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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ८९

ज्ञानकी प्रशंसा करते हैं, कोई वैराग्यको उत्तम बताते हैं तो कुछ लोग अग्निष्टोम आदि यज्ञ-कर्मको श्रेष्ठ मानते हैं और दूसरे लोग मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णमें समभाव रखते हुए आत्मज्ञानको ही सबसे उत्तम समझते हैं। कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें प्रायः लोककी यही स्थिति है। अतः सबसे श्रेष्ठ क्या है? यह विचार करनेवाले मनुष्य बहुधा मोहको ही प्राप्त होते हैं। मुने! आप सर्वज्ञ हैं, ऊपर बताये हुए कार्योंमें जो सर्वोत्तम, महात्मा पुरुषोंके द्वारा भी अनुष्ठान करने योग्य तथा सब पुरुषार्थोंका साधक हो, वह मुझे बतानेकी कृपा करें।'

सारस्वत बोले-ब्रह्मन्! माता सरस्वती ने मुझे जो कुछ बतलाया है, उसके अनुसार मैं सारतत्त्वका वर्णन करूँगा, सुनो। यह सम्पूर्ण जगत् छायाकी भाँति उत्पत्ति और विनाशरूप धर्मसे युक्त है। धन, यौवन और भोग जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति चंचल हैं। यह जानकर और इसपर भलीभाँति विचार करके भगवान् शंकरकी शरणमें जाना चाहिये और दान भी करना चाहिये। किसी भी मनुष्यको कदापि पाप नहीं करना चाहिये, यह वेदकी आज्ञा है। श्रुति यह भी कहती है कि महादेवजीका भक्त जन्म और मृत्युके बन्धनमें नहीं पड़ता। पूर्वकालमें सावर्णि मुनिने जो दो गाथाएँ गान की हैं, उन्हें सुनो—'भगवान् धर्मका नाम वृष है। वे ही जिनके वाहन हैं, उन महादेवजीकी यदि पूजा की जाती है, तो वही सबसे महान् धर्म कहा गया है। जिसमें दुःखरूपी भँवर उठता है, अज्ञानमय प्रवाह बहता रहता है, धर्म और अधर्म ही जिसके जल हैं, जो क्रोधरूपी कीचड़से युक्त है, जिसमें मदरूपी ग्राह निवास करता है, जहाँ लोभरूपी बुलबुले उठते रहते हैं, अभिमान ही जिसकी पातालतक पहुँचनेवाली गहराई है, सत्त्वगुणरूपी जहाज जिसकी शोभा बढ़ाता है, ऐसे संसारसमुद्रमें डूबनेवाले जीवोंको केवल भगवान् शंकर ही पार लगाते हैं। दान, सदाचार, व्रत, सत्य और प्रिय वचन, उत्तम कीर्ति, धर्मपालन तथा आयुपर्यन्त दूसरोंका उपकार—इन सार वस्तुओंका इस असार शरीरसे उपार्जन करना चाहिये। राग हो तो धर्ममें, चिन्ता हो तो शास्त्रकी, व्यसन हो तो दानका—ये सभी बातें उत्तम हैं। इन सबके साथ यदि विषयोंके प्रति वैराग्य हो जाय तो समझना चाहिये, मैंने जन्मका फल पा लिया।* इस भारतवर्षमें मनुष्यका शरीर, जो सदा टिकनेवाला नहीं है, पाकर जो अपना कल्याण नहीं कर लेता, उसने दीर्घकालतकके लिये अपने आत्माको धोखेमें डाल दिया। देवता और असुर सबके लिये मनुष्य-योनिमें जन्म लेनेका सौभाग्य अत्यन्त दुर्लभ है। उसे पाकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे नरकमें न जाना पड़े। यह मानव-शरीर सर्वस्वसाधनका मूल है तथा सब पुरुषार्थोंको सिद्ध करनेवाला है। यदि तुम सदा लाभ उठानेके ही प्रयासमें रहते हो, तो इस मूलकी यत्नपूर्वक रक्षा करो। महान् पुण्यरूपी मूल्य देकर तुम्हारे द्वारा यह मानव-शरीररूपी नौका इसलिये खरीदी जाती है कि इसके द्वारा दुःखरूपी समुद्रके पार पहुँचा जा सके। जबतक यह नौका छिन्न-भिन्न नहीं हो जाती, तबतक ही तुम इसके द्वारा संसार-समुद्रको पार कर लो। जो नीरोग मानवशरीररूपी दुर्लभ वस्तुको पाकर भी उसके द्वारा संसारसागरके पार नहीं हो जाता, वह नीच मनुष्य आत्महत्यारा है। इसी शरीरमें रहकर यतिजन परलोकके लिये तप करते हैं, यज्ञकर्ता होम करते हैं और दाता पुरुष आदरपूर्वक दान देते हैं।'

कात्यायनने पूछा—सारस्वतजी! दान और


* दानं वृत्तं व्रतं वाचः कीर्तिर्धर्मस्तथायुषः। परोपकरणं कायादसारात् सारमुद्धरेत् ॥
धर्मे रागः श्रुतौ चिन्ता दाने व्यसनमुत्तमम्। इन्द्रियार्थेषु वैराग्यं सम्प्राप्तं जन्मनः फलम् ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २। ४७-४८)

९०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तपस्यामें कौन दुष्कर है तथा कौन परलोकमें महान् फल देनेवाला है; यह बतलाइये।

सारस्वतने कहा—मुने! इस पृथ्वीपर दानसे बढ़कर अत्यन्त दुष्कर कोई कार्य नहीं है। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। सभी लोग इसके साक्षी हैं। मनुष्य धनके लिये महान् लोभ होनेके कारण अपने प्यारे प्राणोंका भी मोह छोड़कर महाभयंकर समुद्र, जंगल और पहाड़ोंमें प्रवेश कर जाते हैं। दूसरे लोग धनके ही लोभसे सेवा-जैसी निन्दित वृत्तिका आश्रय लेते हैं, जिसे कुत्तेकी वृत्तिके समान त्याज्य माना गया है। कुछ लोग खेतीकी वृत्ति अपनाते हैं, जिसमें प्रायः जीवोंकी हिंसा होती है और स्वयं भी बहुत क्लेश उठाने पड़ते हैं। इस प्रकार जो बड़े दुःखसे उपार्जन किया गया, सैकड़ों आयास-प्रयाससे प्राप्त किया गया, प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है, उस धनका त्याग अत्यन्त दुष्कर है। मनुष्य अपने हाथसे उठाकर जो धन दूसरेको देता है, अथवा जिसे वह खा-पीकर भोग लेता है, वही धन वास्तवमें उस धनीका है। मरे हुए मनुष्यके धनसे तो दूसरे लोग मौज करते हैं। जो प्रतिदिन अपने पास आकर याचना करता है, मैं उसे गुरु मानता हूँ; क्योंकि वह नित्यप्रति दर्पणकी भाँति मेरे चित्तका मार्जन करके इसे स्वच्छ बनाता है। दिया जानेवाला धन घटता नहीं, अपितु सदा बढ़ता ही रहता है। ठीक उसी प्रकार, जैसे कुएँसे पानी उलीचनेपर वह शुद्ध और अधिक जलवाला होता है। एक जन्मके सुखके लिये सहस्रों जन्मोंके सुखोंपर पानी नहीं फेरना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष एक ही जन्ममें इतना पुण्य संचय कर लेता है, जो सहस्रों जन्मोंके लिये पर्याप्त होता है। मूर्ख मनुष्य इस लोकमें दरिद्र हो जानेकी आशंकासे अपने धनका दान नहीं करता, परंतु विद्वान् पुरुष परलोकमें दरिद्र न होना पड़े, इस शंकासे यहाँ खुले हाथों धन बाँटता है। जिनका आश्रय ही नाशवान् है, वे मनुष्य धन रखकर क्या करेंगे? जिसके लिये वे धन चाहते हैं, वह शरीर सदा रहनेवाला नहीं है। लोगोंने पहलेसे जो 'नास्ति-नास्ति' (नहीं है, नहीं है) इन दो अक्षरोंका अभ्यास कर रखा है, उसकी जगह यह 'देहि-देहि' (दो-दो) इन दो अक्षरोंका प्रस्ताव विपरीत जान पड़ता है। याचक जन 'देहि' (दीजिये) कहकर याचना नहीं करते, अपितु कृपण मनुष्यको यह समझाते हैं कि 'दान न करनेवालेकी यही (मेरी-जैसी) अवस्था होती है। अतः आप भी ऐसे ही न बनें।' याचक दाताका उपकार करनेके लिये ही उसके सामने 'देहि' (दीजिये) कहकर याचना करता है; क्योंकि दाता तो ऊपरके लोकोंमें जाता है और दान लेनेवाला नीचे ही रह जाता है। जो दान नहीं करते, वे दरिद्र, रोगी, मूर्ख तथा सदा दूसरोंके सेवक होकर दुःखके ही भागी होते हैं। जो धनवान् होकर दान नहीं करता और दरिद्र होकर कष्ट-सहनरूप तपसे दूर भागता है, इन दोनोंको गलेमें बड़ा भारी पत्थर बाँधकर जलमें छोड़ देना चाहिये। सैकड़ों मनुष्योंमें कोई शूरवीर हो सकता है, सहस्रोंमें कोई पण्डित भी मिल सकता है तथा लाखोंमें कोई वक्ता भी निकल सकता है, परंतु इनमें एक भी दाता हो सकता है या नहीं, इसमें सन्देह है। गौ, ब्राह्मण, वेद, सती स्त्री, सत्यवादी पुरुष, लोभहीन तथा दानशील मनुष्य—इन सातोंके द्वारा ही यह पृथ्वी धारण की जाती है।* उशीनर देशके राजा शिवि ब्राह्मणके लिये


* अहन्यहनि याचन्तमहं मन्ये गुरुं तथा। मार्जनं दर्पणस्येव यः करोति दिने दिने॥
दीयमानं हि नायैति भूय एवाभिवर्धते। कूप उत्सिच्यमानो हि भवेच्छुद्धो बहुदकः॥
एकजन्मसुखस्यार्थे सहस्राणि न लोपयेत्। प्राज्ञो जन्मसहस्रेषु संचिनोत्येकजन्मनि॥
मूर्खो हि न ददात्यर्थानिह दारिद्र्यशङ्कया। प्राज्ञस्तु विसृजत्यर्थानमुत्र तस्य शङ्कया॥

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९१

अपने शरीरको देकर स्वर्गलोकमें चले गये। विदेहनरेश निमिने अपना सम्पूर्ण राज्य, परशुरामजीने सारी पृथ्वी तथा राजा गयने नगरोंसहित समूची पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी। एक समय जब बहुत दिनोंतक मेघोंने वर्षा नहीं की, तब वसिष्ठजीने सब प्राणियोंको उसी प्रकार जीवित रखा, जैसे प्रजापति समस्त प्रजाके जीवनकी रक्षा करते हैं। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पांचाल-नरेश ब्रह्मदत्तने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको शंख निधि प्रदान करके स्वर्गलोक प्राप्त किया। ये तथा और भी बहुत-से राजर्षि, जो शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे, दान तथा शिवभक्तिके प्रभावसे रुद्रलोकमें गये। जबतक यह पृथ्वी टिकी रहेगी तबतक इन सबकी कीर्ति स्थिर है। ऐसा विचार करके तुम सारभूत धर्मके अभिलाषी होकर भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये सदा दान करते रहो।

यह उपदेश सुनकर कात्यायन भी मोह त्यागकर वैसे ही हो गये।

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नारदजीके द्वारा धर्मवर्माके दानसम्बन्धी जटिल प्रश्नोंका समाधान

नारदजी बोले—वीरश्रेष्ठ अर्जुन! इस प्रकार पृथ्वीपर जो-जो पवित्र तीर्थस्थान हैं, उन सबका दर्शन करते हुए मैं समूची पृथ्वीपर घूमता-घामता भृगुके आश्रमपर पहुँचा, जहाँ श्रेष्ठ एवं पवित्र नर्मदा नदी बहती है, जिसका स्मरण सात कल्पोंतक पुण्य फल देनेवाला होता है। नर्मदा महान् पुण्य प्रदान करनेवाली, पवित्र, सर्वतीर्थमयी तथा कल्याणकारिणी है। वह अपने नामोंका कीर्तनमात्र करनेसे पवित्र कर देती है। दर्शन करनेपर तो वह विशेष पुण्यदायिनी होती है। कुन्तीनन्दन! नर्मदामें स्नान करनेपर जीव सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जैसे पिंगला नामवाली नाड़ी शरीरके मध्य भागमें स्थित है। इसी प्रकार यह नर्मदा ब्रह्माण्डरूपी शरीरके उसी स्थान (मध्यभाग)-में स्थित बतायी गयी है। वहाँ नर्मदामें सब पापोंका नाश करनेवाला शुक्लतीर्थ है जहाँ स्नान करनेमात्रसे ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है। अर्जुन! उस शुक्ल तीर्थके समीप नर्मदाके उत्तर तटपर भृगु मुनिका आश्रममण्डल है, जिसमें तीनों वेदोंके विद्वान् ब्राह्मण रहकर सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ाते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंके उच्चघोषसे वहाँकी सम्पूर्ण दिशाएँ गूँजती रहती हैं। मुनिश्रेष्ठ भृगु जहाँ विराजमान थे, उस स्थानपर मैं भी गया; मुझे आते देख भृगु आदि सब ब्राह्मणोंने उठकर मेरा स्वागत किया। भलीभाँति स्वागत करके मुझे अर्घ्य, पाद्य आदि निवेदन कर वे सब मुनीश्वर मेरे और भृगुजीके साथ आसनोंपर बैठे। फिर यह जानकर कि मैंने पूर्ण विश्राम कर लिया, मुझसे भृगुजीने इस प्रकार पूछा—'मुनिश्रेष्ठ!

