सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित ३०३
ष्ठाने क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्वस्य नियमविशेषरूपत्वेन कर्माङ्गत्वस्य फलोप- कारितया सन्निपातितया वा कारणत्वविशेषरूपत्वेन च तयोः कादाचित्क- त्वायो pick स्वाभाविकत्वनिर्वाहाय पश्चाद्भाविविरुद्धापच्छेदाभाववतः क्रतोः पूर्वापच्छेदनैमित्तिकमङ्गम्। तत्रैव तदननुष्ठानं क्रतुवैकल्यप्रयोजकमिति विशेषणीयतया पाश्चात्त्यापच्छेदान्तरवति क्रतौ पूर्वापच्छेदनैमित्तिके क्रत्व-
हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनुष्ठानके न करनेमें—अनुष्ठानके अभावमें— जो ऋतुके वैकल्यके प्रति प्रयोजकत्व (हेतुत्व) है, वह नियमविशेषरूप है अर्थात् क्रतुवैकल्यव्याप्यत्वरूप * है, और कर्मके प्रति जो अङ्गत्व है, वह फलोपकारितारूपसे अथवा † सन्निपातितारूपसे कारणत्वविशेषरूप है, इसलिए उनमें अर्थात् क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्व और कर्माङ्गत्वमें कादाचित्कत्वके न होनेसे स्वाभाविकत्वके निर्वाह करनेके लिए उत्तरकालमें होनेवाले विरुद्ध अप- च्छेदके अभावसे युक्त क्रतुका पूर्वकालीन निमित्तसे जायमान प्रायश्चित्त अङ्ग है, और उसीमें उसका अननुष्ठान क्रतुकी विकलतामें कारण है, इस प्रकार विशेषण देना ‡ होगा, इससे पश्चाद्भावी अपच्छेदसे युक्त क्रतुमें पूर्वकालीन
ङ्गतुवैकल्यकी प्रयोजकताके पाश्चात्य अपच्छेदोत्पत्तिके पूर्वमें न होनेसे भ्रान्ति ही होगी, अतः क्रतुवैकल्यप्रयोजकाननुष्ठानप्रतियोग्यनुष्ठानशालित्व अथवा पश्चाद्भाविविरुद्धापच्छेदाभाववत्क्रतु- वैकल्यप्रयोजकाननुष्ठानप्रतियोग्यनुष्ठानशालित्वरूप कर्तव्यत्व अथवा तादृश अङ्गत्व (पश्चाद्भा- व्यपच्छेदाभाववत्क्रतुं प्रति फलोपकारित्वेन सन्निपत्योपकारित्वेन कारणत्वरूप अङ्गत्व) को भी कर्तव्यत्व नहीं मान सकते हैं, यह भाव है।
* क्रतुवैकल्यव्याप्यत्वका अर्थ है—जहाँ-जहाँ अनुष्ठानका अभाव हो वहाँ-वहाँ क्रतुमें वैकल्य होना चाहिए, व्याप्यके अस्तित्वमें व्यापकका अस्तित्व अवश्य रहता है, जैसे धूमके रहनेपर वह्निकी सत्ता पर्वतमें अवश्य रहती है, इसलिए प्रायश्चित्तके अननुष्ठानमें क्रतुवैकल्य- व्याप्यता अवश्य रहेगी।
† अपच्छेदसंयुक्त प्रायश्चित्तमें क्रतुकी अङ्गता मानी जाय, तो वह दो प्रकारसे घटेगी अर्थात् साक्षात् या परम्परया। क्रतुके स्वरूपमें जो कारण होगा वह फलोपकारी अङ्ग होगा और क्रतुजन्य परमापूर्वका अदृष्टद्वारा सम्पादक जो कारण होगा वह सन्निपाती अङ्ग होगा, इसलिए मूलमें 'फलोपकारितया' और 'सन्निपातितवा' इत्यादि कहा गया है, यह भाव है।
‡ व्याप्यत्व और अङ्गत्वका कादाचित्कत्व प्रसङ्ग किस प्रकार है, उसका निरूपण पूर्वमें किया जा चुका है। इसके परिहारके लिए क्रतुवैकल्य प्रयोजकका और क्रत्वङ्गका क्रमशः उत्तरकालिक विरुद्ध अपच्छेदसे रहित क्रतुका ही पूर्व प्रायश्चित्त अङ्ग है, ऐसा अर्थ करना होगा, इससे उक्त व्याप्यत्व और अङ्गत्वका स्वाभाविकत्व सिद्ध होगा, अन्यथा नहीं होता है, यह भाव है।
३०४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
ङ्गत्वस्य, तदननुष्ठाने क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्वस्य वा पाश्चात्त्यापच्छेदोत्पत्तेः पूर्वमसम्भवात् । नहि वस्तु किञ्चिद्वस्त्वन्तरं प्रति कञ्चित्कालं व्याप्यं पश्चान्नेति वा, कञ्चित्कालं कारणं पश्चान्नेति वा, क्वचिद् दृष्टम्, युक्तं वा । नापि कर्तव्यत्वं नाम धर्मान्तरमेवाऽऽगमापाययोग्यं कल्प्यम्, मानाभावात् ।
अपच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तकी अङ्गताका और उसके अनुष्ठान न करनेपर विकलताके हेतुत्वका परकालीन अपच्छेदके पूर्वकालमें भी असम्भव ही है । क्योंकि ऐसा कहींपर नहीं देखा गया है और युक्त भी नहीं है कि * कोई वस्तु किसी वस्तुके प्रति कुछ कालतक व्याप्य होती है, और पीछे व्याप्य नहीं होती है तथा किसी भी वस्तुके प्रति कोई वस्तु अल्प समयतक कारण रहती हो और पीछे कारण नहीं रहती हो । और † आगम और विनाशके योग्य कोई धर्मान्तर भी कर्तव्यत्व नहीं हो सकता है, क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है । विरुद्ध जो अपच्छेदशास्त्र हैं, उनकी 'पदे जुहोति' और 'आवहनीये जुहोति' इन दो शास्त्रोंके समान व्यवस्था हो सकती है, इसलिए क्रमिक दो कर्तव्यताओंके उपपादक वचन अप्रमाण हैं ।
* व्याप्यत्व और अङ्गत्व (कारणत्व) कादाचित्क नहीं होते हैं, स्वाभाविक ही होते हैं, उसमें प्रसिद्ध दृष्टान्त देते हैं कि वह्निके प्रति धूम व्याप्य है, उसमें व्याप्यता कुछ समयतक रहती है और कुछ समयतक नहीं रहती है, यह देखा नहीं गया है और किसी युक्तिसे सिद्ध भी नहीं है । यदि कदाचित् जबरदस्ती मान लिया जाय कि वह्निकी धूममें व्याप्यता कुछकाल तक ही रहती है, तो आपत्ति यह होगी कि तो 'वह्निमान् धूमात्' (धूम होनेसे पर्वत वह्निमान् है) इस स्थलको सोपाधिकता प्रसक्त होगी, क्योंकि व्याप्यत्वा-भावमें उपाधि प्रयोजक है, इसीलिए 'धूमवान् वह्नेः' इस स्थलमें वह्निहेतु सोपाधिक होता है । इसी प्रकार कारणमें कारणत्व कादाचित्क होगा, तो धूमादिकार्यके लिए वह्निरूप कारणके ग्रहणमें देवदत्त आदिकी जो प्रवृत्ति होती है, उसमें अद्य निष्कम्प प्रवृत्ति नहीं होगी, अतः व्याप्यत्व और अङ्गत्वको (कारणत्वको) कदाचित्क नहीं मान सकते हैं, यह भाव है ।
† यदि कर्तव्यत्वका यह अर्थ किया जाय कि जो धर्म आगम (उत्पत्ति) और अपाय (विनाश) योग्य हो, अर्थात् जो प्रथम निमित्तके जननके अनन्तर ही आगमयोग्य हो और द्वितीय निमित्तके उत्पन्न होनेके बाद ही विनाशके योग्य कोई अन्य धर्मसे—उक्तलक्षणलक्षित धर्मों भिन्न—कर्तव्यत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे विलक्षण धर्ममें कोई प्रमाण ही नहीं है । अतः जैसे—'आवहनीये जुहोति' इस शास्त्रकी पदहोमातिरिक्त स्थलमें विषयता है, वैसे ही क्रमिक विरुद्ध प्रायश्चित्तकी व्यवस्था भी हो सकती है, अतः क्रमिक कर्तव्यद्वयकी उत्पत्ति मानना निरालम्ब है, यह भाव है ।
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार ] भाषानुवादसहित ३०५
विरुद्धापच्छेदशास्त्रयोः पदाहवनीयशास्त्रवद् व्यवस्थोपपत्तेः । तस्मान्निरालम्बनं क्रमिककर्तव्यताद्वयोत्पत्तिवचः ।
ननूपक्रमवत् पूर्वं प्रत्यक्षं बलवच्छ्रुतेः ।
नैकवाक्येष्विदंवाधास्त्वपच्छेदनयादिह ॥१२॥
यदि यह शङ्का हो कि उपक्रमके समान प्रत्यक्ष पूर्वभावी है, अतः श्रुतिसे प्रत्यक्ष बलवान् है, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि परस्पर एकवाक्यता स्थलमें ही उपक्रम-न्यायसे पूर्व बलवान् होता है, यहाँ तो अपच्छेदन्यायसे प्रत्यक्षसे पर श्रुति ही बलवती है ॥ १२ ॥
ननु चोपक्रमाधिकरणन्यायेनाऽसञ्जातविरोधित्वात् प्रत्यक्षमेवाऽऽगमाद् बलीयः किं न स्यात् ?
