सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| १२६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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शरीरात्' (उ० मी० अ० ४ पा० २ सू० १२) इत्यधिकरणे बद्धमुक्तत्व-प्रतिपादकभाष्यस्य च नाऽऽञ्जस्यमित्यपरितुष्यन्तोऽन्तःकरणादीनां जीवोपाधित्वाभ्युपगमेनाऽनेकजीववादमाश्रित्य बद्धमुक्तव्यवस्थां प्रतिपद्यन्ते ।
प्रतिजीवमविद्यांशा भिन्ना ब्रह्मावृत्तिक्षमाः ।
तन्नाशक्रमतो मुक्तिव्यवस्था कैश्चिदीर्यते ॥ ४६ ॥
कोई लोग कहते हैं कि प्रत्येक जीवमें अविद्याके अंश भिन्न-भिन्न हैं और वे ब्रह्मका आवरण करनेमें समर्थ हैं और उनके नाशक्रमसे मुक्तिकी व्यवस्था है ॥४६॥
तेषु केचिदेवमाहुः—यद्यपि शुद्धब्रह्माश्रयविषयमेकमेवाऽज्ञानम्, तन्नाश एव च मोक्षः, तथापि जीवन्मुक्तावज्ञानलेशानुवृत्त्यभ्युपगमेनाऽज्ञानस्य सांशत्वात् तदेव क्वचिदुपाधौ ब्रह्मावगमोत्पत्तौ अंशेन निवर्तते, उपाध्यन्तरेषु यथापूर्वमंशान्तरैरनुवर्तते इति ।
इस अधिकरणमें बद्धत्व और मुक्तत्वका प्रतिपादन करनेवाले भाष्यके साथ सामञ्जस्य नहीं है अर्थात् उक्त श्रुति और भाष्यकी अनुपपत्ति है ।
उन अनेकजीववादियोंमें से कुछ लोग यह कहते हैं कि यद्यपि शुद्ध ब्रह्मका आश्रय और उसको विषय करनेवाला अज्ञान एक ही है, और उसके नाश होनेसे ही मोक्ष होता हैं † तथापि जीवन्मुक्तिमें अज्ञानके विक्षेपांशकी अनुवृत्तिका स्वीकार होनेसे अज्ञान सांश है, इससे जिस उपाधिमें (जीवरूप अधिकरणमें) ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति होगी, उसी स्थलमें अंशतः अज्ञानकी निवृत्ति होगी और अन्य स्थलमें पूर्ववत् अन्य अंशोंसे अज्ञानकी अनुवृत्ति होगी ।
उन श्रुतियों और स्मृतियोंका एकजीववादमें भी तात्पर्य नहीं है, ऐसा कह सकते हैं। यह भी नहीं कह सकते हैं कि अविद्याके एक होनेसे तदवच्छिन्न जीव एक है, क्योंकि कथित श्रुति और स्मृतिके आधारपर अविद्याका अनेकविधत्व भी सम्भव है और एकत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य जातिके अभिप्रायसे भी लगा सकते हैं अर्थात् अविद्यात्व जातिके एक होनेसे अविद्या एक है, ऐसा कहा गया है । कदाचित् अविद्याको एक माना जाय, तो भी 'कार्योपाधिरयं जीवः' इत्यादि उदाहृत पूर्वकी श्रुतिके बलसे नाना अन्तःकरण ही जीवकी उपाधियाँ हैं, ऐसा भी स्वीकार कर सकते हैं, अतः अनेकजीववादमें विरोध नहीं है, यह भाव है ।
† विशिष्ट जीव और ईश्वर अज्ञानके आश्रय नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे स्वयं ही अज्ञानसे कल्पित हैं, अतः शुद्ध ब्रह्म ही उसका आश्रय है, इसी प्रकार अज्ञानविषयत्व अर्थात् अज्ञानावृतत्वरूपविषयत्व भी शुद्धमें है ईश्वरमें नहीं है, क्योंकि जैसे औपाधिक भेदसे
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२७
आत्मन्यविद्यासंसर्गो हृदयग्रन्थिसंश्रयः ।
तद्भेदात्तदसंसर्गः क्रमान्मुक्तिक्रमः परैः ॥ ४७ ॥
आत्मामें जो अविद्याका सम्बन्ध है, वह हृदयग्रन्थिप्रयुक्त—अन्तःकरणप्रयुक्त है, अतः अन्तःकरणके विनाशसे आत्मा और अविद्याका जो क्रमसे असम्बन्ध है वही मुक्तिक्रम है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥४७॥
अन्ये तु यथा न्यायैकदेशिमते भूतले घटात्यन्ताभावस्य वृत्तौ घटसंयोगाभावो नियामक इति अनेकेषु प्रदेशेषु तद्वत्सु संसृज्य वर्तमानो घटात्यन्ताभावः क्वचित्प्रदेशे घटसंयोगोत्पत्त्या तदभावनिवृत्तौ न संसृज्यते ।
* कुछ लोग यह कहते हैं कि जैसे भूतलमें घटात्यन्ताभावकी वृत्तिमें घटके संयोगका अभाव नियामक ( प्रयोजक ) है, इसलिए अनेक घटसंयोगाभाववाले प्रदेशोंमें सम्बन्ध करके स्थित घटका अत्यन्ताभाव—किसी प्रदेशमें घटके संयोगकी उत्पत्तिसे घटसंयोगाभावकी निवृत्ति होनेसे ( उस
अन्य जीवकी उपलब्धि नहीं होती है, वैसे ही ईश्वरकी भी अनुपलब्धि हो सकती है। अतः उसको ( ईश्वरको ) आवृत मानना अनुचित है।
अज्ञान एक ही है उसमें प्रमाण है—अज्ञानवाचक शब्दोंका श्रुतिस्मृतियोंमें एकवचनान्त प्रयोग, जैसे 'अजामेकाम्' 'मायान्तु प्रकृतिं विद्यात्' 'विभेदजनकेऽज्ञाने' इत्यादिमें 'अजाम्' 'मायांम्' 'प्रकृतिम्' और 'अज्ञाने' ये सब एकवचनान्त ही कहे गये हैं, और इसी एक अज्ञानके नाशसे मोक्ष होता है, ऐसा श्रुति प्रतिपादन करती है—'भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः'। इस मतमें एकके तत्त्वज्ञानसे समग्र अज्ञानका नाश नहीं माना जाता है, किन्तु जिस पुरुषको तत्त्वज्ञान होगा उसी पुरुषका अज्ञानांश नष्ट होगा, इसलिए बद्ध और मुक्तकी अत्यन्त उचित रीतिसे व्यवस्था हो सकेगी, यह भाव है।
* इस मतमें ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, ऐसा प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंका अज्ञानके सम्बन्धकी निवृत्तिमें ही तात्पर्य मानना होगा ज्ञानकी निवृत्तिमें नहीं। यदि अज्ञानके नाशमें ही तात्पर्य माना जाय, तो जैसे तृणसमुदायके विरोधी अग्निके उदयसे समग्र तूलराशिका नाश होता है, वैसे ही अज्ञानविरोधी ज्ञानके उदयसे समग्र अर्थात् निःशेष अज्ञानके नाशका प्रसङ्ग आवेगा। ऐसी स्थितिमें जीवन्मुक्तिशास्त्र और बद्धमुक्तिशास्त्रके साथ अवश्य विरोध होगा। इसमें घटात्यन्ताभावका जो दृष्टान्त दिया गया है, उसका तात्पर्य यह है कि 'भूतलमें घट नहीं है' इस अनुभवसे सिद्ध जो अभाव है, वह त्रैकालिक है अर्थात् अत्यन्ताभाव है, इसलिए घटके आनेपर भी 'घट नहीं है' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, परन्तु होती नहीं है, कारण कि घटाधिकरणमें घटात्यन्ताभावप्रतीतिका नियामक सम्बन्ध नहीं है, घटात्यन्ताभावकी प्रतीतिका नियामक है—घटसंयोगाभाव, घटाधिकरणमें घटसंयोगाभावके न रहनेसे उक्त आपत्ति नहीं है।
१२८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
एवमज्ञानस्य चैतन्ये वृत्तौ मनो नियामकमिति तदुपाधिना तत्प्रदेशेषु संसृज्य वर्तमानमज्ञानं क्वचिद् ब्रह्मदर्शनोत्पत्त्या 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्युक्तरीत्या मनसो निवृत्तौ न संसृज्यते । अन्यत्र यथापूर्वमवतिष्ठते । अज्ञानसंसर्गासंसर्गावेव च बन्धमोक्षावित्याहुः ।
जातिर्व्यक्तिमिव ध्वस्तां स्वात्मज्ञं यज्जहाति सा।
जीवं जीवाश्रिताऽविद्या मुक्तिः सेत्यपि चाऽपरैः ॥४८॥
