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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौंदर्य लहरी ३५

प्रादुर्भाव के साथ मायाशबल ब्रह्म में शिव तत्व और शक्ति तत्व दोनों की व्यक्तता दिखने लगती है।

अहं प्रत्यय (मैं के ज्ञान) को शिव तत्व कहते हैं, परन्तु शिव तत्व में अहं प्रत्यय अनन्यमुख अहंवमर्ष* युक्त होता है उस अहं अर्थात मैं की स्फुरणा में अपने से अन्य भिन्न वस्तु का ज्ञान नहीं होता, इस समय शक्ति की सत्ता अव्यक्त स्वरूपा है और शिव तत्व पर उसका आवरण मात्र छा सा गया है। यद्यपि अहं अर्थात मैं के उदय के साथ युग पद् इदं भाव अर्थात यह का भाव भी उदय हो जाता है। मैं और यह दोनों भाव युगपद ही उदय ओर अस्त हुवा करते हैं, दोनों का जोडा है, इदं भाव ही शक्ति तत्व है। मानों शुद्ध ब्रह्मस्वरूप आकाश में स्पन्द होने से कुछ आवरण सा छा गया है और उस आवरण में ब्रह्म का तेजोमह प्रकाश भी चमक रहा है। कहीं कहीं उस अव्यक्त माया को आकाश शब्द से भी निर्दिष्ट किया गया है-

जैसे:—
“ एतस्मिन्नु खल्वरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च (वृ. ३, ८, ११)
अर्थ—इस (ब्रह्म) में निश्चय हे गार्गि ! आकाश ओत प्रोत है।


*नोट: — विमर्शोनाम विश्वाकारेण विश्वप्रकाशेन
विश्व संहारेण वा अकृत्तिमोऽहमिति स्फुरणम् ॥

विमर्श का अर्थ: — विश्वाकार होने और विश्व को प्रकाशित एवं विश्व का संहार करने वाला जो आदि कारण अकृतिम अहंभाव है उसके स्फुरण को विमर्श कहते हैं।

३६ | सौंदर्य लहरी


ब्रह्म देश काल से अतीत है, उसमें आकाश के ओत प्रोत होने की भावना मात्र का होना माया के अस्तित्व का व्यंजक है । आकाश में स्पंद होना संभव है. देश और काल से अतीत ब्रह्म में स्पन्द होना संभव नहीं, क्योंकि स्पंद के प्रसार के लिये देश और उसके क्रम को समय चाहिये और देश और काल दोनों माया के अंग हैं । आकाश में स्पन्द, स्पन्द में शक्ति और शक्ति में ब्रह्म के तेज की द्युति, सब का समन्वय होकर, शिवः शक्त्या युक्तो भवति शक्तः प्रभवितुम् ’ अर्थात शक्ति से युक्त शिव प्रभव करने को शक्त होता है । इसी भाव को मंत्र शास्त्र ने मायाबीज द्वारा व्यक्त किया है, हकार आकाश का द्योतक है, रकार स्पन्द का, ईकार शक्ति का और अनुस्वार ब्रह्म के प्रतिबिंबित तेज का । ब्रह्म में माया का धुंध अथवा अंधकार यद्यपि तमोमय अवश्य है, परन्तु वह हिरण्यमय कान्तियुक्त होता है, इसीलिये उसे हिरण्यगर्भ भी कहते हैं । वेद कहता है कि—

‘हिरण्मयेन पात्रेण सत्यास्यापिहितंमुखम्’

अर्थात सत्य का मुख हिरण्यमय पात्र से ढका हुवा है । हिरण्यमय आवरण में एक कान्ति, प्रभा अथवा श्री होती है मानों आकाश में कांति की छाया बस गई है अर्थात हकार शकार में परिणित हो गया है । शकार और हकार दोनों आकाश तत्व के अक्षर हैं । हकार के स्थान पर शकार रखकर माया बीज ही लक्ष्मी बीज बन जाता है । रकार अग्नि का बीज भी है, अग्नि स्वयं शक्ति-स्वरूप है, और उसका वर्ण हिरण्मय श्री(कांति) युक्त है. परन्तु

सौंदर्य लहरी ३७

उसमें जो श्री है वह उसकी अपनी नहीं है, वह श्री ब्रह्म की ही प्रभा है, जैसा कि कहा है—

‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’

इसी अभिप्राय से शंकर भगवत्पाद कहते हैं—

‘न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि’