उच्यते—यत्रैकवाक्यता प्रतीयते, तत्रैकस्मिन्नेवार्थे पर्यवसानेन भाव्यम्, अर्थभेदे प्रतीतैकवाक्यताभङ्गप्रसङ्गात् । अतस्तत्र प्रथममसञ्जातप्रतिपक्षेण
अब शङ्का होती है कि उपक्रमाधिकरणन्यायसे असञ्जातविरोधी ॐ होनेके कारण प्रत्यक्ष ही आगमसे बलवान् क्यों न होगा ? अर्थात् आगमकी अपेक्षा प्रत्यक्ष ही बलवान् है । [ तात्पर्य यह है कि जैसे उपक्रमवाक्यके अर्थज्ञानके समयमें उपसंहारवाक्यार्थका परिज्ञान न होनेसे किसी विरोधीका परिस्फुरण नहीं होता है, अतः उपक्रम असञ्जातविरोधी है, वैसे ही द्वैतमें सत्यत्वके प्रत्यक्ष-समयमें विरोधी अर्थ, अर्थात् द्वैतमिथ्यात्वग्राहक श्रुतिका अर्थ, अनुभूत नहीं होता है, अतः विरोधकी परिस्फूर्ति न होनेसे प्रत्यक्ष असञ्जातविरोधी है, इस-लिए वह बलवान् हो सकता है । ]
इस आक्षेपके समाधानमें कहते हैं कि जहाँपर एकवाक्यता प्रतीत होती है, वहाँ एक ही अर्थमें वाक्यका पर्यवसान होता है, यदि ऐसे स्थलमें अर्थभेद माना जाय, तो प्रतीत एकवाक्यताका भङ्ग होगा [ अर्थात् भिन्न-भिन्न अर्थोंके रहते एकवाक्यताका ज्ञान नहीं हो सकता है, अतः एकवाक्यतामें--उपक्रम
ॐ उपक्रमाधिकरणन्यायसे उपक्रम ही बलवान् होता है, क्योंकि उपक्रम—आरम्भ जब होता है, तब अन्य विरोधी नहीं होता, अतः इसी उपक्रमन्यायसे प्रत्यक्षके असञ्जातविरोधी-( न सञ्जातो विरोधो यस्य सः, अर्थात् जिसका प्रतिद्वन्द्वी उत्पन्न न हुआ हो ) होनेसे शब्दकी अपेक्षा वही बलवान् होगा, प्रत्यक्ष जब प्रवृत्त होगा, तब मिथ्यात्वबोधक श्रुतियोंकी प्रवृत्ति न होनेके कारण वह असञ्जातविरोधी है ही ।
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| ३०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद- |
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'प्रजापतिर्वरुणायाश्वमनयद्' इत्याद्युपक्रमेण परकृतिरूपार्थवादेन दातुरिष्टौ बुद्धिमधिरोपितायां तद्विरुद्धार्थं 'यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयात्तावतो वारुणान् चतुष्कपालान्निर्वपेद्' इत्युपसंहारगतं पदजातमुपजातप्रतिपक्षत्वाद्यथाश्रुतार्थसमर्पणेन तदेकवाक्यतामप्रतिपद्यमानमेकवाक्यतानिर्वाहाय णिजर्थमन्तर्भाव्य तदानुगुण्येनैवाऽऽत्मानं लभते इति उपक्रमस्य प्राबल्यम् । यत्र तु परस्परमेकवाक्यता न प्रतीयते, तत्र पूर्ववृत्तमविगणय्य लब्धात्मकं विरुद्धार्थकं वाक्यं स्वार्थं बोधयत्येवेति न तत्र पूर्ववृत्तस्य प्राबल्यम् ।
अत एव षोडशिग्रहणवाक्यं पूर्ववृत्तमविगणय्य तदग्रहणवाक्यस्यापि
और उपसंहार आदिकी एकवाक्यतामें—एक ही अर्थका प्रतिभास होना चाहिए, यह भाव है । इससे पूर्वकालमें जिसका विरोधी उत्पन्न न हुआ हो, ऐसे परकृति* के सदृश 'प्रजापतिर्व०' ( प्रजापतिने वरुणको अश्व दिया ) इत्यादि अर्थवादके उपक्रमसे दाताकी इष्टिके बुद्धिमें आरूढ होनेपर 'यावतोऽश्वान् ०' ( जितने अश्वोंका प्रतिग्रह करावे † उतने वारुणचतुष्कपालोंका निर्वाप करे ) इस प्रकारके उपक्रमसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाला उपसंहारस्थ वाक्य संजातविरोधी है, अतः आपाततः प्रतीयमान अर्थका बोधन करनेपर उपक्रमवाक्यके साथ एकवाक्यता प्राप्त नहीं कर सकता है, अतः उपक्रमवाक्यके साथ एकवाक्यता की उपपत्ति करनेके लिए णिच्के अर्थका अन्तर्भाव करके ही उपक्रमके अनुकूल एकवाक्यता होती है, अतः उपक्रमवाक्य बलवान् है । और जहांपर उपक्रम और उपसंहारकी एकवाक्यताकी प्रतीति किसी भी रीतिसे नहीं होती है, वहांपर पूर्ववृत्तान्तपर ध्यान न दे करके अपनी सत्तासे विरुद्धार्थक वाक्य अपने स्वार्थका बोधन करता ही है, अतः उस स्थलमें पूर्ववृत्त—पूर्ववाक्य—प्रबल नहीं होता है ।
इसीलिए पूर्ववृत्त षोडशिग्रहणवाक्यकी अर्थात् 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति'-
* 'परकृतिः—परस्य-प्रजापतेः कृतिः—अनुष्ठानम्' इस व्युत्पत्तिसे यद्यपि प्रजापतिका अनुष्ठान परकृतिशब्दका अर्थ प्रतीत होता है, तथापि यहाँपर उस अनुष्ठानका प्रतिपादक वाक्य परकृति-शब्दका अर्थ है ।
† प्रतिगृह्णीयात् ( प्रतिग्रह करे ) इस शब्दमें णिजर्थका अन्तर्भाव करके 'प्रतिग्राहयेत्' ( प्रतिग्रह करावे ) ऐसा अर्थ आगे ग्रन्थकार ही करेंगे । इस वाक्यसे—जितने अश्व दें, वरुणदेवताके उद्देश्यसे उतने ही चतुष्कपालोंका निर्वाप करे । कपालशब्दका अर्थ है—पुरोडाश बनानेके लिए बनाया हुआ मिट्टीका पात्रविशेष ।
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित ३०७
स्वार्थबोधकत्वमुपेयते, किन्तुभयोर्विषयान्तराभावाद् अगत्या तत्रैव विकल्पानुष्ठानमिष्यते ।
एवं चाऽद्वैतागमस्य प्रत्यक्षेणैकवाक्यत्वशङ्काऽभावात् पूर्ववृत्तमपि तद्विगणय्य स्वार्थबोधकत्वमप्रतिहतम् ।
तदर्थबोधजनने च—
'पूर्वं परमजातत्वादबाधित्वाैव जायते ।
परस्यानन्यथोत्पादान्नाबाधेन सम्भवः ॥'
इत्यपच्छेदन्यायस्यैव प्रवृत्तिः, नोपक्रमन्यायस्य ।
अत एव लोकेऽपि प्रथमवृत्तं शुक्तिरूप्यप्रत्यक्षमाप्तोपदेशेन बाध्यते इति ॥२॥
इस वाक्यकी 'नातिरात्रे षोडशिनं ‡ गृह्णाति' यह वाक्य भी अपेक्षा न करके ही स्वार्थबोधक है, ऐसा स्वीकार किया गया है, परन्तु विशेष इतना है कि षोडशीके ग्रहण और अग्रहणका अन्य विषय नहीं है, अतः अगत्या अर्थात् समुच्चयका भी असम्भव होनेसे अतिरात्रमें ही विकल्पसे अनुष्ठान माना जाता है ।
एवञ्च अर्थात् उपक्रमन्यायके प्रतीतैकवाक्यविषयक होनेसे अद्वैतबोधक शास्त्रकी प्रत्यक्षके साथ एकवाक्यताकी शङ्का भी नहीं हो सकती है, इसीलिए प्रत्यक्ष यद्यपि पूर्ववृत्त है, तथापि उसका ख्याल न करके आगम अपने अर्थका बोधन करता ही है ।
आगम अपने अर्थका बोध करता है, इसलिए—
'पूर्वं परमजातत्वात् ०' ( पूर्व अर्थात् प्रथम अपच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त कर्त्तव्यताज्ञान परका अर्थात् दूसरे कालमें होनेवाले नैमित्तिककर्त्तव्यज्ञानकी उत्पत्ति न होनेसे उसका बाध न करके ही प्रवृत्त होता है और परशास्त्रकी पूर्वके बाधके विना उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः वह पूर्वका बाध करके ही उत्पन्न होता है ) ।
इसीसे व्यवहारमें भी प्रथमकालमें प्रवृत्त शुक्ति-रजतका प्रत्यक्ष उत्तरकालमें प्रवृत्त आप्तोपदेशसे बाधित होता है ॥२॥
‡ षोडशिनामक स्तोत्रके बाद जहाँ अतिरात्र सामोंका गान किया जाता है, उस ज्योतिष्टोमका नाम अतिरात्र है ।