जैसे व्यक्तिमें रहनेवाला जातिरूप धर्म विनष्ट व्यक्तिका परित्याग करता है, वैसे ही जीवाश्रित अविद्या आत्मज्ञानी जीवका जो परित्याग करती है, वही मुक्ति है, यह भी किन्हीं लोगोंका मत है ॥४८॥
अपरे तु नाऽज्ञानं शुद्धचैतन्याश्रयम्, किं तु जीवाश्रयं ब्रह्मविषयम् ।
स्थलमें ) सम्बद्ध नहीं होता, ऐसा किसी नैयायिकका मत है, वैसे ही चैतन्यमें अज्ञानकी वृत्तिका मन नियामक है, इसलिये मनरूप उपाधिसे युक्त प्रदेशमें सम्बन्ध करके रहा हुआ अज्ञान—किसी चैतन्यदेशमें ब्रह्मापरोक्षकी उत्पत्तिसे 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः०' (अन्तःकरणरूप ग्रन्थि ब्रह्मदर्शनसे निवृत्त होती है) इस श्रुतिके आधारपर मनकी निवृत्ति होनेसे सम्बद्ध नहीं होता है और अन्यत्र अर्थात् जिस प्रदेशमें ब्रह्मज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हुई है, उस स्थलमें यथापूर्व रहता ही है, [ क्योंकि इस मतमें ] अज्ञानका सम्बन्ध बन्ध है और अज्ञानका असम्बन्ध मोक्ष है [ पूर्व मतमें अज्ञानकी सत्ता बन्धन और उसका नाश मोक्ष है और इस मतमें अज्ञानका सम्बन्ध बन्ध और असम्बन्ध मोक्ष है यह पूर्व मत और इस मतमें भेद है ] ।
अज्ञान शुद्ध चैतन्यमें नहीं रहता है * किन्तु जीवमें ही रहता है और
* वेदान्तशास्त्रसे प्रतिपाद्य जो शुद्ध चैतन्य है, वह अज्ञानका आश्रय नहीं है, क्योंकि 'वेदान्तवेद्यवस्तुको मैं नहीं जानता हूँ' इस अनुभवसे शुद्ध चैतन्यका अज्ञानविषयत्वरूपसे ही अनुभव होता है। और 'मैं परमात्माको नहीं जानता हूँ'। इस अनुभवसे अज्ञानकी जीवाश्रयत्वरूपसे प्रतीति होती है, अतः जीव ही अज्ञानका आश्रय है। अज्ञान अपने कार्यभूत अन्तःकरणसे युक्त चैतन्यरूप जीवमें कैसे रहेगा, यह शङ्का नहीं करनी चाहिए, कारण कि अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बभूत जो चैतन्य है उसीमें जीवत्वका स्वीकार होनेसे अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको जीव मानते ही नहीं हैं। अन्तःकरण सादि है, इसलिए उसमें प्रतिबिम्बभूत चैतन्यके भी सादि होनेसे वह अनादि अविद्याका आश्रय न होगा, इस प्रकारकी यदि शङ्का हो, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणके—सुषुप्ति और जाग्रदवस्थाके अनुभवसे
जीवैकत्वानेकत्वविचार ] भाषानुवादसहित १२९
अतश्चान्तःकरणप्रतिबिम्बरूपेषु सर्वेषु जीवेषु व्यक्तिषु जातिवत् प्रत्येकपर्यवसायितया वर्तमानमुत्पन्नविद्यं कञ्चित्त्यजति नष्टां व्यक्तिमिव जातिः । स एव मोक्षः । अन्यं यथापूर्वमाश्रयतीति व्यवस्थेत्याहुः ।
वह ब्रह्मविषयक है । इससे प्रत्येकव्यक्तिको व्याप्त करके रहनेवाली जातिके † समान अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप सब जीवोंमें रहनेवाला अज्ञान—जैसे जातिरूप धर्म नष्ट व्यक्तिका त्याग करता है, वैसे ही जिस जीवमें ‡ विद्या उत्पन्न हुई है, उसका—त्याग करता है और यही त्याग मोक्ष कहलाता है । अन्य पुरुषका, जिसमें विद्याका आविर्भाव नहीं हुआ है, आश्रय करता है, इस प्रकारसे भी कुछ लोग बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था करते हैं ।
—लय और जन्म हैं अतः उसके सादि होनेपर भी स्थूलके सूक्ष्मरूपसे वह अनादि है, ऐसा ‘पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात्’ (ब्र० सू० अ० २ पा० ३ सू० ३१) इस सूत्रमें प्रतिपादन किया गया है । इस सूत्रका यह अर्थ है—जैसे बाल्य अवस्थामें अनभिव्यक्त पुंस्त्व और स्त्रीत्व आदिका यौवनमें प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही स्वाप आदिमें अनभिव्यक्त अन्तःकरणकी, जो कि सत् है, स्थूलावस्थारूप अभिव्यक्ति होती है । अनादि चैतन्यप्रतिबिम्बमें अविद्या रहती है, इसका विचार—माया और अविद्याके भेदनिरूपणके प्रसङ्गमें—किया गया है ।
† द्वित्व या बहुत्वके समान अज्ञान व्यासज्यवृत्ति (एकाधिकव्यक्तिमात्रवृत्ति) माना जाय, तो सभी को प्रत्येकरूपसे 'मैं अज्ञ हूँ' ऐसा जो प्रत्यक्ष होता है, वह नहीं होगा, क्योंकि व्यासज्यवृत्ति धर्मके प्रत्यक्षमें यावत् आश्रयीभूत व्यक्तियोंका प्रत्यक्ष कारण होता है, अतः एक-एक जीवको सब जीवोंका प्रत्यक्ष न होनेसे एक व्यक्तिको व्यासज्यवृत्ति अज्ञानका प्रत्यक्ष नहीं होगा, इसलिए अज्ञानको गोत्व आदि जातिरूप धर्मके समान प्रत्येक जीवव्यक्तिमें पर्यवसायी मानना चाहिए । वस्तुतस्तु यदि अज्ञान व्यासज्यवृत्ति माना जाय, तो भी दोष नहीं है, कारण कि अज्ञानप्रत्यक्ष नित्य और साक्षिरूप होनेसे उसके अपरोक्षावभासमें यावदाश्रयका प्रत्यक्ष कारण नहीं है, क्योंकि जन्य-प्रत्यक्षमें ही यावदाश्रयप्रत्यक्ष कारण होता है, यह भाव है ।
‡ उत्पन्न विद्यासे मनकी निवृत्ति होगी और उसके निवृत्त होनेपर तन्निबन्धन चैतन्यप्रतिबिम्बका निरास होगा और इसीसे तद्विशिष्ट चेतन भी निवृत्त हो जायगा, इस क्रमसे मोक्ष होगा । इसीलिए 'जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः' (विद्यावान् जीव जिसके विषय भुक्त हुए हैं, ऐसी अविद्याका त्याग करता है) यह भाव है ।
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१३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
प्रतिजीवमविद्याया भेदमाश्रित्य चेतरे ।
तद्विनाशक्रमान्मुक्तिव्यवस्थां संप्रचक्षते ॥४९॥
कोई-कोई प्रत्येक जीवमें अविद्याका भेद मानकर उसके विनाशक्रमसे मुक्ति-व्यवस्था करते हैं ॥४९॥
इतरे तु प्रतिजीवमविद्याभेदमभ्युपगम्यैव तदनुवृत्तिनिवृत्तिभ्यां बद्धमुक्तव्यवस्थां समर्थयन्ते ।
अविशेषेण सर्वेषामविद्यातः प्रवर्त्तते ।
प्रपञ्चोऽस्मिन्नैकतन्त्वारब्धः पक्षे पटो यथा ॥ ५० ॥
जैसे अनेक तन्तुओंसे एक पट उत्पन्न होता है, वैसे ही अविशेषसे सभी जीवोंकी अविद्यासे प्रपञ्च उत्पन्न होता है, ऐसा अनेक जीववादियोंमें कुछ लोग कहते हैं ॥५०॥
अस्मिन् पक्षे कस्याऽविद्यया प्रपञ्चः कृतोऽस्त्विति चेत्, विनिगमका-भावात् सर्वाविद्याकृतोऽनेकतन्त्वारब्धघटतुल्यः। एकस्य मुक्तौ तदविद्या-नाशे एकतन्तुनाशे पटस्येव तत्साधारणप्रपञ्चस्य नाशः, तदैव विद्यमान-
कुछ लोग प्रत्येक जीवमें अज्ञानका भेद मानकर ही अज्ञानकी अनुवृत्ति और निवृत्तिसे बन्ध और मोक्षका समर्थन करते हैं ✕ ।