अर्थात यदि वह ब्रह्मदेव शक्ति से युक्त नहीं होता तो वह स्पन्दित होने में भी कुशल नहीं हो सकता था। ऋग्वेदीय उपरोक्त नासदासीय मंत्र में कहा है कि फिर उसकी महिमा के तप से एक (पुरुष) उत्पन्न होता है। हम कह आये हैं कि ब्रह्म का तप उसके ज्ञान का उन्मेश है अर्थात ज्ञान के उद्भव अथवा व्यक्त होने को ही तप कहा गया है, मानो शिवजी के नेत्र अर्द्धोन्मिलित से खुल जाते हैं। इस स्तर पर अहम् और इदम् दोनों का युगपद् ज्ञान उदय होता है। यह ज्ञानमय तप दूसरा स्पन्द है, जिसको सदारुय अथवा सदाशिव तत्व भी कहते हैं। इस अहम्-इदम् विमर्श वाले दूसरे स्पन्द को एक बीज के सदृश समझना चाहिये, जिसमें दो दल होते हैं परन्तु ऊपर से एक ही प्रतीत होता है। इस ही स्वरूप को अर्ध नारीश्वर अथवा अर्ध नारी नटेश्वर कहते हैं। देखें श्लोक २, ३। इस स्तर पर साधक योगी का तप भी ज्ञानमय ही होता है, अर्थात उसकी उन्नति साधन साध्य नहीं रहती वरन् पांचवी, छःटी, सातवी भूमिकाओं वाली ज्ञान साध्य होती है, ये जीवन मुक्ति की भूमिकायें कहलाती हैं। यह सदारुय तत्व सृष्टि करने की

३८ सौंदर्य लहरी


कामना करता है । कामना से मन और मन में संकल्प* शक्ति का उदय होता है, जिसको 'मनसोरेतस्' कहा गया है। देखें परिशिष्ट नं. १ । संकल्पात्मिका शक्ति का स्थान मन है । रेतस् का अर्थ शक्ति ही समझना चाहिये । इच्छा शक्ति मन के स्तर पर उतर कर संकल्पात्मिका शक्ति में परिणत हो जाती है, अर्थात् संकल्पों की शक्ति कामना अथवा वासना का स्थूल परिणाम है, और संकल्पों का ही नाम मन है । कहा है:—

‘संकल्पविकल्पात्मनं मनः’

इस स्तर पर मानो बीज अंकुरित होकर दोनों दल पृथक हो जाते हैं. अहम् अपने को इदम् शक्ति का ईश्वर समझने लगता है । यह तीसरा स्पन्द है, फिर शक्ति का परिणाम निम्न स्तरों पर होने लगता है, वह चौथा स्पन्द है । तीसरे स्पन्द में मानों शिवजी नेत्र खोल देते हैं, और उनको शक्ति के स्फुरण का पूर्ण ज्ञान हो जाता है । अर्थात शक्ति और शक्तिमान दोनों की पृथक सत्ता का ज्ञान उदय हो जाता है । शिवरूपी अहम् को महेश्वर तत्व और 'इदम्' को शुद्ध विद्या कहते हैं । शुद्ध विद्या की फिर सत् और असत् दो स्तरों पर अभिव्यक्ति दिखने लगती है । सत् को सद्विद्या और असत् को असद्विद्या भी कहा जा सकता है । शुद्ध विद्या में सामान्य भाव है और सद्विद्या में विशेष भाव निहित है । असद्विद्या


* संकल्प = मैं यह यह करूंगा (इदमिदं कुर्याम), • ऐसा मन का व्यापार संकल्प कहलाता है संकल्प में इदम् का ज्ञान विशेष रूप से रहता है ।

सौंदर्य लहरी ३९


को माया अथवा अविद्या भी कहा जाता है। काम मन और संकल्पात्मक रेतस में काम महेश्वर का रूप है, और मन की शक्ति (रेतस) शुद्ध विद्या और सद्विद्या है और उसका परिणाम असद्विद्या है। शक्ति का परिणाम वर्णात्मक अर्थात्मक दो स्तरों पर होता है और वर्णात्मिका शक्ति को सरस्वती कहते हैं जिसका उदय कामना के उदय के साथ-साथ ही होता है और अर्थात्मिका शक्ति परिणत होकर समस्त विसर्ग का रूप धारण कर लेती है। वर्णात्मिका शक्ति को स्वरात्मिका भी कहते हैं कहा है—

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वंहि वषट्कारः स्वरात्मिका
(दु. श. ७३)

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता
अर्ध मात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः
(दु. श. ७४)

