सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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( १६ ) (८) आचार्य पद्मनाभ के बीजसूत्र का व्यभिचार प्रदर्शन, (९) अनेक वर्ण मध्यमाहरण के 'यत्स्यात्साम्पवधार्धतो धन पदम्' इत्यादि उदाहरण में राशि कल्पना की अपूर्व युक्ति Wait, in line 3: 'यत्स्यात्साम्पवधार्धतो धन पदम्' Let's check the letters: य त् स्य ा त् स ा म् प व ध ा र
( १७ ) ०, भाजक = ० लब्धि = ० तथा भाजक = १, भाज्य = ० तो लब्धि = ३ इसी प्रकार (०)² = ० तथा शून्य का मूल = शून्य । यदि अ क तो अ² = क² तथा अ² - क² = ० = (अ + क) (अ - क) चूंकि अ - क = ० अतः ०/० = अ² - क² / अ - क = अ + क अथवा अ² - क² / अ² - क² = १ यहाँ इस प्रकार से ऐसा मान भी अनन्त की तरह हो जाता है । इस प्रकार के मान से अनन्तत्व का भास होने लगता है । यदि - अ ± १ करते हैं तो योग = ० अर्थात् यह संख्या ० से भी कम है तथा अ² ÷ ० = लब्धि = अनन्त । यदि शून्य से कम
- अ से भाग देंगे तो लब्धि = अनन्त से भी अधिक होती है । अतः अ² / - अ = - अ, यह संख्या अनन्त से भी अधिक हो जाती है । "गुरूणां गुरु म० म० सुधाकर द्विवेदी ने इस सम्बन्ध में लिखा है— "अत्यल्पमानमुपलभ्य सकृत्प्रकृत्या मानं महाधिकमनन्तमितैर्यदेति । मूलञ्च नो मिलति यस्य रसातलेऽपि तस्मै नमोऽच्युतकलामहितेऽधनाय ॥" प्रकृतितः अत्यन्त अल्पमान प्राप्ति के साथ जिसका मान महान् से महान् अत्यधिक अनन्त तक हो जाता है और, जिस - ० का मूल लाने का कोई भी सिद्धान्त कहीं रसातल में भी नहीं है, ऐसे सदास्थायी, शाश्वत अधन (ऋण) शून्य या शेषस्थायी श्री विष्णु को नमस्कार है । इत्यादि तक कह दिया है । वर्ग और वर्गमूल प्रसिद्ध होते हुए भी अ ४ - ६ का वर्ग क्या है तो उत्तर = १६ अ² - ४८ अ + ३६ अ², १६ अ² - ४८ अ + ३६ अ² का मूल = ४ अ - ६ । जिन संख्याओं का पूर्णतया वर्गमूल नहीं मिलता है उन अवर्गाङ्कों का नाम करणी = क संकेत से जाना गया है अतः इस स्थल पर आधुनिक चिह्न करणी अवर्गाङ्क = √ है । अङ्कों का योग अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग ओर वर्गमूल ६ प्रकार की गणित क्रिया में २ और ८ अङ्कों के मूलों का योगान्तर क्या है तो उसकी ऐसी गणित क्रिया कही जा रही है जैसे— √२ + √८ को करणी को मूल चिह्न की जगह "क" रखने से क २ + क ८ का मान ज्ञात करना है इसके लिए भास्कराचार्य और पूर्ववर्ती ब्रह्म गुप्तो ने सिद्धान्त (आविष्कार) रचना की है कि, करणियों का साधारण अङ्कों की तरह योग का नाम = महती और करणी संख्या x करणी संख्या (योगान्तर ज्ञान के लिये द्वित्रि''''करणी'''से प्राप्त अङ्क) का मूल द्विगुणित = लघु मान कर साधारण अङ्क की तरह महती ± लघु = करणियों का योगान्तर हो जाता है । उक्त उदाहरण में (क.२ क.८) का योग = १० = महती दोनों के २
( १८ )
गुणनफल ८ × २ = १६ का मूल = ४ × २ = ८ = लघु । अतः महती ± लघु = योगान्तर = योग = क १८ । अन्तर = क. २ होता है । इसी प्रकार क ३ + क २७ से २७ + ३ = ३० महती, √२७ × ३ = ८१ का मूल × २ = ९ × २ = १८ = लघु अतः ३० ± १८ - क. ४८, क = १२ अथवा क ३ ± क ७ से लघु = १०, क ३ × क ७ = २१ का मूल नहीं मिलने से क ३ ± क ७ = क ३ ± क ७ यथावत् उत्तर होता है । "पृथक् स्थितिस्याद्यदिनास्तिमूलम्" कहा भी है । करणी अर्थात् अवर्गाङ्क अङ्कों का गुणन— गुण्य क २ + क ३ + क ८ को गुणक क ३ + ५ से गुणा करिये अवर्गाङ्क का सजातीय रूप ५ = क २५ समझ कर यदि सम्भव हो तो गुण्य गुणक में दी हुई कर- णियों का योग वियोग कर तब गुणा करने से गुणक के क २ + क ८ = क १८ अतः क १८ + क ३ से गुण्य क ३ + क २५ । यहाँ पर स्वतन्त्र रूप ५ = क २५ । क ३ + क २५ क ३ + क १८