इस अनेक-अज्ञानपक्षमें किसकी अविद्यासे प्रपञ्च हुआ है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कुछ लोग कहते हैं कि जैसे अनेक तन्तुओंसे पटका आरम्भ हुआ है, वैसे ही सभी जीवोंके अज्ञानसे यह समस्त प्रपञ्च हुआ है, क्योंकि किसी एक जीवके अज्ञानसे प्रपञ्चकी उत्पत्ति माननेमें कोई बलवत्तर विनिगमक ( युक्तिविशेष ) नहीं है। जैसे एक तन्तुका नाश होनेसे उस तन्तुकी सत्त्वदशामें जो विजातीय पट था, उसका नाश हो जाता है, वैसे ही एक जीवकी अविद्याका नाश होनेसे
✕ इस पक्षमें अविद्याकी अनुवृत्ति बन्ध है और अननुवृत्ति मोक्ष है। और अविद्या प्रत्येक जीवमें अलग-अलग है। एक माननेपर बन्ध और मोक्षका उपपादन नहीं हो सकेगा। यदि शङ्का की जाय कि अविद्याके अंशके आधारपर बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था हो सकती है ? नहीं, नहीं हो सकती, क्योंकि विरोधी विद्याका उदय होनेपर उस अविद्याका किसी अंशसे भी अवस्थान नहीं हो सकता और जीवन्मुक्तिके निर्वाहके लिए अविद्याका लेश नहीं माना गया है, किन्तु अविद्याका नाश होनेपर भी प्रारब्धके अनुसार उसके संस्कार कुछ रहते हैं, इसीको अविद्याका लेश कहा गया है। वस्तुतस्तु अविद्याका लेश है ही नहीं। अतः अविद्याका प्रत्येक जीवमें भेद मानना ही उचित है।
जीवैकत्वानेकत्वविचार ] भाषानुवादसहित १३१
तन्त्वन्तरैः पटान्तरस्येव इतराविद्यादिभिः सकलेतरसाधारणप्रपञ्चान्तरस्योत्पादनमित्येके ।
प्रत्यविद्यं प्रपञ्चस्य भेदं न्यायनये यथा ।
अपेक्षाबुद्धिजद्वित्वं शुक्तिरूप्यं च भिद्यते ॥ ५१ ॥
जैसे न्यायमतमें प्रत्येक पुरुषकी अपेक्षाबुद्धिसे जन्य द्वित्व भिन्न-भिन्न होते हैं, और शुक्तिरूप्यादि प्रातिभासिक पदार्थ भी तत्-तद् अज्ञानसे भिन्न हैं, वैसे ही प्रत्येक अज्ञानके भेदसे प्रपञ्चका भी भेद है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥५१॥
तत्तदज्ञानकृतप्रातिभासिकरजतवत् न्यायमते तत्तदपेक्षाबुद्धिजन्यद्वित्ववच्च तत्तदविद्याकृतो वियदादिप्रपञ्चः प्रतिपुरुषं भिन्नः। शुक्तिरजते त्वया यद् दृष्टं रजतम्, तदेव मयाऽपीतिवदैक्यभ्रममात्रमित्यन्ये ।
तत्साधारण विजातीय प्रपञ्चका नाश होता है और जैसे उसी क्षणमें ( तन्तुके नाशक्षणमें ) वर्तमान अन्य तन्तुओंसे पूर्वपटसे विलक्षण पट उत्पन्न होता है, वैसे ही इतर जीवोंकी अविद्या आदिसे—मुक्त जीवसे अन्य समस्त जीवोंका साधारण अन्य प्रपञ्च उत्पन्न होता है ।
जैसे उन उन पुरुषोंके अज्ञानसे ✻ प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति होती है और जैसे न्यायमतमें † उन उन पुरुषोंकी अपेक्षाबुद्धिसे ( अनेकमें एकत्र बुद्धि—यह एक है, यह एक है, इत्यादिरूपसे ) द्वित्व आदि संख्या उत्पन्न होती है, वैसे ही उन उन पुरुषोंके अज्ञानसे आकाश आदि समस्त पदार्थोंकी उत्पत्ति हुई है, अतः अज्ञानके भेदसे प्रत्येक पुरुषके प्रति प्रपञ्च भिन्न-भिन्न है । शुक्तिरजतस्थलमें जैसे एकत्वका भ्रम होता है, जिस रजतको तुमने देखा था वही मैने देखा, वैसे ही जिस प्रपञ्चको तुम देखते हो, उसी प्रपञ्चको 'मैं देख रहा हूँ', इस प्रकार ऐक्यका भ्रम ही है, वस्तुतः प्रपञ्च एक नहीं है, ऐसा भी उन्हीं लोगोंका मत है ।
✻ यहाँ एक शङ्का होती है कि जिस स्थलमें एक कालमें अनेक पुरुषोंको एक साथ ही भ्रम हुआ है, उस स्थलमें उन सभी पुरुषोंके अज्ञान एक रजतके प्रति कारण होंगे, अतः दृष्टान्तकी असम्पत्ति अवश्य होगी, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें दैवयोगसे एक पुरुषमें शुक्तिका ज्ञान होनेसे 'नेदं रजतम्' ऐसे बाधक प्रत्यक्षसे सोपादान रजतका नाश होनेपर भी अन्योंमें रजतका भ्रम यथापूर्व अनुवर्तमान रहता ही है। अतः रजतका भेद अवश्य मानना होगा, इसलिए दृष्टान्तकी असिद्धि नहीं है, यह भाव है।
† 'न्यायमते' इस कथनका आशय यह है कि वेदान्तसिद्धान्तमें—द्वित्व आदि अपेक्षा-
| १३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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प्रातिभासिकरूप्यादेः प्रकृतिर्जीवसंश्रया ।
अविद्येशाश्रया माया विश्वस्येत्यपरे जगुः ॥ ५२ ॥
प्रातिभासिक रूप्य आदिकी प्रकृति ( उपादान ) जीववृत्ति अविद्या है और ईशमें रहनेवाली माया समस्त विश्वकी प्रकृति है, ऐसा कोई-कोई कहते हैं ॥५२॥
जीवाश्रिताविद्यानिवहाद्भिन्ना मायैव ईश्वराश्रिता प्रपञ्चकारणम् । जीवानामविद्यास्तु आवरणमात्रे प्रातिभासिकशुक्तिरजतादिविक्षेपेऽपि च उपयुज्यन्ते इत्यपरे ॥ ७ ॥
ईशस्य कर्तृता कीदृक् ? तत्र केचित् प्रचक्षते ।
कार्यानुकूलविज्ञानचिकीर्षाकृतिकेति ताम् ॥ ५३ ॥
ईश्वरमें कैसा कर्तृत्व है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कोई लोग कहते हैं कि कार्यानुकूल ज्ञानचिकीर्षा-कृतिमत्त्व ही कर्तृत्व है ॥५३॥
अवसितमुपादानत्वम्, तत्प्रसक्तानुप्रसक्तं च ।
कुछ लोगोंका यह मत है कि जीवोंमें रहनेवाले अज्ञानके समुदायसे ईश्वरमें रहनेवाली माया पृथक् है और यही समस्त वियद् आदि संसारके प्रति उपादान है । और जीवोंकी अविद्या आवरणमात्रमें और उपादानरूपसे प्रातिभासिक शुक्ति आदि विक्षेपमें उपयुक्त होती है * ॥७॥
[ अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप ब्रह्मलक्षणमें प्रविष्ट ] उपादानत्वका लक्षण समाप्त हुआ और उसके प्रसङ्गसे प्राप्त जीवेश्वरस्वरूपनिरूपण तथा जीवेश्वर-स्वरूपनिरूपणके अनन्तर प्राप्त जीवैकत्व, नानात्व आदिका भी निरूपण समाप्त हुआ । [ अब कर्तृत्वका निरूपण करते हैं ]—
बुद्धिजन्य नहीं हैं, किन्तु अनेकद्रव्यजन्य ही हैं, क्योंकि अनेक द्वित्व आदिकी और उनकी उत्पत्ति आदिकी कल्पनामें गौरव है इसलिए अपेक्षाबुद्धि द्वित्व आदिकी व्यञ्जक है, यह माना गया है ।
* यद्यपि जीवाश्रित अविद्या स्वाप्न प्रपञ्चके प्रति उपादान है, अतः इसका स्वप्नप्रपञ्चमें भले ही उपयोग हो, परन्तु शुक्तिरजतके प्रति उसका उपयोग नहीं हो सकता, कारण कि रजटका अधिष्ठान जो शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य है, उसमें जीवाविद्या नहीं रहती है, तथापि अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि 'रजतादिमें' आदि पदसे स्वप्नप्रपञ्च ही गृहीत है, अथवा वाचस्पतिमिश्रके समान शुक्तिरजतादिको जीवाविद्याविषयीकृतशुक्त्याद्यवच्छिन्नचैतन्यका ही विवर्त मानकर जीवाविद्याओंका प्रातिभासिक रजत आदिके प्रति उपयोग बतलाया गया है, अतः अनुपपत्ति नहीं है ।
ब्रह्मके कर्तृत्वस्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित १३३
अथ कीदृशं कर्तृत्वम् । ?
