संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उस दशामें पुनः स्नान करनेसे ही शुद्धि होती है। दाँतसे कभी नख या रोएँको न काटे। यदि शुभकी इच्छा हो तो नखसे नखको न काटे। अपने घरमें भी कभी बिना दरवाजेके (दीवार फाँदकर) न जाय, धर्मघातीके साथ न बैठे, कभी नग्न होकर न सोवे और हाथमें भोजन रखकर न खाय। हाथ, पैर और मुख भीगे रखकर भोजन करनेवाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है। भीगे हुए पैरोंवाला मनुष्य शयन न करे, जूठे मुँह कहीं न जाय, शय्यापर बैठकर न खाय और न जल ही पीये। जूता पहने हुए न बैठे, खड़ा होकर पानी न पीये, आरोग्यकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सब खट्टी वस्तुओंको त्याग दे। जूठे हाथसे सिरका स्पर्श न करे, भूसी, अंगार, भस्म, केश और कपालके ऊपर खड़ा न हो। पतित मनुष्योंके साथ निवास करना पतनका ही कारण होता है। शूद्रके लिये ऊँचा आसन और मंच न दे। द्विजोंकी सेवा करना शूद्रोंके लिये परम धर्म माना गया है। दोनों हाथोंसे सिर खुजलाना शुभ नहीं है। शूद्रको कभी वैदिक मन्त्रका उपदेश नहीं करना चाहिये, उसे वेदोपदेश करनेवाला ब्राह्मण ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है, और शूद्र भी स्वधर्मसे भ्रष्ट हो जाता है। दोनों हाथोंसे किसीको पीटना, निन्दा करना, बाल नोचना, शास्त्रके विपरीत बर्ताव करना और लोभीसे दान लेना— यह सब करनेवाला ब्राह्मण इक्कीस नरकोंमें पड़ता है।
असमयमें मेघकी गर्जना सुनायी दे, वर्षा-ऋतुमें धूल बरसानेवाली आँधी चले तथा रात्रिमें बालकोंके रोनेकी विशेष ध्वनि हो, तब अनध्याय बताया गया है। उल्कापात, भूकम्प और दिग्दाह (अग्निकाण्ड) होनेपर, अर्धरात्रिमें, दोनों सन्ध्या-कालमें, शूद्रके समीप, राज्यके अपहरण होनेपर, सूतकमें, दस अष्टकाओंमें, चतुर्दशीको, श्राद्धके दिन, प्रतिपदा तिथिमें, पूर्णिमामें, अष्टमीमें, कुत्तेके रोनेपर, राज्यभंग होनेपर, वेदोंके उपाकर्म और उत्सर्गके दिन, कल्पादि एवं युगादि तिथियोंमें, आरण्यकका अध्ययन पूरा होनेपर, बाण और सामकी ध्वनि सुनायी देनेपर अनध्याय होता है। इन अनध्यायोंमें कदापि स्वाध्याय नहीं करना चाहिये।
चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या और पूर्णिमाको सदा ब्रह्मचर्यका पालन करे। परायी स्त्रीसे सम्बन्ध रखना इस लोकमें आयुका विनाश करनेवाला है, अतः पर-स्त्री-संसर्ग दूरसे ही त्याग दे। शत्रुओंका सेवन भी दूरसे ही त्याग देना चाहिये। सत्य बोले, प्रिय बोले, अप्रिय सत्य कभी न बोले, प्रिय भी असत्य हो तो न बोले। यह धर्म वेद-शास्त्रोंद्वारा विहित है*। वाणी, मन और जिह्वाके वेगको रोके, गुप्तांगोंमें जो रोएँ हैं, उनका त्याग करे; क्योंकि उनके स्पर्शसे मनुष्य अशुद्ध हो जाता है। पैरोंके धोवनका जल, मूत्र और पीनेसे बचा हुआ जूठा जल, थूक तथा कफ— इन सबको घरसे दूर फेंकना चाहिये। दिन-रात वैदिक मन्त्रके जपसे, शौच और सदाचारके सेवनसे तथा द्रोहरहित बुद्धिसे मनुष्य अपने पूर्वजन्मका स्मरण कर लेता है। बड़े-बूढ़े पुरुषोंको यत्नपूर्वक प्रणाम करे, उन्हें बैठनेके लिये अपना आसन दे, उनके सामने नतमस्तक होकर रहे और जब वे जाने लगें, तब उनके पीछे-पीछे जाय। वेद, ब्राह्मण, देवता, राजा, साधु, तपस्वी और पतिव्रता स्त्रियोंकी कभी निन्दा न करे। दूसरेके जलाशयमें स्नान करना हो तो उसमेंसे पाँच ढेला मिट्टी निकाल करके स्नान करे। उत्तम देश और उत्तम कालमें किसी सुपात्रको पाकर
* सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मो विधीयते॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ६।८८)
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * | ६१७ ---|---
उसे श्रद्धा और विधिके साथ जो धन दिया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है।
भूमिदान करनेवाला मण्डलेश्वर होता है, अन्नदाता सर्वत्र सुखी होता है और जल देनेवाला सुन्दर रूप पाता है। भोजन देनेवाला हृष्ट-पुष्ट होता है। दीप देनेवाला निर्मल नेत्रसे युक्त होता है। गोदान देनवाला सूर्यलोकका भागी होता है। सुवर्ण देनेवाला दीर्घायु और तिल देनेवाला उत्तम प्रजासे युक्त होता है। घर देनेवाला बहुत ऊँचे महलोंका मालिक होता है। वस्त्र देनेवाला चन्द्रलोकमें जाता है। घोड़ा देनेवाला दिव्य शरीरसे युक्त होता है। बैल देनेवाला लक्ष्मीवान् होता है। पालकी देनेवाला सुन्दर स्त्री पाता है। उत्तम पलंग देनेवालेको भी यही फल मिलता है। जो श्रद्धापूर्वक दान देता और श्रद्धापूर्वक ग्रहण करता है, वे दोनों स्वर्गलोकके अधिकारी होते हैं तथा अश्रद्धासे दोनोंका अधःपतन होता है। झूठ बोलनेसे यज्ञका फल नष्ट होता है। अपने तपको लेकर आश्चर्य प्रकट करनेसे तपस्या क्षीण होती है और दानके बिना कीर्तिका नाश होता है। गन्ध, पुष्प, कुश, गौ, दूध, दही, साग, मधु, जल, फल, मूल, ईंधन और अभयदक्षिणा—ये वस्तुएँ निकृष्ट मनुष्यसे भी प्राप्त हों तो ग्रहण करनी चाहिये।
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पतिव्रता स्त्रियोंके बर्ताव, धर्म और नियम तथा श्राद्ध और धर्मारण्यका महत्त्व
**व्यासजी कहते हैं—**जो मनुष्य धर्मवापीमें पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर तबतक तृप्त रहते हैं, जबतक कि चौदह इन्द्र बीत नहीं जाते। यहाँ पितरोंकी भी पूजा करनी चाहिये। जो पूर्वज पितर स्वर्गमें गये हों, उन सबके लिये इस मोक्षदायिनी वापीके तटपर जाकर पिण्डदान करना चाहिये। त्रेतामें पाँच दिनोंतक और द्वापरमें तीन दिनोंतक श्राद्ध करनेसे जो फल मिलता है, वही कलियुगमें एकचित्त होकर जो एक पिण्डदान देता है, उसको भी मिल जाता है। कलियुग आनेपर संसारके मनुष्य लोलुप और पर-स्त्री-लम्पट हो जाते हैं एवं स्त्रियाँ अत्यन्त चपल हो जाती हैं। स्त्री, पुरुष और नपुंसक—ये सब दूसरोंसे द्रोह करनेवाले, परनिन्दापरायण तथा सदैव दूसरोंके छिद्र देखनेवाले होते हैं; दूसरोंको उद्वेगमें डालनेवाले, झगड़ालु और दो मित्रोंमें फूट पैदा करनेवाले होते हैं। वे सब भी इस धर्मारण्यमें आकर पवित्र हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनोंने अपने श्रीमुखसे धर्मारण्यकी ऐसी महिमा बतलायी है। महाभाग! इस प्रकार मैंने धर्मारण्यका वर्णन किया। जो इसका पठन करते हैं अथवा इस तीर्थका सेवन करते हैं, वे मन, वाणी और शरीरसे शुद्ध होते हैं। जो परायी स्त्रियोंसे मुँह मोड़ लेते हैं, कहीं भी द्रोह न करके सर्वत्र समबुद्धि रखते हैं, शुद्धाचारी और माता-पिताके भक्त होते हैं, उनमें लोभ और चपलता नहीं होती। वे दान-धर्ममें तत्पर, आस्तिक, धर्मज्ञ और स्वामिभक्ति-परायण होते हैं। जो स्त्री इस तीर्थका सेवन करती है, वह पतिव्रता और पतिसेवामें तत्पर रहनेवाली होती है। धर्मारण्यके सेवनसे सब मनुष्य अहिंसक, अतिथिपूजक और सदा स्वधर्मपरायण होते हैं।
**शौनकजी बोले—**सब धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महाभाग सूतजी! पतिव्रता स्त्रियोंका कैसा लक्षण होता है, यह बतलाइये।
सूतजी बोले—(गुरुदेव व्यासजीने राजा युधिष्ठिरको यह बात इस प्रकार बतायी थी) जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री होती है, उसका जीवन सफल हो जाता है। उसके अंगोंकी छायाके
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तुल्य उसकी कथा भी पुण्यकारक होती है। पतिव्रता स्त्रियाँ अरुन्धती, सावित्री, अनसूया, शाण्डिली, सती, लक्ष्मी, शतरूपा, सुनीति, संज्ञा और स्वाहाके समान होती हैं। पतिव्रताओंके धर्म मुनिवर व्यासजीने इस प्रकार बतलाये हैं— पतिव्रता स्त्री पतिके भोजन कर लेनेपर भोजन करती है, उनके खड़े रहनेपर स्वयं भी खड़ी रहती हैं, पतिके सो जानेपर सोती है और पहले ही जाग उठती है। स्वामी यदि दूसरे देशमें हो, तो वह अपने शरीरका श्रृंगार नहीं करती अथवा यदि किसी कार्यवश पति बाहर जायँ तो वह सब प्रकारके आभूषणोंको उतार देती है। पतिकी आयु बढ़े, इस उद्देश्यसे वह कभी पतिके नामका उच्चारण नहीं करती। वह दूसरे पुरुषका नाम भी कभी नहीं लेती। पति चाहे कितनी ही खरी-खोटी बात क्यों न कह डाले, वह उसे नहीं कोसती। जब स्वामी कहते हैं कि 'यह कार्य करो' तब वह शीघ्र उत्तर देती 'जो आज्ञा नाथ! मैंने अभी इस कामको पूरा किया। आप यह समझ लें कि कार्य पूरा हो गया।' पतिके बुलानेपर वह घरका काम-काज छोड़कर तुरंत उनके पास दौड़ी जाती है और पूछती है— 'प्राणनाथ! किस लिये दासीको बुलाया है? मुझे सेवाका आदेश देकर अपने कृपाप्रसादकी भागिनी बनाइये।' वह घरके दरवाजेपर देरतक नहीं खड़ी होती। दरवाजेपर सोती-बैठती भी नहीं। जो वस्तु नहीं देने योग्य होती है, उसे वह स्वयं किसीको कभी नहीं देती। पतिव्रता स्त्रीको चाहिये कि स्वामीके लिये पूजनकी सामग्री बिना कहे ही जुटा दे। नित्य-नियमके लिये जल, कुशा, पत्र, पुष्प, अक्षत आदि प्रस्तुत करे और पतिकी प्रतीक्षामें खड़ी होकर जिस समय जो वस्तु आवश्यक हो, वह सब शीघ्र बिना किसी उद्वेगके अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रस्तुत करे। स्वामीके भोजनसे बचे हुए प्रसादस्वरूप अन्न और फल आदिको अत्यन्त प्रिय मानकर ग्रहण करे। सामाजिक उत्सवोंका दर्शन तो वह दूरसे ही त्याग दे। पतिकी आज्ञाके बिना वह तीर्थयात्राको और विवाहोत्सवोंको देखने आदिके लिये भी न जाय। पति सुखसे सोये हों, सुखसे बैठे हों या स्वेच्छानुसार किसी कार्य अथवा विचारमें रम रहे हों, तो कार्यमें विघ्न आनेपर भी उन्हें कभी न उठावे। रजस्वला होनेपर वह तीन राततक पतिको अपना मुँह न दिखावे। जबतक स्नान करके शुद्ध न हो जाय, तबतक अपनी आवाज भी पतिके कानोंमें न पड़ने दे। भलीभाँति स्नान कर लेनेपर सबसे पहले पतिके ही मुखका दर्शन करे, दूसरे किसीका नहीं। अथवा पतिदेव उपस्थित न हों तो मन-ही-मन उनका ध्यान करके सूर्यदेवका दर्शन करे। पतिकी आयु बढ़नेकी इच्छा रखनेवाली पतिव्रता स्त्री हल्दी, कुंकुम, सिन्दूर, कज्जल, चोली, पान, मांगलिक आभूषण, केशोंके श्रृंगार तथा हाथ और कान आदिके आभूषण अपने शरीरसे कभी अलग न करे। पतिसे विद्वेष रखनेवाली स्त्रीसे पतिव्रता नारी कभी बातचीत न करे। कभी अकेली न रहे और नंगी होकर न नहाये। ओखली, मूसल, झाडू, सिलवट, चक्की और चौखठ (देहली)-पर सती स्त्री कभी न बैठे। पतिके सम्मुख धृष्टता न करे। जहाँ-जहाँ पतिकी रुचि हो, वहाँ-वहाँ उसे भी प्रेम रखना चाहिये। स्त्रियोंके लिये यही सबसे उत्तम व्रत, यही महान् धर्म और यही पूजा है कि वह पतिकी आज्ञाका उल्लंघन न करे। नपुंसक, दुर्दशाग्रस्त, रोगी, वृद्ध, सुस्थिर अथवा दुःस्थिर कैसा भी पति क्यों न हो, उस पतिका वह कभी उल्लंघन न करे। वह लोहेके बरतनमें भोजन न करे। यदि उसे तीर्थस्नानकी इच्छा हो, तो वह प्रतिदिन पतिका चरणोदक पीये। उसके लिये शंकर और भगवान् विष्णुसे भी बढ़कर उसका