| ३०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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ननूपजीव्यप्रत्यक्षविरुद्धेऽर्थे श्रुतेः कथम् ।
मानत्वं युक्तमिति चेद्,
यदि शङ्का हो कि उपजीव्यभूत प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले आगममें प्रामाण्य कैसे होगा, क्योंकि अबाधितार्थबोधकत्व ही प्रामाण्य है,
ननु तथाऽप्युपजीव्यत्वेन प्रत्यक्षस्यैव प्राबल्यं दुर्वारम् । अपच्छेदशास्त्रयोर्हि न पूर्वं परस्योपजीव्यमिति युक्तः परेण पूर्वस्य बाधः । इह तु वर्णपदादिस्वरूपग्राहकतया मिथ्यात्वबोधकागमं प्रति प्रत्यक्षस्योपजीव्यत्वाद् आगमस्यैव तद्विरुद्धमिथ्यात्वावोधकत्वरूपो बाधो युज्यते । न च मिथ्यात्वश्रुत्या वर्णपदादिसत्यत्वांशोपमर्देऽपि उपजीव्यस्वरूपांशोपमर्दाभावान्नोपजीव्यविरोध इति वाच्यम्, 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि-श्रुतिभिः स्वरूपेणैव प्रपञ्चाभावबोधनात् ।
अब पुनः शङ्का होती है कि* यद्यपि आगमके समान प्रत्यक्ष स्वतः बलवान् नहीं है, तथापि आगमका उपजीव्य होनेसे प्रत्यक्ष ही बलवान् है, अपच्छेदशास्त्रोंमें पूर्व परका उपजीव्य ( कारण ) नहीं है, अतः उनमें पर पूर्वका बाध अवश्य करता है, और प्रकृतमें अर्थात् आगम और प्रत्यक्ष-स्थलमें मिथ्यात्वबोधक 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि आगम ( शास्त्र ) का—वर्ण, पद आदि स्वरूपका ग्राहक होनेसे—प्रत्यक्ष उपजीव्य है, अतः प्रत्यक्षविरुद्ध मिथ्यात्वरूप अर्थका बोधक होनेसे आगमका ही बाध युक्त है । इस विषयमें यदि शङ्का हो कि मिथ्यात्वबोधक श्रुतिसे वर्ण, पद आदिमें सत्यत्व अंशका उपमर्द ( बाध ) होनेपर भी उपजीव्यस्वरूपांशका बाध न होनेसे उपजीव्यभूत प्रत्यक्षसे आगमका विरोध नहीं है ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतियोंसे स्वरूपका ही निषेध होता है, [ अतः उपजीव्यके साथ सर्वथा विरोध होनेसे प्रत्यक्ष ही बलवान् है आगम बलवान् नहीं है, यह भाव है ] ।
* यद्यपि इस शङ्काका 'न चैवमुपजीव्यविरोधः' इत्यादिसे उत्थान और परिहार किया गया है, तथापि उस परिहारका फिर आक्षेप करनेके लिए इस ग्रन्थका उल्लेख किया गया है, 'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतिसे प्रपञ्चका स्वरूप ही निषिद्ध होता है, अतः उपजीव्य स्वरूपका उपमर्द होनेसे उपजीव्य विरोधका निरास नहीं है, इसलिए अनधिगताबाधितविषयकत्व न होनेके कारण अप्रामाण्यापत्ति दुर्वार है, यह भाव है ।
उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित ३०९
अत्र केचित् प्रचक्षते ॥ १३ ॥
न पदज्ञानमानत्वनियता शाब्दमानता ।
वृषभादिपदे भ्रान्त्या न्यूनाधिक्येऽपि दर्शनात् ॥ १४ ॥
इस शङ्काके परिहारमें कुछ लोग कहते हैं कि प्रमात्मक शाब्दबोध प्रमात्मक पदज्ञानसे नियत नहीं है, क्योंकि वृषभ आदि पदोंमें भ्रमात्मक ज्ञानसे भी शाब्दबोध देखा जाता है, अतः उक्त दोष नहीं है ॥ १३ ॥ १४ ॥
अत्र केचिदाहुः—‘वृषमानय’ इत्यादिवाक्यं श्रवणदोषाद् ‘वृषभ-मानय’ इत्यादिरूपेण शृण्वतोऽपि शाब्दप्रमितिदर्शनेन शाब्दप्रमितौ वर्ण-पदादिप्रत्यक्षं प्रमाभ्रमसाधारणमेवापेक्षितमित्यद्वैतागमेन वर्णपदादिप्रत्यक्ष-मात्रमुपजीव्यम्, न तत्प्रमा । तथा च वर्णपदादिस्वरूपोपमर्देऽपि नोप-जीव्यविरोध इति ।
असद्विलक्षणं रूपमुपजीव्यं न तात्त्विकम् ।
तच्चानिर्वचनीयार्थेष्वविरुद्धमितीतरे ॥ १५ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि पदका असद्विलक्षणस्वरूप ही शाब्दप्रमाके प्रति उपजीव्य है, तात्त्विक स्वरूप उपजीव्य नहीं है, असद्विलक्षणस्वरूप को अनिर्वचनीय प्रपञ्चमें माननेसे भी विरोध नहीं है, अतः उक्त दोषकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है ॥ १५ ॥
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—‘वृषमानय’ (बैलको लाओ) यह शब्द किसीसे कोई कहता है परन्तु कानके दोषसे वह ‘वृषभमानय’ ऐसा सुनता है फिर भी उसको ‘बैल लाओ’ इस प्रकार यथार्थ शाब्द ज्ञान होता है, इससे शाब्दज्ञानमें भ्रमप्रमासाधारण वर्ण, पद आदिका प्रत्यक्षमात्र उपजीव्य है, उसका प्रमात्मक प्रत्यक्ष उपजीव्य—कारण नहीं है, इसलिए आगम उसके स्वरूपांशका उपमर्द भले करे, तो भी उपजीव्यके साथ विरोध नहीं होगा । [ तात्पर्यार्थ यह है कि प्रपञ्चके सत्यत्व पक्षमें भी ‘वृषमानय’ इस दृष्टान्तके अनुरोधसे भ्रमप्रमासाधारण शब्दप्रत्यक्ष, अर्थात् शब्दका प्रत्यक्ष भ्रमात्मक हो चाहे प्रमात्मक हो, शाब्दबोधका उपजीव्य है, ऐसा कहना होगा, हमारे (वेदान्तियोंके) मतमें निषेधश्रुतिके बलसे भ्रमरूप प्रत्यक्ष ही सर्वत्र शाब्दबोधमें और अन्य व्यवहारोंमें कारण है, यह विशेष है, अतः शाब्दबोधके प्रति उपजीव्यविरोध नहीं है, क्योंकि शब्दस्वरूप उपजीव्य नहीं है ] ।
| ३१० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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अन्ये त्वाहुः—शाब्दप्रमितौ वर्णपदादिस्वरूपसिद्ध्यनपेक्षायामप्ययोग्यशब्दात् प्रमित्यनुदयाद्योग्यतास्वरूपसिद्ध्यपेक्षाऽस्ति । तदपेक्षायामपि नोपजीव्यविरोधः । 'नेह नानास्ति' इति श्रुत्या निषेधेऽपि यावद्ब्रह्मज्ञानमनुवर्तमानस्याऽर्थक्रियासंवादिनोऽसद्विलक्षणप्रपञ्चस्वरूपस्याऽङ्गीकारात् । अन्यथा प्रत्यक्षादीनां व्यावहारिकप्रमाणानां निर्विषयत्वप्रसङ्गात् ।
न च स्वरूपेण निषेधेऽपि कथं प्रपञ्चस्वरूपस्यात्मलाभः । निषेधस्य प्रतियोग्यप्रतिक्षेपरूपत्वे व्याघातादिति वाच्यम् , शुक्तौ 'इदं रजतम्' 'नेदं रजतम्' इति प्रतीतिद्वयानुरोधेनाधिष्ठानगताध्यस्ताभावस्य बाध-
कुछ लोग* उक्त उपजीव्यविरोधका अन्य प्रकारसे समाधान करते हैं—यद्यपि शाब्दबोधमें वर्ण, पद आदिके स्वरूपकी सिद्धि अपेक्षित नहीं है, तथापि अयोग्य शब्दसे शाब्दज्ञानकी उत्पत्ति न होनेके कारण योग्यता-स्वरूपकी सिद्धि अपेक्षित है । उस योग्यताकी अपेक्षा होनेपर भी उपजीव्यके साथ विरोध नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मातिरिक्त समस्त प्रपञ्चका निषेध होनेपर भी ब्रह्मज्ञानपर्यन्त अनुवर्तमान तथा अर्थक्रियामें समर्थ असत् पदार्थोंसे विलक्षण प्रपञ्चके स्वरूपका अङ्गीकार किया जाता है । यदि असत् ( शशशृङ्ग ) पदार्थसे विलक्षण प्रपञ्चस्वरूप न माना जाय, तो जितने व्यावहारिक प्रमाण हैं, वे सब निर्विषयक हो जायेंगे ।
