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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ६३

तथा च 'आत्मन आकाशः सम्भूतः' इत्यादिकारणवाक्येषु शबलवाचिनामात्मादिशब्दानां शुद्धे लक्षणैवेति । सार्वत्म्यस्येशालिङ्गत्वात् यः सर्वज्ञ इति श्रुतेः । मायोपहितमीशं तदाहुर्विवरणानुगाः ॥ १८ ॥

'सैव ॠक् तत्साम' इत्यादि श्रुतिसे कहा गया सर्वात्मकत्व ईश्वरमें लिङ्ग है और 'यः सर्वज्ञः' इस प्रकार श्रुति है; अतः जगत्का उपादान मायोपाधिक चैतन्य अर्थात् ईश्वर ही है, ऐसा विवरणानुसारी कहते हैं ॥ १८ ॥

विवरणानुसारिणस्तु—'यः सर्वज्ञः सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते' इति श्रुतेः सर्वज्ञत्वादिविशिष्टं मायाशबलमीश्वररूपमेव ब्रह्म उपादानम् ।

और उसके भाष्यमें जगदुपादानत्व ज्ञातव्य ब्रह्मका लक्षण कहा गया है । इसलिए 'आत्मन आकाशः०' ( आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि ‡ कारणप्रतिपादक वाक्योंमें शबलवाची—मायासे युक्त चैतन्यके बोधक—'आत्म' शब्दोंकी शुद्धमें लक्षणा ही है । 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्०' ( जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है, जिसका तप ज्ञानमय—स्वरूपज्ञानका विकार है, उस सर्वज्ञ ब्रह्मसे हिरण्यगर्भ, नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं ) इस श्रुतिसे सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त मायासे


हो लक्षण किया जाता है, यह अवश्य स्वीकार करना होगा, अन्यथा अप्रतिज्ञातके लक्षणका प्रसङ्ग होगा, अतः सूत्र-भाष्यकी मर्यादाका संरक्षण करनेके लिए उन शबलवाची आत्मार्थक शब्दोंकी शुद्धमें लक्षणा करनी होगी, यह संक्षेपशारीरककारके अनुयायियोंका मत है ।

‡ यद्यपि 'तद्विजिज्ञासस्व' इत्यादि वाक्यशेषसे शुद्ध ब्रह्म ही जिज्ञास्य है और उसका 'यतो वा' इत्यादि श्रुतिसे लक्षण किया गया है, अतः इस शङ्काका अवसर नहीं है कि शुद्ध ब्रह्म कारण है या जीवरूप या ईश्वर, तथापि जैसे शुद्ध ब्रह्म जिज्ञास्य है, वैसे ही जीव और ईश्वर, जो 'त्वम्' और 'तत्' शब्दसे वाच्य हैं, जिज्ञास्य हैं, क्योंकि वे भी शुद्ध ब्रह्मके ज्ञानके प्रति हेतु हैं, अतः उनमें भी जगत्के प्रति उपादानता है, इसलिए शङ्काका होना सम्भव है, और चैतन्यके तीन भेद भी शास्त्रमें मिलते हैं— जीव ईशो विशुद्धा चित् तथा जीवेशयोर्भिदा । अविद्या तचितोर्योगः षडस्माकमनादयः ॥ अर्थात् जीव, ईश्वर, शुद्ध चैतन्य ( ब्रह्म ), जीव और ईश्वरका भेद, अविद्या और चित्का सम्बन्ध, ये छः अनादि हैं, इनमें चैतन्यके तीन भेद प्रतीत होते हैं, अतः प्रश्न होता है ।

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६४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अत एव भाष्ये 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' (उ० मी० अ० १ पा० १

शबल अर्थात् मायारूप उपाधिसे विशिष्ट * ईश्वररूप ब्रह्म ही जगत्‌के प्रति उपादान है, ऐसा ज्ञात होता है।

इसीसे—ईश्वररूप ब्रह्म ही उपादान है, ऐसा स्वीकार करनेसे †'अन्त-


* 'मायाविशिष्ट ब्रह्म ही जगत्‌के प्रति उपादान है' यह विवरणका मत है, अतः इसकी परिपुष्टि करनेके लिए हम यहाँ विवरणकी कुछ पङ्क्तियाँ उद्धृत करते हैं—

'तस्मादनिर्वचनीयमायाविशिष्टं कारणं ब्रह्मेति प्राप्तम् ......... ... त्रैविध्यमत्र सम्भवति— रज्ज्वाः संयुक्तसूत्रद्वयवत् मायाविशिष्टं ब्रह्म कारणमिति वा 'देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' इति श्रुतेः मायाशक्तिमत्कारणमिति वा, जगदुपादानमायाश्रयतया ब्रह्मकारणमिति वा। तत्र विशिष्टपक्षे तथैव ब्रह्मानेनोपलक्षितस्य ज्ञानानन्दादिस्वरूपलक्षणेन मायानिष्कर्पलक्षणद्वयेन विशुद्धब्रह्मसिद्धिः । उत्तरपक्षयोस्तु मायाया ब्रह्मपरतन्त्रत्वात् तत्कार्यमपि ब्रह्मपरतन्त्रं भवति; यथाऽंशु-तन्त्रतन्त्वारब्धोऽपि पटोऽशुतन्त्रः प्रतीयते । ततश्च उत्पद्यमानकार्यस्य यद् आश्रयोपाधिज्ञानानन्दलक्षणं च तद् ब्रह्मेति शुद्धब्रह्मलाभ इति”। (टीकानवकोपेत शा० पृ० ९०७ कल० मुद्रित) अर्थात् इससे अनिर्वचनीय मायासे विशिष्ट ब्रह्म ही जगत्‌का उपादान है, यह सिद्ध हुआ, इसमें तीन प्रकार भासते हैं—जैसे रज्जुके प्रति संयुक्त दो सूत्र कारण हैं, वैसे ही मायाविशिष्ट ब्रह्म कारण है—माया भी विशेषणरूपसे कारण है, अथवा 'देवात्मशक्तिम्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार मायाशक्तिसे युक्त ब्रह्म कारण है, अथवा जगत्‌की उपादान मायाके आश्रयरूपसे ब्रह्म कारण है। प्रथम पक्षमें ब्रह्मका लक्षण—जगत्कारणस्वरूप मायामें जाता है, तथापि ज्ञानानन्दरूप स्वरूपलक्षणके प्रवेशसे शुद्ध ब्रह्म ही सिद्ध होगा। द्वितीयादि पक्षमें जैसे अंशुके (तन्तुके अवयवके) अधीन तन्तुसे आरब्ध पट अंशुतन्त्र ही है, वैसे ही ब्रह्मपरतन्त्र मायाका कार्य भी ब्रह्मपरतन्त्र ही होगा, इसलिए उत्पद्यमान कार्यका जो आश्रयोपाधि (अज्ञान सत्ताका हेतु) ज्ञान और आनन्द लक्षण है, वह ब्रह्म है, ऐसा सिद्ध होगा। इससे यह बात मालूम होती है—विवरणकार यद्यपि औपाधिक ब्रह्मको कारण मानते हैं, तथापि शुद्ध ब्रह्मकी सिद्धि तो किसी रूपसे होती ही है।

† 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रके भाष्यमें विचार किया गया है कि छान्दोग्यमें 'एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः' (जो यह सूर्यके अन्दर ज्योतिःस्वरूप पुरुष है) इत्यादिका उपक्रम करके 'य एषोन्तरऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' (जो यह चक्षुके भीतर पुरुष देखा जाता है) इत्यादि सुना जाता है। यहांपर संशय होता है—आदित्य और आँखके अन्दर रहनेवाला कोई विशिष्ट जीव है या ईश्वर है। पूर्वपक्षीके अभिप्रायसे जीवके प्राप्त होनेपर सिद्धान्त करते हैं कि आदित्य आदिमें रहनेवाला ईश्वर ही है, क्योंकि उन श्रुतियोंमें ईश्वरके धर्मोंका कथन मिलता है—सर्वात्मकत्व—सर्वतादात्म्यत्वरूप धर्म सर्वोपादान होनेसे ईश्वरमें ही है, जीवमें नहीं है, कारण कि जीव अल्पज्ञ और अल्पशक्ति होनेसे जगत्‌के प्रति कारण नहीं है। अतः सर्वात्मकत्व उसमें नहीं हैं, इसलिए आदित्य आदिके अन्दर रहनेवाला पुरुष जीव नहीं है। और

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ६५


सू० २०) 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' ( उ० मी० अ० १ पा० २ सू० १ ) इत्याद्यधिकरणेषु 'सैव ऋक् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद् ब्रह्म सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः' इत्यादिश्रुत्युक्तं सर्वोपादानत्वप्रयुक्तं सर्वात्मकत्वं जीवव्यावृत्तमीश्वरलिङ्गमित्युपवर्णितम् ।