किं धनेन करिष्यन्ति देहिनो भङ्गुराश्रयाः। यदर्थं धनमिच्छन्ति तच्छरीरमशाश्वतम्॥
अक्षरद्वयमभ्यस्तं नास्ति नास्तीति यत्पुरा। तदिदं देहि देहीति विपरीतमुपस्थितम्॥
बोधयन्ति न याचन्ते देहीति कृपणं जनाः। अवस्थेयमदानस्य माभूदेवं भवानपि॥
दातुरेवोपकाराय वदन्त्यर्थीति देहि मे। यस्माद्दाता प्रयात्यूर्ध्वमधस्तिष्ठेत् प्रतिग्रही॥
दरिद्रा व्याधिता मूर्खाः परप्रेष्यकराः सदा। अदत्तदाना जायन्ते दुःखस्यैव हि भाजनाः॥
धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम्। उभावम्भासि मोक्तव्यौ गले बद्ध्वा महाशिलाम्॥
शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः। वक्ता शतसहस्रेषु दाता जायेत वा न वा॥
गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभिः सत्यवादिभिः। अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धार्यते मही॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २। ६०-७१)

९२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आपको कहाँ जाना है और कहाँसे आप यहाँ पधारे हैं?'

तब मैंने भृगुजीसे कहा—महर्षे ! मैंने समुद्र-पर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर भ्रमण किया है। मेरी यात्राका उद्देश्य था ब्राह्मणोंको भूमिदान करनेके लिये उत्तम भूमिकी खोज करना। मैं पग-पगपर ऐसी भूमिका अनुसन्धान करता था, जो सर्वथा निर्दोष, पवित्र तीर्थोंसे युक्त, रमणीय और मनोरम हो। किंतु किसी प्रकार ऐसी भूमि मुझे नहीं दिखायी देती।

भृगुजी बोले—देवर्षे ! मैंने भी ब्राह्मणोंको बसानेके लिये पूर्वकालमें समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया था। उस समय मैंने शुभ पुण्यभूमिका दर्शन किया है। 'मही' नामसे प्रसिद्ध एक परम पवित्र नदी है, जो सर्वतीर्थमयी होनेके साथ ही परम कल्याणकारिणी है। वह देखनेमें मनोरम, सौम्य तथा महापापोंका विनाश करनेवाली है। नारद! पृथ्वीपर जो देखे हुए और बिना देखे हुए तीर्थ हैं, वे सब मही नदीके जलमें निवास करते हैं। पुण्यसलिला मही नदी समुद्रमें मिली हुई है। जहाँ मही और समुद्रका संगम हुआ है, वहाँ स्तम्भ नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ जो मनुष्य स्नान करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो जानेके कारण यमराजके समीप नहीं जाते।

मैंने कहा—भृगुजी! आप और हम दोनों मही नदीके शोभायमान तटपर चलेंगे और साथ ही उस परम उत्तम स्थानका पूर्णरूपसे दर्शन करेंगे।

मेरी बात सुनकर भृगुजी मेरे साथ परम पुण्यमय महीतटका दर्शन करनेके लिये आये। उसे देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ। मेरे सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया और मैंने हर्ष-गद्गद वाणीमें मुनिश्रेष्ठ भृगुजीसे कहा—'ब्रह्मन् ! आपके प्रसादसे मैं इस स्थानको बहुत उत्तम बनाऊँगा। अब आप अपने आश्रमपर पधारें। मैं आगेके कार्यपर विचार करूँगा।' इस प्रकार भृगुजीको विदा करके मैं महीके तटपर विचार करने लगा कि यह स्थान मेरे अधीन कैसे होगा क्योंकि यह भूमि सदा राजाओंके अधीन रही है। यदि मैं राजा धर्मवर्माके पास जाकर इस भूमिके लिये याचना करता हूँ तो वे मेरे माँगनेपर मुझे अवश्य दे देंगे; परंतु मुनियोंने तीन प्रकारके द्रव्य बतलाये हैं—शुक्ल, शबल और कृष्ण। इनमें शुक्ल सबसे उत्तम है। शबल मध्यम श्रेणीका है और कृष्ण अधम कहलाता है। वेदोंको पढ़ाकर शिष्यसे दक्षिणारूपमें जो धन प्राप्त होता है वह शुक्ल कहा गया है। कन्यासे तथा सूद, व्यापार, खेती और याचनासे मिला हुआ धन शबल कहलाता है। जुआ, चोरी, दुःसाहसपूर्ण कार्य तथा छलसे कमाया हुआ धन कृष्ण कहा गया है। (ये शुक्ल, शबल और कृष्ण द्रव्य क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस माने गये हैं।) जो मनुष्य किसी उत्तम तीर्थ और पात्रको पाकर शुक्ल धनके द्वारा श्रद्धापूर्वक धर्मका अनुष्ठान करता है, वह देवयोनिमें उसके फलका उपभोग करता है। जो राजस भावसे शबल धनके द्वारा याचकोंको दान देता है, वह उसका उपभोग मनुष्य-योनिमें करता है। जो तमोगुणसे आवृत्त हो कृष्ण धनके द्वारा दान करता है, वह नराधम मृत्युके पश्चात् तिर्यग् योनिमें जाकर उसके फलका उपभोग करता है। इस दृष्टिसे मेरे याचना करनेपर मिला हुआ धन राजस होगा, यह बात स्वतः स्पष्ट है। यदि ब्राह्मणभावसे उपस्थिति हो राजासे प्रतिग्रहकी याचना करता हूँ तो वह भी प्रतिग्रह होनेके ही कारण मुझे अत्यन्त कष्टदायक प्रतीत होता है। यह राजप्रतिग्रह बड़ा भयंकर है। स्वादमें तो मधुके समान है, किंतु परिणाममें विषके तुल्य है। प्रतिग्रहयुक्त ब्राह्मण नरकमें जाता है, इसीलिये मैं इस प्रतिग्रहरूपी पापसे अलग हूँ। तब दान और याचना इन दोमेंसे किसी एक उपायके द्वारा यह स्थान अपने अधिकारमें करूँ। इसी बातपर मैं बार-बार विचार करने लगा।

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९३

अर्जुन! इसी समय मही और समुद्रके पवित्र संगममें स्नान करनेके लिये वहाँ बहुत-से ऋषि-मुनि आ पहुँचे।

मैंने उन सबसे पूछा—'महात्माओ! आपलोग कहाँसे आये हैं?' तब वे मुझे प्रणाम करके बोले—'मुने! हमलोग सौराष्ट्र देशमें रहते हैं, जहाँके राजा धर्मवर्मा हैं। राजा धर्मवर्माने दानका तत्त्व जाननेकी इच्छासे बहुत वर्षोंतक तपस्या की, तब आकाशवाणीने उनसे एक श्लोक कहा—वह इस प्रकार है, सुनो—

द्विहेतु षडधिष्ठानं षडङ्गं च द्विपाकयुक्।
चतुष्प्रकारं त्रिविधं त्रिनाशं दानमुच्यते॥

'दानके दो हेतु, छः अधिष्ठान, छः अंग, दो प्रकारके परिणाम (फल), चार प्रकार, तीन भेद और तीन विनाशसाधन हैं; ऐसा कहा जाता है।'

"यह एक श्लोकमात्र कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी। नारदजी! राजाके पूछनेपर भी आकाशवाणीने इस श्लोकका अर्थ नहीं बतलाया। तब महाराज धर्मवर्माने ढिंढोरा पिटवाकर यह घोषणा करायी कि 'जो मेरी तपस्याद्वारा प्राप्त हुए इस श्लोककी ठीक-ठीक व्याख्या कर देगा उसे मैं सात लाख गौएँ, इतनी ही स्वर्णमुद्राएँ तथा सात गाँव दूँगा।' डंकेकी चोटपर राजाकी यह महती घोषणा सुनकर अनेक देशोंके बहुत ब्राह्मण वहाँ गये। नारदजी! हम भी धनके लोभसे वहाँ गये थे, किंतु श्लोक दुर्बोध होनेके कारण उसकी व्याख्या न करके यहाँ लौट आये हैं और अब तीर्थयात्राके लिये जाते हैं।"

अर्जुन! उन महात्माओंकी यह बात सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें विदा करके सोचने लगा—'अहो! इस स्थानकी प्राप्तिके लिये मुझे अच्छा उपाय मिल गया, इसमें संशय नहीं है। श्लोककी व्याख्या करके विद्याके मूल्यपर मैं राजासे स्थान और धन दोनों प्राप्त करूँगा। ऐसा करनेपर मुझे प्रतिग्रह नहीं माँगना पड़ेगा। अब मेरा दुर्लभ मनोरथ सिद्ध हो गया। यद्यपि यह श्लोक अत्यन्त दुर्बोध है, तथापि मैं इसे अच्छी तरह जानता हूँ।' कुन्तीनन्दन! इस प्रकार विचार करके मुझे बड़ा हर्ष हुआ। फिर उस महीसागर-संगम तीर्थको बार-बार प्रणाम करके मैं वहाँसे चला और वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके राजा धर्मवर्माके पास जा पहुँचा। वहाँ जाकर मैंने राजासे इस प्रकार कहा—'नरेन्द्र! मुझसे श्लोककी व्याख्या सुनिये और इसके बदलेमें जो कुछ देनेके लिये आपने ढिंढोरा पिटवाया है, उसकी यथार्थता प्रकट कीजिये।'

मेरे ऐसा कहनेपर राजा बोले—'ब्रह्मन्! ऐसी बात तो बहुत अधिक श्रेष्ठ ब्राह्मण कह चुके हैं; परंतु कोई भी इसका वास्तविक अर्थ नहीं बता सका। दानके वे दोनों हेतु कौन हैं? छः अधिष्ठान कौन-से बताये गये हैं? छः अंग कौन हैं? दो फल कौन माने गये हैं? वे चार प्रकार और तीन भेद कौन-कौन-से हैं? तथा दानके तीन विनाश-साधन कौन-कौन-से बताये गये हैं? यह सब स्पष्टरूपसे वर्णन कीजिये। विप्रवर! यदि इन सात प्रश्नोंको आप भलीभाँति स्पष्ट करके बतला सकेंगे तो मैं आपको सात लाख गौ, इतनी ही स्वर्णमुद्रा तथा सात गाँव दे दूँगा। यदि नहीं बता सकें तो खाली हाथ अपने घर लौट जाइयेगा।'