शङ्का होती है कि स्वरूपतः प्रपञ्चके निषिद्ध होनेपर प्रपञ्चस्वरूपके अस्तित्वका लाभ कैसे होगा ? क्योंकि यदि निषेधको प्रतियोगीका अभावरूप न माना जाय, तो व्याघात होगा । परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिमें 'इदं रजतम्' 'नेदं रजतम्' ( यह रजत है और यह रजत नहीं है ) इस प्रकार दो प्रतीतियोंके अनुरोधसे अधिष्ठानमें अध्यस्तका अभाव—बाधपर्यन्त अनुवृत्त होने-
* इस मतका अवलम्बन करनेवालोंका कहना है कि पूर्व मतमें केवल शब्दका प्रत्यक्षज्ञान शाब्दबोधमें प्रयोजक है, वह चाहे प्रमात्मक हो चाहे भ्रमात्मक हो, परन्तु वर्ण, पद आदिका स्वरूप कारण नहीं है, लेकिन यह उनका कहना युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष निर्विषयक नहीं होता है; अतः वर्णादिस्वरूपका अवश्य शाब्दबोधके कारणरूपसे अङ्गीकार करना चाहिए । इस परिस्थितिमें पूर्वमतमें भी उपजीव्य विरोध अवश्य है, अतः पूर्वोक्त समाधान युक्त नहीं है, अतः मतान्तर कहते हैं, यह भाव है ।
उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित ३११
पर्यन्तानुवृत्तिकासद्विलक्षणप्रतियोगिस्वरूपसहिष्णुत्वाभ्युपगमात् । एतेन प्रपञ्चस्य स्वरूपेण निषेधे शशशृङ्गवदसत्त्वमेव स्यादिति निरस्तम्, ब्रह्मज्ञाननिवर्त्यस्वरूपाङ्गीकारेण वैषम्यात् । न चाऽस्याध्यस्तस्याऽधिष्ठाने स्वरूपेण निषेधे अन्यत्र तस्य स्वरूपेण निषेधः स्वतः सिद्ध इति तस्य सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वापश्या असत्त्वं दुर्वारम् । ‘सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वमसत्त्वम्’
वाले असद्विलक्षण प्रतियोगीस्वरूपका—सहिष्णु है, ऐसा माना जाता है* ।
इससे अर्थात् वक्ष्यमाणब्रह्मज्ञाननिवर्त्यरूप प्रपञ्चस्वरूपका अङ्गीकार करनेसे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि ‘नेह नानास्ति’ इत्यादि श्रुतिसे प्रपञ्चका स्वरूपतः निषेध करनेपर शशशृङ्गके समान प्रपञ्च असत् ही होगा, क्योंकि ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त होनेवाले स्वरूपसे युक्त उस प्रपञ्चका स्वीकार किया गया है । अतः शशशृङ्गसे वैषम्य है ।
यदि शङ्का हो कि अध्यस्तका अधिष्ठानमें स्वरूपतः निषेध किया जाय, तो अन्यत्र अर्थात् अधिष्ठानसे अतिरिक्त देश, कालमें अध्यस्तका निषेध स्वतः सिद्ध है ही; इसलिए वह असत् हो जायगा, क्योंकि सब देश और कालके साथ सम्बन्ध रखनेवाले अभावका वह प्रतियोगी है । असत्त्वका निर्वचन भी यही है
† शङ्कासमाधानका तात्पर्य यह है कि अधिष्ठानभूत ब्रह्ममें प्रपञ्चस्वरूप और प्रपञ्चका निषेध दोनों एक कालमें नहीं मान सकते हैं, यदि निषेध श्रुतिके अनुसार प्रपञ्च-निषेध ब्रह्ममें माना जाय, तो प्रपञ्चकी अवस्थिति नहीं होगी, क्योंकि अभाव प्रतियोगीकी स्थितिका विरोधी होता है, यदि कथञ्चित् जबर्दस्ती मान लिया जाय कि प्रतियोगी और अभाव एकत्र रहते हैं, तो निषेधत्वका व्याघात होगा, क्योंकि निषेधत्व (अभावत्व) प्रतियोग्यवस्थितिविरोधित्वरूप है; अतः स्वरूपतः प्रपञ्चका निषेध करनेपर प्रपञ्चस्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः प्रपञ्चको सत्य मानना चाहिए, यह पूर्वपक्षका तात्पर्य है, इसपर सिद्धान्त कहते हैं कि कल्पितपदार्थप्रतियोगिक अभाव अधिष्ठानसे अन्यत्र प्रतियोगीके साथ भले ही विरोधी हो, परन्तु अधिष्ठानमें कुछ काल तक अविरोधी रहता है अर्थात् अधिष्ठानमें रहनेवाला कल्पितप्रतियोगिक अभाव प्रतियोगीकी अवस्थितिको सहन करता है, ऐसी कल्पनामें द्वैतग्राही प्रत्यक्ष और निषेधश्रुति प्रमाणरूपसे हमको मिल रहे हैं, जैसे न्यायमें घटत्वाद्यभावको प्रतियोगीके साथ घटाद्यधिकरणमें विरोधी मानते हैं, तथापि संयोगादिके अभावको प्रतियोगीके साथ विरोधी नहीं मानते हैं अर्थात् संयोगाधिकरणमें भी संयोगाभाव माना जाता है, वैसे ही हम लोग भी मान, तो क्यों हानि है अर्थात् कुछ हानि नहीं है ।
| ३१२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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इत्येवाऽसत्त्वनिर्वचनाद्, विधान्तरेण तन्निर्वचनायोगादिति वाच्यम्; असतः सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वमुपगच्छता, तथात्वे-प्रत्यक्षस्य सर्वदेशकालयोः प्रत्यक्षीकरणायोगेन, आगमस्य तादृशागमानुपलम्भेन च प्रमाणयितुमशक्यतयाऽनुमानमेव प्रमाणयितव्यमिति तदनुमाने यत् सद्द्यावृत्तं लिङ्गं वाच्यम्, तस्यैव प्रथमप्रतीतस्यासत्त्वनिर्वचनत्वोपपत्तेरित्याहुः ।
पारमार्थिकसत्यत्वं नेह नानेति नुद्यते ।
व्यावहारिकसत्यत्वं न निषिद्धमितीतरे ॥ १६ ॥
'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतिसे प्रपञ्चके पारमार्थिक रूपका ही बाध होता है, व्यावहारिक स्वरूपका बाध नहीं होता, इससे आगमका उपजीव्य प्रत्यक्षसे विरोध नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १६ ॥
कि सब देश और काल आदिके साथ सम्बन्ध रखनेवाले निषेधका जो प्रतियोगी हो, इसके सिवा अन्य कोई प्रकार नहीं है, जिससे कि असत्का निर्वचन हो सके; तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि जो महाशय असत्को सर्वदेशकालसम्बन्धी निषेधका प्रतियोगी मानते हैं, वे उस प्रकारके असत्त्वमें प्रत्यक्षको प्रमाण नहीं दे सकते हैं, क्योंकि सब देश और कालका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, उसी प्रकार शशशृङ्ग आदि सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधके प्रतियोगी हैं इसमें आगम भी प्रमाण नहीं हो सकता है, क्योंकि उस प्रकारका असत्त्वबोधक कोई आगम मिलता ही नहीं, अतः अनुमान ही प्रमाणको कहना होगा। उस अनुमानमें जो ॐ सद्द्यावृत्त हेतु करोगे उसीको, प्रथमोपस्थित होनेके कारण, असत्का लक्षण मानेंगे ।
* सत् पदार्थमें नहीं जानेवाला जो हेतु करोगे वही असत्का लक्षण होगा अर्थात् शशशृङ्ग असत् है, निःस्वरूप होनेसे, जो निःस्वरूप नहीं है वह असत् भी नहीं है, जैसे ब्रह्म इस प्रकारके अनुमानसे ही शशशृङ्ग आदिमें तुम्हें असत्त्वकी सिद्धि करनी होगी, इसलिए प्रथमोपस्थित होनेसे निःस्वरूपत्व ही असत्का निर्दुष्ट लक्षण हो सकता है, तो किसलिए सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वरूप असत्त्व मानना चाहिए ? नहीं मानना चाहिए, प्रकृतमें ज्ञाननिवर्त्यत्वरूप स्वरूप प्रपञ्चमें है, इसलिए प्रपञ्चमें निःस्वरूपत्वरूप असत्त्व नहीं है, अतः शशशृङ्गादिसे प्रपञ्च विलक्षण हो सकता है, यह भाव है।
उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित ३१३
