक्स्थितो मेरुरिति प्रसिद्धम् ॥४५॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥४४॥४५॥ मरीचिः—अथ सप्तलोककथनच्छलेनोपसंहारं शालिन्याऽऽह—भूरिति । व्यक्षदेशान्निरक्षदेशात् । लवणसमुद्रोत्तरतटमारभ्य दक्षिणे । भूगोलार्धे भूर्लोकः । तस्मात् । निरक्षदेशाल्लवणसमुद्रोत्तरतटमारभ्य । सौम्यः । उत्तरभूगोलार्धरूपः । अयं जम्बू- द्वीपात्मको भूर्लोको भुवर्लोकः । मेरुः स्वर्लोकः । चकार आकाशस्थपुराणप्रसिद्धस्वर्लोक- निरा

तत्रापि" -> "पूर्वापरयोर्व्यत्यासात्" (has repha on 'व्य').

Line 32: "दिशामवगमाद्दक्षिणोत्तरयोरभिन्नत्वदुक्तार्थे न काचित्क्षतिरिति भावः ।।४४।।" Wait, "भिन्नत्वदुक्तार्थे" -> 'भिन्नत्वात्' + 'उक्तार्थे' = 'भिन्नत्वादुक्तार्थे'? Look at the text: 'दिशामवगमाद्दक्षिणोत्तरयोरभिन्नत्वदुक्तार्थे' -> is there an aa-matra on 'त्व'? Look at 'त्व': no aa-matra! It is 'त्वदुक्तार्थे'! Wait, look at 'काचित्क्षतिरिति': 'का' 'चि' 'त्' 'क्ष' 'ति' 'रि' 'ति'. Then "भावः ।।४४।।" (two dandas, 44, two dandas).

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Header: Left: ८० Center: गोलाध्याये

Lines of main text: मध्याह्नम् । तस्मिन्नेव काले । अधो लङ्काया ऊर्ध्वत्वकल्पनया तदधोभागस्थितसिद्ध- पुरावच्छिन्नभूगर्भेऽस्तकालः । कालपदोपादानादेक एव कालस्तत्त

यहाँ पृष्ठ का प्रतिलेखन (transcription) प्रस्तुत है:

भुवनकोशः ८१ ननु सूर्योदयास्तयोः सर्वत्रैककालासंभवेऽपि पूर्वापरयोरैक्यमस्तु । अन्यथोदयस्तयोरेक- देशेऽपि कालतः स्थानैक्याभावात्प्रतिदिनं पूर्वापरस्थानभेदप्रसङ्गः । नहि कस्मिन्नपि देशे त्वियं पूर्वा चान्येति कस्यापि प्रतीतिः संभवत्यन्यथा कुण्डार्थदिक्साधनानुपपत्तेरित्यत उप- जातिकयाऽऽह-यत्रेति । यत्र यस्मिन्प्रदेश उदितोऽर्को निशावसाने दर्शनयोग्यतां गतः सूर्यस्तत्र तस्मिन् भागे । किलेत्यागमे । पूर्वा दिक् । प्रागञ्चतीति प्राचीपदविवरणात् । यस्मिन्प्रदेशे प्रतिष्ठांमदर्श- नतां दिनावसाने गतस्तत्रापरा पश्चिमा दिक् । तथा च प्रतिदेशमुदयास्तयोर्भिन्नत्वेन प्राची- प्रतीच्योर्भेदावश्यंभावाद्यत्र लङ्कास्थानामुदयेन प्राची तत्र सिद्धपुरस्थानामस्तत्वेन प्रतीची । यत्र च लङ्कास्थानामस्तत्वेन प्रतीची तत्र सिद्धपुरस्थानामुदयत्वेन प्राचीति सिद्धपुरप्राच्य- परयोर्व्यत्यासादुक्तार्थः समञ्जसः । न च प्रतिदिनं प्राच्यपरयोरनियतत्वापत्तिरिति वाच्यम् । कस्मिन्भागे प्राक्त्वं कस्मिंश्च भागेऽपरत्वमिति क्षितिजवृत्ते साधारणज्ञानार्थं सूर्योदयास्तयोः स्थूलत्वोपलक्षणेन साधारणोक्तित्वात् । अन्यथा प्राक्प्रतीचीभेदज्ञानासंभवापत्तेः । सूक्ष्मज्ञानं तु त्रिप्रश्नाधिकार उक्तमेवेति भावः । ननु प्राचीप्रतीच्योर्व्यत्यासेऽवश्यं दक्षिणोत्तरयोर्व्य- त्यासः । पूर्वाभिमुखपुरुषसव्यापसव्याभ्यां पश्चिमाभिमुखपुरुषसव्यासव्ययोर्भुविपरीतसद्भावा- त्पुनर्दोषतादवस्थ्यमित्यत आह—तन्मत्स्यत इति । ताभ्यां पूर्वापरस्थानाभ्यां वृत्तद्वयसंजात- मत्स्यात् । अन्ये दक्षिणोत्तरे चकारान्मत्स्यतः सिद्धे । तथा च पूर्वतः सव्यापसव्ययोर्दक्षिणो- त्तरनियमात्सिद्धपुरपर्वतोऽपि सव्यापसव्ययोर्दक्षिणोत्तरे इति भावः । ततश्च दोषाभावः । कथमित्युपसंहारव्याजेनोत्तरमाह—तत इति । तत उक्तप्रकारादखिलानां देशानां मेरुरुदक्- स्थितोऽस्तीति पुराणसर्वजनसिद्धं प्रसिद्धं प्रकर्षेण सिद्धमत्रार्थे न किंचिद्विरुद्धमित्यर्थः । तथा च यथा लङ्कास्थानां पूर्वादिविभागस्तथैव सिद्धपुरादिस्थानां पूर्वादिविभागः । कुमध्यपरि- धिप्रदेशेभ्यश्चतुर्थांशान्तरेण मेरुवडवानलयोर्दक्षिणोत्तरयोरवस्थानात्तदनुरोधेनैवेष्टदेशोऽपि दक्षिणोत्तरयोस्तदभिमुखत्वसिद्धेः सव्यापसव्यव्यत्यासस्त्ववस्तुभूतोऽधःप्रदेशभ्रमेण भ्रमरूप इत्यत एव मेरुमस्तकोर्ध्वस्थितध्रुव उत्तरध्रुव इति सिद्धमिति भावः ॥४५॥ केदारदत्त :—लवण समुद्र के उत्तरतट से दक्षिणीय भूगोलार्ध में भूलोक, निरक्ष देश लवणसमुद्र के उत्तर तट से प्रारम्भ उत्तर भूगोलार्ध के जम्बू द्वीप में भू और भुवः लोक और मेरु (ध्रुव) को स्वर्लोक कहा गया है । (मेरु = देवस्थान) नक्षत्र गोल से ऊपर मह- र्लोक, महर्लोक के ऊपर जन लोक, जनलोक के ऊपर तपोलोक, तपोलोक के ऊपर सत्य- लोक स्थित हैं । बड़े पुण्य से जन, तप, सत्य लोक की प्राप्ति होती है । उक्त इन्हीं विषयों का उल्लेख इसी भुवन कोष अध्याय के प्रकारान्तर से श्लोक १७- २० तक में आचार्य ने कर दिया है जिसे यहाँ पर और अधिक स्पष्टं किया जा रहा है कि— गोल पृथ्वी के सूर्याभिमुख दिशा में दिन और विपरीत दिशा में रात्रि का होना स्पष्ट है । ६