अर्जुन! उनके ऐसा कहनेपर सौराष्ट्रपति राजा धर्मवर्मासे मैंने कहा—'राजन्! दानके जो दो हेतु हैं, उन्हें सुनिये,—दानका थोड़ा होना या बहुत होना अभ्युदयका कारण नहीं होता, अपितु श्रद्धा और शक्ति ही दानोंकी वृद्धि और क्षयमें कारण होती है। इनमेंसे श्रद्धाके विषयमें ये श्लोक हैं—शरीरको बहुत क्लेश देनेसे तथा धनकी राशियोंसे सूक्ष्म धर्मकी प्राप्ति नहीं होती। श्रद्धा ही धर्म और अद्भुत तप है, श्रद्धा ही स्वर्ग और मोक्ष है तथा श्रद्धा ही यह सम्पूर्ण जगत् है। यदि कोई बिना श्रद्धाके अपना सर्वस्व दे दे अथवा अपना जीवन ही निछावर कर दे तो भी वह उसका कोई फल नहीं पाता; इसलिये सबको

९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रद्धालु होना चाहिये। श्रद्धासे ही धर्मका साधन किया जाता है; धनकी बहुत बड़ी राशिसे नहीं। क्योंकि अकिंचन ऋषि-मुनि श्रद्धालु होनेके कारण ही स्वर्गलोकमें गये हैं। देहधारियोंमें उनके स्वभावके अनुसार होनेवाली श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसे सुनिये। सात्त्विकी श्रद्धावाले पुरुष देवताओंकी पूजा करते हैं, राजसी श्रद्धावाले लोग यक्षों और राक्षसोंको पूजते हैं तथा तामसी श्रद्धावाले मनुष्य प्रेतों, भूतों और पिशाचोंकी पूजा किया करते हैं। इसलिये श्रद्धावान् पुरुष अपने न्यायोपार्जित धनका सत्पात्रके लिये जो दान करते हैं, वह थोड़ा भी हो तो उसीसे भगवान् शिव प्रसन्न हो जाते हैं।^१

'शक्तिके विषयमें श्लोक इस प्रकार हैं—कुटुम्बके भरण-पोषणसे जो अधिक हो, वही धन दान करने योग्य है, वही मधुके समान मीठा है—उसीसे वास्तविक धर्मका लाभ होता है। इसके विपरीत करनेपर वह आगे चलकर विषके समान हानिकारक होता है, दाताका धर्म अधर्मरूपमें परिणत हो जाता है। यदि आत्मीयजन दुःखसे जीवननिर्वाह कर रहे हों, तो उस अवस्थामें किसी सुखी और समर्थ पुरुषको दान देनेवाला मनुष्य मधुपानके धोखेमें मानो विष-भक्षण करनेवाला है। वह धर्मके अनुकूल नहीं, प्रतिकूल चलता है। जो भरण-पोषण करनेयोग्य व्यक्तियोंको कष्ट देकर किसी मृत व्यक्तिके लिये (बहु-व्ययसाध्य) श्राद्ध करता है, उसका किया हुआ वह श्राद्ध उसके जीते-जी अथवा मरनेपर भी भविष्यमें दुःखका ही कारण होता है। जो अत्यन्त तुच्छ हो अथवा जिसपर सर्वसाधारणका अधिकार हो, वह वस्तु 'सामान्य' कहलाती है, कहींसे माँगकर लायी हुई वस्तुको 'याचित' कहते हैं, धरोहरका ही दूसरा नाम 'न्यास' है, बन्धक रखी हुई वस्तुको 'आधि' कहते हैं, दी हुई वस्तु 'दान'के नामसे पुकारी जाती है, दानमें मिली हुई वस्तुको 'दान-धन' कहते हैं, जो धन एकके यहाँ धरोहर रखा गया हो और रखनेवालेने उसे पुनः दूसरेके यहाँ रख दिया हो उसे 'अन्वाहित' कहते हैं, जिसे किसीके विश्वासपर उसके यहाँ छोड़ दिया जाय, वह धन 'निक्षिप्त' कहलाता है, वंशजोंके होते हुए भी सब कुछ दूसरोंको दे देना 'सान्वय सर्वस्व दान' कहा गया है। विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि वे आपत्तिकालमें भी उपर्युक्त नव प्रकारकी वस्तुओंका दान न करें। जो पूर्वोक्त नव वस्तुओंका दान करता है, वह मूढ़चित्त मानव प्रायश्चित्तका भागी होता है।^२


१- कायक्लेशैश्च बहुभिर्न चैवार्थस्य राशिभिः। धर्मः सम्प्राप्यते सूक्ष्मः श्रद्धा धर्मोऽद्भुतं तपः॥
श्रद्धा स्वर्गश्च मोक्षश्च श्रद्धा सर्वमिदं जगत्। सर्वस्वं जीवितं चापि दद्यादश्रद्धया यदि॥
नाप्नुयात्स फलं किञ्चिच्छ्रद्दधानस्ततो भवेत्। श्रद्धया साध्यते धर्मो महद्भिर्नार्थराशिभिः॥
निष्किञ्चना हि मुनयः श्रद्धावन्तो दिवंगताः। त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा॥
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चैव तां शृणु। यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः॥
प्रेतान् भूतान् पिशाचांश्च यजन्ते तामसा जनाः। तस्माच्छ्रद्धावता पात्रे दत्तं न्यायार्जितं हि यत्॥
तेनैव भगवान् रुद्रः स्वल्पकेनापि तुष्यति।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २९–३५)

२- कुटुम्बभुक्तभरणाद्देयं यदतिरिच्यते। मध्वास्वादो विषं पश्चाद्दातुर्धर्मोऽन्यथा भवेत्॥
शक्ते परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि। मध्वापानविषादः स धर्माणां प्रतिरूपकः॥
भृत्यानामुपरोधेन यः करोत्यौर्ध्वदैहिकम्। तद्भवत्यसुखोदर्कं जीवितोऽस्य मृतस्य च॥
सामान्यं याचितं न्यासमाधिर्दानं च तद्धनम्। अन्वाहितं च निक्षिप्तं सर्वस्वं चान्वये सति॥
आपत्स्वपि न देयानि नववस्तूनि पण्डितैः। यो ददाति स मूढात्मा प्रायश्चित्ती भवेन्नरः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३६–४०)

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९५


'राजन्! ये दानके दो हेतु बताये गये हैं। अब अधिष्ठानोंका वर्णन सुनो। दानके अधिष्ठान छः हैं। उन्हें बताता हूँ— धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, हर्ष और भय—ये दानके छः अधिष्ठान कहे जाते हैं। सदा ही किसी प्रयोजनकी इच्छा न रखकर केवल धर्मबुद्धिसे सुपात्र व्यक्तियोंको जो दान दिया जाता है, उसे 'धर्म-दान' कहते हैं। मनमें कोई प्रयोजन रखकर ही प्रसंगवश जो कुछ दिया जाता है, उसे 'अर्थ-दान' कहते हैं। वह इस लोकमें ही फल देनेवाला होता है। स्त्रीसमागम, सुरापान, शिकार और जुएके प्रसंगमें अनधिकारी मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक जो कुछ दिया जाता है, वह 'काम-दान' कहलाता है। भरी सभामें याचकोंके माँगनेपर लज्जावश देनेकी प्रतिज्ञा करके उन्हें जो कुछ दिया जाता है, वह 'लज्जा-दान' माना गया है। कोई प्रिय कार्य देखकर अथवा प्रिय समाचार सुनकर हर्षोल्लाससे जो कुछ दिया जाता है, उसे धर्मविचारक महात्मा पुरुष 'हर्ष-दान' कहते हैं। निन्दा, अनर्थ और हिंसाका निवारण करनेके लिये अनुपकारी व्यक्तियोंको विवश होकर जो कुछ दिया जाता है, उसे 'भय-दान' कहते हैं।*

'इस प्रकार दानके छः अधिष्ठान बताये गये। अब उसके छः अंगोंका वर्णन सुनिये—दाता, प्रतिग्रहीता, शुद्धि, धर्मयुक्त देय वस्तु, देश और काल—ये दानके छः अंग माने गये हैं। दाता नीरोग, धर्मात्मा, देनेकी इच्छा रखनेवाला, व्यसनरहित, पवित्र तथा सदा अनिन्दनीय कर्मसे आजीविका चलानेवाला होना चाहिये। इन छः गुणोंसे दाताकी प्रशंसा होती है। सरलतासे रहित, श्रद्धाहीन, दुष्टात्मा, दुर्व्यसनी, झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला तथा बहुत सोनेवाला दाता तमोगुणी और अधम माना गया है। जिसके कुल, विद्या और आचार तीनों उज्ज्वल हों, जीवननिर्वाहकी वृत्ति भी शुद्ध और सात्त्विक हो, जो दयालु, जितेन्द्रिय तथा योनि-दोषसे मुक्त हो, वह ब्राह्मण दानका उत्तम पात्र (प्रतिग्रहका सर्वोत्तम अधिकारी) कहा जाता है। याचकोंको देखनेपर सदा प्रसन्नमुख हो उनके प्रति हार्दिक प्रेम होना, उनका सत्कार करना तथा उनमें दोषद्रष्टि न रखना ये सब सद्गुण दानमें शुद्धिकारक माने गये हैं। जो धन किसी दूसरेको सताकर न लाया गया हो, अति क्लेश उठाये बिना अपने प्रयत्नसे उपार्जित किया गया हो, वह थोड़ा हो या अधिक, वही देने योग्य बताया गया है। किसीके साथ कोई धार्मिक उद्देश्य लेकर जो वस्तु दी जाती है, उसे धर्मयुक्त देय कहते हैं। यदि देय वस्तु उक्त विशेषताओंसे शून्य हो तो उसके दानसे कोई फल नहीं होता। जिस देश अथवा कालमें जो-जो पदार्थ दुर्लभ हो, उस-उस पदार्थका दान करनेयोग्य वही-वही देश और काल श्रेष्ठ है;


* अधिष्ठानानि वक्ष्यामि षडेव शृणु तानि च। धर्ममर्थं च कामं च व्रीडाहर्षभयानि च॥
अधिष्ठानानि दानानां षडेतानि प्रचक्षते। पात्रेभ्यो दीयते नित्यमनपेक्ष्य प्रयोजनम्॥
केवलं धर्मबुद्ध्या यद्धर्मदानं तदुच्यते। प्रयोजनमपेक्ष्यैव प्रसंगाद्यत्प्रदीयते॥
तदर्थदानमित्याहुर्हैहिकं फलहेतुकम्। स्त्रीपानमृगयाक्षाणां प्रसंगाद्यत्प्रदीयते॥
अनर्हेषु सुयत्नेन कामदानं तदुच्यते। संसदि व्रीडयाऽऽश्रुत्य अर्थोऽर्थिभ्यः प्रयाचितः॥
प्रदीयते तु तद्दानं व्रीडादानमिति श्रुतम्। दृष्ट्वा प्रियाणि श्रुत्वा वा हर्षेण यत्प्रदीयते॥
हर्षदानमिति प्राहुर्दानं तद्धर्मचिन्तकाः। आक्रोशामर्थहिंसानां प्रतीकाराय यद्भवेत्॥
दीयतेऽनुपकर्तृभ्यो भयदानं तदुच्यते।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ४२—४९)

९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

दूसरा नहीं। इस प्रकार ये दानके छः अंग बताये गये हैं।^१

'अब दानके द्विविध फलोंका वर्णन सुनो। महात्माओंने दानके दो परिणाम (फल) बतलाये हैं। उनमेंसे एक तो परलोकके लिये होता है और एक इहलोकके लिये। श्रेष्ठ पुरुषोंको जो कुछ दिया जाता है, उसका परलोकमें उपभोग होता है और असत् पुरुषोंको जो कुछ दिया जाता है, वह दान यहीं भोगा जाता है। ये दो परिणाम बताये गये हैं। अब दानके चार प्रकारोंको श्रवण करो। ध्रुव, त्रिक, काम्य और नैमित्तिक—इस क्रमसे द्विजोंने वैदिक दान-मार्गको चार प्रकारका बतलाया है। कुँआ बनवाना, बगीचे लगवाना तथा पोखरे खुदवाना आदि कार्योंमें, जो सबके उपयोगमें आते हैं, धन लगाना 'ध्रुव' कहा गया है। प्रतिदिन जो कुछ दिया जाता है, उस नित्य दानको ही 'त्रिक' कहते हैं। सन्तान, विजय, ऐश्वर्य, स्त्री और बल आदिके निमित्त तथा इच्छाकी पूर्तिके लिये जो दान किया जाता है, वह 'काम्य' कहलाता है। 'नैमित्तिक' दान तीन प्रकारका बतलाया गया है। वह होमसे रहित होता है। जो ग्रहण और संक्रान्ति आदि कालकी अपेक्षासे दान किया जाता है, वह 'कालापेक्ष' नैमित्तिक दान है। श्राद्ध आदि क्रियाओंकी अपेक्षासे जो दान किया जाता है। वह 'क्रियापेक्ष' नैमित्तिक दान है तथा संस्कार और विद्या-अध्ययन आदि गुणोंकी अपेक्षा रखकर जो दान दिया जाता है, वह 'गुणापेक्ष' नैमित्तिक दान है।^२