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६१९ पति ही है। जो स्त्री पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करके व्रत और उपवास आदिका नियम करती है, वह पतिकी आयु हर लेती है और मरनेपर नरकमें जाती है।* जो नारी पतिके कोई बात कहनेपर क्रोधपूर्वक उसका उत्तर देती है, वह गाँवमें कुतिया और निर्जन वनमें सियारिन होती है। स्त्रियोंके लिये एकमात्र यही सर्वोत्तम नियम बताया गया है कि वह प्रतिदिन अपने पतिके चरणोंकी पूजा करके ही भोजन करे और दृढ़ निश्चयपूर्वक इस नियमका पालन करे। पतिसे ऊँचे आसनपर न बैठे। दूसरेके घरमें न जाय और कड़वी बातें कभी मुँहसे न निकाले। गुरुजनोंके समीप जोरसे न बोले तथा न किसीको पुकारे ही। जो खोटी बुद्धिवाली स्त्री पतिका साथ छोड़कर एकान्तमें विचरती है, वह वृक्षके खोंखलेमें सोनेवाली क्रूर उलूकी होती है। जो दूसरे पुरुषकी ओर कटाक्षसे देखती है, वह ऐंची आँखवाली हो जाती है। जो पतिको छोड़कर अकेली मिठाइयाँ उड़ाती है, वह गाँवकी विष्ठाभोजी सूकरी अथवा चमगादड़ होती है। जो हुंकार और त्वंकार करके (पतिके प्रति अनादरसूचक वचन कहकर) अप्रिय भाषण करती है, वह गूँगी होती है। जो सौतसे सदा ही ईर्ष्या रखती है, वह खोटे भाग्यवाली होती है। जो पतिकी आँख बचाकर किसी दूसरे पुरुषको निहारती है, वह कानी, विकृत मुखवाली अथवा कुरूपा होती है। पतिको बाहरसे आते देख जो तुरंत उठकर पानी और आसन देती है, पानका बीड़ा खिलाती है, पंखा करती, पाँव दबाती, प्रिय वचन बोलती और पसीना आदि दूर करके प्रियतमको सन्तुष्ट करती है, उसके द्वारा तीनों लोक तृप्त हो जाते हैं। पिता, भाई और पुत्र- ये सब परिमित- नपी-तुली वस्तुएँ प्रदान करते हैं, परंतु पति अपनी पत्नीको अपरिमित दान करता है। इसके दानकी कोई सीमा नहीं होती। ऐसे पतिका कौन ऐसी स्त्री है, जो पूजन न करे? पति ही देवता है, पति ही गुरु है और पति ही धर्म, तीर्थ एवं व्रत है। अतः स्त्री सब छोड़कर एकमात्र पतिकी पूजा करे।† कन्याके विवाहकालमें ब्राह्मणलोग यह प्रतिज्ञा करवाते हैं कि तू पतिके जीवन और मरणमें भी उनकी सहचरी होकर रह। जो श्मशानमें जाते हुए स्वामीके शवके पीछे-पीछे घरसे (सती होनेके लिये) प्रसन्नतापूर्वक जाती है, उसे पग- पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। जैसे साँप पकड़नेवाला मनुष्य साँपको बलपूर्वक बिलसे बाहर निकाल लेता है, उसी प्रकार सती स्त्री अपने पतिको बलपूर्वक यमदूतोंके हाथसे छीनकर स्वर्गमें ले जाती है। पतिव्रता स्त्रीको देखकर यमदूत भाग जाते हैं, सूर्य भी उसके तेजसे सन्तप्त होते हैं और अग्निदेव भी उसके तेजकी आँचसे जलने लगते हैं। पतिव्रताका तेज देखकर सम्पूर्ण तेज काँप उठते हैं। अपने शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने करोड़ अयुत वर्षोंतक वह पतिके साथ स्वर्गसुख भोगती है और विहार करती है। संसारमें वह माता धन्य है, वह पिता धन्य है और वह पति धन्य है, जिनके घरमें पतिव्रता स्त्री शोभा पाती है। केवल पतिव्रता नारीके पुण्यसे उसके पिता, माता और पति- इन तीनों कुलोंकी तीन-तीन पीढ़ियाँ स्वर्गीय सुख भोगती हैं। दुराचारिणी स्त्रियाँ अपना शील
- व्रतोपवासनियमं पतिमुल्लङ्घ्य या चरेत् । आयुष्यं हरते भर्तुर्मृता निरयम्ऋच्छति ॥ (स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ७। ३७) † मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत् ॥ भर्ता देवो गुरुर्भर्ता धर्मतीर्थव्रतानि च। तस्मात् सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत् ॥ (स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ७। ४७-४८) In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण * भंग करनेके कारण पिता-माता और पति तीनों कुलोंको नरकमें गिराती हैं और स्वयं भी इहलोक तथा परलोकमें दुःख भोगती हैं। पतिव्रताका चरण जहाँ-जहाँ धरतीका स्पर्श करता है, वह- वह स्थान तीर्थभूमिकी भाँति मान्य है। वहाँ भूमिपर कोई भार नहीं रहता। वह स्थान परम पावन हो जाता है। सूर्य भी डरते-डरते अपनी किरणोंसे पतिव्रताका स्पर्श करते हैं। चन्द्रमा अपनेको पवित्र करनेके लिये ही उसका स्पर्श करते हैं। जल सदा पतिव्रता देवीके चरणस्पर्शकी अभिलाषा रखता है। वह जानता है कि पतिव्रता गायत्रीदेवीके द्वारा जो हमारे पापका नाश होता है, उसमें उस देवीका पातिव्रत्य ही कारण है। पातिव्रत्यके बलसे ही वह हमारे पापोंका नाश करती है। क्या घर-घरमें अपने रूप और लावण्यपर गर्व करनेवाली नारियाँ नहीं हैं? परंतु पतिव्रता स्त्री भगवान् विश्वेश्वरकी भक्तिसे ही प्राप्त होती हैं। गृहस्थ-आश्रमका मूल भार्या है। सुखका मूल कारण भार्या है, धर्मफलकी प्राप्ति तथा सन्तानवृद्धिका कारण भी भार्या ही है। भार्यासे इहलोक और परलोक दोनोंपर विजय प्राप्त होती है। घरमें भार्याके होनेसे देवताओं, पितरों और अतिथियोंकी तृप्ति होती है। वास्तवमें गृहस्थ उसीको समझना चाहिये, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री है। जैसे गंगामें स्नान करनेसे शरीर पवित्र होता है, उसी प्रकार पतिव्रताका दर्शन करके सम्पूर्ण गृह पवित्र हो जाता है। यदि विधवा स्त्री पलंगपर सोती है, तो वह पतिको नरकमें गिरा देती है; अतः पतिके सुखकी इच्छासे विधवा स्त्रीको धरतीपर ही शयन करना चाहिये। विधवा स्त्रीको कभी अपने अंगोंमें उबटन नहीं लगाना चाहिये तथा उसे कभी सुगन्धित वस्तुका उपयोग भी नहीं करना चाहिये। प्रतिदिन तिल और कुशयुक्त जलसे पतिके लिये तर्पण करना चाहिये तथा पतिके पिता और पितामहके भी नाम-गोत्र आदिका उच्चारण करते हुए उनके लिये जलकी अंजलि देनी चाहिये। पतिबुद्धिसे भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। वह विष्णुरूपधारी पति- परमेश्वरका ही ध्यान करे। संसारमें जो-जो वस्तु पतिको प्रिय रही हो, वह पतिको तृप्त करनेकी इच्छासे गुणवान् विद्वान्को देनी चाहिये। विधवा स्त्री वैशाख और कार्तिक मासमें विशेष नियमोंका पालन करे। स्नान, दान, तीर्थयात्रा और पुराणश्रवण बारंबार करती रहे। मनुष्यको चाहिये कि वह धर्मकूपपर पितरोंके लिये विधिपूर्वक श्राद्ध करे। श्राद्धमें मनुष्य जो भूमिपर अन्न बिखेरते हैं, उससे पिशाच योनिको प्राप्त हुए पितर तृप्त होते हैं। जिनके स्नानवस्त्रसे पृथ्वीपर जल गिरता है, उनके उस जलसे स्थावरयोनिको प्राप्त हुए पितर तृप्त होते हैं। श्राद्धकर्ता मनुष्योंके हाथसे जो यवान्नकी कणिका पृथ्वीपर गिरती है, उससे देवभावको प्राप्त हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। तथा पिण्डोंके उठानेपर जो यवान्नकी कणिका गिरती है, उससे पातालमें गये हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। जो वर्ण और आश्रमके आचार एवं कर्मका लोप करनेवाले एवं संस्कारहीन होकर मरे हैं, वे श्राद्धमें सम्मार्जनके लिये जो जलका छींटा दिया जाता है, उससे तृप्त होते हैं। ब्राह्मणलोग भोजन करके जब मुँह- हाथ धोते और आचमन करते हैं, उस समय जो जल गिरता है, उससे अन्यान्य पितरोंकी तृप्ति होती है। इसी प्रकार यजमानके हाथसे अथवा उन श्राद्धसम्बन्धी ब्राह्मणोंके हाथसे जो शुद्ध या स्पर्शरहित जल और अन्न गिराया जाता है, उससे उन पितरोंकी तृप्ति होती है, जो नरकमें पड़े हैं अथवा दूसरी किसी योनिमें चले गये हैं। मनुष्य अन्यायोपार्जित द्रव्यसे जो श्राद्ध करते In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२१
हैं, उससे चाण्डाल आदि योनिके पितरोंकी तृप्ति होती है। वत्स! इस प्रकार श्राद्धसे अनेकानेक बान्धवोंकी तृप्ति होती है। यदि अन्नद्वारा श्राद्ध करनेकी शक्ति न हो तो केवल सागोंसे भी उसका अनुष्ठान हो सकता है। अतः मनुष्य भक्तिपूर्वक शाकसे भी श्राद्ध करे। श्राद्ध करनेवाले मनुष्यका कुल कभी दुःखमें नहीं पड़ता।
यदि धर्मारण्यमें सब पाप-ही-पाप किया गया तो निश्चय ही पाप भी बढ़ता है और उसे करनेवाला घोर नरकमें पकाया जाता है। जैसे पुण्य, वैसे पाप; धर्मारण्यमें किया हुआ सब शुभाशुभ कर्म अवश्य वृद्धिको प्राप्त होता है।
धर्मारण्यवासी ब्राह्मणोंके गोत्र तथा उनकी रक्षाके लिये कामधेनुद्वारा वैश्योंकी उत्पत्ति