८२ गोलाध्याये निरक्ष देशीय खमध्य का, अर्थात् भूमध्य रेखा के साथ याम्योत्तरवृत्त का सम्पात बिन्दु का नाम निरक्ष खमध्य बिन्दु होता है। एक व्यासार्ध गोल के एक धरातल के गोल में दो बड़े वृत्तों का सम्पात दो जगह होने से उक्त वृत्तों का दूसरे सम्पात स्थान का नाम अधो खमध्य होता है। किसी भी खमध्य से ९० (नब्बे) अंश की दूरी पर किये गये वृत्त का नाम उस खम- ध्यीय भू-स्थान का क्षितिज वृत्त होता है। यहाँ पर निरक्ष देशीय क्षितिज का नाम उन्मण्डल गोल परिभाषा से स्पष्ट है। निरक्ष देशीय क्षितिज के साथ निरक्ष देशीय पूर्वापर वृत्त (नाडी वृत्त या विषुवद्वृत्त) के सम्पात बिन्दु का नाम पूर्व स्वस्तिक और पश्चिम स्वस्तिक होता है। इस प्रकार निरक्ष स्थानीय लङ्का का स्थान भूमध्य में होने से, पूर्वस्वस्तिक का नाम यमकोटि, पश्चिम स्वस्तिक का नाम रोमक पत्तन, और अधो स्वास्तिक का नाम गोल परिभाषा से सिद्धपुर कहना समीचीन है। अतः पूर्वस्वस्तिक रूप यमकोटि के खमध्यगत सूर्य बिम्ब की स्थिति से, यमकोटि में में मध्याह्न, लङ्का में सूर्योदय, रोमकपत्तन में अर्द्ध रात्रि, और सिद्धपुर में सूर्यास्त का होना गोल रीति से सुस्पष्ट होता है। अभी तक पुराणों के मतानुसार आचार्य ने मेरु पर्वत की सविशेष स्थिति पूर्व व्याख्यानों में स्पष्ट कर दी है किन्तु गोलीय नियमानुसार 'मेरु' की वस्तुस्थिति कहाँ है ? और उसका अपर नाम क्या है ? इत्यादि विषयों को यहाँ पर आचार्य गोल दृष्टि से और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। भू पृष्ठीय समाज का जो कोई जीव पृथ्वी पर जो जहाँ स्थित है, उस बिन्दु की पूर्व दिशा में वहाँ का सूर्योदय बिन्दु है, और उस बिन्दु की ९० अंश दूरी पर पश्चिम दिशा वहाँ का सूर्यास्त सिद्ध होता है, यह एक साधारण नियम है। सूत्र से ही प्राची प्रतीची दिशा का ज्ञान आचार्य ने··· 'तत्कालापमजीवयोर्विवरात्' इसी ग्रन्थ के ग्रहगणिताध्याय के त्रिप्रश्ना- धिकार में स्थल विशेष पर स्पष्ट कर दिया है। सूर्योदयास्त बिन्दुगत पूर्वापर रेखा पर लम्ब रूप याम्योत्तर रेखा में उत्तर एवं दक्षिण ध्रुव बिन्दु होते हैं जो गोल क्षेत्र से सुस्पष्ट है। इन्हीं दोनों उत्तर दक्षिण बिन्दुओं का अपर नाम सुमेरु (उत्तरध्रुव) कुमेरु (दक्षिण ध्रुव) कहा गया है। एक दिन की क्रान्ति गति शून्य मान कर सायन मेषादि तुलादि में सूर्योदयास्त बिन्दु द्वयगत पूर्वापर धरातलीय रेखा पर लम्ब रूप रेखा के उत्तर शीर्ष में उत्तर और दक्षिण शीर्ष में दक्षिण ध्रुव समीचीन सिद्ध होते हैं। प्राचीन आचार्य एक रेखा पर दूसरी रेखा को लम्ब रूप करने में रेखान्त और रेखादि बिन्दुओं से नवत्यंश वृत्तों के सम्पात द्वय पर रेखा को याम्योत्तर रेखा कहते थे।

भुवनकोशः ८३ यह एक मछली के आकार का सा चित्र बन जाता था इसलिये, “तन्मत्स्यतोऽन्ये च ततोऽखिलानामुदक् स्थितो मेरुरिति प्रसिद्धम्” ऐसा कहा जाता है । पृथ्वी के किसी विभाग के किसी बिन्दु से पूर्वापर दिशा शंकु छायादि से ज्ञात कर पूर्वापर रेखा ज्ञान पर मत्स्य रेखा करने से उत्तर दक्षिण ध्रुव गामिनी याम्योत्तर रेखा हो जाती है जो गोल क्षेत्र से स्वतः प्रसिद्ध है । क्षेत्र देखने से स्पष्ट है ॥४४-४५॥ उत्तर ध्रुव मध्यान्ह विषुवद्वृत्त धरातल पश्चिम स्वस्तिक अक्षांश शून्य निरक्ष रवमध्य पूर्व स्वस्तिक अस्त उदय रोमकपत्तन यमकोटि अर्द्धरात्रि दक्षिण ध्रुव इदानीं विशेषमाह— यथोज्जयिन्याः कुचतुर्थभागे प्राच्यां दिशि स्याद्यमकोटिरेव । ततश्च पश्चान्न भवेदवन्ती लङ्कैव तस्याः ककुभि प्रतीच्याम् ॥४६॥ तथैव सर्वत्र यतो हि यत्स्यात्प्राच्यां ततस्तन्न भवेत्प्रतीच्याम् । निरक्षदेशादितरत्र तस्मात्प्राचीप्रतीच्यौ च विचित्रसंस्थे ॥४७॥ वा० भा०—इष्टप्रदेशान्मेरोरभिमुखीमुत्तरां दिशं निश्चलां कृत्वा निरक्षा- भिमुखीं दक्षिणां च निश्चलां कृत्वा तन्मत्स्यात्प्राच्यपरा साध्या । एवं यत्प्राच्यग्रे चिह्नं भवति ततः पुनरुत्तरां दक्षिणां च साधयित्वा यावत्प्राच्यपरा साध्यते ताव- त्पूर्वरेखायां न पतति । उत्तरायाश्चलितत्वात् । प्राच्यपरा चलिता भवतीत्यर्थः । शेषं सुगमम् ॥४६-४७॥ मरीचि :—ननु मेरोः सर्वदेशेभ्य उत्तरत्वे तस्मादितरसर्वदेशानां दक्षिणत्वापत्त्या तत्र- स्थानां दक्षिणोत्तरदिग्विभागानुपपत्तेर्भद्राश्वा चोत्तरान्कुरून्यातेति पूर्वोक्तमसङ्गतमित्यतस्त- दुत्तरं विवक्षुस्तत्साधकं दृष्टान्तं प्रथममुपजातिकायाऽऽह-- यथेति ।

"? Wait! If it is "तथैव", then the word before it is "भूगोलस्थ"! Wait, is the letter before 'थैव' a 'त'? Let's look at: भू - गो - ल - स्थ - त - थै - वो - ज्ज - यि - न्याः ??? Wait! Let's count characters in that word:

  1. भू
  2. गो
  3. स्थ
  4. ?
  5. ?
  6. वो
  7. ज्ज
  8. यि
  9. न्याः Look between 'स्थ' and 'वो': There is: 'त' and 'थै'? YES! Look closely! There is a 'त' and then a 'थै'!! Wait! Let me look really closely at L10: "भूगोलस्थ" then "त" then "थै" with two matras! YES! It is "भूगोलस्थतथैवोज्जयिन्याः"! Wait, or "भूगोलस्थस्तथैवोज्जयिन्याः"? Look between 'स्थ' and 'त': There is NO 'स्'. It is: "भूगोलस्थ" then "तथैव" -> "भूगोलस्थतथैवोज्जयिन्याः" or "भूगोलस्थ तथैवोज्जयिन्याः" (with very little or no space)! Wait, "भूगोलस्थ" (situated on the globe), "तथ

Here is the line-by-line transcription of the page into Unicode Devanagari:

भुवनकोशः ८५ स्वकल्पनेन यद्भूपरिधिवृत्तं तत्सर्वतो निरक्षदेशाभिमुखत्वेन संभवत्येवं याम्योत्तरवृत्तं च तच्चतुर्थांशान्तरेणेष्टं संभवतीति मेरौ गोलयुक्त्या दिशामसिद्धिः । अत एव मेरुस्थानां पूर्वदिक्संबन्धेन भ्रमतः सूर्यस्य दर्शनाद्यत्रोदितोऽर्कः किल तत्र पूर्वेत्यादिता प्राच्यपरज्ञाना- संभवः । न च तन्निशादिनावसाने यत्र तस्योदयास्तौ तयोः प्राच्यपरत्वमिति वाच्यम् । रविविषुवद्वृत्तसंबन्धस्य दैवप्रमाणेन प्रत्यहं स्थानान्तरतया सर्वावयवावच्छेदेन संभवात्प्राक्- परयोरनुगममापत्तेर्मेरौ रविर्भ्रमति भूपगतः समन्तादाशा न काचिदपि तत्र विचारणीया । पूर्वं हि दर्शनमुपैति स चेह पूर्वा तन्नास्ततो भवति सैव कथं प्रतीचीति श्रीपत्युक्तदूषणाच्च । एतेन सविता प्रागञ्चतीति प्राचीपदवीवर