इस तरह दानके चार प्रकार बतलाये गये हैं। अब उसके तीन भेदोंका प्रतिपादन किया जाता है। आठ वस्तुओंके दान उत्तम माने गये हैं। विधिके अनुसार किये हुए चार दान मध्यम हैं और शेष कनिष्ठ माने गये हैं। यही दानकी


१- दाता प्रतिग्रहीता च शुद्धिर्देयं च धर्मयुक्। देशकालौ च दानानामङ्गान्येतानि षड् विदुः॥
अपरोगी च धर्मात्मा दित्सुर्व्यसनः शुचिः। अनिन्द्याजीवकर्मा च षड्भिर्दाता प्रशस्यते॥
अनृजुश्चाश्रद्दधानो दुष्टात्मा व्यसनी च यः। असत्यसन्धो निद्रालुर्दातायं तामसोऽधमः॥
त्रिशुक्लः शुक्लवृत्तिश्च घृणालुः संयतेन्द्रियः। विमुक्तो योनिदोषेभ्यो ब्राह्मणः पात्रमुच्यते॥
सौमुख्यादभिसम्प्रीतिरर्थिनां दर्शने सदा। सत्कृतिश्चानसूया च दाने शुद्धिरिति स्मृता॥
अपराबाधमक्लेशं स्वयत्नेनार्जितं धनम्। स्वल्पं वा विपुलं वापि देयमित्यभिधीयते॥
केनापि सह धर्मेण उद्दिश्य किल किंचन। देयं तद्धर्मयुगिति शून्ये शून्यं फलं मतम्॥
यद्यच्च दुर्लभं द्रव्यं देशे कालेऽपि वा पुनः। दानार्हौ देशकालौ तौ स्यातां श्रेष्ठौ न चान्यथा॥
षडङ्गानीति चोक्तानि ... ... ... ... ... ...॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ५०–५७)

२- ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...। ... ... ... द्वौ च पाकावतः शृणु॥
द्वौ पाकौ दानजौ प्राहुः परत्रार्थमिहोच्यते। सद्भ्यो यद्दीयते किंचित्तत्परत्रोपभुज्यते॥
असत्सु दीयते यत्तु तद्दानमिह भुज्यते। द्वौ पाकाविति निर्दिष्टौ प्रकारांश्चतुरः शृणु॥
ध्रुवमाहुस्त्रिकं काम्यं नैमित्तिकमिति क्रमात्। वैदिको दानमार्गोऽयं चतुर्धा वर्ण्यते द्विजैः॥
कूपारामतडागादि सर्वकामफलं ध्रुवम्। तदाहुस्त्रिकमित्येव दीयते यद्दिने दिने॥
अपत्यविजयैश्वर्यस्त्रीबलार्थे च दीयते। इच्छासंसिद्ध्यै च यद्दानं काम्यमित्यभिधीयते॥
कालापेक्षं क्रियापेक्षं गुणापेक्षमिति स्मृतौ। त्रिधा नैमित्तिकं प्रोक्तं सदा होमविवर्जितम्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ५८–६४)

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९७

त्रिविधता है, जिसे विद्वान् पुरुष जानते हैं। गृह, मन्दिर या महल, विद्या, भूमि, गौ, कूप, प्राण और सुवर्ण— इन वस्तुओंका दान अन्य दानोंकी अपेक्षा उत्तम है। अन्न, बगीचा, वस्त्र तथा अश्व आदि वाहन— इन मध्यम श्रेणीके द्रव्योंको देनेसे यह मध्यम दान माना गया है। जूता, छाता, बर्तन, दही, मधु, आसन, दीपक, काष्ठ और पत्थर आदि— इन वस्तुओंके दानको श्रेष्ठ पुरुषोंने कनिष्ठ दान बताया है। ये दानके तीन भेद बतलाये गये। अब दाननाशके तीन हेतुओंको सुनो। जिसे देकर पीछे पश्चात्ताप किया जाय, जो अपात्रको दिया जाय तथा जो बिना श्रद्धाके अर्पण किया जाय, वह दान नष्ट हो जाता है। पश्चात्ताप, अपात्रता और अश्रद्धा— ये तीनों दानके नाशक हैं। यदि दान देकर पश्चात्ताप हो तो वह आसुर-दान है, जो निष्फल माना गया है। अश्रद्धासे जो कुछ दिया जाता है, वह राक्षस-दान है। वह भी व्यर्थ ही होता है। ब्राह्मणको डाँट-फटकारकर या उसे कटुवचन सुनाकर जो दान किया जाता है अथवा दान देकर जो ब्राह्मणको कोसा जाता है, वह पैशाच-दान माना गया है। उसे भी व्यर्थ ही समझना चाहिये। ये तीनों भाव दानके नाशक हैं।^१ राजन्! इस प्रकार सात पदोंमें बँधा हुआ जो दानका यह उत्तम माहात्म्य है, उसे मैंने तुमको बताया।

धर्मवर्मा बोले— आज मेरा जन्म सफल हुआ। आज मुझे अपनी तपस्याका फल मिल गया। यशस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ महर्षि ! आज आपने मुझे कृतार्थ कर दिया। विद्या पढ़कर यदि मनुष्य दुराचारी हो गया तो उसका सम्पूर्ण जीवन व्यर्थ है। बहुत क्लेश उठाकर जो पत्नी प्राप्त की गयी, वह यदि कटुवादिनी निकली तो वह भी व्यर्थ है। कष्ट उठाकर जो कूँआँ बनवाया गया, उसका पानी यदि खारा निकला तो वह भी निरर्थक है तथा अनेक प्रकारके क्लेश सहन करनेके पश्चात् जो मनुष्यजन्म मिला, वह यदि धर्माचरणके बिना बिताया गया तो उसे भी व्यर्थ ही समझना चाहिये। इसी प्रकार मेरी तपस्या भी व्यर्थ हो गयी थी। उसे आज आपने सफल कर दिया। आपको नमस्कार है। समस्त ब्राह्मणोंको बारंबार नमस्कार है।^२ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वैकुण्ठधाममें आये हुए सनकादि कुमारोंसे यह ठीक ही कहा


१- अष्टोत्तमानि चत्वारि मध्यमानि विधानतः। कनीयसानि शेषाणि त्रिविधत्वमिदं विदुः ॥
गृहप्रासादविद्याभूगोकूपप्राणहाटकम् । एतान्युत्तमादानि उत्तमान्यन्यदानतः ॥
अन्नारामौ च वासांसि हयप्रभृतिवाहनम्। दानानि मध्यमानीति मध्यमद्रव्यदानतः ॥
उपानच्छत्रपात्रादिदधिमध्वासनानि च। दीपकाष्ठोपलादीनि चरमान्याहुरुत्तमाः ॥
इति ते त्रिविधं प्रोक्तं दाननाशत्रयं शृणु।
यदत्त्वा तप्यते पश्चादपात्रेभ्यस्तथा च यत्।
अश्रद्धया च यद्दानं दाननाशास्त्रयस्त्वमी ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २। ६५–६९)
यदत्त्वा तप्यते पश्चादासुरं तद्वृथा मतम्। अश्रद्धया यद्ददाति राक्षसं स्याद्वृथैव तत्॥
यच्चाक्रुश्य ददात्यङ्ग दत्त्वा वाक्रोशति द्विजम्। पैशाचं तद्वृथा दानं दाननाशास्त्रयस्त्वमी ॥
(स्क० वेंकटेश्वरकी प्रतिसे)
२- अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तपसः फलम्। अद्य वै कृतकृत्योऽस्मि कृतः कीर्तिमतां वर॥
पठित्वा सकलं जन्म दुराचारस्य नुर्वृथा। बहुक्लेशाच्च लब्धा स्त्री सा वृथाप्रियवादिनी ॥
क्लेशेन कृत्वा कूपं वा स च क्षारोदको वृथा। बहुक्लेशैरर्जन्म नीत्वा विना धर्मे वृथा यथा॥
एवं मे यद् वृथा जातं तपस्तत्सफलं त्वया। कृतं तस्मान्नमस्तुभ्यं द्विजेभ्यश्च नमो नमः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। १७१–१७४)

९८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

था कि 'मैं यजमानके यज्ञमण्डपमें अपने अग्निरूपी मुखके द्वारा घीमें डुबोयी हुई आहुति पाकर भी उसे उतनी तृप्तिपूर्वक नहीं खाता, जितनी कि मुझमें अपने कर्मफल समर्पित करके प्रसन्न होनेवाले ब्राह्मणके मुखसे भोजन करते समय मुझे एक-एक ग्रासमें तृप्ति होती है।' अतः मैंने अपने व्यवहारोंसे यदि कभी ब्राह्मणोंका अप्रिय किया हो तो सबके स्वामी ब्राह्मणलोग कृपापूर्वक मुझे क्षमा करें। मुने! आप कौन हैं? आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। मैं चरणोंमें मस्तक रखकर आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। कृपया अपना परिचय दीजिये।

राजा धर्मवर्माके ऐसा कहनेपर उस समय मैंने अपना परिचय इस प्रकार दिया— नृपश्रेष्ठ! मैं देवर्षि नारद हूँ। स्थानकी प्राप्तिके लिये आया हूँ। तुम अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मुझे धन दो और स्थान बनानेके लिये भूमि अर्पण करो। महाराज! यद्यपि यह भूमि और धन देवताओंके ही हैं; तथापि जिस समय जो राजा हो, उसीसे उनको माँगना चाहिये। क्योंकि वह पृथ्वीका प्रतिपालक और दाता होता है। इसलिये द्रव्यशुद्धिकी इच्छासे मैं तुमसे कुछ भूमि माँगता हूँ।

राजाने कहा—विप्रवर! यदि आप देवर्षि नारद हैं तो यह सारा राज्य आपका ही रहे। मैं तो आपकी और समस्त ब्राह्मणोंकी चाकरी करूँगा।

नारदजी कहते हैं—अर्जुन! तब मैंने राजा धर्मवर्मासे कहा—'यह धन तुम्हारे ही पास रहे। आवश्यकताके समय मैं ले लूँगा।' ऐसा कहकर मैं रैवतक पर्वतपर चला गया। उस श्रेष्ठ पर्वतका दर्शन करके मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। वहाँ तपस्या करके मनुष्य अपनी अभीष्ट वस्तुको प्राप्त कर लेता है। ठीक उसी तरह जैसे भक्तपुरुष भगवान् महादेवको पाकर अपना मनोरथ सिद्ध कर लेता है। कुन्तीनन्दन! मैं रैवतक पर्वतकी एक बहुत बड़ी शिलापर बैठ गया और शीतल, मन्द, सुगन्ध पवनके स्पर्शसे अत्यन्त प्रसन्न हो मन-ही-मन विचार करने लगा—स्थान तो मैंने प्राप्त कर लिया, जो अत्यन्त दुर्लभ था। अब मैं उत्तम ब्राह्मणकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न आरम्भ करूँ। मुझे ऐसे ब्राह्मण देखने चाहिये, जो सर्वश्रेष्ठ पात्र माने गये हैं। इस विषयमें वेदवादी विद्वानोंके वचन इस प्रकार सुने जाते हैं—जैसे खेनेवालेके बिना कोई नाव किसी प्राणीको पार उतारनेमें समर्थ नहीं है, उसी प्रकार जातिसे श्रेष्ठ ब्राह्मण भी यदि दुराचारी हो तो वह किसीका उद्धार नहीं कर सकता। जिसने शास्त्रोंका अध्ययन नहीं किया है, वह ब्राह्मण तिनकेकी आगके समान शीघ्र बुझ जाता है—तेजोहीन हो जाता है। अतः उसे हव्य प्रदान नहीं करना चाहिये, क्योंकि राखमें आहुति नहीं दी जाती। दानके सुयोग्य पात्रको छोड़कर अपात्रको जो दान दिया जाता है, वह दान वैसा ही है, जैसा कि ऊसरमें बोये हुए बीज शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। दानमें ली हुई भूमि विद्याहीन ब्राह्मणके अन्तःकरणको नष्ट करती है। इसी प्रकार गाय उसके भोगोंका, सुवर्ण उसके शरीरका, घोड़ा उसके नेत्रका, वस्त्र उसकी स्त्रीका, घृत उसके तेजका और तिल उसकी सन्तानका नाश करते हैं। अतः अविद्वान् ब्राह्मणको सदा