क ९ + क ७५ + क ५४ + क ४५० । यहाँ पर क ९ अर्थात्— √९ = ३ होने से उत्तर = ३ + क ७५ + क ५४ + क ४५० गुणन की विलोम क्रिया से गुणक को = भाजक और गुणनफल को = भाज्य मानकर भाज्य में भाजक से भाग देने पर गुणांक ज्ञात हो जाता है । बीजगणित में कुट्टक गणित संक्षेप से कुट्टक गणित दिखाया जा रहा है । धान से चावल निकालने के लिये बार बार धान को कूटना पड़ता है इसी अभिप्राय से "कुट्टतीति कुट्टकः" इस गणित का नामकरण कुट्टक हुआ । प्रश्न है कि २२१ को किससे गुणा करें, और उस गुणनफल में ६५ जोड़ दें, और उसमें १९५ का भाग दें, तो वह संख्या निःशेष हो जाती है । प्रश्नानुसार भाज्यमान = २२१, हार या हर का मान = १९५ जोड़े जाने वाले अंक का मान क्षेपक = ६५ "भाज्यो हारः क्षेपकश्चापवर्त्यः केनाप्यादौ संभवे कुट्टकार्थम्" इत्यादि सूत्र से बड़े अंकों में यदि किसी १ अंक का अपवर्तन लग जाय तो गणित लाघव के लिए अपवर्तनाङ्क समझकर उससे अपवर्तन देना चाहिए । ध्यान रहे जिस अंक से भाज्य हार कट जाते हैं उस अंक से क्षेप में पूरा अपवर्तन लगना चाहिए, नहीं तो प्रश्न ही अशुद्ध समझा जाना चाहिए । अपवर्तनाङ्क की गवेषणा का उपाय बार बार २२१ ÷ १९५, गणित करने से अंतिम भाजक का अंक अपवर्तनाङ्क होता है ।
( १९ ) जैसे— १९५ ) २२१ ( १ १९५ ————— २६ ) १९५ ( ७ १८२ ————— १३ ) २६ ( २ २६ ————— × यहाँ पर भाज्य और हार का अपवर्तनांक १३ है। जो क्षेपक ६५ का भी अपवर्तन होता है। अतः लाघव से भाज्य = २२१/१३ = १७, हार = १९५/१३ = १५ और क्षेपक ६५ ÷ १३ = ५ । अतः भाज्य भाजक में परस्पर भाग देने से पूर्व की लब्धियों को अधोऽधः रखने से (तब तक भाग देते रहें जब तक शेष १ हो) एक बल्ली लता सी बनती है। जैसे, १७ ÷ १५ = ल० १ शेष २ से १५ में भाग देने से = ल० ७ शेष १ हो जाने से बल्ली भी यहीं समाप्त हो जाने से बल्ली के दो अंक होते हैं। बल्ली के नीचे क्षेपक = ५ और अंत में ० शून्य रखने से बल्ली का स्वरूप = १ / ७ / ५ / ० (अधोऽधः) होता है। अन्तिम अंक = ०, अन्तिम के समीप का ऊपरी अंक = ५ तदुपरि अंक = ७, ५ × ७ = ३५ + ० = ३५, तब बल्ली का स्वरूप = १ / ३५ / ५ पूर्ववत् ३५ × १ + ५ = ४० और ३५ बल्ली का लघु स्वरूप ४० / ३५ हो जाता है। इनमें दृढ़ भाज्य १७ दृढ़ हार १५ से शोधित करने पर ४० ÷ १७ = ६, ३५ ÷ १५ शेष ५ अन्तिम बल्ली का फल = ६ / ५ इन दोनों में गुणकांक = ५ और लब्धाङ्क = ६ उत्तर हो जाते हैं। आलाप से (२२१ × ५ + ६५) / १९५ = ल० ६ । इस उत्तर के अतिरिक्त १, २, ३ इष्ट कल्पनावश भा० १७ क्षे० ५, हा० १५, ६ लब्धि, ल० २३, ४०, ५७ गुणांक गु० २०, ३५, ५० इत्यादि। अनेक सही उत्तर होते हैं। जैसे, (२२१ × २० + ६५) / १९५ = २३ लब्धि इत्यादि, अनेक सही उत्तर हो जाते हैं। जैसे, (२२१ × ३५ + ६५) / १९५ = ४० लब्धि। इस कुट्टक गणित का ग्रह गणित में अत्यधिक उपयोग हुआ है। संक्षेप में सृष्ट्यादि से वर्त- मान शक वर्ष के किसी भी अभीष्ट दिन के अहर्गण ज्ञान से कल्प कुदिन में कल्प के ग्रह भगण तो इष्ट अहर्गण में ग्रह की राश्यादि क्या होगी ? जैसे, (क० ग्र० भ० × इ० अहर्गण) / (क० कु० दि०)