८६ गोलाध्याये से उज्जियिनी का पूर्वापर वृत्त, यमकोटि के याम्योत्तर वृत्त पर लम्ब रूप नहीं होने से यमकोटि के पश्चिम में उज्जयिनी की स्थिति कभी भी नहीं कही जावेगी क्योंकि उज्जयिनी और यमकोटि के अक्षांशों में एकता नहीं है जो गोल दर्शन से स्पष्ट है । वस्तुतः लङ्का द्वीप का अन्तिम भूभाग का अक्षांश लगभग ४।२०' के तुल्य आधुनिक भूगोल की स्थिति से है । संभव है वर्त्तमान दृश्य लङ्का द्वीप का अधोभाग समुद्र गत हो गया हो, जिसकी तत्कालीन राजधानी लङ्का नामक नगर में रही होगी ? तथा उक्त प्रकार के लङ्का खमध्य से ९० अंश की दूरी पर PAPUA, NEW GUINEA से १६° आगे एक द्वीप है जिसकी राजधानी के नगर का नाम प्राक्काल में यमकोटि रहा होगा । इस प्रकार रेखा देशीय जिस बिन्दु से यमकोटि नगर पूर्व में होता है, तो रेखादेशीय वह नगर यमकोटि से पश्चिम में नहीं कहा जावेगा । साक्ष्य देशों में प्राची और प्रतीची (पूर्व पश्चिम) दिग्ज्ञान में पूर्वापर नगरियों की स्थिति अति विचित्र ही होती है ।

[चित्र के विवरण:] ध्रुव = ध्रु NOVAYA = न ओभक = ओ तास्कन्द = ता कुरुक्षेत्र = कु उज्जैन = उ लङ्का = ल यमकोटि = य

लङ्का का याम्योत्तर वृत्त ल उ कु ध्रु, लङ्का के पूर्वापर वृत्त ल य पर लम्ब वृत्त है अत एव, ल बिन्दु से ठीक पूर्व में य बिन्दु है और य बिन्दु के पश्चिम में ल बिन्दु भी ठीक है । किन्तु उ बिन्दु के पूर्व दिशा में य बिन्दु तो है किन्तु य बिन्दु के ठीक पश्चिम में उ बिन्दु नहीं है । क्योंकि ध्रु य रेखा ही ल य रेखा पर लम्ब रूप ९०° का कोण बना रही है क्योंकि उ य रेखा से ल य रेखा पर ९०° का कोण नहीं बन रहा है, रेखागणित से स्पष्ट है ॥४६-४७॥

इदानीं चक्रभ्रमणव्यवस्थामाह— निरक्षदेशे क्षितिमण्डलोपगौ ध्रुवौ नरः पश्यति दक्षिणोत्तरौ । तदाश्रितं खे जलयन्त्रवत्तथा भ्रमद्भचक्रं निजमस्तकोपरि ॥४८॥ उदग्दिशं याति यथा यथा नरस्तथा तथा खान्नतमृक्षमण्डलम् । उदग्ध्रुवं पश्यति चोन्नतं क्षितेस्तदन्तरे योजनजाः पलांशाः ॥४९॥ योजनसंख्या भांशैर्गुणिता स्वपरिधिहृता भवन्त्यंशाः । भूमौ कक्षायां वा भागेभ्यो योजनानि च व्यस्तम् ॥५०॥ वा० भा०—उदग्दिशं याति यथा यथा नर इत्यनेनापसारयोजनैरनुपातः सूचितः । यदि भूपरिधियोजनैश्चक्रांशा लभ्यन्ते तदाऽपसारयोजनैः किमिति । फलमक्षांशाः । यदि चक्रांशमितपरिधिना भूपरिधिर्लभ्यते तदाक्षांशैः किमिति । फलं निरक्षदेशस्वदेशयोरन्तरयोजनानि स्युः । शेषं स्पष्टम् । एवं निरक्षदेशात्क्षि- तिचतुर्थांशे किल मेरुः । तत्र नवतिः ९० पलांशाः ॥४८॥४९॥५०॥ मरीचिः—अथोपस्थितिनिरक्षदेशानां स्वरूपज्ञानं वंशस्थेनाऽऽह—निरक्षदेश इति । यतो यस्मिन्भूप्रदेशे दक्षिणोत्तरौ ध्रुवौ नक्षत्रगोलाधिष्ठितौ क्षितिमण्डलोपगौ । स्वाधिष्ठितभूप्रदेशे भूगर्भविच्छेदेन यद्भूगोलार्धं दृश्यमदृश्यं तत्संधिस्थं भूपरिधिवृत्तं क्षिति- मण्डलम् । तत्समसूत्रेण भगोले तदाकारवृत्तमुपचारादुच्यते । तत्र विद्यमानौ यद्देशे भूगर्भ- क्षितिजासक्तौ भगोलस्थौ ध्रुवौ भवतस्तस्मिन्निरक्षदेशे यदाश्रितं दक्षिणोत्तरध्रुवाभ्यां स्थिरीभूतमित्यर्थः । खे आकाशे । जलयन्त्रवत्, उद्यानादिजलसेकार्थं कूपोदकोद्धारहेतुकं प्रसिद्धं काष्ठघटितं मृद्भाण्डपङ्किसहितं तद्यथा भ्रमति तद्वत् । तथाऽनवरतम् । भ्रमद्भचक्रं पश्चिमाभिमुखं भ्रमद्भाधिष्ठितगोले निजमस्तकोपरि । निजशब्देन क्षितिजासक्तध्रुव संबन्धि- देशनिवासी । तस्य मूर्धोपरि स पश्यति । ध्रुवद्वयसमान्तरितभूगोलमध्यवृत्तं खपूर्वापरवृत्ता- कारेण भवतीत्यर्थः । तथा च ध्रुवयोरक्षस्थानापन्नत्वेन तदोच्छ्रयेऽप्यक्षत्वोपचाराद्यद्देशा- वच्छिन्नभूगर्भक्षितिजाद्द्ध्रुवौच्च्याभावस्तद्देशो निरक्षपदवाच्यः । एवं यद्देशे भगोलध्रुवद्वय- समान्तरितमध्यवृत्तं पूर्वापरानुकारं भवति तद्देशो निरक्षपदवाच्य इति लक्षणद्वयेन निरक्ष- देशत्वे (त्वं) लङ्कापूर्वापरसूत्रस्थदेशेषु प्रसिद्धमिति भावः ॥४८॥ अक्ष निरक्षदेशातिरिक्तदेशेषु साक्षत्वं वंशस्थेन प्रतिपादयति—उदगिति । नरो निरक्ष- देशाद्यथा यथा यथोत्तरमित्यर्थः । उत्तरदिशं गच्छति तथा तथा । उत्तरोत्तरम् । खात् । स्वाधिष्ठितभूप्रदेशसमसूत्रेणोर्ध्वस्थभगोलप्रदेशरूपाकाशस्थानादित्यर्थः । ऋक्षमण्डलं भगोल- ध्रुवद्वयसमान्तरितमध्यवृत्तं नतं नम्रं दक्षिणदिशि पश्यति । स्वमस्तकोर्ध्वभागमध्यत्वेन भाधिष्ठितगोलभ्रमणं पश्यतीत्यर्थः । नन्वेवं तद्देशस्य निरक्षदेशभिन्नत्वेऽपि साक्षत्वं कथं तत्र ? आह—उदग्ध्रुवमिति । क्षितेः स्वदेशावच्छिन्नभूगर्भक्षितिजवृत्तोत्तरदिक्स्थाना-

