सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| १५८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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पुनः कन्दलनादन्येऽनावृतिं वृत्त्यनेहसम् ।
अज्ञोऽहमिति विज्ञानात् स्वाश्रितेनाऽप्यनावृतिम् ॥ ७४ ॥
पुनः आवरणके होनेसे वृत्तिकालपर्य्यन्त विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण न रहना ही आवरणभंग है। 'मैं अज्ञ हूँ' इत्यादि अनुभवसे अहमर्थके अज्ञानाश्रय होनेपर भी अहमर्थको वह आवृत नहीं करता है ॥ ७४ ॥
अन्ये तु—अज्ञानस्यैकदेशेन नाशे उपादानाभावात् पुनस्तत्र कन्दलनायोगेन संकृदपगते समयान्तरेऽप्यावरणाभावप्रसङ्गात्, निष्क्रियस्याऽपसरणसंवेष्टनयोरसम्भवाच्च न यथोक्तरूपोऽभिभवः सम्भवति । अतः चैतन्यमात्रावारकस्याऽप्यज्ञानस्य तत्तदाकारवृत्तिसंसृष्टावस्थविषयावच्छिन्नचैतन्यानावारकत्वस्वाभाव्यमेवाभिभवः । न च विषयावगुण्ठनपटवद्विषयचैतन्यमाश्रित्य स्थितस्याज्ञानस्य कथं तदनावारकत्वं युज्यते इति शङ्क्यम्, 'अहमज्ञः' इति प्रतीत्याऽहमनुभवे प्रकाशमानचैतन्यमाश्रयत एव तस्य तदनावारकत्वप्रतिपत्तेरित्याहुः ।
युद्धमें डरे हुए योद्धाके समान अज्ञान ज्ञान द्वारा विषयावच्छिन्न प्रदेशसे पलायन करता है, वही आवरणाभिभव है।
कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अज्ञानका एकदेशसे विनाश, संवेष्टन या अपसरण आवरणाभिभव नहीं है, क्योंकि अज्ञानका एकदेशसे विनाश होनेपर उपादान कारणके न रहनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशमें फिर आवरणकी उत्पत्ति नहीं होगी, इस प्रकार एक बार अज्ञानका नाश होनेपर अन्य समयमें भी आवरणाभावका प्रसङ्ग होगा और क्रियारहित अज्ञानका वेष्टन या अपसरण भी नहीं हो सकता है। इससे चैतन्यमात्रके आवरक ( आवरणकर्ता ) अज्ञानका तत्-तत् विषयाकार वृत्तिसे सम्पृक्त अवस्थावाले विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण न करना—यह जो स्वभाव है वही स्वभाव आवरणाभिभव है । परन्तु जैसे घट आदि विषयका अवगुण्ठन करके अर्थात् घटको व्याप्तकर स्थित पट घटको आवृत करता है वैसे ही अज्ञान भी विषयचैतन्यको आवृत करेगा ही, तो यह कल्पना कैसे हो सकती है कि उसका अनावारकत्व स्वभाव है। यदि इस प्रकार शङ्का की जाय तो युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहमज्ञः' 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है, इसलिए 'अहम्' अनुभवमें प्रकाशमान जीवचैतन्यका अज्ञान
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १५९
वृत्तिनाश्यं परे वृत्तिसमसङ्ख्यं प्रचक्षते ।
अवस्थाज्ञानमज्ञानं नष्टमित्यनुभूतितः ॥ ७५ ॥
वृत्तिसे नष्ट होनेवाले और संख्यामें वृत्तिके बराबर अवस्थारूप अज्ञान अनेक हैं, क्योंकि 'एक अज्ञान नष्ट हुआ' ऐसा अनुभव होता है, यहाँ वृत्तिसे अवस्थारूप अज्ञानका विनाश आवरणभंग है ॥ ७५ ॥
अपरे तु—‘घटं न जानामि’ इति घटज्ञानविरोधित्वेन, घटज्ञाने सति घटाज्ञानं निवृत्तमिति तन्निवर्त्यत्वेन चाऽनुभूयमानं न मूलाज्ञानम् । शुद्धचैतन्यविषयस्य तज्ज्ञाननिवर्त्यस्य च तस्य तथात्वायोगात् । किन्तु घटावच्छिन्नचैतन्यविषयं मूलाज्ञानस्यावस्थाभेदरूपमज्ञानान्तरमिति तन्नाश एवाऽभिभवः । न चैवमेकेन ज्ञानेन तन्नाशे तत्समानविषयाणां ज्ञानान्तराणामावरणाभिभावकत्वानापत्तिः । यावन्ति ज्ञानानि, तावन्ति अज्ञानानीत्यभ्युपगमादित्याहुः ।
आश्रय करता ही है, परन्तु वह अज्ञान उसको आवृत नहीं करता, यह भी ज्ञात होता है, [ अतः पटदृष्टान्तसे यह विलक्षण है, और दहराधिकरणमें जीवको आवृत माननेमें सभी व्यवहारोंकी लोपप्रसक्ति होगी, ऐसा साधन किया है, और इस ग्रन्थमें साक्षी चैतन्यकी अनावृति भी कहेंगे, यह भाव है ]
कुछ लोग कहते हैं कि ‘घटं न जानामि’ ( मैं घटको नहीं जानता हूँ ) इस प्रकार घटज्ञानके विरोधीरूपसे और ‘घटज्ञान होनेपर घटका अज्ञान निवृत्त हुआ’ इस प्रकार घटज्ञानके निवर्त्यरूपसे अनुभूयमान अज्ञान मूलाज्ञान नहीं है, कारण कि शुद्धचैतन्यविषयक शुद्धचैतन्यज्ञानसे निवृत्त होनेवाला अज्ञान घटावच्छिन्नचैतन्यविषयक और घटज्ञानसे निवर्त्य नहीं हो सकता । परन्तु घटावच्छिन्न चैतन्यको अवलम्बन करनेवाले मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष कोई अन्य ही अज्ञान है, इसलिए उस अवस्थाविशेषरूप अज्ञानका विनाश ही आवरणाभिभव है । एक ज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानका नाश होनेपर तत्समानविषयक अन्य ज्ञान आवरणके नाशक नहीं होंगे, यह आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जितने ( संसारमें ) ज्ञान हैं, उतने ही अज्ञान भी हैं, ऐसा स्वीकार है ।
| १६० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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केचिदूचुरनादीदं मूलाज्ञानमिव—
कोई लोग कहते हैं कि अवस्थारूप अज्ञान मूलाज्ञानके समान अनादि है ।
इमानि चाऽवस्थारूपाणि अज्ञानानि मूलाज्ञानवदज्ञानत्वादनादीनीति केचित् ।
इतरे ।
सादि निद्रादिवत्, तत्रानादित्वे कस्य नाश्यता ॥ ७६ ॥
अन्य लोग कहते हैं कि अवस्थारूप अज्ञान निद्रा आदिके समान सादि है, यदि अवस्थारूप अज्ञानको अनादि मानें तो नाश किसका होगा ?
व्यावहारिकौ जगज्जीवावावृत्य स्वाप्नौ जगज्जीवौ विक्षिपन्ती निद्रा तावदावरणविक्षेपशक्तियोगात् अज्ञानावस्थाभेदरूपा । तथा निद्रा सुषुप्तावस्थाऽप्यन्तःकरणादौ विलीने 'सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषम्' इति परामर्शदर्शनात् मूलाज्ञानवत् सुषुप्तिकाले अनुभूयमानाज्ञानावस्थाभेदरूपैव । तयोश्च जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सत्येवोद्भवात् सादित्वम्, तद्वद् अन्यदप्य-
कुछ लोग यह कहते हैं कि जो ये अवस्थारूप अज्ञान हैं, वे सबके सब मूल अज्ञानके समान अनादि ही हैं, क्योंकि अज्ञानत्व धर्म अवस्थारूप अज्ञानमें भी है * ।
जाग्रत् अवस्थाके जगत् और जीवका आवरण करके स्वप्नावस्थावाले जगत् और जीवकी उत्पत्ति करती हुई निद्रा अज्ञानकी ही विशेष अवस्था है, क्योंकि निद्रामें भी आवरण और विक्षेपशक्तिका योग है । इसी प्रकार अन्तःकरण आदिके विलीन होनेपर 'मैं सुखसे सोया था, मैंने कुछ भी नहीं जाना' इस प्रकारके स्मरणके देखनेसे सुषुप्तिकालमें मूलाज्ञानके समान अनुभूयमान सुषुप्ति अवस्था भी अज्ञानकी विशेष अवस्था ही है । जाग्रत्कालीन भोगके देनेवाले कर्मका क्षय होनेपर ही निद्रा और सुषुप्तिकी उत्पत्ति होती है, अतः वे सादि...