( २० ) भगण शेष में इष्ट ग्रह भगण + ──────── अतः भगण शेष को १२ से गुणा करने पर भ० शे० कल्प कुदिन भगण शेष × १२ गतराशि + भगण शेष ────────── = ───────────────── इसी प्रकार आगे विकलादि शेष ज्ञात कर क० कु० क० कु० गुणक और लब्धि के ज्ञान से विलोम क्रिया से विकलादि शेषादि समझकर कल्प कुदिन का ज्ञान सुलभ हो जाता है। इसलिए मात्र दिग्दर्शनार्थ संक्षेप से यहाँ पर इस गणित का उल्लेख किया गया है। वर्ग प्रकृति जिस गणित की प्रकृति ही वर्गात्मक होती है उसे वर्ग प्रकृति गणित कहा गया है । जैसे, उदाहरण—वह कौन सा वर्गांक है जिसको ८ से गुणाकर उसमें १ जोड़ दें तो वह अंक वर्गांक ही रहता है अर्थात् सदा उसका मूल मिल ही जाता है। आचार्य यहाँ पर गुणक ८ का नामकरण प्रकृति करते हुए जोड़े या घटाये जाने वाले पदार्थ का नाम क्षेपक देते हैं। जैसे, इस प्रश्न में प्रकृति = ८ क्षेपक = १ इसका हल निम्न- भाँति से है। इष्ट अंक कल्पनाकर उसको प्रकृति से गुणा करने पर गुणन फल में जितना जोड़ने से मूल मिलता है उसे क्षेप संज्ञा देकर इष्ट का नाम कनिष्ठ, प्रकृति × इष्ट वर्ग + क्षेप का नाम ज्येष्ठ और मूल प्राप्त्यर्थ युक्त अंक का नाम क्षेप कहा गया है। जैसे—यहाँ पर इष्ट का मान यदि १ तो १ का वर्ग = १ इसे प्रकृति से ८ से गुणा करने पर १ × ८ = ८ इसमें फिर हाल १ जोड़ने पर ९, और ९ का मूल = ३ यह ज्येष्ठ होता है। इसी प्रकार दूसरी पंक्ति में दोनों क्षेप, ज्येष्ठ और कनिष्ठ उत्पन्न होने से दोनों में परस्पर भावना एक दूसरे का घनिष्ठतम संबन्ध से इष्ट = १ = ज्येष्ठ = ३ क्षेप = १, कनिष्ठ = इष्ट - १ ज्येष्ठ = ३, क्षेप = १ । ऐसी स्थिति में वज्राभ्यास का तात्पर्य × गुणा अर्थात् कनिष्ठ × ज्येष्ठ + ज्येष्ठ × कनिष्ठ = कनिष्ठ, तथा (कनिष्ठ × कनिष्ठ) × प्रकृति + ज्येष्ठ × ज्येष्ठ = ज्येष्ठ मूल और दोनों क्षेपों का गुणनफल क्षेप × क्षेप = तृतीय क्षेप होता है । इस प्रकार कनिष्ठ ज्येष्ठ और क्षेप अनेक नवीन उत्पन्न होते हैं। यथा क ×
( २१ ) और १ × १ = १ = क्षेप की उपलब्धि होती है। पुनः नूतन उत्पन्न क० = ३५ ज्ये० = ९९, क्षे० = १ आलाप मिलाने से ३५ का वर्ग = १२२५, इसे ८ से गुणा करने पर १२२५ होता है। इसको प्रकृति = ८ से गुणा करने पर १२२५ × ८ = ९८०० होता है। इसमें क्षेप = १ जोड़ने से ९८०१ होता है, ९८०१ का मूल निकालने से ९९ ┌────── │ ९८०१ │ ८१ ─────── १८९ │ १७०१ मूल = ९९ │ १७०१ ज्येष्ठमान स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार एक ही नहीं अनेक अनन्त अंक पदों से प्रश्न का समीचीन उत्तर होता है। यह है आचार्य की सूक्ष्म बुद्धि का महान् अंकगणित कौशल का आविष्कार। वर्ग प्रकृति और कुट्टक से सम्बन्धित चक्रवाल गणित चक्र की तरह परिभ्रमणशील होने से इस गणित का कुट्टक और वर्ग प्रकृति संबंधेन कुट्टक से गुण लब्धि की प्राप्ति के अनन्तर पुनः
से प्राप्त शेषित करने पर लब्धि = ३ । गुणांक = १ का वर्ग = १ को प्रकृति ६७ में कम करने से गुण - १, करने से ६७ - १ = ६६ यहाँ अल्प शेष होना चाहिए अधिक शेष होने से क्रिया गौरव होता है । अतः इष्ट = २ की कल्पना से लब्धि ः - ५ + - २ = ७ (७)² = ४९ प्रकृति ६७ में कम करने से ६७ - ४९ = १८, क्षेप = ३ से भाग देने पर लब्धि - ६ = क्षेपक होता है । गुण का वर्ग प्रकृति में घट गया है इसलिए प्र० - गु०² = शेष धनात्मक का मान यहाँ पर धनात्मक - ६ = + ६ और लब्धि - ५ = कनिष्ठ हो जाता है । - ५ का घनत्व और ऋणत्व से कोई विकार नहीं है अतः गुण लब्धि = - ५, गुणक ७ का वर्ग = ४९ को प्रकृति ६७ लब्धि में घटाने से शेष = १८ होता है । शेष में - ३ से भाग देने से + ६, - ५ का वर्ग = २५ से गुणित करने पर १६७५, में क्षेप ६ जोड़ने से १६८१ का मूल = ४१ = ज्येष्ठमूल होता है । अतः पुनः कुट्टक के लिए भाज्य = ५, हार = ६, क्षेप = ४१ बल्ली = १ लब्धि = ११ ° १ गुणक = ५ गुणक