अर्थ— हे देवि, तू स्वाहा, तू स्वधा और तू ही व षटकार स्वरात्मिका है, अर्थात सब स्वर तेरे ही रूप हैं, तू स्वधा है। हे नित्ये ! और अक्षरो ! अकार, ईकार अथवा उकार और मकार की तीनों मात्राओं के रूप में तू स्थित है और अनुस्वार स्वरूपी अर्धमात्रा में भी नित्य स्थित है जिसका विशेष रूप से उच्चारण भी नहीं किया जा सकता अ+उ=ओ और आ+ए=ऐ से ओम और ऐं दोनों रूप लिये जा सकते हैं अथवा इकारस्य भावे ऐ भी लिया जा सकता है. ऐं सरस्वती बीज है. ई शक्ति वाचक है और ऐ स्वरात्मक भाव वाचक है और अनुस्वार शिव वाचक

४० सौंदर्य लहरी


है। अर्थ स्वरूपा देवी आदि काम से उदय होकर संकल्प रूप धारण करके सृष्टि, स्थिति और प्रलय की कल्पना करती है और ब्रह्मा के दिन में स्थिति करके कल्प का निर्माण करती है। संकल्प, कल्पना और कल्प तीनों शब्दों की व्युत्पत्ति क्लृप् (सामर्थ्य) धातु से होती है अर्थात भगवती के सामर्थ्य का विकास अथवा प्रदर्शन स्वरूप आद्योपान्त सारा कल्प है इसलिये उसका रूप क्लृप् धातु से क्लीं बनता है। ब्रह्मा का दिन जिसको कल्प कहते हैं और जिसकी अवधि १००० चतुर्युगी का समय १२ ००० दिव्य वर्ष अथवा १२ ००० × ३६० = ४३२००० मानुषी वर्ष हैं, भगवती के क्लीं बीज के सामर्थ्य से कल्पित हैं, जो महेश्वर की काम अथवा संकल्प शक्ति का स्वरूप हैं। इसी अभिप्राय से भगवती को कामेश्वरी भी कहते हैं। और सौंदर्य लहरी में सर्वत्र भगवती के स्वरूप को कामदेव से भी उपमित किया गया है। यहां यह भी स्मरण रहे कि कामदेव की उपास्य विद्या मूल कादि विद्या ही है और क्लीं को काम बीज भी कहते हैं।

उपरोक्त शिव, शक्ति, सदाशिव, महेश्वर और शुद्ध विद्या को शुद्ध तत्व कहते हैं। प्रथम दो शांतातीता और अन्तिम तीन शान्तिकला के तत्व माने जाते हैं।

फिर तीसरा माया कला का स्तर शुद्धाशुद्ध विद्या का स्तर माना जाता है जिसे गीता में भगवान ने परा प्रकृति कहा है। माया का प्रस्तार देश (कला) और काल में होता है और जो नियति अर्थात प्राकृतिक नियमों के सूत्र में बंधा हुवा है जिनके अविद्या स्वरूप ज्ञान का जानकार होकर शिव स्वयं राग के पाश में बंध जाता है

सौंदर्य लहरी ४१

और जीव कहलाने लग जाता है, इसलिये माया के सात तत्व शुद्धा-शुद्ध तत्व कहलाते हैं उनके नाम यह हैं—माया, काल, कला, नियति, अविद्या, राग और पुरुष । इस स्तर को विद्या कला कहते हैं । कला पांच हैं—शान्त्यातीता, शांति, विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति । काल से राग तक पांच तत्व पांच कंचुक कहलाते हैं जो माया के पांच आवरण या पांच केंचुलियां है, और जो शिवकी चितिशक्तिको काल से, क्रिया शक्ति को कला से, ज्ञान शक्ति को विद्या से, इच्छाशक्ति को राग से और आनंद को नियति से आवृत करके उसे जीव बना देते हैं । अशुद्ध तत्व २४ हैं जिनके नाम नीचे दिये जाते हैं:—

(१) अव्यक्त प्रकृति (२) महत् (३) अहंकार (४) मन (५-९) पांच ज्ञानेन्द्रियां (१०-१४) पांच कर्मेन्द्रियां (१५-१९) पांच तन्मात्राएं (२०-२४) पांच महाभूत । प्रथम २३ तत्व प्रतिष्ठा कला के अन्तर्गत हैं और अन्तिम पृथिवी तत्व निवृत्ति कला कहलाता है । सब तत्वों का योग ३६ है और कलाएं पांच हैं ।

बीज मंत्र द्वारा ब्रह्मोपासनाह्रीं का उदय आकाश से होता है, इसकी पीठ विशुद्ध चक्र में है और उसका आयतन सहस्रार तक है । श्रीं का उदय स्थान भी आकाश है, इसलिये उसकी पीठ विशुद्ध है और आयतन आज्ञाचक्र तक है । ऐं का उदय अग्नि से है, इसलिये उसकी पीठ मणिपूर है और आयतन वाक शक्ति का स्थान विशुद्ध चक्र है और विकास स्थान जिव्हाग्र भाग है । इन तीनों में अग्नि ही प्रमुख है । क्लीं में लकार