जीवेश्वरानुस्यूतचैतन्यमात्रस्य सर्वोपादानत्वे तु न तज्जीवव्यावृत्तमीश्वरलिङ्गं स्यात् । सङ्क्षेपशारीरके शबलोपादानत्वनिराकरणमपि माया-


स्तद्धर्मोपदेशात्' और 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' ‡ इत्यादि अधिकरणोंके भाष्यमें 'सैव ऋक् तत्साम०' (वही—चक्षुके अन्दर रहनेवाला पुरुष ऋक् है, वही साम है, वही उक्थ है, वही यजु है और वही ब्रह्म—वेद है अर्थात् ऋक् आदिसे अतिरिक्त वेद है ) इत्यादि श्रुतिसे कहा गया जीवव्यावृत्त—जीवमें नहीं रहने वाला सर्वोपादानताप्रयुक्त जो सर्वात्मकत्व है, वह ईश्वरका लिङ्ग कहा गया है ।

यदि जीव और ईश्वरमें अनुगत केवल शुद्ध चैतन्य ही सबके प्रति उपादान कारण माना जाय, तो वह सर्वात्मकत्व जीव-व्यावृत्त ईश्वरलिङ्ग नहीं होगा। शबलवाची चैतन्यमें उपादानकारणताका निराकरण संक्षेपशारीरकमें जो किया गया है, वह भी मायाविशिष्ट चेतन उपादान कारण नहीं है, इस अभिप्रायसे है अर्थात् मायाके विम्बरूप ईश्वरके विशेषण होनेसे जो उसका


भगवान् भाष्यकारने '............ऋक् सामाद्यात्मकतां निर्धारयति । सा च परमेश्वरस्यैवोपपद्यते, सर्वकारणत्वात् सर्वात्मकत्वोपपत्तेः' इस पंक्तिसे सर्वोपादानत्वप्रयुक्त जो सर्वात्मकत्व है, वह 'आदित्य आदिमें रहनेवाला जीव नहीं है, प्रत्युत ईश्वर है' इस प्रकार जीवव्यावृत्त ईश्वरके परिग्रहमें लिंगरूपसे कहा गया है । 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रका अर्थ है—अन्तः आदित्य आदिके अन्दर रहनेवाला पुरुष [ ईश्वर ही है किससे ? इससे कि ] तद्धर्मोपदेशात् यहां ईश्वरके धर्मका उपदेश है ।

'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इस सूत्रमें भी 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' ( यह सब ब्रह्म है ) इसका उपक्रम करके 'स क्रतुं कुर्वीत' ( वह उपासना करे ) इस प्रकार उपासनाका विधान किया है। अनन्तर 'मनोमयः प्राणशरीरः' ( मनोमय—मन-प्रधान और प्राणशरीरवाला ) इत्यादिसे वह उपास्य कहा गया है। इसमें मनोमय आदिसे जीवका ग्रहण होता है अथवा पर-ब्रह्मका ? इस प्रकार संशय होता है, पूर्वपक्षमें जीव प्राप्त होता है, परन्तु सिद्धान्तमें ईश्वर ही मनोमय आदिसे लिया गया है, क्योंकि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादिसे सर्वात्मकत्वका अभिधान है।

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६६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

विशिष्टोपादानत्वनिराकरणाभिप्रायम्, न तु निष्कृष्टेश्वररूपचैतन्योपादानत्व-
निराकरणपरम् । तत्रैव प्रथमाध्यायान्ते जगदुपादानत्वस्य तत्पदार्थवृत्ति-
त्वोक्तेः । एवं च ईश्वरगतमपि कारणत्वं तदनुगतमखण्डचैतन्यं शाखा-
चन्द्रमसमिव तटस्थतयोपलक्षयितुं शक्नोतीति तस्य ज्ञेयब्रह्मलक्षणत्वोक्ति-
रिति मन्यन्ते ।


उपादानकुक्षिमें भी प्रवेश प्राप्त है, उसके निरासके लिए संक्षेपशारीरककारका प्रयास है, न कि बिम्बविशिष्ट चैतन्यरूप ईश्वर उपादान कारण नहीं है इस अभिप्रायसे । [ अतः संक्षेपशारीरककारके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है । परन्तु संक्षेपशारीरकमें 'शबल चेतन * जगत्का उपादान नहीं है' इस प्रकार साक्षात् औपाधिक चेतनमें जगत्कारणताका निषेध करके 'शुद्ध ब्रह्म ही जगत्का उपादान है, क्योंकि शुद्ध ब्रह्म ज्ञेयरूपसे उपन्यस्त है, ऐसा कहा गया है, अतः स्वारसिक अर्थको छोड़कर संक्षेपशारीरककारका स्वकपोलकल्पित विरुद्ध अर्थ कैसे करते हो ? यदि कोई इस प्रकारकी शङ्का करे, तो वह युक्त नहीं है, ] क्योंकि संक्षेपशारीरकमें ही प्रथम अध्यायके अन्तमें 'जगत्की उपादानता तत्पदार्थ—ईश्वरमें है' ऐसा कहा गया है । इस परिस्थितिमें—'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इत्यादि अधिकरणोंके पर्यालोचनसे अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप लक्षणके बिम्बभूत ईश्वरगत होनेपर ईश्वरमें रहनेवाली भी कारणता तटस्थरूपसे शाखास्थ चन्द्रमाके समान बिम्बरूपचैतन्यानुगत अखण्डचैतन्यकी उपलक्षण हो सकती है, अतः उसका ज्ञेय ब्रह्मके लक्षणरूपसे कथन ( सूत्र और भाष्यमें )


* इस अभिप्रायका सूचक संक्षेपशारीरकका श्लोक देखिए—

स्वात्मानमेव जगतः प्रकृतिं यदेकम्,
सर्गे विवर्तयति तत्र निमित्तभूतम् ।
कर्माकलय्य रमणीयकपूयमिश्रम्,
पश्यन्नृणां परिवृढं तदितीर्यमाणम् ॥५५०॥ [ सं० शा० अ० १ ]

जो संसारकी उत्पत्तिमें एक चेतन निमित्तभूत है, वह प्राणियोंके पुण्य, पाप और मिश्र—इन त्रिविध कर्मोंका ठीक-ठीक आलोचन करता हुआ उनका ग्रहण करके तदनुसार स्वयं ही चेतनप्रकृतिरूप होकर मायासे जगदाकारेण विवर्तमान होता है, अतः वही सर्वज्ञ सर्वशक्ति-आदि स्वभाववाला ब्रह्म है और 'तद् ब्रह्म' आदि वाक्य भी इसी लक्षणको कहकर ब्रह्ममें ही समन्वित होता है ।

.ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहितं ६७


ईश्वरो वियदादौ स्यात् जीवेशौ लिङ्गतद्गते ।
मायाऽविद्याभिदावादाः केचिदेवं प्रचक्षते ॥१९॥

आकाश आदि महाभूतोंकी सृष्टिमें ईश्वर उपादान है और लिङ्गशरीर, लिङ्गस्थ धर्म और सुख आदिमें जीव और ईश्वर दोनों उपादान कारण हैं, इस प्रकार माया और अविद्यामें भेद माननेवालोंमें से कुछ लोग कहते हैं ॥ १९ ॥

वियदादिप्रपञ्च ईश्वराश्रितमायापरिणाम इति तत्रेश्वर उपादानम् । अन्तःकरणादिकं तु ईश्वराश्रितमायापरिणाममहाभूतोपसृष्टजीवाविद्याकृत-भूतसूक्ष्मकार्यमिति तत्रोभयोरुपादानत्वम् । अत एव ‘एवमेवास्य परि-परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति’ इति श्रुतौ कलाशब्दवाच्यानां प्राणमनःप्रभृतीनां विदुषो विदेहकैवल्यसमये विद्यानिवर्त्याविद्याकार्यांशाभिप्रायेण विद्ययोच्छेदो दर्शितः ।

‘गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः’ इति श्रुत्यन्तरे तदनिवर्त्यमायाकार्य-


है, [ अतः ‘जन्माद्यस्य’ इत्यादि सूत्र और उसके भाष्यके साथ विरोध नहीं है ] ऐसा विवरणके अनुयायियोंका मत है ।