का वर्ग (५)² = २५, प्रकृति = ६७ में कम करने से शेष = ४२ में क्षेप से भाग देने पर लब्धफल = ७ प्रकृति में घटने पर व्यस्त चिह्न, धन हो तो ऋण और ऋण हो तो धन हो जाने से फल, ७ ऋण हुआ, अतः कनिष्ठ = ११ ज्येष्ठ = ९०, क्षेप = ७ फिर से कुट्टक करने से— भा० = ११, हा० = - ७, क्षेप = ९० उक्त रीति से गुण = ५ बल्ली विषम है । अतः गुण = ७ - ५ = गुण = २, क्षेप = - ७, को - १ से गुणा करने पर - ७ × - १ = + ७, × + क्षेप = ७ + २ = ९ (९)² = ८१, प्रकृति ही ६७ पर घट रही है, अतः ८१ - ६७, १४ में क्षेप से भाग देने पर = १४ / - ७ = - २, लब्धि, और २७ = कनिष्ठ पुनः कुट्टक से— क = २७, ज्ये० २२१, क्षेप = - २ क = २७, ज्ये० २२१, क्षेप - २ क २७ × २२१ + २२१ × २७ = ११९३४ । क्षेप = + ४ । ज्ये०, प्र० (२७ × २७) ६७ + २२१ × २२१ = ९७६८४ और क्षेप = - २ × - २ = ४ स्पष्टता से कनिष्ठ = ११९३४ ज्येष्ठ = ९७६८४ और क्षेप = ४ । इष्ट कल्पना = २ का वर्ग ४ = से क्षेप में भाग देने से ४ ÷ ४ = १ तथा कनिष्ठ / २ = कनिष्ठ ५९६७, तथा ज्येष्ठ / २ = ज्येष्ठ = ४८८४२ और क्षेप ४ ÷ ४ = १ इस प्रकार ५९६७ के वर्ग को ६७ से गुणा कर १ जोड़ने से उस वर्गाङ्क संख्या का मूल ४८८४२ होगा । और भी अनेक उत्तर होते हैं । विशेष सूत्र—“रूप शुद्धौ खिलोद्दिष्टं वर्गयोगो गुणो न चेत्” ऋण १ क्षेप में गुणक संख्या किन्हीं दो वर्गों के = योग तुल्य होनी चाहिए, यदि प्रकृति दो वर्गों का योग नहीं है तो ऐसा प्रश्न अशुद्ध समझना चाहिए । उदाहरण से—
( २३ ) वह कौन सा वर्ग है जिसे १३ से गुणा कर १ जोड़ देने से प्राप्त अंक का मूल मिल जाता है । प्रकृति १३ है । जो (२)² + (३)² = ४ + ९ दो वर्गाङ्कों को योग तुल्य है अतः प्रश्न सही है । दोनों वर्गाङ्कों ४, ९ के मूलों २, ३ से १ में भाग देने पर ऋण १ में कनिष्ठ पद = १/२, अतः १/२ का वर्ग = १/४ को प्रकृति १३ से गुणा करने पर १/४ × १३ = १३/४ इसमें ऋण १ क्षेप कम करने से १३/४ - १ = ९/४ का मूल ३/२ यह ज्येष्ठ का मान है । इष्ट ३ से १ में भाग देने से १/३ कनिष्ठ, १/३ का वर्ग = १/९ को १३ से गुणा करने पर १३/९ में ऋण १ कम करने से ४/९ का मूल = २/३ यह ज्येष्ठ का मान भी होता है । अथवा कनिष्ठ १ के वर्ग को १३ से गुणा कर ४ कम कर मूल लेने से क० = १, ज्ये० ३, क्षे० ४, यहाँ पर इष्ट = यदि २ का वर्ग = ४ अतः क ३/२ ज्ये० ३/२, क्षे० = - १ । यदि प्रकृति १३ में - ९ = ४ का मूल २ से १ में भाग देने से क० १/२, ज्ये० ३/२, क्षे० - १ कुट्टक रीति से भाज्य = १ हा० = - १, क्षे० = ३/२ तीनों में ३/२ का अपवर्तन देने से भा० = १, हा० - २, क्षे०, ३ अतः कुट्टक से ल० = १, गु० = २, यहाँ पर १ इष्ट मानकर गुण ३ गुणवर्ग (३) अतः १३ - ९ = क्षेप = ४ = कनिष्ठ वर्ग (३)² को प्रकृति १३ से गुणा कर ४ जोड़ने से = १२१ का मूल ११ = ज्ये० । क० ३ ज्ये० ११ क्षे० = ४ भा० = ३ क्षे० ११ और हा० = ४ पूर्ववत् क० = ५ ज्ये० = १८ क्षे० = १ इस प्रकार अनेक अनन्त उत्तर होते हैं । इस प्रकार उक्त कुट्टक, वर्ग प्रकृति और चक्रवाल गणित का यत्र-तत्र सर्वत्र ग्रह गणित में अति आवश्यक उपयोग होता है जिसको संक्षेप से आवश्यक समझ कर यहाँ पर प्रदर्शित किया गया है । इस बीजगणित के उत्तरार्द्ध में भी कुट्टक गणित का उपयोग यथा स्थान आगे भी आ रहा है जो दिखाया जायगा । श्री भास्कराचार्य एवं तत्पूर्ववर्ती आचार्यों ने अव्यक्त पदार्थों की अव्यक्त कल्पना के लिए यावत् = या. तावत् - ता. कालक = का. नीलक = नी. पीतक = पी. लोहितक = लो. श्वेतक = श्वे. हरितक - ह. अभ्रक = अ. इत्यादि संकेत दिये हैं । आधुनिक गणित सागर के गाताखार अव्यक्त मात्र कल्पना के लिए, A, B, C, D, E, F इत्यादि या अ, ब, क, ल, ह, च... इत्यादि वर्णों के मान से अव्यक्त अर्थात् अज्ञात पदार्थों की कल्पना करते हैं ।