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९९

प्रतिग्रहसे डरना चाहिये। मूर्ख ब्राह्मण थोड़ा प्रतिग्रह लेकर भी कीचड़में फँसी हुई गायकी भाँति कष्ट पाता है। इसलिये जो मूढ़ तपस्यासे युक्त और गुप्तरूपसे स्वाध्यायका साधन करनेवाले हैं तथा जो शान्त चित्तवाले हैं, उन्हींको दिया हुआ दान सदा अक्षय होता है। उत्तम देशमें (काशी आदि तीर्थोंमें), उत्तम काल (ग्रहण आदि)-में श्रेष्ठ उपायसे सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक जो द्रव्य दिया जाता है, वही परिपूर्ण दान-धर्मका लक्षण है। केवल विद्या अथवा तपस्यासे सुपात्रता नहीं आती। जहाँ सदाचार है और उसके साथ ये दोनों (विद्या और तपस्या) भी हैं, उसीको उत्तम पात्र कहा जाता है।


कलाप-ग्रामनिवासी सुतनुद्वारा नारदजीके जटिल प्रश्नोंका समाधान

**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! मैं देश-देश घूमकर विद्यारूपी नेत्रवाले ब्राह्मणोंकी परीक्षा करता हूँ। यदि वे मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे, तब मैं उन्हें दान करूँगा। ऐसा विचार करके मैं उस स्थानसे उठा और महर्षियोंके आश्रमोंपर इन प्रश्नरूपी श्लोकोंका गान करता हुआ विचरण करने लगा। वे श्लोक इस प्रकार हैं, सुनो—

मातृकां को विजानाति कतिधा कीदृशाक्षराम्।
पञ्चपञ्चाद्भुतं गेहं को विजानाति वा द्विजः॥
बहुरूपां स्त्रियं कर्तुमेकरूपां च वेत्ति कः।
को वा चित्रकथं बन्धं वेत्ति संसारगोचरः॥
को वार्णवमहाग्राहं वेत्ति विद्यापरायणः।
को वाष्टविधं ब्राह्मण्यं वेत्ति ब्राह्मणसत्तमः॥
युगानां च चतुर्णां वा को मूलदिवसान् वदेत्।
चतुर्दशमनूनां वा मूलवारं च वेत्ति कः॥
कस्मिंश्चैव दिने प्राप पूर्वं वा भास्करो रथम्।
उद्वेजयति भूतानि कृष्णाहिरिव वेत्ति कः॥
को वास्मिन् घोरसंसारे दक्षदक्षतमो भवेत्।
पन्थानावपि द्वौ कश्चिद्वेत्ति वक्ति च ब्राह्मणः॥
इति मे द्वादश प्रश्नान् ये विदुर्ब्राह्मणोत्तमाः।
ते मे पूज्यतमास्तेषामहमाराधकश्चिरम्॥
(स्क० पु० मा० कुमा० ३।२०५-२१२)

(१) मातृकाको कौन विशेषरूपसे जानता है? वह मातृका कितने प्रकारकी और कैसे अक्षरोंवाली है? (२) कौन द्विज पचीस वस्तुओंके बने हुए गृहको अच्छी तरह जानता है? (३) अनेक रूपवाली स्त्रीको एक रूपवाली बनानेकी कला किसको ज्ञात है? (४) संसारमें रहनेवाला कौन पुरुष विचित्र कथावाली वाक्य-रचनाको जानता है? (५) कौन स्वाध्यायशील ब्राह्मण समुद्रमें रहनेवाले महान् ग्राहकी जानकारी रखता है? (६) किस श्रेष्ठ ब्राह्मणको आठ प्रकारके ब्राह्मणत्वका ज्ञान है? (७) चारों युगोंके मूल दिनोंको कौन बता सकता है? (८) चौदह मनुओंके मूल दिवसका किसको ज्ञान है? (९) भगवान् सूर्य किस दिन पहले-पहल रथपर सवार हुए? (१०) जो काले सर्पकी भाँति सब प्राणियोंको उद्वेगमें डाले रहता है, उसे कौन जानता है? (११) इस भयंकर संसारमें कौन दक्ष मनुष्योंसे भी अत्यधिक दक्ष माना गया है? (१२) कौन ब्राह्मण दोनों मार्गोंको जानता और बतलाता है? जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे इन बारह प्रश्नोंको जानते हैं, वे मेरे लिये परमपूज्य हैं और मैं उनका चिरकालतक सेवक बना रहूँगा।

अर्जुन! इन प्रश्नोंका गान करता हुआ मैं सारी पृथ्वीपर घूमता रहा। मुझे जो-जो ब्राह्मण मिले, उन सबने यही कहा—'आपके इन प्रश्नोंकी व्याख्या बहुत कठिन है। हम तो केवल नमस्कार करते हैं।' इस प्रकार सारी पृथ्वीपर घूमकर मैं लौट आया और हिमालयके शिखरपर बैठकर पुनः इस प्रकार विचार करने लगा। 'अहो! मैंने सब ब्राह्मणोंको देख लिया, अब क्या करूँ?'

१००* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

इसी समय मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि 'मैं अभीतक कलाप-ग्राममें तो गया ही नहीं। वह एक उत्तम स्थान है। जहाँ ऐसे ब्राह्मण निवास करते हैं, जो तपस्याके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। उनकी संख्या चौरासी हजार है। वे सब-के-सब वेदाध्ययनसे सुशोभित होते रहते हैं। अतः उसी स्थानपर चलूँ।'

मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके मैं वहाँसे चल दिया और आकाशमार्गसे वहाँ जा पहुँचा। पुण्यभूमिपर बसा हुआ वह श्रेष्ठ ग्राम सौ योजनतक फैला हुआ था। नाना प्रकारके वृक्ष वहाँ सब ओरसे छाया किये हुए थे। अग्निहोत्रसे उठा हुआ धूँएँका प्रवाह वहाँ कभी शान्त नहीं होता था। कलापग्राम वह स्थान है, जहाँ सत्ययुगके लिये सूर्यवंश, चन्द्रवंश तथा ब्राह्मणवंशका बीज शेष और सुरक्षित है। उस स्थानपर पहुँचकर मैंने द्विजोंके आश्रमोंमें प्रवेश किया। वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण मधुर वाणीमें अनेक प्रकारके वादोंपर वार्तालाप कर रहे थे। उस समय उस विद्वत्-सभाके बीच मैंने अपनी भुजा उठाकर घोषणा की—'ब्राह्मणो! अब आपलोग मेरे प्रश्नोंका समाधान कीजिये।'

**ब्राह्मण बोले—**विप्रवर! आप अपना प्रश्न उपस्थित कीजिये। यह हमारे लिये बहुत बड़ा लाभ है कि आप कोई प्रश्न पूछ रहे हैं।

वहाँके विद्वान् ब्राह्मण 'पहले मैं उत्तर दूँगा—पहले मैं उत्तर दूँगा।' ऐसा कहकर एक-दूसरेको मना करने लगे। तब मैंने उनके सामने अपने बारह प्रश्न उपस्थित किये। सुनकर वे मुनीश्वर उन प्रश्नोंको खिलवाड़ समझते हुए मुझसे कहने लगे—'विप्रवर! आपके प्रश्न तो बालकोंके-से हैं। इन छोटे-छोटे प्रश्नोंसे यहाँ क्या होनेवाला है? आप हमलोगोंमें जिसे सबसे छोटा और ज्ञानहीन समझते हों, वही इन प्रश्नोंका उत्तर दे।' यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने अपनेको कृतार्थ माना और उनमेंसे एक बालकको सबसे हीन समझकर कहा—'यह मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे।'

उस बालक ब्राह्मणका नाम सुतनु था। उसने मेरे प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कहा—(१) मातृकामें बावन अक्षर बताये गये हैं। उनमें सबसे प्रथम अक्षर ॐकार है। उसके सिवा चौदह स्वर, तैंतीस व्यंजन, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय—ये सब मिलकर बावन मातृका वर्ण माने गये हैं।* द्विजवर! यह तो मैंने आपसे अक्षरोंकी संख्या बतायी है। अब इनका अर्थ सुनिये। इस अर्थके विषयमें पहले आपसे एक इतिहास कहूँगा। पूर्वकालकी बात है, मिथिला नगरीमें कौथुम नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने इस पृथ्वीपर प्रचलित हुई सम्पूर्ण विद्याओंको पढ़ लिया था। वे इकतीस हजार वर्षोंतक आदरपूर्वक अध्ययनमें लगे रहे। उनका एक क्षण भी कभी व्यर्थ नष्ट नहीं हुआ। अध्ययन पूरा करके जब वे गृहस्थ हुए, तब कुछ कालके बाद उनके एक पुत्र हुआ। उनके सारे बर्ताव जड़की भाँति होते थे। उसने केवल मातृका पढ़ी। मातृका पढ़नेके बाद वह किसी प्रकार दूसरी कोई बात नहीं याद करता था। इससे उसके पिता बहुत खिन्न हुए और उस जड बालकसे कहने लगे—'बेटा! पढ़ो, पढ़ो, मैं तुम्हें मिठाई दूँगा। नहीं पढ़ोगे तो यह मिठाई दूसरेको दे दूँगा और तुम्हारे दोनों कान उखाड़ लूँगा।'

यह सुनकर पुत्रने कहा—पिताजी! क्या मिठाई लेनेके लिये ही पढ़ा जाता है? क्या लोभकी पूर्ति ही अध्ययनका उद्देश्य है? अध्ययन तो उसका नाम है, जो मनुष्योंको परलोकमें लाभ पहुँचानेवाला हो।

**कौथुम बोले—**वत्स! ऐसी बातें कहनेवाले, तेरी आयु बढ़े। तेरी यह बुद्धि बहुत अच्छी है। पर तू पढ़ता क्यों नहीं है?


* ॐकारः प्रथमस्तस्य चतुर्दश स्वरास्तथा। वर्णाश्चैव त्रयस्त्रिंशदनुस्वारस्तथैव च॥
विसर्जनीयश्च परो जिह्वामूलीय एव च। उपध्मानीय एवापि द्विपञ्चाशदमी स्मृताः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २३५-२३७)

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १०१ ---|---

पुत्रने कहा—पिताजी! जाननेयोग्य जितनी भी बातें हैं, वे सब तो मैंने मातृकामें ही जान लीं। बताइये, इसके बाद अब कण्ठ किसलिये सुखाया जाय?