अपरे तु 'नेह नानास्ति' इति श्रुतेः सत्यत्वेन प्रपञ्चनिषेधे एव तात्पर्यम्, न स्वरूपेण । निषेधस्य स्वरूपाप्रतिक्षेपकत्वे तस्य तन्निषेधत्वा- योगात् । तत्प्रतिक्षेपकत्वे प्रत्यक्षविरोधात् ।
न च सत्यत्वस्यापि 'सन् घटः' इत्यादिप्रत्यक्षसिद्धत्वाद् न तेनापि रूपेण निषेधो युक्त इति वाच्यम्, प्रत्यक्षस्य श्रुत्यविरोघाय सत्यत्वा-
कुछ लोग कहते हैं कि 'नेह नानास्ति किञ्चन' (ब्रह्ममें द्वैत प्रपञ्च नहीं है) इस श्रुतिका (ब्रह्ममें) प्रपञ्चका सत्यत्वरूपसे निषेधमें ही तात्पर्य है, प्रपञ्चके स्वरूपसे निषेधमें तात्पर्य नहीं है । यदि ब्रह्ममें प्रपञ्चका स्वरूपसे निषेध प्रतियोगीका प्रतिक्षेपक—विरोधी न माना जाय, तो वह प्रपञ्चका स्वरूपसे निषेध ही नहीं रहेगा । यदि निषेध प्रतियोगीका विरोधी माना जाय, तो प्रत्यक्षविरोध होगा, [इससे प्रपञ्चके अधिकरणीभूत ब्रह्ममें प्रपञ्चका स्वरूपसे निषेध श्रुति नहीं करती है, किन्तु प्रपञ्चका सत्यत्वरूपसे निषेध करती है, अतः प्रतियोगी और अभावके भिन्नाधिकरण होनेसे, कोई दोष नहीं है, यह तात्पर्यार्थ है] ।
- यदि शङ्का हो कि 'घटः सन्' (घट सत् है) इत्यादि प्रत्यक्षसे घटादि-प्रपञ्चमें भी सत्यत्व सिद्ध है, अतः सत्यत्वरूपसे भी प्रपञ्चका निषेध नहीं कर सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुतिके साथ विरोध न हो, इसलिए सत्यत्वाभासरूप व्यावहारिक सत्यत्व ही 'घटः सन्' इत्यादि प्रत्यक्षका विषय है ।
• इस ग्रन्थका तात्पर्यार्थ यह है कि ब्रह्ममें जैसे प्रपञ्च प्रत्यक्षसिद्ध है, वैसे प्रपञ्चमें सत्यत्व भी 'घटः सन्' इत्यादिसे प्रत्यक्षसिद्ध है, इससे निषेधश्रुतिका तात्पर्य प्रपञ्चके सत्यत्वके निषेधमें भी नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रपञ्चमें सत्यत्व है और उसीमें उसका निषेध करना है, अतः निषेध और प्रतियोगीकी अवस्थिति एकत्र हो जानेके कारण निषेधत्वका पूर्वोक्त रीतिसे व्याघात ही होगा, इसपर उत्तर देते हैं कि घट आदिमें जिस सत्यत्वका प्रत्यक्ष होता है, वह ब्रह्माप्रत्यक्षके समान पारमार्थिक नहीं है, किन्तु व्यावहारिक सत्यत्वरूप है, ऐसी कल्पना की जाती है, इसलिए उक्त दोष नहीं है, क्योंकि प्रपञ्चमें व्यावहारिक सत्यत्वका निषेध नहीं करते हैं, किन्तु पारमार्थिकत्वका ही निषेध करते हैं, इसलिए शुक्तिमें जो रजतका निषेध किया जाता है, वह सत्यरजतका ही निषेध किया जाता है, कल्पित रजतका निषेध नहीं किया जाता है, क्योंकि इस मतमें शुक्त्यादिमें कल्पित रजतादिका निषेध नहीं माना जाता है, किन्तु देशान्तरस्थ सत्य रजतादिका ही निषेध किया जाता है, इसीमें 'अत एव' इत्यादि ग्रन्थसे युक्ति दी गई है, और इस मतमें सत्ताके त्रैविध्यका अङ्गीकार भी है।
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३१४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
भासरूपव्यावहारिकसत्यत्वविषयत्वोपपत्तेः । न चैवं सति पारमार्थिक- सत्यत्वस्य ब्रह्मगतस्य प्रपञ्चे प्रसक्त्यभावात् तेन रूपेण प्रपञ्चनिषेधानु- पपत्तिः । यथा शुक्तौ रजताभासप्रतीतिरेव सत्यरजतप्रसक्तिरिति तन्नि- षेधः, अत एव ‘नेदं रजतम्, किन्तु तत्’, ‘नेयं मदीया गौः, किन्तु सैव,’ ‘नात्र वर्तमानश्चैत्रः, किन्त्वपवरके’ इति निषिध्यमानस्याऽन्यत्र सत्त्वमवगम्यते, एवं सत्यत्वाभासप्रतीतिरेव सत्यत्वप्रसक्तिरिति तन्नि- षेधोपपत्तेः । अतो वर्णपदयोग्यतादिस्वरूपोपमर्दशङ्काभावान्नोपजीव्य- विरोध इत्याहुः ।
अन्येऽविवेकादेकैव ब्रह्मसत्ता घटादिषु । असन्निकृष्टे ह्यध्यासोऽन्यत्र संसर्गकल्पनम् ॥ १७ ॥
एक ही ब्रह्मसत्ता घट आदिमें अविवेकसे गृहीत होती है । असन्निकृष्ट स्थलमें अध्यास होता है और अन्यत्र—सन्निकृष्ट स्थलमें संसर्गकी कल्पना की जाती है ॥ १७ ॥
अन्ये तु ब्रह्मणि पारमार्थिकसत्यत्वम्, प्रपञ्चे व्यावहारिकसत्यत्वं सत्यत्वाभासरूपम्, शुक्तिरजतादौ प्रातिभासिकसत्यत्वं ततोऽपि निकृष्ट-
यदि शङ्का हो कि प्रपञ्चमें व्यावहारिक सत्यत्व माननेपर ब्रह्ममें रहनेवाले पारमार्थिक सत्यत्वकी प्रपञ्चमें प्रसक्ति न होनेके कारण पारमार्थिक सत्यत्वरूपसे प्रपञ्चका निषेध नहीं हो सकता है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे शुक्तिमें रजताभासकी प्रतीति ही सत्य रजतकी प्रसक्ति है, इससे उसका निषेध होता है, इसीलिए यह रजत नहीं है, किन्तु वह रजत है, यह मेरी गाय नहीं है, किन्तु वह मेरी गाय है, यहाँ चैत्र वर्तमान नहीं है, किन्तु भीतर है, इस प्रकारका निषेध होता है, उनकी अन्यत्र सत्ता ज्ञात होती है, वैसे ही सत्यत्वा- भासप्रतीति ही सत्यत्वप्रसक्ति है, इसलिए उस सत्यत्वका प्रपञ्चमें निषेध हो सकता है । इससे वर्ण, पद, योग्यता आदि स्वरूपोपमर्दकी शङ्का न होनेसे उपजीव्यके साथ कोई विरोध नहीं है ।
कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्ममें पारमार्थिक सत्यत्व प्रपञ्चमें सत्यत्वाभासरूप व्यावहारिक सत्यत्व और शुक्तिरजत आदिमें व्यावहारिक सत्यतासे निकृष्ट प्रातिभासिक सत्यत्व, इस प्रकार सत्ताका त्रैविध्य नहीं हैं ? किन्तु ब्रह्मरूप
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३१५
मिति सत्तात्रैविध्यं नोपेयते, अधिष्ठानब्रह्मगतपारमार्थिकसत्ताऽनुवेधादेव घटादौ शुक्तिरजतादौ च सत्त्वाभिमानोपपत्त्या सत्यत्वाभासकल्पनस्य निष्प्रमाणकत्वात् । एवं च प्रपञ्चे सत्यत्वप्रतीत्यभावात्, तत्तादात्म्यापन्ने ब्रह्मणि तत्प्रतीतेरेवाविवेकेन प्रपञ्चे तत्प्रसक्त्युपपत्तेश्च सत्यत्वेन प्रपञ्च-निषेधे नोपजीव्यविरोधः, न वा अप्रसक्तनिषेधनम् ।
न च ब्रह्मगतपारमार्थिकसत्ताऽतिरेकेण प्रपञ्चे सत्त्वाभासानुपगमे व्यवहितसत्यरजतातिरेकेण शुक्तौ रजताभासोत्पत्तिः किमर्थमुपेयत इति वाच्यम्, व्यवहितस्याऽसन्निकृष्टस्याऽऽपरोक्ष्यासम्भवात् तन्निर्वाहाय तदुपगमात् ॥ ३ ॥
नन्वेवं स्वमुखं स्वस्यासन्निकृष्टमितीतरत् ।
दर्पणेऽध्यस्तताऽऽपन्नं प्रतिबिम्बं मृषेति चेद् ॥ १८ ॥
रजताभासकी उत्पत्ति माननेपर दर्पणमें अध्यस्त अपना मुख भी असन्निकृष्ट होनेसे अन्य अनिर्वचनीय उत्पन्न होगा, अतः वह मिथ्या होगा, यदि इस प्रकार शङ्का हो तो युक्त नहीं है ॥ १८ ॥
अधिष्ठानमें रहनेवाले पारमार्थिक सत्यत्वके सम्बन्धसे ही घट आदिमें और शुक्तिरजत आदिमें सत्ताका भान हो सकता है, फिर सत्यत्वाभासरूप सत्तान्तरकी कल्पना प्रमाणशून्य है। इस परिस्थितिमें* प्रपञ्चमें सत्यत्वकी प्रतीति न होनेसे प्रपञ्चतादात्म्यापन्न ब्रह्ममें सत्यत्वकी प्रतीतिसे ही अविवेकसे प्रपञ्चमें सत्यत्वकी प्रसक्ति है, अतः सत्यत्वरूपधर्मसे यदि ब्रह्ममें प्रपञ्चका निषेध किया जाय, तो उपजीव्य विरोध नहीं है और अप्रसक्तका निषेध भी नहीं है।