आकाश आदि महाभूतप्रपञ्च ईश्वरमें रहनेवाली मायाका परिणाम है अतः आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चका उपादान है—ईश्वर । अन्तःकरण आदि प्रपञ्च तो ईश्वराश्रित मायाके परिणामभूत आकाश आदि उपष्टम्भकलक्षण महाभूतोंसे संसृष्ट जीवकी अविद्यासे उत्पन्न हुए सूक्ष्म भूतोंका कार्य है, इसलिए ईश्वर और जीव दोनों अन्तःकरण आदिके उपादान कारण हैं । इसीसे अर्थात् जीवकी अविद्यासे परिणत सूक्ष्म भूत और उसके उपष्टम्भक मायाके परिणाम महाभूत उपादानरूपसे अन्तःकरण आदिमें प्रविष्ट होनेसे ‘एवमेवाऽस्य०’ (जैसे गङ्गा आदि नदियां समुद्रको प्राप्त कर उसमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही सर्वत्र आत्मभावको देखनेवाले इस विद्वान् पुरुषकी ये सोलह कलाएँ, जिनका चिदात्मा–पुरुष ही अधिष्ठान है, पुरुषको प्राप्त कर उसीमें लीन हो जाती हैं ) इस श्रुतिमें विद्वान्‌के विदेहकैवल्य-समयमें विद्यासे नष्ट होनेवाली अविद्याके कार्यांशके अभिप्रायसे कलाशब्दसे कहे जानेवाले प्राण, मन आदिका पुरुषमें विद्यासे विनाश बतलाया गया है ।

‘गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः’ (पन्द्रह कलाएँ प्रतिष्ठाके—पृथ्वी आदि


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६८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


महाभूतपरिणामरूपोपष्टम्भकांशाभिप्रायेण तेषां स्वस्वप्रकृतिषु लयो दर्शित इति मायाऽविद्याभेदवादिनः ।

लिङ्गादौ जीव एवेति केचित्तत्रैकदेशिनः ।
महाभूतलयोक्तिस्तु कलानामन्यदृष्टितः ॥२०॥

माया और अविद्यामें भेद माननेवालोंमें से कुछ लोग लिङ्गशरीर और अन्तःकरण आदिका उपादान जीव ही है कलाओंकी महाभूतोंमें लयोक्ति तो तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिसे है, ऐसा कहते हैं ॥ २० ॥

यथा वियदादिप्रपञ्च ईश्वराश्रितमायापरिणाम इति तत्र ईश्वर उपादानम्, तथाऽन्तःकरणादि जीवाश्रिताविद्यामात्रपरिणाम इति तत्र जीव एव उपादानम् ।

न चान्तःकरणादौ मायाकार्यमहाभूतानामप्यननुप्रवेशे उदाहृतश्रुतिद्वयव्यवस्थाऽनुपपत्तिः । कलानां विद्ययोच्छेदश्रुतिस्तत्त्वविद्द्दष्टिविषया ।


महाभूतोंके—प्रति गई अर्थात् उनमें लीन हुई) इस प्रकारकी अन्य श्रुतिमें जीवकी विद्यासे निवृत्त न होनेवाली मायाके कार्य महाभूतोंका परिणामरूप जो उपष्टम्भक अंश है, उसके आधारपर उन पञ्चदश कलाओंका अपनी-अपनी प्रकृतिमें विलय बतलाया गया है, यह उन लोगोंका मत है, जो माया और अविद्याको भिन्न-भिन्न मानते हैं ।

माया और अविद्याको भिन्न माननेवालोंमें से कुछ लोगोंका मत है कि जैसे आकाश आदि महाभूत प्रपञ्च ईश्वरकी आश्रित मायाका परिणाम है, अतः आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चमें ईश्वर उपादान है, वैसे ही अन्तःकरण आदि जीवकी आश्रित केवल अविद्याके परिणाम हैं, इसलिए उनमें जीव ही उपादान है, ईश्वर उपादान नहीं है ।

यदि कोई कहे कि मायाके कार्य जो महाभूत हैं, उनका अन्तःकरण आदिमें अनुप्रवेश न माना जाय, तो पूर्वमें उदाहृत दो श्रुतियोंकी व्यवस्था नहीं होगी, नहीं, व्यवस्था होगी, क्योंकि 'एवमेवास्य' इत्यादि प्राण, मन आदि कलाओंका विद्यासे उच्छेदबोधन करनेवाली जो श्रुति है, वह तत्त्वविद्द्दष्टिविषयक है अर्थात् आत्मतत्त्वको जाननेवाला जो पुरुष है, उसकी जो दृष्टि-तत्त्व-साक्षात्कार तद्विषयक है—पुरुषमें कलालयश्रुति साक्षात्कारके अभिप्रायसे है,

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ब्रह्मकी कारणताको विचार ] भाषानुवादसहित ६९


'गताः कलाः' इति श्रुतिस्तु तत्त्वविदि म्रियमाणे समीपवर्तिनः पुरुषाः नश्यद्घटवत्तदीयशरीरादीनामपि भूम्यादिषु लयं मन्यन्ते इति तटस्थपुरुषप्रतीतिविषयेति व्यवस्थायाः कलालयाधिकरणभाष्ये स्पष्टत्वात्, इति मायाऽविद्याभेदवादिष्वेकदेशिनः ॥

मायाऽविद्यैक्यवादेऽपि जीवतादात्म्यदर्शनात् ।
जीव एव हि लिङ्गादेरुपादानमितीतरे ॥ २१ ॥

माया और अविद्याका अभेद मानने वालोंमें भी कुछ लोग अन्तःकरण आदिकी जीवके साथ तादात्म्यप्रतीति होनेसे अन्तःकरण आदिका जीव ही उपादान है, ऐसा कहते हैं ॥ २१ ॥

तदभेदवादिष्वपि केचित्—यद्यपि वियदादिप्रपञ्चस्य ईश्वर उपादानम्, तथाऽप्यन्तःकरणादीनां जीवतादात्म्यप्रतीतेः जीव एवोपादानम् ।
अत एवाऽध्यासभाष्ये अन्तःकरणादीनां जीवे एवाऽध्यासो दर्शितः ।

यह भाव है। और 'गताः कलाः०' इत्यादि श्रुति तो तत्त्वज्ञानीके मर जानेपर समीपस्थ पुरुष जैसे चूर्णावशेष घटका विनाश भूमिमें देखते हैं, वैसे ही उसके शरीर आदिका भूमि आदिमें लय मानते हैं। इस प्रकार तटस्थपुरुषविषयक है, ऐसी व्यवस्था कलालयाधिकरणभाष्यमें स्पष्टरूपसे की गई है।

माया और अविद्याको जो अभिन्न मानते हैं, उनमेंसे कुछ लोग कहते हैं—यद्यपि आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चका ईश्वर ही उपादान है, तथापि अन्तःकरण आदिमें जीवके तादात्म्यकी प्रतीति होनेसे उनका—अन्तःकरण आदिका—जीव ही उपादान है *।

इसीसे अध्यासभाष्यमें अन्तःकरण आदिका जीवमें ही अध्यासभ्रम बत-


* माया ही अविद्या है और वह ईश्वरकी उपाधि है अर्थात् मायाशबलित चैतन्य ईश्वर है और प्रतिबिम्बभूत जीवोंकी उपाधियाँ अन्तःकरण हैं, इस रीतिसे माया और अविद्याको अभिन्न मानकर व्यवस्था करनेवालोंमें से भी भेदवादियोंके समान कुछ लोग अन्तःकरण आदिमें जीवको उपादान मानते हैं। 'तदभेदवादिष्वपि' इसमें 'अपि' शब्दसे पूर्व मतके साथ किसी अंशमें समानता है, यह प्रतीत होता है और उस विशेषताका 'तथापि' ग्रन्थसे स्पष्टीकरण होता है अर्थात् जैसे ईश्वरमें रहनेवाली मायाके परिणामी होनेसे महाभूतोंके प्रति ईश्वर उपादान है वैसे ही माया और अविद्याके अभिन्न होनेसे अविद्यापरिणामी अन्तःकरण आदि भी ईश्वरा-

७० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद

विवरणे च प्रतिकर्मव्यवस्थायां ब्रह्मचैतन्यस्योपादानतया घटादिसङ्गित्त्वम्, जीवचैतन्यस्य तदसङ्गित्त्वेऽप्यन्तःकरणादिसङ्गित्त्वं च वर्णितमित्याहुः ॥

लाया गया है । और विवरणमें भी प्रतिकर्मव्यवस्थाके प्रतिपादक † ग्रन्थमें ब्रह्मके उपादान होनेसे ब्रह्मचैतन्यका घटके साथ तादात्म्य है, और घटादिके प्रति उपादान न होनेसे जीवका घटादिके साथ तादात्म्य न रहनेपर भी अन्तःकरण आदिके साथ जीवकी सङ्गिता—तादात्म्य है' इस प्रकार वर्णन किया गया है ।


श्रित मायाके ही परिणाम हैं । अतः उनके प्रति ईश्वर ही उपादान क्यों न माना जाय ? इस प्रकारकी शङ्काका परिहार 'तथापि' इत्यादिसे किया गया है—'अहं काणः' ( मैं काना हूँ ) 'अहं कर्ता', ( मैं कर्ता हूँ ) 'अहं मूकः', ( मैं मूक हूँ ) और 'अहं स्थूलः' ( मैं स्थूल हूँ ) इत्यादि रूपसे शरीरके अन्दर रहनेवाले अन्तःकरण आदिका जीवके साथ तादात्म्य प्रतीत होता है, वह तभी उपपन्न हो सकता है, जब उनका जीवमें अध्यास माना जाय, ऐसा माननेपर तदधिष्ठानत्वरूप उपादानत्व भी जीवमें ही है।