केचिदाहुः—'तदैक्षत सोऽकामयत तदात्मानं स्वयमकुरुत' इति श्रवणान्न्यायमत इव कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वरूपमिति ।
कार्यानुकूलविज्ञानमात्रं सा नेतरे तयोः ।
कार्यत्वेनानवस्थानादिति चान्ये प्रचक्षते ॥ ५४ ॥
कोई-कोई कहते हैं कि कार्यानुकूलज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्व है, क्योंकि चिकीर्षा (करनेकी इच्छा) और कृतिके कार्य होनेसे तदनुकूल अन्य चिकीर्षा और कृतिके माननेमें अनवस्था प्रसक्त होगी ॥५४॥
अन्ये तु चिकीर्षाकृतिकर्तृत्वनिर्वाहाय चिकीर्षाकृत्यन्तरापेक्षायामनवस्थाप्रसङ्गात् कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वमेव ब्रह्मणः कर्तृत्वम् । न च ज्ञानेऽप्येष
ब्रह्ममें कर्तृत्व कैसा है ? [ ब्रह्ममें कोई धर्म नहीं है, अतः यदि कर्तृत्व है, तो उसका स्वरूप क्या है, यह आक्षेपकर्ताका भाव है ]
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे न्यायमतमें कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वरूप * कर्तृत्वका लक्षण किया है, वैसे ही प्रकृतमें कर्तृत्वका यही लक्षण है, क्योंकि 'तदैक्षत०' (उसने (ब्रह्मने) देखा, उसने चाहा, और उसने स्वतः ही अपनेको जगद्रूप किया) इत्यादि श्रुति है [ यद्यपि ब्रह्ममें स्वतः कर्तृत्व नहीं है, तथापि औपाधिक कर्तृत्व है, यह भाव है ] ।
कुछ लोग कहते हैं कि चिकीर्षाके प्रति और कृतिके प्रति कर्तृताका निर्वाह करनेके लिए यदि अन्य चिकीर्षा और अन्य कृतिका स्वीकार किया जायगा, तो अनवस्था होगी, इससे कार्यानुकूलज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्वका लक्षण है।
* कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वम्—कर्तृत्वम् । इसका विवेचन कुछ पङ्क्तियोंके अनन्तर अनुवादमें स्पष्टरूपसे किया गया है, लक्षणमें इच्छा, कृति आदिका यद्यपि समावेश नहीं होता, इच्छानुकूल इच्छा कृतिके अनुकूल कृति ऐसा मानकर उनमें (इच्छा आदिके कर्तृत्वमें) लक्षण-समन्वय किया जायगा, तो परिशेषसे अनवस्था ही प्रसक्त होगी, तथापि इस लक्षणकर्ताओंका अभिप्राय है कि इच्छा आदिसे भिन्न जो कार्य हैं, उनके प्रति कर्तृत्वका यह लक्षण है इच्छा आदिके प्रति नहीं, इच्छा आदिके प्रति अन्यविध कर्तृत्व होगा । इससे इसमें कर्तृत्वलक्षणका अननुगम दोष होता है, यही अस्वरस है, अतः 'कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वं कर्तृत्वम्' अर्थात् कार्यका अनुकूल ज्ञान जिसमें रहे, वह कर्ता है, ऐसा 'अन्ये तु' इत्यादिसे अन्य पक्ष कहा जाता है ।
| १३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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प्रसङ्गः । तस्य ब्रह्मस्वरूपत्वेनाऽकार्यत्वात् । एवं च विवरणे जीवस्य सुखादिकर्तृत्वोक्तिः, वीक्षणमात्रसाध्यत्वात् वियदादि वीक्षितम्, हिरण्य-
ज्ञानमें यह प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि ज्ञानके ब्रह्मस्वरूप होनेसे वह किसीका भी कार्य नहीं है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि सच्चिदानन्द परमात्मा समस्त जगत्का कर्ता है और पूर्वमतमें कर्ता वह कहा गया है—जिसमें कार्यका ठीक-ठीक परिज्ञान, उसकी चिकीर्षा (कार्यको बनानेकी प्रबल इच्छा) और कार्य-विषयिणी (कार्यानुकूल) कृति हो । जो कर्ता होता है, उसमें कार्यविषयक ज्ञान, कार्यविषयक चिकीर्षा और तदनुकूल कृति रहती है, जैसे—घटका कर्ता है—कुम्भकार, उसमें घटका ज्ञान, घटकी चिकीर्षा और घटानुकूल कृति, ये तीनों विद्यमान हैं । तुल्य युक्तिसे ईश्वरमें भी उपाधिवश कार्यानुकूल ज्ञान, चिकीर्षा और कृति माननी ही पड़ेगी, अन्यथा ईश्वरके कर्तृत्वका निर्वाह नहीं होगा । ऐसी परिस्थितिमें कर्ताके लक्षणमें प्रविष्ट जो चिकीर्षा और कृति है, उनको कार्य माना जाय या नहीं ? यदि उनको कार्य न माना जाय, तो ईश्वरसे अन्य चिकीर्षा और कृतिके भी नित्य होनेसे अद्वितीयत्वश्रुतिके साथ विरोध होगा, इसलिए चिकीर्षा और कृतिको कार्य अवश्य मानना होगा, यदि वे कार्य हैं, तो चिकीर्षाके अनुकूल द्वितीय चिकीर्षा और कृतिके अनुकूल अन्य कृति माननी होगी, इस प्रकार द्वितीय चिकीर्षा और कृतिके कार्य होनेसे तदनुकूल तृतीय चिकीर्षा और कृति माननी होगी, अतः इस क्रमसे विचारधारा करनेपर अनवस्था ही होगी, ज्ञानके ब्रह्मस्वरूप होनेसे वह नित्य है, अतः तत्प्रयुक्त अनवस्था नहीं हो सकती है, इसलिए चिकीर्षा और कृतिसे रहित—'कार्यानुकूल' अर्थात् कार्यके लिए उपयुक्त जो ज्ञान तद्वान् जो हो वह कर्ता है—इस प्रकार प्रथम लक्षणमें अरुचि बतलाकर कर्ताका लक्षण कहा गया, यह भाव है ] । इच्छा और कृतिका कर्ताके लक्षणमें प्रवेश नहीं है, अतः विवरणमें सुख आदिका जीव कर्ता है, ऐसा कहा गया है* । और वीक्षणमात्रसे साध्य होनेसे वियद् आदि वीक्षित कहे गये हैं, हिरण्यगर्भ द्वारा भौतिक
* यह तात्पर्य है—जीवमें सुख आदिकी उत्पत्तिके अनुकूल ज्ञान है, परन्तु सुख आदिकी उत्पत्तिके अनुकूल इच्छा या कृति नहीं है, क्योंकि, ऐसा अनुभूत नहीं है, और किसी तन्त्रकारने स्वीकार भी नहीं किया है। इसीलिए कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्वरूपकर्तृत्वका अङ्गीकार करके ही विवरणकारका उक्त वचन सङ्गत होता है, अन्यथा सङ्गत नहीं होगा।
ब्रह्मके कर्तृत्वस्वरूपका विचार] भाषानुवादसहित १३५
गर्भद्वारा वीक्षणाधिकयत्नसाध्यत्वात् भौतिकं स्मितमिति कल्पतरूक्तिश्च सङ्गच्छत इति वदन्ति ।
एवं जीवोऽपि कर्ता स्याज्जगतः स्वप्नजस्य च ।
ततः सृष्ट्यनुकूलार्थाऽऽलोचनेनैवेति चापरे ॥ ५५ ॥
यदि कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्व कर्तृत्व माना जायगा, तो जीव भी जगत् और स्वप्नका कर्ता होगा, इसलिए सृष्टिके अनुकूल आलोचनात्मक ज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्व है, ऐसा कोई लोग कहते हैं ॥५५॥
अपरे तु कार्यानुकूलस्रष्टव्यालोचनरूपज्ञानवत्त्वं कर्तृत्वम्, न कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वमात्रम् । शुक्तिरजतस्वाप्नभ्रमादिषु अध्यासानुकूलाधिष्ठानज्ञानवत्त्वेन
पदार्थ वीक्षणसे अधिक यत्नसाध्य हैं, अतः भौतिक पदार्थ स्मित हैं † इस प्रकार कल्पतरुकी उक्ति भी सङ्गत होती है ।
कुछ लोग कहते हैं कि 'मया इदं स्रष्टव्यम्' इत्याकारक कार्यानुकूल जो आलोचनात्मक ज्ञान है, वह जिसमें हो, वह कर्ता है, केवल कार्यानुकूल ज्ञानवान्
† भामतीग्रन्थके आरम्भमें मङ्गलाचरण है—
निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च भूतानि।
स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥
इसका यह अर्थ है—जैसे पुरुषके निःश्वासमें कोई प्रयत्नविशेषकी आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही जिस ब्रह्मके—ये समग्र ज्ञानके आगार चारों वेद प्रयत्नके बिना ही—कार्य हैं, जिसकी दृष्टिमात्रसे ही ये महाभूत हुए हैं, जिसका हिरण्यगर्भके साथ चराचर विश्व एक मन्दहास्य है और महाप्रलय जिसकी मानो सुषुप्ति है, उस ब्रह्मका नमन करता हूँ । इस श्लोकमें महाभूत ब्रह्मवीक्षित हैं और भौतिक चराचर प्रपञ्च ब्रह्मस्मित हैं, ऐसा कहा गया है, इसी तात्पर्यको कहनेके लिए कल्पतरूकारने यह कहा है कि ‘वीक्षणमात्रेण सृष्टत्वात् भूतानि वीक्षितम्, हिरण्यगर्भद्वारा साध्यं चराचरं वीक्षणाधिकप्रयत्नसाध्यस्मितसाम्यात् स्मितम्’ (केवल वीक्षणसे ही भूतोंकी उत्पत्ति है, अतः भूत वीक्षित कहे गये हैं हिरण्यगर्भ द्वारा चराचरकी उत्पत्ति हुई है, अतः वीक्षणसे अधिक प्रयत्नसाध्यस्मितकी समानता होनेसे चराचर ब्रह्मका स्मित है अर्थात् लोकमें मन्दहासरूप जो स्मित है, उसमें वीक्षणसे—ज्ञानसे अधिक कुछ ओष्ठसंचालनके अनुकूल यत्न करना पड़ता है, वैसे ही चराचरकी उत्पत्तिमें ब्रह्मको वीक्षणके सिवा हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिरूप व्यापार करना पड़ता है, अतः वीक्षणाधिक यत्नकी अपेक्षा होनेसे चराचर स्मित हैं, यह भाव है) इस कल्पतरुव्याख्याके आधारपर कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्वरूप कर्तृत्वका ही लाभ होता है, क्योंकि ‘वीक्षणमात्रेण सृष्टत्वात्’ इसमें मात्रशब्दसे स्पष्ट ही चिकीर्षा और कृतिका निरास होता है, यह भाव है ।
| १३६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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जीवस्य कर्तृत्वप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः, 'अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते स हि कर्ता' इत्यादिश्रुत्यैव जीवस्य स्वप्नप्रपञ्चकर्तृत्वोक्तेरिति वाच्यम् । भाष्यकारैः 'लाङ्गलं गवादीनुद्वहतीतिवत् कर्तृत्वोपचारमात्रं रथादिप्रतिभाननिमित्तत्वेन' इति व्याख्यातत्वादित्याहुः ॥
कर्ता नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवमें भी शुक्ति-रजत और स्वप्नविभ्रमके प्रति कर्तृत्वका प्रसङ्ग होगा, क्योंकि उसमें अध्यस्यमान (जिनका अध्यास होता है, ऐसे) रजत आदिके अनुकूल जो अधिष्ठानका ज्ञान है, वह है । परन्तु यह दोष नहीं है, प्रत्युत इष्टापत्ति ही है, क्योंकि 'अथ रथान्०' (स्वप्न-कालमें जीव रथ, घोड़े और मार्गको उत्पन्न करता है, क्योंकि वह जीव स्वाप्न पदार्थके हेतुभूत कर्मका कर्ता है) इस श्रुतिसे 'जीव स्वाप्न प्रपञ्चका कर्ता है' ऐसा कहा गया है, नहीं इष्टापत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि भाष्यकारने व्याख्यान किया है कि जैसे 'लाङ्गल गो आदिका उद्वहन करता है' यह प्रयोग केवल औपचारिक है, वैसे ही रथ आदिके प्रतिभानके निमित्तरूपसे जीवमें कर्तृत्वका उपचारमात्र * है।
* 'लाङ्गलं गवादीनुद्वहति' (हल गाय आदि पशुओंका उद्वहन करता है अर्थात् गौ आदि पशुओंकी जीवनस्थितिको हल करता है) इस प्रयोगमें लाङ्गलमें गाय आदिका स्थितिकर्तृत्वरूप उद्बोढ़त्व सुना जाता है, वह मुख्य नहीं हो सकता है, क्योंकि हलका भक्षण नहीं किया जा सकता है। पशुओंका उद्वहन करना कैसे हो सकता है, इसलिए—लाङ्गलसे कृषि होगी, कृषिसे गाय आदिकी स्थितिमें कारणभूत भूसा आदिका लाभ होगा—इस प्रकार परम्परासे औपचारिक कहा जाता है, वैसे ही स्वप्नरथ आदिका जो प्रतिभान—प्रतिभास होता है उसमें कारणभूत धर्म आदिके, कर्ता होनेसे 'स हि कर्ता' इत्यादि श्रुतिमें जीवोंमें स्वप्नरथ आदिके प्रति कर्तृता कही गई है, वस्तुतः नहीं। इस प्रकार भाष्यकारने जीवमें औपचारिक कर्तृत्व—स्वप्नरथ आदिके प्रति कहा है, विवरणमें सुख आदिके प्रति जीवमें जो कर्तृत्वका प्रतिपादन किया गया है, वह भी इससे औपचारिक ही साबित होता है। 'मया इदं स्रष्टव्यम्' (मुझे यह बनाना चाहिए) इस प्रकार आत्माके आलोचनात्मक ज्ञानके न रहनेपर भी सुख आदि देखे जाते हैं, अतः मुख्य कर्तृत्वकी सम्भावना नहीं है 'वीक्षणमात्रासाध्यम्' इस प्रकार जो कल्पतरुका वचन है, इससे भी सृष्ट्यालोचनरूप ज्ञान ही वीक्षणशब्दसे अभिप्रेत है, अतः उसके साथ भी कोई विरोध नहीं है, यह भाव है।
ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १३७
जगत्कर्तृत्वसंसिद्धं सर्वज्ञत्वं समर्थितम् ।
ईशस्य शास्त्रयोनित्वात्तच्च कीदृग्विधं भवेत् ॥ ५६ ॥
ईश्वर जगत्का कर्ता है, इससे अर्थतः और सम्पूर्ण वेदोंका कर्ता है, इससे साक्षात् ईश्वरमें सर्वज्ञत्व सिद्ध है, वह सर्वज्ञत्व कैसा है ? ॥५६॥
अनेनैव निखिलप्रपञ्चरचनाकर्तृभावेनाऽर्थसिद्धं सर्वज्ञत्वं ब्रह्मणः 'शास्त्रयोनित्वात्' ( उ. मी. अ. १ पा. १ सू. ३ ) इत्यधिकरणे वेदकर्तृत्वेनाऽपि समर्थितम् ॥८॥
अथ कथं ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वं सङ्गच्छते । जीववदन्तःकरणाभावेन ज्ञातृत्वस्यैवाऽयोगात् ।
इसी सम्पूर्ण प्रपञ्चरचनाके कर्तृत्वसे ब्रह्ममें अर्थतः सिद्ध हुए सर्वज्ञत्वका 'शास्त्रयोनित्वात्' इस अधिकरणमें वेदकर्तृत्वसे भी समर्थन किया गया है * ॥ ८ ॥
अब शङ्का करते हैं कि ब्रह्म सर्वज्ञ कैसे हो सकता है ? क्योंकि जीवके समान ब्रह्ममें अन्तःकरणका सम्बन्ध न होनेसे ज्ञातृत्वका ही असम्भव है † ।
* 'जन्माद्यस्य यतः' ( जिस आनन्दकन्दसे समस्त प्रपञ्चकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं, वह ब्रह्म है ) इस सूत्रसे समस्त प्रपञ्चका कर्ता होकर जगत्का जो उपादान हो, वह ब्रह्म है, ऐसा लक्षण प्राप्त होता है, परन्तु सर्वज्ञत्वके बिना सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके प्रति कर्तृत्व ब्रह्ममें नहीं हो सकता है, अतः ब्रह्मका सर्वज्ञत्व अर्थतः सिद्ध है । और 'शास्त्रयोनित्वात्' ( ब्रह्म सर्वज्ञ है, क्योंकि ऋग्वेद-आदि साङ्ग समस्त वेदोंका कर्ता है ) इस अधिकरणमें वेदकर्तृत्वसे भी सर्वज्ञताका साक्षात् साधन किया गया है, पूर्वके 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रमें अर्थतः सिद्ध है और 'शास्त्रयोनित्वात्' में साक्षात् सर्वज्ञत्वका साधन है, क्योंकि पूर्वसूत्र ब्रह्मका लक्षण बोधन करता है 'और शास्त्रयोनित्वात्' सर्वज्ञत्वका साधन करता है ।
† यद्यपि 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्मके सर्वज्ञत्वका साक्षात् ही कथन है, तथापि युक्तियोंसे सर्वज्ञत्वका अधिक दृढीकरण करनेके लिए इस सर्वज्ञत्वविचारका उपक्रम है । शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि जीवमें ज्ञातृत्वका व्यवहार जो होता है, वह अन्तःकरणरूप जीवकी उपाधिके आधारपर ही अवलम्बित है, ईश्वरके अन्तःकरण नहीं है, अतः उसमें ज्ञातृत्वका सर्वथा अभाव ही रहेगा, ईश्वरकी उपाधि अन्तःकरण नहीं हो सकता, क्योंकि 'कार्योपाधिरयं जीवः' इस उदाहृत श्रुतिसे अन्तःकरण जीवकी ही उपाधि कही गई है। ज्ञातृत्व धर्म सर्वज्ञत्वका व्यापक है, अर्थात् जहाँ जहाँ सर्वज्ञत्व होगा वहाँ वहाँ ज्ञातृत्व अवश्य रहेगा, क्योंकि ज्ञातृत्वका एकदेश ही सर्वज्ञत्व है । इसलिए व्यापक
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| १३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तत्र सर्वार्थविषयसर्वधीवासनोपधः ।
साक्षित्वाद्भारतीतीर्थमते सार्वज्ञ्यमीरितम् ॥ ५७ ॥
सम्पूर्णवस्तुविषयक सम्पूर्णधीवासनाओंसे उपहित ईश्वर सम्पूर्ण विषयवासनाका साक्षी है, अतः ईश्वरमें सर्वज्ञत्व है, ऐसा भारतीतीर्थका मत कहा गया है ॥५७॥
अत्र सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिक ईश्वरः । अतस्तस्य सर्वविषयवासनासाक्षितया सर्वज्ञत्वमिति भारतीतीर्थादिपक्षः प्रागेव दर्शितः ।
चिच्छायाग्राहिभिर्मायावृत्तिभेदैस्तदीशितुः ।