यदि शङ्का हो कि ब्रह्ममें रहनेवाली पारमार्थिक सत्तासे अतिरिक्त प्रपञ्चमें सत्त्वाभासरूप सत्ताके न माननेपर शुक्तिमें भी व्यवहित (दूरस्थ) रजतसे अतिरिक्त प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यवहित रजतके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध न होनेके कारण उसकी अपरोक्षता नहीं हो सकती है, इसलिए अपरोक्षत्वका निर्वाह करनेके लिए प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति मानी जाती है ॥३॥
* इस परिस्थितिमें अर्थात् 'सन्' रूपसे प्रतीयमान घटादितादात्म्यापन्न सद्वस्त्वंशरूप ब्रह्ममें ही 'सन् घटः' इत्याकारक प्रतीतिकी विषयता है, जैसे 'मृद्धटः' इत्यादि प्रतीतिकी मृदंशमें मृद्विषयता है और ब्रह्ममें सत्ताप्रतीति होनेसे ही घटादिमें सत्ताव्यवहार होता है, यह भाव है।
| ३१६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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नन्वेवं प्रतिबिम्बभ्रमस्थलेऽपि ग्रीवास्थमुखातिरेकेण दर्पणे मुखाभासोत्पत्तिरुपेया स्यात् । स्वकीये ग्रीवास्थमुखे नासाद्यवच्छिन्नप्रदेशापरोक्ष्यसम्भवेऽपि नयनगोलकललाटादिप्रदेशापरोक्ष्यायोगात् । प्रतिबिम्बभ्रमे नयनगोलकादिप्रदेशापरोक्ष्यदर्शनाच्च । न च बिम्बातिरिक्तप्रतिबिम्बाभ्युपगमे इष्टापत्तिः । ब्रह्मप्रतिबिम्बजीवस्यापि ततो भेदेन मिथ्यात्वापत्तेः ।
रजतकी अपरोक्षताके लिए यदि शुक्तिमें अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति मानी जायगी, तो जहाँपर प्रतिबिम्बका भ्रम होता है, वहाँ भी ग्रीवास्थ मुखसे अतिरिक्त दर्पणमें अनिर्वचनीय मुखाभास की उत्पत्ति माननी ही होगी, क्योंकि प्रतिबिम्बत्वरूपसे स्वीकृत अपने ग्रीवास्थ मुखमें नासिका आदिसे युक्त प्रदेशका अपरोक्षत्व होनेपर भी नेत्रके गोलक और ललाट आदि प्रदेशका आपरोक्ष्य नहीं होगा, [ क्योंकि उस अंशके साथ इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं है, यह भाव है ] । और प्रतिबिम्बविभ्रममें नयनके गोलक आदि प्रदेशोंका आपरोक्ष्य देखा भी जाता है । यदि शङ्का हो कि बिम्बसे अतिरिक्त प्रतिबिम्ब माननेमें इष्टापत्ति ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवभूत ब्रह्मप्रतिबिम्बके ब्रह्मभिन्न होनेपर जीवमें मिथ्यात्वकी प्रसक्ति होगी । [तात्पर्यार्थ यह है कि बिम्ब और प्रतिबिम्बको यदि एक माना जायगा, तो प्रतिबिम्बका आपरोक्ष्य ( प्रत्यक्षात्मक ज्ञान ) नहीं होगा, क्योंकि बिम्बभूत मुखमें रहनेवाले आँखके गोलक तथा ललाट आदिके साथ इन्द्रिय आदिका सन्निकर्ष न होनेके कारण तदभिन्न प्रतिबिम्बका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा, और यदि प्रत्यक्षकी उपपत्तिका लिए बिम्बसे अतिरिक्त प्रतिबिम्ब मानोगे, तो उसको मिथ्या ही मानना होगा, अन्यथा अद्वैतकी हानि होगी । इस अवस्थामें ब्रह्मप्रतिबिम्बरूपसे माने गये जीवका भी ब्रह्मसे भेद और उसको मिथ्या मानना होगा, क्योंकि जीव ब्रह्मसे स्वरूपतः भिन्न है, ब्रह्मप्रतिबिम्ब होनेसे, मुखप्रतिबिम्बवत् , इस अनुमानसे जीवमें ब्रह्मका भेद सिद्ध करनेपर—जीव मिथ्या है, ब्रह्मभिन्न होनेके कारण, घट आदिके समान, इस अनुमानसे जीवमें मिथ्यात्वप्रसक्ति होगी, इसे इष्टापत्ति नहीं मान सकते हैं, अतः मुखाभासादिकी उत्पत्ति नहीं मान सकते हैं, यह शङ्ककका कहना है ] ।
प्रतिबिम्ब की सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३१७
दर्पणादिपरावृत्तैर्निजैर्नयनरश्मिभिः ।
सन्निकृष्टं मुखं तत्रोपाध्यन्तःस्थितिविभ्रमः ॥ १९ ॥
न दर्पणे मुखाध्यासः संस्कारादेरसम्भवात् ।
ममेदमिति भानाच्चेत्याहुर्विवरणानुगाः ॥ २० ॥
क्योंकि दर्पण आदिसे परावृत्त अपनी नयनकी रश्मियाँ ही सन्निकृष्ट मुखका ग्रहण करती हैं और उसमें केवल उपाध्यन्तःस्थत्व आदि का अध्यास होता है। दर्पणमें मुखका अध्यास उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि संस्कार नहीं है और 'मेरा यह मुख है' इस प्रकार अभेदानुभव भी होता है, ऐसा विवरणानुसारी लोग कहते हैं ॥ १९ ॥ २० ॥
अत्र विवरणानुसारिणः प्राहुः—ग्रीवास्थ एव मुखे दर्पणोपाधिसन्निधानदोषाद् दर्पणस्थत्वप्रत्यङ्मुखत्वविम्बभेदानामध्याससम्भवेन न दर्पणे मुखस्याध्यासः कल्पनीयः, गौरवात् । 'दर्पणे मुखं नास्ति' इति संसर्गमात्रबाधात् । मिथ्यावस्त्वन्तरत्वे 'नेदं मुखम्' इति स्वरूपबाधापत्तेः । 'दर्पणे मम मुखं भाति' इति स्वमुखाभेदप्रत्यभिज्ञानाच्च ।
❊ इस आक्षेपके समाधानमें विवरणानुसारी कहते हैं—ग्रीवास्थ मुखमें ही दर्पणरूप उपाधिके सान्निध्यरूप दोषसे दर्पणस्थत्व, प्रत्यङ्मुखत्व, बिम्बभिन्नत्व आदिका अध्यास हो सकता है, इसलिए दर्पणमें मुखाध्यासकी कल्पना करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि धर्माध्यासकी अपेक्षा धर्मीका अध्यास माननेमें गौरव है। और 'दर्पणमें मुख नहीं है' इस प्रकार जो बाध होता है, वह दर्पणस्थत्वादि संसर्गका ही बाध है, प्रतिबिम्बस्वरूपका बाध नहीं है, [ अतः दर्पणस्थत्व आदि संसर्ग मिथ्या हैं और प्रतिबिम्ब सत्य हैं, यह भाव है ] । यदि यह मान लिया जाय कि प्रतिबिम्ब [ शुक्तिरजतके समान बिम्बभूत वस्तुसे मिथ्याभूत अन्य वस्तु है ] तो 'नेदं मुखम्' ( यह मुख नहीं है ) इस प्रकार स्वरूपबाध ही होता, परन्तु ऐसा तो होता नहीं है, अतः प्रतिबिम्बको मिथ्या वस्तु नहीं मान सकते हैं। और प्रतिबिम्बको सत्यस्वरूप मानने में और भी कारण है कि 'दर्पणमें मेरा मुख है' इस प्रकार अपने बिम्बभूत मुखके साथ अभेदकी प्रत्यभिज्ञा होती है । [ इसलिए प्रतिबिम्ब मिथ्या नहीं है, उसके विषयमें अनुमानसे यह फलित होगा—बिम्बके समान प्रतिबिम्ब सत्य है, बिम्बाभिन्न होनेसे और बाधाभाव होनेसे । इससे प्रतिबिम्बभूत जीवका भी सत्यत्व ही सिद्ध होगा,
* इस विवरणके मतमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका ऐक्य होनेसे बिम्बभिन्नत्व हेतुसे मिथ्यात्वका अनुमान नहीं कर सकते हैं, यह भाव है।
| ३१८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद |
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न च ग्रीवास्थमुखस्याधिष्ठानस्यापरोक्ष्यासम्भवः, उपाधिप्रतिहत-नयनरश्मीनां परावृत्य बिम्बग्राहित्वनियमाभ्युपगमाल्लत्वादिवद् । तन्नियमानभ्युपगमे परमाणोः, कुड्यादिव्यवहितस्थूलस्यापि चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रमप्रसङ्गात् । न च 'अव्यवहितस्थूलोद्भूतरूपवत एव चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रमः, नान्यस्य' इति नियम इति वाच्यम्, बिम्बस्थौल्योद्भूतरूपयोः क्लृप्तेन चाक्षुषज्ञानजननेन उपयोगसम्भवे विधान्तरेणोपयोगकल्पनानु-
क्योंकि उसके ब्रह्मप्रतिबिम्ब होनेपर भी वह ब्रह्मसे अभिन्न है, यह भाव है ।
यदि शङ्का हो कि बिम्ब और प्रतिबिम्बको एक माना जायगा, तो प्रतिबिम्बका सर्वांशसे प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि ग्रीवास्थमुखके (जो प्रतिबिम्बत्व आदिका अधिष्ठानभूत है) नयनगोलक आदिके साथ स्वकीय चक्षुका सन्निकर्ष नहीं है, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उपाधिसे प्रतिहत नेत्र-रश्मियाँ निवृत्त होकर बिम्बको ही ग्रहण करती हैं, जैसे कि ऊपर चढ़ती हुई लताएँ प्रतिहत होकर पुनः नीचे आ जाती हैं, ऐसा नियम माना गया है । यदि यह नियम न माना जाय, तो परमाणु और दिवाल आदि व्यवधानग्रस्त स्थूल पदार्थोंका भी प्रतिबिम्ब प्रसक्त होगा । [तात्पर्यार्थ यह है कि प्रतिबिम्बस्थलमें नेत्रकी किरणें चक्षुगोलकमें से निकलकर दर्पण आदि स्वच्छ द्रव्यरूप उपाधिके समीप जाती हैं और उस उपाधिसे आघात खाकर पुनः वापस लौटती हैं और ग्रीवास्थ मुख और उसके अवयवोंसे संसृष्ट हो जाती हैं। इसके बाद वहीं रश्मियाँ जैसे सामनेके पदार्थोंका साक्षात्कार करती हैं, वैसे ही स्वकीयग्रीवास्थ मुखका सर्वांशसे प्रत्यक्ष करती हैं। इसपर यदि कोई शङ्का करे कि परावृत्त नयनकी रश्मियाँ गोलक द्वारा अन्तर्लीन हो जाती हैं, यह अन्यत्र कहा गया है, इससे यहांपर लौटकर वे मुखसन्निकृष्ट होकर मुखको देखती हैं, यह कल्पना गौरवग्रस्त है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जो प्रतिबिम्बकी उत्पत्ति मानते हैं, उनको भी यह कहना होगा कि चक्षुसन्निकृष्ट पदार्थ ही बिम्ब होता है, असन्निकृष्ट नहीं, इससे उक्त नियम अवश्य मानना होगा। यदि सन्निकृष्ट बिम्ब न माना जाय, तो व्यवहित पदार्थका भी प्रतिबिम्ब-विभ्रम प्रसक्त होगा, अतः ग्रीवास्थ मुखके नयनगोलक आदिके साथ स्वचक्षुःसन्निकर्ष होनेसे प्रतिबिम्बका सर्वाशतः प्रत्यक्ष होगा। यदि
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३१९
पपत्तेः । कुड्यादिव्यवधानस्य प्रतिहतनयनरश्मिसम्बन्धविघटनं विनैवेह प्रतिबन्धकत्वे तथैव घटप्रत्यक्षादिस्थलेऽपि तस्य प्रतिबन्धकत्वसम्भवेन
शङ्का हो कि उसी द्रव्यका चाक्षुषप्रतिबिम्ब होता भ्रम है, जो कि व्यवधान रहित, उद्भूतरूपवान् और स्थूल हो, दूसरेका चाक्षुष प्रतिबिम्ब भ्रम नहीं होता है, ऐसा नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बिम्बगत* स्थूलत्व और उद्भूतरूपका कॢप्त चक्षुरिन्द्रियजन्य ज्ञान द्वारा उपयोग हो सकता है, फिर उनका उपयोग प्रकारान्तरसे मानना अर्थात् स्थूलता और उद्भूतरूपका उनके आश्रय बिम्ब द्वारा प्रतिबिम्बभ्रमकी उत्पत्तिमें उपयोग मानना अनुचित है। और इस अवस्थामैं यह भी आपत्ति हो सकती है—व्यवधानभूत दिवाल आदि पदार्थोंमें प्रतिहत नेत्ररश्मि आदिके सम्बन्धके विघटनके बिना ही प्रतिबिम्बविभ्रम-स्थलमें प्रतिबन्धकत्व होनेपर घट आदिके प्रत्यक्षस्थलमें भी सन्निकर्षविघटनके बिना भित्ति आदि व्यवधानोंमें प्रतिबन्धकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो
* समाधानका तात्पर्य यह है कि द्रव्यके चाक्षुषप्रत्यक्षमें द्रव्यगत महत्त्व और उद्भूतरूप कारण है, यह मानी हुई बात है । इसी प्रकार बाह्य वस्तुके प्रत्यक्षके प्रति दिवाल आदि पदार्थ सन्निकर्षके निरसन द्वारा ही प्रतिबन्धक हैं, यह कॢप्त है। इस अवस्थामें प्रतिबिम्ब और बिम्बके अभेदपक्षमें बिम्बका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही प्रतिबिम्बका चाक्षुष प्रत्यक्ष है, अतः बिम्बभूत मुख आदिमें रहनेवाले स्थूलत्व और उद्भूतरूपको कॢप्त चाक्षुष प्रत्यक्षसे अन्यत्र कारण नहीं मानना पड़ता है, अतः लाघव है, और शुक्तिरजतके समान साक्षीसे भास्य अनिर्वचनीय प्रतिबिम्बाध्यासकी उत्पत्तिपक्षमें, तो प्रतिबिम्बाध्यासमें प्रतिबिम्बसन्निकर्षको कारण माननेसे, वायु और परमाणु आदिके चाक्षुष प्रसङ्गके निवारणके लिए बिम्बगत महत्त्व और उद्भूतरूपको—महत्त्व और स्थौल्यका आश्रयीभूत द्रव्यरूप बिम्बसे उत्पन्न होनेवाले प्रतिबिम्बके अध्यासकी उत्पत्तिमें भी—कारण मानना होगा, यह गौरव है । इसी प्रकार बिम्ब और प्रतिबिम्बके अभेदपक्षमें यह माना जाता है कि नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर बिम्बके साथ सम्बद्ध होती हैं; इससे प्रतिबिम्बविभ्रममें भी बिम्बसन्निकर्षके हेतु होनेसे घट आदिके चक्षुर्जन्य ज्ञानके समान प्रतिबिम्बके चाक्षुषमें भी दिवाल आदि सन्निकर्षके विघटनद्वारा ही प्रतिबन्धक होंगे, अकॢप्त साक्षात् प्रतिबन्धक नहीं होंगे, अतः लाघव है, प्रतिबिम्बके अध्यासपक्षमें तो बिम्बसन्निकर्षके हेतुत्वका अभ्युपगम न होनेसे कुड्यादिमें (दिवाल आदिमें) कॢप्त सन्निकर्षविघटकत्व कह नहीं सकते हैं, अतः कुड्यादिमें प्रतिबिम्ब अध्यासके प्रति साक्षात् ही प्रतिबन्धकताकी ही कल्पना करनी होगी, अन्यथा व्यवहितका भी प्रतिबिम्ब प्रसक्त होगा, इसलिए गौरव है, अतः 'अव्यवहित' इत्यादि ग्रन्थोक्त नियमसे भी उपपत्ति नहीं हो सकती है ।
३२० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद
चक्षुःसन्निकर्षमात्रस्य कारणत्वविलोपप्रसङ्गाच्च । दर्पणे मिथ्यामुखाध्यास- वादिनाऽपि कारणत्रयान्तर्गतसंस्कारसिद्ध्यर्थं नयनरश्मीनां कदाचित्- परावृत्य स्वमुखग्राहकत्वकल्पनयैव पूर्वानुभवस्य समर्थनीयत्वांच्च । न च नासादिप्रदेशावच्छिन्नपूर्वानुभवादेव संस्कारोपपत्तिः । तावता नयनगोल- कादिप्रतिबिम्बाध्यासानुपपत्तेः तटाकसलिला तटविटपिसमारूढादृष्टचर- पुरुषप्रतिबिम्बाध्यासस्थले कथमपि पूर्वानुभवस्य दुर्वचत्वाच्च । एवं चोपाधिप्रतिहतनयनरश्मीनां बिम्बं प्राप्य तद्ग्राहकत्वेऽवश्यं वक्तव्ये फलबलाद्दर्पणाद्यभिहतानामेव बिम्बं प्राप्य तद्ग्राहकत्वम्, न शिलादि-