**युधिष्ठिरने पूछा—**धर्मारण्यमें जिन श्रेष्ठ आचार-व्यवहारवाले ब्राह्मणोंने निवास किया, वे किस कुलमें उत्पन्न हुए थे?
**व्यासजी बोले—**नृपश्रेष्ठ! उन ऊर्ध्वरेता ऋषियों एवं महात्मा ब्राह्मणोंकी शाखा, प्रशाखा, पुत्र-पौत्र आदिकी संख्या बहुत हुई। मुख्य-मुख्य चौबीस गोत्रोंके नाम तुम्हें बतलाता हूँ—भारद्वाज, वत्स (प्रथम), कौशिक, कुश, शाण्डिल्य, काश्यप, गौतम, छान्दन, जातूकर्ण्य, वत्स (द्वितीय), वसिष्ठ, धारण, आत्रेय, भाण्डिल, लौकिक, कृष्णायन, उपमन्यु, गार्ग्य, मुद्गल, मौषक, पुण्यासन, पराशर, कौण्डिन्य तथा गांगासन। इन गोत्रोंमें उत्पन्न ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान्, नाना प्रकारके यज्ञानुष्ठानमें तत्पर, द्विजपूजन कर्ममें संलग्न, सत्कर्मपरायण तथा गुणवान् हुए। धर्मारण्यनिवासी सब ब्राह्मण सदाचारी, अत्यन्त दक्ष, वेद-शास्त्रपरायण, यज्ञकर्ता तथा सत्य और शौचाचारमें प्रवृत्त रहनेवाले हैं। राजा युधिष्ठिर! पहले वहाँके ब्राह्मणोंको यक्ष, राक्षस और पिशाच आदि व्याकुल किये रहते थे। तब उन ब्राह्मणोंने देवताओंसे कहा—'देवगण! यक्ष और राक्षस आदिसे हम सताये जाते हैं, अतः उनके भयसे हमलोग अब इस उत्तम स्थानको त्याग देंगे।' यह सुनकर देवताओंने लोकहितकी कामनासे ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये प्रत्येक गोत्रमें एक-एक योगिनीकी स्थापना की। जिस गोत्रकी रक्षा और पालनमें जो शक्ति समर्थ हुई, वह उस गोत्रकी कुलदेवी मानी गयी। श्रीमाता, तारणीदेवी, गोत्रपा, आशापूरी, इच्छार्तिनाशिनी, पिप्पली, विकारवशा, जगन्माता, महामाता, सिद्धा, भट्टारिका, कदम्बा, विकरा, मीठा, सुपर्णा, वसुजा, महादेवी, मातंगी, वाणी, मुकुटेश्वरी, भद्री, महाशक्ति संहारी, महाबला और महादेवी चामुण्डा। ये गोत्रोंकी माताएँ हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने वहाँ रक्षाके लिये उन गोत्रमातृकाओंकी स्थापना की है। वहाँके स्वधर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण उन सब योगिनियोंकी पूजा करने लगे। तभीसे योगिनियोंद्वारा वे अपने-अपने समयमें सुरक्षित हुए। सब ब्राह्मण स्वस्थ एवं पुत्र-पौत्रोंसे संयुक्त हो गये।
राजन्! सौ वर्ष बीतनेके पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु और शिव धर्मारण्यको देखनेके लिये प्रातःकाल सूर्योदयके समय उत्तम विमानपर बैठकर आये। उस समय ब्राह्मणलोग समिधा, पुष्प और कुशा लानेके लिये आश्रम छोड़कर सब दिशाओंमें चले गये थे। आश्रम सूना देखकर महादेवजीने भगवान्से कहा—'प्रभो! यहाँके ब्राह्मण बड़ा कष्ट पाते हैं, अतः इनकी सेवाके लिये कुछ सेवकोंकी व्यवस्था करूँ, ऐसा मेरा विचार हो रहा है।' भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर श्रीविष्णुने कहा—'ठीक है, ठीक है।' फिर वे ब्रह्माजीसे बोले—
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'ब्रह्मन्! आप यहाँके ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये कोई उपाय कीजिये।' भगवान् विष्णुका यह आदेश सुनकर ब्रह्माजीने कामधेनुका स्मरण किया। स्मरण करनेसे कामधेनु उसी क्षण वहाँ आ गयी।
तब ब्रह्माजीने कामधेनुसे कहा—मातः! इन ब्राह्मणोंमेंसे प्रत्येकके लिये दो-दो शुद्ध हृदयवाले अनुचरोंकी व्यवस्था करो। 'बहुत अच्छा' कहकर उस महाधेनुने खुरसे पृथ्वीको खोदा और हुंकार किया। इससे छत्तीस हजार शिखा-सूत्रधारी मनुष्य प्रकट हुए। वे सभी महाबली वैश्य थे। उन्होंने यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। वे सब शास्त्रोंमें चतुर, ब्राह्मणभक्त, ब्राह्मणोंका हित चाहनेवाले, तपस्वी, उत्तम आचारवाले और धार्मिक थे। उस समय एक-एक ब्राह्मणके लिये दो-दो अनुचर दिये गये। राजन्! ब्राह्मणका पहले जो गोत्र बताया गया है, वही उसके अनुचरका भी हुआ। तदनन्तर ब्रह्माजीने उनके हितके लिये कहा—'तुम सब लोग इन ब्राह्मणोंका वचन मानो और इन्हें जिस-जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, उसे ला दिया करो। प्रतिदिन समिधा, कुशा और फूल आदि ले आओ। सदा इनकी आज्ञाके अनुसार चलो, कभी इनका अनादर न करो। जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूडाकरण, उपनयन आदि संस्कार तथा जो व्रत, दान, उपवास आदि कर्म प्राप्त हों, उन्हें इन ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अनुसार ही करना चाहिये। इनकी आज्ञा लिये बिना जो दर्शयाग, श्राद्धकार्य या और कोई कर्म करेगा, वह दरिद्रता, पुत्रशोक एवं कीर्तिनाशको प्राप्त होगा।' तब उन अनुचरोंने 'बहुत अच्छा' कहकर देवताओंकी आज्ञा स्वीकार की। तदनन्तर वे इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता कामधेनुकी स्तुति करने लगे—'अनघे! तुम सब देवताओंकी माता और सब यज्ञोंका कारण हो। सब तीर्थोंमें तुम्हीं उत्तम तीर्थ हो। तुम्हें सदा नमस्कार है। तुम्हारे ललाटमें सूर्य, चन्द्रमा, अरुण तथा भगवान् शंकर विराजमान हैं। हुंकारमें सरस्वती वास करती हैं, गलेके कंबलमें नागोंका निवास है, खुरपृष्ठमें गन्धर्व और चारों वेद हैं तथा तुम्हारे मुखके अग्रभागमें समस्त चराचर तीर्थ हैं।' इस प्रकार भाँति-भाँतिके वचनोंसे प्रसन्न की हुई कामधेनु स्वर्गको चली गयी।
उन वैश्योंके विवाहके लिये भगवान् शंकर और यमने गन्धर्वोंकी कन्याओंको लाकर उनकी पत्नीके रूपमें स्थापित किया। 'विश्वावसु' नामसे प्रसिद्ध जो गन्धर्वोंके राजा हैं, उनके यहाँ साठ हजार कन्याएँ थीं। वे सभी रूप, यौवन और उदारतासे सम्पन्न थीं। उन्हींको वेदोक्त विधिसे देवताके समीप उन वैश्योंके लिये अर्पण किया। उस समय उन वैश्योंने गन्धर्वोंको, पूर्वज देवताओंको, सूर्य और चन्द्रमाको तथा यमराज और मृत्युको भी आज्यभाग दिया। विधिपूर्वक आज्यभाग अर्पण करनेके पश्चात् ही उन वैश्योंने उन कन्याओंका वरण (पाणिग्रहण) किया। तबसे लेकर आजतक गान्धर्व विवाह उपस्थित होनेपर देवता आज्यभाग ग्रहण करते हैं। जिन छत्तीस हजार धेनुकुमारोंकी चर्चा की गयी है, उनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२३
लाखोंतक पहुँच गयी। वे सब ब्राह्मणोंके सेवक हुए। तत्पश्चात् देवताओंके चले जानेपर सब ब्राह्मण इस स्थानपर निवास करने लगे। राजन् ! तबसे वहाँके ब्राह्मण निर्भय हो पुत्र-पौत्रोंके साथ रहते और वेदोंका पाठ करते हैं। वे वेदज्ञ विद्वान् कभी शास्त्रोंका अर्थ सुनाते, कभी कोई भगवान् विष्णुका जप करते, कोई शिवजीके गुण गाते, कोई ब्रह्माजीके नाम लेते और कोई यमसूक्तका जप करते हैं। कितने ही याजक बनकर यज्ञ एवं अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं। वे स्वाहाकार, स्वधाकार और वषट्कारके शब्दोंसे चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको परिपूर्ण करते रहते हैं। वहाँके वैश्य भी बड़े दक्ष होते हैं और सदा ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये उत्कण्ठित रहते हैं। वे धर्मारण्यके दिव्य प्रदेशमें सुस्थिर होकर बसते हैं और ब्राह्मणोंके लिये अन्न, पान, समिधा, कुश तथा फल आदिका प्रबन्ध करते हैं। पुष्पोपहारका संग्रह करना, स्नान किये हुए वस्त्रको धोना, उपले आदि बनाना, झाड़ने-बुहारनेका काम करना तथा कूटना और पीसना आदि कार्य उन वैश्योंकी स्त्रियाँ करती थीं। ब्रह्मा, विष्णु और शिवके वचनसे सब लोग उन ब्राह्मणोंकी सेवा करते थे। तबसे सब ब्राह्मण स्वस्थ हो, हर्षपूर्वक दिन-रात ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिकी उपासना करने लगे।
लोलजिह्वाक्षका वध, गणेशजीकी उत्पत्ति और देवताओंद्वारा उनका स्तवन