८८ गोलाध्याये दित्कर्याः । उत्तरध्रुवम् । उन्नतमुच्चस्थानस्थितं पश्यति । यथा निरक्षदेशाद्दक्षिणां दिशं गच्छति तथा दक्षिणध्रुवं क्षितिजादुन्नतं पश्यति । उत्तरतो भचक्रं नतं पश्यतीति चार्थः । तथा च ध्रुवस्य क्षितिजवृत्तलग्नताया अभावात्निरक्षदेशभिन्नत्वेन साक्षत्वम् ननु ध्रुवस्याक्ष- स्थानापन्नत्वेन प्रत्युत निरक्षदेशस्य साक्षत्वं तदितरदेशस्यान्यतरध्रुवादर्शनात्तदितरध्रुव- दर्शनेऽपि निरक्षत्वौचित्यात् । ध्रुवोन्नत्या साक्षत्वप्रतिपादनमसंगतमत आह—तदन्तरे इति । तयोर्भगोलयाम्योत्तरवृत्तस्थयोर्ध्रुवद्वयसमान्तरितभगोलमध्यवृत्तप्रदेशस्वमूर्धोपलक्षिता- काशप्रदेशयोर्ध्रुवक्षितिजवृत्तप्रदेशयोर्वा । अन्तरे मध्ये । याम्योत्तरवृत्ते । पलांशाः सन्ति । तथा च पलांशानामक्षांशसंज्ञत्वात्तेषां च तदुन्नतिरूपत्वात्साक्षत्वं युक्तमुपपादितमिति भावः । ननु तदुन्नतिदर्शने तदंशज्ञानमिति दूरस्थितभगोले कथमस्तद्विशेषेणोत्तरमाह—योजनजा इति । निरक्षदेशात्स्वदेशो याम्योत्तरान्तरेण यैर्योजनैर्भवति तेभ्यो योजनेभ्य उत्पन्ना अक्षांशा इत्यर्थः । तथा चोदग्दिशामित्यनेन यथा निरक्षदेशात्स्वदेशस्यान्तरं तथा ध्रुवोन्नतिदर्श- नमिति प्रतिपादनान्निरक्षस्वदेशान्तरयोजनोत्पन्ना एव अक्षांशा इति योजनज्ञाने तज्ज्ञानम- शक्यं नेति भावः ॥४९॥ ननु योजनज्ञाने तदंशज्ञानं कथमित्यतो योजनांशौ परस्परसंबन्धेन गीत्याऽऽह— योजनेति । स्वदेशस्वनिरक्षदेशयोरन्तरस्थितयोजनसंख्या षष्ट्यधिकशतत्रयेण गुणिता स्वपदेन भूमियोजनानां भूमावेव ज्ञानात् तस्याः प्रागुक्तः परिधिस्तेन भक्ता भूमौ योजनसंबन्धि- भूपरिधिप्रदेशैकदेशेऽंशा योजनसंबन्धेन भवन्ति । ननु भूमौ योजनानां ज्ञानादुत्पन्नांशा भूमावेवेति कथं तेषामक्षांशत्वं तस्योक्तदिशाऽऽकाशस्थत्वनियमादित्यत आह—कक्षायामिति । भूमिसंबन्धांशाः कक्षायां भाधिष्ठितगोले भूम्यधिप्रदेशद्वयसंबन्धिखगोलाणुसूतसूत्राभ्यां यद्भूगोले ज्ञातं स्थानद्वयं तदन्तराले याम्योत्तरान्तररूपे । अंशाः । वा विकल्पे । उभयत्र भवन्तीत्यर्थः । कक्षाः सर्वा अपि द्वित्रिसदामिति मध्यमाधिकारोक्तरीत्या भूवृत्तेंऽशानां कक्षानां कक्षावृत्तांशसंख्यामितत्वकल्पनाल्लघुदशांशमानेनोभयत्र तुल्यांशसंख्यया संभवाद्- देशांशत्वमविरुद्धमिति भावः । न च पुरान्तरं चेदिदमुत्तरं स्यादित्यत्र पूर्वोक्त एतदक्षांश- ज्ञानावश्यकतयाऽत्र च परिध्यावश्यकतयाऽन्योन्याश्रय इति वाच्यम् । पूर्वं यन्त्रादिवेधेन विषुवन्मध्याह्ने सूर्यनतांशत्वेनाक्षांशाङ्गीकारात् । एतेन वापदोपादानात्स्वपरिधावित्यत्र भूमौ चेद्योजनानि गृहीतानि तदा भूपरिधिः । भगोले चेद्योजनानि गृहीतानि तदा योजनात्मको भगोलपरिधिरिति व्यवस्थेति निरस्तम् । आकाशे योजनगणनासंभवादगौरवाच्च । प्रसङ्गा- दंशज्ञाने योजनमाह—भागेभ्य इति । अंशेभ्यो व्यस्तं योजनानि । भागसंख्या भूपरिधि- गुणिता षष्ट्यधिकशतत्रयभक्ता योजनानि भवन्ति । चकारोऽनेन प्रकारेण । भूमाविव योजनज्ञानं न कक्षायामित्यर्थः । ममान्तरोक्तरीत्या कक्षायामपि योजनसंख्याज्ञानमित्यर्थको वा ॥५०॥

२. मध्य-गति वासना एवं छेदक वासना: खगोलीय वृत्त एवं ग्रह-कक्षाएं

भुवनकोशः ८९ केदारदत्तः —अक्षांश रहित भूपृष्ठीय देशों में अर्थात् निरक्ष देशों में रहने वाले प्राणी उत्तर और दक्षिण ध्रुव को अपने क्षितिज में देखते हैं। क्योंकि निरक्ष देशीय भूपृष्ठ खमध्य से ९०° अंश की दूरी पर जो वृत्त बनेगा वह निरक्षदेशीय क्षितिज कहा जाता है। अथवा उसका दूसरा नाम ऊनमण्डल भी कहते हैं जो गोल परिभाषा से स्पष्ट है। इसलिये निरक्ष देशीय मानव, भ्रमणशील नक्षत्र चक्र को अपने मस्तक के ऊपर पश्चिमाभिमुख जल यन्त्र की तरह देखता है। निरक्ष देश से जैसे जैसे उत्तर दिशा की ओर नर का अभियान जब होगा तो दक्षिण दिशाभिमुख नक्षत्र मण्डल नत दिखाई देता है। इसलिये कि उत्तरध्रुवाभिमुख भूपृष्ठ देश जो निरक्ष खमध्य से उत्तर अक्षांशस्थ हैं अर्थात् स्वदेशीय खमध्य से निरक्ष देशीय खमध्य अक्षांश तुल्यान्तर से दक्षिण को नत हुआ है। ऐसी स्थिति में याम्योत्तर वृत्त में ध्रुव से अपने खमध्य तक उठा हुआ ध्रुव का उन्नतांश = लम्बांश, और खमध्य से निरक्षखमध्य तक अक्षांश तुल्य ध्रुव का नतांश होता है। योजनात्मक अक्षांश से भूपरिधियोजन ज्ञान त्रैराशिक से किया जा रहा है। जैसे— उपपत्तिः—यदि भूपरिधि योजन में अंशात्मक ३६०° उपलब्ध होते हैं तो निरक्ष व स्वखमध्य द्वयान्तर तुल्य अपसार योजन में उपलब्ध अंश = अक्षांश सिद्ध होते हैं। ३६०° × अपसार योजन ────────────────── = अक्षांश । भूपरिधि योजन तथा अक्षांश और भूपरिधि योजन ज्ञान से भूपरिधि योजन × अक्षांश ──────────────────── = स्वनिरक्ष खमध्यों की योजनात्मक अन्तरित ३६० दूरी सिद्ध होती है ॥४८॥४९॥५०॥ अतस्तत्र ध्रुवर्क्षसंस्थानमाह— सौम्यं ध्रुवं मेरुगताः खमध्ये याम्यं च दैत्या निजमस्तकोर्ध्वे । सव्यापसव्यं भ्रमदृक्षचक्रं विलोकयन्ति क्षितिजप्रसक्तम् ॥५१॥ इदानीं भूपरिधिमानं प्राक्कथितमपि विशेषार्थमनुवदति स्म— प्रोक्तो योजनसंख्यया कुपरिधिः सप्ताङ्गनन्दाब्धय-४९६७ स्तद्व्यासः कुभुजङ्गसायकभुवः सिद्धांशकेनाधिकाः १५८१ १/२४ पृष्ठक्षेत्रफलं तथा युगगुणत्रिंशच्छराष्टाद्रयो ७८५३०३४ भूमेः कन्दुकजालवत्कुपरिधिव्यासाहतेः प्रस्फुटम् ॥५२॥