* अवस्थाऽज्ञानानि अनादीनि, अज्ञानत्वात्, मूलाज्ञानवत्, अर्थात् अवस्थारूप अज्ञान अनादि हैं, अज्ञानत्व होनेसे, मूलाज्ञानके समान, यह अनुमानप्रमाण अवस्थारूप अज्ञानके अनादित्वका साधक है । देवताधिकरणमें ( ब्र० सू० अ० १ पा० ३ सू० २६ ) इस मूल अज्ञानको अनादि सिद्ध किया है, अतः दृष्टान्तासिद्धि नहीं है ।
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६१
ज्ञानमवस्थारूपं सादीत्यन्ये । नन्वनादित्वपक्षे घटे प्रथममुत्पन्नेनैव ज्ञानेन सर्वतदज्ञाननाशो भवेत्, विनिगमनाविरहात्; तदवच्छिन्नचैतन्यावरकसर्वाज्ञानानाशे विषयप्रकाशा-योगाच्च। अतः पाश्चात्त्यज्ञानानामावरणानभिभावकत्वं तदवस्थमेवेति चेत्,
है, इसीके समान अन्य घटादिविषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करनेवाला अज्ञान भी सादि † है।
[ यदि अवस्थारूप अज्ञान सादि माने जायँ, तो प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे पूर्वकालिक घटका आवरण करके स्थित अज्ञानका नाश होनेपर भी पुनः उत्पन्न अवस्थारूप अज्ञानसे उसका आवरण होगा, इससे सादिपक्षमें तो व्यवस्था हो सकती है, परन्तु अनादित्वपक्षमें व्यवस्था नहीं हो सकती, यह शङ्का करते हैं—] अज्ञानके अनादित्वपक्षमें प्रथम उत्पन्न घटविषयक ज्ञानसे ही सम्पूर्ण घटविषयक अज्ञानका नाश होगा, क्योंकि 'प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही अज्ञान नष्ट होता है, अन्य अज्ञान नष्ट नहीं होते, इसमें कोई विनिगमक (युक्तिविशेष) नहीं है और घटावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करनेवाले सम्पूर्ण अज्ञानका विनाश न माना जाय, अर्थात् प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे एक आवरण अज्ञानका नाश माना जाय, तो [ एक आवरणके विनष्ट होनेपर भी अन्य आवरणोंके रहनेसे ] विषय-प्रकाशकी अनुपपत्ति होगी, [ अर्थात् एक आवरणका नाश होनेपर भी अन्य आवरणोंसे घट आदिके आवृत होनेसे घटादिका कदापि प्रकाश होगा ही नहीं, अतः सम्पूर्ण आवरणोंका एक ज्ञानसे नाश मानना होगा, यह भाव है,]। इससे—प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे सम्पूर्ण अज्ञानका नाश माननेसे—उत्तरकालीन ज्ञान आवरणके अभिभावक नहीं होंगे, यह दोष तदवस्थ ही है, अर्थात् प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे ही घटके सब आवरणोंका विनाश हुआ, तो उत्तरज्ञान—द्वितीय कालमें उत्पन्न हुआ घटज्ञान—किस आवरणका विनाश
† विमतानि अवस्थाऽज्ञानानि सादिमन्ति, अवस्थाज्ञानत्वात्, निद्रावत्, सुप्तिवच्च; अर्थात् अवस्थारूप अज्ञान सादि है, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानत्व धर्म उनमें है, निद्रा और सुप्ति रूप अवस्थाऽज्ञानके समान, इस अनुमानसे उन अवस्थारूप अज्ञानोंमें सादित्वकी सिद्धि की जाती है, पूर्वोक्त अनादित्वसाधक अनुमानसे विरोध नहीं है, क्योंकि वह अनुमान मूलाज्ञानमें ही अनादित्वका साधक है, अवस्थारूप अज्ञानमें नहीं। मूलाज्ञानमें अनादित्वका सिद्धान्तमें अभ्युपगम है, अतः सिद्धान्तसे विरोध नहीं है।
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| १६२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अत्र केचित् स्वभावेन व्यवस्थां प्रागभाववत् ।
सत्स्वप्यावरकेष्वर्थप्रकाशं च प्रचक्षते ॥ ७७ ॥
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि प्रागभावके समान आवारक अज्ञानोंके रहते हुए भी विषयोंका प्रकाश और व्यवस्था स्वभावतः हो सकती है ॥७७॥
अत्र केचिदाहुः—यथा ज्ञानप्रागभावानामनेकेषां सत्त्वेऽप्येकज्ञानोदये एक एव प्रागभावो निवर्तते । संशयादिजननशक्ततया तदावरणरूपेषु प्रागभावान्तरेषु सत्स्वपि विषयावभासः । तथैकज्ञानोदये एकमेवाऽज्ञानं निवर्तते, अज्ञानान्तरेषु सत्स्वपि विषयावभास इति ।
करेगा ? किसीका नहीं, क्योंकि आवरण रहे, तो उसका नाश करे, परन्तु आवरण तो है ही नहीं, यह शङ्काका तात्पर्य है ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे ज्ञानके प्रागभावोंके अनेक होनेपर भी एक ज्ञानकी उत्पत्तिसे एक ही ज्ञानके प्रागभावका विनाश होता है । संशय, विपर्यय आदिकी उत्पत्तिमें समर्थ ज्ञानके आवरणरूप अन्य प्रागभावोंके रहते हुए भी विषयका अवभास होता है, वैसे ही एक ज्ञानके उदयसे एक ही अज्ञानका निवर्तन होता है और अन्य अज्ञानोंके रहते हुए भी विषयोंका अवभास होता है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि नैयायिकोंके मतमें चार प्रकारके अभाव हैं—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव । इनमें प्रागभाव है—वस्तु सत्ताके पूर्वकालमें प्रतीत होनेवाला और वस्तुके उत्पन्न होनेपर नष्ट होनेवाला अभाव, जितने घट या घटज्ञान आदि होते हैं, उतने ही उनके प्रागभाव होते हैं। प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही ज्ञानप्रागभावकी निवृत्ति होती है और अन्य प्रागभाव यथापूर्व रहते हैं, उन दूसरे प्रागभावोंके रहते हुए भी न्यायमतमें विषयका प्रकाश माना जाता है, इसी प्रकार प्रकृतमें इतर आवरणोंके रहते हुए भी प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही आवरणका विनाश होगा और विषयका प्रकाश होगा, इसमें कोई बाधा नहीं है । यद्यपि यहांपर यह शङ्का हो सकती है कि अभावरूप प्रागभाव विषयका आवारक नहीं है और भावरूप अज्ञान-विषयोंको आवृत करता है, इसलिए यह दृष्टान्त असङ्गत है, तथापि यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञानमें आवारकत्व यही है कि अज्ञातत्वरूपसे अभिमत वस्तुमें संशय, विपर्यय आदिके जननमें ( उत्पादनमें ) सामर्थ्य, उसे नैयायिक ज्ञानप्रागभावमें भी मानते हैं, इसलिए दृष्टान्तकी असङ्गति नहीं है ] ।
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६३
विशेषदर्शनाभावकूटात् संशयसम्भवात् ।
आवृतस्याऽप्रकाशाच्च पर्यायेणाऽऽवृतिं परे ॥ ७८ ॥
विशेषदर्शनके अभावसमुदायसे संशयका सम्भव है और आवृतका अप्रकाश होनेसे क्रमशः अज्ञान विषयको आवृत करते हैं, अर्थात् एक ज्ञानसे एक अज्ञानकी निवृत्ति होगी अनन्तर उसका उपशम होनेपर अन्य अज्ञान आवरण करेगा, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ७८ ॥