व्यासजी बोले— तत्पश्चात् कुछ काल बीतनेपर जब सत्ययुगकी समाप्ति हुई, तब त्रेताके प्रारम्भमें 'लोलजिह्वाक्ष' नामका एक राक्षस हुआ, जो समस्त राक्षसोंका राजा था। उसने ब्राह्मणोंसे सेवित उस परम पवित्र एवं सुन्दर धर्मारण्यमें द्वेषवश आग लाग दी। अपने नगरको जलते देख वे श्रेष्ठ ब्राह्मण भाग खड़े हुए। तब श्रीमाता आदि देवियाँ क्रोधमें भरकर उस राक्षसको फटकारती हुई उसपर प्रहार करने लगीं। राक्षसने उन देवियोंको देखकर भयंकर सिंहनाद किया। उस समय धर्मारण्यमें बड़ा भारी कोलाहल मच गया। उसे सुनकर इन्द्रने नलकूबरको भेजा। नलकूबर वहाँ गये और श्रीमाता तथा लोलजिह्वाक्षमें जो महान् युद्ध चल रहा था, उसको उन्होंने देखा। जैसा देखा, वैसा ही इन्द्रके आगे निवेदन किया। यह समाचार सुनकर भगवान् विष्णु सुदर्शन चक्र लेकर सत्यलोकसे पृथ्वीपर आये। धर्मारण्यमें पहुँचकर उन्होंने चक्र चलाया। तब लोलजिह्वाक्ष राक्षस मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और प्राण त्यागकर परम धामको चला गया। देवता और गन्धर्वोंने हर्षमें भरकर जगदीश्वर भगवान् विष्णुका स्तवन किया। उस नगरको उजड़ा हुआ देख भगवान् विष्णुने कहा—'ऋषियोंके आश्रममें निवास करनेवाले वे सब ब्राह्मण कहाँ हैं?' देवता और गन्धर्वोंने इधर-उधर भगे हुए ब्राह्मणोंको खोज निकाला तथा इस प्रकार कहा—'ब्राह्मणो! उस अधम राक्षसको भगवान् वासुदेवने अपने चक्रसे काट डाला है।' यह सुनकर ब्राह्मणोंके नेत्र हर्षसे खिल उठे और उन सबने अपने-अपने स्थानमें प्रवेश किया तथा भगवान् श्रीलक्ष्मीपतिसे कहा—'प्रभो! आपने सत्यलोकसे आकर ब्राह्मणोंके हितके लिये इस मन्दिररूपी नगरकी पुनः स्थापना की है। इसलिये संसारमें यह सत्यमन्दिरके नामसे विख्यात होगा। सत्ययुगमें यह धर्मारण्य था, त्रेतामें इसका नाम सत्यमन्दिर होगा।' भगवान् विष्णुने 'तथास्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की।
गणेशजीका मस्तक-छेदन
गणेशजीको गजमस्तक-दान
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२५
तदनन्तर वे सब ब्राह्मण अपने पुत्र-पौत्र, पत्नी और सेवकोंके साथ पूर्ववत् निवास करने लगे।
उस नगरके पूर्वभागमें धर्मेश्वर, दक्षिणमें गणेश, पश्चिममें सूर्यदेव और उत्तरमें साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजीका स्थान है।
युधिष्ठिरजीने पूछा—महाभाग ! गणेशजीको किसने स्थापित किया ?
व्यासजी बोले—महाराज ! पूर्वकालमें सब देवताओंने धर्मारण्यमें दुर्गाजीके पुत्र गणेशजीको स्थापित किया था। अब मैं गणेशजीकी उत्पत्तिका कारण बतलाता हूँ। एक समय पार्वतीजीने अपने अंगोंमें उबटन लगाया और उससे जो मैल निकली, उसे हाथपर रखकर उसकी एक सुन्दर स्वरूप प्रतिमा बना दी। फिर उसमें उन्होंने जीवका भी संचार कर दिया। तब वह बालक उनके आगे उठकर खड़ा हो गया और मातासे बोला—'आज्ञा दीजिये, मैं कौन-सा कार्य करूँ?'
पार्वतीजीने कहा—मैं जबतक स्नान करूँ, तबतक तुम मेरे द्वारपर खड़े रहो। महादेवजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर गणेशजी हथियार ले द्वारपर खड़े हो गये। इसी समय महादेवजी आये और उन्होंने घरके भीतर प्रवेश करनेका विचार किया। किंतु द्वारपर खड़े हुए बालकने उन्हें भीतर नहीं जाने दिया। इससे महादेवजी कुपित हो उठे और दोनों पिता-पुत्रमें परस्पर युद्ध होने लगा। महादेवजीने त्रिशूलसे उस बालकका मस्तक काट डाला। अपने पुत्रको मरकर गिरा हुआ देख पार्वतीजी फूट-फूटकर रोने लगीं। पार्वतीजीको दुःखी देखकर भगवान् शंकरको बड़ी चिन्ता हुई। इतनेमें ही उनकी दृष्टि वहाँ आये हुए गजासुरपर पड़ी। उस महादैत्यको देखकर भगवान् शंकरने उसे मार डाला और उसका मस्तक लेकर पार्वतीके बनाये हुए बालकके धड़से जोड़ दिया। तब वह बालक उठकर खड़ा हो गया। शिवजीने उसका नाम गजानन रखा। फिर सब देवताओं और मुनियोंने मिलकर गणेशजीका स्तवन किया।
देवता बोले—भगवन् ! आपको नमस्कार है। आप देवताओंके ईश्वर तथा गणोंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। गजानन ! आप महादेवजीके भी अधिदेवता हैं, आपको नमस्कार है। गणाध्यक्ष ! आप भक्तिप्रिय देवता हैं, आपको नमस्कार है।
इन शुभ स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करनेपर गणोंके स्वामी गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न होकर इस प्रकार बोले—देवताओ ! मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ, तुम कोई मनोवांछित वस्तु माँगो, मैं तुम्हें देता हूँ।
देवता बोले—महाभाग ! आप यहीं रहकर हमारा कार्य-साधन करें। धर्मारण्यमें रहनेवाले ब्राह्मण, वैश्यजन, धार्मिक पुरुष तथा वर्णाश्रमसे भिन्न मनुष्योंका भी आप सदा संरक्षण करें। आपके प्रसादसे यहाँके ब्राह्मण और महाबली वैश्य सदा धन और सुखसे सम्पन्न हों। जबतक सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी रहे, तबतक आप यहीं रहकर सबकी रक्षा करते रहें।
गणेशजीने 'एवमस्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की। तब देवताओंने हर्षमें भरकर गणेशजीका पूजन किया। संसारके दूसरे लोगोंने भी विघ्ननिवारणके लिये उनकी पूजा की। इसीलिये गणेशजी विवाह, उत्सव और यज्ञमें पहले पूजित होते हैं। धर्मारण्यमें रहनेवाले लोगोंपर वे सर्वदा प्रसन्न रहते हैं।
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६२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
संज्ञाकी तपस्या, अश्विनीकुमारोंका जन्म तथा वकुलादित्यकी स्थापना
व्यासजी कहते हैं— महाभाग युधिष्ठिर ! भगवान् शंकरके पश्चिम भागमें कश्यपनन्दन भगवान् सूर्यकी स्थापना की गयी है। वह स्थान रविक्षेत्र कहलाता है। वहीं रूप और यौवनसे सम्पन्न नासत्य नामसे प्रसिद्ध महादिव्य दोनों अश्विनीकुमार उत्पन्न हुए, जो देवलोकके वैद्योंके रूपमें प्रसिद्ध हैं। विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा अंशुमाली भगवान् सूर्यको ब्याही गयी थी। संज्ञाके यमराज और यमुना—ये दो सन्तान उत्पन्न हुईं। यमुना महानदीके रूपमें प्रसिद्ध हुई। संज्ञाको भगवान् सूर्यका तेज सहन नहीं होता था। अतः उसने अपनी छायाका ही आवाहन करके उससे कहा—'तुम मेरी ही भाँति भगवान् सूर्यकी सेवामें उपस्थित रहो। मेरे पुत्रोंसे और मेरे पतिदेव सूर्यदेवसे सदा उत्तम बर्ताव करना, ऐसा कहकर संज्ञादेवी पिताके घर चली गयी। वहाँ उसने अपने पिता विश्वकर्माका दर्शन किया और विश्वकर्माने भी बड़े आदरसे उन्हें रखा। कुछ समयतक वे पिताके घरमें ही टिकी रहीं। तब उनके धर्मज्ञ पिता विश्वकर्माने अपनी पुत्रीसे प्रेमपूर्वक कहा—'बेटी ! यहाँ तुम्हारे रहनेसे धर्मका लोप हो रहा है, क्योंकि अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ स्त्रियोंका अधिक कालतक रहना उनके लिये यशकारक नहीं होता। स्त्री पतिके घरमें रहे, तभी उसकी शोभा है। इसलिये तुम पतिके घर जाओ।' पिताके ऐसा कहनेपर संज्ञाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनका आदर किया और वहाँसे निकलकर उत्तर कुरुको प्रस्थान किया। वे सूर्यके तेजसे भयभीत थीं, अतः घोड़ीका रूप धारण करके वहाँ तपस्या करने लगीं। इधर भगवान् सूर्यने अपनी दूसरी पत्नीको संज्ञा ही समझकर उसके गर्भसे दो पुत्र और एक सुन्दर कन्याको जन्म दिया। छाया अपनी सन्तानोंके प्रति जैसा प्रेमपूर्ण बर्ताव करती थी, वैसा संज्ञाकी कन्या एवं पुत्रोंके साथ नहीं करती थी। लाड़-प्यार तथा भोजन आदिमें वह प्रतिदिन भेदभाव करती थी। यमुनाने तो उसके इस बर्तावको सह लिये किंतु यमराजसे नहीं सहा गया। उन्होंने पिताके समीप जाकर प्रणामपूर्वक कहा—'तात ! यह मेरी माता नहीं है।' यह सुनकर भगवान् सूर्यने छाया-संज्ञाको बुलाकर पूछा—'देवी ! संज्ञा कहाँ चली गयीं?' उनके बार-बार पूछनेपर भी जब उसने नहीं बताया, तब वे क्रोधमें आकर शाप देनेको उद्यत हो गये। इससे भयभीत हो उसने सब वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों बता दिया। यथार्थ बात ज्ञात होनेपर सूर्यदेव विश्वकर्माके घर गये और विश्वकर्मासे उन्होंने संज्ञाके विषयमें पूछा। वे बोले—'देव ! संज्ञा आपके भेजनेसे मेरे घर आयी अवश्य थी, किंतु मैंने उसे पुनः वहीं भेज दिया।' यह सुनकर भगवान् सूर्यने समाधिमें स्थित होकर देखा कि संज्ञा घोड़ीका रूप धारण करके उत्तर कुरुमें तपस्या कर रही हैं। उन्होंने ध्यानके द्वारा यह भी समझ लिया कि तेजसे असह्य होनेके कारण वह मेरी ओर देखनेमें समर्थ न हो सकी। आज पचास वर्ष व्यतीत हो गये। उसने पृथ्वीपर जाकर तपस्या की है। तब भगवान् सूर्य शीघ्रतापूर्वक संज्ञाके पास गये। उस समय वे धर्मारण्यपुरमें आकर तपस्यामें संलग्न थीं। भगवान् सूर्यको आया हुआ देख सूर्यपत्नी संज्ञा पुनः घोड़ीके रूपमें स्थित हो गयीं। तब भगवान् सूर्य भी अश्व हो गये। फिर उन दोनोंका मिलन हुआ। इससे वे दोनों अश्विनीकुमार जुड़वें प्रकट हुए। उनके दाहिने खुरसे पृथ्वी विदीर्ण हो जानेके कारण वहाँ एक कुण्ड बन गया और उसमें जल प्रकट हो गया। इसी प्रकार पिछले चरणोंसे भी एक दूसरा कुण्ड