पिता बोले—वत्स! तू तो आज बड़ी विचित्र बात कहता है। मातृकामें तूने किस ज्ञातव्य अर्थका ज्ञान प्राप्त किया है? बता, बता। मैं तेरी बात फिर सुनना चाहता हूँ।

पुत्रने कहा—पिताजी! आपने इकतीस हजार वर्षोंतक नाना प्रकारके तर्कोंका अध्ययन करते हुए भी अपने मनमें केवल भ्रमका ही साधन किया है। 'यह धर्म है, यह धर्म है' ऐसा कहकर शास्त्रोंमें जो धर्म बताया गया है, उसमें चित्त भ्रान्त-सा हो जाता है। आप उपदेशको केवल पढ़ते हैं। उसके वास्तविक अर्थकी जानकारी नहीं रखते। जो ब्राह्मण केवल पाठमात्र करते हैं, अर्थ नहीं समझते, वे दो पैरवाले पशु हैं। अतः मैं आपसे मोहनाशक वचन सुनाता हूँ। अकार ब्रह्मा कहे गये हैं, भगवान् विष्णु उकार बतलाये गये हैं, मकारको भगवान् महेश्वरका प्रतीक माना गया है। ये तीन गुणमय स्वरूप बताये गये हैं, ॐकारके मस्तकपर जो अनुस्वाररूप अर्द्धमात्रा है, वह सर्वोत्कृष्ट भगवान् सदाशिवका प्रतीक है।^१ यह है ॐकारकी महिमा, जिसका वर्णन कोटि-कोटि ग्रन्थोंद्वारा दस हजार वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता।

पुनः जो मातृकाका सारसर्वस्व बताया गया है, उसे सुनिये। अकारसे लेकर औकारतक जो चौदह^२ स्वर हैं, वे चौदह मनुस्वरूप हैं। स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तम, रैवत, तामस, छठे चाक्षुष, सातवें वैवस्वत—जो इस समय वर्तमान हैं, सावर्णिक, ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, दक्षसावर्णि, धर्मसावर्णि, रौच्य तथा भौत्य—ये चौदह मनु हैं। श्वेत, पाण्डु, लोहित, ताम्र, पीत, कपिल, कृष्ण, श्याम, धूम्र, अधिक पिंगल, थोड़ा पिंगल, तिरंगा, बहुरंगा तथा कबरा—ये क्रमशः चौदह मनुओंके रंग हैं। पिताजी! वैवस्वत मनु ऋकारस्वरूप हैं। उनका रंग काला बतलाया जाता है। 'क'से लेकर 'ह' तक तैंतीस देवता हैं। 'क' से लेकर 'ठ' तक तो बारह आदित्य^३ माने गये हैं। 'ड' से लेकर 'ब' तक जो अक्षर हैं, वे ग्यारह^४ रुद्र हैं। 'भ' से लेकर 'ष' तक आठ^५ वसु माने गये हैं। 'स' और 'ह'—ये दोनों अश्विनीकुमार बताये गये हैं। इस प्रकार ये तैंतीस देवता कहे जाते हैं। पिताजी!


१- अकारः कथितो ब्रह्मा उकारो विष्णुरुच्यते। मकारश्च स्मृतो रुद्रस्त्रयश्चैते गुणाः स्मृताः॥
अर्द्धमात्रा च या मूर्ध्नि परमः स सदाशिवः।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३।२५१-२५२)

२- अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ—ये चौदह स्वर हैं।

३- वेंकटेश्वरकी प्रतिमें आदित्य, रुद्र और वसुओंके नाम भी आये हैं। आदित्यसम्बन्धी श्लोक इस प्रकार हैं—
धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणश्चांशुरेव च।
भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा।
एकादशस्तथा त्वष्टा विष्णुर्द्वादश उच्यते॥
जघन्यजः स सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः॥
अर्थात् धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंशु, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु—ये बारह आदित्य हैं। इनमें विष्णु सबसे छोटे होनेपर भी गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं।

४- ग्यारह रुद्र ये हैं—
कपाली पिंगलो भीमो विरूपाक्षो विलोहितः। अजकः शासनः शास्ता शम्भुश्चण्डो भवस्तथा॥

५- आठ वसु ये हैं—
ध्रुवो घोरश्च सोमश्च आपश्चैव नलोऽनिलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च अष्टौ ते वसवः स्मृताः॥

१०२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय—ये चार अक्षर जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकारके जीव बताये गये हैं।^१

पिताजी! यह भावार्थ बताया गया है। अब तत्त्वार्थ सुनिये। जो पुरुष इन देवताओंका आश्रय लेकर कर्मानुष्ठानमें तत्पर होते हैं, वे ही अर्द्धमात्रास्वरूप नित्यपद (सदाशिव)-में लीन होते हैं। चार प्रकारके जीवोंमेंसे कोई भी जब मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन देवताओंका भजन करता है, तभी उसे मुक्ति प्राप्त होती है। जिस शास्त्रमें पापी मनुष्योंके द्वारा ये देवता नहीं माने गये हैं, उस शास्त्रको यदि साक्षात् ब्रह्माजी भी कहें तो नहीं मानना चाहिये। ये सब देवता वैदिक मार्गमें सर्वत्र प्रतिष्ठित हैं। अतः जो दुरात्मा इन देवताओंका उल्लंघन करके तप, दान अथवा जप करते हैं, वे वायुप्रधान मार्गमें जाकर सर्दीसे काँपते रहते हैं। अहो! अजितेन्द्रिय मनुष्योंके मोहकी महिमा तो देखो। वे पापी मातृका पढ़ते हैं, परंतु इन देवताओंको नहीं मानते।

सुतनु कहते हैं—पुत्रकी यह बात सुनकर पिताको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने और भी बहुत-से प्रश्न पूछे। पुत्रने भी उनके प्रश्नोंके अनुसार ठीक-ठीक उत्तर दिया। मुने! मैंने भी उसी प्रकार तुम्हारे मातृकासम्बन्धी उत्तम प्रश्नका समाधान किया है। (२) अब पचीस वस्तुओंसे बने हुए गृहसम्बन्धी द्वितीय प्रश्नका उत्तर सुनिये। पाँच महा^२भूत, पाँच^३ कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञा^४नेन्द्रियाँ, पाँच^५ विषय—मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष—ये पचीस तत्त्व हैं। पचीसवाँ तत्त्व पुरुष है जो सदाशिवस्वरूप है। इन पचीस तत्त्वोंसे सम्पन्न हुआ यह शरीर ही घर कहलाता है। जो इस शरीरको इस प्रकार तत्त्वतः जानता है, वह कल्याणमय परमात्माको प्राप्त होता है।^६

(३) वेदान्तवादी विद्वान् बुद्धिको ही अनेक रूपोंवाली स्त्री कहते हैं; क्योंकि वही नाना प्रकारके विषयों अथवा पदार्थोंका सेवन करनेसे अनेक रूप ग्रहण करती है। किंतु अनेकरूपा होनेपर भी वह एकमात्र धर्मके संयोगसे एकरूपा ही रहती


१- औकारान्ता अकाराद्या मनवस्ते चतुर्दश। स्वायम्भुवश्च स्वारोचिरौत्तमो रैवतस्तथा ॥
तामसश्चाक्षुषः षष्ठस्तथा वैवस्वतोऽधुना। सावर्णिर्ब्रह्मसावर्णी रुद्रसावर्णिरेव वा ॥
दक्षसावर्णिरेवापि धर्मसावर्णिरेव च। रौच्यो भौत्यस्तथैवापि मनवोऽमी चतुर्दश ॥
श्वेतः पाण्डुस्तथा रक्तस्ताम्रः पीतश्च कापिलः। कृष्णः श्यामस्तथा धूम्रः सुपिशङ्गः पिशङ्गकः ॥
त्रिवर्णः शवलो वर्णैः कर्बुरश्च इति क्रमात्। वैवस्वत ऋकारश्च तात कृष्णः प्रपद्यते ॥
ककाराद्या हकारान्तास्त्रयस्त्रिंशच्च देवताः। ककाराद्याष्ठकारान्ता आदित्या द्वादश स्मृताः ॥
डकाराद्या वकारान्ता रुद्राश्चैकादशैव ते।
भकाराद्याः षकारान्ता अष्टौ हि वसवो मताः। सहौ चेत्यश्विनौ ख्यातौ त्रयस्त्रिंशदिति स्मृताः ॥
अनुस्वारो विसर्गश्च जिह्वामूलीय एव च। उपध्मानीय इत्येते जरायुजास्तथाऽण्डजाः ॥
स्वेदजाश्चोद्भिज्जाश्चापि पितर्जीवाः प्रकीर्तिताः।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २५४-२६२)
२- पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश। ३- वाक्, हाथ, पैर, गुदा और लिंग। ४- कान, नेत्र, रसना, नासिका और त्वचा। ५- शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श।
६- पञ्चभूतानि पञ्चैव कर्मज्ञानेन्द्रियाणि च। पञ्च पञ्चापि विषया मनोबुद्ध्यहमेव च ॥
प्रकृतिः पुरुषश्चैव पञ्चविंशः सदाशिवः। पञ्चपञ्चभिरेतैस्तु निष्पन्नं गृहमुच्यते ॥
देहमेतदिदं वेद तत्त्वतो यात्यसौ शिवम्।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २७२-२७४)

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १०३


है। जो इस तत्त्वार्थको जानता है, वह (धर्मका आश्रय लेनेके कारण) कभी नरकमें नहीं पड़ता। (४) मुनियोंने जिसे नहीं कहा है तथा जो वचन देवताओंकी मान्यता नहीं स्वीकार करता, उसे विद्वानोंने विचित्र कथासे मुक्त बन्ध (वाक्यविन्यास) कहा है, तथा जो कामयुक्त वचन है वह भी इसी श्रेणीमें है।^१ (ऐसा वचन सुनने और मानने योग्य नहीं है। वास्तवमें वह बन्धन ही है।)

(५) अब पाँचवें प्रश्नका समाधान सुनिये। एकमात्र लोभ ही इस संसार-समुद्रके भीतर महान् ग्राह है। लोभसे पापमें प्रवृत्ति होती है, लोभसे क्रोध प्रकट होता है, लोभसे कामना होती है, लोभसे ही मोह, माया (शठता), अभिमान, स्तम्भ (जडता), दूसरेके धनकी स्पृहा, अविद्या और मूर्खता होती है। यह सब कुछ लोभसे ही उत्पन्न होता है। दूसरेके धनका अपहरण, परायी स्त्रीके साथ बलात्कार, सब प्रकारके दुस्साहसमें प्रवृत्ति तथा न करने योग्य कार्योंका अनुष्ठान भी लोभकी ही प्रेरणासे होता है। अपने मनको जीतनेवाले संयमी पुरुषको उचित है कि वह उस लोभको मोहसहित जीते। जो लोभी और अजितात्मा हैं, उन्हींमें दम्भ, द्रोह, निन्दा, चुगली और दूसरोंसे डाह—ये सब दुर्गुण प्रकट होते हैं। जो बड़े-बड़े शास्त्रोंको याद रखते हैं और दूसरोंकी शंकाओंका निवारण करते हैं, ऐसे बहुज्ञ विद्वान् भी लोभके वशीभूत होकर नीचे गिर जाते हैं। लोभ और क्रोधमें आसक्त मनुष्य सदाचारसे दूर हो जाते हैं। उनका अन्तःकरण छुरेके समान तीखा होता है। परंतु ऊपरसे वे मीठी बातें करते हैं। ऐसे लोग तिनकोंसे ढके हुए कुएँके समान भयंकर होते हैं। वे ही लोग केवल युक्तिवादका सहारा लेकर अनेकों पन्थ चलाते हैं। लोभवश मनुष्य समस्त धर्ममार्गोंका लोप कर देते हैं। लोभसे ही कुटुम्बीजनोंके प्रति निष्ठुरतापूर्ण बर्ताव करते हैं। कितने ही नीच मनुष्य लोभवश धर्मको अपना बाह्य आभूषण बना धर्मध्वजी होकर जगत्‌को लूटते हैं। वे सदा लोभमें डूबे रहनेवाले महान् पापी हैं। राजा जनक, युवनाश्व, वृषादर्भि, प्रसेनजित् तथा और भी बहुत-से राजा लोभका नाश करके स्वर्गलोकमें गये हैं। इसलिये जो लोग लोभका परित्याग करते हैं, वे ही इस संसार-समुद्रके पार जाते हैं। इनसे भिन्न लोभी मनुष्य ग्राहके चंगुलमें ही फँसे हुए हैं। इसमें संशय नहीं है।^२


१- बहुरूपं स्त्रियं प्राहुर्बुद्धिं वेदान्तवादिनः । सा हि नानार्थभजनान्नानारूपं प्रपद्यते ॥
धर्मस्यैकस्य संयोगाद्बहुधाप्येकिकैव सा । इति यो वेद तत्त्वार्थं नासौ नरकमाप्नुयात् ॥
मुनिभिर्यच्च न प्रोक्तं यन्न मन्येत देवताम् । वचनं तद् बुधाः प्राहुर्बन्धं चित्रकथं त्विति ॥
यच्च कामान्वितं वाक्यं......................।
(स्क० पु० मा० कुमा० ३। २७४-२७७)