अन्ये तु—आवृतस्याऽऽपरोक्ष्यं विरुद्धम् । एकज्ञानोदये च प्राग्भावान्तरसत्त्वेऽपि यावद्विशेषदर्शनाभावकूटरूपमावरणं विशेषदर्शनान्नास्तीति मन्यमाना वदन्ति—यदा यदज्ञानमावृणोति, तदा तेन ज्ञानेन तस्यैव नाशः । सर्वं च सर्वदा नाऽऽवृणोति, वैयर्थ्यात् । किन्त्वावरकाज्ञाने वृत्त्या नाशिते तद्वृत्त्युपशमे अज्ञानान्तरमावृणोति ।
पर्वतीय वह्नि आदि जो आवृत हैं, उनका आपरोक्ष्य नहीं माना जाता है, किन्तु सिद्धान्तमें उनका परोक्ष ज्ञान ही माना गया है । एक ज्ञानके उदित होनेपर अन्य प्राग्भावोंकी सत्तामें भी * सम्पूर्ण विशेषदर्शनका अभाव-समुदायरूप जो आवरण है, वह विशेषके दर्शनसे है ही नहीं, ऐसा मानते हुए कुछ लोग कहते हैं कि जिस कालमें जो अज्ञान जिस वस्तुका आवरण करता है, उस कालमें उस वस्तुके ज्ञानसे उसी अज्ञानका नाश होता है। सब अज्ञान सर्वदा आवृत्त नहीं करते, क्योंकि ऐसा मानना व्यर्थ है, परन्तु अन्य वृत्तिसे आवरण करनेवाले अज्ञानका नाश होनेपर, उस वृत्तिका जब उपशम होता है, तब अन्य अज्ञान उसको आवृत्त करता है ।
* भाव यह है कि स्थाणु आदिमें अर्थात् स्थाणु आदिविषयक—संशयात्मक ज्ञानको उत्पन्न करनेमें—संशय आदिके प्रति विरोधिभूत विशेष दर्शनका प्राग्भावमात्र समर्थ नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर 'अयं स्थाणुः' ( यह स्थाणु है ) इस प्रकारके निश्चयकालमें भी समानविषयक अन्य निश्चयका प्राग्भाव होनेसे पुरुषत्वकी स्मृतिवाले पुरुषको फिर संशयकी आपत्ति होगी, इसलिए नैयायिक यह मानते हैं कि संशय आदिके समानविषयक जितने निश्चयात्मक ज्ञान हैं, उन सबके प्राग्भावोंका समुदाय संशय आदिकी उत्पत्तिमें समर्थ है और वही आवरण है । एकके निश्चयकालमें आवरणरूपसे सम्मत सम्पूर्ण विशेष दर्शन प्राग्भावकूटरूप विशेषदर्शनका अभाव होनेसे पुनः संशयकी आपत्ति नहीं हो सकती है और प्राथमिक घटज्ञानकालमें न्यायमतमें विषयप्रकाशकी अनुपपत्ति भी नहीं हो सकती है, क्योंकि प्राग्भावकूटरूप आवरण नहीं है । इसलिए 'संशयादिजनक-
| १६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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न चाऽनावरकाज्ञानशेषो मुक्तौ प्रसज्यते ।
मूलाज्ञानच्छिदा छेद्यास्तदवस्था इमा यतः ॥ ७९ ॥
मुक्ति अवस्थामें आवरण न करनेवाले अज्ञानोंका अवशेष प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि उस दशामें मूलाज्ञानका विनाश होनेसे अवस्थारूप अज्ञान भी विनष्ट होते हैं ॥७९॥
न चैवं ब्रह्मावगमोत्पत्तिकालेऽनावरकत्वेन स्थितानामज्ञानानां ततोऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्गः । तेषां साक्षाद्विरोधित्वाभावेऽपि तन्निवर्त्यमूलाज्ञानपरतन्त्रतया अज्ञानसम्बन्धादिवत् तन्निवृत्त्यैव निवृत्त्युपपत्तेः । एतदर्थमेव तेषां तदवस्थाभेदरूपतया तत्पारतन्त्र्यमिष्यत इति ।
यदि सर्वदा सब अज्ञान आवारक न हों, तो ब्रह्मज्ञानके उत्पत्तिकालमें अनावारक ( आवरण नहीं करनेवाले ) रूपसे विद्यमान अज्ञानोंकी ब्रह्मज्ञानसे भी निवृत्ति नहीं होगी, [ भाव यह है कि ब्रह्मज्ञानके उत्पत्तिकालमें मूूल अज्ञानके समान अवस्थाऽज्ञान भी ब्रह्मचैतन्यको विषय प्रदेशमें आवृत करके रहेंगे, तो ब्रह्मज्ञानसे ब्रह्मविषयक मूलाज्ञानकी नाईं उन चैतन्यके आवारक अवस्थारूप अज्ञानोंकी भी निवृत्ति होगी, यदि अवस्थारूप अज्ञान आवारकरूप नहीं होंगे, तो उनकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि समानविषयमें ज्ञानाज्ञानका निवर्त्यनिवर्तकभाव होनेसे ब्रह्मज्ञानका समानविषयक अवस्थारूप अज्ञान नहीं है ] । नहीं, ब्रह्मज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानोंकी भी निवृत्ति होगी, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानोंके साक्षात् ब्रह्मज्ञानके विरोधी न होनेपर भी वे ( अवस्थारूप अज्ञान ) ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त होनेवाले मूलाज्ञानके परतन्त्र अधीन हैं, इसलिए जैसे अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर अज्ञानपरतन्त्र चैतन्य और अज्ञानके सम्बन्धकी निवृत्ति होती है, वैसे ही अज्ञानकी निवृत्तिसे ही अवस्थारूप अज्ञानकी भी निवृत्ति होती है। जैसे अज्ञानकी निवृत्तिसे संसारकी निवृत्ति होनेसे संसार अज्ञानपरतन्त्र माना जाता है, वैसे ही अज्ञानकी निवृत्तिसे अवस्थारूप अज्ञानके निवृत्त होनेसे घटादिविषयक अज्ञान, मूलाज्ञानके अवस्थाविशेषरूप होनेसे, मूलाज्ञानके अधीन माने जाते हैं।
तया' इत्यादिसे जो पूर्वमें दृष्टान्त दिया गया है, वह नहीं घटता है, इसी अस्वरससे यह 'अन्ये तु' मत है।
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६५
अन्ये त्वेकस्य विच्छेदमितरेषां पराभवम् ।
तं चावरणशक्तीनां प्रतिबन्धं प्रचक्षते ॥ ८० ॥
कोई लोग कहते हैं कि एक ज्ञानसे एक ही अज्ञानका नाश होता है और इतरोंका पराभव होता है, और अज्ञानोंकी आवरणशक्तियोंका प्रतिबन्ध पराभव कहा जाता है ॥८०॥
अपरे तु—अज्ञानस्य सविषयत्वस्वभावत्वात् उत्सर्गतः सर्वं सर्वदाऽऽवृणोत्येव । न च विषयोत्पत्तेः प्रागावरणीयाभावेनाऽऽवरकत्वं न युज्यते इति वाच्यम् , तदाऽपि सूक्ष्मरूपेण तत्सत्त्वादिति मन्यमानाः कल्पयन्ति--यथा बहुजनसमाकुले प्रदेशे कस्यचित् शिरसि पतन्नशनिरितरानप्यपसारयति ।
यथा वा सन्निपातहरमौषधमेकं दोषं निवर्तयद्दोषान्तरमपि दूरीकरोति, एवमेकमज्ञानं नाशयत् ज्ञानमज्ञानान्तराण्यपि तिरस्करोति । तिरस्कारश्च यावद् ज्ञानस्थितिः तावद् आवरणशक्तिप्रतिबन्ध इति ।
अज्ञानका सविषयत्व स्वभाव है अर्थात् अज्ञान किसी विषयका अवलम्बन किये बिना नहीं रहता, इससे स्वभावतः सभी अज्ञान अपनी सत्त्वदशामें सदा विषयका आवरण करते ही हैं । यदि यह शङ्का हो कि घट आदि विषयकी उत्पत्तिके पूर्वमें * आवरणीय ( आवरण करने योग्य ) विषयके न रहनेसे आवरकत्वकी उपपत्ति नहीं होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिके पूर्वकालमें भी सूक्ष्मरूपसे वह कार्य है, अतः आवरकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, ऐसा मानते हुए कुछ लोग कल्पना करते हैं कि जैसे अनेक जनोंसे युक्तदेशमें किसी एक पुरुषके मस्तकके ऊपर गिरता हुआ वज्र अन्य पुरुषोंको हटा देता है ।
अथवा जैसे सन्निपातको हरण करनेवाली औषधि एक दोषका विनाश करती हुई अन्य दोषोंका भी निराकरण करती है, इसी प्रकार एक अज्ञानका विनाश करता हुआ ज्ञान इतर अज्ञानोंका भी तिरस्कार करता है । और जब तक ज्ञानकी स्थिति रहती है, तब तक आवरणशक्तिका प्रतिबन्ध होता है ।