त्रैकालिकेष्वपरोक्ष्यं प्रकटार्थकृतो विदुः ॥ ५८ ॥
चित्प्रतिबिम्बका ग्रहण करनेवाली मायावृत्तियोंसे ईश्वरसे कालत्रयमें रहनेवाले प्रपञ्चका जो अपरोक्ष ज्ञान है, वह सर्वज्ञत्व है, ऐसा प्रकटार्थकार कहते हैं ॥५८॥
प्रकटार्थकारास्त्नाडुः—यथा जीवस्य स्वोपाध्यन्तःकरणपरिणामाश्चैतन्यप्रतिबिम्बग्राहिण इति तद्योगात् ज्ञातृत्वम्, एवं ब्रह्मणः स्वोपाधिमाया-
* इस आक्षेपके समाधानमें भारतीतीर्थ आदिका पक्ष पूर्वमें ही दिखलाया गया है कि सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्णप्राणिधीवासनाओंसे उपरक्त अज्ञानसे उपहित † चैतन्य ईश्वर है, इससे अपनी उपाधिभूत वासनाओंके विषयीभूत वस्तुओंके अवभासकरूपसे ईश्वरमें सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है ।
प्रकटार्थकार कहते हैं कि ‡ जैसे जीवके उपाधिरूप अन्तःकरणके परिणाम (वृत्तियाँ) चैतन्यके प्रतिबिम्बको ग्रहण करते हैं, इसलिए उनके योगसे जीव ज्ञाता होता है, वैसे ही ब्रह्मकी उपाधिभूत मायाके परिणाम चैतन्यके
ज्ञातृत्वकी निवृत्तिसे व्याप्य सर्वज्ञत्वका भी निरास हुआ, कारण कि व्यापकके अभावसे व्याप्यका अभाव सिद्ध होता है, यह सिद्धान्त है, अतः पूर्वपक्ष होता है कि ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति कैसे हो सकती है ।
* ‘सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपाधिकस्य तस्य सर्वज्ञत्वस्य तत एवोपपत्तेः’ इस ग्रन्थसे दिखलाया गया है [ द्रष्टव्य—पृ० ९४ ] ।
† जैसे प्रकटार्थकारके मतसे जीवमें ज्ञातृत्वकी प्रयोजक उपाधि अन्तःकरण है, वैसे ही ईश्वरमें ज्ञातृत्वकी प्रयोजक उपाधि माया है, इसलिए मायोपाधिक ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वका व्यापक ज्ञातृत्व नहीं है, ऐसा नहीं है, परन्तु है ही और ‘मायिनन्तु महेश्वरम्’ इत्यादि श्रुतिसे माया ईश्वरकी उपाधि प्रसिद्ध है ।
ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार] भाषानुवादसहित १३९
परिणामाश्रितप्रतिबिम्बग्राहिणस्सन्तीति तत्प्रतिबिम्बितैः स्फुरणैः कालत्रयवर्तिनोऽपि प्रपञ्चस्याऽपरोक्षेणाऽवकलनात् सर्वज्ञत्वमिति ।
तत्त्वशुद्धिकृतो भूते स्मृतिं भाविनि तूहनम् ॥
ब्रह्ममें [ वर्तमान वस्तुका अनुभव है ], भूतकालीन वस्तुका स्मरण है और भविष्यत्कालीन वस्तुका भी ( मूलोक्त प्रकारसे ) ज्ञान है, इसलिए ब्रह्म सर्वदा सर्वज्ञ है, ऐसा तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं ।
तत्त्वशुद्धिकारास्तूक्तरीत्या ब्रह्मणो विद्यमाननिखिलप्रपञ्चसाक्षात्कारसम्भवात् तज्जनितसंस्कारवत्तया च स्मरणोपपत्तेरतीतसकलवस्त्ववभाससिद्धिः । सृष्टेः प्राङ् मायायाः सृज्यमाननिखिलपदार्थस्फुरणरूपेण जीवादृष्टानुरोधेन विवर्तमानत्वात् तत्साक्षितया तदुपाधिकस्य ब्रह्मणोऽपि तत्साधकत्वसिद्धेः अनागतवस्तुविषयविज्ञानोपपत्तिरिति सर्वज्ञत्वं समर्थयन्ते ।
सदा सर्वस्य सत्त्वात्तु साक्षिणा कौमुदीकृतः ॥ ५९ ॥
सार्वज्ञ्ये ज्ञानरूपत्वमिष्टं न ज्ञानकर्तृता ।
प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेवाले हैं, अतः उनमें प्रतिबिम्बित स्फुरण ( चैतन्य ) तीनों कालमें रहनेवाले प्रपञ्चको अपरोक्षसे विषय करते हैं, अतः ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व हो सकता है ।
! तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं कि पूर्वोक्त रीतिसे सम्पूर्ण वर्तमान प्रपञ्चका साक्षात्कार सम्भव है और विद्यमान वस्तुविषयक साक्षात्कारसे उत्पन्न संस्कारके आश्रयरूपसे भूतकालीन सम्पूर्ण वस्तुके अवभासकी सिद्धि होती है । सृष्टिके पूर्वकालमें जीवोंके अदृष्टवशसे सृज्यमान सम्पूर्ण पदार्थोंकी वृत्तिरूपसे मायाका परिणाम होता है, इससे मायामें प्रतिबिम्ब होनेसे मायोपाधिक ब्रह्ममें भी मायाकी वृत्तिके प्रति कर्तृत्वकी सिद्धि होनेसे अनागतवस्तुविषयक विज्ञानकी उपपत्ति है, अतः ब्रह्मके सर्वज्ञत्वकी सिद्धि है ।
‡ इस तत्त्वशुद्धिकारके मतमें पूर्वमतसे यह विशेष है—पूर्वोक्तमतमें ईश्वरका अतीत-अनागत-विषयक ज्ञान अपरोक्ष ही है और इस मतमें जीवके समान ईश्वरका भी अतीत आदिविषयक ज्ञान परोक्ष है, क्योंकि लोकमें वर्तमानविषयक ज्ञान ही अपरोक्ष ज्ञान कहा जाता है । अवर्तमान-विषयक अपरोक्ष ज्ञान नहीं कहा जाता, अतः लोकमें अनुभूत स्वभावका शास्त्र भी अतिक्रमण नहीं कर सकता है ।
| १४० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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भाष्येऽस्य जीवलिङ्गत्वकीर्त्तनादिति ते विदुः ॥ ६० ॥
सूक्ष्मरूपसे सभी पदार्थोंके विद्यमान होनेके कारण साक्षिरूपसे ब्रह्म सब वस्तुका अवभासक है। ऐसा कौमुदीकार कहते हैं। ज्ञानरूपत्व ही सर्वज्ञत्व है, ज्ञानकर्तृत्वरूप नहीं, इसीलिए भाष्यमें ज्ञानकर्तृत्व जीवका लिङ्ग कहा गया है, ऐसा भी वे (कौमुदीकार) कहते हैं ॥५९॥६०॥
कौमुदीकृतस्तु वदन्ति—स्वरूपज्ञानेनैव ब्रह्मणः स्वसंसृष्टसर्वावभासकत्वात् सर्वज्ञत्वम्। अतीतानागतयोरप्यविद्यायां चित्रभित्तौ विमृष्टानुन्मीलितचित्रवत् संस्कारात्मना सत्त्वेन तत्संसर्गस्याऽप्युपपत्तेः। न तु वृत्तिज्ञानैस्तस्य सर्वज्ञत्वम्। 'तमेव भान्तमनु भाति सर्वम्' इति
कौमुदीकार कहते हैं कि स्वरूपज्ञानसे ही * ब्रह्म अपने साथ सम्बद्ध सब पदार्थोंका अवभासक होनेसे सर्वज्ञ है। जैसे विमृष्ट होनेसे अनभिव्यक्त चित्र संस्काररूपसे चित्रभित्तिमें रहता है, वैसे ही अतीत और अनागत पदार्थ अविद्याके संस्काररूपसे रहते हैं, अतः उनके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध है, इसलिए अतीत और अनागत विषयके साथ सम्बन्ध होनेसे तत् संसृष्ट ब्रह्म सर्वज्ञ है। वृत्तिज्ञानसे ब्रह्म सर्वज्ञ नहीं है, क्योंकि 'तमेव भान्त०' (उसके ही
* पूर्वके दो मतोंसे वृत्तिज्ञान द्वारा ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वका निरूपण किया गया है, और इस मतसे स्वरूपज्ञानसे ब्रह्मकी सर्वज्ञताका निरूपण किया जाता है। अतीत और अनागत प्रपञ्च प्रलयकालमें और सृष्टिकालमें संस्काररूपसे विद्यमान रहते हैं, इसलिए उनका ब्रह्मके साथ सम्बन्ध होता है, अतः अतीत और अनागत वस्तुओंसे सम्पृक्त ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी अनुपपत्ति नहीं हो सकती है। देवताधिकरणके भाष्यमें और आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें अतीत और अनागत वस्तुकी प्रलयकालमें और सृष्टिकालमें संस्कारात्मना अवस्थिति रहती है, इसका निरूपण किया गया है। इसमें एक बातकी न्यूनता रहती है, उसे जानना चाहिए—जब स्थूल प्रपञ्चका अवस्थान है तब सूक्ष्म प्रपञ्च नहीं है और प्रलयकालमें सूक्ष्म प्रपञ्च है, तो उस कालमें स्थूल प्रपञ्च नहीं है, अतः सब कालमें सब प्रपञ्चके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध न होनेसे ब्रह्ममें असंकुचित सर्वज्ञत्व सिद्ध नहीं होगा।
'तमेव भान्तम्' इसमें 'एव'के अवधारणार्थक होनेसे यह अर्थ स्पष्ट भासता है कि ब्रह्म विषयके प्रकाशनमें अन्य किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं करता है, अतः ब्रह्मकी सर्वज्ञतामें वृत्तिकी अपेक्षा नहीं है, परन्तु स्वरूपज्ञानसे ही ब्रह्म स्वसम्बद्ध सकल पदार्थोंका अवभास करता है। इस विषयमें भी कुछ विचारणीय अंश है, जैसे ब्रह्मचैतन्य जगत्के अवभासनके लिए मायावृत्तिकी अपेक्षा करे तो 'तमेव' इस श्रौत अवधारणके साथ विरोध होता है, वैसे ही घट आदिके अवभासनमें जीव अन्तःकरण वृत्तिकी अपेक्षा करता है, तो श्रौत अवधारणके
ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १४१
सावधारणश्रुतिविरोधात् सृष्टेः प्रागेकमेवाद्वितीयमित्यवधारणानुरोधेन महाभूतानामिव वृत्तिज्ञानानामपि प्रलयस्य वक्तव्यतया ब्रह्मणस्तदा सर्वज्ञत्वाभावापत्त्या प्राथमिकमायाविवर्तरूपे ईक्षणे तत्पूर्वके महाभूतादौ च स्रष्टृत्वाभावप्रसङ्गाच्च । एवं सति ब्रह्मणस्सर्वविषयज्ञानात्मकत्वमेव स्यात्, न तु सर्वज्ञातृत्वरूपं सर्वज्ञत्वमिति चेत्, सत्यम् । सर्वविषयज्ञानात्मकमेव ब्रह्म, न तु सर्वज्ञानकर्तृत्वरूपं ज्ञातृत्वमस्ति । अत एव 'वाक्यान्वयात्'
प्रकाशित होनेपर सब वस्तुओंका प्रकाश होता है ) इस अवधारण ( एव ) के सहित श्रूयमाण श्रुतिके साथ विरोध होगा और 'एकमेवाद्वितीयम्' ( एक ही अद्वितीय ) इस अवधारण श्रुतिके आधारपर सृष्टिके पूर्वकालमें महाभूतोंके समान वृत्तिज्ञानोंका प्रलय है, यह कहना होगा, इसलिए उस कालमें वृत्तिका अभाव होनेसे ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वाभावकी प्रसक्ति होगी और प्राथमिक ( आद्य ) मायाके प्रथम परिणाम ईक्षणमें और उस ईक्षणपूर्वक महाभूत आदिकी सृष्टिमें ब्रह्मकी स्रष्टता भी नहीं रहेगी ।
इस परिस्थितिमें ब्रह्मकी सर्ववस्तुविषयज्ञानात्मकता ही सर्वज्ञता होगी, सर्वज्ञानकर्तृत्त्वरूप नहीं होगी, ठीक है, सर्वविषयकज्ञानात्मकत्व ही सर्वज्ञत्व है, क्योंकि सर्वविषयकज्ञानस्वरूप ब्रह्म है, सर्वज्ञानकर्तृत्वरूप ज्ञातृत्व
साथ विरोध होगा ही, यदि इस अनुपपत्तिके परिहारके लिए सम्पूर्ण जड़ वस्तुएँ वृत्तिवाक्षित चैतन्यसे ही प्रकाशित होती हैं, यह अवधारणश्रुतिका अर्थ माना जाय, तो ब्रह्मचैतन्य भी मायावृत्तिकी अपेक्षा करके जड़ वस्तुको प्रकाशित कर सकता है, इसमें आपत्ति नहीं है ।
इस मतमें वृत्त्यनपेक्ष ब्रह्म स्वरूप ज्ञानसे ही सर्वावभासक होकर सर्वज्ञ है, यह कहा जाता है, क्योंकि 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतिके आधारपर प्रलयकालमें सब वृत्तियोंका विनाश प्रतीत होता है । इसलिए वृत्ति द्वारा, सृष्टिके पूर्वकालमें वृत्तिका अभाव होनेसे, 'तदैक्षत' ( उसने ईक्षण किया ) इस प्रकार ईक्षण नहीं हो सकता है । यहाँपर भी विचार करने लायक एक बात है—सृष्टिके पूर्वकालमें माया आदिकी सत्ताका अवश्य अङ्गीकार करना होगा, क्योंकि वेदान्तसिद्धान्तमें अविद्या आदि छः पदार्थ अनादि माने गये हैं । 'एकमेवाद्वितीयम्' इत्यादि अद्वितीयत्वके अवधारणको मुख्य नहीं मान सकते हैं, परन्तु माया आदिके अनादित्वकी प्रतिपादक श्रुतिके आधारपर व्याकृत—कार्य्यरूप द्वितीयसे रहित ब्रह्म था, यह 'अद्वितीयम्' का अर्थ करना होगा । इसी न्यायके अनुसार सर्वविषयकज्ञानकर्तृत्वप्रतिपादक श्रुतिके बलसे मायावृत्तिसे व्यतिरिक्त कोई द्वितीय वस्तु है ही नहीं, ऐसा अर्थ अद्वितीय श्रुतिका क्यों न किया जाय । और ईक्षत्यधिकरणमें भाष्यकारने भी मायावृत्तिसे ही सर्वज्ञत्वका समर्थन किया है ।
| १४२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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( उ. मी. अ. १ पा. ४ सू. १९ ) इत्याधिकरणे विज्ञातृत्वं जीवलिङ्गमित्युक्तं भाष्यकारैः । 'यः सर्वज्ञः' इत्यादिश्रुतिरपि तस्य ज्ञानरूपत्वाभिप्रायेणैव योजनीयेति ।
दृश्यावच्छिन्नरूपेण चितः कार्यत्वसम्भवात् ।
सार्वज्ञ्यं ज्ञानकर्तृत्वं वाचस्पतिमते स्थितम् ॥ ६१ ॥
दृश्यावच्छिन्नरूपेण चैतन्य कार्यरूप हैं, अतः ज्ञानकर्तृत्व ही सर्वज्ञत्व है, ऐसा वाचस्पतिमिश्रका मत है ॥६१॥
यद्यपि ब्रह्म स्वरूपचैतन्येनैव स्वसंसृष्टसर्वावभासकम्, तथाऽपि तस्य स्वरूपेणाऽकार्यत्वेऽपि दृश्यावच्छिन्नरूपेण तु ब्रह्मकार्यत्वात् । 'यः सर्वज्ञः'
(सर्वज्ञत्व) ब्रह्ममें नहीं हैं अर्थात् ब्रह्म ज्ञाता नहीं है । इसीलिए 'वाक्यान्वयात् ※' इस अधिकरणमें भाष्यकारने विज्ञातृत्वका जीवके लिङ्गरूपसे कथन किया है । 'यः सर्वज्ञः' ( जो सर्वज्ञ ) इस श्रुतिकी भी ज्ञानरूपताके अभिप्रायसे ही योजना करनी चाहिए ।
† आचार्य वाचस्पतिमिश्र कहते हैं कि यद्यपि ब्रह्म अपनेसे सम्बद्ध सब वस्तुओंका अवभासक स्वरूपचैतन्यसे ही है, तथापि स्वरूपतः चैतन्यके उसके कार्य न होनेपर भी दृश्यावच्छिन्नरूपसे वह कार्य ही है, इससे 'यः सर्वज्ञः'
※ 'वाक्यान्वयात्', 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि श्रुतिमें द्रष्टव्यरूपसे कहा गया आत्मा जीव नहीं है, किससे ? इससे कि 'इदं सर्वमात्मा' ( यह सब आत्मरूप है ) इत्यादि श्रुति-वाक्य तात्पर्यवृत्तिसे सर्वात्मक ब्रह्ममें ही अन्वित हैं । 'विज्ञातारम्' इत्यादि वाक्यके आधारपर पूर्वोक्त श्रुतिस्थ आत्मासे जीवात्माका ग्रहण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उस वाक्यसे मुक्त पुरुषका ही बोधन होता है, अतः भूतपूर्वविज्ञातृत्व धर्मका, जो जीवमें ही था, अनुवादमात्र है, अतः द्रष्टव्य परमात्मा ही है, जीव नहीं । इसमें विज्ञातृत्व धर्म जीवलिङ्गतया ही उपन्यस्त है, ब्रह्मसाधारणविज्ञातृत्वका कथन नहीं है, अतः ब्रह्म स्वरूपतः सब वस्तुका प्रकाशक है, यह भाव है ।
† सब वेदान्तोंका लक्ष्य नित्य निर्विशेष चैतन्य ही है, अतः 'सर्वज्ञः' इसमें जो ज्ञाधातु .. है, उसका वाच्य यह नहीं हो सकता है, इसलिए उसका अर्थ विशिष्ट चेतन ही होगा, विशिष्ट चेतनके कार्य होनेसे 'सर्वज्ञः' में प्रत्ययार्थ जो कर्तृत्व है, उसकी उपपत्ति हो सकती है । ब्रह्ममें सर्वज्ञानकर्तृत्वप्रतिपादक श्रुति है, उसकी उपपत्ति होनेके लिए ज्ञातृत्व ईश्वरमें मानना होगा । जीवके लिङ्गरूपसे भाष्यकारने जो विज्ञातृत्वका कथन किया है, वह तो केवल वाक्यान्वयाधिकरणकी सिद्धान्तकोटिमें स्वीकृत निर्विशेष ब्रह्मसे व्यावृत्ति करनेके उद्देश्यसे है,
वृत्तिके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित १४३
इति ज्ञानजननकर्तृत्वश्रुतेरपि न कश्चिद्विरोध इति आचार्यवाचस्पतिमिश्राः ॥ ९ ॥
नन्वीश्वरवज्जीवोऽपि वृत्तिमनपेक्ष्य स्वरूपचैतन्येनेव किमिति विषयान्नावभासयति ?—
बुद्धौ संसृज्यते जीवः सर्वगो व्यक्तिजातिवत् ।
अन्यैस्तद्वृत्यपारूढो ज्ञाता विवरणे स्थितः ॥ ६२ ॥
जैसे गोत्व आदि जातिके व्यापक होनेपर भी उसका गोव्यक्तिमें ही सम्बन्ध होता है, वैसे ही जीवके व्यापक होनेपर भी उसका अन्तःकरणमें ही सम्बन्ध होता है, और अन्तःकरणकी वृत्तिके ऊपर आरूढ़ होकर अन्य विषयोंके साथ उसका सम्बन्ध होता है, अतः वह (जीव) ज्ञाता होता है, ऐसा विवरणमें कहा गया है ॥६२॥
अत्रोक्तं विवरणे—ब्रह्मचैतन्यं सर्वोपादानतया सर्वतादात्म्यापन्नं सत् स्वसंसृष्टं सर्वमवभासयति, न जीवचैतन्यम् । तस्याऽविद्योपाधिकतया
इत्यादि ज्ञानजननकर्तृत्वकी (ज्ञानोत्पत्तिके प्रति कर्तृत्वकी) प्रतिपादक श्रुतिके साथ कोई भी विरोध नहीं है ॥ ९ ॥
शङ्का होती है कि ईश्वरकी नाईं जीव भी वृत्तिकी अपेक्षा न करके स्वरूपचैतन्यसे विषयोंका परिज्ञान (प्रकाश) क्यों नहीं करता है * ?