( २४ ) सौकर्य के लिए वस्तुतः लिपियों के परिणाम दोनों या अनेकों अव्यक्त कल्पनाओं में बात एक है भी तो प्राचीन आचार्यों की अव्यक्त कल्पना सविशेष महत्त्व की इसलिये है कि प्राचीनों से सप्त सारथिः, सात बार, सात प्रकार के रंग लाल, पीला, हरा, श्वेतादि सम्बन्धित कालक, पीतक, श्वेतक, इत्यादि रंग बोधक कल्पना की गई है । भास्करीय बीजगणित के एक वर्ण समीकरण से प्रश्न का हल एक प्रश्न है कि—एक पुरुष का धन ३०० रु० और ६ घोड़े की पूंजी है तथा दूसरे पुरुष के पास १० घोड़ों के साथ १०० रु० कर्ज (ऋण) देना है दोनों अर्थ विनिमय से तुल्य हैं तो अश्व (घोड़ों) का मूल्य क्या होगा ? घोड़ों का मूल्य अज्ञात होने से अव्यक्त कल्पना करते हैं अश्व (घोड़े) का मूल्य, जैसे, घोड़े का मूल्य = य रुपया है अतः प्रश्न के अनुसार— प्रथम का धन = ६ य + ३०० रु० ⎫ दोनों तुल्य धनी हैं अतः धनात्मक दूसरे का धन - १० य - १०० रु० ⎬ ६ य को धनात्मक १० य में शोधन ६ य - ३०० = १०० य - १०० ⎭ करने से ६ य का मान ऋणात्मक हो जाने से १० य - ६ य, ४ य = ३०० + १०० = ४०० इस प्रकार ४ य = ४०० अतः य = ४००/४ = १०० = अश्व का मूल्य होता है । अतः य का अव्यक्त मान १०० रु० होने से प्रथम पुरुष का धन = ९०० के तुल्य द्वितीय का भी धन ९०० दोनों तुल्य धन हो जाते हैं । और भी प्रश्न है—समतल समान भूमि में ३२ हाथ का एक बाँस खड़ा है वायु वेग से यह एक जगह से टूट कर मूल से अग्रभूमि १६ हाथ की दूरी पर लग गया तो बताओ बाँस अपने मूल से आगे कितने हाथ की दूरी पर टूटा था ।
[चित्र विवरण]
- शीर्ष बिन्दु: ब
- सम्पूर्ण ऊँचाई: ३२ हाथ
- टूटने का स्थान: त्रुटित=त्रु
- टूटा हुआ भाग (कर्ण): २०
- शेष सीधा भाग (लम्ब): य १२
- बाँस का आधार (पाद बिन्दु): मू
- आधार से अग्रभाग की दूरी (भूमि): १६ हाथ
- अग्र बिन्दु: अग्र=अ
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण (transcription) दिया गया है:
( २५ ) कल्पना किया मू बं = ३२ हाथ । त्रु = मू अ त्रिभुज में मू त्रु = य अतः त्रु अ = ३२ - य । अतः भु² + को² = कर्ण² से, भुज² = (१६)² = २५६ होता है । तथा (३२ - य)² = १०२४ - ६४ य + य² + (१६)² नियमतः य² + २५६ = १०२४ - ६४ य + य² अतः ६४ य = ७६८ ∴ य = १२ मू त्रु उत्थापन से ३२ हाथ का बांस मूल से १२ हाथ की दूरी पर टूट कर ३२ - १२ = २० हाथ के तुल्य कर्ण का मान होता है । बीजगणित में वर्गात्मक अव्यक्त राशियों का गणित किसी भ्रमर झुण्ड के आधे का मूल मालती पुष्प में, समग्र भ्रमर झुण्ड का ८/९ अलिनी पुष्प में, शेष एक भ्रमर अपनी भ्रमरी की खोज में रात्रि में कमल पुष्प के निरुद्ध होने पर बारम्बार से रातभर अपनी नायिका का द्वार खटखटाता रहा, और
( २६ ) जैसे प्रथम पक्ष में २ य² है अतः २ × ४ = ८ से दोनों पक्षों को गुणा करने से तथा व्यक्त ( ९ )² = ८१ दोनों पक्षों में जोड़ने से १६ य² + ७२ य = १४४, १६य² - ७२ य + ८१ = ∴ १४४ + ८१ = २२५ अतः १६ य² + ७२ य - ८१ = २२५ मूल = ४ य - ९ = १५ आलाप से ४ य = २४ ७२ ÷ २ = √ ३६ = ६ = मालती पुष्प में ∵ य = ६ ७२ × ८/९ = ६४ = अलिनी " " ∴ य² = ३६ दृश्य = २ = प्रत्यक्ष दृष्टि में ────────────────────────────────── अतः २ य² = ७२ योग = ७२ = भ्रमर कुल होता है । “शून्ये गुणके जाते खं हारश्चेत्पुनस्तदा राशिः । अविकृत एव विचिन्त्यः सर्वत्रैवं विपश्चिद्भिः ॥” यदि किसी समीकरण में गुणक ० और भाजक भी ० है तो