* तात्पर्य यह है कि इस मतमें यह कहते हैं कि सब अज्ञान सब विषयोंको सदा आवृत्त करते हैं, इसलिए घटकी उत्पत्तिके पूर्वमें घट आदि विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करता है, यह प्रतीत होता है, परन्तु यह नहीं हो सकता, क्योंकि अज्ञानका सविषयत्व स्वभाव होनेसे विषयके न रहनेके कारण तदवच्छिन्न चैतन्यरूप आवरणीय भी नहीं है ।
| १६६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तत्र धारावहज्ञानेष्वाद्येनैव पराभवात् ।
अज्ञानानां द्वितीयादेः साफल्यं कथमुच्यते ॥ ८१ ॥
शङ्का होती है कि धारावाहिक स्थलमें प्रथम ज्ञानसे ही अज्ञानका विनाश होगा, फिर द्वितीय आदि ज्ञानोंकी सफलता कैसे होगी ? अर्थात् द्वितीयादि वृत्ति निरर्थक होगी यह भाव है ॥ ८१ ॥
नन्वेवं सति धारावाहिकस्थले द्वितीयादिवृत्तीनामावरणानभिभावकत्वे वैफल्यं स्यात्, प्रथमज्ञानेनैव निवर्तनतिरस्काराभ्यामावरणमात्रस्याभिभवादिति ।
अत्राहुर्दीपधारेव तिरस्कृत्य तमः स्थिता ।
वृत्तिधारेत्यनावारो वृत्तीनां क्षेमतः फलम् ॥ ८२ ॥
तमका तिरस्कार करके रहनेवाली दीपधाराके समान वृत्तिकी धारा है, अतः उन वृत्तियोंका आवरणाभिभव—आवरणप्रागभावरक्षण ही फल है, इस प्रकार पूर्वोक्त आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं ॥ ८२ ॥
अत्राहुः—वृत्तितिरस्कृतमप्यज्ञानं तदुपरामे पुनरावृणोति प्रदीपतिरस्कृतं तम इव प्रदीपोपरमे । वृत्त्युपरमसमये वृत्त्यन्तरोदये तु तिरस्कृतमज्ञानं तथैवाऽवतिष्ठते प्रदीपोपरमसमये प्रदीपान्तरोदये तम इव । तथा च
परन्तु एक ज्ञानसे एक अज्ञानका नाश होता है और अन्य अज्ञानोंका तिरस्कार होता है, ऐसा माननेमें धारावाहिक ज्ञानके स्थलमें द्वितीय आदि वृत्तियाँ आवरणकी अभिभावक न होनेसे निरर्थक हो जायँगी, क्योंकि प्रथम ज्ञानसे अज्ञानके निवर्तन और तिरस्कार—इन दोनोंसे आवरणशक्तिका निराकरण होता है ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे प्रदीपके विनष्ट होनेपर प्रदीप द्वारा तिरस्कृत अन्धकार ( घट आदिको ) आवृत करता है, वैसे ही वृत्तिद्वारा तिरस्कृत अज्ञान भी घटज्ञानके ( घटवृत्तिके ) विनष्ट होनेपर विषयको आवृत करता है । एक प्रदीपके विनाशकालमें यदि अन्य दीपका उदय हो, तो जैसे अन्धकारका विनाश और तिरस्कार होता है, वैसे ही यदि वृत्तिके उपरामकालमें
आवरणाभिभवस्वरूप-विचार ] भाषानुवादसहित १६७
'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सत्त्वम्, यद्व्यतिरेके चाऽसत्त्वम्, तत् तज्जन्यम्' इति प्रागभावपरिपालनसाधारणलक्षणानुरोधेनाऽनावरणस्य द्वितीयादिवृत्तिकार्यत्वस्याऽपि लाभान्न तद्वैफल्यमिति ।
पर्यायेणावृत्तिर्न्यायचन्द्रिकाकृद्भिरीरिता । अर्थस्य मोहैर्वेधेन स्वकालावरणक्षतिः ॥ ८३ ॥
घट आदि विषयका अज्ञानसे क्रमशः आवरण होता है और ज्ञानसे अपनी विद्यमान दशामें ही अज्ञानका नाश होता है, ऐसा न्यायचन्द्रिकाकारका मत है ॥८३॥
न्यायचन्द्रिकाकृतस्त्वाहुः— केनचिज्ज्ञानेन कस्यचिदज्ञानस्य नाश एव । न त्वावरकाणामप्यज्ञानान्तराणां तिरस्कारः । तथा च धारावाहिक-द्वितीयादिवृत्तीनामप्येकैकाज्ञाननाशकत्वेन साफल्यम् ।
अन्य ( तद्विषयक ) वृत्तिका उदय हो, तो वह अज्ञानतिरस्कृत ही * रहता है । इस परिस्थितिमें 'जिसके रहनेपर उत्तर क्षणमें जिसका अस्तित्व होता है और जिसके न रहनेपर जिसका अस्तित्व नहीं होता, वह तज्जन्य अर्थात् उससे उत्पन्न होता है, इस प्रागभावके परिपालनमें साधारणजन्यत्वके लक्षणानुरोधसे † द्वितीयादि वृत्तिका अनावरणरूप ( आवरणाभाव ) कार्यका भी लाभ हो सकता है, अतः द्वितीयादि वृत्तिका वैफल्य नहीं है ।
न्यायचन्द्रिकाकार कहते हैं—किसी एक ज्ञानसे किसी एक अज्ञानका नाश होता ही है, अन्य आवरक अज्ञानोंका तिरस्कार नहीं होता, इसलिए धारावाहिक दूसरी वृत्तियोंसे भी एक-एक अज्ञानका नाश होता है, अतः उनकी निष्फलता नहीं है ।
* तात्पर्य यह है कि 'यह घट है' इस प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान एक अज्ञानका विनाश करता है और अन्यका तिरस्कार, और वह तिरस्कृत अज्ञान घटज्ञानके विनाशकालमें फिर उसी विषयको आवृत करता है । यदि विशेष जाननेकी इच्छासे प्रथम उत्पन्न घटज्ञानके विनाश-समयमें अन्य घटप्रत्यक्ष उत्पन्न हो तो, वह तिरस्कृत अज्ञान वैसा ही रहता है ।
† तात्पर्य यह है कि सादि और अनादि साधारण जन्यत्व—साध्यत्वका यह लक्षण है, कि जिसके रहनेपर जो रहे और न रहनेपर न रहे, वह उससे जन्य है । इस लक्षणका समन्वय इस प्रकार है—यस्मिन् सति—जिसके रहनेपर अर्थात् दण्डके रहनेपर अग्रिम क्षणमें—उत्तरक्षणमें घटरूप कार्य रहता है और दण्डके न रहनेपर घटरूप कार्य नहीं रहता है, अतः घट दण्डसे साध्य है । वैसे ही प्रायश्चित्तके होनेपर उत्तरक्षणमें दुःखप्रागभावकी सत्ता है और उसके न रहनेपर नहीं है, अतः दुःखप्रागभावका प्रायश्चित्त
| १६८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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न चैवं ज्ञानोदयेऽप्यावरणसम्भवाद्विषयानवभासप्रसङ्गः । अवस्थारूपाण्यज्ञानानि हि तत्तत्कालोपलक्षितस्वरूपावरकाणि, ज्ञानानि च यावत्स्वकालोपलक्षितविषयावरकाज्ञाननाशकानि । तथा च किञ्चिज्ज्ञानोदये तत्कालीनविषयावरकाज्ञानस्य नाशात् विद्यमानानामज्ञानान्तराणामन्यकालीनविषयावारकत्वाच्च न तत्कालीनविषयावभासे काचिदनुपपत्तिः ।
यदि शङ्का हो कि प्रथम ज्ञानसे आवारक अन्य अज्ञानोंका तिरस्कार न माना जाय, तो प्रथम ज्ञानकी उत्पत्ति होनेपर भी विषयका प्रकाश नहीं होगा क्योंकि अन्य अज्ञानकृत आवरणोंका सम्भव है ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, कारण कि अवस्थारूप जो अज्ञान हैं, वे तत्-तत् कालसे उपलक्षित स्वरूपका आवरण करते हैं और ज्ञान अपनी अवस्थिति तकका जो सम्पूर्णकाल है उससे उपलक्षित विषयावच्छिन्न चैतन्यके आवरकरूपसे विद्यमान अज्ञानके विनाशक हैं । [ तात्पर्यार्थ यह है कि अवस्थारूप जितने अज्ञान हैं वे सबके सब मूलाविद्याके समान सर्वदा विषयावच्छिन्न चैतन्यको आवृत करनेवाले नहीं हैं, क्योंकि ऐसा मानना व्यर्थ है, किन्तु यह उचित है कि कुछ काल तक कोई अज्ञान विषयचैतन्यका आवरण करता है और कोई अन्य कालमें आवरण करता है, इस प्रकार कालकी सीमासे वे अवस्थारूप अज्ञान आवारक हैं सम्पूर्ण काल तक आवारक नहीं हैं । अतः प्रथम उत्पन्न घटविषयक ज्ञान अपनी स्थितिके यावत्कालमें तदावारक अज्ञानका अवश्य नाश करेगा, इसलिए ज्ञानके उदित होनेपर विषयके अनवभासका प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि ज्ञानका यह स्वभाव है कि अपने उदयकालमें अपने विषयको आवृत करके बैठे हुए अज्ञानका निवर्तन करता है, इसलिए उक्त शङ्काका अवसर नहीं है ] । इस प्रक्रियासे एक ज्ञानकालमें अज्ञानान्तरके अनावारकत्व सिद्ध होनेपर घटादिविषयक किसी एक ज्ञानके उत्पन्न होनेपर उस ज्ञानके उदयकालमें विषयावारक एक अज्ञानका नाश होता है, और उस कालमें विद्यमान इतर अज्ञान अन्य कालमें विषयोंको आवृत करते हैं, अतः तात्कालिक विषयके