† प्रतिकर्म-व्यवस्था—जीवके प्रति विषयव्यवस्थाका दिग्दर्शन करानेवाला विवरणग्रन्थका प्रकरण । माया और अविद्याका अभेद माननेमें विवरणकारने 'अत्र केचिदाहुः—अतोऽविद्यामयं वक्तव्यं न मायामयमिति' इत्यादि ग्रन्थसे लेकर 'इति युक्तं मायामयम्' यहाँ तक अनेक युक्तियों और प्रमाणोंका उपन्यास किया है। (पृ० २०७ कल० मुद्रित भामत्यादिटीकानव-कोपेत शाङ्करभाष्य) जानकारीके लिए उसमें से कुछ सारांश यहांपर देते हैं—माया और अविद्याका अभेद नहीं मान सकते, क्योंकि माया अपने आश्रयको मुग्ध नहीं करती और कर्ताकी इच्छाके अनुसार अनुवर्तन करती है। अविद्या वैसी नहीं है अर्थात् स्वाश्रयको मुग्ध करती हुई कर्ताकी इच्छाके विरुद्ध प्रवृत्त होती है। और लोकमें अविद्या तथा मायाका अन्योन्य भेद प्रसिद्ध है ? इस प्रश्नके उत्तरमें विवरणकार कहते हैं कि इनका भेद हम लक्षणके भेदसे या व्यवहारके भेदसे नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अनिर्वचनीयतया तत्त्वावभासप्रतिबन्ध विपर्यायावभासरूप लक्षण माया और अविद्यामें सामान्यरूपसे रहता ही है (लक्षणार्थ यह हुआ कि अनिर्वचनीय होकर यथार्थ वस्तुके परिज्ञानमें प्रतिबन्ध करे और विपरीत वस्तुका भान करे उसे अविद्या या माया कहते हैं)। और मायाशब्दका मन्त्र या औषध आदि सत्य वस्तुमें प्रयोग होता है, यह बात नहीं है, क्योंकि मिथ्यारूपसे देखे जानेवाली वस्तुमें भी माया शब्दका प्रयोग होता है। और समीपस्थ पुरुषको मन्त्र आदिका परिज्ञान भी नहीं है, अधिक क्या कहा जाय ? मन्त्र आदिमें मायाशब्दका प्रयोग भी तो लोकमें देखा नहीं जाता और 'मायां तु प्रकृतिम्' (मायाको प्रकृति जानो) इस श्रुतिमें मायाशब्दका प्रयोग प्रकृतिमें है। अतः प्रकृतिभूत माया और अविद्याके लिए एक ही लक्षण अवगत होता है। माया अपने आश्रयमें मोह नहीं करती और अविद्या करती है, इस प्रकार जो लक्षण-भेद कहा गया है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि मायाका आश्रय द्रष्टा माना जाय, तो वह मुग्ध होता ही है और यदि

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७१


इष्ट ईश उपादानं सर्वस्मिन् व्यावहारिके ।
प्रातिभासिककार्ये तु जीव इत्यपरे जगुः ॥२२॥

सम्पूर्ण व्यावहारिक पदार्थोंका उपादान ईश्वर है और प्रतिभासिक पदार्थोंका उपादान जीव है, ऐसा अन्य लोग कहते हैं ॥ २२ ॥

“एतस्माज्जायते प्राणो मनस्सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी” ॥

इत्यादिश्रुतेः कृत्स्नव्यावहारिकप्रपञ्चस्य ब्रह्मैव उपादानम् । जीवस्तु प्रातिभासिकस्य स्वप्नप्रपञ्चस्य च । ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’

‘एतस्माज्जायते०’ ( इस प्रकृत ईश्वरलूप उपादानसे प्राण, मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज और सम्पूर्ण पदार्थोंकी आधारभूत पृथ्वी उत्पन्न हुई ) इत्यादि श्रुतिसे सम्पूर्ण व्यावहारिक घट आदि प्रपञ्चका ब्रह्म ही उपादान कारण है और प्रातीतिक स्वप्नके प्रपञ्चोंका अर्थात् स्वप्न सृष्टिमें देखे जानेवाले प्रतीतिकालावस्थायी भ्रमात्मक पदार्थोंका जीव ही उपादान कारण है, क्योंकि ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ * इस अधिकरणमें ‘जगत्का उपादान


धर्त्ता माना जाय, तो उसके मायावी होनेसे उसमें व्यामोहका अभाव है, यह नहीं कह सकते । और इच्छाके अनुसार माया कर सकते हैं और अविद्या नहीं कर सकते यह युक्ति भी भेदमें नहीं दे सकते, क्योंकि मन्त्र और औषध आदिमें कर्ताका स्वातन्त्र्य है, मायामें नहीं है अविद्यामें भी द्विचन्द्र आदि भ्रम कर्ताकी इच्छाके अधीन होते हैं । और शास्त्रीयव्यवहारसे भी माया एवं अविद्याका भेद नहीं है, क्योंकि ‘भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’ इत्यादि श्रुतिसे यथार्थ ज्ञानसे निवर्त्य अविद्यामें मायाशब्दका प्रयोग होता है । ‘तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते। योगी मायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥’ इस श्रुतिमें भी माया और अविद्या-का सामानाधिकरण्यसे ( एकार्थकत्वसे ) निर्देश कर तत्त्वज्ञानसे तैरना बतलाया है । इसी प्रकार भगवान् सूत्रकारने ‘मायामात्रन्तु कात्स्न्ये॑नानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्’ इस सूत्रमें स्वप्नमें भी मायाशब्दका प्रयोग किया है । भाष्यकारने भी ‘अविद्यामायाऽविद्यात्मिका मायाशक्तिः’ ( अविद्या-माया है मायाशक्ति भी अविद्यारूप है ) इस वाक्यसे माया और अविद्याका अभेद दर्शाया है अतः यह स्पष्ट हुआ कि माया और अविद्याका अभेद है, भेद नहीं है ।

* ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ इस सूत्रका अर्थ है, यदि ब्रह्मका सर्व अंशसे परिणाम माना जाय, तो कृत्स्नप्रसक्ति होगी अर्थात् जैसे दधिके आकारसे परिणत दुग्धकी अपने स्वरूपसे हानि होती है, वैसे ही ब्रह्मकी अपने रूपसे हानि होगी । और एक देशसे

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७२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ७ सू० २६ ) इत्यधिकरणे ब्रह्मणो जगदुपादानत्वे तस्य कात्स्न्येन जगदाकारेण परिणामे विकारातिरेकेण ब्रह्माभावो वा, एकदेशेन परिणामे निरवयवत्वश्रुतिविरोधो वा प्रसज्यते इति पूर्वपक्षे 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २८ ) इति सूत्रेण विवर्तवादाभिप्रायेण स्वप्नदृशि जीवात्मनि स्वरूपानुपमर्दनेनाऽनेकाकारस्वाप्नप्रपञ्चसृष्टिवत् ब्रह्मणि वियदादिसृष्टिरुपपद्यते इति सिद्धान्तितत्वादित्यन्ये ।


ब्रह्म है' इस सिद्धान्तमें शङ्का की है कि क्या ब्रह्म सर्वांशसे जगदाकारमें परिणत होता है या एकदेशसे ? प्रथम पक्षमें ( जैसे दधिरूपमें दूधके परिणत होनेसे दूध रहता ही नहीं है, वैसे ही ) ब्रह्मके सर्वांशसे जगद्रूपमें परिणत होनेपर जगत्से पृथक् ब्रह्मका अस्तित्व नहीं रहेगा; यदि द्वितीय पक्ष अर्थात् एकदेशसे ब्रह्मका परिणाम माना जाय, तो ब्रह्मके निरवयवत्वका प्रतिपादन करनेवाली ( 'अजो नित्यः शाश्वतो' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता है, नित्य—अवयवरहित और सनातन है ) इस श्रुतिके साथ विरोध होगा। अतः दोनों मार्गोंसे ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं हो सकता है, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर † 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' इस सूत्रसे विवर्तवादके अभिप्रायसे 'जैसे जीवके स्वरूपके बिगड़े बिना ही स्वप्न देखनेवाले जीवात्मामें अनेक आकार-प्रकारवाली स्वप्न पदार्थोंकी सृष्टि बनती है, वैसे ही ब्रह्मके स्वरूपमें कुछ भी विकृति न होकर आकाश आदि प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है' इस प्रकारका सिद्धान्त किया गया है, ऐसा भी कुछ लोगोंका मत है ।


परिणाम माना जाय, तो निरवयवत्वशब्दकोप होगा अर्थात् ब्रह्मकी निरवयवताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ विरोध होगा।

† आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि। इस सूत्रमें प्रथम 'च' शब्दका अर्थ यथा ( जैसे ) है और द्वितीयका अर्थ तथा ( वैसे ही ) है और 'हि' शब्द हेतु अर्थमें है। इसलिए जैसे आत्मनि-स्वप्नद्रष्टा जीवमें विचित्र—विलक्षण रथ आदि सृष्टि प्रतीत होती है, और उसके स्वरूपका विनाश नहीं होता है, क्योंकि स्वप्नावस्थाकी निवृत्तिके बाद भी साक्षीरूपसे जीव चैतन्य पूर्ववत् ही रहता है, वैसे ही ब्रह्ममें भी स्वरूपविनाशके बिना विचित्र आकाश आदि सृष्टि उत्पन्न होती है।

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ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७३


स्वात्ममोहात् समस्तस्य सेश्वरस्य प्रकल्पकः ।
स्वप्नवज्जीव एवैको नापरोऽस्तीति केचन ॥ २३ ॥

केवल एक जीव ही अज्ञानसे स्वप्न पदार्थोंके समान ईश्वरसहित इस सब प्रपञ्चका कारण है, दूसरा कोई कारण नहीं है, ऐसा कुछ लोगोंका मत है ॥ २३ ॥

जीव एव स्वप्नद्रष्टृवत् स्वस्मिन्नीश्वरत्वादिसर्वकल्पकत्वेन सर्वकारणम् इत्यपि* केचित् ॥ ४ ॥

स्वप्नद्रष्टाके समान अपनेमें ईश्वरत्व आदि सभी वस्तुओंकी कल्पना करनेके कारण जीव ही सबके प्रति उपादान कारण है, यह भी कुछ लोगोंका मत है । भाव यह है कि पूर्वग्रन्थमें जगत्का शुद्ध ब्रह्म उपादान है या ईश्वररूप ब्रह्म उपादान है या जीवरूप ब्रह्म उपादान इस प्रकार तीन विकल्प किये गये हैं, उनमें से तृतीय पक्षको लेकर कहते हैं—जीव ही उपादान है अर्थात् अवच्छेद या प्रतिबिम्बवादकी अपेक्षा न करके परिपूर्ण चिदात्मा ही अविद्यासे जीवभावको प्राप्त होकर अपनेको सभीका ईश्वर मानता है अर्थात् 'मैं ही ईश्वर हूँ' इस प्रकार कल्पना करता है, अनन्तर अपनेसे गगन आदिकी उत्पत्तिकी कल्पना करता है और अपने आप अपनेसे ही कल्पित ईश्वरका भेद और उससे 'मैं नियम्य हूँ' इस प्रकार कल्पना करता है, इसी रीतिसे मनुष्य आदिभावकी क्रमसे कल्पना करता है । जैसे 'आकाश आदि प्रपञ्च व्यवहारमें सत्य है और स्वप्नप्रपञ्च प्रातीतिक है' इस पक्षमें स्वप्नका द्रष्टा जीव ही—( स्वप्नमें ) देवादिभावसे, उसके नियन्ता परमेश्वररूपसे और उससे मैं भिन्न हूँ—इत्यादिरूपसे अपनी कल्पना करता है, वैसे ही दृष्टिसृष्टिपक्षमें श्रद्धा रखनेवाले कुछ महाजन अपने आपमें सब प्रपञ्चकी कल्पना करनेवाला जीवस्वरूपापन्न ब्रह्म ही जगत्का उपादान है, ऐसा स्वीकार करते हैं ॥ ४ ॥


* यहाँ ज्ञातव्यविशेष यह है कि इस पक्षमें अर्थात् जीवभावापन्न ब्रह्म जगत्का उपादान है, इस पक्षमें जीवसे इतर ईश्वर रहेगा नहीं, इससे एक तो ईश्वरके अस्तित्वका प्रतिपादन करनेवाली तथा सब जीवोंके नियन्ताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके साथ एवं इसीके समर्थक सूत्र और स्मृतियोंके साथ विरोध प्रसक्त होगा, दूसरा बन्ध और मोक्ष-व्यवस्था भी अस्तंगत होगी, इसलिए यह पक्ष असङ्गत है और यह भाव 'इत्यपि' इसके अपि शब्दसे सुस्पष्ट विदित भी होता है, अतः ईश्वररूप ब्रह्म ही जगत्का उपादान है यही पक्ष निर्दुष्ट है, ऐसा प्रतीत होता है।
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७४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अहेतुत्वादमायस्य मायाशवलतेष्यते ।
साऽप्युपादानमेवेति तत्त्वनिर्णयकृन्मतम्॥ २४ ॥

मायासे रहित शुद्ध ब्रह्म उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए (ब्रह्ममें) मायाशबलता मानी जाती है और वह माया भी उपादान ही है, ऐसा तत्त्वनिर्णयकारका मत है ॥ २४ ॥

अथ 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्' इति श्रुतेः, मायार्जाड्यस्य घटादिष्वनुगमाच्च माया जगदुपादानं प्रतीयते, कथं ब्रह्मोपादानम् ? ।
अत्राऽऽहुः पदार्थतत्त्वनिर्णयकाराः—ब्रह्म माया चेत्युभयमुपादानमित्युभयश्रुत्युपपत्तिः, सत्ताजाड्यरूपोभयधर्मानुगत्युपपत्तिश्च । तत्र ब्रह्म विवर्तमानतयोपादानम्, अविद्या परिणममानतया ।

यहाँपर यह शङ्का होती है कि 'ब्रह्म जगत्का उपादान है' यह नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'मायां तु प्रकृतिं'० (माया ही जगत्की प्रकृति—उपादान है, ऐसा जानो) इस प्रकारकी मायामें ही उपादानत्वकी प्रतिपादिका श्रुति है और [जैसे घट आदिमें उपादानभूत मृत्तिकाके श्लक्ष्णत्व आदि धर्मोंका अनुस्यूतरूपसे भान होता है, वैसे ही] घट आदि समस्त प्रपञ्चमें मायामें रहनेवाले जडत्व धर्मका अनुस्यूतरूपसे भान होता है, अतः माया जगत्की उपादान है, ऐसा प्रतीत होता है। [यद्यपि अनेक श्रुतियोंके आधारपर पीछे ब्रह्मकी उपादानताका दिग्दर्शन कराया गया है, तथापि निरवयव ब्रह्ममें मृत्तिका आदिके समान परिणामी उपादानता नहीं हो सकती है, यदि ब्रह्मको विवर्तोपादान कहें तो भी जैसे परिणामी उपादान लोकमें देखे जाते हैं, वैसे विवर्तके अधिष्ठानमें उपादानत्वकी प्रसिद्धि लोकमें नहीं है, अतः ऐसे पदार्थोंमें उपादानत्वका स्वीकार करना केवल स्वकीय-कपोलकल्पनासे परिभाषा बांधनामात्र है, ऐसा आक्षेपकर्ताका प्रकृतमें अभिप्राय है]।

इस परिस्थितिमें पदार्थतत्त्वनिर्णयकार उत्तर कहते हैं—ब्रह्म और माया दोनों ही जगत्के प्रति उपादान हैं; इसलिए माया और ब्रह्ममें उपादानत्वकी प्रतिपादिका दोनों श्रुतियोंकी युक्तार्थता है और (घट आदिमें भासनेवाले) सत्ता और जड़ता दोनों धर्मोंके अनुगमकी भी उपपत्ति हो सकती है। इसमें विशेषता यह है कि ब्रह्म विवर्तमानरूपसे उपादान है और माया परिणामरूपसे उपादान है।

मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७५


न च विवर्ताधिष्ठाने पारिभाषिकमुपादानत्वम् । स्वात्मनि कार्यजनि- हेतुत्वस्योपादानलक्षणस्य तत्राऽप्यविशेषादिति ।

केचित् उक्तामेव प्रक्रियामाश्रित्य विवर्तपरिणामोपादानद्वयसाधारण- मन्यल्लक्षणमाहुः--स्वाभिन्नकार्यजनकत्वमुपादानत्वम् । अस्ति च प्रपञ्चस्य


और. पूर्वमें यह जो कहा गया है कि विवर्तके अधिष्ठानमें पारिभाषिक उपादानत्व है, यह भी नहीं है, क्योंकि 'स्वात्मनि कार्यजनिहेतुत्वरूप उपादानका लक्षण है, वह [ मृत्तिका आदि उपादानमें जैसे रहता है, वैसे ही ] विवर्तके अधिष्ठानमें भी रहता ही है । ['स्वात्मनि' इत्यादि उपादानके लक्षणमें प्रविष्ट स्वशब्दसे उपादानरूपसे अभिमत जो वस्तु हो उसका ग्रहण करना चाहिए, अतः लक्षण-समन्वय यों करना चाहिए--स्वपदसे मृत्तिकाका ग्रहण हुआ, उसमें घटरूपकार्यकी उत्पत्तिकी हेतुता है, इसलिए घटकी कारण मृत्तिकामें उपादानता है । ब्रह्ममें भी वियदादिसृष्टिकी हेतुता होनेसे उपादानका उक्त लक्षण घट जाता है ] ।