? No, ६ × ० + ९. Denominator: ०. Wait, but look at the second fraction: Numerator: ६ × ०̸ Denominator:०̸ Wait, why does it say:६ × ०̸ / ०̸ + ९ = ९ + ६ = १५? Because ६ × ० + ९divided by०is separated into(६ × ०)/० + ९! Wait, in Bhaskara's Bijaganita: (६ × ० + ९) / ०is not valid, rather(६ × ०)/० + ९ = १५! Wait, look at the image: ६ × ० + ९ ६ × ० अतः ───────── ────── + ९ = ९ + ६ = १५ ठीक हो जाता है । आलाप ० ० Wait, between them there is NO=. It's just a space, or is it an =? Wait, look at the space: there is a smudge, but it looks like =. Wait, no, look at the alignment: अतः ६ × ० + ९ ६ × ० Wait, no,६ × ० + ९is the numerator! Wait, is there a fraction line under६ × ० + ९
( २८ ) कोण से भूमि आधार पर लम्ब गिराने से अ ब क त्रिभुज में अ क = कर्ण = भूमि, ब क और अ ब = भुज तथा कोटि । अतः लीलावती से २० + १५ = ३५ योग तथा अन्तर = ५ — ३५ × ५ / २५ = ७, २५ ± ७ / २ = ३२ / २, १८ / २ = १६ बड़ी आबाधा और २५ - ७ / २ = १८ / २ = ९ = लघु आबाधा । √भु² - आबाधा² = लम्ब = (१५)² - (९)² = २२५ - ८१ = १४४ का मूल = १२ = लम्ब अथवा (२०)² - (१६)² = १४४ का मूल = १२ यह भी पूर्ण तया लम्बमान होता है । भूमि × लम्ब / २ = १२ × ९ / २ + १२ × १६ / २ = ५४ + ९६ = १५० = दोनों प्रकार से एक रूप का उत्तर में क्षेत्रफल आता है । प्रकारान्तर से भी चतुर्भुज के रूप में क्षेत्र रचना निम्न भांति होती है । [चित्र: २०, १५, १५, १५, ५, ५, ५, ५, २०, २०, १५] कल्पना किया कर्णमान = य कोटि = २० भुज = १५ अन्तर = ५ अन्तर वर्ग = (५)² = २५
१. गोल-प्रशंसा एवं भुवन-कोश: पृथ्वी की गोल आकृति, गुरुत्वाकर्षण एवं आधार-विचार
( २९ ) २५ २५ (भु × को) × २ = ४ त्रिभुजों का फल १५ × २० × २ = ६०० इसमें अन्तर वर्ग = (५)² = २५ जोड़ देने से ६२५ = या² अतः २५ = या ऐसी स्थिति में एक सिद्धान्त जिसे सूत्र कहते हैं उपपन्न होता है कि भुज कोटि के अन्तर वर्ग को भुज कोटि के द्विगुणित गुणनफल में जोड़ देने से वह दोनों भुज कोटि का वर्ग हो जाता है। अर्थात् (भु ~ को)² + (भु × को) × २ = भु² + को² = कर्ण² उपपन्न होता है। प्रश्न है कि भुज में ३ कम करने से प्राप्त मूल में १ कम करने से कोटि मान हो जाता है तो एक ही द्वादश भुज में अनेकों कर्णों का मान क्या होगा ? आलाप से — √भु - ३ - १ = कर्ण, कोटि, इष्ट = २ ∴ √भु - ३ = २ + १ = ३, ∴ भु - ३ = ९, भु = ९ + ३ = १२,
- कोटि = १६, कर्ण = २० अतः कर्ण² - कोटि² = १४४ = (कर्ण + को) (कर्ण - कोटि) किन्हीं दो राशियों के योग और अन्तर के गुणनफल के तुल्य होता है । जैसे (२० + १६) (२० - १६) = ३६ × ४ = १४४ = (२०)² - (१६)² = १४४ का मूल = १२ = भुज इत्यादि ।
( ३० ) क्षेत्र दर्शन से और भी स्पष्ट होगा । जैसे— अ ब क ल चतुर्भुज में ७ × ७ = ४९ कोष्ठक हैं । इसमें ५ × ५ = २५ अ च त प को निकाल देने से ४९ - २५ = २४ अर्थात् २४ कोष्ठक निम्न क्षेत्र की तरह १२ × २ = २४ क्षेत्रफलात्मक बन जाते हैं । तात्पर्य से जो (७ - ५) × (७ + ५) = २ × १२ = २४ = (७)² - (५)² = ४९ - २५ = २४ के तुल्य अर्थात् दो राशियों के योगान्तर का गुणनफल उन्हीं दोनों राशियों के वर्गान्तरों के तुल्य क्षेत्र से भी सुस्पष्ट है । और भी सूत्र हैं कि— चतुर्गुणस्य घातस्य युतिवर्गस्य चान्तरम् । राश्यन्तर कृतेस्तुल्यं द्वयोरव्यक्तयोर्यथा ॥ किन्हीं दो राशियों के अन्तर का वर्ग, उन दोनों राशियों के चतुर्गुणित गुणनफल और उन दोनों राशियों के योग के वर्ग के अन्तर तुल्य होता है । क्षेत्र को देखें— जैसे दो राशियाँ = ५ और ३ (५ × ३) × ४ = ६०