से परिपालन होनेसे दुःखप्रागभाव प्रायश्चित्तसाध्य है। वैसे ही द्वितीय वृत्तिके उदयसे प्रथम ज्ञान सिद्ध आवरणतिरस्कारकी उत्तरक्षणमें सत्ता है और उसके न रहनेसे नहीं है, अतः द्वितीयावृत्तिका फल आवरणतिरस्कार हो सकता है, यह भाव है।
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६९
कारीरीफले वृष्टावासन्नसमयस्येवाऽज्ञानविषये घटादौ तत्कालस्योपलक्षणतया विषयकोटावननुप्रवेशेन सूक्ष्मतत्कालभेदाविषयैर्धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानैरज्ञानानां निवृत्तावपि न काचिदनुपपत्तिरिति ।
केचिदाहुर्घटाज्ञानमाद्यज्ञानेन हन्यते ।
द्वितीयाद्यैस्तु कालादिविशिष्टाज्ञानबाधनम् ॥ ८४ ॥
अवभासमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । जैसे कारीरीके फलभूत वृष्टिमें आसन्न समयके (कारीरीनामक इष्टिसमाप्तिके उत्तरक्षणके) उपलक्षण होनेसे विषयकोटिमें प्रवेश नहीं है, वैसे ही अज्ञानके विषयीभूत घट आदिमें भी तत्-तत् कालके उपलक्षण होनेसे विषयकोटिमें प्रवेश नहीं है । इससे सूक्ष्म कालविशेषको विषय न करनेवाले धारावाहिक द्वितीय आदि ज्ञानोंसे अज्ञानोंकी निवृत्ति होनेमें कोई आपत्ति नहीं है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि कोई लोग शङ्का करते हैं—तत्-तत् अज्ञान तत्-तत् कालविशेषविशिष्ट विषयका ही आवरण करते हैं । इस प्रकार काल-विशेषका आवरणीय विषयकोटिमें विशेषणरूपसे प्रवेश न कर उपलक्षणरूपसे उसका क्यों प्रवेश करते हैं ? इसपर उत्तर है कि यदि उसका विशेषणरूपसे प्रवेश किया जायगा, तो धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादि ज्ञान अज्ञानके निवर्तक नहीं होंगे, क्योंकि तत्-तत् सूक्ष्मकालके अप्रत्यक्ष होनेसे तत्-तत् काल-वैशिष्ट्यका विषयमें अवभास न होनेके कारण तत्-तत् कालविशिष्टविषयकत्वका भी ज्ञानमें भान नहीं होगा, और असमानविषयक ज्ञान अज्ञानका विरोधी नहीं होता है । अतः उपलक्षणरूपसे ही उन उन कालोंका प्रवेश है, विशेषण-रूपसे प्रवेश नहीं है, इसमें दृष्टान्त है कारीरीफल—वृष्टि । अर्थात् ‘वृष्टिकामः कारीर्या यजेत’ (वृष्टिका अभिलाषी कारीरी याग करे) यह वृष्टिरूप फल कारीरी नामके यागके उत्तर क्षणमें ही होना चाहिए, अन्य कालमें नहीं; क्योंकि उस कालमें सूखते हुए धानोंका जीवन कालान्तरीय वृष्टिसे सुरक्षित नहीं होगा, परन्तु वह समीपवर्ती इष्टिका उत्तर काल वृष्टिरूप फलमें विशेषणरूपसे विवक्षित नहीं है, कारण कि इष्टिके विना भी समयविशेषमें वृष्टि होती ही है, किन्तु इतर समयकी व्यावृत्ति करनेके लिए वृष्टिरूप--कारीरी नामक यागके फलमें जैसे आसन्नसमयका उपलक्षणरूपसे प्रवेश है, वैसे ही प्रकृतमें भी तत्-तत् कालका विशेषणरूपसे प्रवेश है, यह भाव है ] ।
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| १७० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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वृत्तिश्चिरस्थितैकैव स्याद्धारावाहिकस्थले ।
भिन्ना वा वृत्तयः सन्तु स्थूलकालार्थगोचराः ॥ ८५ ॥
उपास्तिवदमानानि सन्तु वाऽनाद्यवृत्तयः ।
गृहीतग्रहणात् सूक्ष्मकालस्याऽतीन्द्रियत्वतः ॥ ८६ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे घट आदिका अज्ञान नष्ट होता है और द्वितीयादि ज्ञानसे तत्-तत् कालसे विशिष्ट अज्ञान नष्ट होता है। और धारावाहिक ज्ञानस्थलमें एक ही दीर्घकालावस्थायी वृत्ति है अथवा स्थूल कालको विषय करनेवाली भिन्न भिन्न ही वृत्तियाँ हों अथवा उपासनाके समान द्वितीयादि वृत्तियाँ अप्रमाण हों, क्योंकि वे अवगत अर्थका ही ग्रहण करती हैं और सूक्ष्म काल तो अतीन्द्रिय है, अतः उसका ग्रहण नहीं करती हैं ॥ ८४ ॥ ८५ ॥ ८६ ॥
केचित्तु प्रथमज्ञाननिवर्त्यमेवाऽज्ञानं स्वरूपावारकम् । द्वितीयादिज्ञाननिवर्त्यानि तु देशकालादिविशेषणान्तरविशिष्टविषयाणि । अत एव सत्तानिश्चयरूपे अज्ञाननिवर्तके चैत्रदर्शने सकृज्जाते 'चैत्रं न जानामि' इति स्वरूपावरणं नाऽनुभूयते, किन्तु 'इदानीं स कुत्रेति न जानामि' इत्यादिरूपेण विशिष्टावरणमेव । विस्मरणशालिनः क्वचित् सकृत् दृष्टेऽपि 'न जानामि' इति स्वरूपावरणं दृश्यते चेत्, तत्र तथाऽस्तु । अन्यत्र सकृद्दृष्टे विशिष्टविषयाण्येवाऽज्ञानानि ज्ञानानि च ।
कोई लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे निवृत्त होनेवाला अज्ञान ही स्वरूपको आवृत करनेवाला है। और धारास्थलमें द्वितीयादि ज्ञानसे देश, काल आदि अन्य विशेषणोंसे विशिष्टविषयक अज्ञान निवृत्त होते हैं। इसीलिए अज्ञाननिवृत्ति करनेमें समर्थ सत्तानिश्चयरूप चैत्रदर्शनके एक बार होनेपर भी—'चैत्रको नहीं जानता हूँ' इस प्रकार स्वरूपावरणका अनुभव नहीं होता है, किन्तु 'इस समय वह कहाँ है, यह मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रकार विशिष्टका ही आवरण अनुभूत होता है। कहींपर विस्मरणशील पुरुषको एक बार देखनेपर भी 'नहीं जानता हूँ' इस प्रकार स्वरूपके आवरणका अनुभव होता है, यदि ऐसी शङ्का करें, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें, अर्थात् जहाँ फिर भी स्वरूपके आवरणका अनुभव होता है, द्वितीय आदि ज्ञान भी स्वरूपके आवारक अज्ञानका ही नाश करते हैं और अन्यत्र—विस्मरणाभावस्थलमें विषयके एक बार दृष्ट होनेपर अज्ञान और ज्ञान विशिष्टविषयक ही
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहितं १७१