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२७
बन गया। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और उसका शरीर कोढ़ आदि रोगोंसे पीड़ित नहीं होता। राजन्! इस प्रकार तुमसे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बतलाया। देवताओंने वहाँ भगवान् सूर्यको वकुलवनके स्वामीके रूपमें स्थापित किया। साथ ही वहाँ संज्ञारानी और दोनों अश्विनीकुमारोंकी भी स्थापना की गयी। जो मनुष्य इन्द्रियोंको संयममें रखकर श्रद्धापूर्वक सूर्यकुण्डमें स्नान करता है, वह महानरकमें पड़े हुए पितरोंका भी उद्धार कर देता है। जो श्रद्धापूर्वक देवताओं और पितरोंका तर्पण करके उस कुण्डका जल पीता है, उसका पुण्य कोटिगुना होता है। रविवारयुक्त सप्तमीमें तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय जो सूर्यकुण्डमें स्नान करते हैं, वे फिर गर्भमें नहीं जाते। संक्रान्ति, व्यतीपात और वैधृति योगमें, पर्वोंके अवसरपर, शुक्ल और कृष्ण पक्षकी पूर्णिमा, अमावास्या एवं चतुर्दशीको जो सूर्यकुण्डमें स्नान करता है, उसे कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य एकचित्त होकर वकुलादित्यका पूजन करता है, वह जबतक सूर्यदेव तपते हैं तबतक परम धाममें निवास करता है। उसे कभी सर्पका भय नहीं होता। भूत और प्रेत आदिकी बाधा भी नहीं प्राप्त होती। जो मनुष्य रोगग्रस्त हो, वह सूर्यकुण्डमें छः महीनेतक स्नान करनेसे सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है। युधिष्ठिर! जो मनुष्य इस धर्मारण्यक्षेत्रमें कन्यादान करता है, वह उस विवाहयज्ञसे पवित्रचित्त होकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इस क्षेत्रमें गोदान, शय्यादान, मूँगा, घोड़ा, दासी, भैंस, तिल एवं सुवर्णका दान करना चाहिये। रविवारयुक्त सप्तमी तिथिमें जो वकुलादित्यका स्मरण करता है, उसे ज्वर आदि रोगों, शत्रुओं तथा व्याधियोंसे भय नहीं प्राप्त होता।
**युधिष्ठिरजीने पूछा—**मुने! वहाँ भगवान् सूर्यका वकुलार्क अथवा वकुलादित्य नाम कैसे पड़ा?
**व्यासजी बोले—**राजेन्द्र! जब संज्ञारानीने भगवान् सूर्यकी प्राप्ति तथा उनके तेजकी शान्तिके लिये एकचित्त होकर वकुल-वृक्षके नीचे तपस्या की, उस समय उस वृक्षके नीचे आकर भगवान् सूर्य बहुत शान्त हो गये। तभी रानीने दो परम मनोहर दिव्यरूपधारी पुत्र उत्पन्न किये। इसीसे भगवान् सूर्यका नाम वकुलार्क हुआ। जो वहाँ स्नान करता है, उसे कोई व्याधि पीड़ा नहीं देती तथा वह धर्म, अर्थ एवं कामको प्राप्त करता है। वहाँ छः महीनेमें मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है और वह अन्तमें मोक्ष पाता है।
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इन्द्रेश्वरकी स्थापना और उनकी महिमा, देवमज्जनक तड़ागका माहात्म्य तथा लोहासुरके अत्याचारसे धर्मारण्यकी जनताका पलायन
**व्यासजी कहते हैं—**भारत! धर्मारण्यपुरसे उत्तर दिशामें देवराज इन्द्रने भगवान् शंकरको प्रसन्न करनेके लिये तीन सौ वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तप किया। वृत्रासुरके वधसे जो पाप लगा था, उसको दूर करनेके लिये ही इन्द्र जितेन्द्रिय एवं एकाग्रचित्त होकर भगवान् शंकरकी आराधनामें लगे थे। उस समय भगवान् चन्द्रशेखर उनकी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हुए और उनके समीप आकर बोले—‘देवराज! तुम जो कुछ माँगते हो, उसे मैं दूँगा।’
**इन्द्रने कहा—**देवेश्वर! कृपासिन्धु महेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो वृत्रासुरके मरनेसे जो पाप लगा है, उसका नाश कीजिये।
| ६२८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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**भगवान् शिवने कहा—**देवराज ! धर्मारण्यमें ब्रह्महत्या किसीको पीड़ा नहीं दे सकती। गोहत्या, द्विजहत्या, बालहत्या और स्त्रीहत्या भी मेरे, ब्रह्माजीके, भगवान् विष्णुके तथा यमराजके वचनसे कभी यहाँ प्रवेश नहीं करती। अतः तुम इस तीर्थमें प्रवेश करके स्नान करो।
**इन्द्रने कहा—**दयासिन्धो ! महेश्वर ! यदि आप मुझपर सन्तुष्ट हैं तो मेरे नामसे यहाँ स्थापित हों।
तब महादेवजीने 'तथास्तु' कहकर इन्द्रकी प्रार्थना स्वीकार की और लोगोंके हितकी इच्छासे सबके पापोंकी शुद्धिके लिये धर्मारण्यमें इन्द्रेश्वर नामसे वे विराजमान हुए। जो मनुष्य सदा भक्तिपूर्वक पुष्प और धूप आदिसे भगवान् इन्द्रेश्वरका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। विशेषतः माघ मासमें अष्टमी और चतुर्दशी तिथिको सब पापोंकी शुद्धिके लिये भगवान् शिवकी पूजा करनेवाला पुरुष शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो चतुर्दशी तिथिमें सांग रुद्रजप करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो परम पदको प्राप्त होता है। जो कुष्ठ आदि महारोगोंसे ग्रस्त होते हैं, वे स्नानमात्रसे शुद्ध हो दिव्य देह धारण कर लेते हैं। जो स्नान करके देवाधिदेव इन्द्रेश्वरका पूजन करता है, वह ज्वरके बन्धनसे छूट जाता है। जो वन्ध्या, दुर्भाग्यवती, काकवन्ध्या, जिसकी सन्तान मर जाती हो, वह, मृतवत्सा तथा महादुष्टा नारी कुण्डमें भगवान् शिवके आगे स्नान करके एकचित्तसे उनकी पूजा करती है, वह स्नानमात्रसे ही शुद्ध हो जाती है।
इस प्रकार इन्द्रको बहुतसे वरदान देकर पिनाकधारी भगवान् शंकर देवता और असुरोंसे सेवित हो अपने धामको चले गये। तत्पश्चात् महातेजस्वी इन्द्र भी अपनी पुरीको गये। इन्द्रपुत्र जयन्तने भी वहाँ उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की है। उस लिंगमें स्थित भगवान् शिव जयन्तके द्वारा अपनी स्तुति सुनकर सदा उनपर सन्तुष्ट रहते हैं।
राजन् ! वहाँ 'धराक्षेत्र' नामक तीर्थ है, जिसमें 'देवमज्जनक' नामक उत्तम तड़ाग शोभा पाता है। आश्विन कृष्णा चतुर्दशीके दिन उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। विधिपूर्वक उपवास करके देवेश्वर भगवान् शिवकी पूजा करनेसे शाकिनी, डाकिनी, वेताल, पितर, ग्रह और नक्षत्र पीड़ा नहीं देते। वहाँ सांग रुद्रजप करनेसे सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है और अनेक प्रकारके रोग नष्ट हो जाते हैं। यह देवमज्जनक तड़ागका शुभ माहात्म्य बतलाया गया। इस प्रसंगके स्मरण और कीर्तनसे कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो इस माहात्म्यको सुनता है, वह सब प्रकारके सुखसे सम्पन्न होता है।
त्रेतायुगकी बात है। 'लोहासुर' नामक एक मदोन्मत्त राक्षस ब्राह्मणका वेष धारण करके सदा धर्मारण्य क्षेत्रमें आता और वहाँके धर्मज्ञ ब्राह्मणोंको सताया करता था। वह उस क्षेत्रके शूद्रों और वैश्योंको डंडोंसे पीटता था। यज्ञ आदिको विध्वंस करता और होमकी सामग्री खा जाता था। वहाँकी वेदी और बावली आदिको देखकर वह मोहवश उन सबको अपवित्र कर दिया करता था। उस स्थानमें जो-जो पुण्यभूमि थी, उसे लोहासुरने मल-मूत्र डालकर गंदा कर दिया। उसके डरसे व्याकुल हो सब ब्राह्मण परिवारसहित सब दिशाओंमें भाग गये। वैश्य भी भयभीत होकर ब्राह्मणोंके ही पीछे चले गये। महान् भयसे व्याकुल हो दूर जाकर सब शूद्रों और ब्राह्मणोंके साथ मिलकर वैश्योंने कुछ विचार किया और सब एक मत होकर परम पवित्र 'मुक्तारण्य' नामक निर्जन वनमें चले गये। वहाँ थोड़ी ही दूरपर उन्होंने निवास बनाया और उस गाँवको 'वजिङ्ग्' नामसे बसाया। वह गाँव संसारमें 'शम्भुग्राम'के नामसे विख्यात हुआ।
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२९
तदनन्तर भयसे भागे हुए कुछ वैश्योंने थोड़ी दूर जाकर 'मण्डल' नामसे एक गाँव बसाया। कुछ वैश्य ब्राह्मणोंके यूथसे अलग होकर किसी दूसरे मार्गमें जा पहुँचे और धर्मारण्यसे थोड़ी ही दूर जाकर इस चिन्तामें पड़े कि हमलोग कहाँ चले आये। वहाँ उन्होंने 'अडालंज' नामसे प्रसिद्ध एक ग्राम बसाया। जिस गाँवका आदिनिवासी वैश्य जिस नामसे प्रसिद्ध था, उसी नामसे उस गाँवकी प्रसिद्धि हुई। सब वैश्य और ब्राह्मण भयसे व्याकुल हो मोहको प्राप्त हुए। इसलिये उन्होंने अपनी निवास-भूमिका नाम 'मोहमयी' रखा। इस प्रकार सब लोग धर्मारण्यसे दसों दिशाओंकी ओर पलायन कर गये। ब्राह्मण और वैश्य कोई भी धर्मारण्यमें नहीं ठहर सके। उस समय सब तीर्थोंका भूषणरूप परम दुर्लभ धर्मारण्य क्षेत्र उजाड़ हो गया। लोहासुरने उसकी बड़ी दुर्दशा कर डाली। वह दानव उस स्थानके तीर्थोंका नाश और ब्राह्मणोंका निष्कासन करके बहुत प्रसन्न हो अपने घरको चला गया।