फिर चक्षुःसन्निकर्षमात्रमें प्रत्यक्षकारणत्वका विलोप प्रसक्त हो जायगा । और यह भी बात है कि जो दर्पणमें मिथ्याभूत मुखप्रतिबिम्ब मानता है, उसको भी दोष, सम्प्रयोग और संस्कार इन तीन कारणोंके अन्तर्गत संस्कारकी सिद्धिके लिए किसी समयमें नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर ही स्वमुखकी ग्राहक होती हैं, इस प्रकारकी कल्पना करके पूर्वानुभवका समर्थन करना पड़ेगा । यदि शङ्का हो कि नासिका आदि प्रदेशसे युक्त पूर्वके अनुभवसे ही उक्त स्थलमें संस्कारकी उपपत्ति हो सकती है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि नासिका आदि प्रदेशसे युक्त पूर्वानुभवसे नयनगोलक आदि प्रतिबिम्बाध्यासकी उपपत्ति नहीं हो सकती है और तालाबके जलमें किसी समयमें नहीं देखे गये और किनारेके वृक्षके ऊपर चढ़े हुए पुरुषके प्रतिबिम्बस्थलमें किसी रीतिसे भी पूर्वानुभवका समर्थन भी नहीं कर सकते हैं । इस अवस्थामें उक्त प्रकारसे उपाधिसे आहत होकर चक्षुकी रश्मियाँ लौटकर बिम्बको ग्रहण करती हैं, इस प्रकार अवश्य कहना होगा, परन्तु अनुभवके आधारपर यह भी कहना होगा कि दर्पण आदि स्वच्छ उपाधिके प्रतिघातसे लौटी हुई रश्मियाँ ही बिम्बका ग्रहण करती हैं, शिला आदिसे आहत हुई रश्मियाँ नहीं ग्रहण करती हैं, अतः शिला आदिमें प्रतिबिम्ब नहीं होता है। जो उपाधियाँ अत्यन्त स्वच्छ नहीं हैं, ऐसी ताम्र आदि उपाधियोंसे आहत नयन- रश्मियाँ मलिन उपाधिके सम्बन्धसे मुख आदि बिम्बभूत पदार्थोंके नयन- गोलक आदि संस्थानोंका ग्रहण नहीं कर सकती हैं, [ अतः शिलादिसे वैलक्षण्य होनेपर भी उनमें कार्त्स्न्येन प्रतिबिम्बग्राहकत्व नहीं है, यह भाव है।] और
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२१
प्रतिहतानाम् । अनतिस्वच्छताम्रादिप्रतिहतानां मलिनोपाधिसम्बन्धदोषाद् मुखादिसंस्थानविशेषग्राहकत्वं साक्षात् सूर्यं प्रेप्सूनामिव उपाधिं प्राप्य निवृत्तानां न तथा सौरतेजसा प्रतिहतिरिति न प्रतिबिम्बसूर्यावलोकने साक्षात्तदवलोकने इवाऽशक्यत्वम् । जलाद्युपाधिसन्निकर्षे केषांचिदुपाधिप्रतिहतानां बिम्बप्राप्तावपि केषांचित्तदन्तर्गमनेनान्तरसिकतादिग्रहणमित्यादिकल्पनान्न कश्चिद् दोष इति ।
अद्वैतविद्याचार्यास्तु पार्श्वस्थैर्भेददर्शनात् ।
ग्रीवास्थादन्यदध्यस्तं प्रतिबिम्बमुखं विदुः ॥ २१ ॥
अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि समीपस्थ मनुष्य मुख्य मुखसे प्रतिबिम्बभूत मुखका भेद देखते हैं, अतः ग्रीवास्थ मुखसे अध्यस्त प्रतिबिम्बभूत मुख भिन्न है ॥२१॥
अद्वैतविद्याकृतस्तु प्रतिबिम्बस्य मिथ्यात्वमभ्युपगच्छतां त्रिविधजीववादिनां विद्यारण्यगुरुप्रभृतीनामभिप्रायमेवमाहुः—
साक्षात् सूर्यको देखनेकी इच्छासे प्रवृत्त हुईं नयनरश्मियाँ जैसे सूर्यके तेजसे पराहत होती हैं, वैसे उपाधिके प्रति जाकर लौटी हुई नेत्रकी रश्मियाँ सूर्यके तेजसे आहत नहीं होती हैं, इसलिए साक्षात् सूर्यके अवलोकनमें जैसी कठिनाई होती है, वैसी प्रतिबिम्बित सूर्यके अवलोकनमें नहीं होती है । जल आदि उपाधिके सन्निकर्षमें कुछ नेत्रकी किरणें उपाधिसे आहत होकर बिम्बदेश तक जाती हैं, तो भी अवशिष्ट कुछ रश्मियाँ उपाधिके भीतर जाकर उसमें की बालू आदिका ग्रहण करती हैं, इत्यादि कल्पना करनेसे कुछ भी *दोष नहीं है ।
प्रतिबिम्बको मिथ्या और जीवको पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक भेदसे त्रिविध माननेवाले श्रीविद्यारण्यप्रभृतियोंका अभिप्राय अद्वैताचार्य निम्न प्रकारसे कहते हैं—
* नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर बिम्बको ग्रहण करती हैं, यही सुरेश्वराचार्यजीका भी मत है—
‘दर्पणाभिहता दृष्टिः परावृत्य स्वमाननम् ।
व्याप्नुवत्याभिमुख्येन व्यत्यस्तं दर्शयेन्मुखम् ॥’
अर्थात् दर्पण आदि उपाधियोंसे प्रतिहत दृष्टि लौटकर अपने ग्रीवास्थ मुखको व्याप्त करती हुई विपरीत मुखका आभिमुख्यसे ग्रहण कराती है, यह भाव है ।
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| ३२२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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चैत्रमुखाद् भेदेन तत्सदृशत्वेन च पार्श्वस्थैः स्पष्टं निरीक्ष्यमाणं दर्पणे तत्प्रतिबिम्बं ततो भिन्नं स्वरूपतो मिथ्यैव, स्वकरगतादिव रजताच्छुक्तिरजतम् । न च 'दर्पणे मम मुखं भाति' इति बिम्बाभेदज्ञानविरोधः, स्पष्टभेदद्वित्वप्रत्यङ्मुखत्वादिविज्ञानविरोघेनाऽभेदज्ञानासम्भवात् । 'दर्पणे मम मुखम्' इति व्यपदेशस्य स्वच्छायामुखे स्वमुखव्यपदेशवद् गौणत्वाच्च । न चाऽभेदज्ञानविरोधाद् भेदव्यपदेश एव गौणः किं न स्यादिति शङ्क्यम्, बालानां प्रतिबिम्बे पुरुषान्तरभ्रमस्य हानोपादित्सार्थक्रियापर्यन्त-
चैत्र जिस कालमें अपना मुख दर्पणमें देखता है, उस कालमें पासके मनुष्य ग्रीवास्थ बिम्बभूत चैत्रके मुखसे भिन्न और सदृश प्रतिबिम्बभूत मुखको स्पष्टरूपसे देखते हैं और वह स्वरूपतः मिथ्या ही है, जैसे कि अपने हाथके रजतसे भिन्न और उसके सदृश स्पष्ट दिखनेवाला शुक्तिरजत स्वरूपतः मिथ्या होता है। यदि शङ्का हो कि प्रतिबिम्ब बिम्बसे भिन्न कैसे हो सकता है, क्योंकि 'दर्पणमें मेरा मुख भासता है' इस प्रकार बिम्बसे प्रतिबिम्बका अभेद भासता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्ब और बिम्बका स्पष्टभेद, द्वित्व, प्रत्यङ्मुखत्व, प्राङ्मुखत्व आदिके ज्ञानसे विरोध होनेके कारण अभेदज्ञान हो ही नहीं सकता है। और 'दर्पणमें मेरा मुख है' इस प्रकारका व्यपदेश तो जैसे अपने छायामुखमें अपने मुखका व्यवहार होता है, वैसे ही गौण है *। इसपर यदि शङ्का हो कि अभेदज्ञानके विरोधसे भेदव्यपदेश ही तुल्ययुक्तिसे गौण क्यों न माना जाय ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बालकोंको प्रतिबिम्बमें अन्य पुरुषका भ्रम होता है, जिससे हान ( त्याग ), उपादित्सा ( ग्रहण करनेकी इच्छा ) आदि जो उसकी अर्थक्रिया होती है, उसका अपलाप किसी रीतिसे नहीं कर सकते हैं †। इसपर भी यदि पुनः शङ्का हो कि बुद्धिमान् पुरुष भी
* 'दर्पणमें मेरा मुख दिखता है', 'मेरा मुख मलिन है', 'मेरा मुख दीर्घ है', 'दर्पण आदिमें मेरा ग्रीवास्थ मुख ही है' इत्यादि अनेक अभेदोंका अनुभव होता है, अतः अभेदानुभव ही मुख्य है, और भेदानुभव तो अभेदानुभवके विरोधसे केवल औपचारिक है, अतः बिम्ब और प्रतिबिम्बका वास्तविक भेद न होनेपर भी कल्पित भेद मान करके उक्त अभेदानुभवोंकी उपपत्ति हो सकती है, यह पूर्वपक्षका भाव है।
† तात्पर्य यह कि प्रतिबिम्बविषयक प्रवृत्ति आदि लोकमें होती है, अतः उसका अवश्य भेद मानना चाहिए, इसीलिए अज्ञानी बालक जलाशय आदिमें अत्यन्त भयंकर प्रतिबिम्बको देखकर