( ३१ ) (५ × ३)² = ६४ ६४ - ६० = ४ = (५ - ३) = २ का वर्ग = ४ होता है । एक उदाहरण है कि, भु + को + क = ४० तथा भु ० × को ० = १२० उक्त नियमों से ( भु × को ) × २ = १२० × २ = २४० = ( भु + को )² + कर्ण = योग और अन्तर के गुणनफल के तुल्य । अतः २४०/४० = ६ = अन्तर संक्रमण गणित से ४० ± ६ = ४६, ३४ के आधे = २३ = भु + को, और १७ = कर्ण । अतः (भु + को)² = ५२९ में भु × को × ४ = १२० × ४ = ४८० को घटाने से ५२९ - ४८० = ४९ का मूल = ७ = भु० को० का अन्तर । अतः संक्रमण से २३ ± ७ ३० और १६ दोनों आधे के १५ तुल्य कोटि और ८ के तुल्य भुज हो जाता है । और भी एक प्रश्न है कि, यदि भु + को + कर्ण = ५६ तथा भु × को × क = ४२०० है तो भु, को और कर्ण के मान क्या हैं ? यहाँ पर कर्ण का मान अव्यक्त "य" मानकर गणित करने से कर्ण का वर्ग = य² = भु² + को² = वर्ग योग । भु + को + क = ५६, अतः ५६ - य² = भु + को = ५६ - य, (भु × को × क) / क = भु × को । ४२०० / य पूर्व सूत्र से वर्ग योग = य² । और युति वर्ग = यु० व० - य² - ११२ य + ३१३६ चूंकि वर्ग योग = य² और दो राशियों भु + को = योग का वर्ग = युति² = (५६ - य) ३१३६ - ११२ य + य² । दो राशियों का द्विगुणित घात (४२०० × २) / य = ८४०० / य के तुल्य है । अतः, ३१३६ - ११२ य - य² = ८४०० / य । दोनों पक्षों से ११२ से भाग देने से भी दोनों पक्ष बराबर हैं । अतः २८ - य² = - ७५ दोनों
( ३२ ) पक्षों को - १ से गुणा करने पर य² - २८ = - ७५ दोनों में १४ का वर्ग जोड़ देने से य² - २८ + १९६ = १९६ - ७५ = य² - २८ य + १९६ = १२१ मूल लेने से, य - १४ = ११ अतः य = २५ = कर्ण का मान है । ∴ भु × को = ४२००/२५ = १६८ । चूंकि भु + को + क = ५६, कर्ण = २५ अतः भु + को = ५६ - २५ = ३१ होता है । पूर्व सूत्र से ४ × दो राशियों का गुणन दोनों राशियों का द्विगुणित गुणनफल के तुल्य होता है । भु × को × क = ४२०० । क = २५ अतः ४२००/२५ = १६८ = भु × को तथा (४ × १६८) = ६७२ = (भु × को) × ४ । ५६ - २५ = ३१ = भु + को अतः (३१)² = ९६१ = (भु + को)² अतः ९६१ - ६७२ = २८९ का मूल = १७ = भु और कोटि का अन्तर है । भु + को = ३१ है, संक्रमण गणित से ३१ + १७ = ४८ का आधा = २४ [L
( ३३ ) बीजगणित में अनेक वर्णों की कल्पना— अभी तक अव्यक्त में एक वर्ण से जैसे य, अथवा अ···इत्यादि तथा तदुपरि एक ही वर्ण सम्बन्धेन एक वर्ण वर्ग से बीजगणित क्रिया प्रदर्शित की गई है, इसके आगे अव्यक्तों में अनेक वर्णों अ, क, य, ल इत्यादि के वर्गादि समीकरणों से सम्बन्धित बीजगणितीय क्रिया का प्रदर्शन पाठकों के बुद्धि विवर्द्धन के लिए आवश्यक समझ कर संक्षेप से अनेक वर्ण वर्ग समीकरणीय ( बीजगणितीय ) गणित प्रक्रिया प्रदर्शित की जा रही है। उदाहरण में यदि २, ३, ४ इत्यादि राशियाँ होती हैं तो उनके मानों में य, अ इत्यादि से अनेक अव्यक्तों का मान कल्पना कर दोनों पक्षों का शोधन, समशोधन, गुणन, भजन और योगान्तरादि करते हुए पूर्वकथित विधि के अनुसार दोनों समान पक्ष स्थापित करना चाहिए। इसके आगे दानों पक्षों के समान अव्यक्तों का संशोधनादि से निम्न भाँति गणित क्रिया की जानी चाहिए। उदाहरण है— चार व्यापार प्रवृत्ति के बन्धु हैं जिनकी सम्पत्ति निम्न भाँति है— प्रथम की पशुधन संख्या अश्व = ५ ऊँट = २ खेचर = ८ बैल = ७ द्वितीय ··· ··· = ३ ७ २ १ तृतीय ··· ··· = ६ ४ १ २ चतुर्थ की ··· ··· = ८ १ ३ १ प्रत्येक के उक्त पशुधन के विक्रय से जो द्रव्य आता है वही उतना ही धन सभी के पास है, तो अश्व, ऊँट, खेचर और बैल आदि का मूल्य क्या होगा ? यही समझना है। यहाँ पर अश्वादिकों का मूल्य कल्पित किया जाता है यथा अश्व का मूल्य = य, ऊँट का मूल्य = क अश्वतर-खेचर का मूल्य = न और बैल का मूल्य = प कल्पना कर गणित प्रस्तार किया जाता है । इस प्रकार अव्यक्त कल्पना के अनन्तर— प्रथम धन = ५ य + २ क + ८ न + ७ प द्वितीय धन = ३ य + ७ क + २ न + १ प तृतीय धन = ६ य + ४ क + १ न + २ प चतुर्थ धन = ८ य + १ क + ३ न + १ प उक्त चारों समान धनी हैं, अतः ५ य + २ क + ८ न + ७ प = ३ य + ७ क + २ न + १ प अतः २ य = ५ क - ६ न - ६ प ३
( ३४ ) ५ क - ६ न - ६ प ∴ य = —————————— = ( १ ) २ ३ क + १ न - १ प दूसरे तीसरे से य = —————————— = ( २ ) ३ ३ क - २ न + १ प तृतीय चतुर्थ से य = —————————— = ( ३ ) २ इस प्रकार य के तीन मान होकर इस समीकरण माध्यम से अब क का मान निकालना चाहिए। ५ क - ६ न - ६ प ३ क + १ न - १ प प्रथम द्वितीय से, —————————— = —————————— २ ३ अर्थात् १५ क - १८ न - १८ प = ६ क + २ न - २ प अतः ९ क = २० न - १६ प ८ न - ५ प २० न + १६ प अतः क = —————— = ———————— ३ ९ ∴ ७२ न - ४५ प = ६० न + ४८ प ९३ प ३१ प अतः १२ न = ९३ प ∴ न = ——— = ——— १२ ४ २५५ अतः ७६ × ३ = २२८ + ३१ - ४ = २५९ - ४ = ——— = ८५ = य ३ २० + १६ प ८ न - ५ य ∴ —————— = —————— ९ ३ = ६० न - ४८ प = ७२ न - ४५ प ९३ प ३१ प ∴ १२ न = ९३ प ∴ न = ——— = ——— १२ ४ पूर्व कथित कुट्टक गणित से गुणक मान यदि इष्ट ल मानने से न = लब्धि = ३१ ल प = गुणक = ४ = उत्थापन देने से क - ७६ ल (८ × ३१) = २४८ ल २० ल ———— २२८ ———— = ७६ ल ३
( ३५ ) इस प्रकार यदि ल = १···२···३··· अनन्त । यदि इष्ट = १ तो य = ८५, क = ७६, न = ३१ और प = ४ । यदि इष्ट = २ तो य = १७० क = १५२, न = ६२, प = ८ इष्ट = ३ तो य = २५५, क = २२८, न = ९३, प = १२ इत्यादि अनेक विध मान होते हैं। आलाप मिलाने से— प्रथम का धन अश्व मूल्य = ४२५, ऊँट मूल्य = १५२, खच्चर मूल्य = २४८, बैल मूल्य = २८, सबका योग ८५३ । द्वितीय का धन = २५५ + ५३२ + ६२ + ४ = ८५३ । तृतीय का धन = ५१० + ३०४ + ३१ + ८ = ८५३ । चतुर्थ का धन = ६८० + ७६ + ९३ + ४ = ८५३ । इस प्रकार के पशु धन का मूल्य से सम्बन्ध करने पर सभी समान धनी सिद्ध हो जाते हैं। और भी एक विनोद प्रदर्शन का अर्थात् अंकगणित के साथ बोजगणित से गहन कल्पना सागर के गोताखोर से उपलब्ध रत्नाकर के रत्नात्मक बीज बुद्धि का प्रश्न है कि (मूल ग्रन्थ में द्रम्म द्रव्य की जगह हम यहाँ रुपये का उपयोग कर रहे हैं ।)— ३ रु० में ५ पारावत पक्षी और ५ रु० में ७ सारस और २ रु० में ९ हंस और ९ रु० में ३ मयूर (मोर) आदि पक्षीगण मिलते हैं, तो हे चतुरराजभक्त १०० रु० में ही १०० पूर्ण संख्या के, पारावत + सारस + हंस और + मोर राजा के विनोद के लिए ले आइये । यहाँ पर आचार्य का कल्पना वैचित्र्य है कि पक्षियों की संख्या के तुल्य, य, क, प, न इत्यादि मान मानकर पुनः पक्षी संख्या तुल्य मूल्यों १०० के साथ साम्य कर तथा १०० के साथ उभयतः य - क - प - न मान निकाले हैं। मूल्य सम्बन्ध जैसे ३ प + ५ क + ७ न + ९ य = १०० अतः य = (१०० - ५ क - ७ न - ९ प) / ३ एवं पशु सम्बन्ध से य = (१०० - ७ क - ९ न + ३ प) / ५ इन दोनों से दोनों पक्षों की समानता है । अतः दोनों पक्षों से, ५०० - २५ क - ३५ न - ४५ प = ३०० - २१ क
- २७ न - ९ प । ∴ ४ क = २०० - ८ न - ३६ प, ∴ क = (२०० - ८ न - ३६ प) / ४ = ५० - २ न - ९ प