४२ सौंदर्य लहरी

से पृथिवी तत्व की प्रधानता लिये हुए वायु तत्व है । कं से जल भी लिया जाता है । इसकी पीठ मूलाधार है और आयतन काम, संकल्प और कामना तीनों में होने के कारण स्वाधिष्ठान और अनाहत् एवं आज्ञा चक्र तक है । वाक्शक्ति का संबंध संकल्पों से है, इसलिये ऐं का साथ क्लीं से है और शक्ति का प्रकाश कांति में होता है, इसलिये हीं का साथ श्रीं से है । ऐं क्लीं बाला मंत्र के अंग हैं, जो सब कामनाओं का देने वाला है, उसका दो प्रकार से प्रयोग किया जाता है । ह्रीं श्रीं को प्रथम रख कर अथवा उसे गर्भ में लेकर—इसलिये ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं और ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं दो रूप बन जाते हैं । यहां यह स्मरण रहे कि प्रत्येक मंत्र का आदि अक्षर अथवा बीजमंत्र सारे मंत्र का प्रमुख होकर उस मंत्र का संचालन करता है । मंत्र विज्ञान एक स्वतंत्र विज्ञान है जो पुस्तकों के आधार पर नहीं जाना जा सकता । जो लोग केवल पुस्तकों को पढकर किसी मंत्र का अनुष्ठान करते हैं, वे उस खिलाडी के सदृश हानि उठा सकते हैं जो तलवार चलाना न जानने के कारण अपना ही अंग काट लेता है । सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुकों को प्रत्येक मंत्र के उपदेश की दीक्षा किसी जानकार देशक (दीक्षा देने वाले) से मन्त्र रहस्य समझ कर लेनी चाहिये । क्योंकि मंत्रों का अनुष्ठान अग्नि के साथ खेल खेलने के सदृश है । यहां पर केवल मंत्र बीजों की भावना करने की विधि पर प्रकाश डाला गया है जिससे साधक विज्ञान को समझ कर तद्रूप भावना सहित अभ्यास बढावें क्योंकि कहा है कि विज्ञान को समझ कर अनुष्ठान करने से विद्या वीर्यवती होती है । यथा “ यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति ।” (छा. १, १, १०)

सौंदर्य लहरी ४३

क्लीं बीज (मकार युक्त ककार) से बनता है। ककार से काम, जल, और प्राण एवं सुख का अर्थ लिया जाता है। कं जल को कहते हैं और प्राण को भी। कं का अर्थ सुख भी होता है। जल के बेध से प्राण का विकास होता है, और प्राण का स्थूल रूप वायु है। वायु का कारण आकाश है। और आकाश का कारण सूक्ष्म प्राण है, प्राण स्वयं ब्रह्म का तेज है। इसलिये कहा है कि—"प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति। यद्वाव कं तदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः।" (छा. ४,१०,५) अर्थात्—प्राण ब्रह्म है, कं ब्रह्म है, खं ब्रह्म है, अथवा जो कं है वह ही खं है, जो खं है वह ही कं है और वह ही प्राण है। खं का अर्थ आकाश भी होता है, इसलिये कं, खं, और प्राण तीनों ब्रह्म वाचक है। ऐसा भी कहा है कि—"अन्नमयं हि सोम्य मनः अपोमयः प्राणस्तेजो मयी वाक्।" (छा. ६,७,६)

क्लीं में ककार के साथ लकार भी है, जो पृथिवी का अक्षर है। पृथिवी के बेध से अन्न होता है, और अन्न से मन। मूलाधार क्लीं बीज की पीठ है, जहां पर पृथिवी और जल दोनो का बेध होकर मन और प्राण के विकास में सहायता मिलती है। मन का बेध आज्ञाचक्र में होता है। मन आनन्द का स्थान है और आनन्द ब्रह्म है। इस प्रकार क्लीं की सहायता से प्राण और मन दोनों के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार ऐं अग्नि बीज है। अग्नि से वाक् और वाक् से ज्ञान की प्राप्ति होती है, और ज्ञान स्वयं ब्रह्म है। सूर्य भी अग्नि ही हैं। सूर्य से दृष्टि का उदय होता है और दृष्टि सत्य की पीठ है। सत्य स्वयं ब्रह्म है। स्थूल प्राण का