कुछ लोग इसी प्रक्रियाके आधारपर विवर्त और परिणाम दोनों उपादानोंमें समानरूपसे लागू होनेवाला अन्य लक्षण कहते हैं कि स्वाभिन्नकार्यजनकत्व ही उपादानत्व * है अर्थात् उपादानसे अभिन्न जो कार्य उसकी उत्पत्तिका जो हेतु


* इस लक्षणमें स्वशब्दसे परिणामी-उपादानत्वसे विवक्षित मृत्तिका, अज्ञान आदिका और विवर्तोपादानत्वसे विवक्षित ब्रह्मका ग्रहण होता है, मृत्तिकारूप उपादान और घटका परस्पर अभेद है ही, क्योंकि 'घट मृत्तिका ही है' इस प्रकार अभेद प्रतीत होता है । परन्तु इस परिस्थितिमें एक विचार अवश्य होता है कि 'मृत्तिका घट है' या 'तन्तु पट है' इस प्रकार जैसे अभेदप्रत्यायक प्रतीति हुआ करती है, वैसे 'घट ब्रह्म है' 'पट ब्रह्म है' या 'अज्ञान घट है' इस प्रकार ब्रह्म और अज्ञानका घटादिसे अभेद सिद्ध होनेके लिए लौकिक व्यवहार नहीं होता, अतः ब्रह्म या अज्ञानरूप उपादानसे घटादि प्रपञ्चका अभेद कैसे मान सकते हैं ? इस शङ्काके परिहारमें यों कहा जाता है--यद्यपि ब्रह्म और अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद ब्रह्मत्व या अज्ञानत्वरूपसे व्यवहृत नहीं होता है, तो भी सत्त्व और जडत्वरूप धर्मोंसे, जो ब्रह्म और अज्ञानके धर्म हैं, 'सन् घटः' 'जडो घटः' इस प्रकार ब्रह्म और अज्ञानका प्रपञ्चके साथ अभेद भासता है । सत्त्व और जडत्व ब्रह्म तथा अज्ञानके धर्म हैं इसमें श्रुतिरूप प्रमाण भी है 'सदेव' ( ब्रह्म सत् ही है ) 'तदेतज्जडं मोहात्मकम्' ( वह अज्ञान जड़ और मोहात्मक है ) इसी गूढ़ अभिप्रायका सूचन करनेके लिए मूलमें 'सद्रूपेण' यह ब्रह्मका विशेषण और 'जडेन' यह अज्ञानका विशेषण दिया गया है ।

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७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सद्रूपेण ब्रह्मणा विवर्तमानेन जडेनाऽज्ञानेन परिणामिना चाऽभेदः; ‘सन् घटः, जडो घटः’ इति सामानाधिकरण्यानुभवात् ।

न च ‘तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ (उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४) इति सूत्रे ‘अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाऽभावः’ ‘न खल्वनन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु ? भेदं व्यासेधामः’ इति भाष्यभामतीनिबन्धनाभ्यां प्रपञ्चस्य ब्रह्माभेदनिषेधाद्भेदाभ्युपगमे अपसिद्धान्त इति वाच्यम्, तयोर्ब्रह्मरूपधर्मिसमानसत्ताकाभेदनिषेधे तात्पर्येण शुक्तिरजतयोरिव प्रातीतिकामेदाभ्युपगमेऽपि विरोधाभावादिति ।


हो, वही उपादान है। सद्रूप विवर्तमान ब्रह्मके साथ तथा परिणामी जडरूप अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद भासता है, क्योंकि ‘सन् घटः’ और ‘जडो घटः’ अर्थात् घटमें सत्ताका और जड़ताका अनुभव होता है।

अब शङ्का होती है कि * ‘तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ इस सूत्रमें अनन्यत्वका अर्थ है—‘कारणसे पृथक् कार्यका न रहना’ ‘अनन्यत्वशब्दका अर्थ हम अभेद नहीं करते हैं, परन्तु भेदका निषेध करते हैं’ इस प्रकार भाष्य और भामती ग्रन्थसे ब्रह्म और प्रपञ्चके अभेदका निषेध किया गया है, अतः यदि प्रपञ्च और ब्रह्मका परस्पर अभेद माना जाय, तो अपसिद्धान्त होगा, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन निबन्धोंका ब्रह्मरूपधर्मीके समानसत्तावाले अभेदके निषेधमें तात्पर्य है, अर्थात् पारमार्थिक अभेदके निषेधमें अभिप्राय है, अत एव जैसे शुक्ति और रजतमें प्रातीतिक अभेदके स्वीकारमें विरोध नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी प्रातीतिक अभेदके स्वीकरणमें कोई विरोध नहीं है।


* इस सूत्रका अर्थ है—तदनन्यत्वम्—तयोः—कार्यकारणयोः अनन्यत्वम्—उन कार्य और कारणका अनन्यत्व है, क्योंकि आरम्भण आदि श्रुतियाँ, इस अर्थका प्रतिपादन करती हैं। आरम्भणशब्दसे ‘वाचारम्भण’ श्रुति ली जाती है और आदि शब्दसे ‘आत्मैवेदं सर्वम्’ ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यादि श्रुतियोंका संग्रह करना चाहिए। भाव यह हुआ कि कार्य और कारण तत्त्वान्तर माने जायँ, तो जगत्कारण ब्रह्ममें सर्वात्मत्वकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। अतः अनन्यत्व मानना चाहिए।

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मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७७


ब्रह्ममात्रमुपादानं माया तु द्वारकारणम् ।
मृच्छ्लक्ष्णतावत् संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ २५ ॥

संक्षेपशारीरककारके मतमें केवल ब्रह्म जगत्‌के प्रति उपादान है और माया तो जैसे घट आदिके प्रति मृत्तिकाका श्लक्ष्णत्व द्वार कारण है, वैसे ही द्वार कारण है ॥ २५ ॥

सङ्क्षेपशारीरककृतस्तु—ब्रह्मैवोपादानम्। कूटस्थस्य स्वतः कारणत्वानुपपत्तेः माया द्वारकारणम्। अकारणमपि द्वारं कार्येऽनुगच्छति।

ब्रह्म ही जगत्‌का उपादान कारण है, माया उपादान कारण नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं, कूटस्थ ब्रह्ममें स्वतः कारणताकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः माया द्वार कारण है। [भाव यह है कि यदि मायाके बिना ही ब्रह्म जगत्‌के प्रति उपादान कारण हो, तो माया व्यर्थ होगी और ब्रह्म स्वयं परिणामी होगा, इस परिस्थितिमें परिणामवादियोंके मतमें परिणाम और परिणामीका परस्पर वस्तुसन् अभेद होनेसे परिणामके जन्म आदि विकारोंसे ब्रह्म भी विकृत होगा, और इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि 'न जायते' (आत्मा उत्पन्न नहीं होता) इस प्रकार अनेक श्रुतियोंके साथ


* संक्षेपशारीरककार कूटस्थ ब्रह्मको जगत्‌के प्रति उपादान मानते हैं, इसके सविशेष दृढ़ीकरणमें उन्हींके दो श्लोक देते हैं—

उपादानता चेतनस्याऽपि दृष्टा यथा स्वप्नसर्गे विचित्रे प्रतीचः ।
यथा चोर्णनाभस्य सूत्रेषु पुंसां यथा केशलोमादिसृष्टौ च दृष्टा ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५४५ ]

अज्ञानतज्जघटना चिदधिक्रियायाम् द्वारं परं भवति नाधिकृतत्वमस्याः ।
नाचेतनस्य घटतेऽधिकृतिः कदाचित् कर्तृत्वशक्तिविरहादिति वक्ष्यते हि ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५५५ ]

अर्थात्— जैसे विचित्र स्वप्नसृष्टिमें निद्रासे तिरस्कृत—अभिभूत है करणसमुदाय जिसका ऐसा प्रत्यगात्मा उपादान है, और जैसे ऊर्णनाभ उसके सूत्रोंके प्रति उपादान है अथवा जैसे केश, लोम आदिमें पुरुष उपादान है, वैसे ही कूटस्थ चेतन भी उपादान है। अविद्या और उसके कार्यका अध्यास ब्रह्मकी अधिकारितामें अर्थात् जगत्‌के प्रति ब्रह्ममें उपादानत्वके सम्पादनमें निमित्तमात्र है, क्योंकि अचेतनकी अध्यासमें अधिकारिता नहीं है, कारण कि उसमें कर्तृत्वशक्तिका अभाव है, ऐसा कहेंगे। और ५५३ के 'अनधिकारिणि शुद्धचिदात्मके' इत्यादिमें भी 'माया ब्रह्मकी अधिकारिताकी सम्पादिका है' ऐसा कहा गया है। इससे स्पष्ट रीतिसे ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरककारने मूलोक्त विषयका अत्यन्त विस्तारसे अपने ग्रन्थमें विवेचन किया है।