२- .............पञ्चमं चाप्यतः शृणु । एको लोभो महान् ग्राहो लोभात्पापं प्रवर्तते ॥
लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रवर्तते । लोभान्मोहश्च माया च मानः स्तंभः परेप्सुता ॥
अविद्याऽप्रज्ञता चैव सर्वं लोभात् प्रवर्तते । हरणं परवित्तानां परदाराभिमर्शनम् ॥
साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रियास्तथा । स लोभः सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना ॥
दम्भो द्रोहश्च निन्दा च पैशुन्यं मत्सरस्तथा । भवन्त्येतानि सर्वाणि लुब्धानामकृतात्मनाम् ॥
सुमहन्त्यपि शास्त्राणि धारयन्ति बहुश्रुताः । छेत्तारः संशयानां च लोभग्रस्ता व्रजन्त्यधः ॥
लोभक्रोधप्रसक्ताश्च शिष्टाचारबहिष्कृताः । अन्तःक्षुरा वाङ्‌मधुराः कूपाश्छन्नास्तृणैरिव ॥
कुर्वते ये बहून् मार्गान्स्तांस्तान् हेतुबलान्विताः । सर्वं मार्गं विलोपयन्ति लोभाज्ज्ञातिषु निष्ठुराः ॥
धर्मावतंसकाः क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् । एतेऽतिपापिनः सन्ति नित्यं लोभसमन्विताः ॥

९०४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विप्रवर ! अब आप ब्राह्मणके आठ भेदोंका वर्णन सुनें—मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनूचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि—ये आठ प्रकारके ब्राह्मण श्रुतिमें पहले बताये गये हैं। इनमें विद्या और सदाचारकी विशेषतासे पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। जिसका जन्म-मात्र ब्राह्मण-कुलमें हुआ है, वह जब जातिमात्रसे ब्राह्मण होकर ब्राह्मणोचित उपनयन-संस्कार तथा वैदिक कर्मोंसे हीन रह जाता है, तब उसको ‘मात्र’ ऐसा कहते हैं। जो एक उद्देश्यको त्यागकर—व्यक्तिगत स्वार्थकी उपेक्षा करके वैदिक आचारका पालन करता है, सरल, एकान्तप्रिय, सत्यवादी तथा दयालु है, उसे ‘ब्राह्मण’ कहा गया है। जो वेदकी किसी एक शाखाको कल्प और छहों अंगोंसहित पढ़कर ब्राह्मणोचित छः कर्मोंमें संलग्न रहता है, वह धर्मज्ञ विप्र ‘श्रोत्रिय’ कहलाता है। जो वेदों और वेदांगोंका तत्त्वज्ञ, पापरहित, शुद्धचित्त, श्रेष्ठ, श्रोत्रिय विद्यार्थियोंको पढ़ानेवाला और विद्वान् है, वह ‘अनूचान’ माना गया है। जो अनूचानके समस्त गुणोंसे युक्त होकर केवल यज्ञ और स्वाध्यायमें ही संलग्न रहता है, यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करता है और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखता है, ऐसे ब्राह्मणको श्रेष्ठ पुरुष ‘भ्रूण’ कहते हैं। जो सम्पूर्ण वैदिक और लौकिक विषयोंका ज्ञान प्राप्त करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सदा आश्रममें निवास करता है, वह ‘ऋषिकल्प’ माना गया है। जो पहले ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होकर नियमित भोजन करता है, जिसको किसी भी विषयमें कोई सन्देह नहीं है तथा जो शाप और अनुग्रहमें समर्थ और सत्यप्रतिज्ञ है; ऐसा ब्राह्मण ‘ऋषि’ माना गया है। जो निवृत्तिमार्गमें स्थित, सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञाता, काम-क्रोधसे रहित, ध्याननिष्ठ, निष्क्रिय, जितेन्द्रिय तथा मिट्टी और सुवर्णको समान समझनेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको ‘मुनि’ कहते हैं। इस प्रकार वंश, विद्या और वृत्त (सदाचार)—से ऊँचे उठे हुए ब्राह्मण ‘त्रिशुक्ल’ कहलाते हैं। वे ही यज्ञ आदिमें पूजे जाते हैं।*

इस प्रकार आठ भेदोंवाले ब्राह्मणत्वका वर्णन


जनको युवनाश्वश्च वृषदर्थिः प्रसेनजित् । लोभक्षयाद्दिवं प्राप्तास्तथैवान्ये जनाधिपाः ॥
तस्मात्त्यजन्ति ये लोभं तेऽतिक्रामन्ति सागरम् । संसाराख्यमतोऽन्ये ये ग्राहग्रस्ता न संशयः ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २७७-२८७)

* अथ ब्राह्मणभेदांस्त्वमष्टौ विप्रावधारय ॥
मात्रश्च ब्राह्मणश्चैव श्रोत्रियश्च ततः परम् । अनूचानस्तथा भ्रूणो ऋषिकल्प ऋषिर्मुनिः ॥
इत्येतेऽष्टौ समुद्दिष्टा ब्राह्मणाः प्रथमं श्रुतौ । तेषां परः परः श्रेष्ठो विद्यावृत्तविशेषतः ॥
ब्राह्मणानां कुले जातो जातिमात्रो यदा भवेत् । अनुपेताक्रियाहीनो मात्र इत्यभिधीयते ॥
एकोद्देश्यमतिक्रम्य वेदस्याचारवानृजुः । स ब्राह्मण इति प्रोक्तो निभृतः सत्यवाग्घृणी ॥
एकां शाखां सकल्पां च षड्भिरङ्गैरधीत्य च । षट्कर्मनिरतो विप्रः श्रोत्रियो नाम धर्मवित् ॥
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः शुद्धात्मा पापवर्जितः । श्रेष्ठः श्रोत्रियवान् प्राज्ञः सोऽनूचान इति स्मृतः ॥
अनूचानगुणोपेतो यज्ञस्वाध्याय यन्त्रितः । भ्रूण इत्युच्यते शिष्टैः शेषभोजी जितेन्द्रियः ॥
वैदिकं लौकिकं चैव सर्वज्ञानमवाप्य यः । आश्रमस्थो वशी नित्यमृषिकल्प इति स्मृतः ॥
ऊर्ध्वरेता भवत्यग्रे नियताशी न संशयी । शापानुग्रहयोः शक्तः सत्यसन्धो भवेदृषिः ॥
निवृत्तः सर्वतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः । ध्यानस्थो निष्क्रियो दान्तस्तुल्यमृत्काञ्चनो मुनिः ॥
एवमन्वयविद्याभ्यां वृत्तेन च समुच्छ्रिताः । त्रिशुक्ला नाम विप्रेन्द्राः पूज्यन्ते सवनादिषु ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २८७-२९८)

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १०५ ---|---

किया गया। अब युगादि तिथियाँ बतलायी जाती हैं। कार्तिकमासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथि सत्ययुगकी आदि बतायी गयी है। वैशाख शुक्ल पक्षकी जो तृतीया है, वह त्रेतायुगकी आदि कही जाती है। माघ कृष्ण पक्षकी अमावश्याको विद्वानोंने द्वापरकी आदि-तिथि माना है और भाद्र कृष्ण त्रयोदशी कलियुगकी प्रारम्भ-तिथि कही गयी है। ये चार युगादि तिथियाँ हैं, इनमें किया हुआ दान और होम अक्षय जानना चाहिये। प्रत्येक युगमें सौ वर्षोंतक दान करनेसे जो फल होता है, वह युगादि-कालमें एक दिनके दानसे प्राप्त हो जाता है।१ | ये युगादि तिथियाँ बतायी गयी हैं, अब मन्वन्तरकी प्रारम्भिक तिथियोंको श्रवण कीजिये। आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, चैत्र और भाद्रकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौषकी एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघकी सप्तमी, श्रावणकी कृष्णा अष्टमी, आषाढ़की पूर्णिमा, कार्तिककी पूर्णिमा, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमा—ये मन्वन्तरकी आदि तिथियाँ हैं, जो दानके पुण्यको अक्षय करनेवाली हैं।२<br><br>भगवान् सूर्य जिस तिथिको पहले-पहल रथपर आरूढ़ हुए, वह ब्राह्मणोंद्वारा माघमासकी सप्तमी


१- नवमी कार्तिके शुक्ला कृतादिः परिकीर्तिता। वैशाखस्य तृतीया या शुक्ला त्रेतादिरुच्यते॥
माघे पञ्चदशी कृष्णा द्वापरादिः स्मृता बुधैः। त्रयोदशी नभस्ये च कृष्णा सादिः कलेः स्मृता॥
एताश्चतस्रस्तिथयो युगाद्या दत्तं हुतं चाक्षयमासु विद्यात्।
युगे युगे वर्षशतेन दानं युगादिकाले दिवसेन तत्फलम्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २९९—३०२)

विशेष वक्तव्य—यहाँ जो युगादि तिथियाँ दी गयी हैं, इनमें मतभेद भी उपलब्ध होता है। कहीं-कहीं 'वैशाखस्य तृतीया या कृतस्यादिः प्रकीर्तिता। कार्तिकस्यापि नवमी शुक्ला त्रेतादिरुच्यते।' ऐसा पाठान्तर मिलता है। इसके अनुसार वैशाख शुक्ला तृतीया सत्ययुगकी और कार्तिक शुक्ला नवमी त्रेताकी प्रारम्भिक तिथि है। हिंदीशब्दसागर कोषके संपादकोंने भी कृतादि और त्रेतादि तिथिका इसी रूपमें उल्लेख किया है। परंतु मुहूर्तचिन्तामणिकारका मत इस सम्बन्धमें मूलसे मिलता है। 'सिते गोऽग्नी बाहुलराधयोः' कहकर उन्होंने यही मत स्वीकार किया है। मूलमें जो द्वापरादि और कलियुगादि तिथि दी गयी है, इससे मुहूर्तचिन्तामणिकारका मत नहीं मिलता। वे 'मदनदर्शौ भाद्रमाघासिते' कहकर भाद्र कृष्ण त्रयोदशीको द्वापरकी और माघ-अमावास्याको कलिकी आदितिथि घोषित करते हैं। हिंदीशब्दसागरने भी यही माना है। केवल माघ अमावास्याकी जगह पौष अमावास्याका उसमें उल्लेख हुआ है। मुहूर्त्तचिन्तामणिकारके मतका प्राचीन आधार क्या है, इसे विद्वान् लोग ढूँढें। स्कन्दपुराण, कुमारिकाखण्डका उपर्युक्त मत अति प्राचीन होनेके कारण स्वतःप्रमाण तो है ही, नारद-स्मृतिके निम्नांकित वचनसे भी इसका समर्थन होता है—

कार्तिके शुक्ल नवमी चादिः कृतयुगस्य सा।
त्रेतादिर्माधवे शुक्ला तृतीया पुण्यसंमिता॥
कृष्णा पञ्चदशी माघे द्वापरादिरुदीरिता।
कल्पादिः स्यात् कृष्णपक्षे नभस्ये च त्रयोदशी॥
(इन श्लोकोंका उल्लेख मु० चि० की पीयूषधारा टीकामें हुआ है।)

२- अश्वयुक् शुक्ल नवमी द्वादशी कार्तिके तथा। तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥
फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी तथा। आषाढस्यापि दशमी माघमासस्य सप्तमी॥
श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा। कार्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्येष्ठपञ्चदशी सिता॥
मन्वन्तरादयश्चैता दत्तस्याक्षयकारिकाः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३०३—३०६)

१०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


बतायी गयी है, जिसे रथसप्तमी कहते हैं। उस तिथिको दिया हुआ दान और किया हुआ यज्ञ सब अक्षय माना गया है। वह सब प्रकारकी दरिद्रताको दूर करनेवाला और भगवान् सूर्यकी प्रसन्नताका साधक बताया गया है।^१

विद्वान् पुरुष जिसे सदा उद्वेगमें डालनेवाला बताते हैं, उसका यथार्थ परिचय सुनिये—जो प्रतिदिन याचना करता है, वह स्वर्गमें जानेका अधिकारी नहीं है। जैसे चोर सब जीवोंको उद्वेगमें डाल देता है, उसी प्रकार वह भी है। वह पापात्मा सबके लिये सदा उद्वेगकारक होनेके कारण नरकमें पड़ता है।^२