इसके ऊपर विवरणकारने यह समाधान किया है—ब्रह्मचैतन्य सभीका उपादान है, इसलिए सभीके साथ तादात्म्यरूप होकर स्वसम्बद्ध सब पदार्थोंका प्रकाश करता है, न कि जीवचैतन्य; कारण कि यद्यपि वह अविद्योपाधिक होनेसे
क्योंकि भाष्यकारने ही ईक्षत्यधिकरणमें सर्वविषयकज्ञानकर्तृत्व कहा है, इसलिए पूर्वपक्षमें कोई जीव नहीं है, इसी आशयसे श्रीवाचस्पतिमिश्रके पक्षका उपक्रम है। माया यद्यपि अनादि है, तथापि तत्तन् कार्योंके साथ मायाका तादात्म्य होनेसे मायावच्छिन्न चैतन्य कार्य हो सकता है, इसलिए 'दृष्टावच्छिन्नरूपेण तु घटाद्यकार्यत्वात्' इस ग्रन्थकी अनुपपत्ति नहीं है ।
* यदि वृत्तिकी अपेक्षा न करके जीव भी सब वस्तुओंका अवभासक हो, तो आपत्ति यह होगी कि अविद्याप्रतिबिम्बितचैतन्यरूप जीवके व्यापक होनेसे अपनेसे सम्बद्ध यावत् वस्तुका प्रकाशक होनेसे जीव भी सर्वज्ञ प्रसक्त होगा, अतः जीवको स्वरूपज्ञानसे अवभासक नहीं मानना चाहिए। और स्वरूपचैतन्यको किसी करणकी अपेक्षा न होनेसे चक्षु आदि व्यर्थ ही प्रसक्त होंगे।
| १४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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सर्वगतत्वेऽप्यनुपादानत्वेनाऽसङ्गित्वात् । यथा सर्वगतं गोत्वसामान्यं स्वभावादश्वादिव्यक्तिसङ्गित्वाभावेऽपि सास्नावद्व्यक्तौ संसृज्यते, एवं विषयासङ्ग्यपि जीवः स्वभावादन्तःकरणे संसृज्यते । तथा च यदाऽन्तःकरणस्य परिणामो वृत्तिरूपो नयनादिद्वारेण निर्गत्य विषयपर्यन्तं चक्षूरश्मिवत् झटिति दीर्घप्रभाकारेण परिणम्य विषयं व्याप्नोति, तदा तमुपारुह्य तं विषयं गोचरयति । केवलाग्न्यदाह्यस्याऽपि तृणादेरयःपिण्डसमारूढाग्निदाह्यत्ववत् केवलजीवचैतन्याप्रकाशयस्याऽपि घटादेरन्तःकरणवृत्त्युपारूढस्य तत्प्रकाशयत्वं युक्तम् ।
यद्वाऽन्तःकरणोपाधिर्जीवो वृत्त्या बहिर्गतः ।
विषयब्रह्मचैतन्याभेदव्यक्त्याऽर्थभासकः ॥ ६३ ॥
अथवा अन्तःकरणोपाधिक जीव वृत्तिद्वारा बाहर निकलकर विषयचैतन्य और ब्रह्मचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्तिसे अर्थका अवभासक होता है ॥६३॥
यद्वाऽन्तःकरणोपाधिकत्वेन जीवः परिच्छिन्नः । अतः संसर्गाभावान्न
सर्वगत है, तो भी विषयोंके प्रति अनुपादान होनेसे घट आदिके साथ उसका सम्बन्ध नहीं है। जैसे गोत्व जाति व्यापक है, तथापि उसका स्वभावसे अश्व आदि व्यक्तिके साथ सम्बन्ध नहीं है, परन्तु सास्त्रावाली गो व्यक्तिमें ही उसका सम्बन्ध है, वैसे ही जीवके विषयासङ्गी होनेपर भी वह स्वभावतः अन्तःकरणके साथ संसृष्ट होता है। इस रीतिसे जीवका स्वभावतः विषयके साथ सम्बन्ध न होनेपर जब नेत्र आदि द्वारसे अन्तःकरणका वृत्तिरूप परिणाम विषयदेश तक निकलकर चक्षुकी रश्मिके समान सहसा बड़ी प्रभाके आकारसे परिणत होकर विषयको व्याप्त करता है, तब जीवचैतन्य उस परिणामके ऊपर चढ़कर उस विषयको प्रकाशित करता है। जैसे तृण आदिका केवल शुद्ध अग्निसे दाह नहीं होता है, परन्तु अयोगोलक आदिके ऊपर आरूढ़ होकर तृण आदिको अग्नि दग्ध करती है, वैसे ही केवल जीवचैतन्यसे विषयका प्रकाश न होनेपर भी वृत्तिके ऊपर आरूढ़ होकर जीवचैतन्य विषयका प्रकाश करता है, यह मानना युक्त है।
अथवा जीव अन्तःकरणोपाधिक चैतन्य है, अतः वह परिच्छिन्न है। इसलिए विषयके साथ उसका सम्बन्ध न होनेसे घट आदिका प्रकाश नहीं
वृत्तिके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित १४५
घटादिकमवभासयति। वृत्तिद्वारा तत्संसृष्टविषयावच्छिन्नब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्तौ तु तं विषयं प्रकाशयति।
अथवा सर्वगोऽविद्यावृतोऽसौ न प्रकाशते ।
बुद्धावनावृतो वृत्तिर्भङ्गावरणभासकः ॥ ६४ ॥
अथवा यद्यपि जीव व्यापक और अन्तःकरणावच्छेदेन अनावृत है, तथापि अविद्यावृत होनेसे स्वयं अप्रकाशमान होकर विषयोंका प्रकाश नहीं करता है। वृत्तिद्वारा आवरणका भङ्ग होनेपर तो विषयोंका प्रकाश करता है ॥६४॥
अथवा जीवः सर्वगतोऽप्यविद्यावृतत्वात् स्वयमप्यप्रकाशमानतया विषयाननवभासयन् विषयविशेषे वृत्त्युपरागादावरणतिरोधानेन तत्रैवाऽभि-
कर सकता है। वृत्तिके द्वारा वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ सम्बद्ध विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके साथ अन्तःकरणावच्छिन्न जीवचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेसे तो वह जीवचैतन्य घट आदि विषयका प्रकाश करता है * ।
† अथवा जीवके सर्वगत होनेपर भी अविद्यावृत होनेसे वह स्वयं भी
* पहला परिहार—जीवको अविद्याप्रतिबिम्ब मान कर और उसे व्यापक स्वीकार करके किया गया है। इस ‘यद्वा’ पक्षमें जीवको अन्तःकरणोपाधिक मान कर उसे परिच्छन्न माना है, अतः इस मतमें सर्वज्ञत्वकी शङ्का ही नहीं है, क्योंकि स्वल्प परिमाणवाले जीवका विषयोंके साथ संबन्ध न होनेसे वृत्तिके बिना वह प्रकाश नहीं कर सकता है, यह भाव है। इस मतमें अभेदाभिव्यक्ति ही वृत्तिका प्रयोजन है, इस पक्षका अवलम्बन करके वृत्ति द्वारा विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेके बाद ही विषयोंका प्रकाश होगा, यह विशेष है।
† अविद्याप्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, इस प्रथम पक्षको मान कर इस ‘अथवा’ कल्पसे परिहार करते हैं । यद्यपि इस पक्षमें जीव व्यापक और जगत्के प्रति अनुपादान है, तथापि उसका संसर्ग माना जाता है। ‘सर्वगतोऽपि’ इसको उपलक्षण मान कर ‘विषयसंसृष्टोऽपि’ (विषयके साथ संसृष्ट होनेपर भी) यह भी जानना चाहिए। अन्यथा यह शङ्का मूलमें हो सकती है कि जीवके व्यापक होनेपर भी विषयोंके साथ उसका संसर्ग न होनेसे जीव विषयका प्रकाश नहीं करता है, यह कह सकते हैं, फिर आवृत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यद्यपि ‘मां न जानामि’ (मैं अपनेको नहीं जानता हूँ) इस प्रकारका अनुभव नहीं होता है, इसलिए जीव आवृत नहीं हो सकता है, यह शङ्का हो सकती है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणोपहित चैतन्य ही ‘माम्’ प्रतीतिका विषय होनेसे व्यापक जीवचैतन्यमें अन्तःकरणावच्छेदरूपसे आवृतत्वके न रहनेपर भी विषयदेशमें वह आवृत ही है, और ‘व्यापकरूपसे मैं अपनेको नहीं जानता हूँ’ इस प्रकारका अनुभव भी होता है।
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