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७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सद्रूपेण ब्रह्मणा विवर्तमानेन जडेनाऽज्ञानेन परिणामिना चाऽभेदः; 'सन् घटः, जडो घटः' इति सामानाधिकरण्यानुभवात् ।

न च 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' ( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४ ) इति सूत्रे 'अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाऽभावः' 'न खल्व-नन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु ? भेदं व्यासेधामः' इति भाष्यभामतीनि-बन्धनाभ्यां प्रपञ्चस्य ब्रह्माभेदनिषेधादभेदाभ्युपगमे अपसिद्धान्त इति वाच्यम्, तयोर्ब्रह्मरूपधर्मिसमानसत्त्वाकाभेदनिषेधे तात्पर्येण शुक्तिरजत-योरिव प्रातीतिकाभेदाभ्युपगमेऽपि विरोधाभावादिति ।


हो, वही उपादान है। सद्रूप विवर्तमान ब्रह्मके साथ तथा परिणामी जडरूप अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद भासता है, क्योंकि 'सन् घटः' और 'जडो घटः' अर्थात् घटमें सत्ताका और जड़ताका अनुभव होता है।

अब शङ्का होती है कि * 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' इस सूत्रमें अनन्यत्वका अर्थ है—'कारणसे पृथक् कार्यका न रहना' 'अनन्यत्वशब्दका अर्थ हम अभेद नहीं करते हैं, परन्तु भेदका निषेध करते हैं' इस प्रकार भाष्य और भामती ग्रन्थसे ब्रह्म और प्रपञ्चके अभेदका निषेध किया गया है, अतः यदि प्रपञ्च और ब्रह्मका परस्पर अभेद माना जाय, तो अपसिद्धान्त होगा, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन निबन्धोंका ब्रह्मरूपधर्मीके समान-सत्तावाले अभेदके निषेधमें तात्पर्य है, अर्थात् पारमार्थिक अभेदके निषेधमें अभिप्राय है, अत एव जैसे शुक्ति और रजतमें प्रातीतिक अभेदके स्वीकारमें विरोध नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी प्रातीतिक अभेदके स्वीकरणमें कोई विरोध नहीं है।


* इस सूत्रका अर्थ है—तदनन्यत्वम्—तयोः—कार्यकारणयोः अनन्यत्वम्—उन कार्य और कारणका अनन्यत्व है, क्योंकि आरम्भण आदि श्रुतियाँ, इस अर्थका प्रतिपादन करती हैं। आरम्भणशब्दसे 'वाचारम्भण' श्रुति ली जाती है और आदि शब्दसे 'आत्मैवेदं सर्वम्' 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतियोंका संग्रह करना चाहिए। भाव यह हुआ कि कार्य और कारण तत्त्वान्तर माने जायँ, तो जगत्कारण ब्रह्ममें सर्वात्मत्वकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। अतः अनन्यत्व मानना चाहिए।

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मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७७


ब्रह्ममात्रमुपादानं माया तु द्वारकारणम् ।
मृच्छ्लक्ष्णतावत् संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ २५ ॥

संक्षेपशारीरककारके मतमें केवल ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान है और माया तो जैसे घट आदिके प्रति मृत्तिकाका श्लक्ष्णत्व द्वार कारण है, वैसे ही द्वार कारण है ॥ २५ ॥

**सङ्क्षेपशारीरककृतस्तु—**ब्रह्मैवोपादानम् । कूटस्थस्य स्वतः कारणत्वानुपपत्तेः माया द्वारकारणम् । अकारणमपि द्वारं कार्येऽनुगच्छति ।

ब्रह्म ही जगत्का उपादान कारण है, माया उपादान कारण नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं, कूटस्थ ब्रह्ममें स्वतः कारणताकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः माया द्वार कारण है । [ भाव यह है कि यदि मायाके बिना ही ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान कारण हो, तो माया व्यर्थ होगी और ब्रह्म स्वयं परिणामी होगा, इस परिस्थितिमें परिणामवादियोंके मतमें परिणाम और परिणामीका परस्पर वस्तुसत् अभेद होनेसे परिणामके जन्म आदि विकारोंसे ब्रह्म भी विकृत होगा, और इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि 'न जायते' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता ) इस प्रकार अनेक श्रुतियोंके साथ


* संक्षेपशारीरककार कूटस्थ ब्रह्मको जगत्के प्रति उपादान मानते हैं, इसके सविशेष दृढ़ीकरणमें उन्हींके दो श्लोक देते हैं—

उपादनता चेतनस्याऽपि दृष्टा यथा स्वप्नसर्गे विचित्रे प्रतीचः ।
यथा चोर्णनाभस्य सूत्रेषु पुंसां यथा केशलोमादिसृष्टौ च दृष्टा ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५४५ ]

अज्ञानतज्जघटना चिदधिक्रियायाम् द्वारं परं भवति नाधिकृतत्वमस्याः ।
नाचेतनस्य घटतेऽधिकृतिः कदाचित् कर्तृत्वशक्तिविरहादिति वक्ष्यते हि ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५५५ ]

**अर्थात्—**जैसे विचित्र स्वप्नसृष्टिमें निद्रासे तिरस्कृत—अभिभूत है करणसमुदाय जिसका ऐसा प्रत्यगात्मा उपादान है, और जैसे ऊर्णनाभ उसके सूत्रोंके प्रति उपादान है अथवा जैसे केश, लोम आदिमें पुरुष उपादान है, वैसे ही कूटस्थ चेतन भी उपादान है । अविद्या और उसके कार्यका अध्यास ब्रह्मकी अधिकारितामें अर्थात् जगत्के प्रति ब्रह्ममें उपादानत्वके सम्पादनमें निमित्तमात्र है, क्योंकि अचेतनकी अध्यासमें अधिकारिता नहीं है, कारण कि उसमें कर्तृत्वशक्तिका अभाव है, ऐसा कहेंगे । और ५५३ के 'अनधिकारिणि शुद्धचिदात्मके' इत्यादिमें भी 'माया ब्रह्मकी अधिकारिताकी सम्पादिका है' ऐसा कहा गया है । इससे स्पष्ट रीतिसे ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरककारने मूलोक्त विषयका अत्यन्त विस्तारसे अपने ग्रन्थमें विवेचन किया है ।


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७८ सिद्धान्तलेशसंग्रहं [ प्रथम परिच्छेदे


मृद इव तद्गतश्लक्ष्णत्वादेरपि घटे अनुगमनदर्शनादित्याहुः ।

ब्रह्मैव जीवाश्रितयाऽविद्यया विषयीकृतम् ।
वाचस्पतिमते हेतुर्माया तु सहकारिणी ॥ २६ ॥

वाचस्पतिमिश्रके मतमें जीवाश्रित अविद्यासे विषयीकृत ब्रह्म ही जगत्के प्रति उपादान है और माया तो सहकारी कारण है ॥ २६ ॥


विरोध होगा, कारण कि उन श्रुतियों द्वारा ब्रह्ममें नित्यत्व, अविकारित्व आदिका प्रतिपादन किया गया है। अतः मायाके द्वारा ही ब्रह्म कारण है, ऐसा कहना चाहिए, अतः माया व्यर्थ भी नहीं है। जैसे घटादिके प्रति मृद् आदिके उपादान होनेपर भी मृत्तिकामें रहनेवाला श्लक्ष्णत्व आदि संस्कार द्वारकारण हैं, क्योंकि जब तक मृत्तिकाका संस्कार न किया जाय, तब तक मृत्तिकामें घटादिकी उपादानता नहीं घट सकती है, वैसे ही कूटस्थ चैतन्यरूप ब्रह्ममें आरोपित माया उसमें (ब्रह्ममें) जगत्प्रकृतित्वका सम्पादन करके सहकारिकारण बन जाती है। मायामें उपादानत्वकी प्रतिपादिका 'मायांन्तु प्रकृतिं विद्यात्' इत्यादि श्रुतिके साथ विरोध भी नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंका तात्पर्य यह है कि माया ही ब्रह्ममें प्रकृतित्वका निर्वाह करती है, अतः उसमें प्रकृतित्वका केवल उपचार है। इसीलिए मायामें शक्तित्वका व्यवहार होता है—'पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (इस ब्रह्मकी अनेक परा शक्तियाँ हैं) और मृत्तिकामें रहनेवाली शक्तिमें घटादिके प्रति उपादानता लोकमें नहीं देखी जाती है। अतः माया और ब्रह्म दोनोंमें उपादानता नहीं है। इस मतमें परिणामी उपादान कोई नहीं, होगा यदि ब्रह्ममें वैसी उपादानता मानी जाय, तो सैकड़ों श्रुतियोंके साथ विरोध होगा, इसलिए वाचस्पतिमतके समान चित्में अध्यस्तमाया-विषयीकृत ब्रह्मका प्रपञ्च विवर्त है, यही इस मतमें मानना होगा, संक्षेप-शारीरकमें कहींपर मायामें परिणामित्वका कथन किया गया है, वह अन्य मतोंके अभिप्रायसे किया गया है, यह ध्यानमें रखना चाहिए]। अकारण भी द्वार-कार्यमें अनुस्यूत होता है। जैसे कि मृत्तिकाके समान मृत्तिकामें रहनेवाले श्लक्ष्णत्व आदिका भी घटमें अनुगम होता है, यह देखा जाता है। अतः मायाकी जड़ताका घटादिमें भान होता है।