४३ | सौंदर्य लहरी

स्थान हृदय है और प्राण सबको प्रिय होते हैं । इसलिये प्राण प्रेम भक्ति की पीठ है । अर्थात हृदय में प्रेम भक्ति का उदय होता है, और प्रेम का भाव स्वयं ब्रह्म है । प्राण की सूक्ष्म गति द्वारा वायु का वेध होकर आकाश का वेध होता है । आकाश से श्रवणेन्द्रिय की उत्पत्ति है जो अनंत की पीठ है । अनंत स्वयं ब्रह्म है । हृदय से अहं भाव की भी स्फुरणा होती है । और अहं मे सत् की पीठ है और सत् स्वयं ब्रह्म है । इस प्रकार ऐं और क्लीं दोनो से सब चक्रों का वेध होकर ब्रह्म की प्राप्ति की जाती है । यह विज्ञान बृहदारण्यक उपनिषत् के चतुर्थ अध्यायोक्त याज्ञवल्क्य—जनक संवाद के आधार पर बताया गया है, देखें प्रथम ब्राह्मण । इसी प्रकार वाग्भव कूट को समझना चाहिये । वाग्भव कामकला और शक्ति कूट जो ह्रीं युक्त हैं और लक्ष्मी बीज जिसकी सोलहवीं कला है, पूरा मंत्रराज बनता है ।

स्पन्द ही शक्ति है — श्लोक की प्रथम पंक्ति में कहा गया है कि शिव शक्ति से युक्त होकर प्रभव करता है । — "नहि तया बिना परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वं सिद्ध्यति" (शंकर भाष्य ब्र.सू. १-४-३) उसके बिना परमेश्वर का स्रष्टृत्व सिद्ध नहीं होता । दूसरी पंक्ति में कहा है कि शिव शक्ति से युक्त न हो तो वह स्पंदित भी नहीं हो सकता । इसका अर्थ यह है कि शक्ति से युक्त ब्रह्म स्पंदित होता है । "तदेजति तन्नैजति" (ईश ५) वह स्पंदित होता है और वह स्पन्द नहीं होता, ऐसा श्रुति कहती है । अब यह बात विचारणीय है कि स्पन्द शक्ति का धर्म है या शिव का अथवा दोनों का । स्वभाव से निष्क्रिय, शांत और निरंजन पद

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४६ सौंदर्य लहरी


यदा पंचावावेष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति, तमाहुः परमां गतिम् ॥
ताँ योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥
(क. ६, १०, ११)

अर्थः—जब पांचों ज्ञानेन्द्रियां मन सहित स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि चेष्टा नहीं करती, उस अवस्था को परमगति कहते हैं, तब मनुष्य अप्रमत्त हो जाता है, अर्थात शांति प्राप्त करता है । इसलिये प्रभव और अप्यय ही योग है ।

इंद्रियां और मन प्रकृति रूपा शक्ति के विकार हैं, और बुद्धि महत् तत्व रुपी सिन्धु की एक तरंग है । महत् तत्व समष्टि हैरण्यगर्भ बुद्धि ही है । इसलिये बुद्धि को तीनों गुणों की विषमता होने पर शक्ति की अभिव्यक्ति की एक तरंग कहा जा सकता है । कहा भी है:—

या देवि सर्व भूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै ३ नमोनमः ॥ (दुर्गा सप्त)

अहंवृति का कारण आत्मा है और इदं का रूप बुद्धि है ! दोनों का इतरेतर अध्यास बन्धन का कारण हैं । एक का दूसरे के गुणों का आरोप अपने उपर कर लेने को अध्यास कहते हैं । अर्थात आत्मा अपने उपरं बुद्धि के विकारों का आरोप करके स्वयं को

सौंदर्य लहरी ५७

विकारी मानने लगता है, और बुद्धि अपने को आत्मतत्व समझने लगती है । अनात्मनि आत्मख्याति रुपी यह अविद्या है । परन्तु शिवतत्व में अविद्या का अभाव होने से अध्यास नहीं होता । आत्मा में अहं इदं का कभी उदय होना कभी अस्त होना यह प्रकट करता है कि नित्य निर्विकार शुद्ध स्वरूप आत्मा दोनों से पृथक है । इदं सत्य है अथवा असत्य ! सत्यवत दिखता है, परन्तु अहं के आधार पर उसका उदय अस्त होने से उसकी असत्यता सिद्ध होती है । इसलिये इसको शंकर भगवत्पाद ने अनिर्वचनीय-ख्याति कहा है । अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि शक्ति की शक्तिमान से अभिन्न सत्ता रहते हुवे भी वह विपरीत धर्मा कैसे उदय-अस्त हुआ करती है । इसी अभिन्नता को लेकर श्रुति कहती है—“तदेजति तन्नैजति” (ईश)