ब्रह्मन् ! 'इस लोकमें किस कर्मसे मुझे सिद्धि प्राप्त हो सकती है और (मृत्युके पश्चात्) यहाँसे मुझे कहाँ किस लोकमें जाना है?' इस बातका भलीभाँति विचार करके जो पुरुष भावी क्लेशके निराकरणका समुचित उपाय करता है, विद्वानोंने उसीको दक्ष पुरुषोंसे भी अधिक दक्ष (चतुरशिरोमणि) कहा है। पुरुष अपनी आयुमेंसे आठ मास, एक दिन, अथवा सम्पूर्ण पूर्वावस्थामें अथवा पूरी आयुभर ऐसा कर्म अवश्य करे, जिससे अन्तमें वह परम सुखी हो और निरन्तर उन्नतिके पथपर बढ़ता रहे।^३

वेदान्तवादी विद्वान् अर्चि और धूम—ये दो मार्ग बतलाते हैं। अर्चिमार्गसे जानेवाला पुरुष मोक्षको प्राप्त होता है और धूममार्गसे जानेवाला जीव स्वर्गमें पुण्यफल भोगकर पुनः इस संसारमें लौट आता है। सकामभावसे किये हुए यज्ञ आदिके द्वारा धूममार्गकी प्राप्ति होती है और नैष्कर्म्य (कर्मफलत्याग एवं ज्ञान)-से अर्चिमाग प्राप्त होता है। इन दोनोंसे भिन्न जो अशास्त्रीय मार्ग है, वह पाखण्ड कहलाता है। जो देवताओं तथा मनुप्रोक्त धर्मोंको नहीं मानता, वह उक्त दोनों मार्गोंको नहीं प्राप्त होता। इस प्रकार यह तत्त्वार्थका निरूपण किया गया।^४ विप्रवर! आपके इन प्रश्नोंका यथाशक्ति समाधान किया गया है। यह ठीक है या नहीं, इसको आप बताइये। साथ ही अपना परिचय भी दीजिये।


१- यस्यां तिथौ रथं पूर्वं प्राप देवो दिवाकरः। सा तिथिः कथिता विप्रैर्माघे या रथसप्तमी॥  
तस्यां दत्तं तु चेष्टं यत् सर्वमेवाक्षयं मतम्। सर्वदारिद्र्यशमनं भास्करप्रीतये मतम्॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३०७-३०८)

२- नित्योद्वेजकमाहुर्यं बुधास्तं शृणु तत्त्वतः। यश्च याचनको नित्यं न स स्वर्गस्य भाजनम्॥  
उद्वेजयति भूतानि यथा चौरस्तथैव सः। नरकं याति पापात्मा नित्योद्वेगकरस्त्वसौ॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३०९-३१०)

३- इहोपपत्तिमम केन कर्मणा क्व च प्रयातव्यमितो भवेन्मया।  
विचार्य चैवं प्रतिकारकारी बुधैः स चोक्तो द्विज दक्षदक्षः॥  
मासैरष्टभिरह्ना च पूर्वेण वयसायुषा।  
तत्कर्म पुरुषः कुर्याद् येनान्ते सुखमेधते॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३११-३१२)

४-अर्चिषा याति मोक्षं च धूमेनावर्तते पुनः। यज्ञैरासाद्यते धूमो नैष्कर्म्येणार्चिराप्यते॥  
एतयोरपरो मार्गः पाखण्ड इति कीर्त्यते। यो देवान् मन्यते नैव धर्मांश्च मनुसूचितान्॥  
न तौ स याति पन्थानौ तत्त्वार्थोऽयं निरूपितः॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३१३-३१५)
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १०७

नारदजीके द्वारा कलाप-ग्रामके ब्राह्मणोंको महीसागरसंगममें ले आना और वहाँ उन्हें भूमि आदि देकर पुण्यस्थानकी स्थापना करना

नारदजी कहते हैं—अर्जुन! इस प्रकार अपने प्रश्नोंका समाधान सुनकर मेरे सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया। तब मैंने अपने स्वरूपको प्रकट करके उन ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा—'अहो!

मेरे पिता ब्रह्माजी धन्य हैं, जिनकी सृष्टिके बालक भी आप-जैसे ब्राह्मणशिरोमणिके रूपमें विद्यमान हैं। मुझे अपने जन्मका फल प्राप्त हो गया, क्योंकि आप-जैसे निष्पाप और उपद्रवशून्य महात्माओंका मैंने दर्शन किया।'

इतना सुनते ही वे शातातप आदि ब्राह्मण सहसा उठकर खड़े हो गये और अर्घ्य, पाद्य आदि पूजा-सामग्रियोंसे मेरे स्वागत-सत्कारमें लग गये। तत्पश्चात् साधुजनोचित वाणीमें वे इस प्रकार बोले—'हम धन्य हैं, क्योंकि आप साक्षात् देवर्षि नारद यहाँ हमलोगोंके समीप पधारे हैं। देवर्षे! कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है और अब कहाँ जानेका विचार है? मुनिश्रेष्ठ! इस आश्रमपर पधारनेकी क्या आवश्यकता थी, वह कार्य आप हमें बतावें।'

नारदजी बोले—मैं ब्रह्माजीके आदेशसे मही-सागरसंगम नामक महातीर्थमें ब्राह्मणोंको उत्तम स्थान दान करना चाहता हूँ। इसके लिये आपलोग मुझे आज्ञा दें।

मेरे ऐसा कहनेपर शातातपने सब ब्राह्मणोंकी ओर दृष्टि डालकर यों कहना आरम्भ किया—'नारदजी! यह सत्य है कि भारतवर्ष देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। उसमें भी महीसागरसंगमके विषयमें तो क्या कहना है, जहाँ स्नान करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण महातीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। आपके प्रस्तावमें एक ही महान् दोष है, जिससे हमलोग निरन्तर डरते रहते हैं। वहाँ बहुतसे निर्दयी और दुस्साहसपूर्ण कर्म करनेवाले चोर हैं, जो हमारे-जैसे तपस्वियोंका धन हर लेते हैं। स्पर्श वर्णोंमें जो सोलहवाँ और इक्कीसवाँ अक्षर है वही हमारा धन है। उस धनसे हीन हो जानेपर हमारा जन्म कैसा निरर्थक हो जायगा। हम चोरोंके हाथमें न पड़ें, यही हमारी अभिलाषा है।'

अर्जुनने पूछा—ब्रह्मन्! वे चोर कौन हैं और कौन-सा धन हर लेते हैं।

नारदजीने कहा—कुन्तीनन्दन! 'काम' और 'क्रोध' आदि दोष ही चोर हैं और 'तप' ही उन ब्राह्मणोंका धन है, जिसके अपहरणके भयसे उन्होंने मुझसे वैसी बात कही थी।

तब हारीत मुनि बोले—कौन अपनी मूढ़ बुद्धिके कारण महीसागरसंगम नामक तीर्थका त्याग करेगा, जहाँ स्वर्ग और मोक्ष हाथमें ही रहते हैं। हमारे हृदयमें भगवान् उमानाथका निवास है। वे दृढ़तापूर्वक हमारा पालन करते हैं। उनके रहते हुए वहाँ चोरोंका भय हमारा क्या कर लेगा। नारदजी! आपके कहनेसे मैं वहाँ चलूँगा।

१०८

  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मेरे परिवारमें छब्बीस हजार ब्राह्मण हैं, वे सब-के-सब अध्ययन, अध्यापन आदि छः कर्मोंमें तत्पर, बाहर-भीतरसे शुद्ध तथा लोभ और दम्भसे रहित हैं। उन सबके साथ मैं वहाँ चल सकता हूँ। यह मेरा उत्तम निश्चय है।

उनके ऐसा कहनेपर मैंने उन सब ब्राह्मणोंको अपने दण्डके ऊपर चढ़ा लिया और बड़ी प्रसन्नताके साथ सहसा आकाशमार्गसे लौट पड़ा। बीचमें सौ योजनतक हिमका मार्ग है। उसे लाँघकर उन ब्राह्मणोंके साथ मैं केदारक्षेत्रमें आ पहुँचा। वह हिम-प्रदेश आकाशमार्गसे या बिलके मार्गसे तथा भगवान् कार्तिकेयके प्रसादसे लाँघा जा सकता है। इसके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है।

अर्जुनने पूछा—नारदजी! कलाप-ग्राम कहाँ है? उसका मार्ग बिलके द्वारा किस प्रकार लाँघा जा सकता है तथा स्वामिकार्तिकेयका कृपा-प्रसाद कैसे प्राप्त होगा? ये सब बातें मुझे बताइये।

नारदजी बोले—केदारक्षेत्रसे आगे सौ योजनतक हिमसंयुक्त प्रदेश माना गया है। उसके अन्तमें सौ योजन विस्तारवाला कलाप-ग्राम है, उसके अन्तमें सौ योजनतक बालूका समुद्र बताया जाता है। उसके बाद सौ योजन विस्तारवाला वह प्रदेश है, जिसे भूमिसवर्ग कहते हैं। बिलके मार्गसे वहाँ जिस प्रकार जाना हो सकता है, उसे सुनो। अन्न और जलका त्याग करके उपवासपूर्वक दक्षिण दिशावर्ती भगवान् कार्तिकेयकी आराधना करे। कार्तिकेयजी जब साधकको पापरहित हुआ मानते हैं तब स्वप्नमें प्रकट होकर आदेश देते हैं कि तुम अभीष्ट स्थानकी यात्रा करो। कार्तिकेयजीके स्थानसे पश्चिम एक बहुत बड़ी गुफा है, वह सात सौ योजन दूरतक गयी हुई है। कार्तिकेयजीकी आज्ञा मिलनेके पश्चात् उसीमें प्रवेश करके आगे बढ़ना चाहिये। उसके भीतर मरकतमणिका एक शिवलिंग है, जो सूर्यके समान प्रकाश करनेवाला है। उस शिवलिंगके आगे अत्यन्त स्वच्छ सुवर्णके रंगकी मिट्टी मिलती है। वहाँ शिवलिंगको नमस्कार करके तथा उस पीली मिट्टीको हाथमें लेकर स्तम्भ तीर्थमें आना चाहिये। वहाँ भगवान् कुमार तथा वाराहदेवकी आराधना करके आधी रात होनेपर कुएँसे जल निकालना चाहिये। उस जल और मिट्टीसे दोनों आँखोंमें अंजन करना चाहिये। साथ ही सम्पूर्ण शरीरमें उस जल और मिट्टीका उबटन लगाना चाहिये। उस अंजनके प्रभावसे कदाचित् साठ कदम चलनेपर उसे एक सुन्दर बिल दिखायी देता है। तदनन्तर उस बिलके भीतरसे होकर वह यात्रा करे। वहाँ कारीष नामक बड़े भयंकर कीड़े होते हैं, परंतु वे उस उबटनके प्रभावसे साधकको डँसते नहीं हैं। उस बिलके भीतर भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी सिद्ध पुरुषोंका दर्शन करते हुए साधक आगे बढ़ता है और परम उत्तम कलाप-ग्राममें पहुँच जाता है। वहाँके मनुष्योंकी आयु चार हजार वर्षकी बतलायी गयी है। वहाँ सब लोग फलोंका ही भोजन करते हैं।

इस प्रकार बिलके मार्गसे कलाप-ग्रामतक पहुँचनेकी विधि बतायी गयी है। अब आगे जो कुछ हुआ उसको श्रवण करो। अपनी तपस्याकी शक्तिसे अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करनेवाले उन ब्राह्मणोंको दण्डके अग्र भागपर रखकर मैं महीसागरसंगम तीर्थमें आया और वहाँ पवित्र जलाशयके तटपर उतारंकर उन्हें स्वतन्त्र कर दिया। फिर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ मैंने सम्पूर्ण दोषोंको दग्ध करनेके लये दावानलसदृश महीसागरसंगम तीर्थमें स्नान किया और देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करके परम उत्तम गायत्रीमन्त्रका जप करते हुए हम सब लोगं संगमके समीप बैठ गये। हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए भगवान् सूर्यकी ओर देखते रहे। इसी समय इन्द्र आदि देवता, सूर्य आदि सम्पूर्ण ग्रह, लोकपाल, आठ देव-जातियाँ, गन्धर्व तथा अप्सराओंके समूह—ये सब वहाँ आ पहुँचे। तदनन्तर महामुनि कपिलजी भी वहाँ आये और नारदजीसे इस प्रकार बोले—'देवर्षे ! मुझे आठ