ढयति—सव्यापसव्यमिति । ऋक्षचक्रम् । ध्रुवद्वयसमान्तरितभा-Wait, look at "पुनर्दृढयति" or "पुनर्द्रढयति"?पुनर्द्रढयति->पु र्द्र ति(punardraḍhayati). Then—सव्यापसव्यमिति । ऋक्षचक्रम् । ध्रुवद्वयसमान्तरितभा-`

Line 18: विष्ठितगोलमध्यवृत्तं भ्रमत् । पश्चिमाभिमुखमनवरतं भ्रममाणं क्षितिजप्रसक्तम् । तद- Wait, "भाविष्ठित-" or "भाधिष्ठित-"? Look at line 17-18: भा- / विष्ठित or धिष्ठित? Wait, "ध्रुवद्वयसमान्तरितभाविष्ठित-"? No, धिष्ठित! Look at line 18, first word: विष्ठित? Wait, धि has a loop: धिष्ठित or विष्ठित? Wait, in line 17: भा- line 18: विष्ठित? But भा + विष्ठित? Or भाविष्ठित? Wait, what word is भाविष्ठित? Could it be `

खमध्यस्थत्वम् । तेन च खमध्यस्थ भूगर्भक्षितिजवृत्तपरिधिप्रदेशदभितो नवत्यंशान्तरित- त्वान्नवत्यंशाः परमाक्षांशाः । तत्र निरक्षदेशान्मेरुवडवानलयोर्भूक्षितिजवृत्तपरिधिचतुर्थी- शान्तरितत्वनिश्चयादन्यथोक्तानुपपत्तेर्भू परिधिचतुर्थांशयोजनैर्नवत्यंशास्तदिष्टयोजनैः क- इत्यनुपाने प्रमाणहरेण चतुर्मितेन च्छेदं लवं च परिवर्त्येत्यादिरीत्या फले गुणिते फलस्थाने- र्भांशाः प्रमाणस्थाने भूपरिधिस्तावदिच्छाहतमाद्यहृत्स्यादिच्छाफलमिति त्रैराशिकोक्त- प्रकारेण योजनसंख्येत्यादि प्रागुक्तमुपपन्नम् । भागेभ्यो योजनज्ञानं वैपरीत्येन भवेदेवेति किं चित्रमिति भावः ॥५१॥ अथ स्वपरिधीत्यनेनोपस्थितं प्रागुक्तभूपरिधि संस्मरंस्तत्प्रसङ्गात्प्रागुक्तभूम्यासे विशेषं च वदन्भूगोलस्य स्पष्टफलं विशेषान्तरकथनोपजीव्यं शार्दूलविक्रीडितेनाऽऽह—प्रोक्त इति । ननु व्यासे भनन्दाग्निहृते विभक्ते खबाणसूर्यैः परिधिस्तु सूक्ष्म इत्यस्य व्यस्तरीत्या परिधिः ४९६७ खबाणसूर्यै १२५० हृतः ६२०८७५० भनन्दाग्नि ३९२७ भक्तः फलं सावयवो भूव्यासः १५८१ । २ । २९ तत्कथमवयवो नोक्त इत्यत आह—सिद्धांशकेनेति । एकयोजनस्य चतुर्विंशत्यंशेनावयवेन युवता इत्यर्थः । तथा च भनन्दाग्निभक्ते शेषं १६३ तेन हरस्य भागे गृहीते फलं चतुर्विंशतिः सावयवा तत्र स्वल्पान्तरात्सुखार्थमवयवत्यागेन चतुर्विंशतिरेवोक्ता । भूमेर्भूगोलस्य । कुपरिधिव्यासाहतेः । भूपरिधिभूव्यासयोर्घातात् । प्रस्फुटं सूक्ष्मम् । पृष्ठक्षेत्रफलम् । तथा । समकोष्ठमितिरूपम् । तन्मानं लाघवादाह— युगगुणत्रिंशच्छराष्टाद्रय इति । ननु भूमिगते चतुरस्रादिक्षेत्रे समकोष्ठमितिरूपं फलं प्रत्यक्षम् । गोले तथाभूतं सर्वतो वृत्तत्वेन कथं फलं संभवतीत्यतो दृष्टान्तद्वारेण विश- दयति—कन्दुकजालवदिति । वस्त्रखण्डतूलादीनां गोलाकारो रज्वादिनिबद्घो बालैः क्रीडार्थं कन्दुकः क्रियते । तदुपरि समन्ताद्यज्जालं तस्य चतुष्कोणाः कोष्टका दृश्यन्ते । तद्वद्गो- लोपरि समन्ताचतुष्कोणकोष्ठकाः समाः क्वचिच्च त्रिभुजक्षेत्राकाराः कोष्टका दृश्यन्त इत्यर्थः । तथा च गोलोपरि पूर्वापरपरिधिमार्गे योजनान्तरेण याम्योत्तरानुकारेण परिधयः परिध्यर्धमितास्तेन गोले परिधिमिता वप्रा दक्षिणोत्तरा भवन्ति । अथ च पूर्वा[पर]परि- ध्योर्याम्योत्तरयोर्व्यासयोजनान्तरेण लघुवृत्तानि यथोत्तरं स्पष्टपरिधिरूपाणि निरेकव्यास- तुल्यानि । तेन गोलेन दक्षिणोत्तरमार्गे पूर्वापराणि वप्रा व्याप्रिता अतः परिधिव्यासा- हतितुल्याः कोष्ठा उपपन्नाः । न च दक्षिणोतरमार्गे लघुवानि परिधियोजनान्तरेण निरेकपरिध्यर्धमितान्यतः परिध्यर्धतुल्याः पूर्वापरा वप्राण(इ)ति परिधिवर्गाधंतुल्याः कोष्टा गोलोपरि सर्वतः परिधिदर्शनाद्व्यासादर्शनाच्चोपपन्नाः कथं व्यासपरिधिघाततुल्या इति वाच्यम् । याम्योत्तरवृत्तसंपातावधिगोलान्तर्व्यासस्य प्रत्यक्षत्वात्फलज्ञानार्थं व्यास- परिध्योरावश्यकत्वात् । व्यासासंबन्धेन फलस्व पूर्वेपेक्षितत्वाच्चेति भावः ॥५२॥ केदारदत्तः—मेरु पृष्ठस्थ मानव उत्तर ध्रुव को अपने खमध्य में एवं कुमेरुपृष्ठगत मानव दक्षिण ध्रुव को राक्षस गण अपने खमध्य में देखते हैं ।