<u>प्राणतत्व और अध्यात्म तथा आधिभूत भाव</u>

यदिदं जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
( कठ २,६,२ )

अर्थ:— यह जो समस्त जगत है वह प्राण के स्पन्दित होने पर निकलता है । वह प्राण वज्र के सदृश्य बडा भय वाला है, अर्थात उसके भय से अग्नि तपता है और सूर्य उदय अस्त होता है । जो उसको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ।

भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । ( क. २.६,३ )

प्राण यहां ब्रह्म वाचक है और वही जीवन शक्ति है । कहा है वह प्राण का भी प्राण है । उपरोक्त श्रुति में कहा गया है कि

८ सौन्दर्य लहरी


सारा जगत प्राण के स्पन्द से बना है। जिस प्राण मे स्पन्द कहा गया है उसे आत्मा की रश्मिवत् समझना चाहिये, जैसे चुम्बक से उसकी किरणें निकला करती है। स्पन्द चुम्बक में नहीं होता, वरन उसकी किरणों में होता है। वह समष्टि प्राण सृष्टि का आदि कारण और शक्ति का ही रूप है। नीचे के स्तरों पर यह प्राणशक्ति दो रूप धारण कर लेती हैं। एक अध्यात्म और दूसरा अधिभूत । अधिभूता शक्ति का परिणाम सारा जगत है, जो अध्यात्म रूपके प्रकाश से सर्वत्र प्रतिभासित हो रहा है। इस विषय का भगवान ने गीता में इस प्रकार वर्णन किया है:—

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
( गीता ८, ३ )

अर्थ:— ब्रह्म अक्षर है, उसमें दो भावों का उदय होता है एक अध्यात्म और दूसरा अधिभूत । अध्यात्म भाव ब्रह्म का स्वभाव है अर्थात उसका अपना ही भाव होने के कारण वह अहं चेतन भाव है और दूसरा अधिभूत भाव उद्भव करने वाला है यह भी ब्रह्म का ही भाव है। इस दूसरे भाव का कर्म सारा जगत है। यह अधिभूत भाव क्षर अथवा नाशवान है।

सच्चिदानन्द ब्रह्म अक्षर है अर्थात उसकी सत्ता ज्ञान स्वरूप है और आनन्दमयी है, परन्तु अहं और इदं दोनों भाव से अतीत होने के कारण परम भाव कहलाता है। उससे अहम् और इदम्

सौंदर्य लहरी ४९

दोनों भावों का उदय होने पर एक को अध्यात्म और दूसरे को अधिभूत भाव कहते हैं। अध्यात्म भाव उसी का स्वभाव वाला अर्थात सच्चिदानन्द स्वरूप है और अविनाशी और अपरिणामी भी हे। अधिभूत भाव क्षर और परिणामी है जिसके परिणाम से सारा जगत बनता बिगडता है। अक्षर निस्पन्द परम शिव है और अध्यात्म में अहंता होने के कारण सस्पन्द शिव ईश्वरभाव और जीवभाव का समावेश है। अधिभूत भाव को उद्भव करने वाले भाव को ही आदि शक्ति कहा है जो ब्रह्म का ही एक भाव है। परमभाव को प्राप्त करने के लिये सब स्पन्दों का निरोध करके अहं भाव में स्थिति करनी पडती है। कहा है—“आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ” (गी. ६-२५) अर्थात-आत्मभाव में मन को स्थिर करके इदम् जगत का कुछ भी चिन्तन नहीं करना चाहिये। यह योग का सब से उत्कृष्ट साधन है। यही अहंग्रह उपासना का अन्तिम स्वरूप है और इसी को निदिध्यासन भी कहते हैं।

हिरण्यगर्भसमष्टि प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं जिसको सांख्य महत्तत्व कहता है और वह ही प्राणिमात्र की बुद्धियों का आदि कारण स्वरूप समष्टि बुद्धि है।

प्राणतत्व और हिरण्यगर्भ

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरोह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥२॥
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणिच ।
खं वायु र्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥३॥ (मु.२,१)

५० सौंदर्य लहरी

अर्थः— वह ब्रह्म पुरुष दिव्य और अमूर्त है, अजन्मा बाह्य अभ्यन्तर सर्वत्र व्यापक है, वह प्राण और मन रहित शुभ्र है और अक्षर (प्रकृति, अव्यक्त) से अति सूक्ष्म है। उससे प्राण उत्पन्न होता है, और फिर मन, सब इन्द्रियां, आकाश, वायु, तेज, आप और विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी उत्पन्न होते हैं।