~~ ० ~~
सरस्वती नदी, द्वारकातीर्थ एवं गोवत्स आदि तीर्थोंकी महिमा
सूतजी बोले—अब मैं धर्मारण्यतीर्थके उत्तम माहात्म्यकी दूसरी कथा कहता हूँ। धर्मारण्यमें सत्यलोकसे जिस प्रकार सरस्वतीजी लायी गयीं, वह प्रसंग सुनिये। एक समय प्रभातकालीन सूर्यके समान तेजस्वी तथा सब शास्त्रोंमें प्रवीण महामुनिसेवित महर्षि मार्कण्डेयजीको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके सब ऋषियोंने कहा—'भगवन्! आपने ब्रह्माजीकी पुत्री जिस सरस्वती नदीको उतारा है, वह दर्शनसे प्राणियोंके पापोंका नाश करनेवाली और पुण्य देनेवाली है, उसके माहात्म्यका वर्णन कीजिये।'
मार्कण्डेयजी बोले—ब्राह्मणो! मैंने शरणार्थियोंको शरण देनेवाली सरस्वती देवीको भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी पुण्यमयी द्वादशी तिथिको धर्मारण्यके अन्तर्गत द्वारावतीतीर्थमें उतारा था। द्वारावतीतीर्थ मुनियों और गन्धर्वोंसे सेवित है। उक्त तिथिको उस तीर्थमें पिण्डदान आदि करना चाहिये। उसमें पितरोंको दिया हुआ अक्षय होता है और श्राद्धकर्ता भी उसके पुण्यफलको प्राप्त होता है। यह महत्त्वपूर्ण उपाख्यान पापोंका नाशक एवं पुण्यदायक है। पवित्र वस्तुओंमें पवित्र और महापातकोंका निवारण करनेवाला है। सरस्वतीका जल समस्त मंगलोंके लिये मंगलकारक और परम पवित्र है। प्रभास तीर्थके मध्यमें सरस्वतीका जो पुण्यमय जल है, वह क्या ऊपरके लोकोंमें सुलभ है? सरस्वतीका जल मनुष्योंकी ब्रह्महत्याको भी दूर करता है। सरस्वतीमें स्नान और देवता-पितरोंका तर्पण करके पश्चात् पिण्ड देनेवाले मनुष्य फिर कभी माताका दूध पीनेवाले शिशु नहीं होते। जैसे कामधेनु गौएँ मनोवांछित फल देनेवाली होती हैं, उसी प्रकार सरस्वती नदी भी स्वर्ग और मोक्षकी एकमात्र हेतु है।
व्यासजी कहते हैं—मार्कण्डेयजीने सरस्वती देवीको यहाँ लाकर वैकुण्ठका दरवाजा खोल दिया है। जो फलकी आकांक्षासे यहाँ शरीर-त्याग करते हैं, वे उस फलको पाते हैं और अन्तमें भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं। अधिक कहनेसे क्या लाभ; मनुष्योंको सदैव विष्णुलोक प्राप्त करनेकी इच्छासे द्वारकामें ही शरीर-त्याग करना चाहिये। द्वारकामें मृत्युको प्राप्त हुए मनुष्य सब पापोंसे छूटकर भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। उस तीर्थमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् विष्णुका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुधामको जाता है। वह सब तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ है, जहाँ साक्षात् श्रीहरि निवास
६३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
करते और उस तीर्थमें रहनेवाले मनुष्यके सब पापोंको हर लेते हैं। द्वारकातीर्थ मोक्ष चाहनेवाले मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला, धनार्थियोंको धन देनेवाला तथा आयु, सुख एवं सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है। जो मनुष्य वहाँ एकादशीमें उपवास करके श्राद्ध करता है, वह नरकोंसे सब पितरोंका उद्धार कर देता है।
वहाँ द्वारकाके समीप मार्कण्डेयजीसे उपलक्षित एक गोवत्स नामक तीर्थ है, जो पृथ्वीमें सर्वत्र विख्यात है। उस तीर्थमें जगत्पति उमाकान्त भगवान् शिव गायके बछड़ेके रूपमें अवतीर्ण हो स्वयम्भू लिंगरूपसे विराज रहे हैं। पूर्वकालमें बलाहक नामके एक शत्रुविजयी राजा थे, जो महान् बलवान् और भगवान् शिवके परम भक्त थे। एक दिन जब वे शिकार खेलनेमें लगे थे, उनके किसी पैदल सैनिकने मृगोंके झुण्डमें एक गायके बछड़ेको स्थित देखकर राजासे कहा— 'नृपश्रेष्ठ! मैंने मृगोंके समुदायमें एक गायका बछड़ा देखा है, जो उन्हींमें हिला-मिला है। उसकी माँ उसके साथ नहीं है।' राजाने उस नौकरसे कहा— 'तू मुझे उस बछड़ेको दिखा।' तब उस पैदल सेवकने वनमें जाकर राजाको वह बछड़ा दिखाया। उस समय पैदल सैनिकोंके भयसे मृगोंका वह झुण्ड पीलु वृक्षकी झाड़ीकी ओर भागा। तब गायका बछड़ा भी उसी ओर चला। राजा उसे पकड़नेके लिये झाड़ीमें घुस गये और ज्यों ही उसे पकड़ने लगे त्यों ही वह उज्ज्वल शिवलिंगके रूपमें परिणत हो गया। यह देखकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे— 'यह क्या बात है।' तबतक उस शिवलिंगके मध्य भागमें उन्होंने गायके बछड़ेको स्थित देखा। अब उनके मनमें यह निश्चय हो गया कि 'अवश्य ही गायके बछड़ेके रूपमें साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं।' तदनन्तर उन्हें ले जानेके लिये उद्यत हो राजाने उस शिवलिंगको उखाड़नेका प्रयत्न किया, किंतु वे उस देवलिंगको किसी प्रकार उठा न सके। तब राजाके साथ सब देवताओंने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की।
देवता बोले— भगवन्! सर्वदेवेश्वर! प्रभो! आपको सब लोकोंका हित-साधन करनेकी इच्छासे शुक्ल लिंगरूपसे स्थित होना चाहिये।
श्रीमहादेवजीने कहा— देवताओ! मैं यहाँ सदा ही लिंगरूपसे स्थित रहूँगा। भाद्रपद मासके कृष्ण पक्षमें अमावास्याके दिन मेरा प्राकट्य हुआ है, इसलिये उस दिन विधिपूर्वक स्नान करके जो लोग इस शिवलिंगका पूजन करेंगे, उन्हें भय नहीं होगा। यहाँ पिण्डदान करनेसे पूर्वजोंको सदाके लिये उत्तम लोककी प्राप्ति होगी। घोर रौरव, कुम्भीपाक तथा अन्य अनेक नरकोंमें गिरे हुए अथवा पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हुए जो पितर हैं, उन्हें यहाँ एक बार पिण्डदान करनेसे अक्षय गतिकी प्राप्ति होती है।
तदनन्तर राजा बलाहकने सब देवताओंके समीप उस शिवलिंगको स्थापित किया और लोकहितकी कामनासे अनेक प्रकारके दान दिये। जबतक वे उस लिंगकी पूजा करते रहे, तभीतक साक्षात् भगवान् शिव भी वहाँ आ गये।
शिवजीने कहा— जो मनुष्य आजकी रातमें श्रद्धा और भक्तिसे इस देवेश्वर शिवकी पूजा करेंगे, उन्हें अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होगी। जो गीता-शास्त्रका पाठ करते हुए जागरण करेंगे, वे मनुष्य अपनी एक सौ एक पीढ़ियोंका उद्धार कर देंगे।
यह देवाधिदेव भगवान् शिवका अद्भुत लिंग है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका माहात्म्य सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। गोवत्स नामसे विख्यात शिवलिंग मनुष्योंको परम पुण्य प्रदान करनेवाला है। वह अनेक जन्मोंके पापोंका नाश कर देता है, ऐसा मार्कण्डेयजीका वचन है। जिनका चित्त पापसे दूषित है, उनके पापयुक्त
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शरीरकी शुद्धिके लिये उस तीर्थमें स्नान करना आवश्यक है। गोवत्सतीर्थमें एक बार किया हुआ स्नान भी मनुष्योंको रुद्रलोक प्रदान करनेवाला है। वहाँ विशेषतः भाद्रपद मासमें पक्षके अन्तमें कूपके तटपर तर्पण और श्राद्ध करनेसे कलियुगमें पितरोंको अधिक तृप्ति होती है। गयामें इक्कीस बार तर्पण करनेपर पितरोंको जो परम तृप्ति होती है, वह गंगकूपमें एक बार तर्पण करनेसे ही हो जाती है। गोवत्स महादेवके समीप ही गंगकूप विद्यमान है। वहाँ तिल और जलसे भी तर्पण करनेपर पितर सद्गतिको प्राप्त होते हैं, नरकोंसे छूट जाते हैं। उस तीर्थमें मुनीश्वरगण गोदानकी प्रशंसा करते हैं। वहाँ दो पीलुके वृक्ष स्थित हैं। वहीं मुनिसेवित गोवत्सतीर्थ है, जो स्नानसे स्वर्ग देनेवाला, आचमनसे पापकी शुद्धि करनेवाला, कीर्तनसे पुण्य उत्पन्न करनेवाला और सेवनसे मोक्ष देनेवाला है।
गोवत्सतीर्थसे नैर्ऋत्य कोणमें 'लोहयष्टि' दीख पड़ती है। वहाँ स्वयम्भू लिंगके रूपमें साक्षात् भगवान् शंकर विराजमान हैं। भाद्रपद (आश्विन)-की अमावास्याके दिन लोहयष्टिमें श्राद्ध करनेपर पितर प्रेतयोनिसे मुक्त हो स्वर्गमें क्रीड़ा करते हैं। पितरलोग यह कहते हैं 'क्या हमारे कुलमें भी ऐसा कोई पुरुष उत्पन्न होगा, जो श्राद्धपक्षमें आश्विनकी अमावास्याके दिन लोहयष्टि तीर्थमें हमारे लिये तिल, जल, पिण्डदान अथवा केवल जल ही प्रदान करेगा?' मुनि कहते हैं—'यदि पितर अधिक प्रिय हों तो भाद्रपद (आश्विन)-की अमावास्या तिथिको उनके लिये अवश्य श्राद्ध करना चाहिये।' जो सरस्वतीके जलमें स्नान करके दूधसे और श्वेत तिलोंसे पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर अवश्य तृप्त होते हैं। लोहयष्टि तीर्थमें भक्ति-भावसे तर्पण करनेपर मनुष्य स्वयं भी तृप्तिको प्राप्त होता है। जल देनेवाला तृप्ति और अन्न देनेवाला अक्षय सुख पाता है। फल देनेवाला पितृभक्त पुत्र और अभय देनेवाला आरोग्य लाभ करता है। न्यायोपार्जित धनमेंसे जो थोड़ा भी दान दिया जाय, तो वह महान् फल देनेवाला होता है। उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य भगवान् शिवका पार्षद होता है।