न चैवं सति धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानानामज्ञाननिवर्तकत्वं न स्यात्, स्थूलकालविशिष्टाज्ञानस्य प्रथमज्ञानेनैव निवृत्तेः। पूर्वापरज्ञानव्यावृत्तसूक्ष्मकालविशिष्टाज्ञानस्य तदविषयैर्द्वितीयादिज्ञानैर्निवृत्त्ययोगादिति वाच्यम्, धारावहनस्थले प्रथमोत्पन्नाया एव वृत्तेस्तावत्कालावस्थायित्वसम्भवेन वृत्तिभेदानभ्युपगमात्। तदभ्युपगमेऽपि बहुकालावस्थायिपञ्चषवृत्तिरूपत्वसम्भवेन परस्परव्यावृत्तस्थूलकालादिविशेषणभेदविषयत्वोपपत्तेः। प्रतिक्षणोद्यदनेकवृत्तिसन्तानरूपत्वाभ्युपगमेऽपि द्वितीयादिवृत्तीनामधिगतार्थमात्रविषयतया प्रामाण्याभावेनाऽऽवरणानिवर्तकत्वेऽप्यहानेश्च। नहि विषया-
हैं। अर्थात् धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीय आदि ज्ञान विशिष्टविषयक हैं और अज्ञान भी विशिष्टविषयक हैं, अतः समानविषयक होनेसे उनका परस्पर निवर्त्यनिवर्तकभाव हो सकता है, यह भाव है।
द्वितीयादि ज्ञानके और इनसे निवर्त्य अज्ञानके स्वभावतः विशिष्टविषयक होनेपर धारावाहिक द्वितीय आदि ज्ञान अज्ञानके निवर्तक नहीं होंगे, क्योंकि स्थूलकालविशिष्ट अज्ञानकी प्रथमज्ञानसे ही निवृत्ति हो जाती है, अतः ज्ञानके पूर्वापर कालसे व्यावृत्त जो सूक्ष्म काल—क्षण है उससे विशिष्ट विषयको आवृत्त करनेवाले अज्ञानका, सूक्ष्मकालविशिष्ट विषयका अवगाहन न करनेवाले द्वितीयादि ज्ञानसे, निरास नहीं होगा, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि धारावाहिक स्थलमें (अर्थात् जहाँ यह घट है, यह घट है, इत्यादिरूपसे ज्ञानकी धारा चलती हो, वहाँ) प्रथम कालमें उत्पन्न वृत्तिकी ही धारावाहिक कालपर्यन्त स्थिति मानते हैं, इससे वृत्तिका भेद ही नहीं माना जाता है। यदि वृत्तिका भेद माना जाय, तो भी धाराकी दीर्घकालपर्यन्त रहनेवाली पाँच छः वृत्तियोंका सम्भव होनेसे परस्पर व्यावृत्त स्थूलकाल आदि विशेषण-विशेष विषयत्वकी उपपत्ति हो सकती है। यदि ज्ञानधाराको—प्रतिक्षणमें उत्पन्न होनेवाली वृत्तियोंका प्रवाह—माने तो भी प्रथमवृत्तिसे उत्तरकालीन वृत्तियोंमें, केवल अधिगतार्थविषयकत्व होनेसे, प्रामाण्य न होनेके कारण* आवरणके
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि पूर्व ग्रन्थमें धारावाहिक ज्ञानमें एक ही वृत्ति मानी गई है, उसके अनन्तर 'तदभ्युपगमेऽपि' इत्यादिसे धारा एकवृत्तिरूप नहीं मानी गई है किन्तु अनेक वृत्तिरूप मानी गई है, क्योंकि भाष्य आदिमें धारावाहिक ज्ञान अनेक वृत्तिरूप ही माना गया है।
| १७२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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बाधमात्रं प्रामाण्यम् । प्रागवगतानवगतयोः पर्वततद्वृत्तिपावकयोरनुमिति-विषययोरबाधस्याऽविशेषेण उभयत्राऽप्यनुमितेः प्रामाण्यप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः । 'वह्नाव् अनुमितिः प्रमाणम्' इतिवत् 'पर्वतेऽप्यनुमितिः प्रमाणम्' इति व्यवहारादर्शनात् ।
विवरणे साक्षिसिद्धस्याऽज्ञानस्याऽभावव्यावृत्तिप्रत्यायनार्थानुमानादिवि-
(अज्ञानके) अनिवर्तक होनेपर भी 'ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है' इस नियमका भङ्ग नहीं हो सकता है, क्योंकि केवल विषयका अबाध प्रामाण्य नहीं है अर्थात् जिस ज्ञानके विषयका बाध न हो वही प्रमाण है, ऐसा प्रामाण्यका लक्षण नहीं है, कारण कि उसके प्रामाण्यलक्षण होनेपर 'पर्वतो वह्निमान्' ( पर्वतमें वह्नि है ) इत्यादि अनुमितिके विषयीभूत पर्वत और उसमें रहनेवाली वह्निका, जो क्रमशः अनुमितिके पूर्वमें ज्ञात और अज्ञात हैं, सामान्यरूपसे बाध नहीं है, अतः पर्वतांश और वह्न्यंशमें अनुमितिके प्रामाण्यकी प्रसक्ति होगी, और इसे इष्टापत्ति नहीं मान सकते हैं, कारण कि लोकमें जैसे 'वह्निमें अनुमिति प्रमाण है', यह व्यवहार देखा जाता है, वैसे 'पर्वतमें भी अनुमिति प्रमाण है', यह व्यवहार नहीं देखा जाता ।
और पराभिमत अभावरूप अज्ञानकी व्यावृत्तिका बोध करानेके लिए प्रयुक्त अनुमान आदिका—यद्यपि साक्षी द्वारा सिद्ध अज्ञान—विषय
वे वृत्तियाँ न्यायमतके समान प्रतिक्षणावस्थायिनी नहीं मानी गई हैं, प्रत्युत पांच छः क्षणावस्थायिनी मानी गई हैं, इसके बाद 'प्रतिक्षणे०' इत्यादि ग्रन्थसे न्यायमतका स्वीकार करके प्रतिक्षणावस्थायिनी वृत्तियोंका अभ्युपगम कर ज्ञानधाराकी उपपत्ति की है। इस मतमें यह शङ्का होती है कि प्रथम क्षणमें उत्पन्न वृत्तिसे ही अज्ञानका नाश होनेपर अनन्तर कालमें उत्पन्न हुई क्षणिक वृत्तियोंसे किस अज्ञानका नाश होगा ? यदि उत्तरकालीन वृत्त्यात्मक ज्ञान अज्ञानकी निवृत्ति नहीं करेगा, तो 'ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है' इस नियमका व्यभिचार होगा। इसपर उत्तर देते हैं कि ठीक है—ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, परन्तु वही ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है, जो प्रमाण हो । और प्रमाण ज्ञान उसे कहते हैं जो अनधिगत और अबाधित विषयका अवगाहन करता हो, द्वितीयकालीन वृत्तिज्ञान अबाधितार्थविषयक है, परन्तु अनधिगतार्थविषयक नहीं है, क्योंकि वह स्मृतिके समान अधिगत विषयका ही अवगाहन करता है, पर्वतांशमें वह्न्यनुमितिका प्रामाण्य न हो, इसलिए केवल अबाधितार्थविषयकत्व—प्रामाण्य नहीं कह सकते हैं, अतः द्वितीयकालिक वृत्तियोंके प्रमाण न होनेसे उनके अज्ञाननिवर्तक न होनेपर भी कोई हानि नहीं है ।
[आवरणाभिभव-स्वरूपविचार] भाषानुवादसहित १७३
पयत्वेऽपि प्रमाणवेद्यत्वोक्तेश्च । तस्मात् द्वितीयादिवृत्तीनां प्रामाण्याभावात् उपासनादिवृत्तीनामिवाज्ञानानिवर्तकत्वेऽपि न हानिः । प्रमाणवृत्तीनामेव तन्निवर्तकत्वाभ्युपगमात् ।
है, तथापि वह विवरणमें प्रमाणवेद्य वह (प्रमितिका अविषय) कहा गया है ।
तात्पर्य यह है कि विवरणकारको भी प्रमाका लक्षण अनधिगतत्व-घटित ही अभिप्रेत है, अर्थात् अनधिगताबाधितार्थविषयक ज्ञानत्वरूप प्रमात्व अभिप्रेत है । इसलिए उन्होंने अज्ञानके अनुमितिविषय होनेपर भी उसे प्रमितिका विषय नहीं माना, क्योंकि 'अज्ञोऽहम्' (मैं अज्ञ हूँ) इस अनुभव-रूप साक्षीसे ही अज्ञानकी सिद्धि हुई है, अतः अनुमिति आदिके ज्ञातार्थ-विषयक होनेसे उक्त अज्ञातत्वघटित प्रमात्व अनुमिति आदिमें नहीं है, अतः प्रमात्मकवृत्तित्वेन अज्ञानमें नहीं आया, क्योंकि अज्ञानांशमें पर्वताद्यंशके समान अनुमिति अप्रमाण है । इसी अभिप्रायसे प्रमाणवेद्यत्वका विवरणमें कथन है । साक्षिरूपज्ञानका अज्ञान विषय है, अतः वह प्रमाणवेद्य है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि साक्षिरूप ज्ञान तभी प्रमाणज्ञान हो सकता है, जब कि वह किसी प्रमाणकरणसे उत्पन्न हो, परन्तु वह तो नित्य है, अतः साक्षिज्ञान प्रमा या अप्रमाकी कोटिमें प्रविष्ट नहीं होता । इसी प्रकार अन्य मतावलम्बीयोंने भी ईश्वरज्ञानको प्रमात्व और अप्रमात्वसे रहित ही माना है । अथवा साक्षीसे अतिरिक्त प्रमाणज्ञानसे अवेद्यत्व भी प्रमाणवेद्यत्वका अर्थ हो सकता है, इसलिए अज्ञातत्वघटित ही प्रमाणका लक्षण मानना होगा, ] इससे अर्थात् अज्ञातत्वघटित प्रमालक्षणके न रहनेसे धारावाहिक ज्ञानकी द्वितीयकालिक वृत्तियोंके प्रामाण्य न होनेके कारण उपासनादि वृत्तियोंके समान * उनके अज्ञानके निवर्तक न होनेपर भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि प्रमाणवृत्तियाँ ही अज्ञानकी निवर्तक होती हैं, ऐसा स्वीकार किया गया है ।