यहां पर महत् के स्थान पर प्राण की उत्पत्ति कही गई है इसलिये समष्टि प्राण जिसको हिरण्यगर्भ भी कहते हैं, महत् तत्व से भिन्न कोई अन्य तत्व नहीं है। शंकर भगवत्पाद ने ब्रह्म सूत्र (२, ४, १३) 'अणुश्च' के भाष्य में समष्टि व्यष्ट्यात्मक विश्व प्राणों को अधिदैविक हैरण्यगर्भ प्राण कहा है। और ब्रह्म सूत्र (१, ४, २) के भाष्य में महत् को हैरण्यगर्भी बुद्धि बताया है। शुद्ध ब्रह्म की तेजोमयी रश्मियां ही जीवन शक्ति रूपी प्राण की किरणें हैं और इस प्रथमज विभु प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं, जैसा कि नीचे दिये मंत्र से भी विदित होता है।

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । सद्दधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

हिरण्यगर्भ की बुद्धि और चित्त दोनों महत्तत्व के ही रूप हैं। महत् से अहंकार की उत्पत्ति होती है। चित्तस्वरूप महत् वासुदेव भगवान विष्णु है, बुद्धि स्वरूप महत् ब्रह्मा और अहंकार रुद्र शिव अथवा हर है। इसलिये आदि शक्ति तीनों की जननी सह आराध्या है।

सौंदर्य लहरी | ५१

अकृत पुण्य भजन नहीं कर सकते

श्लोक की तीसरी पंक्ति में देवी को हरिहर और ब्रह्मा की आराध्य देवता कहा गया है। क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार असद्विद्या में ही होते हैं। शुद्ध विद्या इनकी भी आराध्या है फिर अकृत पुण्य पापी जीवों की तो वहां गति ही कैसे हो सकती है, वे तो स्तुति और प्रणाम भी नहीं कर सकते। भगवान ने भी गीता में कहा है:—

न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ (७-१)
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ (७-२८)
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् (९-१३)

हरि भी रजोगुण की शक्ति लक्ष्मी के बिना पालन नहीं कर सकते, हर भी सत्व गुण की शक्ति उमा की सहायता से संहार करते हैं, तमोगुण के वशीभूत होकर बिना सोचे समझे संहार करना तो विश्व के कल्याणार्थ नहीं हो सकता, उनकी संहार शक्ति इसलिये सात्विक ज्ञानमयी है। और ब्रह्मा की सृष्टृत्व शक्ति, तामसी मोहासक्ति के बिना उनके ज्ञान वैराग्य पर आवरण डाले, सृष्टि कार्य में उन्हें कैसे प्रवत कर सकती थी। इसलिये ब्रह्मा तमोगुण की शक्ति से युक्त होकर सृष्टि करते हैं। प्रथम मानसिक सृष्टि के सनकादि पुत्रों में ज्ञान वैराग्य देखकर तो उन्हें मैथुनिक सृष्टि क

५२ सौंदर्य लहरी


आश्रय लेना पडा । इसी लिये श्लोक में कहा गया है कि है मां ! तू ही तीनों की आराध्या है ।

दीक्षा का शक्ति से सम्बन्ध ।

गुरु को शिव स्वरूप कहते हैं । जब गुरु शक्ति से युक्त होता है तब ही वह दीक्षा देकर शिष्य की प्रसुप्त शक्ति कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है अन्यथा नहीं । जब तक शक्तिसंपन्न गुरु का अनुग्रह नहीं होता, तब तक शिष्य चाहे कितना भी विद्वान क्यों न हो, पुस्तकों से पढे हुवे मन्त्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता । भगवान राम और कृष्ण को भी गुरु करना पडा था, फिर अन्य साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है । अकृतपुण्य पापी जन तो गुरु की शरण में जा ही नहीं सकते, जब अनेक जन्मों के पुण्यों का उदय होता है तब ही सद्गुरु का समागम मिलता है । शक्ति के बिना जैसे शिव स्पन्दितुमपि न कुशलः तद्वत शक्ति के बिना शिव स्वरुप गुरु भी शिष्य में शक्ति जागरण करने की कुशलता नहीं रखता और शिष्य में भी मंत्र चैतन्य का प्रकाश नहीं होता । मंत्र चैतन्य के बिना मंत्र सिद्धि की बात करना तो बालू से तेल निकालने के बराबर है ।

शिष्य में भी उसका अन्तरात्मा शिव है, परन्तु वह शिव उसको माया की भ्रांति में डालता रहता है ।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ (गी. १८-६१)