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संक्षेपसे श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन
व्यासजी कहते हैं—पूर्वकालमें त्रेतायुग आनेपर भगवान् विष्णुका अंश सूर्यवंशमें रघुवंशशिरोमणि कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें अवतीर्ण हुआ। श्रीराम और लक्ष्मण अभी काकपक्षधारी बालक थे, तभी पिताकी आज्ञासे वे विश्वामित्रके अनुगामी हो गये। राजा दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये उन अपने दोनों कुमारोंको विश्वामित्रजीकी सेवामें सौंप दिया था। वे दोनों वीर धनुष और बाण धारण करके पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये चले। रास्तेमें जाते हुए उन दोनों भाइयोंके समक्ष ताड़का नामवाली राक्षसी विघ्न डालनेके लिये आ खड़ी हुई। तब विश्वामित्र मुनिकी आज्ञासे श्रीरामचन्द्रजीने ताड़काको मार डाला। विश्वामित्रजीने श्रीरामचन्द्रजीको धनुर्वेद विद्याका उपदेश भी दिया। रघुनाथजीके चरणोंके स्पर्शसे शिलारूपधारिणी अहल्या, जो इन्द्रके साथ संयोग होनेके कारण शापवश प्रस्तर हो गयी थी, पुनः गौतम-वधूके रूपमें प्रकट हो गयी। विश्वामित्रजीका यज्ञ आरम्भ होनेपर रघुनाथजीने मारीचको मार भगाया और सुबाहुको अपने उत्तम बाणोंसे मौतके घाट उतार दिया। उन्होंने राजा जनकके घरमें रखे हुए महादेवजीके धनुषको तोड़ डाला और अयोनिजा सीताके साथ विवाह किया। जब वे अयोध्याको लौटने लगे, तब रास्तेमें परशुरामजी
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मिले। उन्हें जीतकर श्रीरामचन्द्रजी सीताके साथ घर आये। तत्पश्चात् सत्ताईसवें वर्षकी आयुमें जब श्रीरामचन्द्रजीको युवराज पद दिया जाने लगा, तब कैकेयीने राजासे दो वर माँगे। उनमेंसे एक वरके द्वारा यह माँगा कि 'श्रीराम जटा धारण करके चौदह वर्षोंके लिये वनमें चले जायँ और दूसरे वरसे यह माँग लिया कि भरत युवराज-पदके अधिकारी हों।' कैकेयी भोली-भाली थी। उसने मन्थराके बहकानेसे ऐसा वर माँगा। राजा दशरथने जानकी और लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीको वनवास दे दिया। श्रीरामचन्द्रजी तीन राततक केवल जल पीकर रहे। चौथे दिन फलाहार किया और पाँचवें दिन चित्रकूटमें पहुँचकर उन्होंने पर्णकुटी बनायी। उस समय राजा दशरथ श्रीरामचन्द्रजीका नाम लेते हुए स्वर्गको सिधारे। उन्होंने ऋषिके शापको सफल बनाकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। उसके बाद भरत और शत्रुघ्न चित्रकूटमें आये। भरतने पिताके स्वर्गगामी होनेका समाचार बतलाकर श्रीरामचन्द्रजीको घर लौट चलनेके लिये समझाया। जब वे लौटनेको राजी न हुए, तब उनकी चरणपादुका लेकर भरत और शत्रुघ्न नन्दिग्रामको लौट आये। वहाँ दोनों भाई राज्यकी रक्षा करते हुए श्रीरामकी चरणपादुकाके पूजनमें तत्पर रहे।
श्रीरामचन्द्रजी महात्मा अत्रिसे मिलकर दण्डकारण्यमें आये और राक्षसोंका वध आरम्भ किया। सबसे पहले विराध मारा गया। उसके बाद साढ़े बारह वर्षोंतक श्रीरामचन्द्रजी पंचवटीमें टिके रहे। वहाँ उन्होंने लक्ष्मणजीके द्वारा 'शूर्पणखा' नामक राक्षसीको कुरूप करा दिया। जानकीके साथ वनमें विचरते हुए श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके समीप भयंकर राक्षस रावण आया। वह सीताका अपहरण करनेके लिये आया था। माघ मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको वृन्द मुहूर्तमें जब राम और लक्ष्मण दोनों आश्रमसे बाहर चले गये थे, दशमुख रावणने सीताको अकेली पाकर हर लिया। रावण पहले मारीचके आश्रमपर गया था। मारीच मृगरूपमें आकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको दूर हटा ले गया था। तब श्रीरामचन्द्रजीने मृगरूपधारी मारीचको मार डाला और पुनः लौटकर जब वे आश्रमपर आये, तब उसे सीतासे रहित एवं सूना देखा।
उधर सीता रावणके द्वारा हरी जानेपर कुररीकी भाँति विलाप करने लगी—'हा राम! हा राम! मुझे राक्षस हरकर लिये जाता है, आप आकर मुझे बचाइये, मेरी रक्षा कीजिये।' जैसे भूखा बाज चीत्कार करती हुई चिड़ियाको उठा ले जाता है, वैसे ही राक्षस रावण जनकनन्दिनी सीताको हरकर लिये जा रहा था। यह समाचार सुनकर पक्षिराज जटायुने राक्षसराज रावणसे युद्ध किया। अन्तमें रावणने उन्हें घायल करके गिरा दिया। माघ कृष्णा नवमीको रावणके घरमें निवास करनेवाली सीताकी खोज करते हुए दोनों भाई राम और लक्ष्मण जटायुसे मिले। उसके मुखसे राक्षसद्वारा हरी गयी सीताका समाचार पाकर श्रीरामने भक्तिपूर्वक पक्षिराजका दाहादि संस्कार किया। फिर आगे-आगे श्रीराम और उनके पीछे लक्ष्मण चले। पम्पासरोवरके निकट पहुँचकर उन्होंने शबरीपर अनुग्रह किया। फिर पम्पासरोवरके जलका आचमन करके श्रीरामजी हनुमान्जीसे मिले। तदनन्तर रघुनाथजीने हनुमान् एवं सुग्रीवसे मैत्री की। सुग्रीवके पास आकर उन्होंने बाली नामक वानरको मारा। तत्पश्चात् श्रीरामदेवने अपनी प्राणवल्लभा सीताकी खोजके लिये हनुमान् आदि प्रमुख वानरोंको भेजा। हनुमान्जी श्रीरामकी अँगूठी लेकर गये। दसवें महीनेमें सम्पातीने हनुमान्जीको सीताका पता बतलाया। सम्पातीके कहनेसे हनुमान्जी सौ
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योजन समुद्र लाँघकर लंकामें पहुँचे और रातभर सब ओर सीताकी खोज करते रहे। रात्रि समाप्त होते-होते हनुमान्जीको सीताका दर्शन हुआ। द्वादशीको हनुमान्जी अशोक वृक्षपर बैठे रहे। उसी रातमें उन्होंने जानकीजीके विश्वासके लिये उत्तम कथा कही। तदनन्तर त्रयोदशीको अक्षकुमार आदिके साथ युद्ध हुआ। त्रयोदशीको ही मेघनादने ब्रह्मास्त्रसे हनुमान्को बाँध लिया। ब्रह्मास्त्रसे बँधे होनेपर भी वायुपुत्र हनुमान्जीने राक्षसराज रावणको कितने ही रूखे एवं कठोर वचन सुनाये। तब राक्षसोंने उनकी पूँछमें आग लगा दी। उसी आगसे हनुमान्जीने समस्त लंकाको जला डाला और वे पूर्णिमाको पुनः महेन्द्र पर्वतपर लौट आये। मार्गशीर्ष प्रतिपदासे पाँच दिनतक रास्तेमें रहकर वे मधुवनमें आये और षष्ठीको मधुवनका विध्वंस किया। फिर सप्तमीको श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें पहुँचकर पहचान देते हुए सब समाचार निवेदन किया। सीताजीकी मणि देकर श्रीरामसे उन्होंने सब बातें बतायीं। फिर अष्टमीको उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें, जब विजयसंज्ञक मुहूर्त व्यतीत हो रहा था, ठीक दोपहरके समयमें श्रीरामचन्द्रजीने प्रस्थान किया। रामने दक्षिण दिशामें जानेकी प्रतिज्ञा करते हुए कहा—'मैं समुद्रको लाँघकर भी राक्षसराज रावणका वध करूँगा। दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करते समय श्रीरामचन्द्रजीके साथी वानरराज सुग्रीव हुए। सात दिनोंमें समुद्रके तटपर सेनाकी छावनी पड़ी। पौष शुक्ला प्रतिपदासे लेकर तृतीयातक सेनासहित श्रीरामचन्द्रजीकी उपस्थिति सागरके तटपर हुई। चतुर्थीको विभीषण आकर श्रीरामचन्द्रजीसे मिले। पंचमीको समुद्र पार करनेके विषयमें विचार किया गया। उसके बाद चार दिनतक श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रके किनारे उपवास-व्रत किया। चौथे दिन समुद्रसे वर प्राप्त हुआ। साथ ही समुद्रने समुद्र-पार करनेका उपाय बताया। दशमीसे सेतु बाँधनेका कार्य प्रारम्भ हुआ और त्रयोदशीको पूरा हो गया। चतुर्दशीको सुबेल पर्वतपर पहुँचकर श्रीरामचन्द्रजीने सेनाका पड़ाव डाला। पूर्णिमासे लेकर द्वितीयातक तीन दिनोंमें सारी सेना समुद्र पार करके लंका पहुँच गयी। तत्पश्चात् शुभलक्षण श्रीरामने सीताको प्राप्त करनेके लिये शूरवीर वानरोंकी सेनाके साथ लंकापुरीको चारों ओरसे घेर लिया। तृतीयासे लेकर दशमीतक आठ दिनोंतक सेना टिकी रही। एकादशीके दिन शुक और सारण इन दो मन्त्रियोंका आगमन हुआ। पौष कृष्णा द्वादशीको सेनाकी गणना की गयी। कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने अपनी सेनाके बलाबलका वर्णन किया। त्रयोदशीसे लेकर अमावास्यातक तीन दिन लंकामें रावणने अपनी सेनाका संगठन, उसकी गणना एवं सैनिकोंमें युद्धके लिये उत्साह भरनेका कार्य किया। माघ शुक्ला प्रतिपदाको अंगदजी दूत बनकर रावणके दरबारमें गये। द्वितीयाके दिन सीताजीको मायासे उनके पतिके कटे हुए मस्तक आदिका दर्शन कराया गया। उस दिनसे सात दिनोंतक अर्थात् अष्टमी तिथितक राक्षसों और वानरोंमें घमासान युद्ध हुआ। माघ शुक्ला नवमीकी रातमें मेघनादने युद्ध करके राम और लक्ष्मणको नागपाशमें बाँध लिया। इससे सब कपीश्वर व्याकुल और हताश हो गये। तब वायुके उपदेशसे श्रीरघुनाथजीने गरुड़का स्मरण किया। दशमीको गरुड़जी नागपाशसे छुड़ानेके लिये आये। फिर माघ शुक्ला एकादशीसे लेकर दो दिनतक युद्ध बंद रहा। द्वादशीको हनुमान्जीने धूम्राक्षका और त्रयोदशीको उन्होंने ही अकम्पनका वध किया। रावणने श्रीरामको मायामयी सीताका दर्शन कराकर समस्त सैनिकोंको भयभीत कर दिया। माघ शुक्ला चतुर्दशीसे लेकर कृष्ण पक्षकी प्रतिपदातक तीन दिनमें