९२ गोलाध्याये भूगर्भविन्दु केन्द्र से ध्रुवाभिमुख सूत्र का नाम ध्रुव सूत्र होता है। ध्रुव सूत्र के अन्त में पृथ्वी में आकाशीय ध्रुव का स्थान होने से उस बिन्दु पर, ध्रुव तारा शिर के ठीक ऊपर होने से भूनिष्ठ उस बिन्दु का नाम ध्रुव स्थान कहा जाता है क्योंकि वहाँ पर उत्तर या दक्षिण ध्रुवगत सूत्र को आकाश में वर्धमान करने से उत्तर ध्रुव स्थान के खमध्य में उत्तर ध्रुव एवं दक्षिण ध्रुव को तत्रस्थ जन समाज शिर के ऊपर ध्रुव को देखता है। अतएव उत्तर ध्रुवस्थ दृष्टा को दक्षिण ध्रुवाभिमुखीय दृष्टि एवं दक्षिण ध्रुवस्थ मानव की उत्तर ध्रुवाभिमुखीय दृष्टि वशेन नक्षत्र मण्डल दाहिने और बायें भ्रमणशील दृष्टिपथ में आते हैं देखें भी जाते हैं। जो प्रत्यक्ष सिद्ध है। योजन माप में पृथ्वी की परिधि ४९६७ योजन है और पृथ्वी का व्यास १५८१ १/२४ योजन कहा गया है। पृथ्वी का पृष्ठफल ७८५३०३४ जो जाल से ढके हुये किसी फुटबौल के पृष्ठ फल की तरह परिधि गुणित व्यास के तुल्य होता है। उपपत्तिः—प्राचीन आचार्यों ने किसी भी वृत्त की परिधि के ३६० अंशों में अर्थात् ३६० × ६० = २१६०० कलाओं में व्यास का मान ६८७६ कला माना है। अतः त्रैराशिक गणित से १ कला व्यास परिधि का मान २१६०० × १ = ————— होता है। ६८७६ हर भाज्य को किसी बड़े अंक से गुणा भाग अर्थात् १० हजार से देने पर एक स्वरूप अविकृत होने से १ कलागत परिधि का मान २१६००० × १ × १०००० १८०० × १२५० = ————————— = ——————— ६८७६ × १०००० ५७३ × १२५० २२५०००० ३९२७ × १ = —————— = ———— इस प्रकार ५७३ × १२५० १२५० ३९२७ × इष्ट व्यास इष्ट व्यास में परिधि का मान = ——————— सिद्ध होता है। १२५० १७७ १ अथवा स्वरूपान्तर से इष्ट व्यास × ( ३ ———— ) = ( ३ + — ) × इष्ट व्यास १२५० ७ स्वल्पान्तर से परिधि मान सिद्ध होता है। आचार्य का भूव्यास का मान और भूव्यासादि ज्ञान गणित— भास्कराचार्य ने अपनी अंकगणित की लीलावती नाम की पोथी के (१ अंगुल = ८ यवोदर, २४ अंगुल = १ हाथ, ४ हाथ = १ दण्ड, और २००० दण्ड = १ क्रोश तथा ४ क्रोश = १ योजन,) परिभाषा प्रकरण में एक स्थान से अन्यस्थानान्तर को मापने का मापदण्ड बताया है।

भुवनकोशः ९३ इस प्रकार १ क्रोश = २००० दण्ड = ८००० हाथ की दूरी को एक क्रोश कहा गया है । वर्त्तमान में दो हाथ = १ गज = ३ फीट मान से ८००० हाथ = ४००० गज = १२००० फीट = का एक योजन होता है । १७६० गज का १ मील होने से १२००० / १७६० = १२०० / १७६ = ६ ६/७ मील = १ योजन कहा जाना चाहिए । स्वल्पान्तरित गणित से ७ मील = १ योजन भी कह सकते हैं । अतः उक्त १५८१ १/२४ योजन = १५८१ १/२४ × ७ = ११०६७ ७/२४ मील में पृथ्वी की निरक्षदेशीय भूपरिधि का मान सिद्ध होता है । आचार्य ने भू व्यास का मान १५८१ १/२४ योजन की कल्पना अंगुल, हाथ, आदि कल्पना के आधार से स्वीकार की है । क्वचित् ग्रन्थों में योजनों का मीलों में परिवर्त्तन करने से ५ मील = १ एक योजन भी सही हो रहा है । अतः १५८१ १/२४ × ५ = ७९०५ ५/२४ मीलों में भू परिधि मान ठीक उतरता है । उक्त त्रैराशिक से व्यास × ३९२७ / १२५० = सूक्ष्म परिधि तथा, व्यास × २२ / ७ = उपरोक्त स्थूल परिधि मान स्पष्ट होता है ॥५१-५२॥ लल्लोक्तस्य नगशिलीमुखबाणभुजंगमेत्या भूपृष्ठफलस्य दूषणमाह— दुष्टं कन्दुकपृष्ठजालवदिलागोले फलं जल्पितं लल्लेनास्य शतांशकोऽपि न भवेद्यस्मात्फलं वास्तवम् । तत्प्रत्यक्षविरुद्धमुद्धतमिदं नैवास्तु वा वस्तु वा हे प्रौढा गणका विचारयत तन्मध्यस्थबुद्ध्या भृशम् ॥५३॥ वा० भा०—यल्लल्लोक्तं भूपृष्ठफलं तद्दुष्टम् । यतस्तदुक्तफलस्य शतांशकोऽपि पारमार्थिकं फलं न भवति । अत्यन्तं दुष्टमित्यर्थः । कुतो यतस्तत्प्रत्यक्षविरुद्धम् । प्रत्यक्षबाधो हि महादूषणम् । अथाऽऽत्मन औद्धत्याशङ्कां परिहरन्नाह—इदं मदुक्तं नैवोद्धतं किंतु वस्तु परमार्थः । अथवा किं शपथपरिहारेण । उद्धतमस्तु वा वस्तु वा । हे प्रौढा गणका मध्यस्थबुद्ध्या विचारयत । भृशमत्यर्थम् ॥५३॥ मरीचिः—ननु परिधिकथने विशेषावगमार्थं व्यासकथनं प्रसङ्गात्तद्युक्तम् । परन्तु

तत्प्रसङ्गाद् भूपृष्ठफलकथनमनुचितम् । तयोजनाभावादन्यथा भूवृत्तफलभूगोलान्तर्घनफलयोरु- क्तत्वापत्तेरित्यतः शार्दूलविक्रीडितेनाऽऽह—दुष्टमिति । लल्लेन । इलागोले पृथ्वीगोले कन्दुकपृष्ठजालवद्यत्फलं स्वरचितगोलग्रन्थे नगशिली- मुखबाणभुजंगमज्वलनवह्नि॒निरसेषुगजाश्विनः । कुवलयस्य बहिः परियोजनान्यथ जगुः खलु कन्दुकजालवदित्यनेन जल्पितमुक्तं तद्दुष्टम् । असदित्यर्थः । कुत इत्यत आह—प्रत्यक्ष- विरुद्धमिति । प्रत्यक्षेण बाधितमित्यर्थः । अत्र हेतुमाह—अस्येति । यस्मात्कारणादस्य लल्लोक्तभूगोलपृष्ठफलस्य शतांशो वास्तवं तत्त्वभूतं फलं भूपृष्ठफलं न भवेत् । अपिशब्दा- च्छतांशस्य फलत्वासिद्धौ यथास्थितस्य सुतरां तत्त्वासिद्धिरित्यर्थः । वास्तवं फलं शतगुणितं फलत्वेनोक्तं तदपि समो यतः स्यात्परिधेः शतांश इत्युक्तरीत्या तत्समीचीनमभ्युपेयमिति भावः । ननु तदुक्तफलस्य वस्तुभूतत्वेन त्वदुक्तदूषणं स्वप्रागल्भ्यद्योतकमसंलग्नमेवेत्यत आह—उद्व(द्ध)तमिति । इदं त्वदुक्तं तद्दुष्टमिति मदुक्तमित्यर्थः । उद्धतमसंलग्नं न यदसदित्युक्तं तत्संगतमेवेत्यर्थः । एवकाराद्दोषदृढता तदनुद्धाररूपा सूचिता । ननु दुष्टं जल्पितमिति पदाभ्यामौद्धत्यं तव सुव्यक्तं नेयं प्रामाणिकरीतिरितयत आह—अस्त्विति । वा पक्षान्तरे । मदुक्तमुद्धतमस्तु । तथा च मदुक्तेरसंगतत्वे त्वौद्धत्यमुचितम् । मदुक्तेर्यथार्थत्वे तादृशोक्तिः स्वस्य पदार्थतत्त्वक्षोददक्षत्वसूचिकेति भावः । ननु वास्तवफलस्यानिर्णयादुक्त- दूषणं यत्किंचिदित्यत आह—वस्त्विति । हे प्रौढाः सदसद्विवेचनदक्षा गणका गणितत्व- पारंगमाः । यूयं । तत् । लल्लोक्तभूपृष्ठफलं मध्यस्थबुद्ध्या पक्षपातराहित्येन यथार्थतत्त्व- विचारात्मकप्रज्ञया । भृशमिति सूक्ष्मविचारेण । वस्तुभूतं वाकारादवस्तुभूतमिति विचारयत । विचारविषयं कुरुत । तथा च मदुक्तभूपृष्ठफलस्य परिधिव्यासहतिरूपत्वाद्वस्तुभूतत्वेन लल्लोक्तस्यैतल्लक्षणत्वेनावस्तुभूतत्वान्मदुक्तं दूषणं युक्तमेवेति भावः । एतेन लल्लोक्तभूगोल- फलनिरासार्थं मया भूगोलफलमुक्तमिति भूवृत्तफलभूगोलान्तर्घनफलयोरप्रयोजनादनुक्तिरिति तात्पर्यम् ॥५३॥ केदारदत्तः—श्री लल्लाचार्य ने भी अपने धीवृद्धिद तन्त्र ग्रन्थ में भूपृष्ठ फल गणित का साधन किया है जो कदापि समीचीन नहीं है । लल्लाचार्य के भूपृष्ठफल साधन की महान् स्थूलता पर आचार्य ने लल्लाचार्य के लिये कटु शब्द 'जल्पितम्' तक का प्रयोग करते हुये कहा है कि लल्लाचार्य का भूपृष्ठ फल का शतांश भी सही नहीं है । गणित की प्रत्यक्षता ही स्वतः प्रमाण है, आचार्य पुनः नम्रता से भविष्य के खगोल गणितज्ञों से निवेदन कर रहा है कि मध्यस्थ बुद्धि से आप लोग विचार करेंगे ही कि सही गणित क्या है ॥५३॥ ग्रन्थ विस्तार भय से इस विषय का और अधिक व्याख्यान अलम् होगा । अथ सद्युक्तिः— यत्परिध्यर्धविष्कम्भं वृत्तं कृतं किलांशुकम् । तेनार्धेञ्छाद्यते गोलः किंचिद्वस्त्रेऽवशिष्यते ॥५४॥