सौन्दर्य लहरी ५३


उसकी शरण में अकृत पुण्य नहीं जा सकते। पुण्य प्रभाव से जब सद्गुरू की प्राप्ति होती है, तब गुरू शिष्य की शक्ति का जागरण करके उसे शक्ति से युक्त कर देता है और शक्ति से युक्त होकर शिष्य का अन्तरात्मा स्पंदित होता है और मोक्ष का पथ-प्रदर्शन कराता है। इसलिये जब तक शक्ति का जागरण नहीं होता, शिष्य भी गुरु का अनुगृहीत नहीं होता अर्थात् शिष्यस्थ शिव स्पंदित नही होता।

श्री विद्या
श्री विद्या आदि ब्रह्म विद्या है उसके कादि और हादि मन्त्रों के अनुसार दो अंग होते हैं जिनके दो प्रथम अक्षर शिव और शक्ति के द्योतक हैं और उन्हीं के आधार पर पूर्ण विद्याएं सिद्ध होती हैं। अर्थात् शक्ति के योग के बिना शिव का अक्षर अकेला मन्त्र नहीं बना सकता। तीसरा अक्षर सदारुय तत्व, चौथा महेश्वर और पांचवा शुद्ध विद्या के द्योतक हैं। दोनों अक्षरों के पश्चात् तीसरा काम का द्योतक है। चौथा फिर शिव वाचक है जिसके काम अर्थात ईक्षण (इच्छा) से पृथ्वी तक व्याप्त है। पांचवा अक्षर पृथ्वी का अक्षर है। इस प्रकार ईश्वर, जीव और विश्व का भेद दिखाने वाला दूसरा कूट विद्या कला का संकेत कराता है। तीसरा कूट शक्ति कूट है जो प्रतिष्ठा और निवृत्ति का संकेत कराता है। इस प्रकार कादि विद्या प्रभव मन्त्र है। इसलिये इस श्लोक में यह पद कि शक्ति के योग से ही शिव प्रभव करता है श्री विद्या का प्रतिपादन करने वाले इस ग्रंथ के प्रथम श्लोक में मंगलाचरणार्थ लिखा गया है।

५४ | सौंदर्य लहरी

श्री विद्या का आधार वेद-वेदांत

जब तक किसी विद्या के आधार वेद नहीं सिद्ध होते, तब तक वह विद्या ऋषियों को मान्य नहीं होती, परन्तु श्री विद्या तांत्रिक है और वह श्री गौडपादाचार्य शंकराचार्य प्रभृति की इष्ट थी, इसलिये उसे श्रुतियों का आधार है यह बात निश्चित ही है। परन्तु हम यहां विशेष रूप से इस विषय पर विचार करने का यत्न करते हैं। वेदों के मत से ईश्वर ही सृष्टि का कारण है। यह बात 'जन्माद्यस्ययतः' (ब्र. १, १, २) में कही गई है। क्योंकि सब शास्त्र ऐसा ही सिद्ध करते हैं और जहां कहीं उनके सृष्टि क्रम में भिन्नता दिखाई देती है, उन सब का समन्वय किया जा सकता है यह बात, 'शास्त्रयोनित्वात्' (ब्रं. १, १, ३) और 'तत्तुसमन्वयात्' (ब्र. १, १, ४) इन दो सूत्रों में सिद्ध की गई है। जो लोग सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्म से स्वतंत्र किसी अन्य प्रकृति तत्व से सिद्ध करते हैं, उनके वादों का खण्डन ग्रंथ के उत्तर भाग में किया गया है। कोई-कोई वाद ईश्वर को मानकर भी प्रकृति की सत्ता स्वतंत्र अथवा अंग-अंगी भाव से बताकर ईश्वर को केवल निमित्त कारण ही मानते हैं, वे वाद भी श्रौत नहीं हैं, जैसा कि श्रुतियों के पढ़ने से स्पष्ट प्रतीत होता है। क्योंकि कहीं तो सृष्टिका उदय ईश्वर के ईक्षण या कामनासे वर्णित है, कहीं एजृत्व अर्थात स्पन्दनसे वर्णित है, कहीं मायासे, कहीं शक्ति से, कहीं प्रकृति से। उस परमात्म शक्ति कोही कही आकाश, कहीं अग्नि, कहीं माया, कहीं प्राण, कहीं वायु, कहीं प्रकृति प्रभृति शब्दों से व्यक्त किया गया है। इसका कारण यह है कि उस आदि शक्ति का स्वरूप किसी की समझ में नहीं आ सकता, इसलिये