* यह भाव है—उपासनाका जो वृत्ति है, वह ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि वह किसी ज्ञानके करणसे उत्पन्न नहीं होती, और मन तो ज्ञानका करण नहीं है, इसका विचार आगे किया जायगा । इसलिए उपासनावृत्ति गमन आदिके समान क्रियारूप है, क्योंकि वह पुरुष-कृतिसाध्य है, अतः वह अपने उपास्यके आवारक अज्ञानका निवारण नहीं करती है । इसी प्रकार इच्छा आदि भी अपने विषयके अज्ञानका निवारण नहीं करते हैं । इसी प्रकार द्वितीयादि वृत्तियाँ अज्ञानका निवारण नहीं करती हैं, क्योंकि वे भी अधिगतार्थविषयक हैं, अतः स्मृतिके समान अप्रमाणरूप हैं ।
१७४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
ननु नाज्ञानविच्छित्तिः परोक्षज्ञानतस्ततः ।
भ्रान्तिजिज्ञासयोर्दृष्टेरत्र केचित् समादधुः ॥ ८७ ॥
परोक्ष ज्ञानसे अज्ञानका विनाश नहीं होता है, क्योंकि परोक्ष ज्ञानके बाद भ्रान्ति और जिज्ञासा होती है, इस शङ्काका कोई लोग निम्नलिखितरूपसे समाधान करते हैं ॥ ८७ ॥
ननु नाऽयमपि नियमः, परोक्षवृत्तेरनिर्गमेनाऽज्ञानानिवर्तकत्वादिति चेत् ।
द्विविधं विषयाज्ञानं साक्षिविक्षेपसङ्गतेः ।
अर्थगं पौरुषं चेति परोक्षात् पौरुषक्षयः ॥ ८८ ॥
साक्षीके और विक्षेपके सम्बन्धसे विषयका आवारक अज्ञान दो प्रकारका है—एक विषयमें रहनेवाला और दूसरा पुरुषमें रहनेवाला, इसलिए परोक्षज्ञानसे पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान विनष्ट होता है ॥ ८८ ॥
अत्र केचिदाहुः—द्विविधं विषयावरकमज्ञानम् । एकं विषयाश्रितं रज्ज्वादिविक्षेपोपादानभूतं कार्यकल्प्यम् । अन्यत् पुरुषाश्रितम् 'इदमहं न जानामि' इत्यनुभूयमानम् । पुरुषाश्रितस्य विषयसंभिन्नविक्षेपोपादानत्वासम्भवेन, विषयाश्रितस्य 'इदमहं न जानामि' इति साक्षिरूपप्रकाशसंसर्गायोगेन द्विविधस्याऽप्यावश्यकत्वात् । एवं च परोक्षस्थले वृत्तेर्निर्गमनाभावाद्
अब फिर शङ्का करते हैं कि यह भी नियम नहीं है कि प्रत्येक प्रमा अज्ञानकी निवृत्ति करती है, क्योंकि परोक्ष वृत्तिका निर्गम नहीं होता है, अतः वह परोक्षवृत्तिरूप प्रमा अज्ञानकी निवर्तक नहीं हो सकती । [ और है तो वह प्रमा अतः 'प्रमामात्रमज्ञाननिवर्तकम्' इस नियममें व्यभिचार है, यह भाव है ] ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—विषयको आवरण करनेवाले अज्ञान दो प्रकारके होते हैं—एक तो विषयमें रहनेवाला रज्जु आदिके विक्षेपका ( सर्प आदिरूप विवर्तका ) उपादानकारणभूत कार्य द्वारा कल्पित अज्ञान और दूसरा 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' इस प्रकारसे अनुभूयमान पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान । जो पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान है, वह अधिष्ठानभूत रज्जु आदि विषयके साथ तादात्म्यापन्न सर्पादि विक्षेपका उपादान नहीं हो सकता और जो विषयमें रहनेवाला अज्ञान है उसका 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' इस प्रकारके साक्षीरूप प्रकाशके साथ सम्बन्ध नहीं है, इसलिए अज्ञानके दो भेद मानने
आवरणविभवस्वरूप-विचार] भाषानुवादसहित १७५
दूरस्थवृक्षे आप्तवाक्यात् परिमाणविशेषावगमेऽपि तद्विपरीतपरिमाणविक्षेप- दर्शनाच्च विषयगताज्ञानानिवृत्तावपि पुरुषगताज्ञाननिवृत्तिरस्त्येव। 'शास्त्रार्थं न जानामि' इत्यनुभूताज्ञानस्य तदुपदेशानन्तरं निवृत्त्यनुभवात्। अत एव 'अनुमेयादौ सुषुप्तिव्यावृत्तिः' इति विवरणस्य तद्विषयाज्ञाननिवृत्तिरर्थ इत्युक्तं तत्त्वदीपने इति।
अन्ये पौरुषमज्ञानमाहुः शक्तिद्वयाश्रयम्। परोक्षज्ञानतस्तत्राऽऽवरणांशपरिक्षयम् ॥ ८९ ॥
कोई लोग कहते हैं कि पुरुषवृत्ति एक ही अज्ञान आवरण और विक्षेप रूप दो शक्तियोंसे युक्त है, उनमें से परोक्षज्ञानसे आवरणांशका विनाश होता है ॥ ८९ ॥
अत्यन्त आवश्यक हैं। दो प्रकारके अज्ञान होनेपर और परोक्षस्थलमें वृत्तिका निर्गम न होनेसे दूर देशमें स्थित वृक्षमें शिष्टके * वाक्यसे परिमाणविशेषका अवगम होनेपर भी उस परिमाणसे विपरीत परिमाणरूप (अल्पपरिमाणरूप) विक्षेप देखा जाता है, अतः विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति न होनेपर भी पुरुषगत अज्ञानकी निवृत्ति होती ही है। क्योंकि 'मैं शास्त्रार्थको † (शास्त्रोक्त अर्थको) नहीं जानता हूँ' इस प्रकार अनुभूत शास्त्रार्थके अज्ञानकी शास्त्रके अर्थके उपदेशके अनन्तर निवृत्ति होती है, ऐसा अनुभव होता है। इसीसे 'अनुमेयादौ सुषुप्तिव्यावृत्तिः' इस विवरणका तत्त्वदीपनमें यह अर्थ कहा है कि अनुमेय आदि विषयमें अनुमिति आदि परोक्ष ज्ञानसे (पुरुषगत) अज्ञानकी निवृत्ति होती है।
* भाव यह है कि किसी शिष्ट पुरुषने कहा कि दूरस्थ वृक्ष छोटा नहीं है, किन्तु समीपके वृक्षके समान बड़ा है, इस वाक्यसे जो ज्ञान होगा, वह परोक्ष होगा। उससे यदि विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति मानी जाय, तो विपरीत परिमाणकी जो दूरस्थ वृक्षमें उपलब्धि होती है, वह नहीं होगी, अतः उससे पुरुषगत अज्ञान ही निवृत्त होता है।
† इसका यह भाव है—'मैं शास्त्रके अर्थको नहीं जानता हूँ' इस वाक्यसे अनुभूत अज्ञानकी शास्त्रार्थके उपदेशके अनन्तर 'शास्त्रार्थका अज्ञान अब निवृत्त हुआ' इस प्रकार अज्ञान निवृत्तिका अनुभव होता है। शास्त्रका अर्थ दो प्रकारका है—धर्मरूप और ब्रह्मरूप। धर्मरूप जो शास्त्रका अर्थ है उसमें उपदेशजन्य ज्ञान परोक्ष ही है, अपरोक्ष नहीं है, इसलिए धर्मरूप विषयमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग नहीं है। अतः वहां पुरुषगत अज्ञानकी निवृत्ति होती है, यह कहना होगा। उपदेशजन्य ब्रह्मरूप अर्थमें भी परोक्षज्ञान होता है अन्यथा मनन आदिके विधानकी असङ्गति होगी, वह भी पुरुषगत अज्ञानकी ही निवृत्ति करेगा। अतः परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तन नहीं करता है, यह कहना असङ्गत है।