भुवनकोशः ९५ गोलक्षेत्रफलात्तस्माद्वस्त्रक्षेत्रफलं यतः । सार्धद्विगुणितासन्नं तावदेवापरे दले ॥५५॥ एवं पञ्चगुणात्क्षेत्रफलात्पृष्ठफलं खलु । नाधिकं जायते तेन परिधिघ्नं कुतः कृतम् ॥५६॥ वृत्तक्षेत्रफलं यस्मात्पारिधिघ्नं न युक्तिमत् । दुष्टत्वादगणितस्यास्य दुष्टं भूपृष्ठजं फलम् ॥५७॥ वा० भा०—गोलपरिध्यर्धप्रमाणो यथा व्यासो भवति तथा वस्त्रं वृत्तं कृत्वा तेन वस्त्रेण गोलोपरिन्यस्तेन गोलार्धं प्रच्छाद्यते । वस्त्रपरिधेः संकोचात्किंचिद्वस्त्रे- ऽवशेषं भवति । एवं सति गोलव्यासवृत्तक्षेत्रफलाद्वस्त्रवृत्तक्षेत्रफलं सार्धद्विगुणिता- सन्नं भवति । तावदेवापरे किल गोलार्धे । एवं वृत्तक्षेत्रफलात्पञ्चगुणाधिकं पृष्ठ- फलं कथंचिदपि न भवति । किंतु न्यूनमेव स्यात् । तर्हि तेन लल्लेन । वृत्तफलं परिधिघ्नं समन्ततो भवति गोलपृष्ठफलम् । इति स्वगणिते कथं परिधिघ्नं कृतम् । किंतु वृत्तफलं चतुर्घ्नमेव पृष्ठफलं भवति । अस्य लल्लोक्तस्य गणितस्य दुष्टत्वादभूपृष्ठफलमपि दुष्टमित्यर्थः । अथ बालावबोधार्थं गोलस्योपरि दर्शयेत् । भूगोलं मृन्मयं दारुमयं वा कृत्वा तं चक्रकलापरिधिं प्रकल्प्य २१६०० तस्य मस्तके बिन्दुं कृत्वा तस्माद्विन्दोर्गोल- षण्णवतिभागेन शरद्विदस्रसंख्येन २२५ धनूरूपेणैव वृत्तरेखामुत्पादयेत् । पुनस्त- स्मादेव बिन्दोस्तेनैव द्विगुणसूत्रेणान्यां त्रिगुणेनान्यामेवं चतुर्विशतिगुणं यावच्च- तुर्विंशतिवृत्तानि भवन्ति । एषां वृत्तानां शरनेत्रबाहव २२५ इत्यादीनि ज्यार्धानि स्युः । तेभ्योऽनुपाताद्वृत्तप्रमाणानि । तत्र तावदन्त्यवृत्तस्य मानं चक्रकलाः २१६०० । तस्य व्यासार्धं त्रिज्या ३४३८ । ज्यार्धानि चक्रकलागुणानि त्रिज्या- भक्तानि वृत्तमानानि जायन्ते । द्वयोर्द्वयोर्वृत्तयोर्मध्य एकैकं वलयाकारं क्षेत्रम् । तानि चतुर्विंशतिः । बहुज्यापक्षे बहूनि स्युः । तत्र महदधोवृत्तं भूमिमुपरितनं लघु मुखं शरद्विदस्रमितं लम्बं प्रकल्प्य लम्बगुणं कुमुखयोगार्धमित्येवं पृथक्पृथक् फलानि । तेषां फलानां योगो गोलार्धपृष्ठफलम् । तद्द्विगुणं सकलगोलपृष्ठफलम् । तद्व्यास- परिधिघाततुल्यमेव स्यात् ॥५४॥५५॥५६॥५७॥ मरीचिः—ननु तन्मते यथा वृत्तफलं परिधिव्यासाहतिचतुर्भाग रूपं चतुर्गुणं परिधि- व्यासाहतिरूपगोलपृष्ठफलं भवति । वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलं तत्क्षणं वेद्देहु- परि परितः कन्दुकस्येव जालमिवि यद्युक्तंस्तथा लल्लमते वृत्तफलपधिगुणं गोलपृष्ठफलं भवति । वृत्तफलं परिधिघ्नं समन्ततो भवति । गोलपृष्ठफलमिति लल्लोद्युक्तेः । तथा हि । नभःशराभ्रक्षितयोऽस्य विस्तृतितिरिति तदुक्तो भूव्यासः पञ्चाशदधिकसहस्रं १०५० व्यासा-

व्यास २" in Line 3? Look at Line 3: व्यास २ ११ ११ Wait, look under "व्यास २": There is "७"! Wait, where is "७"? Is "७" on Line 4? Line 4 has: ७ व्यास १ व्यास ११ Wait! Look at the alignment: Under "पूर्वपरिध्यर्धरूपं व्यासः ११": There is "व्यास २" and under it "७"? Wait, no! "व्यास २" is under "व्यासः ११"? No, look at "व्यास २": It is at the left! Wait, why is it at the left? Because above it is: Line 1: क्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलमिति गोलवृत्तक्षेत्रपरिधिस्वरूपं १२ । अथ वस्त्रफलार्थं? Wait, look at the image carefully! Let's trace: Line A: क्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलमिति गोलवृत्तक्षेत्रपरिधिस्वरूपं १२ । अथ वस्त्रफलार्थं Wait, look at the word: "गोलवृत्तक्षेत्र" then is it "परिधिस्वरूपं"? Wait! It has "प-रि-धि-स्व-रू-पं"! Wait, does it really say "परिधिस्वरूपं"? Look at the loop: प, then र with ि (रि), then ध with ि (धि),