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मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७९


वाचस्पतिमिश्रास्तु--जीवाश्रितमायाविषयीकृतं ब्रह्म'स्वत एव जाड्याश्रयप्रपञ्चाकारेण विवर्तमानतयोपादानमिति माया सहकारिमात्रम्, न कार्यानुगतं द्वारकारणमित्याहुः ।

वाचस्पतिमिश्र, कहते हैं कि जीवकी आश्रित मायासे विषयीकृत ब्रह्म ही स्वयं जाड्यका आश्रयीभूत अर्थात् जड़ प्रपञ्चके आकारसे विवर्तमानरूपसे उपादान है, अतः माया सहकारी कारण ही है। कार्यानुगत द्वारकारण नहीं है * ।

• वाचस्पतिमिश्रके उक्त मतमें एक विचार उपस्थित होता है कि अक्षरब्राह्मणमें आकाशशब्दसे कहलनेवाली मायाका अक्षरशब्दसे वाच्य नित्य चैतन्य रूप ब्रह्म ही आश्रय माना गया है, इसलिए उसका (मायाका) जीव आश्रय है, यह कहना अत्यन्त विरुद्धसा ज्ञात होता है और 'मायिनं तु महेश्वरम्' (महेश्वरको मायाका आश्रय जानो) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतियाँ मायाके ब्रह्माश्रितत्वमें प्रमाण हैं जीवाश्रितत्वमें प्रमाण नहीं, अतः उभयथा यह मत असङ्गत है, दूसरी बात यह है कि जीवके मायाश्रय होनेपर जीवमें जगदुपादानत्वका प्रसङ्ग आवेगा ब्रह्ममें नहीं आवेगा। अपि च यदि माया ब्रह्मकी उपाधि न हो, तो ब्रह्म नियन्ता भी कैसे होगा? इसपर वाचस्पतिमिश्रके अनुयायियोंका कहना है कि जीवाश्रितत्वपदसे जीवत्वविशिष्ट चैतन्याश्रितत्व विवक्षित नहीं है, परन्तु अक्षरब्राह्मणके अनुरोधसे चैतन्याश्रितत्व ही विवक्षित है। और मायापदसे वेदनीय अविद्याकी चैतन्यवृत्तिमें जीवत्वका अवच्छेदकरूपसे भान होता है, अतः मायामें जीवाश्रितत्वका कथन है और 'निरवद्यं निरञ्जनम्' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मके निर्गुणत्वका ज्ञान होनेसे उसे अविद्याश्रय मानना विरुद्ध ही है 'मायिनं तु महेश्वरम्' इत्यादि श्रुतिका माया और ब्रह्मका परस्पर विषयविषयीभावरूप सम्बन्धके बोध करनेमें तात्पर्य है। प्रपञ्चका उपादान जीव होगा, यह आपत्ति भी वन्ध्यापुत्रके समान मिथ्या है, क्योंकि समस्त प्रपञ्च जीवाश्रितमायाविषयीकृत ब्रह्मका विवर्त है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें जगत्‌की उपादानकारणताकी प्रसक्ति नहीं होगी। ब्रह्ममें वस्तुतः उपाधिका सम्पर्क न होनेपर भी सर्वनियन्तृत्व आदिकी—जीवकी अविद्यासे विषयीकृत ब्रह्मके विवर्त रूपसे—ब्रह्मधर्मसे कल्पना की जाती है, इसलिए जीवाविद्याविषयीकृत ब्रह्म ही प्रपञ्चाकारसे विवर्त मान होता है, इसमें कोई दोष नहीं है।

आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें 'मूलकारणमेव······नटवत्सर्वव्यवहारास्पदत्वं प्रतिपद्यते' नटके दृष्टान्तसे वाचस्पतिमिश्रका यह मत ज्ञात होता है, इसीलिए कल्पतरुमें कहा गया है कि-

स्वाश्रया नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् ।
जीवभ्रान्तिनिमित्तं तद् बभाषे भामतीपतिः ॥
अज्ञातं नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् ।
जीवाज्ञानं जगद्बीजं जगौ वाचस्पतिस्तथा ॥

अर्थात् जैसे द्रष्टाओंसे अविज्ञात है रूप जिसका ऐसा नट उन-उन अभिनयोंको, जो वस्तुतः सत्य नहीं है, प्राप्त होता है, वैसे ही जीवों द्वारा अज्ञातस्वरूप ब्रह्म ही असत्य


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८० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


अपूर्वानपरं ब्रह्म नोपादानं जगत्स्थितेः ।
माया तु मुख्योपादानमिति मुक्तावलीकृतः ॥ २७ ॥

कार्य्य कारणसे रहित ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए माया ही मुख्य कारण है, ऐसा सिद्धान्त मुक्तावलीकार कहते हैं ॥ २७ ॥

सिद्धान्तमुक्तावलीकृतस्तु—मायाशक्तिरेवोपादानं न ब्रह्म ‘तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमवाह्यम्’ ‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते’ इत्यादिश्रुतेः जगदुपादानमायाधिष्ठानत्वेन उपचारादुपादानम्, तादृशमेवोपादानत्वं लक्षणे विवक्षितमित्याहुः ॥ ५ ॥

मायाशक्ति ही उपादान है ब्रह्म उपादान नहीं है, क्योंकि ‘तदेतत् ०’ (प्रकृत बुद्धि आदिका साक्षीरूप ब्रह्म कारण नहीं है, कार्य नहीं है और वाह्य नहीं है) ‘न तस्य०’ (उसका अर्थात् ब्रह्मका कोई कारण और कार्य नहीं है) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्ममें उपादानताका निषेध किया गया है । और ब्रह्ममें जो उपादानताका व्यवहार होता है, वह तो केवल जगत्की उपादान मायाके अधिष्ठान होनेसे औपचारिक व्यवहार होता है । इसीलिए जगदुपादानमायाधिष्ठानत्व ही उपादानत्व लक्षणमें अर्थात् ब्रह्मके लक्षणमें विवक्षित है, ऐसा सिद्धान्त-मुक्तावलीकार कहते हैं * ॥ ५ ॥


वियदादिकी आकारताको प्राप्त होता है और उसके द्वारा व्यवहारकी विषयताको प्राप्त होता है, इस दृष्टान्तसे भामतीकारका मत शङ्कराचार्यके अनुकूल है, ऐसा प्रतीत होता है [ पृ० ४७१ कल्पतरु निर्णय० मु० ] और 'न ह्यचेतनं चेतना...’ से लेकर 'तस्माज्जीवाधिकरणाप्यविद्या निमित्ततया विषयतया चेश्वरमाश्रयते इतीश्वराश्रयेत्युच्यते, न त्वाधारतया, विद्यास्वभावे ब्रह्मणि तदनुपपत्तेरिति' भाव यह है कि जीवमें रहनेवाली अविद्या निमित्त और विषय रूपसे ईश्वरको आश्रय करती है, अतः ईश्वराश्रय माया कही जाती है, वस्तुतः आधाररूपसे ईश्वराश्रय है नहीं, क्योंकि जिसका विद्यास्वभाव है, उसमें अविद्या कैसे रह सकती है [ कल्पतरुसहित भाम० पृ० ३७८ निर्णय-सागर मु० ] इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि मूलोक्त वाचस्पतिमिश्रका पक्ष भामती ग्रन्थमें स्पष्ट ही है ।

* इसी भावको सिद्धान्तमुक्तावलीकार श्रीप्रकाशानन्दस्वामीजी निम्न लिखित पंक्तियोंसे प्रकट करते हैं—

ब्रह्माज्ञानात् जगज्जन्म ब्रह्मणोऽकारणत्वतः ।
अधिष्ठानत्वमात्रेण कारणं ब्रह्म गीयते ॥३८॥

दृश्यत्वाद्यनुमानसिद्धानिर्वचनीयस्य जगतः अनाद्यनिर्वचनीया अविद्यैव कारणम्, न ब्रह्म, तस्य कूटस्थस्य कार्यकारणविलक्षणत्वात्, 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यम्' 'अयमात्मा .