| १७६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अन्ये तु—नयनपटलवत् पुरुषाश्रितमेवाऽज्ञानं विषयावरणम् । न तदतिरेकेण विषयगताज्ञाने प्रमाणमस्ति । न च पुरुषाश्रितस्य विषयगतविक्षेपपरिणामित्वं न सम्भवति । तत्संभवे वा दूरस्थवृक्षपरिमाणे परोक्षज्ञानादज्ञाननिवृत्तौ विपरीतपरिमाणविक्षेपो न सम्भवतीति वाच्यम्, वाचस्पतिमते सर्वस्य प्रपञ्चस्य जीवाश्रिताज्ञानविषयीकृतब्रह्मविवर्तत्वेन तद्वच्छुक्तिरजतादेः पुरुषाश्रिताज्ञानविषयीकृतब्रह्मविवर्तत्वोपपत्तेः । परोक्षवृत्त्या एकावस्थानिवृत्तावपि अवस्थान्तरेण विपरीतपरिमाणविक्षेपोपपत्तेश्चेत्याहुः ।
कुछ लोग कहते हैं कि जैसे नेत्रमें रहनेवाले पटल (काचादि दोष) विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषगत अज्ञान ही विषयको आवृत करता है, इससे भिन्न विषयगत अज्ञानमें प्रमाण नहीं है । परन्तु यदि 'एक ही पुरुषगत अज्ञान माना जाय, तो वह विषयगत विक्षेपका परिणामी—उपादान—नहीं होगा । यथा कथंचित् पुरुषगत अज्ञानके विषयगत विक्षेपके उपादान होनेपर भी दूर देशवर्ती वृक्षके परिमाणमें आप्त (सच्चे) पुरुषके उपदेशसे जन्य ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उत्पत्ति नहीं होगी' इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि * वाचस्पतिमिश्रके मतमें सम्पूर्ण प्रपञ्च जीवमें रहनेवाली अविद्याके विषय ब्रह्मका विवर्त है, अतः पुरुषगत अज्ञानके विषय ब्रह्मके शुक्ति-रजत आदि विवर्त हो सकते हैं । † परोक्ष वृत्तिसे एक अवस्था (आवरण) की निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अन्य अवस्थासे विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उपपत्ति हो सकती है ।
* तात्पर्य यह है कि यदि शुक्ति-रजत आदि अज्ञानके परिणाम माने जायँ, तो अज्ञानको अवश्य विषयचैतन्यगत मानना चाहिए । और वे अज्ञानके परिणाम न माने जायँ, तो अज्ञानको विषयचैतन्यगत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । दार्ष्टान्तिकमें अर्थात् 'पुरुषाश्रित' इत्यादिमें ब्रह्मपद शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप अर्थमें प्रयुक्त है, पूर्ण ब्रह्मरूप अर्थमें प्रयुक्त नहीं है । क्योंकि अवच्छिन्न चैतन्य ही शुक्तिरजत आदिका अधिष्ठान है ।
† जैसे परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति अनुभूत होती है, वैसे ही दूरस्थवृक्षस्थलमें परोक्षज्ञान होनेपर भी विपरीत परिमाणकी उत्पत्ति भी अनुभूत होती है, अतः दो अनुभवोंके आधारपर पुरुषवृत्ति अज्ञानका एक देश परोक्षज्ञानसे निवृत्त होता है और अन्य देश अनुवृत्त होता है, ऐसी कल्पनाकी जाती है, दो प्रकारका अज्ञान है, ऐसी कल्पना नहींकी जाती, क्योंकि ऐसा माननेमें गौरव है । वस्तुतस्तु परोक्षज्ञानको अज्ञानका
आरणाभिगव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १७७
विषयस्थं परे मोहं मूलाज्ञानांशरूपकम् ।
अंशांशिनोरभेदाच्च साक्षिणा तस्य सङ्गतिम् ॥ ९० ॥
विषयमें रहनेवाला अज्ञान मूलाज्ञानका अंशरूप है, और उसीका साक्षीके साथ सम्बन्ध होता है, क्योंकि अंश और अंशीका अभेद होता है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ९० ॥
अपरे तु—शुक्तिरजतादिपरिणामोपपत्त्याञ्जस्याद् विषयावगुण्ठनपटवत् विषयगतमेवाऽज्ञानं तदावरणम् । न च तथा सति अज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेण ततः प्रकाशानुपपत्तिः, परोक्षवृत्तिनिवर्त्यत्वासम्भवश्च दोष इति वाच्यम्, अवस्थारूपाज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेऽपि तत्संसृष्टमूलाज्ञानस्यैव 'शुक्तिमहं न
कुछ लोग कहते हैं कि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिका सामञ्जस्य हो, इसलिए विषयको आवृत्त करके रहनेवाले पटके समान विषयगत ही अज्ञान विषयका आवरण करता है ‡। विषयावरक अज्ञानके विषयगत होनेपर साक्षीके साथ अज्ञानका सम्बन्ध न होनेसे साक्षीसे अज्ञानका प्रकाश नहीं होगा और परोक्ष वृत्तिका विषयदेशमें गमन न होनेसे उससे उसकी निवृत्ति भी नहीं होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानका साक्षीके साथ सम्बन्ध भले ही न हो, परन्तु 'शुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ'
निवर्तक माना जाय, तो भी प्रतिबन्धकरहित परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा ही स्वीकार करना चाहिए । प्रकृतमें भ्रमके अनुरोधसे दूरत्व आदि दोषोंसे प्रतिवद्ध होनेके कारण आप्तवाक्यजन्य भी ज्ञान पुरुषगत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, अतः विपरीत परिमाणकी उपपत्ति और अनुपपत्तिकी शङ्का नहीं है, यह भाव है।
‡ पूर्वमें अप्रतिबद्ध ज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमके अनुसार अव्यभिचारके लिए परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक है, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। अब 'अपरे तु' ग्रन्थसे 'अप्रतिबद्ध अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमका अङ्गीकार करके परोक्षज्ञानमें व्यभिचारशङ्काका निरास करते हैं। तात्पर्य यह है कि लोकमें घट आदि मृत्तिकाके परिणामी देखे जाते हैं, इसी प्रकार शुक्तिरजत आदि भी किसीके परिणाम हैं, ऐसा मानना चाहिए। उनका परमाण्वन्वय और व्यतिरेकसे अज्ञान ही सिद्ध होता है, क्योंकि प्रातिभासिक शुक्तिरजतके प्रति शुक्ति आदि उपादान नहीं हो सकते हैं, जैसे शुक्तिद्वारा विषयचैतन्यगत अज्ञान रजत आदि विक्षेपके प्रति उपादान सिद्ध हो सकता है, वैसे पुरुषवृत्ति अज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए विषयगत अज्ञान ही अवस्थारूप है। यद्यपि पुरुषगत अज्ञान प्रभान्यायसे रजत आदिके प्रति उपादान हो सकता है, तथापि यह युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे मूलाज्ञानमें क्रिया नहीं होती है, वैसे ही अवस्थारूप अज्ञानमें भी क्रिया नहीं होती, अतः प्रभान्यायका प्रसङ्ग नहीं हो सकता है।
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