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नीलने प्रहस्तका वध किया। माघ कृष्णा द्वितीयासे लेकर चतुर्थीतक तीन दिनोंमें श्रीरामचन्द्रजीने तुमुल युद्ध करके रावणको रणस्थलसे मार भगाया। पंचमीसे अष्टमीतक रावणद्वारा जगाया हुआ कुम्भकर्ण चार दिनतक केवल भोजन ही करता रहा। नवमीसे चार दिनतक कुम्भकर्णने युद्ध किया और बहुतसे वानरोंको खा डाला। अन्तमें वह श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मारा गया। अमावास्याके दिन लंकामें उसके लिये शोक मनाया गया। फाल्गुन शुक्ला प्रतिपदासे लेकर चतुर्थीतक चार दिनोंमें नरान्तक आदि पाँच राक्षस मारे गये। पंचमीसे सप्तमीतक तीन दिनोंमें अतिकायका वध हुआ। अष्टमीसे द्वादशीतक पाँच दिनोंमें निकुम्भ और कुम्भ मारे गये। फिर चार दिनोंमें मकराक्षका वध किया गया। फाल्गुन कृष्णा द्वितीयाके दिन मेघनाद पराजित हुआ। तीजसे लेकर सप्तमीतक पाँच दिन दवा आदि लानेकी व्यग्रताके कारण युद्ध बंद रहा। अष्टमीको दुर्बुद्धि रावणने शोकके आवेगसे मायामयी मैथिलीका वध किया। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने सेनाके द्वारा इसका पूर्णतः निश्चय किया। फिर त्रयोदशीसे पाँच दिनोंमें लक्ष्मणजीने विख्यात बल और पराक्रमवाले मेघनादको युद्धमें मार डाला। चतुर्दशीको रावणने युद्ध बंद करके यज्ञकी दीक्षा ली। फिर अमावास्याके दिन वह युद्धके लिये निकला। चैत्र शुक्ला प्रतिपदासे लेकर पाँच दिनतक रावण लगातार युद्ध करता रहा। इस युद्धमें बहुत-से राक्षसोंका संहार हुआ। फिर तीन दिनोंतक रावणके रथ, घोड़े आदि मारे गये। चैत्र शुक्ला नवमीको लक्ष्मणजीको शक्ति लगी। तब श्रीरामचन्द्रजीने क्रोधमें भरकर दशमुख रावणको खदेड़ दिया। फिर विभीषणकी सलाहसे हनुमान्जी लक्ष्मणके लिये ओषधि लानेको द्रोणाचल पर्वतपर गये और वहाँसे विशल्या (संजीवनी बूटी) ले आकर उन्होंने लक्ष्मणको पिलायी। दशमीके दिन युद्ध बंद रहा। रातमें राक्षसों ने युद्ध आरम्भ किया। एकादशीके दिन श्रीरामचन्द्रजीके पास मातलि नामक सारथिके साथ इन्द्रका रथ आ पहुँचा। चैत्र शुक्ला द्वादशीसे लेकर कृष्णा चतुर्दशीतक अठारह दिनोंमें श्रीरामचन्द्रजीने द्वन्द्वयुद्ध करके रावणको मार डाला। अमावास्याके दिन रावण आदि राक्षसोंके दाह-संस्कार हुए। इस प्रकार घोर संग्राम होनेपर श्रीरामचन्द्रजीको विजय प्राप्त हुई। माघ शुक्ला द्वितीयासे लेकर चैत्र कृष्णा चतुर्दशीतक सत्तासी दिनके संग्राममें केवल पंद्रह दिन युद्ध बंद रहा। शेष बहत्तर दिन युद्ध चालू रहा। वैशाख शुक्ला प्रतिपदाको श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें ही रहे। द्वितीयाके दिन उन्होंने विभीषणका लंकाके राज्यपर अभिषेक किया। तृतीयाको सीताकी शुद्धि हुई, देवताओंसे वरदान प्राप्त हुआ। उसी दिन दशरथजीका आगमन हुआ और उनके द्वारा भी सीताजीकी पवित्रताके विषयमे अनुमोदन प्राप्त हुआ।
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंद्वारा कष्टमें डाली हुई परम पवित्र जानकीको बड़े प्रेमसे ग्रहण करके वहाँसे लौटे। वैशाखकी चतुर्थीको श्रीरामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर बैठे और आकाशमार्गसे अयोध्यापुरीकी ओर चल दिये। चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर वैशाख शुक्ला पंचमीको श्रीरामचन्द्रजी अपने दलबलके साथ भरद्वाज आश्रमपर आकर रहे। फिर षष्ठीको पुष्पक विमानसे वे नन्दिग्राममें आये। सप्तमीमें अयोध्याके राज्यपर रघुनाथजीका अभिषेक हुआ। चौदह महीने दस दिनतक सीताको रामसे अलग रावणके घरमें रहना पड़ा था। बयालीसवें वर्षमें श्रीरामचन्द्रजीने राज्यकार्य प्रारम्भ किया। उस समय सीताजीकी आयु पैंतीस वर्षकी थी। चौदह वर्षके बाद ही
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६३५
श्रीरामने अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया था। उस समय रावणका दर्प दलन करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने अपने भाइयोंके साथ ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया। राज्यका पालन करनेके पश्चात् वे सबके साथ परम धाममें गये। रामराज्यमें सब लोग बहुत प्रसन्न रहते थे। सभी धन-धान्यसे सम्पन्न तथा पुत्र-पौत्रोंसे भरे-पूरे थे। बादल इच्छाके अनुसार पानी बरसाते थे, अन्नकी उपज कई गुनी अधिक होती थी, गौएँ घड़ाभर दूध देती थीं और वृक्षोंमें सदैव फल लगे रहते थे। श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें किसीको आधि-व्याधि नहीं सताती थी, सभी स्त्रियाँ पतिव्रता होती थीं, पुरुष पिता-माताकी भक्ति करनेवाले होते थे, ब्राह्मण सदा वेदपाठमें लगे रहते, क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी सेवा करते और वैश्यलोग ब्राह्मणों एवं गौओंमें सदा भक्ति रखते थे। उस समय वर्णसंकरता और कर्मसंकरताका नाम नहीं सुना जाता था। कोई भी स्त्री वन्ध्या, दुर्भाग्यवती, काकवन्ध्या, मृतवत्सा अथवा विधवा नहीं थी। सधवा स्त्रीको कभी विलाप नहीं करना पड़ता था। कोई भी माता-पिता और गुरुकी अवहेलना नहीं करते थे। प्रत्येक मनुष्य पुण्य करता और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञा नहीं टालता था। कोई दूसरेकी भूमिपर अधिकार नहीं जमाते थे। सभी परायी स्त्रियोंसे विमुख रहते थे। कोई मनुष्य परनिन्दक, दरिद्र, रोगी, चोर, जुआरी, शराबी और पापी नहीं था। सुवर्ण चुरानेवाला, गुरुपत्नीगमन करनेवाला, ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या और बालहत्या करनेवाला तथा झूठ बोलनेवाला एक भी मनुष्य नहीं था। कोई किसीकी जीविका नष्ट नहीं करता और झूठी गवाही नहीं देता था। शठ, कृतघ्न और मलिन मनुष्य कहीं देखनेको भी नहीं मिलता था। ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान् होते थे और सदा सर्वत्र उनकी पूजा होती थी। अत्यन्त विख्यात रामराज्यमें कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो व्रतका पालन करनेवाला एवं ईश्वरका भक्त न हो। राज्य करते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास उनके पुरोहित महाभाग वसिष्ठ मुनि अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करके आये। श्रीरामचन्द्रजीने अभ्युत्थान, अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्क आदिके द्वारा मुनियोंसहित गुरु वसिष्ठका पूजन किया। तत्पश्चात् मुनिवर वसिष्ठने श्रीरामचन्द्रजीसे उनके राज्य, अश्व, हाथी, खजाना, देश, उत्तम बन्धु तथा सेवकोंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा। श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है।' तदनन्तर श्रीरामने मुनिवर वसिष्ठजीसे उनकी पत्नी और पुत्रके कुशल-मंगलका समाचार पूछा। तब वसिष्ठजीने भूमण्डलमें जिन-जिन क्षेत्रों, तीर्थों और देवालयोंका सेवन किया था, उन सबकी चर्चा करते हुए सर्वत्र अपना कुशल-मंगल बतलाया। इससे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी बड़े विस्मित होकर वसिष्ठजीसे उत्तमोत्तम तीर्थका माहात्म्य पूछने लगे।