भुवनकोशः ९७

सम्यग्वृत्तक्षेत्रफलं तु वृत्ते केन्द्राभिमुखं व्यासार्धमानेन रेखाः परिधिमिता- स्तेन वृत्तान्तः सूचीमुखशकलानि त्रित्रिभुजाकाराणि परिधिमितानि । तत्र त्रि ० भुजे भुजौ व्यासार्धमितो लम्बोऽपि तन्मितस्तद्भूमेः परिधिपरिध्यंशमितत्वेन २४ समत्वाभावादत एव गणितेन लम्बासिद्धिः तत्र भूम्यर्धलम्बयोः स्वतः सिद्धत्वाल्लम्बगुणं भूम्यर्धं स्पष्टम् । त्रिभुजे फलमित्युक्त्या व्यासचतुर्थांशः फलं तत्परिधिगुणं वृत्तक्षेत्रफलश- कलानां परिधितुल्यत्वादिति वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलमित्युक्तं युक्तियुक्तमेव । यद्यपि शकले व्यासार्धानुरोधेनान्तरसमवृत्तैः कोष्ठकानां व्यासार्धमितत्वमिति संपूर्णकोष्ठकाः परिधिव्यासघातार्धंतुल्या दृश्यन्त इत्युक्तं फलमसंगतं तथाऽपि तेषां विषमत्वात्समकोष्ठमिति फलाख्यामित्युक्तत्वात्तत्र समकोष्ठगणनयार्धमुत्पद्यत इति दिक् । तथा च गोलवृत्तफलस्य सार्धद्वयगुणितवृत्तक्षेत्रफलान्न्यूनत्वनिश्चयात्परिधिगुणितक्षेत्रफलस्य पृष्ठफलत्वे प्रत्यक्षमेव बाधकमिति भावः ननु भवदुक्त्या परिध्यर्धगुणितवृत्तक्षेत्रफलस्य गोलार्धपृष्ठफलत्वं निरस्त [मिति] न संपूर्णफलस्य वृत्तक्षेत्रफलगुणितवृत्तपरिधित्त्वम् । इतरशकले सार्धद्वयोत्तरपरिधि- गुणितवृत्तक्षेत्रफलस्य तथात्वादित्यत आह—तावदिति । तद्गोलेऽपरदले वस्त्रान्ताच्छिन्न- गोलार्धातिरिक्तगोलार्धे यावत् । वस्त्रच्छिन्नगोलार्धे यावत् पृष्ठफलं तत्तुल्यम् । एवकारात- दधिकन्यूननिरासः । अन्यथा गोलार्धत्वव्याघातः । दूषणं स्फुटयति—एवमिति । एवमुक्त- रीत्या गोलस्य पृष्ठं फलं पञ्चगुणाद्वृत्तक्षेत्रफलात्स्थूलदृष्ट्याऽप्यधिकं न जायते । खल्वि- त्यनेन स्थूलदृष्ट्याऽपि पञ्चगुणितं भवति । सूक्ष्मदृष्ट्या तु तन्न्यूनमेव । वस्त्रावशेषात् । अत एव प (म) या पाट्यां तत्क्षणं वेदरुपरि परितः कन्दुकस्येव जालममित्युक्तमित्यर्थः । तेन प्रत्यक्षविरोधदूषणेन । तेन लल्लेन । वृत्ते वृत्तक्षेत्रफलं परिधिगुणितम् । कुतः कस्मा- त्कारणात्कृतं निष्कारणं कृतमित्यर्थः । तेन तद्गणितपाट्युक्तं वृत्तफलं परिधिघ्नं समं भवति ततो गोलपृष्ठफलमित्यसंगतं सिद्धम् । अन्यथा । गोलपृष्ठे परितः परिधिदर्शनात्प- रिधिवर्गस्य त्वदुक्तरीत्या पृष्ठफलत्वापत्तिः । नन्वेतावता तदुक्तं फलं कथं दूषितं तद्गणितपाट्या अप्रसिद्धत्वेन परिधिगुणनोद्भावनस्य तदाशयस्थितत्वाभावात्तेन च तत्फलस्यान्यर्थवोपपत्त्योक्तत्वात्तदज्ञानात् । नह्ययं स्थाणोरप- राधो यदेनमन्धो न पश्यतीत्यतोऽनुष्टुब्भाऽऽह—वृत्तेति । अन्यथा केनापि प्रकारान्तरेण तदुक्तफलानुपपत्त्या परिधिगुणितेन तदुपपत्तेस्तत्तात्पर्य- मुद्भावितं युक्तमेव । परे तु यस्मात्पूर्वोक्तदूषणाद्वृत्तक्षेत्रफलं परिधिघ्नं पृष्ठफलं भवतीत्ये- तत्तात्पर्यं युक्तिमदुपपत्तिसिद्धं नायुक्तमित्यर्थः । ननु तात्पर्याशुद्ध्या फलमयुक्तं कृत इति मन्दाशङ्कापाकरणाय दूषणोपसंहारमाह—दुष्टत्वादिति । अस्य लल्लाशयस्थितस्य गणितस्य पृष्ठफलानयनस्य दुष्टत्वादयुक्तत्वात् । भूपृष्ठजं भूगोलपृष्ठसम्बन्धि फलं लल्लोक्तं नगशिलीमुखेत्यादि भूगोलपृष्ठफलं दुष्टमसत् । तत्फलस्यासंगतप्रकारोत्पन्नत्वादिति भावः ॥५४॥५५॥५६॥५७॥ ७

९८ गोलाध्याये केदारदत्तः—आचार्य द्वारा यहाँ वृत्त फल, गोल पृष्ठ फल एवं गोलघन फल साधन का सही गणित बताया जा रहा है— किसी गोल पदार्थ की परिधि का आधा तुल्य व्यास मान कल्पना के तुल्य कोई वस्त्र (कपड़े का टुकड़ा) से उस गोल को ढक देने से वस्त्र से आधा गोल के ढांके जाने पर भी वस्त्र में वस्त्र का कुछ अंश शेष रह जाता है। इस प्रकार गोलव्यास के वृत्तक्षेत्रफल से वस्त्र का क्षेत्रफल २ १/२ = ५/२ के तुल्य होता है। इस प्रकार एक गोल का अर्द्धपृष्ठ फल को द्विगुणित कर देने से ५/२ × २ = ५ गुणित वस्त्र क्षेत्रफल = गोल पृष्ठफल सिद्ध होता है तो लल्लाचार्य ने “वृत्तफलं परिधिघ्नं समन्ततो भवति गोलपृष्ठफलम्” वृत्तफल को परिधि से गुणा करने से गोल का पृष्ठ फल हो जाता है, इत्यादि गणित कैसे कह दिया है ? लल्लाचार्य के गोलपृष्ठ फल साधन की त्रुटि प्रत्यक्ष उपलब्ध हो रही है। आचार्य युक्तिपूर्वक गोलपृष्ठ फल साधनप्रकार स्वयं बता रहे हैं कि—किसी भी वृत्त की ३६० अंशों में ३६० × ६० = २१६०० की कलात्मक परिधि होती हैं। शाकल्य संहिता में “वृत्तस्य षण्णवत्यंशो दण्डवत्परिदृश्यते” किसी भी वृत्त की परिधि का सूक्ष्म विभाग अर्थात् कम से कम ९६वाँ विभाग चापाकार न होकर सरल रेखाकार होता है। अतः २१६०० ÷ ९६ = २२५ कला चाप और कला चाप की ज्या में अभेद हो जाने से एक वृत्तपाद की २१६०० ÷ ४ = ५४०० कलाओं के ५४०० ÷ २२५ = २४ ज्याखण्ड होते हैं। अतः प्रत्येक चाप खण्ड का व्यास = २२५, अन्तिम वृत्त की व्यासार्ध रेखा = ३४३८ इस प्रकार (ज्यार्ध खण्ड × २१६००) / (त्रि = ३४३८) प्रथमादि २४ वृत्त होते हैं। प्रत्येक वृत्तों के मध्य में एक वलयाकार क्षेत्र होता है। इस प्रकार के २४ वलय एक-एक गोलपृष्ठ में होते हैं। २२५ कला से कम सूक्ष्म चाप और ज्या के अभेद कल्पना में २४ की जगह यथेष्ट ज्या कल्पनया अनेक कल्पित संख्या तुल्य वलय क्षेत्र होंगे। इस प्रकार के २४ चतुर्भुजों के आकार में प्रथमादि....चतुर्विंशति ज्यार्ध खण्ड = लम्ब, ऊर्ध्व वलय = मुख अधो वलय = आधार “लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम्” आचार्य के इसी प्रथम लीलावती गणित ग्रन्थ के सूत्र से ((मुख + आधार) / २) लम्ब = वलय क्षेत्रफल इस प्रकार के सभी वलयों के क्षेत्र फलों का योग गोलार्ध पृष्ठ फल होता है। अर्द्धगोल पृष्ठफल × २ = समग्र गोल पृष्ठ फल = व्यास × परिधि के तुल्य ही गोल पृष्ठ फल युक्ति और उपपत्ति से सिद्ध हो रहा है तो गोल पृष्ठ फल = व्यास + परिधि इस सही गणित की जगह वृत्तफल × परिधि = गोल पृष्ठफल कैसे माना जाय ?